Category: फ़िजिक्स

  • नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है ?

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है ?

    What is Nuclear Fusion ?

    जब दो या अधिक हल्के नाभिक संयुक्त होकर एक भारी नाभिक बनाते है और अत्यधिक उर्जा विमुक्त करते है, तो इस अभिक्रिया को नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) कहते है l

    यह अभिक्रिया सूर्य और अन्य तारों में संपन्न होती है और अत्यधिक उर्जा उत्पन्न करती है l सूर्य से प्राप्त प्रकाश और ऊष्मा उर्जा का स्त्रोत नाभिकीय संलयन ही है l

    जब अत्यधिक और अति उच्च ताप (जो सूर्य के केंद्रीय भाग में उपलब्ध है ) पर एक ड्यूटेरियम नाभिक ट्रीटियम नाभिक (दोनों हल्के नाभिक) से संयुक्त होता है, तो वे एक हीलियम नाभिक (अपेक्षाकृत भारी नाभिक) बनाते है तथा एक न्यूट्रॉन व अत्यधिक ऊर्जा (17.6 मिलियन इलेक्ट्रॉन वोल्ट) विमुक्त होती है।

    सूर्य की असीमित ऊर्जा का कारण नाभिकीय संलयन है। सूर्य में हाइड्रोजन के समस्थानिक ड्यूटेरियम (HP) के परमाणु नाभिकों के संलयन के फलस्वरूप हीलियम नाभिक का निर्माण होता है। इस दौरान प्रचुर ऊर्जा उत्सर्जित होती है।

    सबसे सफल संलयन रिएक्टर जिसे ‘टोकामक’ के नाम से जाना जाता है, मूलतः सोवियत वैज्ञानिकों द्वारा डिजाइन किया गया था। रशियन भाषा में टोकामक का अर्थ है-शक्तिशाली धारा।

    भारत ने अनुसंधान के उद्देश्य से इंस्टीटयूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च, अहमदाबाद में ‘आदित्य’ नामक टोकामक विकसित कर लिया है।

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) के उदाहरण

    जब दो भारी हाइड्रोजन का नाभिक (ड्यूट्रॉन 1H2) संलयित होते हैं। तो एक ट्राॅइटियम का नाभिक (ट्राइटॉन) तथा एक प्रोटोन (1H1) प्राप्त होता है। तथा इस प्रक्रिया में 4.0 MeV ऊर्जा निकलती है।
    1H2 + 1H2 ⟶⟶ 1H3 + 1H1 + 4.0 MeV ऊर्जा
    अब ट्राॅइटियम का नाभिक एक तीसरे ड्यूट्रॉन के साथ संलयित होकर एक हीलियम नाभिक (2He4) का निर्माण करती हैं। तथा इस प्रक्रिया में 17.6 MeV ऊर्जा मुक्त होती है।
    1H3 + 1H2 ⟶⟶ 2He4 + 0n1 + 17.6 MeV ऊर्जा

    Fusion of deuterium with tritium creating helium-4, freeing a neutron, and releasing 17.59 MeV as kinetic energy of the products while a corresponding amount of mass disappears, in agreement with kinetic E = ∆mc2, where Δm is the decrease in the total rest mass of particles

    अतः इस प्रकार उपरोक्त दोनों अभिक्रियाओं में तीन ड्यूट्रॉन संलयित होकर एक हीलियम नाभिक, एक प्रोटोन तथा एक न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं। तथा इसमें 21.6 MeV ऊर्जा मुक्त होती है। जो प्रोटॉन (sub>1H1) तथा न्यूट्रॉन (sub>0n1) की गतिज ऊर्जा के रूप में होती है।

    हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन प्रक्रिया पर कार्य करता है। अर्थात् हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन का एक उदाहरण है।

    सूर्य एक मुख्य अनुक्रम तारा (Sequence Star जो हाइड्रोजन नाभिक के हीलियम में परमाणु संलयन द्वारा अपनी ऊर्जा उत्पन्न करता है। अपने मूल में, सूर्य प्रति सेकंड 500 मिलियन मीट्रिक टन हाइड्रोजन का संलयन करता है।

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया

    नाभिकीय संलयन प्रक्रिया व्यवहार में नाभिकीय विखंडन के मुकाबले एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। इसका कारण दोनों ड्यूट्रॉनों का धनावेशित होना है। जिसके फलस्वरूप दोनों ड्यूट्रॉन एक दूसरे के निकट मिलने की जगह प्रतिकर्षित हो जाते हैं। यह प्रतिकर्षण बल इतना प्रबल होता है कि अभिक्रिया का होना असंभव सा लगता है। जिस कारण अभिक्रिया में ड्यूट्रॉनों को लगभग 10 मिलियन कैल्विन ताप पर तापित किया जाता है।

    हाइड्रोजन बम

    हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन अभिक्रिया पर आधारित है। इस सिद्धान्त के आधार पर हाइड्रोजन के दो नाभिकों को संलयित करके एक अधिक द्रव्यमान का नाभिक तैयार किया जाता है। इस क्रम में काफी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होता है जो अन्य नाभिकों को भी संलयित करती है जिससे पुनः ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। परिणामस्वरूप अभिक्रिया की एक श्रृंखला बन जाती है जिससे अपरिमित ऊर्जा निःसृत होती है। यह बम, परमाणु बम की अपेक्षा लगभग 10 हजार गुना अधिक विध्वंसात्मक होता है।

    नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया ‘स्व-प्रजननी’ (Self-propagating) होने के कारण बहुत महत्त्वपूर्ण है। ‘नियन्त्रित’ विखण्डन से उत्पन्न ऊर्जा पूर्ण नियन्त्रण में रहती है। यह ऊर्जा मुख्यत: ऊष्मा के रूप में होती है तथा इसका विद्युत और यान्त्रिक ऊर्जा में रूपान्तरण करके अनेक लाभदायक कार्यों में उपयोग किया जा सकता है

    नाभिकीय ऊर्जा के कुछ शान्तिमय उपयोग निम्नलिखित हैं:

    1. विद्युत शक्ति का उत्पादन (Electric power generation) करने में;

    2. जहाज, वायुयान, पनडुब्बी (Submarine) और रेल चलाने में:

    3. रॉकेट उड़ाने में; तथा

    4. रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उत्पादन करने में। इन समस्थानिकों का उनके स्वतः विघटन के गुण के कारण चिकित्सा, कृषि, रासायनिक विश्लेषण, जीव-रसायन अनुसन्धान, इत्यादि कई क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है।

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) से जुड़े प्रश्न और ऊत्तर

    प्रश्न – नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है ?

