Category: कैमिस्ट्री

  • थोरियम और उसके गुण

    थोरियम और उसके गुण

    Thorium and its properties

    थोरियम (Thorium) आवर्त सारणी के ऐक्टिनाइड श्रेणी (actinide series) का प्रथम तत्व है।

    थोरियम के अयस्क में केवल एक समस्थानिक (द्रव्यमान संख्या 232) पाया जाता है, जो इसका सबसे स्थिर समस्थानिक (अर्ध जीवन अवधि 1.4 x 1010 वर्ष) है। परंतु यूरेनियम, रेडियम तथा ऐक्टिनियम अयस्कों में इसके कुछ समस्थानिक सदैव वर्तमान रहते हैं, जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ 227, 228, 230, 231 तथा 234 हैं। इनके अतिरिक्त 224, 225, 226, 229 एवं 233 द्रव्यमान वाले समस्थानिक कृत्रिम उपायों द्वारा निर्मित हुए हैं।

    थोरियम एक रेडियो-सक्रिय धातु है।

    थोरियम धातु की खोज 1828 ई में बर्ज़ीलियस ने थोराइट अयस्क में की थी। यद्यपि इसके अनेक अयस्क ज्ञात हैं, परंतु मोनेज़ाइट (monazite) इसका सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं, जिसमें थोरियम तथा अन्य विरल मृदाओं के फॉस्फेट रहते हैं।

    संसार में मोनेज़ाइट का सबसे बड़ा भंडार भारत के केरल राज्य में हैं। बिहार प्रदेश में भी थोरियम अयस्क की उपस्थिति ज्ञात हुई है। इनके अतिरिक्त मोनेज़ाइट अमरीका, आस्ट्रलिया, ब्राज़िल और मलाया में भी प्राप्त है।

    थोरियम का निष्कर्षण मुख्यतः मोनाजाइट अयस्क से किया जाता है।

    यह भूरे रंग की धातु है। इसका द्रवणांक 145°C तथा क्वथनांक 2,800°C होता है। इसका आपेक्षिक घनत्व 11.23 होता है।

    थोरियम के उपयोग

    (1) परमाणु ऊर्जा (Atomic energy) के उत्पादन में,

    (2) फोटोइलेक्ट्रिक सेल, Glow tube electrodes में, X-ray targets, Arc lamp के टंगस्टन फिलामेण्ट में,

    (3) Incandescent gas mantles में, तथा

    (4) कार्बनिक रसायन में उत्प्रेरक के रूप में।

  • यूरेनियम और उसके गुण

    यूरेनियम और उसके गुण

    Uranium and its properties

    • यूरेनियम एक दुर्लभ तत्व है।
    • यह प्रकृति में मुक्त अवस्था में नहीं पाया जाता है।
    • इसके सभी खनिज रेडियोसक्रियता का गुण प्रदर्शित करते हैं।
    • भारत में यूरेनियम का सर्वाधिक उत्पादन झारखण्ड राज्य में होता है।
    • यूरेनियम धातु का निष्कर्षण मुख्यतः उसके अयस्क पिचब्लैंड से किया जाता है।
    • यह चमकदार (Lustrous) सफेद धातु है।
    • यह आघातवर्ध्य और बहुत तन्य होता है। लेकिन अशुद्ध धातु भंगुर होता है।
    • यह काफी रेडियोसक्रिय होता है।
    • यह पारामैग्नेटिक होता है, इसका आपेक्षिक घनत्व 19.05, द्रवणांक 1,850°C तथा क्वथनांक 3,500°C होता है।

    यूरेनियम का उपयोग

    • यूरेनियम कार्बाइड का उपयोग हैबर विधि में अमोनिया के उत्पादन में उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है।
    • यूरेनियम का उपयोग परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है।
    • इसका उपयोग अनेक मिश्र धातुओं के निर्माण में होता है।
    • इसका उपयोग गैस विसर्जन उपकरण (Gas discharge device) में इलेक्ट्रोड के रूप में होता है।
    • यूरेनियम के नाइट्रेट, क्लोराइड और सेलिसायलेट का उपयोग दवाई निर्माण में होता है।
    • यूरेनियम के नाइट्रेट तथा एसीटेट का उपयोग फोटोग्राफी में होता है।

    यूरेनियम के समस्थानिक (Isotopes of Uranium)

    यूरेनियम के तीन समस्थानिक है

    (1) 92U234

    (2) 92U235 तथा

    (3) 92U238

    • प्रकृति में सर्वाधिक मात्रा में 92U238 पाया जाता है 99.28%, जबकि  92U235 0.71% तथा 92U234 मात्र 0.006% ही पाया जाता है।
    • यूरेनियम के समस्थानिक 92U235 का उपयोग परमाणु भट्टी (Atomic reactor) में ईंधन के रूप में होता है।
    • यूरेनियम का समस्थानिक 92U238 रेडियोसक्रियता प्रदर्शित नहीं करता है।
    • यूरेनियम को ‘आशा धातु’ (Metal of hope) भी कहा जाता है।
  • सीसा और उसके गुण

