Category: फ़िजिक्स

  • चन्द्रमा पर वायुमण्डल क्यों नही है ?

    Why is there no atmosphere on the moon?

    चन्द्रमा पर पलायन वेग लगभग 2.4 किमी./सेकण्ड होता है, इसलिए जिन गैसों के अणुओं की माध्य चाल 2.4 किमी./सेकण्ड अथवा इससे अधिक होती है, वे चन्द्रमा की सतह को हमेशा के लिए छोड़कर अन्तरिक्ष (Space) में चले जाते हैं।

    चन्द्रमा पर प्राय: सभी गैसों के अणुओं की माध्य ऊष्मीय चाल, पलायन वेग के बराबर या इससे अधिक होती है, अत: चन्द्रमा पर वायुमण्डल नहीं हैं। जब चन्द्रमा बना ही था उस समय वहां पर वायुमण्डल रहा होगा।

    क्यों कि पृथ्वी का पलायन वेग 11.2 किमी./सेकण्ड है इसलिए पृथ्वी पर उपलब्ध गैसों कि चाल इस पलायन वेग से कम होने के कारण पृथ्वी को छोड़कर अन्तरिक्ष में नहीं जा सकते हैं जिसके कारण पृथ्वी के चारों ओर वायुमण्डल होता है।

    अन्य छोटे ग्रहों, जैसे—बुध, मंगल, आदि पर भी जहां पलायन वेग का मान कम है, गैसों के अणु पलायन करके अन्तरिक्ष में चल जाते हैं तथा वहा वायुमण्डल नहीं पाया जाता है। इसके विपरीतं बड़े ग्रहों, जैसे—बृहस्पति, शनि, आदि पर पलायन वेग का मान बहुत अधिक है, अत: वहां से अणु पलायन नहीं कर पाते हैं तथा वहां पृथ्वी की अपेक्षा सघन वायुमण्डल उपस्थित है।

  • ध्वनि का सुनाई देना तथा अपवर्तन क्या होता है ?

    अभिग्रहण (सुनाई देना)

    सामान्यतः हमें ध्वनि की अनुभूति अपने कानों के द्वारा होती है। जब किसी कम्पित वस्तु से चलने वाली ध्वनि-तरंगें हमारे कान के पर्दे से टकराती हैं, तो पर्दे में भी उसी प्रकार के कम्पन होने लगते हैं। इससे हमें ध्वनि का अनुभव होता है।

    ध्वनि का अपवर्तन (Refraction of Sound)

    जब ध्वनि की तरंगें एक माध्यम से चलकर दूसरे माध्यम के पृष्ठ से टकराती हैं, तो उनमें से कुछ दूसरे माध्यम में ही अपने पथ से कुछ विचलित होकर चली जाती है। इस प्रकार ध्वनि तरंगों का अपने पथ से विचलित हो जाना ही उनका ‘अपवर्तन’ कहलाता है।

    अपवर्तन के कारण

    ध्वनि के अपवर्तन का कारण है विभिन्न माध्यमों तथा विभिन्न तापों पर ध्वनि की चाल का भिन्न-भिन्न होना। अपवर्तन के कुछ परिमाण हैं—दिन में ध्वनि का केवल ध्वनि के स्रोत के पास के क्षेत्रों में ही सुनाई देना और रात्रि में दूर-दूर तक सुनाई देना, समुद्र में उत्पन्न की गई ध्वनि का दूर-दूर तक सुनाई देना।

    इन घटनाओं का एक कारण अपवर्तन है, दूसरा कारण नमी युक्त वायु का घनत्व कम होना तथा फलत: उसमें ध्वनि की चाल का अधिक होना।

  • ध्वनि का संचरण क्या होता है ?

    संचरण

    ध्वनि के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में किसी-न-किसी पदार्थ के माध्यम (गैस, द्रव अथवा  ठोस) का होना आवश्यक है। ध्वनि निर्वात में होकर नहीं चल सकती।

    ध्वनि का माध्यम प्रत्यास्थता एवं घनत्व पर निर्भर करती है, जिस पदार्थ के माध्यम प्रत्यास्थ नहीं होते उसमें अधिक दूरी तक ध्वनि का संरचरण नहीं हो पाता।

    इसके विपरीत कोई माध्यम जितना अधिक प्रत्यास्थ होगा उसमें ध्वनि की चाल उतनी ही अधिक होगी। इस कारण ठोस वस्तुओं में द्रव तथा गैसों की अपेक्षा ध्वनि की चाल अधिक होती है।

