Category: फ़िजिक्स

  • जल का असामान्य प्रसार क्या होता है ?

    जल का असामान्य प्रसार क्या होता है ?

    जल का असामान्य प्रसार

    प्रायः सभी द्रव गर्म किए जाने पर आयतन में बढ़ते हैं परन्तु जल 0°C से 4°C तक गर्म करने पर आयतन में घटता है तथा 4°C के पश्चात् बढ़ना प्रारम्भ करता है। इसका अर्थ यह है. कि 4° पर जल का घनत्व सबसे अधिक होता है।

    दैनिक जीवन में इसके कई प्रभाव दिखाई देते हैं. कुछ निम्नलिखित हैं:

    ठण्डे देशों में तालाबों के जम जाने पर भी उनमें मछलियां जीवित रहती हैं: ठण्डे देशों में जाड़े के दिनों में वायु का ताप 0° से भी कम हो जाता है। अतः वहां के तालाबों में जल जमने लगता है।

    वायु का ताप गिरने पर पहले तालाबों की सतह का जल ठण्डा होता है। अत: यह भारी होकर नीचे बैठता रहता है तथा नीचे का हल्का जल ऊपर आता रहता है। यह प्रक्रिया तब तक चली रहती है जब तक कि पूरे तालाब का जल 4°C तक नहीं गिरा जाता।

    जब सतह के जल का ताप 4°C से नीचे गिरने लगता है. तो इसका घनत्व कम होने लगता है। अतः अब यह नीचे नहीं जाता तथा 0°C तक ठण्डा होकर बर्फ के रूप में सतह पर ही जमने लगता है। अत: जल के जमने की क्रिया ऊपर से नीचे की ओर होती है (नीचे से ऊपर की ओर नहीं) बर्फ की इस पर्त के नीचे अब भी 4°C का जल रहता है।

    चूंकि बर्फ ऊष्मा का कुचालक होता है, अत: नीचे के 4°C वाले जल की ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देता। अत: नीचे वाला जल 4°C पर ही बना रहता है और इस प्रकार वह जमने से बच जाता है। इस जल में मछलिया तथा अन्य जीव जीवित रहते हैं।

    अत्यधिक ठण्ड में जल के पाइप कभी-कभी फट जाते हैं: ठण्डे स्थानों पर जाड़े के दिनों में पाइपों में बहने वाले जल का ताप 4°C से नीचे गिर जाने पर जल के आयतन में वृद्धि होती है परन्तु धातु का पाइप सिकुड़ता है। इन विपरीत दशाओं के कारण पाइपों की दीवारों पर इतना अधिक दाब पड़ता है, कि वे फट जाते हैं।

  • पृष्ठ तनाव (Surface Tension) क्या है ?

    What is Surface Tension ?

    परिभाषा

    द्रव के अणुओं में संसंजक बल होने के कारण उसका स्वतन्त्र पृष्ठ तनी हुई रबर की झिल्ली (Membrane) की तरह कार्य करता है। प्रत्येक तना हुआ पृष्ठ सदैव तनाव की स्थिति में होता है। तथा उसमें संकुचित (Contract) होने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार, द्रव का स्वतन्त्र पृष्ठ (Surface) सदैव तनाव की स्थिति में रहता है तथा उसमें कम-से-कम क्षेत्रफल प्राप्त करने की प्रवृत्ति होती है। द्रव के पृष्ठ का यह तनाव ही ‘पृष्ठ तनाव‘ कहलाता है।

    पृष्ठ तनाव नियम

    द्रव का ताप बढ़ाने पर पृष्ठ तनाव कम हो जाता है और क्रान्तिक ताप (Critical temperature) पर यह शून्य हो जाता है।

    किसी दिए हुए आयतन के लिए गोलाकार आकृति के पृष्ठ का क्षेत्रफल अन्य आकृतियों के पृष्ठ के क्षेत्रफल से कम होता है। चूंकि द्रव का स्वतन्त्र पृष्ठ कम-से-कम क्षेत्रफल घेरने का प्रयास करता है, अत: वर्षा की बूदें तथा पारे के कण गोलाकार होते हैं।