    सीसा और उसके गुण

    Lead and its properties

    • सीसे का निष्कर्षण मुख्यतः उसके अयस्क गैलना (Pbs) से किया जाता है।
    • सीसा सर्वाधिक स्थायी तत्व है।
    • यह एक ऐसा तत्व है जिससे कागज पर लिखने का काम लिया जाता है।
    • यह कागज पर निशान छोड़ता है। यह एक भारी धातु है।
    • यह ताप और विद्युत का कुचालक होता है। यह एक उभयधर्मी धातु है।
    • सीसा शुष्क वायु से कोई अभिक्रिया नहीं करता है।
    • यह आर्द्र वायु के साथ अभिक्रिया कर पहले हाइड्रॉक्साइड का और फिर कार्बोनेट का परत बनाता है।
    • यह वायु की उपस्थिति में गर्म करने पर लेड ऑक्साइड तथा लाल लेड बनता है।
    • यह जल के साथ अभिक्रिया कर लेड हाइड्रॉक्साइड बनाता है।

    सीसे के उपयोग

    (1) मिश्रधातुओं के निर्माण में,

    (2) लेड चेम्बर बनाने में,

    (3) लेड पाइप के निर्माण में, तथा

    (4) कार्बन सीसा (Carbon lead) का उपयोग कृत्रिम अंगों के निर्माण में।

    सीसे के यौगिक

    1. लेड ऑक्साइड (Lead Oxide): इसे ‘लिथार्ज’ कहा जाता है। यह एक उभयधर्मी ऑक्साइड है। इसका उपयोग रबड़ उद्योग, स्टोरेज बैटरी के निर्माण में तथा फ्लिण्ट कांच बनाने में होता है।

    2. लेड डाइऑक्साइड (Lead Dioxide): इसका उपयोग दियासलाई निर्माण में होता है।

    3. लाल लेड (Red Lead): ट्राइ प्लम्बिक टेट्राऑक्साइड को लाल लेड (Red lead) कहा जाता है। इसका उपयोग लाल पेन्ट बनाने में, फ्लिण्ट कांच तथा लाल लेड सीमेण्ट निर्माण में होता है।

    4. लेड एसीटेड (Lend Acetate): इसे Sugar of Lead‘ कहा जाता है। इसे Inorganic Sugar‘ भी कहते हैं। लेड एसीटेट पेपर का उपयोग H2S गैस की उपस्थिति की जांच हेतु किया जाता है।

    5. व्हाइट लेड (White Lead): बेसिक लेड कार्बोनेट को व्हाइट लेट कहा जाता है। इसे ‘सफेदा‘ के नाम से भी जाना जाता है।

    6. लेड टेट्राइथाइल (TEL): इसका उपयोग अपस्फोटन रोकने हेतु किया जाता है।

    लेड (सीसा) के मिश्र धातु

    1.  टाइप मेटल   Type Metal Pb(75%), Sb(20%) तथा Sn(6%)

    2.  सोल्डर       Solder       Sn (50-70%) तथा Pb (50-30%)

    3. प्यूटर        Pewter       Sn (75%) तथा Pb (25%)

    • विद्युत उपकरणों में प्रयुक्त होने वाला फ्यूज तार लेड और टिन से बना मिश्रधातु होता है।
    • राजस्थान स्थित ‘जावर खान’ सीसा-जस्ता के खनन के लिए प्रसिद्ध है।
    • लेड-पाइप पीने के जल को ले जाने के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं क्योंकि ये वायु मिश्रित जल के साथ घुलकर विषैले लेड हाइड्रॉक्साइड [Pb(OH2)] उत्पन्न करते हैं।
  • पारा और उसके गुण

    पारा और उसके गुण

    Mercury and its properties

    • पारा प्रकृति में विस्तृत रूप में नहीं पाया जाता है। यह थोड़ी मात्रा में स्वतंत्र रूप में पाया जाता है।
    • इसका मुख्य अयस्क सिनेबार है जो मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका, मैक्सिको तथा इटली में पाया जाता है।
    • यह ऊष्मा एवं विद्युत का सुचालक होता है। चर्बी या चीनी के साथ खूब जोर से हिलाने पर यह भूरे रंग के चूर्ण में परिवर्तित हो जाता है। इस घटना को पारा का ‘मृतकीकरण’ (Deadening of mercury) कहते हैं। यह न तो आघातवद्धर्य होता है और न ही तन्य।
    • 4.12  k ताप पर पारा का प्रतिरोध शून्य हो जाता है। इस पर जल और क्षार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यह धातुओं के साथ संयोग कर अमलगम (Amalgam) का निर्माण करता है।
    • यह गंधक के साथ अभिक्रिया कर मरक्यूरिक सल्फाइड बनाता है। यह क्लोरीन के साथ प्रतिक्रिया कर मरक्यूरिक क्लोराइड बनाता है।