    उत्तर – जब दो हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के फलस्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनों नाभिकों के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है।

    प्रश्न – नाभिकीय अभिक्रिया से क्या तात्पर्य है?

    उत्तर – नाभिकीय अभिक्रिया वह प्रक्रम है जिसमें में दो नाभिक या नाभिकीय कण आपस में टक्कर करने के बाद नये उत्पाद बनाते हैं। सिद्धांततः नाभिकीय अभिक्रिया में दो से अधिक नाभिक भी भाग ले सकते हैं किन्तु दो से अधिक नाभिकों के एक ही समय पर टकराने की प्रायिकता बहुत कम होती है, इसलिये ऐसी अभिक्रियाएं अत्यन्त कम होती हैं।

    प्रश्न – नाभिकीय विखण्डन व नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है?

    उत्तर – विखंडन का आशय एक बड़े परमाणु का दो या दो से अधिक छोटे परमाणुओं में विभाजन से है। नाभिकीय संलयन का आशय दो हल्के परमाणुओं के संयोजन से एक भारी परमाणु नाभिक के निर्माण की प्रकिया से है। विखंडन प्रकिया सामान्य रूप से प्रकृति में घटित नहीं होती है। प्रायः सूर्य जैसे तारों में संलयन प्रक्रिया घटित होती है।

    प्रश्न – सूर्य में कौन सी क्रिया होती है?

    उत्तर – सूर्य (Sun) में नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया होती है

    प्रश्न – नाभिकीय ऊर्जा का महत्व क्या है?

    उत्तर – यूरेनियम के एक परमाणु क विखण्डन से जो ऊर्जा मुक्त होती है वह कोयले के किसी कार्बन परमाणु के दहन से उत्पन्न ऊर्जा की तुलना में एक करोड़ गुना अधिक होती है। नाभिकीय ऊर्जा प्रदूषण नहीं करती है। यह ऊर्जा थोडी मात्रा में अवशिष्ट पदार्थ उत्पन्न करती है। यह ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा है

  • नाभिकीय विखण्डन (Nuclear Fission) क्या है ?

    नाभिकीय विखण्डन (Nuclear Fission) क्या है ?

    What is Nuclear Fission ?

    जब किसी अस्थायी भारी नाभिक पर उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है, तो वह लगभग समान द्रव्यमान वाले दो नाभिकों में विभक्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को ‘नाभिकीय विखण्डन’ कहा जाता है।

    यूरेनियम-235 का नाभिकीय विखण्डन अनेक प्रकार से हो सकता है, उनमें से एक नाभिकीय अभिक्रिया निम्न प्रकार है:

    श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction)

    यदि बहुत अधिक यूरेनियम-235 के परमाणु उपलब्ध हों, तो नाभिकीय विखण्डन एक श्रृंखला अभिक्रिया बन जाती है। यूरेनियम-235 पर जब मन्द गति वाले न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है, तो U-235 परमाणु एक न्यूट्रॉन को अवशोषित (Absorb) कर लेता है जिससे U-236 का अस्थायी परमाणु बन जाता है। U-236 का नाभिक अत्यधिक अस्थायी होने के कारण तुरन्त दो खण्डों में विभक्त हो जाता है और प्राय: 3 न्यूट्रॉन तथा बहुत अधिक ऊर्जा मुक्त होती है। इस क्रिया में निर्मुक्त न्यूट्रॉनो में से माना दो न्यूट्रॉन दूसरे दो U-235 परमाणुओं का विखण्डन करते है जिससे पहले से अधिक ऊर्जा और लगभग 6 न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं। माना इनमें से 4 न्यूट्रॉन दूसरे चार U-235 परमाणुओं का विखण्डन करते हैं जिससे और अधिक ऊर्जा एवं लगभग 12 न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं। इस प्रकार यह क्रिया अपने-आप आगे बढ़ती रहती है और अभिक्रियाओं की एक श्रृंखला बन जाती है। प्रथम विखण्डन क्रिया प्रारम्भ होने के पश्चात् बाहर से न्यूट्रॉनों की बमबारी करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि अभिक्रिया में उत्पन्न हुए न्यूट्रॉन (मन्दित होकर) विखण्डन अभिक्रिया को स्वयं आगे बढ़ाते रहते हैं। इसे ही ‘श्रृंखला अभिक्रिया’ कहते हैं

    यह अभिक्रिया भी दो प्रकार की बनाई जा सकती है—अनियन्त्रित तथा नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया।

    परमाणु बम (Atom Bomb)

    नाभिकीय विखण्डन क्रिया पर जब किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होता है, तो विखण्डन क्रिया की दर बहुत तीव्र होती है जिस कारण कुछ ही क्षणों में प्रचण्ड विस्फोट हो जाता है। परमाणु बम में अनियन्त्रित विखण्डन क्रिया होती है। प्रथम परमाणु बम सन् 1945 में बनाया गया था

    द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रथम परमाणु बम का विस्फोट 6 अगस्त, 1945 को जापान में हिरोशिमा पर और इसके तीन दिन बाद ही दूसरा परमाणु-विस्फोट जापान में ही नागासाकी पर किया गया था।

    समृद्धित यूरेनियम (Enriched Uranium)

    परमाणु बम के निर्माण में पर्याप्त यूरेनियम-235 की आवश्यकता होती है परन्तु प्राकृतिक यूरेनियम में केवल 0.7% ही यूरेनियम-235 होता है शेष यूरेनियम-238 होता है जिसका विखण्डन मन्द न्यूट्रॉनों द्वारा नहीं होता है। अतः प्राकृतिक यूरेनियम से यूरेनियम-235 अलग किया जाता है। वह यूरेनियम जिसमें विखण्डनीय यूरेनियम-235 की प्रचुर मात्रा होती है उसे ‘समृद्धित यूरेनियम’ कहते हैं।

    नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor)

    नियन्त्रित नाभिकीय शृंखला उत्पन्न करने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले रिएक्टर को ‘नाभिकीय रिएक्टर या परमाणु भट्टी‘ कहा जाता है। इसमें यूरेनियम-235 का नियन्त्रित विखण्डन कराया जाता है। विखण्डन में निकलने वाली ऊर्जा अधिकांशतः ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में होती है जिससे पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है। इस भाप द्वारा टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है। प्रथम नाभिकीय रिएक्टर वैज्ञानिक ऐनरिको फर्मी के निर्देशन में अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय में सन् 1942 में बनाया गया था