    पृष्ठ तनाव के कुछ प्रमाण

    1. लोहे का एक छल्ला लेते हैं तथा उसमें धागे का एक फन्दा डाल देते हैं। छल्ले को साबुन के गाढ़े घोल में डुबाकर निकालते हैं। फन्दे के अन्दर और बाहर साबुन की झिल्ली (फिल्म) बन जाती है और फन्दा किसी भी आकृति में साम्यावस्था में पड़ा रहता है। अब गरम पिन की नोंक से फन्दे के अन्दर की झिल्ली को तोड़ देते हैं। ऐसा करते ही फन्दा तनकर वृत्त की आकृति ग्रहण कर लेता है।

    2. जब मुलायम बालों से बने ब्रुश को पानी में डुबाते हैं तो उसके बाल अलग-अलग रहते हैं, किन्तु बाहर निकालने पर बाल आपस में चिपक जाते हैं। इसका कारण यह है, कि ब्रुश को बाहर निकालने पर बालों पर लगे पानी का स्वतन्त्र पृष्ठ होता है जिसमें संकुचित होने की प्रवृत्ति है। अत: ब्रुश के बाल आपस में चिपक जाते हैं।

    पृष्ठ तनाव को प्रभावित करने वाले कारक

    1. तापमान बढ़ाने से पृष्ठ तनाव घटता है।
    2. तेल, ग्रीस, आदि पृष्ठ तनाव घटाते हैं।
    3. जब द्रव में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तब द्रव का पृष्ठ तनाव घटता है।
  • ऊष्मीय प्रसार (Thermal Expansion)क्या होता है ?

    ऊष्मीय प्रसार (Thermal Expansion)

    ऊष्मा के प्रभाव के पदार्थों का फैलाव ऊष्मीय प्रसार कहलाता है। यह प्रसार लम्बाई, क्षेत्रफल तथा आयतन में होता है। ऊष्मीय प्रसार होने से पदार्थ के अणुओं के बीच दूरी बढ़ जाती है। 

    ऊष्मीय प्रसार के कुछ व्यावहारिक उपयोग

    • रेल की पटरियां लोहे की बनी होती हैं, इसलिए रेल की दो पटरियों के जोड़ पर थोड़ा रिक्त स्थान छोड़ दिया जाता है जिससे गर्मी के दिनों में ताप बढ़ने के कारण पटरियों की लम्बाई बढ़ने के लिए खाली स्थान मिल सके, अन्यथा पटरियां तिरछी हो जाएगी और रेल दुर्घटना हो सकती है।
    • कांच की बोतल में डाट फंसने पर बोतल की गर्दन को गरम पानी में रखकर गरम करते हैं, जिससे बोतल की गर्दन का व्यास बढ़ जाता है और डाट बाहर निकल जाता है। यदि कांच की बोतल पर धातु का ढक्कन है (Cap) लगा हुआ है. तो गरम करने पर उसमें प्रसार होता है !

    महत्वपूर्ण तथ्य (कांच की अपेक्षा धातु का प्रसार गुणांक अधिक होने के कारण)

    थर्मामीटर में पारा, बैंजीन जैसे पदार्थ से अधिक उपयोगी होते है और वह ढीली हो जाती है। 

    हैं। इसके निम्नलिखित कारण है: 

    1. पारा ऊष्मा का अच्छा चालक है। अत: पारे के किसी 3. जब कांच के गिलास में गर्म पानी डालते 

    भाग में समायी ऊष्मा इसके अन्य भागों में चलकर हैं, तो वह चटक जाता है क्योंकि कांच आसानी से फैल जाती है। ऊष्मा का कुचालक है। गरम पानी डालते ही अन्दर का भाग गरम हो जाता है और 

    2. पारा थर्मामीटर की नली को भिगोता नहीं बल्कि बैंजीन फैलता है परन्तु बाहर का भाग ठण्डा ही 

    उसे भिगो देती है। रहता है अत: गिलास चटक जाता है। 

    3. चमकीला होने के कारण पारे की सतह स्पष्ट दिखाई पायरेक्स कांच का बर्तन नहीं चटकता है 

    पड़ती है जिससे ताप को पढ़ने में सुविधा होती क्योंकि पायरेक्स कांच का आयतन प्रसार गुणांक साधारण कांच की तुलना में एक-तिहाई होता है। जल का असामान्य प्रसारः प्रायः सभी द्रव गर्म किए जाने पर आयतन में बढ़ते हैं परन्तु जल 0°C से 4°C तक गर्म करने पर आयतन में घटता है तथा 4°C के पश्चात् बढ़ना प्रारम्भ करता है। इसका अर्थ यह है. कि 4° पर जल का घनत्व सबसे अधिक होता है। दैनिक जीवन में इसके कई प्रभाव दिखाई देते हैं. कुछ निम्नलिखित हैं: 1. ठण्डे देशों में तालाबों के जम जाने पर भी उनमें मछलियां जीवित रहती हैं: ठण्डे देशों में जाड़े के दिनों 

    में वायु का ताप 0° से भी कम हो जाता है। अतः वहां के तालाबों में जल जमने लगता है। वायु का ताप गिरने पर पहले तालाबों की सतह का जल ठण्डा होता है। अत: यह भारी होकर नीचे बैठता रहता है तथा नीचे का हल्का जल ऊपर आता रहता है। यह प्रक्रिया तब तक चली रहती है जब तक कि पूरे तालाब का जल 4°C तक नहीं गिरा जाता। जब सतह के जल का ताप 4°C से नीचे गिरने लगता है. तो इसका घनत्व कम होने लगता है। अतः अब यह नीचे नहीं जाता तथा 0°C तक ठण्डा होकर बर्फ के रूप में सतह पर ही जमने लगता है। अत: जल के जमने की क्रिया ऊपर से नीचे की ओर होती है (नीचे से ऊपर की ओर नहीं) बर्फ की इस पर्त के नीचे अब भी 4°C का जल रहता है। चूंकि बर्फ ऊष्मा का कुचालक होता है, अत: नीचे के 4°C वाले जल की ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देता। अत: नीचे वाला जल 4°C पर ही बना रहता है और इस प्रकार वह जमने से बच जाता है। इस जल में मछलिया तथा अन्य जीव जीवित रहते हैं। 2. अत्यधिक ठण्ड में जल के पाइप कभी-कभी फट जाते हैं: ठण्डे स्थानों पर जाड़े के दिनों में पाइपों में बहने वाले जल का ताप 4°C से नीचे गिर जाने पर जल के आयतन में वृद्धि होती है परन्तु धातु का पाइप सिकुड़ता है। इन विपरीत दशाओं के कारण पाइपों की दीवारों पर इतना अधिक दाब पड़ता है, कि वे फट जाते हैं।

  • ऊष्मा धारिता (Thermal Capacity) क्या होती है ?

    ऊष्मा धारिता (Thermal Capacity)

    किसी वस्तु का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है उसे उस वस्तु की ऊष्मा धारिता कहते हैं। परन्तु कौन-सी वस्तु कितनी गरम होगी यह बात वस्तु की प्रकृति और उसके द्रव्यमान पर निर्भर है। इसका मात्रक जूल प्रति केल्विन या कैलोरी प्रति C है। 

    विशिष्ट ऊष्मा धारिता

    आजकल विशिष्ट ऊष्मा को ‘विशिष्ट ऊष्मा धारिता’ लिखा जाता है, किसी पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा धारिता ऊष्मा की वह मात्रा है जो उस पदार्थ के एकांक द्रव्यमान में एकांक ताप-वृद्धि उत्पन्न करती है। इसे प्राय: C द्वारा व्यक्त किया जाता है। 

    उदाहरण

    1 ग्राम जल का ताप 1°C बढ़ाने के लिए 1 कैलोरी ऊष्मा की आवश्यकता होती है। अत: जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता 1 कैलोरी/ग्राम C होती है। जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता अन्य ठोस तथा द्रव पदार्थों की तुलना में सबसे अधिक है। 

    विशिष्ट ऊष्मा धारिता का SI मात्रक जूल किलोग्राम केल्विन होता है। ठोस और द्रवों में जल की विशिष्ट ऊष्मा सर्वाधिक है परन्तु सभी पदार्थों में हाइड्रोजन की विशिष्ट ऊष्मा सर्वाधिक है। 

    पानी की विशिष्ट ऊष्मा धारिता उच्च होने का लाभ यह है, कि अन्य पदार्थों की तुलना में पानी अधिक देर में गरम होता है और अधिक देर में ही ठण्डा होता है। यही कारण है, कि शरीर को सेंकने वाली बोतलों (Heating bottles) में गरम पानी भरा जाता है जिससे वह अधिक देर तक सेंक देता रहे।

    कमरों को गरम करने वाले पाइपों में भी गरम पानी ही भरा जाता है। समुद्र के पास के नगरों में न तो अधिक गर्मी पड़ती है और न ही अधिक सर्दी। इसका कारण भी जल की अधिक विशिष्ट ऊष्मा धारिता है।

    दिन में समुद्र का जल धूप में स्थल की मिट्टी की अपेक्षा बहुत देर में गरम होता है जिससे स्थल के ऊपर की वायु गरम होकर ऊपर उठ जाती है। उसका स्थान भरने के लिए दिन में समुद्र से स्थल की ओर ठण्डी हवा चलती है, इससे वहां का ताप बहुत अधिक नहीं बढ़ पाता है।

    रात को समद्र का जल स्थल की अपेक्षा अधिक देर से ठण्डा होता है, अतः रात को समुद्र, स्थल की अपेक्षा गरम होता है वहां की वायु गरम होकर ऊपर उठ जाती है। उसका स्थान ग्रहण करने के लिए स्थल से ठण्डी वायु समुद्र की ओर चलने लगती है।

    इस प्रकार स्थल का ताप दिन और रात में लगभग एकसमान बना रहता है, और ग्रीष्म तथा शीत ऋतु में भी इसी प्रकार की प्रक्रिया द्वारा एकसमान बना रहता है।

  • संसंजक बल और आसंजक बल क्या है ?

    What are Cohesive Force and Adhesive Force ?

    संसंजक बल (Cohesive Force)

    प्रत्येक पदार्थ अणुओं से मिलकर बना होता है जिनके बीच आकर्षण बल कार्य करता है। एक ही पदार्थ के अणुओं के मध्य लगने वाले आकर्षण बल को ‘संसंजक’ बल कहते हैं।

    उदाहरण

    जिन द्रवों के अणुओं के बीच संसंजक बल कम होता है, वे बर्तन की दीवार को गीला करते हैं एवं जिन द्रवों के अणुओं के बची संसंजक बल कम होता है वे बर्तन की दीवार को गीला नहीं करते हैं।

    पारा के अणुओं के बीच संसंजक बल अधिक होता है जिस कारण वे बर्तन की दीवार को गीला नहीं करते हैं। पृष्ठ तनाव का कारण संसंजक बलों का होना है।

    आसंजक बल (Adhesive Force)

    दो विभिन्न पदार्थों के अणुओं के मध्य लगने वाले आकर्षण बल को आसंजक बल कहते हैं।

    उदाहरण

    आसंजक बल के कारण ही पानी कांच को भिगोता है, ब्लैक बोर्ड पर चॉक से लिखने पर अक्षर उभर आते हैं, पीतल के बर्तनों पर निकल की पॉलिश की जाती है।

    जब किसी द्रव-ठोस युग्म के लिए आसंजक बल का मान, द्रव के अणुओं के संसंजन बल के मान से अधिक होता है, तो वह ठोस को गीला कर देता है।

    उदाहरण: 

    1. पानी कांच पर चिपकता है क्योंकि पानी और कांच के अणुओं के मध्य लगने वाला आसंजक बल पानी के अणुओं के मध्य लगने वाले संसंजक बल से अधिक होता है।

    2. पानी में अंगुली डालने पर पानी अंगुली से चिपक जाता है, क्योंकि पानी और अंगुली के मध्य आसंजक बल पानी के अणओं के मध्य ससंजक बल से अधिक होता है। 

    जब किसी द्रव-ठोस युग्म के लिए आसंजक बल का मान द्रव के अणुओं के संसंजक बल के मान से कम होता है तो द्रव उस ठोस को गीला नहीं कर पाता है।

    उदाहरण: 

    1. पारा कांच पर नहीं चिपकता, क्योंकि पारा और कांच के अणुओं के मध्य लगने वाला आसंजक बल पारे के अणुओं के मध्य लगने वाले संसजक बल से कम होता है। 

    2. पानी के स्वतन्त्र पृष्ठ पर तेल की कुछ बूंदें डालने पर तेल पतली फिल्म के रूप में पानी के पृष्ठ पर फैल जाता है, क्योंकि पानी और तेल के अणुओं के बीच लगने वाला आसंजक बल, तेल के अणुओं के मध्य लगने वाले संसंजक बल से अधिक होता है।

     

  • ध्वनि का तारत्व क्या होता है ?

    तारत्व

    तारत्व का सम्बन्ध आवृत्ति से होता है। जैसे-जैसे ध्वनि की आवृत्ति बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे ध्वनि का तारत्व बढ़ता जाता है तथा ध्वनि तीक्षण अथवा पतली होती जाती है।

    चिड़िया की आवाज, सोनोमीटर के तने हुए पतले तार से निकलने वाली ध्वनि, मच्छरों की भनभनाहट, अधिक तारत्व की ध्वनियों के उदाहरण हैं।

    ध्वनि की आवृत्ति कम होने पर उसका तारत्व कम होता है तथा ध्वनि मोटी तथा सपाक (Flat) प्रतीत होती है। सितार के मोटे तथा कम तने हुए तार से उत्पन्न ध्वनि कम तारत्व की होती है। 

    उदाहरण

    बच्चों और स्त्रियों की आवाज पतली होती है, अत: उसका तारत्व अधिक होता है, पुरुषों की आवाज भारी होती है, अत: उसका तारत्व कम होता है।

    ध्वनि के तारत्व का ध्वनि की प्रबलता से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। अधिक प्रबल ध्वनि का तारत्व कम (जैसे शेर की दहाड़) अथवा अधिक (जैसे रेलगाड़ी की सीटी), कुछ भी हो सकता है।

    इसी प्रकार, कम प्रबल ध्वनि का तारत्व कम (जैसे—पत्तियों की खड़खड़ाहट) अथवा अधिक (जैसे मच्छर की भनभनाहट), कुछ भी हो सकता है।

  • ध्वनि प्रबलता क्या होती है ?

    ध्वनि के लक्षण

    प्रबलता ध्वनि का वह लक्षण है जिससे ध्वनि कान को मन्द (धीमी) अथवा तीव्र (प्रबल) प्रतीत होती है। सांस लेने से उत्पन्न ध्वनि अत्यधिक मन्द, किताब का कागज पलटने पर उत्पन्न ध्वनि मन्द, आपस में बातचीत की ध्वनि मन्द, कार के हॉर्न की ध्वनि प्रबल तथा बादलों की गड़गड़ाहट अति प्रबल प्रतीत होती है।

    लेकिन ध्वनि जो साधारण मनुष्य को प्रबल प्रतीत होती है, बहरे मनुष्य को मन्द प्रतीत होती है। अतः हम कह सकते हैं, कि वास्तव में, ध्वनि की प्रबलता दो कारकों पर निर्भर करती है

    • (1) ध्वनि की तीव्रता पर, तथा
    • (2) श्रोता के कान की संवेदना पर

    ध्वनि की तीव्रता बढ़ने पर ध्वनि की प्रबलता भी बढ़ती है। ध्वनि की तीव्रता एक भौतिक राशि है जिसे शुद्धता से मापा जा सकता है। माध्यम के किसी बिन्दु पर ध्वनि की तीव्रता, उस बिन्दु पर एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड तल के लम्बवत् गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा के बराबर होती है।

    इसका SI मात्रक माइक्रोवाट/मीटर (=10-6 जूल/सेकण्ड मीटर) तथा प्रयोगात्मक मात्रक बेल B (Bell) है। इसके दसवें भाग को ‘डेसीबल’ (dB कहते हैं)। 0 तारत्व या पिच: तारत्व, ध्वनि का वह लक्षण है जिससे ध्वनि को मोटा (Grave) या तीक्ष्ण (Shrill) कहा जाता है। 

  • वाष्पीकरण (Vapourisation) क्या है ?

    What is Vapourisation ?

    परिभाषा

    जब किसी द्रव को खुले पात्र में रखा जाता है तो उसकी खुली सतह से द्रव के अणु धीरे-धीरे वाष्पीकृत होकर वायु में मिल जाते हैं। इस क्रिया को ‘वाष्पीकरण‘ या ‘वाष्पन‘ कहते हैं l

    अर्थात पदार्थ प्रत्येक ताप पर अपनी द्रव अवस्था से वाष्प अवस्था में परिवर्तित होता रहता है । द्रव अवस्था से वाष्प में परिवर्तित होने की इस प्रकिया को ‘वाष्पीकरण’ कहते हैं।

    ऊष्मा’ या ‘वाष्पन ऊष्मा

    किसी द्रव को स्थिर ताप पर वाष्पीकृत होने के लिए जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है उसे वाष्पीकरण की ‘ऊष्मा’ या ‘वाष्पन ऊष्मा’ कहते हैं।

    वाष्पीकरण दो प्रकार के होते हैं: वाष्पीकरण (Vaporization) और उबलना (Boiling) वाष्पीकरण एक सतह की घटना (surface phenomenon) है, जबकि उबालना एक विस्तृत घटना (bulk phenomenon) है।

    वाष्पीकरण द्रव के सतह से प्रारम्भ होता है। वाष्पीकरण में द्रव के अणु जिनकी ऊर्जा सामान्य से अधिक होती है द्रव की सतह छोड़कर चले जाते हैं, जिससे द्रव का ताप गिर जाता है।

    द्रव का वाष्पीकरण वायुमण्डल में उपस्थित वाष्प की मात्रा, द्रव सतह के क्षेत्रफल तथा द्रव के ताप पर निर्भर करता है। यदि वायुमण्डल में वाष्प की मात्रा अधिक होती है तो वाष्पीकरण घट जाता है तथा यदि वाष्प की मात्रा कम होती है तो वाष्पीकरण बढ़ जाता है।

    वाष्पीकरण की दर वायुमंडल की आर्द्रता के व्युत्क्रमानुपाती, वायुमंडल के ताप के समानुपाती तथा द्रव के तल के क्षेत्रफल के अनुक्रमानुपाती के रूप में बढ़ती है।

    उदाहरण

    गर्मी के दिनों में वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा अत्यन्त कम हो जाने के कारण जल का वाष्पीकरण अधिक होता है, जिससे जल का ताप गिर जाता है, जबकि बरसात के दिनों में वायुमण्डल में जल वाष्प की मात्रा अधिक होने के कारण वाष्पीकरण कम होता है । यही कारण है कि गीले कपड़े गर्मियों में जल्दी व बरसात में देर से सूखते हैं।

    बुखार(fever) होने के समय जब रोगी के शरीर का ताप बढ़ जाता है तो उसके माथे पर गीला कपड़ा रख देते हैं तथा शरीर को गीले कपड़े से पोछते हैं। इस प्रकिया में जल शरीर से ऊष्मा लेकर वाष्पीकृत होता है, जिससे शरीर का तापमान कम हो जाता है।

  • विसरण (Diffusion) क्या है ?

    What is Diffusion ?

    यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा विभिन्न पदार्थ एक-दूसरे में मिश्रित (Mixed) हो जाते हैं।

    अर्थात दो से अधिक पदार्थों का स्वतः एक दूसरे से मिलकर समांग मिश्रण बनाने की क्रिया को विसरण (डिफ्यूजन) कहते हैं। 

    यह क्रिया पदार्थों के परमाणु, अणु या आयनों की अनियमित गति (Random motion) के कारण होती है। गैसों में यह क्रिया अपेक्षाकृत शीघ्रता से होती है, और मिश्रण अधिकांश समांग (Homogeneous) होता है, यद्यपि गुरुत्व के कुछ प्रभाव के कारण भारी गैसों का अनुपात तली में अधिक होता है। विलायक में ठोस विलेय का मिल जाना भी एक विसरण क्रिया ही है, यद्यपि यह एक मन्द प्रक्रिया है।

    विसरण एक अपरिवर्तनीय क्रिया है, जिसमें पदार्थों के स्वाभाविक बहाव से सांद्रण का अंतर कम होता रहता है। यह क्रिया सभी पदार्थों में होती है।

    गैसें शीघ्रता से विसरण करती हैं। 

    गुरुत्वाकर्षण से विसरण में कोई रुकावट नहीं पड़ती और न उत्प्वलाकता का ही उसपर कोई प्रभाव पड़ता है।

    उदाहरण

    क्लोरीन गैस के जार पर यदि एक हवा भरा जार रख दिया जाए, तो क्लोरीन गैस के भारी होने पर भी उसके अणु विसरण द्वारा ऊपर उठकर दोनों जारों में मिल जाते हैं और कुछ समय में वे एक से संगठन के हो जाते हैं। 

    यदि सोने के एक टुकड़े को सीसा के टुकड़े के संपर्क में रखा जाए, तो कुछ दिनों के बाद सीसा में सोना और सोने में सीसा की उपस्थिति मालूम की जा सकती है। 

  • वायुमण्डल की परतें (Layers of Atmosphere) क्या है ?

    What are Layers of Atmosphere ?

    वायुमण्डल

    पृथ्वी के चारों ओर सैकड़ो किमी की मोटाई में लपेटने वाले गैसीय आवरण को वायुमण्डल कहते हैं। वायुमण्डल विभिन्न गैसों का मिश्रण है जो पृथ्वी को चारो ओर से घेरे हुए है।

    वायुमंडल पृथ्वी पर जीवित जीवन के लिए जिम्मेदार कई गैसों का मिश्रण हैl इसमें भारी मात्रा में ठोस और द्रव के कण होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से एरोसोल के रूप में जाना जाता है। शुद्ध शुष्क हवा में मुख्य रूप से नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, हीलियम और ओजोन होते हैं। इसके अलावा, जल वाष्प, धूल के कण, धुआं, लवण आदि भी वायुमंडल में मौजूद होते हैं।

    वायुमंडल के अतिरिक्त पृथ्वी का स्थलमंडल ठोस पदार्थों से बना और जलमंडल जल से बना हैं।

    वायुमण्डल की परतें

    वायुमण्डल के संघटन एवं गुणों के अनुसार उसे निम्नलिखित क्षेत्रों में विभाजित किया गया है जिन्हें ‘वायुमण्डल की परतें’ कहते हैं:

    क्षोभमण्डल (Troposphere)

    यह सबसे पहला भाग है, जिसमें मौसम सम्बन्धी सभी परिवर्तन होते हैं। इसकी मोटाई ध्रुवों पर 8 किमी. तथा भूमध्यरेखा पर 18 किमी. होती है। इस भाग में वायुमण्डल का ताप ऊंचाई बढ़ने के साथ घटता है।

    समतापमण्डल (Stratosphere)

    क्षोभमण्डल के बाद यह भाग आता है, जो 50 किमी. की ऊंचाई तक फैला होता है। इस भाग में वायुमण्डलीय ताप लगभग एकसमान (Constant) रहता है। इसीलिए इसे ‘समताप मण्डल’ कहते हैं। इसी भाग में ओजोन परत पाई जाती है। ओजोन परत 20 किमी. से 50 किमी. की ऊंचाई के मध्य होती है। इसकी सर्वाधिक मोटाई लगभग 25-30 किमी. पर होती है ।

    आयनमण्डल (lonosphere)

    यह भाग 50 किमी. से लगभग 1,000 किमी. तक फैला हुआ है। इसमें अधिकांश आयनित गैसें होती है। इसमें ताप ऊंचाई के साथ बढ़ता है।

    आयनमण्डल को भी तीन परतों में बांटा गया है:

    • D-परत (D-layer): (50-90 किमी.), इसमें इलेक्ट्रॉन-घनत्व कम होता है और यह केवल निम्न आवृत्ति की रेडियो तरंगों को परावर्तित करता है।
    • E-परत (E-layer): यह 90-150 किमी. तक का भाग है। इसे ‘हैवीसाइड केनेली’ (Heaviside Kennelly) परत भी कहते हैं। यह परत मीडियम आवृत्ति को रेडियों तरंगों को परिवर्तित करती है l
    • F-परत (F-layer): यह 150 से 1,000 किमी. तक फैली हुई है। इसे ‘ऐप्लिटन परत‘ (Appleton layer) भी कहते हैं। इसमें इलेक्ट्रॉन घनत्व सबसे अधिक होता है। यह परत रेडियो प्रसारण के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

    बहि:मण्डल (Exosphere)

    लगभग 400 किमी. की ऊंचाई से आगे वाले भाग को ‘बहि:मण्डल‘  कहते हैं।

    कुछ नियम

    • यदि वायुदाबमापी में पारा अचानक चढ़ जाए तो समझना चाहिए कि मौसम स्वच्छ रहेगा।
    • यदि वायुदाबमापी का पारा अचानक गिर जाए (अर्थात् वायुदाब कम हो जाए) तो समझना चाहिए कि तेज आधी/तूफान/वर्षा आने की सम्भावना रहती है, क्योंकि जब आंधी या वर्षा आने वाली होती है, तो वायुमण्डल का दाब तुरन्त घट जाता है।
    • वे रेडियों तरंगें, जिनकी तरंग दैर्ध्य 8 मिमी, से 20 मी. तक होती है, टेलीविजन प्रसारण में काम आती है। ये तरंगें आयनमण्डल से परावर्तित नहीं होती है। ये अन्तरिक्ष में चली जाती हैं। अतः इन्हें परावर्तित करने के लिए कृत्रिम उपग्रहों की आवश्यकता होती है।