    पारे का उपयोग

    (1) थर्मामीटर, बैरोमीटर, आदि यंत्रों में,

    (2) गैस को एकत्र करने में,

    (3) धातुओं के अमलगम के निर्माण में,

    (4) चाँदी और सोने के निष्कर्षण में,

    (5) सिन्दूर के निर्माण में,

    (6) कास्टनर-केलनर विधि द्वारा सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के निर्माण में, तथा

    (7) मरकरी वाष्प लैम्प बनाने में।

    पारे के यौगिक

    1. मरक्यूरस क्लोराइड (Mercurous Chloride): इसे केलोमल‘ (Calomel) भी कहा जाता है। यह जान तथा तनु अम्लों में अविलेय होता है। अम्लराज के साथ गर्म करने पर यह मरक्यूरिक क्लोराइड बनाता है। इसका उपयोग औषधि के रूप में तथा केलोमल इलेक्ट्रोड बनाने में होता है।

    2. मरक्यूरिक क्लोराइड (Mercuric Chloride): इसे कोरोसिव सब्लिमेट‘ (Corrosive sublimate) भी कहा जाता है। यह एक भयंकर विष है। यदि मरक्यूरिक क्लोराइड के विलयन में सोडियम हाइड्रॉक्साइट डाल दिया जाए तो नेस्लर अभिकर्मक बनता है। कोरोसिव सब्लिमेट कीटाणुनाशक के रूप में तथा सर्जिकल उपकरणों को साफ करने के काम आता है।

    3. मरक्यूरिक सल्फाइड (Mercuric Sulphide): इसे ‘वर्मीलियन’ (Vermilion)’ भी कहा जाता है। इसका उपयोग सिन्दूर के रूप में, औषधियों में मकरध्वज के रूप में तथा जल रंग (Water colours)बनाने में किया जाता है।

    महत्त्वपूर्ण तथ्य

    • अमलगम (Amalgam: पारा (Hg) अन्य धातुओं के साथ मिलकर धातुई घोल बनाता है जिसे ‘अमलगम‘ कहते हैं।
    • पारे को लौह-पात्र में रखा जाता है क्योंकि यह लोहे के साथ अमलगम नहीं बनाता है।
    • ट्यूबलाइट में सामान्यतः मरकरी का वाष्प और आर्गन गैस भरी रहती है। .
    • बैरोमीटर में पारे की सतह का चढ़ना और उतरना क्रमशः स्वच्छ मौसम एवं तूफान के बारे में सूचना देता है।
    • पारे को क्विक सिल्वर (Quick silver) के नाम से भी जाना जाता है।
  • सोना और उसके गुण

    सोना और उसके गुण

    Gold and its properties

    सोने की प्राप्ति (Occurrence)

    • प्रकृति में सोना मुक्त अवस्था और संयुक्त अवस्था दोनों में पाया जाता है।
    • यह प्रायः क्वार्ट्ज (Quartz) के रूप में पाया जाता है।
    • विश्व में सोना मुख्य रूप से दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, रूस एवं आस्ट्रेलिया में पाया जाता है। विश्व के कुल स्वर्ण उत्पादन का लगभग 2% भारत में उत्पादित होता है।
    • भारत विश्व का सबसे बड़ा स्वर्ण उपभोक्ता वाला देश है। सोना का निष्कर्षण मुख्यतः केलावेराइट और सिल्वेनाइट अयस्क से किया जाता है।

    सोने के गुण

    • यह एक कोमल. आधातवर्ध्य, तन्य चमकदार पीले रंग की धात् है.
    • यह सबसे आघालवध्यं धातु है। यह ऊष्मा और विद्युत का सुचालक होती है।
    • यह वायु से कोई अभिक्रिया नहीं करता है।
    • पोटैशियम सायनाइड या सोडियम सायनाइड में घुलकर यह पोटैशिम औरोसायनाइड या सोडियम औरोसायनाइड बनाता है। यह क्षार के साथ कोई अभिक्रिया नहीं करता है। यह अम्लराज में घुलकर क्लोरोऑरिक अम्ल बनाता है।

    सोने का उपयोग

    1. आभूषणों के निर्माण में।

    2. सिक्कों के निर्माण में।

    3. सोने के लवण फोटोग्राफी में काम आते हैं।

    4. विद्युत लेपन तथा स्वर्ण पत्र चढ़ाने में।

    5. कोलायडी स्वर्ण कांच एवं चीनी उद्योग में प्रयुक्त होता है।

    6. स्वर्ण के वर्क पतली पन्नी छपाई तथा औषधियों में प्रयोग किये जाते हैं। सोने को कठोर बनाने के लिए इसमें तांबा मिलाया जाता है।

