Category: फ़िजिक्स

  • ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के नियम

    ऊष्मागतिकी (Thermodynamics)

    भौतिकी की वह शाखा जिसके अन्तर्गत ऊष्मीय ऊर्जा का यान्त्रिक ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा के साथ सम्बन्ध हो, ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) कहलाता है। हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं, कि यान्त्रिक ऊर्जा को ऊष्मा बदला जा सकता है। (उदाहरण के लिए, हाथों को आपस में रगड़ने ऊष्मा उत्पन्न होती है) तथा ऊष्मा को यान्त्रिक ऊर्जा में बदला जा सकता है (उदाहरण के लिए, वाष्य इंजन में)। 

    ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम (First Law of Thermodynamics)

    यदि यान्त्रिक ऊर्जा (अथवा कार्य) को ऊष्मा में परिवर्तित किया जाए तो किया गया कार्य, उससे उत्पन्न ऊष्मा के तुल्य होता है।’ इसे ‘ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम’ कहते हैं। 

    प्रथम नियम का दूसरा रूप

    ऊर्जा की न तो उत्पत्ति होती है और न विनाश, इसका एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन हो सकता है।’ उदाहरण के लिए, आंतरिक ऊर्जा का गतिज ऊर्जा में परिवर्तन। 

    ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम (Second Law of Thermodynamics)

    ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम ऊष्मा के प्रवाहित होने की दिशा को व्यक्त करता है। इस नियम के अनुसार

    (1) ऊष्मा का पूर्णतया कार्य में परिवर्तन असम्भव है एवं

    (2) ऊष्मा अपने कम ताप की वस्तु से अधिक ताप की वस्तु की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती जब तक कि बाहरी ऊर्जा का उपयोग न किया जाए। 

    ऊष्मागतिकी का तीसरा नियम

    किसी पदार्थ या निकाय (System) तन्त्र के तापमान को परम शून्य तक नहीं घटाया जा सकता है।’ अर्थात् परम शून्य तापमान प्राप्त करना असम्भव है। 

  • आवर्त गति क्या होती है ?

    आवर्त गति (Periodic Motion)

    एक निश्चित पथ पर गति करती वस्तु जब एक निश्चित समय-अन्तराल के पश्चात् बार-बार अपनी पूर्व गति को दुहराती है, तो इस प्रकार की गति को ‘आवर्त गति‘ कहते हैं।

    आवर्त काल

    गति को दुहराने का तात्पर्य है, कि किसी निश्चित समय-अन्तराल पर वस्तु अपने मार्ग में स्थित किसी बिन्दु को किसी निश्चित दिशा में पार करती हुई बार-बार दिखायी दे। इस निश्चित समय-अन्तराल को जिसमें वस्तु उसी बिन्दु उसी दिशा में जाने वाली स्थिति में पुनः आ जाती है ‘आवर्तकाल‘ (Time period) कहते हैं। आवर्तकाल T द्वारा सूचित किया जाता है। आवर्तकाल का मात्रक प्रति सेकण्ड होता है। 

    पृथ्वी सूर्य के चारों ओर आवर्त गति करती है जिसका आवर्त काल एक वर्ष होता है। घड़ी की सुइयां भी आवर्त गति करती हैैं !

  • सरल आवर्त गति (Simple Harmonic Motion) क्या होती है ?

    सरल आवर्त गति

    यदि कोई वस्तु एक सरल रेखा पर मध्यमान स्थिति (Mean position) के इधर-उधर इस प्रकार गति करे कि वस्तु का त्वरण मध्यमान स्थिति से वस्तु के विस्थापन के अनुक्रमानुपाती हो तथा त्वरण की दिशा मध्यमान स्थिति की ओर हो तो उसकी गति सरल आवर्त गति कहलाती है। उदाहरणार्थ, कम्पन करने वाली वस्तु की गति सरल आवर्त गति होती है। गति करने के पश्चात् वस्तु जिस स्थिति में आकर रुक जाती है, उसे वस्तु की ‘मध्यमान स्थिति’ कहते हैं। घड़ी का पेण्डुलम लगभग सरल आवर्त गति करता है। 

    आवृत्ति (Frequency)

    कम्पन करने वाली वस्तु एक सेकण्ड में जितने कम्पन करती है, उसे उसकी ‘आवृत्ति‘ कहते हैं। इसका SI मात्रक हर्ट्स (Hertz) होता है जो कम्पन/सेकण्ड या चक्र/ सेकण्ड के समतुल्य होता है।

