Category: फ़िजिक्स

  • सूक्ष्मदर्शी (Microscopes) क्या है ?

    What is Microscopes ?

    सूक्ष्मदर्शी एक ऐसा प्रकाशित यन्त्र है जिसकी सहायता से सूक्ष्म वस्तुएं देखी जाती है। इसके द्वारा सूक्ष्म वस्तु का आभासी एवं आवर्धित प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी (25 सेमी.) पर बनता है जिससे वह स्पष्ट दिखायी देती है।

    सूक्ष्मदर्शी दो प्रकार के होते हैं (1) सरल सूक्ष्मदर्शी तथा (2) संयुक्त सूक्ष्मदर्शी

    सरल सूक्ष्मदर्शी (Simple Microscope)

    सरल सूक्ष्मदर्शी छोटी फोकस-दूरी का एक उत्तल (अभिसारी) लेंस होता है । इस लेन्स को ‘आवर्धक लेंस’ (Magnifying lens) भी कहते हैं।

    संयुक्त सूक्ष्मदर्शी (Compound Microscope)

    संयुक्त सूक्ष्मदर्शी छोटी वस्तुओं के देखने के काम में लाया जाता है। इसकी आवर्धन क्षमता सरल सूक्ष्मदर्शी की तुलना में बहुत अधिक होती है।

    इसमें एक ही अक्ष पर दो उत्तल लेन्स लगे होते हैं जो लेन्स वस्तु की ओर होता है, उसे अभिदृश्यक (Objective lens) और जो आंख के समीप होता है, उसे अभिनेत्र लेन्स (Eye lens) कहते हैं।

    खगोलीय दूरदर्शी (Astronomical Telescope)

    खगोलीय दूरदर्शी एक ऐसा प्रकाशिक यन्त्र है जो आकाशीय पिण्डों अथवा बहुत अधिक दूरी पर स्थित वस्तुओं को देखने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यह यन्त्र दो उत्तल लेन्सों के संयोग से बनाया जाता है जो लेन्स वस्तु की ओर रहता है, उसे ‘अभिदृश्यक‘ कहते हैं।

    यह लेन्स अधिक फोकस दूरी तथा अधिक द्वारक (Aperture) का उत्तल लेन्स होता है। लेन्स का द्वारक अधिक होने के कारण दूर की वस्तु से आने वाले प्रकाश की अधिक मात्रा को यह एकत्र करता है जिससे दूरदर्शी से बने अन्तिम प्रतिबिम्ब की तीव्रता बढ़ जाती है।

    दूसरे उत्तल लेन्स को जिसके निकट आंख को रखकर दूर की वस्तु के प्रतिबिम्ब को देखा जाता है, ‘अभिनेत्र लेन्स’ कहते हैं। इस लेन्स की फोकस दूरी एवं द्वारक दोनों ही कम होते हैं।

  • गामा-किरणें (γ-Rays) क्या होती हैं ?

    गामा-किरणें (γ-किरण)

    गामा-किरणों को इनके अन्वेषक के नाम पर ‘बैकुरल किरणें’ भी कहते हैं। ये अत्यन्त लघु तरंग दैर्ध्य की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें होती है।

    ये उच्च परमाणु द्रव्यमान के रेडियोधर्मी पदार्थों, जैसे यूरेनियम, रेडियम, थोरियम. प्लूटोनियम, आदि के परमाणुओं के नाभिकों के विघटन की क्रिया से उत्सर्जित होती है। इसकी भेदन क्षमता अल्फा तथा बीटा किरणों के मुकाबले अधिक होता है ये किरणें गैस को आयनीकृत कर देती हैं।

    इनकी आवृत्ति बहुत अधिक होने के कारण ये अपने साथ बहुत अधिक ऊर्जा ले जाती हैं। इनकी भेदन क्षमता इतनी अधिक होती है, कि ये 30 सेमी. मोटी लोहे की चादर को भेद कर निकल जाती हैं।

    ये फोटोग्राफिक प्लेटों पर रासायनिक क्रिया करती हैं। ये सोडियम आयोडाइड तथा अन्य प्रस्फुरक पदार्थों की पर्त वाले पर्दे (Fluorescent screen) पर प्रस्फुर (चमक) उत्पन्न करती है। इन प्रस्फुरों के द्वारा अथवा फोटोग्राफिक प्लेट पर प्रभाव से इन किरणों की पहचान की जाती है। इनका उपयोग नाभिकीय अभिक्रिया तथा कृत्रिम रेडियोधर्मिता में किया जाता है।

    उपयोग

    • गामा किरणे, ब्रह्माण्ड में होने वाली अति उच्च ऊर्जा वाली परिघटनाओं के बारे में जानकारी देता है।
    • गामा किरणों के द्वारा आनविक परिवर्तन किया जा सकता है। इसी प्रक्रिया द्वारा अर्ध-रत्नों (semi-precious stones) के गुणों को बदला जाता है।
    • संवेदक (सेन्सर) – स्तर (levels), घनत्व तथा मोटाई मापने के लिये।
    • जीवाणुओं को मारने के लिये – इसे गामा किरणन कहते हैं। गामा किरणन द्वारा चिकित्सा उपकरणों का रोगाणुनाशन (sterilization) किया जाता है जो रासायनिक विधि तथा अन्य विधियों से की जाने वाले रोगाणुनाशन का विकल्प बनकर उभरी है।
    • गामा किरणों के द्वारा भोज्य पदार्थों से उन जीवाणुओं को मार दिया जाता है जो उनका क्षय करते हैं।
    • फल और शब्जियों का अंकुरण रोकने के लिये, या अंकुरण की गति कम करने के लिये या अंकुरण में देरी करने के लिए।
    • कैंसर की चिकित्सा में (गामा किरणों के कारण कैंसर भी हो सकता है।)
  • ध्वनि-अनुनाद क्या होता है ?

    ध्वनि-अनुनाद

    जब किसी वस्तु पर कोई बाहरी आवर्ती (Periodic force) लगाया जाता है, तो वस्तु उस बल के प्रभाव में प्रणोदित कम्पन (Forced vibration) करने लगती है। 

    यदि आवर्ती बल की आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो तो वस्तु के कम्पनों का आयाम अधिकतम हो जाता है। इस घटना को ‘अनुनाद’ (Resonance) कहते हैं। 

    1939 में संयुक्त राज्य अमेरिका का टैकोमा पुल यांत्रिक अनुनाद के कारण ही क्षतिग्रस्त हो गया था। उच्च गति की पवन पुल के ऊपर कम्पन करने लगी जो पुल की स्वाभाविक आवृत्ति के लगभग बराबर आवृत्ति की थी। इससे पुल में दोलन आरम्भ हो गया और यह कई घण्टे तक चलता रहा और कम्पन के आयाम में लगातार वृद्धि होते रहने के कारण पुल टूट गया। 

    उदाहरण

    1. सैनिकों को पल पार करने का प्रशिक्षण अनुनाद से बचने के लिए ही दिया जाता है। पुल को कम्पन कर सकने वाला एक निकाय माना जा सकता है जिसके लिए स्वाभाविक आवृत्ति का एक निश्चित मान होगा। यदि सैनिकों के नियमित पड़ने वाले कदमों की आवृत्ति पुल की आवृत्ति के बराबर हो जाए तो अनुनाद की स्थिति आ जाएगी और पुल में अधिक आयाम के कम्पन उत्पन्न हो जाएंगे। इससे पुल टूटने का खतरा रहता है। इसी कारण पुल पार करते समय सैनिकों की टुकडी कदम मिलाकर नहीं चलती। 
    2. बच्चों का झूला इसका एक सामान्य यांत्रिक उदाहरण है। झूले को ऊंचाई तक ले जाने के लिए उसे हर बार अधिक जोर से धक्का नहीं देना चाहिए, लेकिन उसे एक निश्चित अंतराल पर समान रूप से ही धक्का देना चाहिए। एक छोटे बल के प्रत्येक बार आरोपित होने से ही झूला अपनी उच्चतम स्थिति पर कुछ ही समय में पहुंच जाता है और उसकी गति विस्तृत हो जाती है।
    3. यदि कोई वायुयान कम ऊंचाई से गुजरता है, तो खिड़कियां खड़खडाने लगती हैं। ऐसा तब होता है जब खिड़की को स्वाभाविक आवृत्ति का मान वायुयान के इंजन की निकलने वाले शोर की आवृत्ति के बराबर हो जाता है। जब किसी कमरे में कोई बड़ा विस्फोट होता है, तो खिड़कियां तीव्र गति से खड़खड़ाने लगती हैं और ऐसा तब भी होता है जब खिड़िकियां बंद हों। यदि विस्फोट और भी शक्तिशाली हो, तो खिड़की टूटकर गिर सकती है। इसी प्रकार यदि कोई बम गिराया जाता है, तो कुछ दूरी तक के भवन गिर जाते हैं। 
    4. रेडियो भी अनुनाद के सिद्धान्त पर ही कार्य करता है, किसी रेडियो सेट को समस्वरित (Tune) करने के लिए रेडियो के धारिता के मान को तब तक परिवर्तित किया जाता है जब तक कि विद्युत की वह आवृत्ति न प्राप्त हो जाए जितनी आवृत्ति आ रहे ध्वनि संकेत की है। एण्टीना में छोटे विभवान्तर या वि.वा. बल उत्पन्न किए गए होते हैं जो समस्वरित परिपथ के आयाम के बराबर का आयाम बना सके।
  • ऊष्मा इंजन क्या होते हैं ?

    ऊष्मा इंजन

    ऊष्मा इंजन वह युक्ति है जो ईंधन के दहन से प्राप्त ऊष्मीय ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदलती है। एक आंतरिक दहन इंजन, जैसे पेट्रोल या डीजल या जेट इंजन में ईंधन को एक बेलन के अन्दर जलाया जाता है या किसी चैम्बर में जलाया जाता है जहां ऊर्जा परिवर्तन होता है। ऐसा अन्य इंजनों जैसे टरबाइन इंजनों में नहीं होता है। 

    पेट्रोल इंजन

    जिस आन्तरिक दहन इंजन में हवा कार्यकारी पदार्थ होती है और पेट्रोल का वाष्प ईंधन होता है उसे पेट्रोल इंजन कहते हैं। पेट्रोल का कार्यकारी पदार्थ नियत आयतन पर ऊष्मा लेता है। इंजन में गर्म गैस का द्रुत प्रसार प्रयोग में लाया जाता है जिससे गर्म गैसें बेलन के पिस्टन को बल लगाकर धक्का देती रहती है। पेट्रोल इंजन की कार्यक्षमता 30 प्रतिशत होती है।

    इसका अर्थ है, कि इसे जितनी ऊष्मीय ऊर्जा दी जाती है उसका मात्र 30 प्रतिशत ही गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो पाता है। शेष ऊर्जा निर्वात चरण में बाहर चल जाती है। 

    डीजल इंजन

    जिस आन्तरिक दहन इंजन में हवा कार्यकारी पदार्थ होती है और डीजल का वाष्प ईंधन होता है, उसे ‘डीजल इंजन’ कहते हैं। दो तथा चार चरण वाले डीजल इंजनों की कार्यविधि भी पेट्रोल इंजनों की तरह ही होती है। इनमें पेट्रोल की जगह डीजल का उपयोग किया जाता है। डीजल इंजन में कोई स्पार्किंग प्लग नहीं होता है और न ही कार्बोरेटर।

  • दृष्टि दोष तथा उनका निवारण

    Defect of Vision and their Correction

    आंख के उत्तल लेन्स द्वारा किसी बाहरी बिन्दु का उल्टा प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल पर बनता है। सामान्य आखों द्वारा अनन्त पर स्थित वस्तु को देखा जा सकता है। उसे स्पष्ट दर्शन की न्यूनतम दूरी (List distance of distinct vision) कहते हैं और इसका मान 25 सेमी. है।

    निकट दृष्टि दोष (Myopia or Short Sightedness)

    यदि नेत्र पास की वस्तु को देख लेता है, किन्तु एक निश्चित दूरी से अधिक दूर की वस्तु को स्पष्ट नहीं देख पाता है, तो उस नेत्र में निकट दृष्टि का दोष होता है। इस स्थिति में दूर की वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर उसके आगे बनता है।

    निवारण

    निकट दृष्टि दोष के निवारण के लिए उपयुक्त फोकस दूरी के अवतल लेन्स का प्रयोग किया जाता है। अवतल लेन्स के प्रयोग करने से वस्तु का प्रतिबिम्ब दृष्टि-पटल पर बनने लगता है। ऐसा करने से वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दृष्टि-पटल का बन जाता है और वस्तु स्पष्ट दिखाई देने लगती है।

    दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia or Long Sightedness)

    इस दोष में नेत्र को दूर की वस्तु तो स्पष्ट दिखाई देती है, किन्तु पास की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती। इस दोष के कारण पास की वस्तु का प्रतिबिम्ब दृष्टि-पटल पर न बनकर उसके पीछे बनता है।

    निवारण

    इस दोष के निवारण हेतु चश्में में एक ऐसे अभिसारी (उत्तल) लेन्स के प्रयुक्त करने की आवश्यकता होती है।

    अन्य नेत्र दोष

    1. दृष्टिवैषम्य (Astigmatism): इसमें नेत्र क्षैतिज व ऊर्ध्व रेखाओं को एक साथ स्पष्ट नहीं देख पाता है। इस कारण अलग-अलग समतलों में आंख में प्रवेश करने वाली किरणें दृष्टि पटल से अलग-अलग दूरियों पर फोकस होती है। इसलिए वस्तु के एक बिन्दु के रूप में होने पर भी उसके प्रतिबिम्ब की शक्ल रैखिक, वृत्ताकार अथवा बिन्दु को छोड़कर किसी दूसरी शक्ल की हो सकती है। इसके निवारण हेतु बेलनाकार लेन्स प्रयुक्त किया जाता है। इसे ‘टोरिक लेन्स‘ भी कहते हैं।

    2. वर्णांधता (Colour Blindness): नेत्र किसी रंग विशेष के लिए संवेदनहीन हो जाता है। इसका कारण है रेटिना के किसी शंकु (Cone) का संवेदनहीन हो जाना। इसका अभी तक कोई उपचार नहीं है।

    3. ज़रा-दृष्टि (Presbyopia): वृद्धावस्था के कारण न पास की और न दूर की वस्तुएं दिखाई देती है। यह पक्ष्माभि पेशियों के धीरे-धीरे कमजोर होने तथा सिस्टलीय लेन्स के लचीलेपन में कमी आने के कारण होता है। कभी-कभी किसी व्यक्ति के नेत्र में दोनों निकट दृष्टि तथा दीर्घ दृष्टि दोष हो सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को प्रायः द्विफोकसी लेन्सों (Bifocal lens) की आवश्यकता होती है।

    रंग दृष्टि (Colour Vision)

    रेटिना में दो प्रकार की प्रकाश संवेदी कोशिकाएं होती है – शकु (Cones) तथा छड़ (Rods)| शंकु रंग को पहचानते हैं। छड़ प्रकाश की तीव्रता को पहचानती हैं। ये धुंधले प्रकाश के प्रति अति संवेदनशील हैं, अत: अन्धेरे में भी हम कुछ-कुछ देख पाते हैं। अधिक तीव्र प्रकाश में छड़ों का कार्य बहुत कम हो जाता है, शंकु अधिक क्रियाशील हो जाते हैं।

    शंकु कोशिकाएं तीन प्रकार की होती हैं—पहले प्रकार की नीले रंग के लिए, दूसरे प्रकार की हरे रंग के लिए ओर तीसरे प्रकार की लाल रंग के लिए सर्वाधिक संवेदनशील होती हैं। इनमें से कोई एक प्रकार की शंकु कोशिका दोषयुक्त होती है, तो वही रंग दिखाई नहीं देगा और तत्संगत वर्णान्धता रोग उत्पन्न हो जाएगा। वर्णान्धता प्रायः अनुवांशिक रोग है जो इलाजरहित है। युक्तियां पराबैंगनी प्रकाश को भी देख लेती हैं, लेकिन लाल प्रकाश को नहीं। प्रसिद्ध रसायन विज्ञानी जॉन डाल्टन भी वर्णान्धता रोग से पीड़ित थे

  • मानव नेत्र (Human Eye)

    Human Eye

    मानव आंख एक कैमरा के सदृश है। आंख के लेन्स द्वारा उल्टा वास्तविक प्रतिबिम्ब आंख के पीछे सुग्राही रेटिना पर बनता है। यह प्रतिबिम्ब दृक् तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क तक संचरित हो जाता है और सीधे प्रतिबिम्ब का आभास होता है।

    मानव नेत्र की रचना

    नेत्र का गोला (Eye ball) बाहर से एक दृढ़ व अपारदर्शी श्वेत पर्त से ढका रहता है जिसे ‘दृढ पटल’ (Sclerotic) कहते हैं। गोले का सामने का भाग पारदर्शी तथा उभरा हुआ होता है। इसे ‘कॉर्निया‘ (Cornea) कहते हैं। नेत्र में प्रकाश इसी से होकर प्रवेश करता है। कॉर्निया के पीछे एक रंगीन अपारदर्शी झिल्ली का पर्दा होता है जिसे ‘आइरिस‘ (Iris) कहते हैं। इस पर्दे के बीच में एक छोटा-सा छिद्र होता है जिसे ‘पुतली‘ अथवा ‘नेत्र तारा‘ (Pupil) कहते हैं। पुतली की एक विशेषता यह होती है, कि यह अधिक प्रकाश में अपने आप छोटी तथा अन्धकार में अपने आप बड़ी हो जाती है। अत: प्रकाश की सीमित मात्रा ही नेत्र में जा पाती है l

    आइरिस के ठीक पीछे ‘नेत्र-लेन्स’ (Eye lens) होता है। लेन्स अपने स्थान पर मांसपेशियों के बीच में टिका रहता है तथा इसमें अपनी फोकस-दूरी को बदलने की क्षमता होती है। कॉर्निया और नेत्र-लेन्स के बीच में एक नमकीन पारदर्शी द्रव भरा रहता है जिसे ‘नेत्रोद’ या ‘जलीय-द्रव’ (Aqueous humour) कहते हैं। नेत्र-लेन्स के पीछे एक अन्य पारदर्शी द्रव होता है जिसे ‘कांच-द्रव’ कहते हैं।

    दृढ़ पटल के नीचे काले रंग की एक झिल्ली होती है जिसे ‘कोरोइड’ (Choroid) कहते हैं। यह प्रकाश को शोषित करके, प्रकाश के आन्तरिक परावर्तन को रोकती है। इस झिल्ली के नीचे नेत्र के सबसे भीतर एक पारदर्शी झिल्ली होती है जिसे ‘रेटिना’ (Retina) कहते हैं। यह प्रकाश-शिराओं (Optic nerves) की एक फिल्म होती है। ये शिराएं वस्तुओं के प्रतिबिम्बों के रूप, रंग और आकार का ज्ञान मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं। जिस स्थान पर प्रकाश-शिरा रेटिना को छेदकर मस्तिष्क में जाती है, उस स्थान पर प्रकाश का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस स्थान को ‘अन्ध-बिन्दु’ (Blind spot) कहते हैं। रेटिना के बीचों-बीच एक पीला भाग होता है जहां पर बना हुआ प्रतिबिम्ब सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इसे ‘पीत-बिन्दु’ (Yellow spot) कहते हैं।

    निकटतम बिन्द जिसे नेत्र अपनी अधिकतम समंजन क्षमता लगाकर स्पष्ट देख सकता है नेत्र का निकट-बिंदु (Near point) कहलाता है। नेत्र से निकट-बिन्दु की दूरी ‘स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी’ (Least distanee of distinct vision) कहलाती है। सामान्य नेत्र (Normal eye) के लिए यह दूरी 25 सेमी. होती है। इसके विपरीत, वह दूरतम बिन्दु जिसे नेत्र बिना समंजन क्षमता लगाए स्पष्ट देख सकता है, नेत्र का दूर-बिन्दु’ (Far point) कहलाता है। सामान्य नेत्र के लिए दूर-बिन्दु अनन्त पर होता है।

  • कैमरा (Camera) और उसके प्रकार

    Camera and its type

    सूची-छिन्द्र कैमरा (Pinhole Camera)

    इस कैमरे में लकड़ी का बना एक आयताकार बॉक्स होता है। इसकी भीतरी दीवारें काले रंग से रंगी रहती हैं। जब हम कैमरे के सामने कोई वस्तु रखते हैं, तो इस वस्तु का उल्टा प्रतिबिम्ब कैमरे की पीछे वाली दीवार पर बनता है।

    फोटोग्राफिक कैमरा (Photographic Camera)

    इस यन्त्र के द्वारा मनुष्यों, वस्तुओं तथा प्राकृतिक दृश्यों का स्थायी प्रतिबिम्ब फोटोग्राफिक प्लेट अथवा फिल्म पर लिया जाता है। ये दो प्रकार के होते हैं—बॉक्स कैमरा (Box camera) तथा फोल्डिंग कैमरा (Folding camera)। इनके मुख्य भाग इस प्रकार है:

    1. फोटोग्राफिक फिल्म (Photographic Film) : यह सैलुलाइड की फिल्म होती है जिस पर जिलेटिन में सिल्वर ब्रोमाइड की पतली परत जमी रहती है। जब इस पर प्रकाश गिरता है, तो रासायनिक क्रिया होती है। फिल्म के स्थान पर प्लेटों का भी उपयोग किया जा सकता है।

    2. लेन्सः प्रकाश-रोधी बॉक्स के आगे के भाग में एक उत्तल लेन्स लगा रहता है जिसे ‘अभिदृश्यक‘ कहते हैं। अच्छे कैमरों में अभिदृश्यक कई लेन्सों में मिलकर बना होता है। इससे प्रतिबिम्ब के दोषों का निवारण हो जाता है।

    3. डायाफ्राम: अभिदृश्यक के ठीक सामने धातु का एक गोल पर्दा होता है जिसके बीच में एक छिद्र होता है। इसे ‘डायाफ्राम‘ कहते हैं। डायाफ्राम के छिद्र से होकर ही प्रकाश कैमरे में प्रवेश करता है। छिद्र का आकार आवश्यकतानुसार घटाया-बढ़ाया जा सकता है।

    4. शटर (Shutter) : लेन्स के पीछे एक स्वतः चालित (Automatic) कपाट होता है जिसे ‘शटर‘ कहते हैं। जब यह बन्द रहता है तब कैमरे में प्रकाश प्रवेश नहीं करता।

    5. घिसे कांच का पर्दा (Ground-glass Screen): यह एक घिसे कांच की प्लेट होती है जो कैमरे के पिछले भाग में लगी रहती है।

  • लेन्स द्वारा प्रकाश का अपवर्तन क्या है ?

    What is Refraction of Light through a Lens ?

    सामान्यतः दो गोलीय पृष्ठों से घिरे हुए किसी अपवर्तक माध्यम को लेन्स कहा जाता है परन्तु कुछ लेन्सों में एक पृष्ठ समतल भी होता है। चश्मा, कैमरा, सूक्ष्मदर्शी तथा दूरबीन ये सभी लेन्सों की सहायता से कार्य करते हैं। लेन्स मुख्यतः कांच के बने होते हैं, लेकिन कुछ लेन्स प्लास्टिक के भी बने होते हैं।

    प्रायः लेन्स दो प्रकार के होते हैं उत्तल लेन्स (Convex lens) तथा अवतल लेन्स (Concave lens)

    उत्तल लेन्स द्वारा वस्तु की विभिन्न स्थितियों के लिए बने प्रतिबिम्ब

    लेन्स की क्षमता

    लेन्स की क्षमता को उसकी फोकस दूरी के व्युत्क्रम या विलोम द्वारा व्यक्त किया जाता है। यदि किसी लेन्स की फोकस दूरी f मीटर में हो तो उसकी क्षमता p= l /f डाइऑप्टर होती है। यहां पर डाइऑप्टर लेन्स की क्षमता का SI मात्रक है। उत्तल लेन्स की क्षमता धनात्मक तथा अवतल लेन्स की क्षमता ऋणात्मक होती है।

    लेन्स की फोकस दूरी तथा क्षमता में परिवर्तन

    यदि n अपवर्तनांक वाले लेन्स को उतने ही अपवर्तनांक वाले द्रव में डुबोया जाए तो लेन्स की क्षमता शून्य हो जाती है अर्थात् उसकी फोकस दूरी अनन्त हो जाती है। लेन्स साधारण गुटके की भांति कार्य करेगा। लेन्स अदृश्य हो जाएगा।

    उत्तल लेन्स, अवतल लेन्स एवं वृत्ताकार प्लेट की पहचानः

    1. यदि कोई वस्तु अपने वास्तविक आकार से छोटी दिखाई पड़ती है, तो अवतल लेन्स है।

    2. यदि कोई वस्तु अपने वास्तविक आकार के बराबर दिखाई पड़ती है, तो वृत्ताकार प्लेट है।

    3. यदि कोई वस्तु अपने वास्तविक आकार से बड़ी दिखाई पड़ती है, तो उत्तल लेन्स है।

  • प्रकाशिक तन्तु (Optical Fibres) क्या है ?

    What is Optical Fibers ?

    प्रकाशिक तन्तु, पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के सिद्धान्त पर आधरित एक ऐसी युक्ति है जिसके द्वारा प्रकाश सिग्नल को, इसकी तीव्रता में बिना क्षय हुए, एक स्थान से दूसरे स्थान तक चाहे जितने भी टेढ़े-मेढ़े मार्ग से स्थानान्तरित किया जा सकता है।

    ये कांच के बहुत पतले धागे होते हैं। इनकी त्रिज्या लगभग 50 से 200 um होती है। ये मूलतः पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं। इनमें प्रकाश स्रोत LED (प्रकाश-उत्सर्जक डायोड) का प्रयोग किया जाता है तथा संसूचन (Detection) के लिए फोटो डायोड का प्रयोग किया जाता है।

    उपयोग

    (1) प्रकाश सिग्नलों के दूरसंचार में (टेलीफोन संचार तथा प्रकाशीय संचार में)

    (2) विद्युत सिग्नल की प्रकाश सिग्नल में बदलकर प्रेषित करने तथा अभिग्रहण करने में,

    (3) मनुष्य के शरीर में आन्तरिक भागों का परीक्षण करने में, तथा

    (4) शरीर के अन्दर लेसर किरणों को भेजने में किया जाता है।

  • प्रकाश का पूर्ण आन्तरिक परावर्तन क्या है ?

    What is Total Internal Reflection of Light ?

    परिभाषा – सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाने वाली प्रकाश की किरणों के लिए आपतन कोण क्रान्तिक कोण से अधिक हो जाए तो प्रकाश की किरणें उसी माध्यम में लौट आती हैं। यह प्रक्रिया पूर्ण आन्तरिक परावर्तन कहलाती है।

    क्रान्तिक कोण – क्रान्तिक कोण सघन माध्यम में बना वह आपतन कोण है जिसके लिए विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 90° होता है। |

    पूर्ण परावर्तन केवल तब ही सम्भव है जबकि निम्न दो शर्ते पूरी हों:

    1. प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जा रहा हो
    2. आपतन कोण क्रान्तिक कोण से बड़ा हो

    पूर्ण आन्तरिक परावर्तन के कारण ही—

    • जल में पड़ी हुई परखनली चमकीली दिखायी देती है,
    • कांच में आयी दरारे चमकती हैं और
    • कालिख से पुता हुआ गोला जल में चमकता है।

    उदाहरण

    हीरे से वायु में आने वाली किरण के लिए क्रान्तिक कोण बहुत कम, केवल 24° होता है। अतः जब बाहर का प्रकाश किसी कटे हुए हीरे में प्रवेश करता है, तो वह उसके भीतर विभिन्न तलों पर बार-बार पूर्ण परावर्तित होता रहता है। जब किसी तल पर आपतन कोण 24° से कम हो जाता है, तब ही प्रकाश हीरे से बाहर आ पाता है। इस प्रकार हीरे में सभी दिशाओं से प्रवेश करने वाला प्रकाश केवल कुछ ही दिशाओं में हीरे से बाहर निकलता है। अतः इन दिशाओं से देखने पर हीरा अत्यन्त चमकदार दिखायी देता है। यह क्रिया प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण ही होती है।

    हीरे से वायु में आने वाली किरण के लिए क्रान्तिक कोण बहुत कम, केवल 24° होता है। अतः जब बाहर का प्रकाश किसी कटे हुए हीरे में प्रवेश करता है, तो वह उसके भीतर विभिन्न तलों पर बार-बार पूर्ण परावर्तित होता रहता है। जब किसी तल पर आपतन कोण 24° से कम हो जाता है, तब ही प्रकाश हीरे से बाहर आ पाता है। इस प्रकार हीरे में सभी दिशाओं से प्रवेश करने वाला प्रकाश केवल कुछ ही दिशाओं में हीरे से बाहर निकलता है। अतः इन दिशाओं से देखने पर हीरा अत्यन्त चमकदार दिखायी देता है। यह क्रिया प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण ही होती है।

    रेगिस्तान में मरीचिका (Mirage) कभी-कभी रेगिस्तान में यात्रियों को दूर से पेड़ के साथ-साथ उसका उल्टा प्रतिबिम्ब भी दिखायी देता है। अत: इन्हें ऐसा भ्रम हो जाता है, कि वहां कोई जल का तालाब है जिसमें पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखायी दे रहा है परन्तु वास्तव में, वहा तालाब नहीं होता है। यह क्रिया प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण होती है।

    जब सूर्य की गर्मी से रेगिस्तान का रेत गरम होता है, तो उसे छूकर पृथ्वी के पास की वायु अधिक गरम हो जाती है। इससे कुछ ऊपर तक वायु की पर्तों का ताप लगातार घटता जाता है। जब पेड़ से प्रकाश किरणें पृथ्वी की ओर आती हैं, तो उन्हे अधिक विरल पतों से होकर आना पड़ता है। इसलिए प्रत्येक पर्त पर अपवर्तित किरण अभिलम्ब से दूर हटती जाती है। अतः प्रत्येक अगली पर्त पर आपतन कोण बढ़ता जाता है तथा किसी विशेष पर्त पर कान्तिक कोण से बड़ा हो जाता है। इस पर्त पर किरण पूर्ण परावर्तित होकर ऊपर की ओर चलने लगती हैं। चूंकि ऊपर वाली पर्ते अधिकाधिक सघन हैं, अत: ऊपर उठती हुई किरण अभिलम्ब की ओर झुकती जाती है। जब यह किरण यात्री की आंख में प्रवेश करती है, तो उसे पृथ्वी के नीचे से आती प्रतीत होती है तथा यात्री को पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखायी देता है।

    Lens TypeDistance of Object to the Left of LensImage DescriptionImage Location
    ConvexMore than two focal lengthsInverted, smallerBetween one and two focal lengths to the right of lens
    ConvexTwo focal lengthsInverted, same sizeTwo focal lengths to the right of lens
    ConvexBetween one and two focal lengthsInverted, largerMore than two focal lengths to the right of lens
    ConvexOne focal lengthNo imageNo image
    ConvexWithin one focal lengthUpright, largerTo the left of lens
    ConcaveAny positionUpright, smallerTo the left of lens