    स्वर्ण की शुद्धता (Purity of Gold)

    • स्वर्ण की शुद्धता कैरेट (Carates) में व्यक्त की जाती है।
    • 100% शुद्ध सोना 24 कैरेट का होता है।
    • 22 कैरेट स्वर्ण में 22 भाग सोना तथा शेष दो भाग तांबा होता है।
    • इसी प्रकार 20 कैरेट स्वर्ण में 20 भाग सोना तथा 4 भाग कॉपर (तांबा) मिला होता है।

    सोने के यौगिक

    1. ऑरिक क्लोराइड (Auric Chloride): इसका उपयोग सर्प विषरोधी सूई (Antidote for snake poisoning) बनाने में होता है।

    2. रोल्ड गोल्ड (Rold Gold): इसे सोना का कृत्रिम रूप कहा जाता है। यह 90° Cu तथा 10% Al का मिश्रण होता है।

    3. आयरन पायराइट्स (Iron Pyrites): इसे झूठा सोना (Fools gold) बेवकूफों का सोना भी कहते हैं।

    4. स्वर्ण लेपन में पोटैशियम ओरिसायनाइड का प्रयोग विद्युत अपघट्य के रूप में होता है।

  • प्लेटिनम एवं उसके गुण

    Platinum and its properties

    प्लेटिनम

    प्लेटिनम एक संक्रमण धातु (Transition metal) है

    प्लेटिनम को सफेद सोना (White gold) कहा जाता है। इसे ‘एडम उत्प्रेरक’ (Adam’s catalyst) भी कहते हैं। यह अपने निक्षेप के अलावा निकेल तथा ताम्र अयस्कों में मिला रहता है। यह न तो वायु द्वारा ऑक्सीकृत होता है और न ही हाइड्रोक्लोरिक अम्ल में घुलता है।

    प्लेटिनम का उपयोग

    प्लेटिनम का उपयोग आभूषणों, प्रयोगशाला उपकरणों, इलेक्ट्रोडों, विद्युत सम्पार्को, मिश्रधातुओं एवं हाइड्रोजनीकरण तथा ओसवाल्ड विधि में उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है।

    फाउण्टेनपेन के निब की टिप (Tip)बनाने में भी प्लेटिनम का उपयोग होता है।

  • चाँदी और उसके गुण

    Silver and Its Properties

    चाँदी की प्राप्ति (Occurrence)

    चाँदी प्रकृति में मुक्त एवं संयुक्त दोनों अवस्थाओं में पाया जाता है। चाँदी धातु का निष्कर्षण मुख्यतः अर्जेण्टाइट अयस्क से किया जाता है।

    यह बहुत ही आघातवयं और तन्य होता है। इसके इसी गुण के कारण इसका उपयोग आभूषण निर्माण में होता है। यह ऊष्मा एवं विद्युत का सुचालक होता है। धातुओं में चाँदी सबसे अच्छा सुचालक होता है।

    चाँदी के उपयोग

    (1) आभूषण व सिक्का बनाने में,

    (2) विद्युत लेपन तथा दर्पण की कलई करने में

    (3) मिश्रधातु बनाने में,

    (4) चाँदी के वर्क (पतली पन्नी) का प्रयोग औषधि निर्माण में, तथा

    (5) दांतों के छिद्रों को भरने में।

    चाँदी के यौगिक

    1. सिल्वर क्लोराइड (Silver Chloride): इसे हार्न सिल्वर (Horn silver) कहा जाता है इसका उपयोग फोटोक्रोमेटिक कांच (Photochromatic glass) बनाने में होता है।

    2. सिल्वर ब्रोमाइड (Silver Bromide): इसका उपयोग फोटोग्राफी में होता है।

    3. सिल्वर आयोडाइड (Silver lodide): इसका उपयोग कृत्रिम वर्षा कराने में होता है।

    4. सिल्वर नाइट्रेट (Silver Nitrate): यह सिल्वर का सबसे प्रमुख यौगिक है। इसे ‘लूनर कॉस्टिक‘ भी कहते हैं। यह सिल्वर पर गर्म एवं तनु नाइट्रिक अम्ल की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है। प्रयोगशाला में यह अभिकर्मक के रूप में प्रयुक्त होता है।

    खिजाब बनाने तथा चाँदी चढ़ाने में भी इसका उपयोग होता है। इसका उपयोग धोबियों के चिन्ह बनाने वाली स्याही में किया जाता है। इसका प्रयोग निशान लगाने वाली स्याही बनाने में किया जाता है।

    मतदान के समय मतदाताओं की अंगुली पर इसी का निशान लगाया जाता है। इसे रंगीन बोतलों में रखा जाता है क्योंकि यह सूर्य के प्रकाश में अपघिटत हो जाता है।

    चाँदी के चम्मच से अंडा खाना वर्जित रहता है क्योंकि चाँदी अंडे में उपस्थित गंधक से प्रतिक्रिया कर काले रंग का सिल्वर सल्फाइड बनाती है और चम्मच नष्ट हो जाता है।

  • जस्ता क्या है ?