    नाभिकीय रिएक्टर के पांच भाग होते हैं:

    नाभिकीय ईंधन (Nuclear Fuel) : यह रिएक्टर का मुख्य भाग होता है। इसमें विखण्डनीय (Fissile) पदार्थ होता है। यह प्रायः समृद्धित यूरेनियम होता है।

    मन्दक (Moderator) : यह विखण्डन अभिक्रिया में उत्पन्न तीव्र न्यूट्रॉनों को मन्दित करता है। इसके लिए प्रायः ग्रेफाइट या भारी जल (Heavy water) का उपयोग किया जाता है। ड्यूटेरियम ऑक्साइड (D2O) को भारी जल कहते है l इस प्रकार के जल का घनत्व साधारण जल के घनत्व से लगभग 10% अधिक होता है। भारी जल को सबसे अच्छा मंदक माना जाता है।

    नियन्त्रक छड़ें (Control Rods) : विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया को नियन्त्रण में रखने के लिए कैडमियम या बोरॉन की लम्बी छड़ों का उपयोग किया जाता है जिनकी कुछ लम्बाई को रिएक्टर के विखण्डन कक्ष (Fission chamber) के अन्दर तथा कुछ को बाहर रखा जाता है। ये छड़ें विखण्डन में उत्पन्न होने वाले न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेती हैं, अत: विखण्डन की श्रृंखला रुक जाती है।

    शीतलक (Coolant): नाभिकीय विखण्डन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊष्मा निर्मुक्त होती है, जिसे ठण्डा करना आवश्यक होता है। इस निर्मित रिएक्टर में वायु, जल और कार्बन डाइऑक्साइड प्रवाहित किए जाते हैं। इस ऊष्मा का उपयोग वाष्प निर्माण में किया जाता है जिससे टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादित की जाती है

    परिरक्षक (Protector) : नाभिकीय विखण्डन के दौरान कई प्रकार की उच्च शक्ति और भेदन क्षमता वाली किरणें निकलती हैं। इन किरणों से रक्षा के लिए रिएक्टर के चारों ओर कंक्रीट की मोटी-मोटी दीवारों का निर्माण किया जाता है, जिसे ‘परिरक्षक’ कहा जाता है। भारत तथा अन्य कई देशों में नाभिकीय रिएक्टरों का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त रिएक्टर से रेडियोऐक्टिव समस्थानिक (Radioactive isotopes) भी प्राप्त होते हैं। रिएक्टर द्वारा यूरेनियम-238 को विखण्डन-योग्य (Fissile) तत्व प्लूटोनियम-239 में भी परिवर्तित किया जाता है और तब उसे परमाणु बम के निर्माण में प्रयुक्त किया जा सकता है

    ब्रीडर रिएक्टर (Breeder Reactor)

    ऐसा रिएक्टर जो प्रयुक्त किए गए विखण्डनीय पदार्थ की तुलना में अधिक विखण्डनीय पदार्थ उत्पन्न करता है, ‘ब्रीडर रिएक्टर’ कहलाता है अर्थात् इसमें प्रयुक्त पदार्थ ही और अधिक मात्रा में उत्पन्न किया जाता है। प्रारम्भ में प्लूटोनियम-239 द्वारा समृद्धित यूरेनियम-238 का अथवा थोरियम-232 का उपयोग किया जाता है, उसके पश्चात् यूरेनियम-238 में एक न्यूट्रॉन संयुक्त हो जाने से प्लूटोनियम-239 प्राप्त होता है और थोरियम-232 से यूरोनियम-233 प्राप्त होता है।

  • द्रव्यमान-ऊर्जा और बन्धन ऊर्जा

    द्रव्यमान-ऊर्जा और बन्धन ऊर्जा

    Mass-Energy and Binding Energy

    नाभिकीय ऊर्जा

    नाभिकीय ऊर्जा (परमाणु ऊर्जा) एक परमाणु के नाभिक या कोर में उपलब्ध उर्जा है। परमाणु ऊर्जा का उपयोग बिजली बनाने के लिए किया जाता है। परमाणु ऊर्जा परमाणु विखंडन, परमाणु क्षय और परमाणु संलयन प्रतिक्रियाओं से प्राप्त की जा सकती है।

    द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता (Mass-Energy Equivalence)

    सम्पूर्ण नाभिकीय ऊर्जा का मूल स्रोत है द्रव्यमान का ऊर्जा में परिवर्तन।

    महान् वैज्ञानिक आइन्सटीन ने बताया कि प्रत्येक द्रव्यमान (m), ऊर्जा (E) के समतुल्य है: E=mc2 जहां, c निर्वात (Vacuum) में प्रकाश की चाल है जो 3 x 108 मीटर/सेकण्ड होती है। इस प्रकार एक किलोग्राम द्रव्यमान के समतुल्य ऊर्जा 1 x (3 x 108) = 9 x 1016 जूल होती है। यह अति विशाल ऊर्जा है। अत: m किलोग्राम द्रव्यमान के लुप्त होने mc2 जूल ऊर्जा उत्पन्न होती है तथा 5 जूल ऊर्जा के उत्पन्न होने पर E/c2 किलोग्राम द्रव्यमान की क्षति (Loss) होती है।

    बन्धन ऊर्जा (Binding Energy)

    नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनन्यूट्रॉन को ‘न्यूक्लिऑन’ (Nucleon) कहते हैं। नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान उसमें उपस्थित न्यूक्लिऑनों के द्रव्यमानों के योग से सदैव कुछ कम होता है। यह द्रव्यमान अन्तर ‘द्रव्यमान क्षति’ (Mass defect) कहलाता है

    जब प्रोटॉन व न्यूट्रॉन मिलकर नाभिक की रचना करते हैं, तो कुछ द्रव्यमान लुप्त हो जाता है। यह लुप्त द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। अतः न्यूट्रॉन व प्रोटॉन के संयोग से किसी नाभिक के बनने में जो ऊर्जा विमुक्त होती है उसे नाभिक की बन्धन ऊर्जा कहते हैं

  • रेडियोऐक्टिव समस्थानिक (Radioactive Isotopes) क्या है ?

    रेडियोऐक्टिव समस्थानिक (Radioactive Isotopes) क्या है ?

    What are Radioactive Isotopes ?

