Category: फ़िजिक्स

  • ऊर्जा (Energy) क्या है ?

    ऊर्जा (Energy) क्या है ?

    What is Energy ?

    परिभाषा

    किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता (Capacity to do work) को उस वस्तु की ‘ऊर्जा’ कहते हैं। कार्य की भांति ऊर्जा भी एक ‘अदिश’ राशि है। इसका SI मात्रक जूल है। वस्तु में जिस कारण से कार्य करने की क्षमता आ जाती है उसे ‘ऊर्जा’ कहते हैं।

    वैज्ञानिक ऊर्जा को कार्य करने की क्षमता के रूप में परिभाषित करते हैं। आधुनिक सभ्यता इसीलिए संभव हुई है क्योंकि लोगों ने यह सीखा है कि ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में कैसे बदलना है और फिर इसका उपयोग काम करने के लिए कैसे करना है। लोग चलने और साइकिल चलाने के लिए, पानी के माध्यम से सड़कों और नावों के साथ कारों को स्थानांतरित करने के लिए, स्टोव पर भोजन पकाने के लिए, फ्रीज़र में बर्फ बनाने के लिए, हमारे घरों और कार्यालयों को रोशनी देने के लिए, उत्पादों के निर्माण के लिए और अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए ऊर्जा का उपयोग करते हैं।

    उदाहरण

    बन्दूक से छोड़ी गई गोली लक्ष्य से टकराकर उसमें विस्थापन उत्पन्न कर सकती है, अर्थात्  कार्य कर सकती है। अत: गतिमान गोली में ऊर्जा होती है ।

    उर्जा के प्रकार

    ऊर्जा के कई अलग-अलग रूप हैं, जिनमें शामिल हैं

    • Heat (तपिश)
    • Light (रोशनी)
    • motion (प्रस्ताव)
    • Electrical (विद्युतीय)
    • Chemical (रासायनिक)
    • Gravitation (गुरुत्वीय)

    ऊर्जा रूपान्तरण (Energy Transformation)

    कुछ उदाहरणः

    1. स्थितिज ऊर्जा का गतिज ऊर्जा में रूपान्तरण (बांध के जल को नीचे गिराकर टरबाइन का घुमाना)।

    2. विद्युत ऊर्जा का गतिज ऊर्जा में रूपान्तर (बिजली के पंखे, मिक्सी, इत्यादि का चलना)।

    3. गतिज ऊर्जा का विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरण (डायनामों से विद्युत उत्पन्न करना)।

    4. विद्युत ऊर्जा का प्रकाश व ऊष्मा में रूपान्तर (बल्ब, टयूब-लाइट व हीटर का जलना)।

    5. रासायनिक ऊर्जा का प्रकाश व ऊष्मा में रूपान्तरण (मोमबत्ती का जलना)।

    6. ध्वनि ऊर्जा का विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरण (माइक्रोफोन)। 

    7. विद्युत ऊर्जा का ध्वनि ऊर्जा में रूपान्तरण (लाउडस्पीकर)।

  • सामर्थ्य अथवा शक्ति (Power) क्या है ?

    What is Power

    परिभाषा

    किसी कर्ता द्वारा प्रति इकाई समय में किए कार्य को उस कर्ता की ‘शक्ति’ कहते हैं अर्थात् शक्ति कार्य करने की समय दर है। मात्रक: सामर्थ्य (शक्ति) का SI मात्रक वाट (W) है, जिसे वैज्ञानिक जेम्सवाट (भाप इंजन के सिद्धान्त का आविष्कारक) के सम्मान में रखा गया है।

    शक्ति ऊर्जा की मात्रा है जो प्रति यूनिट समय पर हस्तांतरित या परिवर्तित होती है।

    Power = Work / time or P = W / t

    शक्ति की एक इकाई समय की एक इकाई द्वारा विभाजित कार्य की इकाई के बराबर है। इस प्रकार, एक वाट जूल / सेकंड के बराबर है। ऐतिहासिक कारणों से, कभी-कभी मशीन द्वारा वितरित की गई शक्ति का वर्णन करने के लिए अश्वशक्ति (Horse Power) का उपयोग किया जाता है। एक अश्वशक्ति लगभग 750 वॉट के बराबर है।