    जस्ता प्रकृति में मुक्त अवस्था में नहीं पाया जाता है। यह संयुक्त अवस्था में विभिन्न अयस्कों के रूप में पाया । यह जिंक ब्लैंड और कैलामाइन अयस्क के रूप में प्रचुर मात्रा में मिलता है।

    जस्ता धातु का निष्कर्षण मुख्यतः इसके सल्फाइड अयस्क जिंक ब्लैंड (Zns) से किया जाता है। यह ऊष्मा तथा विद्युत का सुचालक होता है

    जस्ता के रासायनिक गुण

    यह तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया कर H2 गैस मुक्त करता है। यह तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया कर SO2 गैस है। यह ठंडा और तनु नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया कर नाइट्रस ऑक्साइड (N2O)गैस मुक्त करता है।

    जस्ता का उपयोग

    1. दानेदार जस्ता तथा जस्ता चूर्ण के रूप में यह प्रयोगशाला में प्रयुक्त होती है।

    2. लोहे को जंग लगने से बचाने के लिए जस्तेदार लोहा (Galvanize iron) बनाने में यह प्रयुक्त होती है।

    3. पीतल (Brass), कांसा (Bronze), जर्मन सिल्वर (German silver), आदि मिश्रधातुएं बनाने में जस्ता का उपयोग होता है।

    4. सिल्वर और सोने के निष्कर्षण में।

    5. युद्ध क्षेत्र में धूम्रपट बनाने में।

    जस्ते की मिश्रधातुएं

    1. पीतल – Brass – Cu (70%,) Zn (30%)

    2. कांसा – Bronze – Cu (88%), Sn (12%)

    3. डच मेटल – Dutch Metal – Cu (80%), Zn (20%)

    4. गन मेटल – Gun Metal – Cu (88%), Sn (10%), Zn (2%)

    5. जर्मन सिल्वर – German Silver – Cu (50%), Zn (35%), Ni (15%)

    जस्ते के यौगिक

    1. जिंक सल्फेट (Zinc Sulphate): इसे सफेद थोथा या सफेद कसीस (White vitriol) भी कहा जाता है। । इसका उपयोग लिथोपोन के निर्माण में तथा रंगाई एवं कैलिको छपाई (Calico printing) के कामों में होता है।

    2. जिंक ऑक्साड (Zinc Oxide): इसे ‘फिलॉस्फर ऊल’ (Philospher’s Wool) कहते हैं। यह मलहम, क्रीम, कृत्रिम दांत, आदि बनाने के काम आता है। जिंक ऑक्साइड रंगने के काम भी आता है। अतः इसे जिंक व्हाइट (Zinc white) कहते हैं। यह प्रकृति में जिकाइट या लाल जिंक अयस्क के रूप में पाया जाता है।

    3. लिथोपोन (Lithopone): जिंक सल्फाइड तथा बेरियम सल्फेट मिश्रण को ‘लिथोपोन’ (Lithopone) कहते हैं। जिंक सल्फेट को बेरियम सल्फाइड के बीच अभिक्रिया कराकर लिथोपोन प्राप्त किया जाता है। यह रंगाई के काम के लिए अत्यंत उपयोगी है क्योंकि इस पर हाइड्रोजन सल्फाइड गैस का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

    4. जिंक सल्फाइड (Zinc Sulphide): यह प्रकृति में जिंक ब्लैंड के रूप में मिलता है। यह स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) का गुण प्रदर्शित करता है। यह स्फुरदीप्ति पर्दे बनाने में काम आता है।

    5. जिंक फॉस्फाइड (Zinc Phosphide): जिंक फॉस्फाइड का उपयोग चूहा-विष (Rat poison) के रूप में होता है।

    6. जिंक क्लोराइड (Zinc Chloride): यह सफेद रवेदार ठोस पदार्थ है जो जल में काफी घुलनशील है। लकड़ो की वस्तुओं को कीड़ों से बचाने के लिए उस पर जिंक क्लोराइड का लेपन किया जाता है।

    7. जिंक कर्बोनेट (Zinc Carbonate): यह बेरवेदार सफेद ठोस पदार्थ है। जल में इसे गर्म करने पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस बाहर निकलती है। जिंक कार्बोनेट से चर्मरोग की दवा बनायी जाती है।

  • तांबा क्या है ?

    What is Copper ?