    सरल आवर्त गति की विशेषताएं

    सरल आवर्त गति करने वाला कण जब अपनी मध्यमान स्थिति या साम्य स्थिति से गुजरता है, तो—

    • उस पर कोई बल कार्य नहीं करता है
    • उसका त्वरण शून्य होता है
    • वेग अधिकतम होता है
    • गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है
    • स्थितिज ऊर्जा शून्य होती है।

    इसके विपरीत, जब वह कण अपनी गति के अन्त बिदुओं से गुजरता है, तो

    • उसका त्वरण अधिकतम होता है
    • उस पर कार्य करने वाला प्रत्यानयन बल (Restoring force) अधिकतम होता है
    • गतिज ऊर्जा शून्य होती है
    • स्थितिज ऊर्जा अधिकतम होती है 
    • वेग शून्य होता है
  • ग्रहों की गति (Motion Planets) और उसके नियम क्या है ?

    What is Motion Planets and Laws ?

    जो खगोलीय पिण्ड सूर्य के चारों ओर घूमते हैं, ग्रह कहलाते हैं।

    हमारे सौर मण्डल (solar system) में 8 ग्रह हैं, जिनके नाम (सूर्य से बढ़ती दूरी के क्रम में) हैं—बुध (Mercury), शुक्र (Venus), पृथ्वी (Earth), मंगल (Mars), बृहस्पति (Jupiter), शनि (Saturn), यूरेनस (Uranus) तथा नेचून (Neptune)। इस प्रकार सूर्य का निकटतम ग्रह बुध तथा दूरतम ग्रह नेप्चून है।

    ग्रहों की गति से सम्बन्धित केप्लर के नियम

    1. प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर ‘दीर्घवृत्ताकार’ (Elliptical) कक्षा (Orbit) में परिक्रमा करता है तथा सूर्य ग्रह की कक्षा के एक फोकस बिन्दु पर स्थित होता है।

    2. प्रत्येक ग्रह का क्षेत्रीय वेग (Areal velocity) नियत रहता है। इसका प्रभाव यह होता है, कि जब ग्रह सूर्य के निकट होता है, तो उसका वेग बढ़ जाता है और जब वह दूर होता है, तो उसका वेग कम हो जाता है।

    3. सूर्य के चारों ओर ग्रह एक चक्र जितने समय में लगाता है उसे उसका ‘परिक्रमण काल’ (T) कहते हैं।

    परिक्रमण काल का वर्ग (T’), ग्रह की सूर्य से औसत दूरी (1) के घन (P) के अनुक्रमानुपाती होता है अर्थात् इसका प्रभाव यह होता है, कि सूर्य से अधिक दूर के ग्रहों के परिक्रमण काल भी अधिक होते हैं।

    उदाहरण के लिए, निकटतम ग्रह बुध का परिक्रमण काल 88 दिन है जबकि दूरतम ग्रह प्लूटो का परिक्रमण काल 247.7 वर्ष है। गुरुत्वीय त्वरण व भार (Acceleration due to Gravity and Weight): जब किसी वस्तु पर बल F लगाया जाता है तो उसमें त्वरण a उत्पन्न हो जाता है।

  • न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम क्या है ?

    What is Newton’s Universal Gravitational Law ?

    न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम के अनुसार ब्रह्माण्ड में पदार्थ का प्रत्येक कण प्रत्येक दूसरे कण को एक बल के साथ आकर्षित करता है जो कणों को मिलाने वाली रेखा के अनुरेख कार्य करता है और इसका परिमाण कणों के द्रव्यमान के गुणनफल का समानुपाती होता है और उसके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

  • पवन ऊर्जा क्या है ?

    What is Wind Energy ?

    पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों की तुलना में भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं अत: वहां की वायु शीघ्र ही गरम होकर ऊपर उठ जाती है। उसके खाली स्थान को भरने के लिए ध्रुवीय क्षेत्रों की अपेक्षाकृत ठण्डी वायु भूमध्य क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने लगती है। वायु के इस प्रवाह में पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) तथा स्थानीय परिस्थितियों के कारण लगातार बाधा पड़ती रहती है। जब सभी बल एक ही दिशा में कार्य करते हैं तो पवन की चाल तेज हो जाती है, यह इतनी अधिक (लगभग 800 किमी./ घण्टा) हो जाती है, कि पवन विनाशकारी टॉरनेडो (Tornado—बवण्डर) में परिवर्तित हो जाता है। परन्तु जब ये बल विपरीत दिशाओं में कार्य करते हैं तो मन्द पवन (जिसकी चाल 5 से 10 किमी./घण्टा होती हैं) बहती है। इस प्रकार जब वायु का विशाल द्रव्यमान (m) पवन के रूप में चाल (v) से गति करता है, तो उसमें गतिज ऊर्जा —m होती है। इसे ही ‘पवन ऊर्जा‘ कहते हैं।

    पवन ऊर्जा के उपयोग

    1. वायु ऊर्जा का उपयोग अनाज पीसने की चक्कियों को चलाने के लिए किया जाता है।

    2. पवन चक्की या वायु प्रेषणी (Windmill): वायु ऊर्जा को सर्वप्रथम उपयोग में लाने का श्रेय लांगली नामक वैज्ञानिक को है। उसने दिखाया कि बहती हुई हवा के मार्ग में अगर कोई क्षेत्र रखा जाय तो उस पर एक बल लगेगा जो हवा के वेग के वर्ग का समानुपाती तथा क्षेत्र के क्षेत्रफल का समानुपाती होगा। इसी सिद्धान्त पर वायु प्रेषणियां (Windmills) बनाई गई हैं। डेनमार्क में वायु प्रेषणी द्वारा ऊर्जा उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। वायु ऊर्जा का उपयोग पवन चक्की द्वारा जल-पम्प चलाकर, पृथ्वी के अन्दर से पानी खींचने में किया जाता है। गुजरात के ओखा नामक स्थान पर 1 MW (मेगावाट) शक्ति की पवन चक्की लगी हुई है।

    3. वायु ऊर्जा का उपयोग पालदार नावों को नदियों तथा समुद्र में चलाने के लिए किया जाता है। इस प्रकार की नावों द्वारा व्यक्तियों तथा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है।

    4. वायु ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन भी किया जाता है। गुजरात के पोरबन्दर में ‘लांबा’ नामक स्थान पर पवन ऊर्जा से 50 टरबाइनें चलाई जाती हैं जिनकी क्षमता 2 अरब (2x 106) यूनिट बिजली उत्पन्न करने की है।

  • सौर सेल क्या है ?

    What is Solar Cell ?

    सौर सेल वह युक्ति है जो सौर प्रकाश को सीधे ही विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर देती है।

    लगभग 100 वर्ष पूर्व यह खोज की जा चुकी थी कि जब सेलेनियम (Se) अर्द्धचालक की किसी पतली परत (Thin film) पर सौर प्रकाश को डाला जाता है, तो उससे इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं जिन्हें एक परिपथ (Circuit) में प्रवाहित करके विद्युत धारा (Electric current) प्राप्त की जा सकती है। परन्तु इस प्रकार का सौर सेल आपति प्रकाश के केवल 0.6% भाग को ही विद्युत में परिवर्तित कर पाता है।

    सौर सेल प्रायः ‘सिलिकॉन’ तथा ‘गैलियम’ जैसे अर्द्धचालकों से बनाए जाते हैं। इनकी दक्षता लगभग 10-18% होती है। अर्द्धचालक में यदि कोई विशेष अशुद्धि (Impurity) मिला दी जाए तो उसकी विद्युत चालकता बहुत अधिक बढ़ जाती है। प्रकाश पड़ने पर भी अर्द्धचालकों की चालकता बढ़ जाती है।

    कैल्युलेटर में सौर सेल का ही प्रयोग किया जाता है।

    सौर सेल पैनल

    सौर सेल पैनल में अनेक सौर सेल विशेष क्रम में व्यवस्थित होते हैं जिससे विभिन्न कार्यों के लिए पर्याप्त परिमाण में विद्युत प्राप्त की जा सकती है। अन्तरिक्ष यान, कृत्रिम उपग्रह तथा अनेक यन्त्रों से विद्युत प्राप्ति हेतु सौर सेल पैनल लगाए जाते हैं।

    सौर बैटरी

    अधिक विद्युत उत्पादन के लिए कई अर्द्धचालक सौर सेलों का समूहन (Grouping) करके सौर बैटरी बनाई जाती है।

    सौर शक्ति संयन्त्र या सौर पावर प्लाण्ट

    इस युक्ति द्वारा बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा का उपयोग करके विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है। सिद्धान्तः सौर पावर प्लाण्ट में बड़े-बड़े अवतल दर्पणों द्वारा सूर्य के प्रकाश को बाहर से काले रंगे हुए पाइपों पर परावर्तित किया जाता है। इन पाइपों में पानी भरा होता है जो गरम होने के बाद भाप उत्पन्न करता है। यह भाप ही विद्युत जनित्र के टरबाइन को घुमाती है जिससे विद्युत उत्पन्न होती है।

  • सौर ऊर्जा (Solar Energy) क्या है ?

    What is Solar Energy ?

    सूर्य ऊर्जा का अति विशाल स्रोत है। सूर्य द्वारा उत्सर्जित प्रकाश के वर्णक्रम का अध्ययन करने से पता चलता है, कि सूर्य का लगभग 70% द्रव्यमान हाइड्रोजन से, 28% हीलियम से तथा 2% अन्य भारी तत्वों से बना हुआ है।

    गणनाओं से पता चलता है, कि सूर्य के केन्द्रीय भाग जिसे कोर (Core) कहते है उसका ताप 1.5x107k (अर्थात् डेढ़ करोड़ केल्विन) है। इतने उच्च पर कोई भी पदार्थ ठोस या द्रव अवस्था में नहीं रह सकता है, अतः सूर्य में केवल गैसीय पदार्थ है।

    सूर्य के केन्द्र में अति उच्च ताप व दाब होने के कारण ही, हाइड्रोजन नाभिक संलयन (Fusion) अभिक्रिया करके हीलियम नाभिक बनाते हैं जिससे अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही सौर ऊर्जा का रहस्य है।

    सौर ऊर्जा गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत का एक महत्त्वपूर्ण अवयव है।

    जैसे भारत की भौगोलिक स्थिति सौर ऊर्जा के व्यापक उपयोग के काफी अनुकूल है, क्योंकि देश के अधिकांश भागों में वर्ष में 250-300 दिनों तक पर्याप्त धूप निकलती है और देश के कई हिस्सों में सौर ऊर्जा की दैनिक उपलब्धि 5-7 किलोवाट प्रतिघण्टा प्रति वर्गमीटर है।

    सूर्य से प्रति सेकण्ड 3.86 x 1026 जूल ऊर्जा निकलती है जो सभी दिशाओं में फैल जाती है। यह ऊर्जा विद्युत-चुम्बकीय तरंगों (Electromagnetic waves) तथा आवेशिक कणों के रूप में निकलती है। इस ऊर्जा का कुछ भाग पृथ्वी पर भी पहुंचता है। पृथ्वी पर ऊर्जा मुख्यतः विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के रूप में ही पहुंचती है। सूर्य से प्राप्त होने वाली विद्युत-चुम्बकीय तरंगों को ‘सौर विकिरण‘ कहते हैं। विकिरण के गुण उसके अन्दर उपस्थित तरंगों की तरंग-दैर्ध्य पर निर्भर करते हैं। कुछ तरंगें हमें ऊष्मा का अनुभव कराती हैं, उन्हें ‘अवरक्त विकिरण‘ (Infrared radiation) कहते हैं और कुछ हमें वस्तुओं का दर्शन कराती हैं, उन्हें ‘दृश्य विकिरण (Visible radiation)’ या ‘प्रकाश’ कहते हैं।

  • ऊर्जा संरक्षण का नियम

    What is Law of Conservation of Energy ?

    ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट की जा सकती है। ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित की जा सकती है। जब भी ऊर्जा किसी रूप में लुप्त होती है, तो ठीक उतनी ही ऊर्जा अन्य रूपों में प्रकट हो जाती है। अत: विश्व की सम्पूर्ण ऊर्जा का परिमाण स्थिर रहता है। यह ‘ऊर्जा संरक्षण का नियम‘ कहलाता है।

    ऊर्जा का उपयोग करने का एकमात्र तरीका ऊर्जा को एक रूप से दूसरे में बदलना है।
  • द्रव्यमान ऊर्जा (Mass Energy) क्या है ?

    What is Mass Energy ?

    आइन्सटीन ने यह सिद्ध किया कि द्रव्यमान की क्षति होने से ऊर्जा उत्पन्न होती है अर्थात् द्रव्यमान भी ऊर्जा का ही एक स्वरूप है।

    यदि m द्रव्यमान की क्षति होती है (अर्थात् m द्रव्यमान ऊर्जा में बदलता है, तो E ऊर्जा उत्पन्न होती है

    जहां E = mc2

    c = निर्वात में प्रकाश की चाल।

    द्रव्यमान-ऊर्जा इस बात पर जोर देती है कि किसी प्रणाली का कुल द्रव्यमान बदल सकता है, लेकिन कुल ऊर्जा और गति स्थिर रहती है; 
    
    उदाहरण के लिए, एक इलेक्ट्रॉन और एक प्रोटॉन की टक्कर दोनों कणों के द्रव्यमान को नष्ट कर देती है, लेकिन फोटॉन के रूप में ऊर्जा पैदा करती है।