    रेडियोऐक्टिव समस्थानिक बनाने के लिए पदार्थों को रिएक्टर में न्यूट्रॉनों द्वारा किरणित (Irradiated) किया जाता है अथवा उन पर त्वरक (Accelerator) से प्राप्त उच्च ऊर्जा कणों द्वारा बमबारी की जाती है।

    आजकल रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों को उपयोग वैज्ञानिक शोध कार्य, चिकित्सा, कृषि एवं उद्योगों में लगातार बढ़ता जा रहा है। एक तत्व के सभी समस्थानिकों के रासायनिक गुण एक समान होते हैं परन्तु नाभिकीय गुण बहुत भिन्न होते हैं।

    समस्थानिकों का उपयोग

    चिकित्सा में उपयोग

    कोबाल्ट-60 एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक है जो उच्च ऊर्जा की गामा किरणें उत्सर्जित करता है। इन गामा किरणों का उपयोग कैंसर के इलाज में किया जाता है। थायरॉइड ग्रन्थि के कैंसर की चिकित्सा के लिए शरीर में रेडियोऐक्टिव आयोडीन समस्थानिक की पर्याप्त मात्रा प्रविष्ट कराई जाती है।

    पाचन क्रिया के अध्ययन के लिए भी रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है। भोजन में एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक की थोड़ी-सी मात्रा मिला दी जाती है और रोगी मनुष्य को वह भोजन खिला दिया जाता है। उसके पश्चात् वह भोजन शरीर में जहां-जहां जाता है, उस मार्ग को जी. एम. काउण्टर नामक यन्त्र द्वारा पूर्णतः पहचान लिया जाता है।

    जी. एम. अर्थात् Geiger-Miller काउण्टर एक ऐसी युक्ति (Device) है जो रेडियोऐक्टिव पदार्थ की उपस्थिति को पहचान लेती है तथा उसकी सक्रियता (Activity) को माप भी सकती है।

    रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उपयोग मानव शरीर में संचरित होने वाले कुल रक्त का आयतन ज्ञात करने में भी किया जाता है। रोगी पर शल्य-क्रिया करने के पहले और बाद में इस प्रकार रक्त के आयतन की माप करके यह पता लगाया जाता है, कि शल्य-क्रिया में कुल कितने रक्त की हानि हुई और उतना ही रक्त पुनः रोगी को को बाहर से दिया जाता है।

    उदाहरण के लिए, थायरॉइड ग्रन्थि के कैंसर के उपचार के लिए I-131, टयूमर की खोज में As-74 तथा परिसंचरण तन्त्र में रक्त के थक्के का पता लगाने के लिए Na-24 समस्थानिक का उपयोग किया जाता है। Co-60 का उपयोग सामान्य कैंसर के उपचार में किया जाता है।

    कृषि में उपयोग

    पौधे ने कितना उर्वरक (Fertilizer) ग्रहण किया है, इसका पता रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों की विधि से लगाया जाता है। इसे ‘ट्रेसर विधि’ (Tracer technique) कहते हैं।

    उर्वरक को पौधे में लगाने से पहले उसमें किसी रेडियोऐक्टिव समस्थानिक की थोड़ी-सी मात्रा मिला दी जाती है। जब पौधे बढ़ने लगता है, तो जी. एम. काउण्टर द्वारा पौधे में उपस्थित उर्वरक की मात्रा ज्ञात हो जाती है। इससे यह पता चलता है, कि किस पौधे को कौन-सा उर्वरक कितनी मात्रा में दिया जाना चाहिए। गामा किरणों द्वारा खाने के पदार्थों को अनुर्वर (Sterilize) किया जाता है तथा जीव नाशक (Pests) के रूप में उपयोग किया जाता है।

    उद्योग में उपयोग

    ऑटोमोबाइल के इंजन के क्षयन (Wear) का पता लगाने के लिए ट्रेसर विधि का उपयोग किया जाता है। इसके लिए इंजन के पिस्टन को रेडियोऐक्टिव बना कर पुन: इंजन में फिट कर दिया जाता है। फिर उसके स्नेहन तेल (Lubricating oil) में रेडियोऐक्टिविटी के बढ़ने की दर को माप करके पिस्टन के क्षयन (या घिसाव) को ज्ञात किया जाता है

    कार्बन काल-निर्धारण (Carbon Dating)

    मृत पेड़ पौधों, आदि जैसे प्राचीन वस्तुओं की आयु ज्ञात करने के लिए उसमें उपस्थित कार्बन समस्थानिक (6C14) के क्षय होने की दर को ज्ञात करने की विधि कार्बन आयु अंकन कहलाती है।

    जीवित अवस्था में प्रत्येक जीव (पौधे या जन्तु) कार्बन-14 (एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक) तत्व को ग्रहण करता रहता है और मृत्यु के बाद उसका ग्रहण करना बन्द हो जाता है। अत: मृत्यु के बाद जीव के शरीर में प्राकृतिक रूप से कार्बन-14 के क्षय (Decay) द्वारा उसकी मात्रा कम होती रहती है। अत: किसी मृत जीव में कार्बन-14 की सक्रियता को माप करके उसकी मृत्यु से वर्तमान तक के समय की गणना की जा सकती है।

    यूरेनियम काल-निर्धारण

    चट्टान, आदि प्राचीन निर्जीव पदार्थों की आयु को उनमें उपस्थित रेडियोऐक्टिव खनिजों, जैसे—यूरेनियम द्वारा ज्ञात किया जाता है। यूरेनियम काल-निर्धारण की इस विधि द्वारा चन्द्रमा से लाई गई चट्टानों की आयु 4.6 x 109 (4.6 अरब) वर्ष पाई गई है जो लगभग उतनी ही है जितनी पृथ्वी की है।

  • रेडियोधर्मिता (Radioactivity) क्या है ?

    रेडियोधर्मिता (Radioactivity) क्या है ?

    What is Radioactivity ?