    फार्मूला

    अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली इकाइयों में, शक्ति की इकाई वाट है, जो कि एक जूल प्रति सेकंड के बराबर होती है ।

     P = E/t

    1 सेकण्ड 1 किलोवाट (kw) = 1000 वाट, 1 मेगावाट (1 MW) = 106 वाट = दस लाख वाट मशीनों की सामर्थ्य को अश्व सामर्थ्य (horse power-h.p) में भी व्यक्त किया जाता है: 1 अश्व सामर्थ्य (h.p.) = 746 वाट (लगभग)

    वाट सेकण्ड (Ws):

    1 वाट सेकण्ड शिक्षा = 1 वाट x 1 सेकण्ड = 1 जूल

    वाट घण्टा (Wh): यह कार्य अथवा ऊर्जा का मात्रक है। 1 वाट घण्टा (Wh)= 3600 जूल

    किलोवाट घण्टा (KWh): यह भी ऊर्जा (कार्य) का मात्रक है। 1 किलोवाट घण्टा (kWh) = 1000 वाट घण्टा

    = 1000 वाट x 1 घण्टा = 1000 वाट x 3600 सेकण्ड = 3.6 x 106 वाट सेकण्ड

    = 3.6 x 106 जूली

  • कार्य (Work) क्या है ?

    What is Work?

    परिभाषा

    भौतिकी में किसी वस्तु (पिण्ड) पर कार्य किया गया तब कहा जाता है, जब निम्नलिखित दो शर्ते पूरी होती है:

    1. किसी बल को किसी वस्तु पर लगना चाहिए, और

    2. बल के अनुपयुक्त बिन्दु को बल लगने के कारण चलना चाहिए।

    हम काम को एक गतिविधि के रूप में और बल की दिशा में बल को शामिल करते हुए परिभाषित कर सकते हैं।

    यदि बल लगाने पर बल की दिशा में विस्थापन ((displacement)) शून्य हो तो कहा जाता है, कि कोई कार्य नहीं किया गया। किसी वस्तु पर जितना अधिक वस्तु की स्थिति में विस्थापन होता है कार्य उतना ही अधिक होता है अर्थात् ‘जब बल लगाकर वस्तु को बल की दिशा में विस्थापित कर दिया जाता है, तो हम कहते हैं कि बल द्वारा किया गया है।

    कार्य (work) = बल (force) x बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन (displacement)

    कार्य एक अदिश राशि है, इसका मात्रक न्यूटन मीटर होता है। जिसे ‘जूल’ भी कहते हैं। [ विस्थापन एक सदिश राशि है l]

    उदाहरण

    उदाहरण के लिए, बल के एक ही दिशा में एक वस्तु को 3 मीटर की दूरी पर धकेलने वाले 30 न्यूटन (N) का बल 90 जूल (J) कार्य करेगा।

    धक्का देना, खींचना, उठाना, मोड़ना और घुमा देना ये सभी कार्य (work) के उदाहरण हैं l

  • गुरुत्व-केन्द्र (Centre of Gravity) क्या है ?

    What is Centre of Gravity ?

    परिभाषा

    गुरुत्व केन्द्र वह बिन्दु है, जहां वस्तु का समस्त भार कार्य करता है, किसी पिण्ड का गुरुत्व केन्द्र तब तक स्थिर रहता है जब तक उसका आकार नहीं बदलता। किसी वस्तु का भार गुरुत्व केन्द्र से ठीक नीचे की ओर कार्य करता है।

    गुरुत्व-केन्द्र की स्थिति (Position of Centre of Gravity)

    पिण्ड का गुरुत्व-केन्द्र तब तक स्थिर रहता है जब तक उसका आकार नहीं बदलता। सुडौल पिण्डों का गुरुत्व-केन्द्र उनके आकार से ज्ञात किया जाता सकता है।

    सन्तुलन के प्रकार (Kinds of Equilibria)

    सन्तुलन तीन प्रकार का होता है स्थायी, अस्थायी तथा उदासीन ।

    1. स्थायी सन्तुलन (Stable Equilibrium): यदि किसी वस्तु को उसकी सन्तुलन स्थिति से थोड़ा-सा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व केन्द्र G कुछ ऊपर उठता है, तथा छोड़ देने पर वस्तु पुनः अपनी पहली स्थिति में आ जाती है तो उसका सन्तुलन ‘स्थायी’ कहलाता है।

    2. अस्थायी सन्तुलन (Unstable Equilibrium): यदि वस्तु को सन्तुलन को स्थिति से थोड़ा-सा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व-केन्द्र G कुछ नीचे आ जाता है तथा छोड़ देने पर वस्तु अपनी पहली स्थिति में नहीं आती बल्कि उस स्थिति से और हट जाती है अर्थात् गिर पड़ती है, तो उसका सन्तुलन ‘अस्थायी’ कहलाता है।

    3. उदासीन सन्तुलन (Neutral Equilibrium): यदि वस्तु को सन्तुलन की स्थिति से थोड़ा-सा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व-केन्द्र G उसी ऊंचाई पर बना रहता है तथा छोड़ देने पर वस्तु अपनी नई स्थिति में ही सन्तुलित हो जाती है, तो उसका सन्तुलन ‘उदासीन’ कहलाता है।

    स्थायी सन्तुलन की शर्ते

    किसी वस्तु के स्थायी सन्तुलन के लिए दो शर्तों का पूरा होना आवश्यक है:

    1. वस्तु का गुरुत्व-केन्द्र अधिक-से-अधिक नीचा होना चाहिए: नुकीली पेन्सिल अपनी नोंक पर सन्तुलित नहीं होती, परन्तु यदि पेन्सिल की साइड के निचले भाग में दोनों तरफ चाकू धंसा दें तो वह सुगमता से सन्तुलित हो जाती है। कारण स्पष्ट है, चाकू धंसाने पर पेन्सिल का (चाकू सहित) निचला भाग भारी हो जाता है जिससे उसका गुरुत्व-केन्द्र नीचा हो जाता है। अतः सन्तुलन का स्थायित्व बढ़ जाता है।

    2. गुरुत्व-केन्द्र से होकर जाने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा वस्तु के आधार से गुजरनी चाहिए: वस्तु का सन्तुलन तभी तक सम्भव है जब तक कि उसके गुरुत्व-केन्द्र में होकर खींची गई ऊर्ध्वाधर रेखा वस्तु के आधार में होकर गुजरती है। अत: वस्तु का आधार जितना अधिक फैला हुआ होगा, वस्तु का सन्तुलन उतना ही अधिक स्थायी होगा।

    उदाहरण:

    पीसा की ऐतिहासिक मीनार तिरछी होते हुए भी नहीं गिरती क्योंकि उसके गुरुत्व-केन्द्र से गुजरने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा उसके आधार से होकर जाती है।

    जहाजों की तली (Bottom) में भारी पदार्थ भरा जाता है, इससे पूरे जहाज का गुरुत्व-केन्द्र नीचा हो जाता है और उसका सन्तुलन अधिक स्थायी हो जाता है।

    टेबिल लैम्प, बर्नर, फ्लास्क, बोतल, इत्यादि के आधार भी इसी कारण चौड़े व भारी बनाए जाते हैं।

    पहाड़ पर चढ़ते समय अथवा अपनी पीठ पर भारी बोझ लेकर चलने वाला मनुष्य आगे की ओर झुक जाता है, जिससे कि उसका आधार बढ़ जाता है और उसके गुरुत्व-केन्द्र से जाने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा उसके पैरों के पास आधार से होकर जाती है और वह अपने सन्तुलन को बनाए रखता है।

    दो मंजिल वाली बसों (Double) में नीचे वाली मंजिल में अधिक यात्री बिठाए जाते हैं तथा ऊपर वाली में कम, ताकि यात्रियों सहित बस का गुरुत्व-केन्द्र नीचा ही रहे तथा ऊंची-नीची सड़क आने पर बस के उलटने का भय न रहे।

  • बल-आघूर्ण (Moment of Force) क्या है ?