    उदाहरण

    दैनिक जीवन में किसी ध्वनि-स्रोत से उत्पन्न ध्वनि प्रायः वायु में होकर हमारे कान तक पहुंचती है परन्तु ध्वनि द्रव व ठोस में होकर भी चल सकती है। यही कारण है, कि गोताखोर जल के भीतर होने पर भी ध्वनि को सुन लेता है।

    इसी प्रकार रेल की पटरी से कान लगाकर बहुत दूर से आती हुई रेलगाड़ी की ध्वनि सुनी जा सकती है। ध्वनि किसी भी माध्यम में अनुदैर्ध्य तरंगों के रूप में चलती हैं। 

  • श्रव्य, अपश्रव्य एवं पराश्रव्य तरंगें क्या होती हैं ?

    ध्वनि तरंगों को आवृत्तियों के एक बहुत बड़े परास तक उत्पन्न किया जा सकता है। इस आधार पर उन्हें तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

    श्रव्य तरंगें (Audible Waves)

    जिन तरंगों को हमारा कान सुन सकता है उन्हें ‘श्रव्य’ तरंगें कहते हैं। इन तरंगों की आवृत्ति 20 से लेकर 20,000 हर्ट्ज तक होती है। इन निम्नतम तथा उच्चतम आवृत्तियों को ‘श्रव्यता की सीमाएं’ (Limits of audibility) कहते हैं। श्रव्य तरंगों के स्रोत हैं-वाक्-तन्तु (मनुष्य तथा जानवरों की आवाजें), कम्पित डोरिया (वायलिन, सितार, इत्यादि), कम्पित छड़ें (स्वरित्र द्विभुज), कम्पित प्लेटें व झिल्लियां (घण्टी, ढोल, लाउडस्पीकर, तबला, आदि) तथा वायु-स्तम्भ (माउथ आर्गन)। 

    अपश्रव्य तरंगें (Infrasonic Waves)

    उन अनुदैर्ध्य यान्त्रिक तरंगों को जिनकी आवृत्तियां निम्नतम श्रव्य आवृत्ति (20 हर्ट्ज) से नीचे होती हैं ‘अपश्रव्य तरंगें’ कहते हैं। इस प्रकार की तरंगों को बहुत बड़े आकार के स्रोतों से उत्पन्न किया जा सकता है। भूचाल के समय पृथ्वी में बहुत लम्बी तरंगें चलती हैं। ये अपश्रव्य तरंगें हैं। हमारे हृदय की धड़कनों की आवृत्ति भी अपश्रव्य तरंगों के समान होती है। 

    पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Waves)

    उन अनुदैर्ध्य यान्त्रिक तरंगों को जिनकी आवृत्तियां उच्चतम श्रव्य आवृत्ति (20,000 हर्ट्ज) से ऊची होती हैं, ‘पराश्रव्य तरंगे’ कहते हैं। इन तरंगों को गाल्टन की सीटी द्वारा तथा दाब-विद्युत प्रभाव (Piezo-electric effect) की विधि द्वारा क्वार्ट्ज और जिंक ऑक्साइड के क्रिस्टल के कम्पनों से उत्पन्न करते हैं।

    इन तरंगों की आवृत्ति बहुत ऊंची होने के कारण ये अपने साथ बहुत ऊर्जा ले जाती है। साथ ही इनकी तरंग दैर्ध्य बहुत छोटी होने के कारण इन्हें एक पतले किरण-पुंज के रूप में बहुत दूर तक भेजा जा सकता है। इन गुणों के कारण इन तरंगों के अनेक लाभदायक उपयोग हैं