    तांबा (ताम्र) एक भौतिक तत्त्व है। इसका संकेत Cu (अंग्रेज़ी – Copper) है। इसकी परमाणु संख्या 29 और परमाणु भार 63.5 है।

    प्रकृति में तांबा मुक्त अवस्था तथा संयुक्तावस्था दोनों में पाया जाता है। संयुक्तावस्था में यह मुख्यतः सल्फाइड, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट अयस्कों के रूप में पाया जाता है। तांबा को ‘उत्कृष्ट धातु‘ कहा जाता है। यह एक संक्रमण तत्व है। आदिमानव द्वारा सबसे पहले तांबा का ही उपयोग किया गया था।

    तांबे का निष्कर्षण

    तांबे का निष्कर्षण मुख्यतः कॉपर पायराइट्स अयस्क में किया जाता है। कॉपर पायराइट्स अयस्क का सांद्रण फेन प्लवन विधि द्वारा किया जाता है। फफोलेदार तांबा को ‘अशुद्ध तांबा‘ कहते हैं। द्रवित तांबे को धीरे-धीरे ठंडा करने पर SO2 गैस बाहर निकलने के कारण वह फफोलेदार हो जाता है।

    तांबे की मिश्रधातुएं

    1. पीतल – Cu (70%), Zn (30%)- बर्तन तथा मूर्तियां बनाने में

    2. कांसा – Cu(88%), Sn (12%)- बर्तन तथा मूर्तियों के निर्माण में

    3. जर्मन सिल्वर – Cu (50%), Zn (35%), Ni (15%) – बर्तन तथा मूर्तियां बनाने में

    4. गन मेटल – Cu (88%), Sn (10%), Zn (2%)- बंदूकों तथा मशीनों के पुर्जी के निर्माण में

    यह ऊष्मा तथा विद्युत का सुचालक होता है।

    तांबे के रासायनिक गुण

    यह साधारण ताप पर शुष्क हवा से कोई अभिक्रिया नहीं करता है। यह आर्द्र हवा में धीरे-धीरे भास्मिक कार्बोनेट में परिवर्तित हो जाता है। सान्द्र H2SO4 के साथ गर्म करने पर SO4 गैस निकलती है।

    तांबा के उपयोग

    1. विद्युत तार एवं विद्युत उपकरण के निर्माण में।

    2. विद्युत मुद्रण तथा विद्युत लेपन में।

    3. सिक्का तथा बर्तन के निर्माण में।

    4. मिश्रधातुओं के निर्माण में।

    5. कैलोरीमीटर के निर्माण में।

    तांबे के यौगिक

    क्यूप्रिक सल्फेट (Cupric Sulphate)

    क्यूप्रिक सल्फेट को ‘नीला थोथा’ या ‘नीला कसीस’ के नाम से भी जाना जाता है। यह तांबा का सबसे प्रमुख यौगिक है। यह जल में काफी विलेय है। इसका उपयोग कीटाणुनाशक के रूप में, विद्युत लेपन तथा विद्युत सेलों में होता है। यह KCN के साथ अभिक्रिया कर जटिल यौगिक पोटैशियम क्यूप्रोसायनाइड बनाता है। कॉपर सल्फेट एक विष है। अतः इसे कीटाणुनाशक (Fungicide) के रूप में प्रयोग किया जाता है। निर्जल कॉपर सल्फेट रंगहीन होता है और जल की अति सूक्ष्म मात्रा की उपस्थिति में यह नीला रंग देता है। अतः निर्जल कॉपर सल्फेट का प्रयोग जल के परीक्षण में किया जाता है।

    श्वेत कांसा (White Bronze)

    टिन की अधिक मात्रा युक्त कांसा को ‘श्वेत कांसा‘ कहते हैं।

    रोल्ड गोल्ड (Rold Gold)

    रोल्ड गोल्ड तांबे की एक मिश्रधातु है जिसका उपयोग सस्ते आभूषणों के निर्माण में होता है।

    क्यूप्रिक क्लोराइड (Cupric Chloride)

    यह हरे रंग का रवेदार ठोस पदार्थ है। यह पानी में काफी घुलनशील है। इसका उपयोग डीकेन विधि द्वारा क्लोरीन के निर्माण में उत्प्रेरक के रूप में होता है।

    क्यूप्रस ऑक्साइड (Cuprous Oxide)

    तांबे के चूर्ण को क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ मिलाकर गर्म करने पर क्यूप्रस ऑक्साइड प्राप्त होता है। इसका उपयोग रूबी कांच, रंग, आदि बनाने में होता है।

    मानव शरीर में कॉपर (तांबा) की मात्रा में वृद्धि हो जाने पर विल्सन रोग हो जाता है।

  • लोहा क्या है ?

    What is Iron ?