    बड़े नाभिकों में दो प्रोटॉनों के बीच में दूरी इतनी कम हो जाती है कि प्रोटॉनों के मध्य उनके समान विद्युत-आवेश के कारण लगने वाला प्रतिकर्षण बल, उनके मध्य लगने वाले नाभिकीय बल (Nuclear force) जो एक आकर्षण बल होता है, से अधिक हो जाता है।

    यह पाया गया है कि जिन नाभिकों में प्रोटॉनों की संख्या 83 या उससे अधिक होती है, वे अस्थायी होते हैं। स्थायित्व प्राप्त करने के लिए ये नाभिक स्वतः ही अल्फा (α), बीटा (β) तथा गामा (γ) किरणों का उत्सर्जन करने लगते हैं। ऐसे नाभिक जिन तत्वों के परमाणुओं में होते हैं उन्हें ‘रेडियोऐक्टिव तत्व’ कहते है तथा उपर्युक्त किरणों के उत्सर्जन की घटना को ‘रेडियोधर्मिता’ कहते हैं।

    अल्फा किरणें वास्तव में धनावेशित हीलियम नाभिकों से बनी होती है तथा बीटा किरणें केवल तीव्र गति से गमन करने वाले ऋणावेश युक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं। गामा किरणे आवेश रहित फोटॉन कणों से बनती है। जब किसी नाभिक से अल्फा किरणें या बीटा किरणें उत्सर्जित हो जाती है, तो वह नाभिक एक नये तत्व के नाभिक में बदल जाता है। यदि यह नाभिक उत्तेजित अवस्था में होता है, तो वह अपने उत्तेजन ऊर्जा को गामा किरणों के रूप में उत्सर्जित करके अपनी मूल अवस्था (Ground state) में आ जाता है। इस प्रकार गामा किरणें, अल्फा या बीटा किरणों के बाद ही उत्सर्जित होती हैं।

    अर्ध-आयु (Half-life)

    किसी रेडियोऐक्टिव तत्व में किसी क्षण पर उपस्थित परमाणुओं के आधे परमाणु जितने समय में विघटित (Disintegrate) हो जाते हैं, उस समय को उस तत्व की ‘अर्ध-आयु’ कहते हैं। प्रत्येक रेडियोऐक्टिव तत्व की अर्ध-आयु निश्चित होती है। विभिन्न तत्वों की अर्ध-आयु 10-7 सेकण्ड से 1010 वर्ष तक पायी जाती है।

    तत्वान्तरण (Transmutation)

    एक रेडियोऐक्टिव तत्व का दूसरे तत्व में परिवर्तित हो जाना तत्वान्तरण कहलाता है।

    प्राकृतिक रेडियोऐक्टिव तत्व तो अल्फा या बीटा कण का उत्सर्जन करके दूसरे तत्वों में बदलते रहते ही हैं; इनके अतिरिक्त कृत्रिम रूप से भी नये तत्व बनाए जा सकते हैं। इसके लिए परमाणु क्रमांक 92 (यूरेनियम) से ऊपर के तत्वों को चुना जाता है और उन पर उच्च ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन की बमबारी (Bombarding) की जाती है। इस प्रकार के कृत्रिम तत्वान्तरण द्वारा अब प्रायः सभी तत्वों को रेडियोऐक्टिव भी बनाया जा सकता है।

    ऐक्टिवता (Activity)

    एक या अधिक नाभिकों के किसी नमूने (Sample) की कुल क्षमता दर (Rate of decay) उस नमूने की ‘सक्रियता’ या ‘ऐक्टिवता’ कहलाती है। इसका (SI) मात्रक ‘बेकेरल’ (Baquerrel) है।

    रेडियोधर्मिता की इकाइयाँ(Units of Radioactivity)

    क्यूरी और रदरफोर्ड रेडियोधर्मिता की इकाइयाँ हैं।

    1C = 3.7 × 10 4 Rd क्यूरी और रदरफोर्ड के बीच का संबंध है।

    1907 से पहले अपनी पेरिस प्रयोगशाला में पियरे और मैरी क्यूरी

    रेडियोधर्मी विकिरण(Radioactive Radiations)

    निम्नलिखित तीन रेडियोधर्मी विकिरण हैं जो α, β, और किरणों से प्राप्त होते हैं:

    1.ज़ब किसी तत्व से एक अल्फ़ा कण निकलता है तो उसके परमाणुभार से 4 की कमी और परमाणु क्रमांक से 2 की कमी होती है।

    2.ज़ब किसी तत्व से एक बिटा कण निकलता है तो उसके परमाणु भार में कोई परिवर्तन नहीं होता जबकि परमाणु क्रमांक में 1 की वृद्धि हो जाती है।

    3.ज़ब किसी तत्व से एक गामा किरण निकलती है तो उसके परमाणु भार और परमाणु क्रमांक में कोई परिवर्तन नहीं होत है।

    रेडियोएक्टिव पदार्थ

    सन् 1898 ई० में क्यूरी दंपति ने एक नए रेडियोएक्टिव पदार्थ की खोज (अविष्कार) की। उन्होंने लगभग 30 टन पिथ ब्लेंडी नामक पदार्थ पर कठोर परिश्रमी रासायनिक अभिक्रियाएं की, इस अभिक्रिया में विभिन्न प्रकार के तत्व प्राप्त हुए। सभी तत्वों को अलग करने के बाद केवल 2 मिलीग्राम रेडियम रेडियोएक्टिव पदार्थ प्राप्त हुआ।
    रेडियोएक्टिव पदार्थ यूरेनियम, थोरियम, पोलोनियम, एक्टिमियम तथा रेडियम आदि रेडियोएक्टिव पदार्थ हैं इन्हें रेडियोधर्मी पदार्थ के नाम से भी जाना जाता है।

    रेडियोएक्टिव क्षय का नियम

    एक नाभिक द्वारा अल्फा क्षय दो न्यूट्रॉन और दो प्रोटॉन के एक अल्फा कण का उत्सर्जन करता है

    जब किसी रेडियोएक्टिव पदार्थ के परमाणु से अथवा कण तथा किरणें निकलती हैं तो इस घटना से परमाणु का भार व क्रमांक में परिवर्तन हो जाता है। और एक नए तत्व के परमाणु का निर्माण होता है इस घटना को रेडियोएक्टिव क्षय कहते हैं।

    इस नियम के अनुसार, ” किसी भी क्षण रेडियोएक्टिव परमाणुओं के क्षय होने की दर उस क्षण उपस्थिति रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या के अनुक्रमानुपाती होती है। “
    माना किसी क्षण t पर रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या N है। तथा (t + dt) क्षण पर यह संख्या घटकर (N + dtN) हो जाती है। तब रेडियोएक्टिव परमाणुओं के क्षय होने की दर −dt/dN होगी।
    अतः रदरफोर्ड सोडी के नियम अनुसार

    इस नियम को रदरफोर्ड सोडी नियम अथवा रेडियोएक्टिव क्षय का नियम कहते हैं।
    जहां N = रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या
    N0 = समय (t = 0) पर रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या
    λ = रेडियोएक्टिव परमाणुओं का क्षय नियतांक
    t = समय है।

    रेडियोधर्मिता के लाभ और हानि (Advantages and Disadvantages of Radioactivity)

    • गामा किरणों का उपयोग कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए किया जाता है और इसलिए इसका उपयोग रेडियोथेरेपी में किया जाता है।
    • कोबाल्ट-60 का प्रयोग कार्सिनोजेनिक कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
    • गामा किरणों का उपयोग शरीर के आंतरिक अंगों को स्कैन करने के लिए किया जाता है।
    • गामा किरणें भोजन में मौजूद रोगाणुओं को मारती हैं और शेल्फ लाइफ को बढ़ाकर इसे क्षय से बचाती हैं।
    • चट्टान में मौजूद आर्गन सामग्री को मापकर रेडियोधर्मी विकिरणों का उपयोग करके चट्टानों की आयु का अध्ययन किया जा सकता है।

    रेडियोधर्मिता के नुकसान

    • शरीर पर रेडियोधर्मी विकिरण की उच्च खुराक से मृत्यु हो सकती है।
    • रेडियोधर्मी समस्थानिक महंगे हैं।
  • नाभिक क्या है ?