    पराश्रव्य तरंगों के उपयोग

    • संकेत (Signal) भेजना: इन तरंगों द्वारा किसी विशेष दिशा में संकेत भेजे जा सकते हैं क्योंकि ये तरंगें बहुत पतले किरण-पुंज के रूप में बहुत दूर तक जा सकती है।
    • समुद्र की गहराई ज्ञात करना व छिपे पदार्थों का पता लगाना: इन तरंगों से समुद्र की गहराई तथा समुद्र में डूबी हुई चट्टानों, मछलियों तथा पनडुब्बियों की स्थितियां ज्ञात की जा सकती है। इन तरंगों के द्वारा उड़ते हुए हवाई जहाज की पृथ्वी से ऊंचाई नापी जा सकती है। 
    • सोनार (SONAR-Sound Navigation and Ranging): यह एक ऐसी विधि तथा युक्ति है जिसके द्वारा समुद्र में डूबी हुई वस्तु का पता लगाया जाता है। इसमें पहले पराश्रव्य तरंगों को समुद्र के अन्दर भेजा जाता है। ये तरंगें डूबी हुई वस्तु से परावर्तित होकर वापस लौटती है। जितने समय में ये तरंगें जाती है और वापस लौटती हैं उसे ज्ञात कर लिया जाता है।
    • उद्योगों में: आजकल इन तरंगों का उपयोग कीमती कपड़ों तथा वायुयान व घड़ियों के पुर्जी को साफ करने में तथा चिमनियों की कालिख हटाने में किया जाता है।
    • कृषि में: कुछ ऐसे छोटे-छोटे पौधे हैं जो पराश्रव्य तरंगों के डालने पर तेजी से बढ़ते हैं।
    • जीव विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान में: ये तरंगें बैक्टीरिया का विनाश कर देती हैं। गठिया रोग के उपचार तथा मस्तिष्क में ट्यूमर का पता लगाने में पराश्रव्य तरंगें उपयोग में लायी जाती है।
    • अन्य उपयोगः कुछ पशु (विशेष रूप से कुत्ते) तथा पक्षी (चमगादड़) पराश्रव्य तरंगों को सुन लेते हैं इन्हें डाल्फिन भी सुन लेती हैं इस प्रकार की सीटी बनाई गई है जिसे बजाने पर पराश्रव्य तरंगें निकलती है। अत: इस सीटी को बजाने पर कुत्ता आ जाएगा परन्तु आस-पास कोई आदमी उसे नहीं सुन सकेगा। 

    इस प्रकार की सीटी बजाकर पेड़ों पर से चिड़ियों को भी उड़ाया जाता है। इसे गाल्टन सीटी (Galton whistle) कहते हैं। 

    उड़ते समय चमगादड़ (Bat) पराश्रव्य तरंगें उत्पन्न करता है। ये तरंगें सामने पड़ने वाली वस्तुओं से परावर्तित होकर चमगादड़ के कानों पर वापस आती हैं। इससे चमगादड़ अंधेरे में उड़ते समय पेड़ों, दीवारों तथा अन्य वस्तुओं से अपने को टकराने से बचा लेता है। 

  • पृथ्वी पर वायुमण्डल क्यों है ?

    Why is there an atmosphere on Earth ?

    पृथ्वी पर वायुमण्डल का कारण

    प्रत्येक पदार्थ अत्यन्त छोटे-छोटे अणुओं से मिलकर बना है। गैसों में ये अणु बहुत अधिक वेग से प्रत्येक सम्भव दिशा में गतिमान होते हैं।

    उदाहरण के लिए, 500 k ताप (जो 227°C के समतुल्य है) पर हाइड्रोजन गैस के अणुओं की माध्य ऊष्मीय चाल लगभग 2.5 किमी./सेकण्ड होती है। अतः पृथ्वी पर उच्चतम सम्भव ताप पर भी हल्की-से-हल्की गैस के अणुओं की माध्य चाल, पलायन वेग (= 11.2 किमी./सेकण्ड) की अपेक्षा बहुत कम है। इसलिए गैसों के अणु, पृथ्वी को छोड़कर अन्तरिक्ष में नहीं जा सकते हैं जिसके कारण पृथ्वी के चारों ओर वायुमण्डल होता है।

  • यान्त्रिक तथा विद्युत-चुम्बकीय तरंगें क्या होती हैं ?