    लोहा एक संक्रमण धातु हैभूगर्भिक तत्वों में लोहा का चौथा स्थान है

    प्रकृति में लोहा मुक्तावस्था में नहीं पाया जाता है। हरी सब्जियों में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

    यह मानव रक्त के हीमोग्लोबीन में भी उपस्थित रहता है। लोहे के निष्कर्षण में वात भट्टी (Blast furnace) का प्रयोग किया जाता है। लोहा का निष्कर्षण मुख्यतः लाल हेमाटाइट (Red haematite) अयस्क से किया जाता है। मैग्नेटाइट लोहे का चुम्बकीय अयस्क है।

    लोहे की मुख्यतः तीन किस्में होती हैं

    ढलवां लोहा (Cast Iron)

    इसमें कार्बन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक (2.5%) होती है। इसी कारण यह कठोर और भंगुर होता है। इसमें फॉस्फोरस (P), सिलिकान (Si) और मैंगनीज (Mn), आदि अशुद्धियों के रूप में उपस्थित रहता है। यह सबसे निम्न कोटि का लोहा होता है। यह भी दो प्रकार का होता है सफेद ढलवां लोहा (White cast iron) तथा भूरा ढलवां लोहा (Brown cast iron)।

    सफेद ढलवां लोहा में कार्बन की अधिकांश मात्रा संयुक्त अवस्था में रहती है जबकि भूरा ढलवां लोहा में कार्बन की अधिकांश मात्रा ग्रेफाइट के सूक्ष्म रवों के रूप में संपूर्ण पिंड में वितरित रहती है।

    पिटवां लोहा (Wrought Iron)

    इसे ढलवां लोहा से प्राप्त किया जाता है। यह अपेक्षाकृत शुद्ध लोहा होता है। यह आघातवर्ध्य और तन्य होता है। अतः इससे चादरें (Sheets) एवं तार (Wires) बनाये जा सकते हैं। इसमें कार्बन की मात्रा सबसे कम (0.12-0.25%) होता है।

    इस्पात (Steel)

    यह लोहा और कार्बन का एक मिश्रधातु (Alloy) है। इसमें कार्बन की मात्रा ढलवां लोहा से कम (0.25 से 15%) होता है।

    इस्पात की मिश्रधातुएं

    स्टेनलेस इस्पात (Stainless Steel): इसमें 15% क्रोमियम रहता है। यह कठोर होता है तथा इसमें जंग भी नहीं लगता है। इसका उपयोग बर्तन, ब्लेड, वाल्व, आदि बनाने में होता है।

    मैंगनीज इस्पात (Manganese Steel): इसमें लोहा के साथ 6 से 15% मैंगनीज होता है। यह बहुत कठोर एव कम घिसने वाला होता है। इससे रेल की पटरियां, स्विच एवं काटने की मशीने बनायी जाती

    निकेल इस्पात (Nickel Steel): इसमें 3 से 4% निकेल होता है। यह कठोर एवं लचीला होता है तथा इसमें जंग नहीं लगता है। इससे धुरे, बिजली के तार, हवाई जहाज एवं मोटर के कल-पुर्जे बनाये जाते

    इनवार (Invar): इसमें निकेल 36% होता है। इसमें प्रसार-गुण नहीं होता है। इससे घड़ी के पेण्डुलम की छड़े एव स्केल (पैमाना) बनाये जाते हैं।

    टंगस्टन स्टील (Tungsten Steel): इसमें टंगस्टन (W) 10 से 20% रहता है। यह बहुत ही कठोर एवं मजबूत होता है। इससे स्प्रिंग एवं चुम्बक, काटने के औजार तथा तेजी से चलने वाले औजार बनाये जाते हैं।

    क्रोम इस्पात (Chrome Steel): इसमें क्रोमियम 5% रहता हैं, यह बहुत ही कठोर होता है। इससे तिजोरी (Safe vaults), बॉल-बियरिंग (Ball-bearings) तथा पत्थर काटने वाले मशीनों के दांत (Jaws of stone crushing machines) बनाये जाते हैं।

    लोहे के रासायनिक गुण

    यह साधारण ताप पर शुष्क हवा से कोई प्रतिक्रिया नहीं करता है। आर्द्र हवा के सपंर्क में आने पर इस पर जंग लगता है।

    शुद्ध लोहे की शुद्ध जल के साथ कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है लेकिन साधारण जल में इस पर जंग लगता है।

    लाल तप्त लोहे पर जलवाष्प प्रवाहित करने पर फेरसोफेरिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन गैस बनता है। यह हैलोजन से प्रतिक्रिया कर हैलाइड तथा सल्फर के साथ गर्म करने पर सल्फाइड बनाता है। यह क्षारों के साथ कोई प्रतिक्रिया नहीं करता है। यह तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के साथ प्रतिक्रिया कर फेरस क्लोराइड एवं हाइड्रोजन गैस बनाता है। यह तनु सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ प्रतिक्रिया कर फेरस सल्फेट एवं हाइड्रोजन गैस बनाता है।