    नाभिक क्या है ?

    What is Nucleus ?

    नाभिक एक परमाणु का केंद्र कोर होता है जिसमें धनात्मक आवेश होता है और जिसमें परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान, या किसी संगठन या समूह का केंद्रीय हृदय (Central Heart of an Organization or Group) होता है।

    नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन कण होते हैं

    नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को ‘परमाणु क्रमांक’ (Atomic number) कहते हैं।

    नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों तथा न्यूटॉनों की कुल संख्या को परमाणु की ‘द्रव्यमान संख्या’ (Mass number) कहते हैं। पदार्थ की रचना परमाणुओं से होती है परन्तु परमाणु भी कुछ मूल कणों से बना होता है।

    प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इलेक्ट्रॉन तो प्रचलित मूल कण हैं ही, इनके अतिरिक्त भी अनेक मूल कण हैं। प्रत्येक मूल कण का प्रति कण (Antiparticle) भी होता है। कुछ प्रमुख मूल कणों का विवरण निम्नलिखित है:

    इलेक्ट्रॉन (Electron)

    इलेक्ट्रॉन की खोज 1897 में अंग्रेज वैज्ञानिक जे. जे. थॉमसन ने कैथोड किरणों के रूप में की। इलेक्ट्रॉन अतिसूक्ष्म कण होते है तथा ये परमाणु में नाभिक के बाहर चारों ओर चक्कर लगाते हैं। इन पर 1.6 x 10-19 कूलॉम का ऋणात्मक आवेश होता है। इनका द्रव्यमान 9.1 x 10-31 किग्रा. होता है। यह एक स्थायी (Stable) मूल कण है ।

    प्रोटॉन (Proton)

    प्रोटॉन की खोज अंग्रेज वैज्ञानिक रदरफोर्ड ने सन् 1919 में नाइट्रोजन नाभिकों पर कणों का प्रहार करके की। प्रोटॉन का द्रव्यमान 1.67239 x 10-27 किग्रा. होता है और आवेश 1.6x 10-19 कूलॉम धनात्मक होता है। यह एक अतिसूक्ष्म कण है। इसका उपयोग कृत्रिम तत्वान्तरण (Artificial transmutation) में होता है।

    न्यूट्रॉन (Neutron)

    न्यूट्रॉन की खोज अंग्रेज वैज्ञानिक चैडविक ने सन् 1932 में बेरेलियम पर a कणों का प्रहार करके की। यह एक आवेश रहित कण है। इसका द्रव्यमान 1.675 x x 10-27 किग्रा. होता है। इसकी भेदन-क्षमता (Penetrating power) अत्यधिक होती है। यह कैंसर की चिकित्सा और नाभिकीय विखण्डन (Nuclear fission) में प्रयुक्त किया जाता है।

    पोजिट्रॉन (Positron)

    यह एक धनावेशित मूल कण है जिसका द्रव्यमान व आवेश इलेक्ट्रॉन के बराबर होता है। इसलिए इसे इलेक्ट्रॉन का प्रतिकण या ऐण्टि-कण (Anti-particle) भी कहते हैं। इसकी खोज 1932 में एण्डरसन (Anderson) ने की थी।

    न्यूट्रिनों (Neutrino)

    ये लगभग द्रव्यमान रहित व आवेश रहित मूल कण हैं। इनकी खोज 1930 में पाउली (Pauli) ने की थी। न्यूट्रिनों का भी प्रतिकण होता है जिसे ‘ऐण्टिन्यूट्रिनों’ कहते हैं। इन दोनों में अन्तर केवल इतना ही है, कि ऐण्टिन्यूट्रिनों की स्पिन (Spin) न्यूट्रिनों की स्पिन के विपरीत होती है l

    पाई-मेसॉन (π-Meson)

    पाई-मेसॉन मूल कणों की सैद्धान्तिक खोज सन् 1935 में वैज्ञानिक युकावा ने की थी। ये कण तीन प्रकार के होते हैं — उदासीन (π०), धनात्मक (π+), ऋणात्मक (π) पाई-मेसॉन। ये अस्थायी कण होते हैं। इनका जीवन काल 10-8 सेकण्ड व द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान का लगभग 274 गुना होता है।

    फोटॉन (Photon)

    फोटॉन ऊर्जा के बण्डल (Packets) होते है जो प्रकाश की चाल से चलते हैं। सभी प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय किरणों का निर्माण इन्हीं मूल कणों से होता है। इनका विराम द्रव्यमान (Rest mass) शून्य होता है।

    कुछ नाभिक दूसरों की अपेक्षा अधिक स्थायी होते हैं। नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उनके मध्य प्रतिकर्षण बल भी बढ़ जाता है जिससे नाभिक के टूटने का खतरा पैदा हो जाता है। जिन नाभिकों में प्रोटॉनों (या न्यूटॉनों) की संख्या 2, 8, 14, 20, 50, या 82 होती है, वे स्थायी होते हैं। इसके अतिरिक्त जिन नाभिकों में प्रोटॉन संख्या 114 होती है, वे भी स्थायी होते हैं । इसी प्रकार जिन नाभिकों में न्यूट्रॉनों की संख्या 126 या 184 होती है, वे भी स्थायी होते हैं।

    अतः न्यूट्रॉन संख्या N या प्रोटॉन संख्या Z के मान 2, 8, 14, 20, 50 तथा 82 ‘स्थायित्व संख्याएं’ (Magic numbers) कहलाते हैं।

    ऐक्टिवता (Activity)

    एक या अधिक नाभिकों के किसी नमूने (Sample) की कुल क्षमता दर (Rate of decay) उस नमूने की ‘सक्रियता’ या ‘ऐक्टिवता’ कहलाती है। इसका (SI) मात्रक ‘बेकेरल’ (Baquerrel) है।

  • मेसर (Maser) क्या है ?