    What is Moment of Force ?

    परिभाषा

    जब किसी पिण्ड पर लगा बाह्य बल उसे किसी अक्ष के परितः घुमाने का प्रयास करता है, तो बल की इस प्रवृत्ति को बल आघूर्ण कहते हैं।

    घूर्णन गति

    यदि हम किसी पिण्ड को एक बिन्दु पर स्थिर करके उसके किसी अन्य बिन्दु पर एक बल लगाएं (जिसकी क्रिया-रेखा पर स्थिर बिन्दु न हो) तो वह पिण्ड स्थिर बिन्दु के परितः घूमने लगता है। इस गति को ‘घूर्णन गति’ कहते हैं।

    बल द्वारा एक पिण्ड को एक अक्ष के परितः घुमाने की प्रवृत्ति को ‘बल-आघूर्ण’ कहते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल बल के परिमाण पर निर्भर करती है अपितु अक्ष से बल की क्रिया-रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी पर भी निर्भर करती है। अत: किसी अक्ष (या बिन्दु) के परित: एक बल का बल-आघूर्ण उस बल के परिमाण तथा अक्ष (या बिन्दु) से बल की क्रिया-रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी के गुणनफल के बराबर होता है।

    यदि किसी बल को अक्ष से अधिक दूरी पर लगाया जाए तो उसका बल-आघूर्ण अधिक होगा। उदाहरण :

    नट और बोल्ट को कसने (Screwing) या खोलने (Unscrewing) के लिए प्रयुक्त किए जाने वाला पाना या स्पैनर (Spanner) इसी सिदान्त पर कार्य करते है l

    जब दरवाजे को खोलने के लिए हम बल को कब्जे (Hinge) के बहुत पास लगाते हैं तो हम उसे नहीं खोल पाते हैं, परन्तु कब्जे से दूर थोड़ा बल लगाने पर ही दरवाजा खुल जाता है।

    आटा पीसने की हाथ की चक्की में हत्था किनारे पर लगाते हैं जिससे आघूर्ण भुजा बढ़ जाती है और कम बल लगाना पड़ता है।

    कुम्हार के चाक में भी घुमाने का डण्डा लगाने के लिए गड्ढा केन्द्र से दूर परिधि के निकट बनाया जाता है जिससे आघूर्ण ऊर्जा बढ़ जाए।

    बल आघूर्ण के सिदान्त पर आधारित मशीनें

    उत्तोलक (Lever), घिरनी या गरारी (Pulley). आनत तल (Inclined plane), स्क्रू जैक, आदि कुछ सरल मशीनों के उदाहरण हैं। सरल मशीन एक ऐसी युक्ति (Device) होती है जिसमें किसी सुविधाजनक बिन्दु पर एक बल लगाकर, किसी अन्य बिन्दु पर रखे हुए एक भार को उठाया जा सकता है।

    याद रखिये l

    मशीन द्वारा यद्यपि कम बल लगाकर अधिक भार उठाया जा सकता है, परन्तु निवेशित ऊर्जा (Input energy) सदैव निर्गत (Output) ऊर्जा से अधिक होती है, क्योंकि ऊर्जा का कुछ अंश घर्षण बलों के विरुद्ध कार्य करने में खर्च हो जाता है। अतः मशीन द्वारा किया गया लाभदायक कार्य दी गई ऊर्जा से कम होता है। अत: मशीन की दक्षता (Efficiency) 100% से कम होती है।

  • अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force) क्या है ?

    What is Centrifugal Force ?