    लोहे की निष्क्रियता (Passivity of Iron): अति सान्द्र या सधूम नाइट्रिक अम्ल में लोहे का एक टुकड़ा डालने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। लोहा का टुकड़ा अम्ल में डालने पर निष्क्रिय हो जाता है, इसे निष्क्रिय लोहा (Passive iron) कहते हैं। निष्क्रिय लोहे को पुनः सक्रिय बनाने के लिए उसे हाइड्रोजन के प्रवाह में गर्म किया जाता है।

    लोहे पर जंग लगना (Rusting of Iron)

    लोहे का आर्द्र वायु में छोड़ देने पर उसके ऊपर लाल रंग की एक ढीली परत बैठ जाती है जिसे जंग (Rust) कहते हैं। इस क्रिया को जंग लगना कहते हैं। लोहे पर यह जंग हवा की नमी और ऑक्सीजन के कारण लगता है।

    लोहे को निम्नलिखित विधियों द्वारा जंग लगने से बचाया जा सकता है:

    1. लोहे के ऊपर पीच, अलकतरा या ऐलुमिनियम पेण्ट लगा देने पर।

    2. लोहे को लाल तप्त कर उसके ऊपर जलवाष्प प्रवाहित करने में Fe3O4 (फेरसोफेरिक ऑक्साइड) की परत बैठ जाती है जो लोहे को जंग लगने से बचाता है।

    3. लोहे को जस्तीकृत (Galvanised) करके।

    लोहे में जंग लगना रासायनिक परिवर्तन का उदाहरण है। जस्ते की परत चढ़ी रहती है। शरीर में लोहे की कमी से एनीमिया तथा अधिकता से लौहमयता (Siderosis) रोग होता है।

    अफ्रीका के बाँटू आदिवासियों में लौहमयता रोग पाया जाता है। ऐसा उनमें लोहे के बर्तन में बीयर (Beer) के सेवन के कारण होता है। बेसेमर प्रक्रम से वृहत् मात्रा में Pig Iron से इस्पात का उत्पादन होता है। इसका आविष्कार 1855 ई. में हेनरी बेसेमर ने किया।

    लोहे पर जंग लगने से लोहे का भार बढ़ जाता है। लोहे में जंग लगाने में पदार्थ फेरसोफेरिक ऑक्साइड होता है। यह भूरी परत के रूप में लोहे पर जम जाती है।

    लोहे के गैल्वेनाइज्ड (जस्तीकृत) चादर पर

    रेजर बनाने में अधिक कार्बन युक्त इस्पात का प्रयोग किया जाता है।

    स्थायी चुम्बक बनाने में इस्पात का उपयोग होता है।

    इस्पात का तप्तीकरण (Tempering of Steel): इस्पात को लाल तप्त कर जल या तेल में डुबाकर शीघ्र ही उडा करने से अत्यंत कठोर एवं भंगुर हो जाता है

    लोहे के यौगिक

    1. फेरस सल्फेट (Ferrous Sulphate): फेरस सल्फेट (FeSO4.7H2O) को हरा कसीस (Green vitriol) कहा जाता है। इसका उपयोग स्याही बनाने एवं मोहर लवण (Mohr’s salt) बनाने एवं रंग उद्योग में होता है। अनार्द्र लवण का उपयोग भोजन में लोहे की कमी को पूरा करने के लिए दवा के रूप में होता है। रंग उद्योग में भी इसका उपयोग होता है।

    2. फेरिक क्लोराइड (Ferric Chloride): अनार्द्र फेरिक क्लोराइड काला एवं आर्द्र फेरिक क्लोराइड पीला पसीजने वाला रवेदार ठोस है। इसका उपयोग कटे स्थान से खून का बहना रोकने के लिए किया जाता है क्योंकि यह खून को आंतचित (Coagulate) कर थक्का बनाता है। इसका उपयोग दवा के रूप में भी होता है।

    3. आयरन सल्फाइड (Ferrous Sulphide): आयरन सल्फाइड को झूठा सोना या बेवकूफों का सोना कहा जाता है। इसका उपयोग किप्प के उपकरण (Kipp’s Apparatus) द्वारा प्रयोगशाला में हाइड्रोजन सल्फाइड गैस बनाने में होता है।

    4. मोहर लवण (Mohr’s Salt): FeSO4,(NH4),SO4, 6H2O को मोहर लवण कहा जाता है। इसका उपयोग आयतनी विश्लेषण में, नीली स्याही बनाने में, रंगाई में, रंगचापक के रूप में, चमड़ा रंगने में, कृषि में हानिकारक कीड़ों को मारने में तथा प्रयोगशाला में अवकारक के रूप में होता है। इसका उपयोग रंगीन क्षार मूलकों के परीक्षण में भी होता है।