    मेसर (Maser) क्या है ?

    What is Maser ?

    मेसर का अर्थ है ‘विकिरण के उद्दीपित उत्सर्जन द्वारा माइक्रोतरंग का प्रवर्धन‘ (Microwave Amplification by Stimulated Emission of Radiation)।

    मेसर एक शक्तिशाली, एकवर्णी, समान्तरित्र एवं कला-सम्बद्ध (Collimated and coherent) माइक्रोतरंग किरण-पुंज प्राप्त करने की युक्ति (Device) है। सर्वप्रथम अमोनिया मेसर बनाया गया था

    मेसर के उपयोग

    अन्तरिक्ष व समुद्र में संदेश-प्रेषण, जटिल ऑपरेशन, कैंसर, अल्सर व आंख की बीमारियों की चिकित्सा हेतु प्रयुक्त किया जाता है।

  • लेसर (Laser) क्या है और कैसे काम करता है ?

    लेसर (Laser) क्या है और कैसे काम करता है ?

    What is a laser and how does it work ?

    लेसर बीसवीं सदी के वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है

    लेसर ‘लाइट ऐम्प्लिफिकेशन बाई स्टिमुलेटेड इमीशन ऑफ रेडिएशन’ (Light Amplification by Stimulated Emission of Radiation) का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ होता है—उद्दीपित उत्सर्जन प्रक्रिया द्वारा प्रकाश तरंगों का प्रवर्द्धन

    लेसर प्रकाश पुंज का फैलाव बहुत कम होता है परन्तु उसकी दीप्ति, तीव्रता व कलासम्बद्धता (Coherence) बहुत अधिक होती है।

    दो प्रकाश स्रोत उस समय कला सम्बद्ध (Coherent) कहलाते हैं जब वे ऐसी तरंगे उत्पन्न करते हैं जिनके मध्य कलान्तर (Phase difference) या तो शून्य होता है या नियत रहता है।

    सन् 1961 के आरम्भ में विभिन्न प्रकार के लेसर का आविष्कार किया गया था, जैसे—रुबी लेसर, द्रव लेसर, प्लाज्मा लेसर, आदि। लेसर किरणे एकवर्णी, समानान्तर किरण पुंज हैं जिसकी तीव्रता बहुत अधिक होती है। हजारों किलोमीटर चलने के बाद न ही उनकी तीव्रता कम होती है और न ही उनका फैलाव अधिक होता है।

    लेसर के उपयोग

    1. संचार में: लेसर किरणों को कांच तन्तु (Glass fibre) की प्रकाश नलिका (Optical pipe) के द्वारा संचारित किया जाता है। इसके द्वारा सूचना संकेतों को बिना किसी बाधा के बहुत लम्बी दूरी तक पहुंचाया जाता है। टेलीफोन, केबल टी.वी. इण्टरनेट, इत्यादि के मिश्रित संदेश भविष्य में प्रकाशीय तन्तु व लेसर के द्वारा भेजा जा सकेगा।

    2. वायु प्रदूषण का संसूचन (Detection) अब लेसर द्वारा किया जा सकता है

    3. सर्वेक्षण (Survey) में लेसर किरणें एक निश्चित दिशा में भेजी जा सकती हैं। ये किरणें जल के अन्दर भी जा सकती हैं जिसके आधार पर गहरे समुद्र के तल के मानचित्र बनाए जा सकते हैं। समुद्र-तल के ताप वितरण का ग्राफ बनाया जा सकता है। समुद्र-तल में स्थित गैस तथा तेल की भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

    4. मौसम के अध्ययन में : बादल, मौसम, आर्द्रता, आदि की पूरी जानकारी लेसर किरणों की सहायता से प्राप्त की जा सकती है।

    5. चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सा के क्षेत्र में लेसर का उपयोग काफी आगे बढ़ चुका है। रेटिना, कैंसर, नेत्र-रोग, बिना चीर-फाड़ के ऑपरेशन, हृदय-रोग, आदि विभिन्न रोगों के उपचार में इसका उपयोग किया जाता है। इसकी सहायता से बिना चीर-फाड़ के शल्य-चिकित्सा सम्भव हो सकी है, क्योंकि यह न सिर्फ रक्त नलिकाओं को काटता है बल्कि तुरन्त जोड़ भी देता है। हृदय की धमनियों में अवरोध उत्पन्न होने पर शल्य-चिकित्सा कराने के लिए सीने की हडिड्यों को तोड़कर ऑपरेशन किया जाता है जिसमें रोगी को काफी कष्ट होता है, लेकिन लेसर के प्रयोग से यह ऑपरेशन काफी सरल हो चुका है। इस ऑपरेशन में पहले समय ज्यादा लगता था, लेकिन अब समय की भी बचत हो जाती है। गुर्दे में पथरी को तोड़ने के लिए इसकी मदद ली जाती है। सन् 1963 में न्यू इंग्लैण्ड मेडिकल सेण्टर के वैज्ञानिक थ्रफ्ट (Thrufts) ने सर्वप्रथम इसकी सहायता से ‘कैंसर ऑपरेशन’ में सफलता पाई

    6. एक्यूपंक्चर क्रिया में भी लेसर किरणों का उपयोग होता है। इसमें एक्यूपंक्चर बिन्दुओं पर लेसर किरणें डाली जाती हैं। इन बिन्दुओं पर सूई लगाकर 30 सेकण्ड तक लेसर किरणों से उचित प्रभाव उत्पन्न किया जाता है जिससे सभी प्रकार के दर्द, पोलियो, मिर्गी, लकवा, स्त्री रोग, खांसी, जुकाम, चर्म रोग, रक्तचाप, गंजापन, कब्ज, मानसिक रोग, अनिद्रा, चेहरे पर झुर्रियां, इत्यादि रोगों का इलाज सम्भव हो सका है। लेसर की सहायता से सिगरेट, शराब एवं अन्य नशीले पदार्थों के सेवन की आदतों से भी छुटकारा पाया जा सकता है। स्त्रियों का बांझपन भी अब इन किरणों की सहायता से बड़ी कुशलतापूर्वक दूर किया जाने लगा है। आंखों के दृष्टि-दोष में कार्निया को लेसर से खुरचकर ठीक किया जाता है जिससे रोगी को चश्मा पहनने की जरूरत नहीं पड़ती हैं।

    7. होलोग्राफी में: होलोग्राफी लेसर का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपयोग है। इससे वस्तुओं का त्रिविमीय प्रतिबिम्ब प्राप्त किया जाता है। सन् 1962 में वाई. एन. डेनीसुक (Y.N. Denisyuk) ने होलोग्राफी का प्रथम उपयोग किया। होलोग्राफी के उपयोग से भविष्य में त्रिविमीय टेलीविजन बनाया जा सकता है l

    8. कॉम्पैक्ट डिस्क (CD) पर लिखने व उसको पढ़ने के लिए लेसर किरणों का उपयोग किया जाता है। CD में ढेर सारी सूचनाएं, संगीत व आंकड़ों का अंकन किया जा सकता है। बार-बार प्रयोग करने के बाद भी इन CD को कोई क्षति नहीं होती है।

    9. नाभिकीय संलयन में : लेसर के प्लाज्मा हीटिंग का उपयोग रिएक्टरों में प्रयुक्त ईंधनों के कृत्रिम निर्माण में होता है। इस विधि में ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए लेसर एक प्रमुख साधन है।

    10. सफाई कार्य में : स्मारकों, भवनों, पुरातात्विक अवशेषों, आदि को साफ-सुथरा रखने तथा उनको नवीनता प्रदान करने के लिए हाल ही में लेसर तकनीक का विकास किया गया है।

    11. सेना में लेसर का उपयोग दुश्मन के प्रक्षेपास्त्रों को नष्ट करने में किया जाता है, इसलिए इसे ‘मृत्यु किरण’ (Death ray) भी कहते हैं।

    12. आजकल लेसर का प्रयोग ‘यूरेनियम के परिष्करण’ (Purification) में भी किया जाता है। परिष्कृत यूरेनियम का उपयोग परमाणु बिजली घरों (Atomic power stations) में किया जाता है। लेसर का उपयोग अनाज, चावल, आदि खाद्यान्नों में कीड़ों को मारने के लिए भी किया जा सकता है। इसके आन्तरिक लेसर प्रिंटिंग व तीक्ष्ण धार बनाने में भी लेसर का प्रयोग किया जाता है

  • राडार (Radar) क्या है  ?

    राडार (Radar) क्या है ?

    What is Radar ?

    राडार का अर्थ है—’रेडियो संसूचन एवं सर्वेक्षण’ (Radio Detection and Ranging)

    इसके द्वारा रेडियों तरंगों की सहायता से आकाशगामी वायुयान की स्थिति व दूरी का पता लगाया जाता है।

    राडार से प्रेषित एवं वायुयान से परावर्तित तरंगों के मध्य समयान्तर ज्ञात करके वायुयान की दूरी ज्ञात की जाती है।

    राडार का उपयोग वायुयानों के संसूचन, निर्देशन एवं संरक्षण में, बादलों की स्थिति व दूरी ज्ञात करने में, धातु व तेल के भण्डारों का पता लगाने में एवं वायुमण्डल की उच्चतम पर्त, आयनमण्डल की ऊंचाई ज्ञात करने में किया जाता है।

  • टेलीविजन (Television) कैसे काम करता है ?

    टेलीविजन (Television) कैसे काम करता है ?

    How television works ?

    तीन विधि से हम टेलीविज़न के कार्य को समझते है

    टेलीविजन द्वारा ध्वनि तथा दृश्य दोनों को एक टेलीविजन का अर्थ होता है दूर की वस्तुओं को देखना। इसकी सहायता चित्रों, विभिन्न दृश्यों, चलती फिरती वस्तुओं आदि को विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में दूरस्थ स्थानों को भेजा जाता है। साथ ही रेडियो तरंगों द्वारा आवाज को एक स्थान से दूसरे स्थान को संप्रेषित किया जाता है।

    वस्तुओं का क्रमवीक्षणीकरण(scanning) जिसमें वस्तुओं को आर्वधन विधि (magnifying method)की सहायता से छोटे-छोटे काले व सफेद बिन्दुओं में बदला जाता है। इनमें से प्रत्येक बिन्दु को तत्व (element) कहते हैं । दूसरी विधि में क्रमवीक्षण (scanning) वस्तुओं से निकली प्रकाश तरंगों को वैद्युत तरंगों (electrical waves) में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिये प्रकाश विद्युत सेलों का इस्तेमाल किया जाता है l तीसरी विधि में इन विद्युत तरंगों को पुनः प्रकाश तरंगों में इस प्रकार परिवर्तित किया जाता है कि वास्तविक चित्र दिखायी दे।

    टेलीविजन के दो भाग होते हैं—(1) आइकोनोस्कोप, (2) काइनोस्कोप

    आइकोनोस्कोप (Iconocoscope)

    यह चित्र द्वारा प्रकीर्णित (Scattered) प्रकाश तरंगों को विद्युत तरंगों में परिवर्तित करता है जिन्हें प्रवर्धित व मॉडुलित (Amplified and modulated) करके दूरस्थ स्थानों को प्रेषित कर दिया जाता है। आइनोस्कोप को टेलीविजन प्रेषी या दूरदर्शन कैमरा भी कहते हैं।

    काइनोस्कोप (Kineoscope)

    यह एक प्रकार का कैथोड किरण ऑसिलोग्राफ (CRO) है जो आइकोनोस्कोप से आने वाली विद्युत तरंगों से तुल्यकालित (Synchronised) होता है और पर्दे पर चित्र व दृश्य के अनुसार, प्रतिदीप्ति उत्पन्न करता है। अत: दृष्टि निर्बंध (Persistence of vision) के कारण एक सतत् चित्र पर्दे पर दिखाई देता है।

    टेलीविजन की सहायता से हम घर बैठे दुनिया के विभिन्न कार्यक्रम देख सकते हैं। इसके लिये भू -स्थिर उपग्रह का प्रयोग किया जाता है। इन्हीं उपग्रहों को पृथ्वी तल से 36000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जाता है तथा इनका परिक्रमण काल पृथ्वी द्वारा.अपने अक्ष के चारो तरफ परिक्रमण काल (24 घण्टे) के बराबर होता है।

    भारत के इनसेट उपग्रह इसी तरह के उपग्रह हैं। पृथ्वी पर होने वाले कार्यक्रमों को विद्युत तरंगों में परिवर्तित करके, इन उपग्रहों की ओर भेजा जाता है, जहाँ पर ये इन तरंगों को ग्रहण करके इनका आवर्धन करते हैं व पुनः पृथ्वी की ओर भेज देते हैं। पृथ्वी पर स्थित विभिन्न स्टेशन इन्हें ग्रहण कर लेते हैं। और इनका प्रसारण टीवी पर करते हैं l