    परिभाषा

    अपकेन्द्री बल : जब कोई पिण्ड किसी वृत्तीय मार्ग पर चलता है, तो उस पर मार्ग के केन्द्र की ओर एक बल लगता है जिसे ‘अपकेन्द्री बल’ कहते हैं।

    उदाहरण:

    1. यदि कोई व्यक्ति कार में बैठा है और कार अचानक दाईं ओर घूम जाए, तो व्यक्ति को बाई ओर एक झटका लगता है। इससे व्यक्ति अपने बाईं ओर एक बल लगा हुआ अनुभव करता है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। बल्कि होता यह है, कि कार तथा व्यक्ति को दाईं ओर घूमने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्री बल चाहिए, कार को तो यह बल सड़क व पहियों के बीच घर्षण से प्राप्त हो जाता है, जबकि व्यक्ति को यह प्राप्त नहीं हो पाता। इसलिए व्यक्ति जड़त्व के कारण अपनी पूर्ववत् सीधी दिशा में गति करने की प्रवृति रखता है और इसीलिए कार के मुड़ते ही वह विपरीत दिशा में झटका खाकर ऐसा अनुभव करता है जैसे कि उस पर कोई बल कार्य कर रहा हो, यही अपकेन्द्री बल है।

    2. घूमते झूले पर खड़ा व्यक्ति यदि झूले की रस्सियों को न पकड़े तो वह बाहर की ओर गिर पड़ता है। इससे यह आभास होता है, कि उस पर बाहर की ओर कोई बल (अपकेन्द्री बल) कार्य करता है जबकि वास्तव में उपर्युक्त व्याख्या की भांति उस पर कोई बल कार्य नहीं करता।

    ३. पृथ्वी पर खड़े व्यक्ति को सूर्य घूमता हुआ प्रतीत होता है, जबकि सूर्य अपनी जगह स्थिर है तथा पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूम रही है। पृथ्वी के घूमने के कारण सूर्य त्वरित प्रतीत होता है अर्थात् सूर्य पर एक बल का अनुभव होता है, यह अपकेन्द्री बल है।

    अपकेन्द्री बल के सिद्धान्त पर आधारित यन्त्र

    अपकेन्द्रित (Centrifuge)

    यह एक ऐसा यन्त्र है जिसकी सहायता से हल्के व भारी कणों को पृथक् किया जाता है। इस प्रकार के यन्त्र के उदाहरण अपकेन्द्रित शोषक (Centrifuge drier), क्रीम निकालने की मशीन (Cream separator), अपकेन्द्र पम्प (Centrifugal pump), आदि हैं।

    क्रीम निकालने की मशीन (Cream Separator) में जब दूध भरकर मशीन को तेजी से घुमाया जाता है, तो क्रीम के कण घूर्णन अक्ष के निकट एकत्रित हो जाते हैं, जबकि दूध के कण बाहर की ओर चले जाते हैं। अत: बर्तन के केन्द्रीय भाग में लगे निकास द्वार से क्रीम तथा बाहरी भाग से दूध निकाल कर अलग कर लिए जाते हैं। दही में से मक्खन भी इसी सिद्धान्त के अनुसार निकलता है।

    अपकेन्द्रित शोषक (Centrifuge Drier) में जब गीले कपड़ों को घुमाया जाता है, तो पानी के कण बाहर की ओर चले जाते हैं क्योंकि पानी के कण कपड़ों से भारी हैं अर्थात् पानी का घनत्व कपड़ों से अधिक होता है। इस प्रकार कपड़े सूख जाते हैं।

  • अभिकेन्द्री बल (Centripetal Forces) क्या है ?

    अभिकेन्द्री बल (Centripetal Forces) क्या है ?

    What is Centripetal Forces ?

    अभिकेन्द्री बल (Centripetal Force)

    जब कोई कण (अथवा पिण्ड) एकसमान चाल v से त्रिज्या । के वृत्तीय मार्ग पर गति करता है तो उस पर अभिकेन्द्री त्वरण लगता है जिसका परिमाण होता है, परन्तु त्वरण की दिशा लगातार बदलती रहती है। त्वरण की दिशा सदैव वृत्त के केन्द्र की ओर रहती है। न्यूटन के द्वितीय नियमानुसार, किसी पिण्ड में त्वरण उत्पन्न करने के लिए, त्वरण की दिशा में ही बल लगाना आवश्यक होता है। अत: हम कह सकते हैं कि कण की वृत्तीय मार्ग में गति बनाए रखने के लिए, वृत्त के केन्द्र की ओर एक बल आवश्यक होता है। इसे ‘अभिकेन्द्री बल’ कहते हैं।

    उदाहरण

    यदि हम एक पत्थर के टुकड़े को किसी डोरी के एक सिरे में बांधकर वृत्ताकार मार्ग में घुमाएं तो हमें डोरी को अन्दर की ओर खींचे रखना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, पत्थर के टुकड़े को डोरी से बांधकर घुमाने पर डोरी में उत्पन्न तनाव ही आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है। अब यदि हम डोरी के सिरे को हाथ से छोड़ दें तो टुकड़ा वृत्तीय मार्ग को छोड़कर, वृत्त की स्पर्श रेखा के अनुदिश भाग जाता है। इसका कारण यह है, कि डोरी के सिरे को हाथ से छोड़ने पर डोरी में तनाव समाप्त हो जाता है, अत: वृत्तीय मार्ग में गति बनाए रखने के लिए इसे आवश्यक अभिकेन्द्री बल नहीं मिल पाता है। इसलिए पत्थर का टुकड़ा सरल रेखा में चलने लगता है।

    सूर्य के चारों ओर ग्रहों की गति तथा ग्रहों के चारों ओर प्राकृतिक व कृत्रिम उपग्रहों की गति के लिए गुरुत्वाकर्षण बल, आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है। परमाणु के नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन की वृत्ताकार गति के लिए विद्युत आकर्षण बल, आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है, किसी मोड़ पर रेल (अथवा कार या मोटर, आदि), के मुड़ने समय पहियों व सड़क के मध्य लगने वाला घर्षण बल, आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है।

    अभिकेन्द्री बल की प्रतिक्रिया (Reaction of Centripetal Force)

    न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुसार, प्रत्येक क्रिया (Action) के बराबर तथा विपरीत एक प्रतिक्रिया (Reaction) होती है, क्रिया तथा प्रतिक्रिया सदैव अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करती है। अत: वृत्तीय पथ पर गतिमान वस्तु पर कार्य करने वाले अभिकेन्द्री बल की भी प्रतिक्रिया होती है।

    उदाहरण

    1. जब हम पत्थर को डोरी से बांधकर वृत्तीय पथ में घुमाते हैं, तो हमारा हाथ डोरी के तनाव द्वारा वृत्त के केन्द्र की ओर अभिकेन्द्री बल (क्रिया) लगाता है जबकि पत्थर हमारे हाथ पर बाहर की ओर प्रतिक्रिया बल लगाता है।

    2. ‘मौत के कुएं’ में कुएं की दीवार मोटर साइकिल पर अन्दर की ओर क्रिया बल लगाती है, जबकि इसका प्रतिक्रिया बल मोटर साइकिल द्वारा कुएं की दीवार पर बाहर की ओर कार्य करता है।

    3. पृथ्वी चन्द्रमा पर अन्दर की ओर अभिकेन्द्री बल (गुरुत्वाकर्षण बल) लगाती है जबकि चन्द्रमा पृथ्वी पर प्रतिक्रिया बल बाहर की ओर लगाता है।

  • घर्षण बल (Force of Friction) क्या है ?

    घर्षण बल (Force of Friction) क्या है ?

    घर्षण बल

    जब मेज पर रखी किसी वस्तु को धीरे से धक्का देते हैं तो वह आगे नहीं बढ़ती है। इसका अर्थ है, कि सम्पर्क में रखी दो वस्तुओं के मध्य एक प्रकार का बल कार्य करता है जो दोनों वस्तुओं के बीच आपेक्षिक गति का विरोध करता है। यह बल ही ‘घर्षण बल’ कहलाता है। इसे ही ‘घर्षण’ कहते हैं। इसकी दिशा सदैव वस्तु की गति की दिशा के विपरीत होती है।

    घर्षण का मुख्य कारण वस्तुओं की सतह का खुरदरा होना है। यदि हम ध्यान से सड़क, मेज, कैरम-बोर्ड, आदि की सतह को देखें तो हमें ज्ञात होगा कि इनकी सतह चिकनी तथा सपाट नहीं होती l लेकिन बहुत अधिक चिकनी तथा सपाट सतहों के मध्य भी घर्षण होता है। इसका कारण है, कि जब दो अणुओं के मध्य बहुत कम दूरी होती है तो वे परस्पर आकर्षण बल लगाते हैं और गति का विरोध करते हैं l

    घर्षण बल के उपयोग

    • घर्षण बल के कारण ही मनुष्य सीधा खड़ा रहता है।
    • यदि सड़कों पर घर्षण न हो तो पट्टा मोटर के पहिए को नहीं घुमा सकेगा।
    • यदि पट्टा तथा पुली के बीच घर्षण न हो तो पट्टा मोटर के पहिए को नहीं घुमा सकेगा।
    • घर्षण बल न होने पर हम केले के छिलके तथा बरसात में चिकनी सड़क पर फिसल जाते हैं।

    घर्षण से हानि

    सभी प्रकार की मशीनों में घर्षण के कारण अति ऊष्मा पैदा होती है और मशीन के चल हिस्से (Moving parts) घिस जाते हैं।

    उदाहरण

    वैसे पदार्थ जो दो सतहों के बीच घर्षण कम करते हैं ‘स्नेहक (Lubrication)’ कहलाते हैं तथा घर्षण को स्नेहकों की सहायता से कम करने की विधि को स्नेहन कहा जाता है। तेल, ग्रीज, आदि उपस्नेहकों से घर्षण का मान न्यूनतम हो जाता है। तेल, वैसलीन, आदि पदार्थ सस्पर्श-तलों के बीच एक पतली परत बना देते हैं, जिसके कारण रगड़ खाने वाले दोनों तल सीधे सम्पर्क में नहीं आते। फलतः रगड़ भी कम होती है और पुर्जे भी जल्दी नहीं घिसते हैं।

    घर्षण कम करने के लिए घिसने वाली दो सतहों के बीच धातु की गोली डाली जाती है। फलत: विसी घर्षण का परिवर्तन लोटनिक घर्षण में हो जाता है। हम जानते हैं कि लोटनिक घर्षण का मान विसी घर्षण से कम होता है। अत: बॉल बेयरिंग के प्रयोग से घर्षण का परिमाण घट जाता है। साइकिल के चक्के, हैण्डिल, पैडिल, आदि में इस प्रकार की बॉल बेयरिंग विधि का प्रयोग होता है।

  • बल का आवेग (Impulse of a Force) क्या है ?

    बल का आवेग (Impulse of a Force) क्या है ?

    किसी वस्तु पर आरोपित बल और बल के कार्य करने के समय के गुणनफल को उस बल का आवेग’ कहा जाता है जो वस्तु के संवेग के परिवर्तन के बराबर होता है। आवेग एक सदिश राशि है जिसका मात्रक ‘न्यूटन सेकण्ड’ (Ns) होता है तथा इसकी दिशा वही होती है जो बल की होती दैनिक जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जबकि किसी वस्तु को आवेग देने के लिए एक बड़ा बल बहुत थोड़े समयान्तराल के लिए लगाया जाता है, जैसे बल्ले द्वारा क्रिकेट की गेंद पर चोट मारकर गेंद को दूर भेजना, छड़ी द्वारा पिंग-पोंग की गेंद को पाले में भेजना, हथौड़े द्वारा कील ठोकना, इत्यादि।

    उदाहरण

    खिलाड़ी क्रिकेट की गेंद का ‘कैच’ लेते समय अपना हाथ पीछे खींचता है। इसका कारण है, कि जब खिलाड़ी गेंद को रोक लेता है तो गेंद का संवग शून्य हो जाता है। संवेग-परिवर्तन के लिए खिलाड़ी गेंद को जितने अधिक समय में रोकेगा, आवेग देने के लिए उसे ङ्केउता ही काम बला लगाना पड़ेगा।

    इसलिए वह गंद के अंगुलियों के बीच में आते ही अपना हाथ पीछे की ओर खींचता है जिससे कि वह गेंद पर अधिक समय तक बल लगा सके। यदि वह अपने हाथ को पीछे नहीं खींचे तो गेंद हथेली से टकराकर तुरन्त ही ठहर जाएगी अर्थात् उसका संवेग यकायक शून्य हो जाएगा। अत: खिलाड़ी को बहुत अधिक बल लगाना पड़ेगा जिससे उसके हाथ में चोट आने का भय रहेगा।

    यदि हम कुछ ऊंचाई से पक्के फर्श पर कूद जाएं तो फर्श द्वारा हमारे पैर को दिए गए आवेग के कारण हमारा संवेग ‘यकायक’ शून्य हो जाएगा। यह आवेग एक बड़े बल का होगा जिसके कारण हमारे पैर में चोट आ जाएगी। परन्तु यदि हम फर्श पर मिट्टी अथवा गद्दा बिछा लें तो हमारे पैर उसमें धंसेंगे (अर्थात् धीरे-धीरे गढ़ेंगे) तथा संवेग के शून्य होने में कुछ देर लगेगी। अतः अब हमारे पैर को उतना ही आवेग एक छोटे बल से मिलेगा जिससे कि पैर में चोट नहीं आएगी। यही कारण है, कि कुश्ती लड़ने के अखाड़ों में पोली मिट्टी भरी जाती है।

  • संवेग-संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Momentum) क्या है ?

    संवेग-संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Momentum) क्या है ?

    यदि कणों के किसी समूह या निकाय (System) पर कोई बाह्य बल नहीं लग रहा हो तो उस निकाय का कुछ संवेग नियत रहता है, अर्थात् संरक्षित रहता है।’ इस कथन को ही ‘संवेग-संरक्षण का नियम’ कहते हैं अर्थात् एक वस्तु में जितना संवेग परिवर्तन होता है, दूसरी में उतना ही संवेग विपरीत दिशा में हो जाता है।

    अर्थात किसी पृथक व्यवस्था (आइसोलेटेड सिस्टम) में दो पिंड टकराएँ, तो उस व्यवस्था का कुल संवेग टकराव के पहले तथा टकराव के बाद संरक्षित (conserved) रहेगा। टकराव के पहले अगर दोनों पिंडों के वेग v1 और V1 है तथा टकराने के बाद v2 और V2, तब
    mv1 + MV1 = mv2 + MV2
    जहाँ m और M दोनों पिंडों के वज़न हैं।

    क्योंकि संवेग एक वेक्टर मात्रा है, यह परिमाण (मैग्नीट्यूड) तथा दिशा (डायरेक्शन) दोनों में संरक्षित रहता है।

    संवेग बनता या नष्ट नहीं होता। उसका बस एक पिंड से दूसरे पिंड में स्थानांतरण हो जाता है।

    उदाहरण के लिय जब कोई गाड़ी किसी दीवार से भिड़ जाती है तो गाड़ी रुक जाती है और दीवार भी वही रहती है। ऐसे में गाड़ी का संवेग नष्ट नहीं होता। बल्कि वह दीवार के अणुओं और धरती में समा जाता है और धरती उस दिशा में और तेज़ी से घूमती है।

    उदाहरण : जब बन्दूक से गोली छोड़ी जाती है तो वह अत्यधिक वेग से आगे की ओर बढ़ती है, जिससे गोली में आगे की दिशा में संवेग उत्पन्न हो जाता है। गोली भी बन्दूक को प्रतिक्रिया बल के कारण पीछे की ओर ढकेलती है, जिससे उसमें पीछे की ओर संवेग उत्पन्न जाता है। चूँकि बन्दूक का द्रव्यमान गोली से अधिक होता है, जिससे बन्दूक के पीछे हटने का वेग गोली के वेग से बहुत कम होता है। यदि दो एकसमान गोलियाँ भारी तथा हल्की बन्दूकों से अलग–अलग दागी जाएँ तो हल्की बन्दूक अधिक वेग से पीछे की ओर हटेगी, जिससे चोट लगने की सम्भावना अधिक होती है। रॉकेट के ऊपर जाने का सिद्धान्त भी संवेग संरक्षण पर आधारित होता है। रॉकेट से गैसें अत्यधिक वेग से पीछे की ओर निकलती हैं तथा रॉकेट को ऊपर उठाने के लिए आवश्यक संवेग प्रदान करती हैं।