Category: कैमिस्ट्री

  • कोयला (Coal) के प्रकार और गुण

    कोयला (Coal) के प्रकार और गुण

    What are the types and properties of Coal ?

    कोयला – लगभग तीन सौ मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी पर निचले जलीय क्षेत्रों में घने वन थे।बाढ़ जैसे प्राकृतिक प्रक्रमों के कारण ये वन मृदा के नीचे दब गए।उनके ऊपर अधिक मृदा जम जाने के कारण वे संपिडित हो गये।जैसे जैसे वे गहरे होते गये उनका ताप भी बढ़ता गया। उच्च ताप और उच्च दाब के कारण पृथ्वी के भीतर मृत पेड़ पौधे धीरे धीरे कोयले में परिवर्तित हो गये। कोयले में मुख्य रूप से कार्बन होता है।मृत वनस्पति के धीमे प्रक्रम द्वारा कोयले में परिवर्तन को कार्बनीकरण कहते हैं। क्योंकि वह वनस्पति के अवशेषों से बना है अतः कोयले को जीवाश्म ईंधन भी कहते हैं।

    कोयला मुख्यतः कार्बन के यौगिकों का मुक्त कार्वन का मिश्रण है।

    जिस रासायनिक प्रक्रिया द्वारा वानस्पतिक पदार्थों का परिवर्तन कोयला में होता है, उसे कार्बनीकरण कहते हैं।

    कार्बनीकरण की मात्रा के आधार पर कोयला चार किस्मों का होता है।

    एन्थ्रासाइट – 90-98% कार्बन

    बिटुमिनस – 70-86% कार्बन

    लिग्नाइट – 60-70% कार्बन

    पीट – 50-60% कार्बन

    एन्थ्रासाइट कोयला उच्च कोटि का कोयला है क्योंकि इसमें कार्बन की मात्रा 94 से 98 प्रतिशत तक पाई जाती है। यह कोयला मजबूत, चमकदार काला होता है। इसका प्रयोग घरों तथा व्यवसायों में स्पेस-हीटिंग के लिए किया जाता है।

    बिटुमिनस सामान्य किस्म का कोयला होता है l बिटुमिनस कोयला को मुलायम कोयला (Solt coal) भी कहते हैं। घरेलू कार्यों में बिटूमिनस कोयले का उपयोग होता है। विश्व में खनन किये जाने वाले कोयले का 80% भाग बिटुमिनस कोयला ही होता है। यह एक ठोस अवसादी चट्टान है, जो काली या गहरी भूरी रंग की होती है। इस प्रकार के कोयले का उपयोग भाप तथा विद्युत संचालित ऊर्जा के इंजनों में भी होता है। इस कोयले से कोक का निर्माण भी किया जाता है।

    लिग्नाइट को ‘भूरा कोयला’ (Brown coal) कहते हैं। यह कोयला भूरे रंग का होता है तथा यह स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक हानिकारक सिद्ध होता है। इसमें कार्बन की मात्रा 28 से 30 प्रतिशत तक होती है। इसका उपयोग विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।

    पीट (Peat) कोयला निर्माण की प्रारंभिक इस कारण उसमें कार्बन की मात्रा सबसे कम होती है। पीट कोयला सबसे निम्न कोटि का होता है। यह कोयला स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यधिक हानिकारक होता है।

    विश्व का 90% कोयला उत्तरी गोलार्द्ध में तथा शेष 10% दक्षिणी गोलार्द्ध में पाया जाता है।

    कोक (Coke)

    कोयले को वायु की अनुपस्थिति में गर्म करने पर इसके वाष्पशील अवयव निकल जाते हैं जो अवशेष बचता है, उसे ‘कोक’ कहा जाता है। इसमें 80 85″, कार्बन पाया जाता है।

    कोक का उपयोग

    1. धातुओं के निष्कर्षण में अवकारक के रूप में।

    2. ईधन के रूप में।

    3. इलेक्ट्रॉड बनाने में।

  • चारकोल (Charcoal)

    चारकोल (Charcoal)

    यह कार्बन का अशुद्ध रूप है।

    यह कई प्रकार का होता है — (1) काप्ट चारकोल (Wood charcoal), (2) अस्थि चारकोल (Bone charcoal), (3) चीनी चारकोल (Sugar charcoal), तथा (4) रक्त चारकोल (Blood charcoal)।