    यान्त्रिक तरंगें (Mechanical Waves)

    वे तरंगें जो किसी पदार्थ के माध्यम (ठोस, द्रव अथवा गैस) में संचरित होती हैं, ‘यान्त्रिक तरंगें’ कहलाती हैं। इन तरंगों में माध्यम के कण यान्त्रिकी के नियमों के अन्तर्गत कम्पन करते हैं। ध्वनि की तरंगें यान्त्रिक तरंगें हैं क्योंकि ये किसी माध्यम से ही संचरित होती हैं।

    यान्त्रिक तरंगें अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य दोनों प्रकार की हो सकती है तथा भिन्न-भिन्न माध्यमों में उत्पन्न तरंगों की चाल भिन्न-भिन्न होती है।

    विद्युत-चुम्बकीय तरंगें

    जिनके संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं होती, जैसे प्रकाश तरंगें, ऊष्मीय विकिरण, रेडियो तरंगें, एक्स किरणें, गामा किरणें, आदि। इन्हें ‘विद्युत-चुम्बकीय तरंगें’ कहते हैं। 

    विद्युत-चुम्बकीय तरंगों में विद्युत क्षेत्र तथा चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर लम्बवत् तलों में कम्पन करते रहते हैं तथा रिक्त स्थान में प्रकाश की चाल से आगे बढ़ते जाते हैं। इन क्षेत्रों के संचरण की दिशा उन तलों के लम्बवत् होती है जिनमें ये स्थित होते हैं।

    इस प्रकार विद्युत-चुम्बकीय तरंग सदैव अनुप्रस्थ होती है तथा इन तरंगों की चाल प्रकाश की चाल के बराबर होती है। निर्वात् (Vacuum) में प्रकाश की चाल 3×108 मी./सेकण्ड होती है। 

  • उपग्रहों में भारहीनता क्या है ?

    What is Weightlessness in Satellites ?

    किसी वस्तु के भार का अनुभव, उसके सम्पर्क में रखी किसी वस्तु द्वारा उस वस्तु पर लगाए गए बल के कारण होता है। यदि व्यक्ति किसी लिफ्ट में खड़ा है और यह लिफ्ट g त्वरण से नीचे की ओर गतिमान है, तो व्यक्ति के पैरों पर लिफ्ट के फर्श का प्रतिक्रिया बल शून्य होता है अर्थात् व्यक्ति का आभासी भार शून्य होता है। इस अवस्था को ‘भारहीनता की अवस्था‘ कहते हैं।

    उदाहरण के लिए. पृथ्वी पर खड़े व्यक्ति को अपने भार का अनुभव, उसके पैरों पर पृथ्वी की प्रतिक्रिया के कारण होता है।

    कृत्रिम उपग्रह (artificial satellite) के अन्दर वस्तु भारहीनता की अवस्था में होती है अर्थात् उसमें बैठे अन्तरिक्ष यात्री को भी भारहीनता का अनुभव होता है।

    उपग्रह के तल द्वारा यात्री पर लगाया गया प्रतिक्रिया बल शून्य होता है।

    अंतरिक्ष में यदि कोई व्यक्ति गिलास से जल पीना चाहे तो वह उसे पी नहीं सकेगा, क्योंकि गिलास टेढ़ा करते ही उसमें से जल निकलकर बाहर बूंदों के रूप में तैरने लगेगा। इसलिए अन्तरिक्ष यात्रियों को भोजन, आदि पेस्ट (Paste) के रूप में टयूब में भरकर दिया जाता है ताकि टयूब को दबाकर यात्री भोजन को निगल सके।

    चन्द्रमा पर भारहीनता नहीं है।

    यद्यपि चन्द्रमा भी पृथ्वी का एक उपग्रह है परन्तु चन्द्रमा पर मनुष्य भारहीनता का अनुभव नहीं करता है। इसका कारण यह है, कि चन्द्रमा का द्रव्यमान अधिक होने के कारण चन्द्रमा स्वयं अपने तल पर स्थित व्यक्ति पर एक आकर्षण बल लगाता है जिसके कारण उसे कुछ भार का अनुभव होता है जिसे चन्द्रमा पर ‘व्यक्ति का भार’ कहते हैं। चन्द्रमा पर व्यक्ति पृथ्वी के आकर्षण के कारण भार का अनुभव नहीं करता है। इसके विपरीत, कृत्रिम उपग्रह का द्रव्यमान अपेक्षाकृत कम होता है, अत: उसमें बैठे मनुष्य पर उपग्रह स्वयं कोई पर्याप्त आकर्षण बल नहीं लगा पाता है। इसलिए उपग्रह में व्यक्ति का भार नगण्य होता है।

  • अनुप्रस्थ-अनुदैर्ध्य तरंगें क्या होती हैं ?