    लकड़ी को हवा की अपर्याप्त मात्रा में जलाकर काष्ट चारकोल प्राप्त किया जाता है।

    काष्ठ चारकोल का उपयोग जलाने, गैस को अवशोषित करने, बारूद बनानं, अवकारक के रूप में कीटाणुओं को नष्ट करने, आदि कामों में किया जाता है।

    अस्थि चारकोल (Bone charcoal) चीरहित (Degreased) तथा हडिड्यों के भंजक स्त्रवण (Destructive distillation) से प्राप्त किया जाता है।

    चीनी चारकोल चीनी से तैयार किया जाता है। बोन चारकोल का प्रयोग कार्बनिक पदार्थों के विरंजन में किया जाता है। चीनी का विरंजन इसी से किया जाता है।

    रक्त चारकोल सूखे हुए रक्त का भंजक स्रवण करने पर प्राप्त होता है।

  • ग्रेफाइट (Graphite)

    ग्रेफाइट (Graphite)

    ग्रेफाइट, जिसे पुरातन रूप से प्लंबेगो कहा जाता है, ग्रेफाइट भी कार्बन का एक अत्यंत ही उपयोगी क्रिस्टलीय अपरूप है जिसके परमाणु एक हेक्सागोनल संरचना में व्यवस्थित होते हैं। यह इस रूप में स्वाभाविक रूप से होता है और मानक परिस्थितियों में कार्बन का सबसे स्थिर रूप है। उच्च दबाव और तापमान में यह हीरे में परिवर्तित हो जाता है

    यह मुख्यतः भारत, श्रीलंका, साइबेरिया, इटली, संयुक्त राज्य अमेरिका, आदि में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

    भारत के उड़ीसा राज्य में यह प्रचुर मात्रा में मिलता है।

    ग्रेफाइट की संरचना षट्कोणीय जालक सतह के रूप में होती है।

    ग्रेफाइट में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं जो सम्पूर्ण रवा-जालक (Crystal lattice) में गमन करते हैं। इसी कारण ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है।

    कागज पर रगड़ने से यह उस पर काला निशान बना देता है। इस कारण इसे ‘काला सीसा’ (Black lead) भी कहते हैं। यह ताप एवं विद्युत का सुचालक होता है। अतः इसका व्यवहार इलेक्ट्रोड तथा कार्बन आर्क बनाने में किया जाता है।

    ग्रेफाइट का उपयोग

    1. धातुओं को गलाने के लिए प्रयुक्त होने वाले उच्च तापसह क्रुसिवल (Refractory crucibles) के निर्माण में।

    2. शुष्क सेलों और विद्युत अपघटन क्रियाओं, आदि में इलेक्ट्रोड के रूप में।

    3. पेंसिल (Pencil) तथा रंग बनाने में।

    4. ग्रेफाइट चूर्ण का उपयोग मशीनों में शुष्क संहक (Dry lubricant) के रूप में होता है।

    5. काफी उच्च दाब पर उत्प्रेरक की उपस्थिति में ग्रेफाइट को गर्म करने पर हीरा में परिवर्तित हो जाता है।

    पेंसिल में प्रयुक्त होने वाला काला सीसा ग्रेफाइट होता है।

    काजल

    काजल कार्बन युक्त पदार्थों को हवा की अपर्याप्त मात्रा में जलाकर प्राप्त धुएं को कम्बलों पर एकत्र कर प्राप्त किया जाता है। इसमें लगभग 95% कार्बन मौजूद होता है।

    इसका उपयोग प्रिटिंग की स्याही, काला रंग तथा जूते की पॉलिश बनाने में किया जाता है। यह आंखों में लगाने (अंजन के रूप में) के काम में भी लाया जाता है।

  • हीरा (Diamond)

    हीरा (Diamond)

    हीरा एकल तत्व कार्बन (single element carbon) से बना होता है, और इसमें जाली की संरचना (Diamond Lattice) में कार्बन परमाणुओं की व्यवस्था होती है जो हीरे को इसके अद्भुत गुण प्रदान करती है। हीरे और ग्रेफाइट की संरचना की तुलना करें, दोनों ही कार्बन से बने हैं।

    हीरा कार्बन का क्रिस्टलीय अपरूप हैं

    इसका प्राकृतिक स्रोत किम्बरलाइट पत्थर होता है।

    यह विश्व में दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, सयुक्त राज्य अमेरिका , आस्ट्रेलिया, आदि देशों में पाया जाता है।

    भारतवर्ष में हीरा गोलकुण्डा, अनन्तपुर, बेलारी, पन्ना, आदि स्थानों पर मिलता है।

    कृत्रिम हीरा को सर्वप्रथम मोयासां (Moisson) ने 1893 ई. में बनाया था।

    शुद्ध हीरा पारदर्शक एवं रंगहीन होता है, किन्तु अशुद्धियों की उपस्थिति के कारण यह भिन्न-भिन्न रंगों का होता है। कुछ हीरे काले रंग के होते हैं जिसे बोर्ट (Bort) कहते हैं।

    यह सभी पदार्थों से अधिक कठोर होता है। इसका अपवर्तनांक 2.417 होता है। अतः पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण ही यह बहुत चमकता है।

    यह ताप और विद्युत का कुचालक है। यह किसी द्रव में नहीं घुलता है। इस पर अम्ल, क्षार, आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

    हीरा का उपयोग

    रंगहीन हीरे आभूषण बनाने में प्रयुक्त होते हैं। काला हीरा जिसे ‘बोर्ट’ कहते हैं, कांच काटने, चट्टानों में छेद करने तथा अन्य पत्थरों पर पॉलिश करने के काम में लाया जाता है।

    काला हीरा को ‘कार्बोनेडो’ (Carbonado) भी कहा जाता है। हीरा की संरचना नियमित चतुष्फलकीय (Regular tetrahedral) होती है।

  • कार्बन तत्व और उसके गुण

    कार्बन तत्व और उसके गुण

    Carbon element and its properties

    कार्बन का संकेत C तथा परमाणु संख्या 6 होता है।

    इसमें संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या 4 होती है।

    कार्बन वर्ग के तत्वों में लेड को छोड़कर सभी अपरूपता (Allotropy) का गुण प्रदर्शित करते हैं।

    कार्बन और सिलिकन अधातु हैं। जर्मेनियम उपधातु (Metalloid) है जबकि टिन और लेड धातु (Metal) है।

    प्रकृति में कार्बन मुक्त और संयुक्त दोनों ही अवस्थाओं में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

    कार्बन मुक्त अवस्था में हीरा, ग्रेफाइट तथा कोयले के रूप में पाया जाता है।

    संयुक्त अवस्था में कार्बन धातु के कार्बोनेट, बाइकार्बोनेटस, CO,, हाइड्रोकार्बन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य जटिल यौगिकों के रूप में पाया जाता है।

    कार्बन को एक सार्वभौमिक तत्व (Universal element) माना जाता है।

    प्रकृति में कार्बन ही एक ऐसा तत्व है जिसके सबसे अधिक यौगिक पाये जाते हैं।

    कार्बन एक ऐसा तत्व है जिसमें शृंखलन (Catenation) का गुण सबसे अधिक पाया जाता है।

    कार्बन के विभिन्न रूपों को जिनके रासायनिक गुणों में समानता, किन्तु भौतिक गुणों में अंतर रहता है, ‘कार्बन के अपरूप’ (Allotrops of carbon) कहते हैं। कार्बन रवेदार तथा बेरवेदार दोनों ही रूपों में पाया जाता है।

  • जल और उसके गुण

    जल और उसके गुण

    Water and its properties

    जल एक यौगिक (compound) है, इसका अणुसूत्र H2O होता है।

    इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात भार के अनुपात में 1:8 तथा आयतन के अनुपात में 2:1 होता है।

    शुद्ध जल उदासीन होता है अर्थात् इसका pH मान 7 होता है।

    शुद्ध जल विद्युत का कुचालक होता है जबकि अम्लीय जल विद्युत का सुचालक होता है।

    4°C पर जल का घनत्व अधिकतम तथा आयतन न्यूनतम होता है।

    जल शून्य डिग्री (0°) सेण्टीग्रेड पर सफेद बर्फ में परिवर्तित हो जाता है।

    शुद्ध जल का क्वथानांक 100°C तथा द्रवणांक 0°C होता है।

    वर्षा का जल शुद्ध जल होता है।

    सम्पूर्ण जल का 97% भाग समुद्री वातावरण में पाया जाता है, शेष बचा हुआ 3% भाग ही स्वच्छ जल के रूप में जाना जाता है। जल का बर्फ में तथा वाष्प में परिवर्तित होना भौतिक परिवर्तन का उदाहरण है।

    जल के प्रकार

    जल दो प्रकार का होता है:

    1. कठोर जल (Hard Water): कठोर जल साबुन के साथ फेन उत्पन्न नहीं करता है। इसमें कैल्सियम एवं मैग्नीशियम के क्लोराइड, सल्फेट व बाइकोर्बोनेट घुले रहते हैं। कठोर जल पीने के लिए उपयुक्त नहीं होता है क्योंकि इसमें घुले लवण स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होते हैं।

    2. मृदु जल (Soft Water): मृदु जल साबुन के साथ आसानी से फेन उत्पन्न करता है। यह जल पीने की दृष्टि से उपयुक्त होता है।

    जल की कठोरता (Hardness of Water)

    जल की कठोरता दो प्रकार की होती है

    स्थायी कठोरता

    जल की अस्थायी कठोरता उसमें कैल्सियम (Ca)व मैग्नीशियम (Mg) के क्लोराइड तथा सल्फेट लवण घुले रहने के कारण होती है। जल की स्थायी कठोरता उसमें सोडियम कार्बोनेट मिलाकर गर्म करने से दूर हो जाती है। जल की स्थायी कठोरता उसे उबालकर आसवन करने से भी दूर हो जाता है। जल की स्थायी कठोरता दूर करने की मुख्य विधि परम्यूटिट विधि है।

    अस्थायी कठोरता

    जल की अस्थायी कठोरता उसमें कैल्सियम (Ca) व मैग्नीशियम (Mg) के बाइकार्बोनेट्स लवण घुले रहने के कारण होती है। जल की अस्थायी कठोरता उसे उबालकर दूर कर ली जाती है। जल में सोडियम कार्बोनेट डालकर उबालने से स्थायी तथा अस्थायी दोनों प्रकार की कठोरता दूर हो जाती है।

    जल को सार्वत्रिक विलायक (Universal solvent) कहा जाता है क्योंकि इसमें कई पदार्थों को घुलाने की क्षमता होती हैं। जल का डाइइलेक्ट्रिक नियतांक अधिक होने के कारण ही इसे उत्तम विलायक माना जाता है (अपवाद-कार्बनिक पदार्थ)

    ऐसी शुद्ध बर्फ जिसमें रोगाणु नहीं होते हैं और जो लगभग 2000-3000 वर्ष पुरानी होती है, ‘ब्लू आइस’ (Blue ice) कहलाती है। यह ग्रीनलैंड में पायी जाती है जहां ब्लू आइस का उपयोग व्हिस्की (Whisky) बनाने में किया जाता है।

    केतली में जल उबालने पर उसकी आंतरिक परत में सफेद रंग की परत जम जाती है जो कैल्सियम व मैग्नीशियम के कार्बोनेट्स होते हैं।

    जल हाइड्रोजन बन्ध (Hydrogen bond) के कारण द्रव अवस्था में पाया जाता है।

    जल का शुद्धीकरण पोटैशियम परमैंगनेट, क्लोरीन गैस, पोटाश एलम, आदि द्वारा किया जाता है।

    पॉली वाटर (Poly Water)

    पॉली वाटर सामान्य जल को बाल के आकार की नलिका से गुजारकर बनाया जाता है। यह पृथ्वी पर एक खतरानाक वस्तु मानी जाती है।

  • हाइड्रोजन तत्व और उसके गुण

    हाइड्रोजन तत्व और उसके गुण

    Hydrogen element and its properties

    हाइड्रोजन आवर्त सारणी का प्रथम तत्व है। यह अन्य सभी तत्वों से हल्का होता है।

    सूर्य और तारों का आधार भाग हाइड्रोजन का बना है।

    हाइड्रोजन को भविष्य का ईधन कहा जाता है। इसके नाभिक में सिर्फ एक प्रोटॉन (Proton) होता है।

    इसकी खोज 1766 ई. में हेनरी कैवेडिस ने की।

    हाइड्रोजन सभी अम्लों का अनिवार्य अंग है।

    हाइड्रोजन निर्माण की विधि

    1. लाल तप्त लोहे पर भाप प्रवाहित करने पर हाइड्रोजन गैस प्राप्त होती है।

    2. हाइड्रोलिथ की जल से प्रतिक्रिया करने पर हाइड्रोजन गैस प्राप्त होती है।

    3. सोडियम की जल के साथ प्रतिक्रिया करने पर हाइड्रोजन गैस प्राप्त होती है।

    4. तेलों का हाइड्रोजनीकरण (Hydrogenation of Oils) : उच्च दाब पर निकेल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन वनस्पति तेलों (Vegetable oils) से संयोग करके उन्हें वनस्पति घी में परिवर्तित कर देता है, इस प्रक्रिया को तेलों का ‘हाइड्रोजनीकरण’ कहते हैं।

    हाइड्रोजन के उपयोग

    1. प्रायः अन्य गैसों के साथ मिश्रित कर ईंधन के रूप में।

    2. हैबर विधि से अमोनिया के उत्पादन में होता है।

    3. वनस्पति घी के निर्माण में।

    4. गैसोलिन (Gasolene) के उत्पादन में।

    5. ऑक्सीजन-हाइड्रोजन लौ (ताप 2,800°C) का उपयोग धातुओं को काटने तथा जोड़ने में होता है।

    6. हल्की गैस होने के कारण बैलून में भरने में होता है, किन्तु ज्वलनशील होने के कारण आजकल इसकी जगह हीलियम या हीलियम-हाइड्रोजन मिश्रण (He 85% + H215%) का व्यवहार होता है।

    7. द्रव हाइड्रोजन रॉकेट ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता है।

    हाइड्रोजन के समस्थानिक

    हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते हैं, ये है:

    1. प्रोटियम (1H1) ।

    2. ड्यूटेरियम (1H2 या D)।

    3. ट्राइटियम (1H3 या T)।

    प्रोटियम (Protium): प्रोटियम की परमाणु संख्या एक तथा द्रव्यमान संख्या भी एक होता है।

    ड्यूटेरियम (Deuterium): ड्यूटेरियम को भारी हाइड्रोजन कहा जाता है। इसकी परमाणु संख्या 1 तथा द्रव्यमान संख्या 2 होती है। ड्यूटेरियम का उपयोग कार्बनिक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि (Mechanism) समझने में तथा नाभिकीय अभिक्रियाओं (Nuclear reactions) में बमबारी के लिए होता है।

    ट्राइटियम (Tritium): यह हाइड्रोजन का एक दुर्लभ समस्थानिक है। इसकी परमाणु संख्या 1 तथा द्रव्यमान संख्या 3 होती है।

    भारी जल (Heavy Water)

    ड्यूटेरियम के ऑक्साइड को भारी जल कहा जाता है क्योंकि इसमें ड्यूटेरियम (D) होता है जो हाइड्रोजन का एक भारी समस्थानिक है

    इसकी खोज सन् 1932 में यूरे तथा वाशबर्न ने की थी। भारी जल को भारी कहा जाता है क्योंकि इसका घनत्व साधारण जल से अधिक होता है। भारी जल का उपयोग ड्यूटेरियम के अनेक यौगिकों के निर्माण में तथा यूरेनियम के नाभिकीय विखण्डन में तीव्रगामी न्यूट्रॉनों को मंद करने के लिए न्यूट्रॉन मंदक (Neutron moderator) के रूप में होता है।

    हाइड्रोजन परॉक्साइड (Hydrogen Peroxide)

    हाइड्रोजन परॉक्साइड की खोज सन् 1818 में श्रीनार्ड ने की।

    यह अपने ऑक्सीकारक गुणों के कारण विरंजक का कार्य करता है।

    यह रेशम, ऊन, बाल, तिनके , हाथी दांत, आदि कोमल वस्तुओं का विरंजन करने में प्रयुक्त होता है। इसका उपयोग बालों के ब्लीचिंग (Bleeching) में होता है

    इसका उपयोग पुराने तैल चित्रों (Oil paintings) को चमकदार बनाने तथा उसके रंग को पुन: उभारने के लिए किया जाता है। यह जर्मनाशी और प्रतिरोधी के रूप में घाव धोने, गरारे करने, दांत और कान साफ करने के काम आता है।

    यह दूध, शराब, आदि का परिरक्षण करने में प्रयुक्त होता है। यह रॉकेट, पनडुब्बियों और टॉरपीडों में ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता है क्योंकि इससे ऑक्सीजन प्राप्त होती है।

  • प्लूटोनियम धातु और उसके गुण

    प्लूटोनियम धातु और उसके गुण

    Plutonium metal and its properties

    प्लूटोनियम एक दुर्लभ ट्रांसयूरेनिक रेडियोधर्मी तत्त्व है।

    इसका रासायनिक प्रतीक Pu और परमाणु भार 94 होता है। प्लूटोनियम के छः अपरूप होते हैं।

    यह एक ऐक्टिनाइड तत्त्व है जो दिखने में रुपहले श्वेत (सिल्वर व्हाइट) रंग का होता है। 

    प्लूटोनियम-238 का अर्धायु काल 87.74 वर्ष होता है। 

    प्लूटोनियम-239, प्लूटोनियम का एक महत्वपूर्ण समस्थानिक है जिसकी अर्धायु काल 24,100 वर्ष होता है।

    प्लूटोनियम-244, प्लूटोनियम का सर्वाधिक स्थाई समस्थानिक होता है। इसका अर्धायु काल 8 करोड़ वर्ष होता है।

    यह एक भारी रेडियो सक्रिय तत्व (धातु) है।

    प्लूटोनियम की खोज वैज्ञानिक एनरिको फर्मी और उनके दल के सदस्यों ने 1934 में की थी।

    प्लूटोनियम का आविष्कार परमाणु बम तैयार करने के समय 1940 ई. में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं में हुआ था। प्लूटो नामक ग्रह के नाम पर इसका नाम प्लूटोनियम (Plutonium) पड़ा।

    प्लूटोनियम के शुद्ध रासायनिक यौगिक की प्राप्ति 1942 ई. में हुई थी।

    यह पहला धात्विक तत्व है जो केवी संश्लेषण से पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हुआ था।

    आज भी इसकी प्राप्ति नाभिकीय रिऐक्टर में ही होती है।

    प्लूटोनियम बड़ी अल्प मात्रा में यूरेनियम अयस्कों, पिचब्लेंड और मोनेज़ाइट, में पाया जाता है।

    जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी शहरों पर गिराए गये परमाणु बमों में प्लूटोनियम का ही उपयोग किया गया था।

     नाभिकीय रिएक्टर में यह ईंधन का कार्य करता है। ऐसे रिऐक्टर यूरेनियम-238 के साथ मिलकर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं और साथ साथ न्यूट्रॉन के अवशोषण से प्लूटोनियम-239 भी बनता है।

    प्लूटोनियम 238 के विखंडन से जो ऊर्जा प्राप्त होती है वह ऊर्जा पूर्ण विखंडन में प्रति पाउंड 10,000,000 किलोवाट घंटा ऊष्मा ऊर्जा के बराबर होती है।

    इस ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में, या विद्युत् के रूप में, परिणत कर सकते हैं। इससे समस्त ऊर्जा के 20 से 30 प्रतिशत तक की उपलब्धि हो सकती है। ऊर्जा की उपलब्धि वस्तुत: यंत्र की दक्षता पर निर्भर करती है।

  • धातुओं से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण बिंदु

    धातुओं से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण बिंदु

    Some important points related to metals

    • भारत में टंगस्टन का उत्पादन राजस्थान स्थित डेगाना (Degana)खान से होता है।
    • टंगस्टन तंतु के उपचयन को रोकने के लिए बिजली के बल्ब से हवा निकाल दी जाती है।
    • जिरकोनियम धातु ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन दोनों में जलते हैं।
    • फ्रांसियम (Fr)एक रेडियोसक्रिय द्रव धातु है।
    • टंगस्टन का संकेत W होता है। इसका गलनांक लगभग 3,500°C होता है।
    • न्यूट्रॉनों को अवशोषित करने के गुणों के कारण जिनकोनियम का उपयोग नाभिकीय रिएक्टर में किया है। अतः यह नाभिकीय रिएक्टर का अनिवार्य तत्व है।
    • स्टेनस सल्फाइड (SnS2) को मोसाइक गोल्ड (Mosaic gold) कहते है, इसका प्रयोग पेंट के रूप में किया जाता है।
    • सबसे भारी धातु ओसमियम (Os) है।
    • बेरियम सल्फेट का उपयोग बेरियम (Ba)मील के रूप में उदर के X-ray में होता है।
    • आतिशबाजी के दौरान हरा रंग बेरियम की उपस्थिति के कारण होता है।
    • आतिशबाजी के दौरान लाल चटक रंग (Crimson red colour) स्ट्रॉन्शियम (Sr) की उपस्थिति के कारण उत्पन्न होता है।
    • लिथियम (Li) सबसे हल्का धात्विक तत्व है। यह सबसे प्रबल अपचायक होता है।
    • चाँदी (Ag), सोना (Au), तांबा (Cu), प्लेटिनम (Pt) तथा बिस्मथ (Bi) अपने कम अभिक्रियाशीलता के कारण स्वतंत्र अवस्था में पाये जाते हैं।
    • गोल्ड, प्लेटिनम, सिल्वर तथा मरकरी उत्कृष्ट धातुएं हैं।
    • धातुओं में सबसे अधिक आघातवर्ध्य सोना (Au)चाँदी (Ag) होते हैं।
    • पारालोहा विद्युत धारा के प्रवाह में अपेक्षाकृत अधिक प्रतिरोध उत्पन्न करते हैं।
    • चाँदी एवं तांबा विद्युत धारा का सर्वोत्तम चालक है।
    • धातुओं के ऑक्साइड की प्रकृति क्षारीय होती है।
    • ऐलुमिनियम का सर्वप्रथम पृथक्करण 1827 ई. में हुआ था।
    • प्याज व लहूसन में गंध का कारण पोटैशियम (k)की उपस्थिति है।
    • कैंसर रोग के इलाज में कोबाल्ट के समस्थानिक का उपयोग होता है।
    • स्मेल्टाइट (Smeltite)निकेल धातु का अयस्क है।
    • वनस्पति तेलों के हाइड्रोजनीकरण में निकेल धातु का उपयोग उत्प्रेरक (Catalyst)के रूप में होता है।
    • कैडमियम का प्रयोग नाभिकीय रिएक्टरों में न्यूट्रॉन मंदक के रूप में संग्राहक बैटरियों में तथा निम्न गलनांक की मिश्रधातु बनाने में होता है।
    • एक्टिनाइड (Actinides)रेडियोसक्रिय तत्वों का समूह होता है।
    • विश्व प्रसिद्ध एफिल टावर का आधार स्टील व सीमेण्ट का बना है।
    • रेडियम का निष्कर्षण पिचब्लैंड से किया जाता है।
    • मैडम क्यूरी ने पिचब्लैंड से ही रेडियम का निष्कर्षण किया था।
    • वायुयान के निर्माण में पेलेडियम धातु प्रयुक्त होती है।
    • गैलियम धातु कमरे के ताप पर द्रव अवस्था में पाया जाता है।
    • सेलीनियम धातु का उपयोग फोटो इलेक्ट्रिक सेल में होता है ।
    • जिओलाइट (Zeolite)का प्रयोग जल को मृदु बनाने में किया जाता है।
    • पोटैशियम कार्बोनेट (K2CO3) को ‘पर्ल एश’ (Pearl ash) कहते हैं।
    • नाइक्रोम (Nichrome) निकिल, क्रोमियम और आयरन का मिश्रधातु है।
    • विद्युत हीटर की कुंडली (Coil) नाइक्रोम की ही बनी होती है।
    • साइटोक्रोम (Cytochrome) में लोहा उपस्थित होता है।
    • ब्रिटेनियम धातु (Britanium metal) एण्टिमनी (Sb), तांबा (Cu) व टिन (Sn) की मिश्रधातु है।
    • बारूद 75% पोटैशियम नाइट्रेट, 10% गंधक व 15% चारकोल एवं अन्य पदार्थों का मिश्रण होता है।
    • टाइटेनियम को ‘रणनीतिक धातु’ (Strategic metal) कहते हैं क्योंकि इसका उपयोग रक्षा उत्पादन में होता है। यह इस्पात के बराबर मजबूत लेकिन भार में उसका आधा गुणा वाली धातु है।

    अधातुएं

    • जो तत्व धातुओं की भांति व्यवहार नहीं करती हैं, ‘अधातु’ कहलाती है।
    • आधुनिक आवर्त सारणी में कुल 22 अधातु तत्व हैं जिनमें से 11 गैसें, एक द्रव तथा शेष 10 ठोस हैं।
    • ब्रोमीन द्रव अवस्था में पाया जाने वाला अधातु है।
    • हाइड्रोजन, नाइट्रोजन ऑक्सीजन, क्लोरीन, इत्यादि कुछ गैसीय अधातुओं के उदाहरण है। कार्बन, सल्फर, फॉस्फोरस, आयोडीन, इत्यादि कुछ ठोस अधातुओं के उदाहरण हैं।
  • प्लेटिनम धातु और उसके गुण

    प्लेटिनम धातु और उसके गुण

    Platinum and its properties

    प्लेटिनम एक संक्रमण धातु (Transition metal) है। सर्वप्रथम सन 1741 में चार्ल्स वुड यूरोप में प्लेटिनम लाये। इसके गुणों का विस्तृत अध्ययन ब्राउनरिज द्वारा किया गया तथा उन्होंने 1750 में इस धातु के बारे में पूर्ण विवरण प्रकाशित करवाया।

    सन 1819 में यूराल पहाडियों (रूस) में जमे हुए प्लेटिनम धातु की उपस्थिति ज्ञात हुई जिसने इस समूह की अन्य धातुओं के अध्ययन का रास्ता भी खोल लिया। 1876 में इस चमकीले रंग की धातु को एक कीमती धातु के रूप में मान्यता मिली।

    प्लेटिनम अधिकांशत: मुक्त अवस्था में पाया जाता है , यद्यपि इसका एक खनिज स्पेरीलाइट PtAs2 होता है जिसमें यह आर्सेनिक के साथ संयुक्त अवस्था में पाया जाता है। प्रकृति में प्लेटिनम मुक्त अवस्था में तो होता है , लेकिन कभी भी शुद्ध अवस्था में नहीं होता।

    प्लेटिनम को सफेद सोना (White gold) कहा जाता है। इसे ‘एडम उत्प्रेरक’ (Adam’s catalyst) भी कहते हैं। यह अपने निक्षेप के अलावा निकेल तथा ताम्र अयस्कों में मिला रहता है।

    मुख्य रूप से यह रूस , कोलम्बिया और दक्षिणी अफ्रीका में पायी जाती है। क्यूप्रोनिकल अयस्कों में भी सूक्ष्म मात्रा में प्लेटिनम पाया जाता है जो इन धातुओं के निष्कर्षण के दौरान एक महत्वपूर्ण उपवाद के रूप में पाया जाता है। चूँकि निकल और कॉपर काफी मात्रा वाली धातुएँ है अत: इनके साथ प्लेटिनम की भी काफी मात्रा उत्पाद के रूप में प्राप्त हो जाती है।

    यह न तो वायु द्वारा ऑक्सीकृत होता है और न ही हाइड्रोक्लोरिक अम्ल में घुलता है।

    लैड के साथ इसकी मिश्रधातु सान्द्र HNO3 में घुल जाती है तथा प्लेटिनम नाइट्रेट बनता है। गलित धातु में ऑक्सीजन घुल जाती है एवं ठण्डा होने पर वह अचानक बाहर निकल जाती है , इसे उद्वमन कहते है।

    प्लेटिनम का उपयोग

    प्लेटिनम एक भारी , मुलायम , तन्य , आघातवर्धनीय , चाँदी जैसी सफ़ेद चमक वाली धातु होती है , सोने और चाँदी के बाद यह सर्वाधिक आघातवर्धनीय धातु है अत: गहने बनाने में भी इसे प्रयुक्त किया जाता है। प्रसार गुणांक के लगभग समान मान होने के कारण यह कांच के साथ आसानी से मिश्रित हो जाता है।

    प्लेटिनम का उपयोग आभूषणों, प्रयोगशाला उपकरणों, इलेक्ट्रोडों, विद्युत सम्पार्को, मिश्रधातुओं एवं हाइड्रोजनीकरण तथा ओसवाल्ड विधि में उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है।

    फाउण्टेनपेन के निब की टिप (Tip)बनाने में भी प्लेटिनम का उपयोग होता है।

    कई कार्बनिक और अकार्बनिक संश्लेष्ण में प्लेटिनम के विभिन्न रूपों का उपयोग किया जाता है।

    यह धातु अवाष्पशील है , वायुमंडलीय ऑक्सीजन के प्रति उदासीन है तथा इसे कांच में आसानी से शील किया जा सकता है। इन गुणों के कारण इसका उपयोग इलेक्ट्रोड , विद्युत के सेल आदि बनाने में किया जाता है।

     लेड के साथ प्लेटिनम के मिश्रधातु का उपयोग दांतों / दाढो के छिद्रों को भरने में किया जाता है। टेढ़े अथवा नकली दांतों को पकड़कर स्थिति में बनाये रखने के लिए प्रयुक्त पिनों और दन्त पट्टियों को बनाने में भी प्लेटिनम का उपयोग किया जाता है।

    गुणात्मक विश्लेषण के किये जाने वाले शुष्क परिक्षण जैसे ज्वाला परिक्षण और बोरेक्स मनका परिक्षण करने के लिए प्लेटिनम के तार का उपयोग किया जाता है।