    मुख्यतः तरंगें दो प्रकार की होती हैं: – अनुप्रस्थ तरंगें तथा अनुदैर्ध्य तरंगें

    अनुप्रस्थ तरंगें

    जब तरंग की गति की दिशा माध्यम के कणों के कम्पन करने की दिशा के लम्बवत् होती है, तो इस प्रकार की तरंगों को ‘अनुप्रस्थ तरंगें’ (Transverse waves) कहते हैं। अनुप्रस्थ तरंगों के निर्माण के लिए माध्यम में दृढ़ता का होना आवश्यक है। पानी की सतह पर उत्पन्न तरंग, प्रकाश तरंग, आदि अनुप्रस्थ तरंग के उदाहरण हैं। 

    अनुदैर्ध्य तरंगें

    जब तरंग की गति की दिशा माध्यम के कणों के कम्पन करने की दिशा के अनुदिश (या उसके समान्तर) होती है, तो ऐसी तरंग को अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal wave) कहते हैं। अनुदैर्ध्य तरंगे सभी माध्यमों (ठोस, द्रव एवं गैस) में उत्पन्न की जा सकती है। भूकम्प तरंगें, स्प्रिंग से उत्पन्न तरंगें, आदि अनुदैर्ध्य तरंगें है। अनुदैर्ध्य तरंगों के निर्माण के लिए माध्यम का प्रत्येक दिशा में लचीला होना चाहिए। 

  • पलायन वेग (Escape Velocity) क्या है ?

    What is Escape Velocity ?

    यह साधारण अनुभव की बात है, कि जब किसी पिण्ड को ऊपर की ओर फेंका जाता है, तो वह कुछ ऊंचाई तक जाकर वापस लौट आता है। पिण्ड को जितने अधिक वेग से फेंकते हैं. वह उतनी ही अधिक ऊंचाई तक ऊपर जाता है। यदि वेग को क्रमश: बढ़ाते जाएं तो एक स्थिति ऐसी आएगी जब पिण्ड गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर अन्तरिक्ष में चला जाएगा, पृथ्वी पर वापस नहीं जाएगा। इस न्यूनतम वेग को ही ‘पलायन वेग‘ कहते हैं।

    अत: पलायन वेग वह न्यनूतम वेग है जिससे किसी पिण्ड को पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर फेंके जाने पर वह गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जाता है, पृथ्वी पर वापस नहीं आता।

    अत: पलायन वेग वह न्यनूतम वेग है जिससे किसी पिण्ड को पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर फेंके जाने पर वह गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जाता है, पृथ्वी पर वापस नहीं आता। यदि पृथ्वी तल से किसी वस्तु को 11.2 किमी. प्रति सेकंड या इससे अधिक वेग से ऊपर किसी भी दिशा में फेंक दिया जाए तो वह वस्तु फिर पृथ्वी तल पर वापस नहीं आएगी। वह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र को पार करके अन्तरिक्ष में किसी अन्य खगोलीय पिण्ड पर जा गिरेगी।

  • वायु की आपेक्षिक आर्द्रता क्या होती है ?

    वायु की आपेक्षिक आर्द्रता

    किसी दिये हुए ताप पर, वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी ताप पर उसी आयतन की वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को ‘आपेक्षिक आर्द्रता’ कहते हैं। इसे प्रतिशत में व्यक्त करते हैं। 

    आपेक्षिक आर्द्रता के लाभ

    • मौसम विज्ञानशालाओं में प्रतिदिन की आपेक्षिक आर्द्रता ज्ञात की जाती है, इससे मौसम का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है। यदि आर्द्रता अधिक है, तो वर्षा होने की सम्भावना रहती है।
    • स्वास्थ्य विभाग को आर्द्रता जानने की आवश्यकता होती है क्योंकि नम वायु में कुछ जीवाणु उत्पन्न होने लगते हैं।
    • सूत के कारखानों में अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है क्योंकि वायु में नमी अधिक होने से सूत का धागा नहीं टूटता। यही कारण है, कि सूती कपड़ों के मिल समुद्र के निकट (अधिक आर्द्रता वाले) बसे हुए नगरों, जैसे—मुम्बई, अहमदाबाद में लगाए जाते हैं।
    • वातानुकूलन में भी आपेक्षिक आर्द्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। 

    महत्वपूर्ण तथ्य

    • आपेक्षिक आर्द्रता को मापने के लिए आर्द्रतामापी (Hygrometer) का प्रयोग किया जाता है। 
    • वायु की आपेक्षिक आर्द्रता 60 से 65 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए।