Category: बायोलॉजी

  • ट्रेकियोफाइटा (Tracheophyta – ट्रेकोफाइट्स) क्या है ? vascular प्लांट्स के प्रकार

    ट्रेकियोफाइटा (Tracheophyta – ट्रेकोफाइट्स) क्या है ? vascular प्लांट्स के प्रकार

    What is Tracheophyta or Vascular Plants ?

    इस चैप्टर में हम जानेगे:

    • ट्रेकियोफाइटा (Tracheophyta – ट्रेकोफाइट्स) या वैस्कुलर प्लांट क्या है ? (What is a Tracheophyta or a Vascular Plant?)
    • ट्रेकियोफाइटा पोधों की विशेषताएँ क्या है ? (What are the characteristics of Tracheophyta plants ? ) 
    • ट्रेकियोफाइटा के प्रकार क्या है ? (What is the type of Tracheophyta?)

    ट्रेकियोफाइटा (Tracheophyta – ट्रेकोफाइट्स) या वैस्कुलर प्लांट

    वे पौधे, जिनमें संवहनी ऊतक (vascular tissue) पाए जाते हैं उन्हें ट्रेकियोफाइट या ट्रेकोफाइट्स कहते हैं। इन्हें Vascular plants भी कहते है l  

    यह भूमि पर पाए जाने वाले पौधों का एक मोनोफिलेटिक उपसमूह (monophyletic subgroup) है l

    ट्रेकियोफाइटा पोधों की विशेषताएँ क्या है ?

    इनके शरीर में जड़, तना, पत्ती होते हैं। तथा जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक होते हैं। यूकेरियोटिक प्रकार वाले यह पोधे पृथ्वी पर सबसे ज्यादा पाए जाते है और यह पृथ्वी पर उपस्थित जीव जगत के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी और लाभदायक होते है । क्लोरोफिल ए और बी उत्प्रेरक की उपस्थिति के कारण यह सार्वभौमिक रूप से हरे रंग के होते हैं।

    जैसा कि हम जानते है पौधे (Plante) को दो प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है पहला, ब्रायोफाइटा (Bryophyta), जिसमें लिग्निफाइड कोशिका भित्ति (Lignified cell wall) नहीं होती है और इसलिए कुछ सेंटीमीटर से ज्यादा ऊपर की ओर बढ़ने में असमर्थ होते हैं; और दूसरा, ट्रेकोफाइटा (Tracheophyta), जिसमें एक लिग्निफाइड कोशिका भित्ति होती है और यह पोधे 100 मीटर से अधिक ऊंचे पेड़ (जैसे सिकोइया सेपरविरेंस) बन सकते हैं l

    ट्रेकियोफाइटा के प्रकार क्या है ? What is the type of Tracheophyta?

    ट्रेकियोफाइटा के तीन वर्ग होते है:

    • टेरिडोफाइटा (Pteridophyte) (बीजविहीन संवहनी पौधे),
    • अनावृतबीजी (Angiosperm) (फलविहीन बीज वाले पौधे) तथा
    • आवृतबीजी (Angiosperms) (पुष्पी पादप, जिसमें फल तथा बीज बनते हैं)

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

    बीज रहित थैलीनुमा पादप, जो प्राचीनतम संवहनी पौधा है। यह मुख्यतया स्थलीय तथा छायादार और नम स्थानों पर पाया जाता है, परन्तु कुछ टेरिडोफाइट जलीय होते हैं; जैसे-एजोला, साल्वीनिया तथा मार्सिलिया आदि। टेरिडोफाइटा को मुख्यतया तीन समूहों-क्लब मॉस, हॉर्स टेल तथा फर्न में बाँटा जाता है।

    टेरिडोफाइटा पोधों के प्रकार

    अनावृतबीजी (Gymnosperms)

    इस समूह के पौधों में बीज किसी प्रकार की संरचना से ढके हुए नहीं होते हैं अर्थात् बीज नग्न (खुला हुआ एवं अण्डाशय का अभाव) होता है। यह पौधा सदाबहार, काष्ठीय तथा लम्बा होता है। ये मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं, जिनमें रन्ध्र पत्ती में घुसे होते हैं तथा बाह्य त्वचा पर क्यूटिकल की पर्त चढ़ी होती है। अनावृतबीजी के अन्तर्गत शंकुधारी पौधे रखे गये हैं, जिसमें चीड़, फर, स्पूस आदि आते हैं।

    अनावृतबीजी पोधों के प्रकार

    आवृतबीजी (Angiosperms)

    ये पुष्प युक्त पौधे होते हैं, जिसमें बीज सदैव फलों के अन्दर होता है। इस वर्ग के पौधों में जड़, तना, पत्ती, फूल और फल लगते हैं। ये शाक, झाड़िया या वृक्ष तीनों ही रूप में मिलते हैं। आवृतबीजी में परागकण तथा बीजाण्ड विशिष्ट रचना के रूप में विकसित होते हैं, जिन्हें पुष्प कहा जाता है, जबकि अनावृतबीजी में बीजाण्ड अनावृत होते हैं। आवृतबीजी को दो वर्गों एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में बाँटा गया है। एकबीजपत्री बीज में बीजपत्रों की संख्या एक होती है। जबकि द्विबीजपत्री में दो बीजपत्र होते हैं।

  • ब्रायोफाइटा क्या है l   (Bryophytes ब्रायोफाइट्स (in Hindi) उदाहरण, लक्षण, प्रकार, विशेषताएँ और गुण

    ब्रायोफाइटा क्या है l (Bryophytes ब्रायोफाइट्स (in Hindi) उदाहरण, लक्षण, प्रकार, विशेषताएँ और गुण

    इस आर्टिकल में हम ब्रायोफाइटा (Bryophytes) के बारे में निम्न तथ्य जानेगे :

    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) क्या है ?
    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) के सामान्य लक्षण क्या है ?
    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) की विशेषताएँ क्या है ?
    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) के गुण और महत्त्व क्या है ?

    ब्रायोफाइटा (Bryophytes)

    ब्रायोफाइटा (Bryophyta) वनस्पति जगत का एक बड़ा वर्ग है और यह एम्ब्रियोफाइटा का सबसे साधारण व आद्य समूह है। पौधों के वर्गीकरण में ब्रायोफाइटा का स्थान शैवाल (Algae) और टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) के बीच में आता है। ब्रायोफाइटा प्रथम स्थलीय पौधे हैं, जो शैवाल से विकसित हुए हैं। डासोनियाँ ब्रायोफाइटा का सबसे बड़ा पौधा है जिसकी ऊँचाई 40 से 70 सेमी. है।

    ब्रायोफाइटा की मुख्य  लक्षण, विशेषताए और उसके गुण

    ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर भी कहा जाता है क्योंकि ये भूमि पर जीवित रहते है , परन्तु लैंगिक जनन के लिए जल पर निर्भर होते है।

    इसके अन्तर्गत वे सभी पौधें आते हैं जिनमें वास्तविक संवहन ऊतक (vascular tissue) नहीं होते, जैसे मोसेस (mosses), हॉर्नवर्ट (hornworts) और लिवरवर्ट (liverworts) आदि।

    ब्रायोफाइटा सर्वाधिक सरल छोटे स्थलीय पौधे हैं, जो आर्द्र स्थानों में विकसित होते हैं।

    पादप का शरीर थैलस या पर्णिल अर्थात् तना तथा पत्ती सदृश रचनाओं में विभेदित होता है परन्तु वास्तविक तना एवं पत्ती नहीं होता है।

    ये पौधे मूलाभास (राइजोड) के द्वारा मिट्टी से जुड़े होते हैं। इसमें जड़, पुष्प तथा बीज का अभाव होता है। इनमें युग्मकोद्भिद् अवस्था प्रभावी होती है।

    अधिकतर ब्रायोफाइटा में क्लोरोफिल पाया जाता है, जिससे वे स्वपोषी होते हैं। इनमें लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों प्रकार का जनन होता है।

    ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर के रूप में जाना जाता है अर्थात् ऐसे पौधे स्थलीय होते हैं, जिसे निषेचन के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है।

    ब्रायोफाइटा में जल तथा लवण के संवहन हेतु संवहन ऊतक नहीं होते हैं। इसमें पदार्थों का संवहन एक कोशिका से दूसरे कोशिका में होता है।

    ब्रायोफाइटा के अन्तर्गत लिवरवर्ट तथा मॉस आते हैं। मॉस मिट्टी को बाँधे रखता है तथा मृदा अपरदन को रोकते हैं।

    कोयले सदृश पीट ईंधन, मॉस और स्फैगनम जैसे ब्रायोफाइट के हजारों वर्षों तक भूमि के नीचे दबकर रहने से निर्मित होते हैं।

    पौधे की सतह पर क्यूटिकिल का अभाव होता है। (जिसके फलस्वरूप पौधे से पानी के वाष्पीकरण का विशेष प्रतिबन्ध नहीं रह पाता तथा जल की अत्यधिक हानि होती है ऐसी स्थिति का उनकी वृद्धि पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।)

    युग्मकोद्भिद् (gametophyte)

    इस समुदाय का पौधा युग्मकोद्भिद् होता है ये पौधे स्थली होने के साथ ही छायादार स्थानों पर उगते हैं और इन्हें अपने जीवन में पर्याप्य आर्द्रता की आवश्यकता होती है, निषेचन के लिये जल आवश्यक है। अतः कुछ वैज्ञानिक ब्रायोफाइटा समुदाय को वनस्पति जगत् का एम्फीबिया कहते हैं। ये पौधे थैलेफाइटा से अधिक विकसित होते हैं।

    इन पौधों का और अधिक विकास तभी संभव हुआ, जब उनमें संवहनी ऊतक का विकास हो गया। संवहन तन्त्र की जड़ से जल तथा खनिज, लवणों को पत्ती तक तथा पत्ती से शर्करा को पौधे की अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करता है। इसी गुण के कारन ट्रैकियोफाइटा का विकास संभव हुआ।

    लैंगिक जनन (reproduction)

    यह पादप युग्मकोदृभिद पीढ़ी पर आश्रित होती है। कायिक जनन विखंडन द्वारा होता है। अगुणित युग्मकोद्भिद पादप में नर लैंगिक अंग को पुंधानी कहते है। जिसमे समसूत्री विभाजन द्वारा पुमंग बनते है , जो अगुणित होते है। मादा लैंगिक अंग स्त्रीधानी कहलाते है। जिनमे अगुणित अण्ड बनता है। पुमंग व अण्ड के संलयन से युग्मनज बनता है।

    युग्मनज से एक बहुकोशिकीय बिजानुभिद विकसित होता है जो द्विगुणित होता है तथा पाद , सिटा व कैप्सूल में विभक्त होता है।  बीजाणुभिद में अर्द्धसूत्री विभाजन से अगुणित बीजाणु बनते है जो अंकुरित होकर अगुणित नया पादप बनाते है।

    ब्रायोफाइटा के प्रकार

    ब्रायोफाइटा को तीन वर्गों में बाँटा गया है:

    हिपैटिसी या हिपैटिकॉप्सिडा (Hepaticopsida)

    इस वर्ग के पौधों का शरीर यकृत के समान हरे रंग का होता है। इसलिए इसे लिवरवर्ट्स भी कहते हैं। पौधों के शरीर को सूकाय कहते हैं। वह चपटा होता है। सूकाय में जड़, तना, पत्तियाँ नहीं होती है। इसकी निचली सतह के अनेक एककोशिकीय मूलांग निकले होते हैं। मूलांग का कार्य स्थिरता प्रदान करना तथा भूमि से पानी एवं खनिज लवणों का अवशोषण करना है।

    जैसे : रिक्सिया तथा मार्केन्शिया आदि।

    ऐंथोसिरोटी, या ऐंथोसिरोटॉप्सिडा (Anthocerotopsida) और मार्केन्टीऑफायटा

    इसमें पौधे बहुत ही साधारण और पृष्ठाधरी रूप से विभेदित (dorsiventrally differentiated) होते हैं, पर मध्यशिरा (mid rib) नहीं होती। इन पौधों का शरीर सूकायक होता है। इनके बीजाणुद्भिद् में सीटा अनुपस्थित होता है। इस उपवर्ग में एक ही गण ऐंथेसिरोटेलीज है, जिसमें पाँच या छह वंश और लगभग 300 जातियाँ हैं। इनमें ऐंथोसिरोस (Anthoceros) और नोटोथिलस (Notothylas) प्रमुख वंश हैं। ये पौधे संसार के कई भागों में पाए जाते हैं। भारत में यह हिमालय की तराई तथा पर्वत पर और कुछ जातियाँ नीचे मैदान में भी पाई जाती हैं।

    जैसे : एन्थोसिरास में।

    मसाइ (Musci) या ब्रायॉप्सिडा (Bryopsida)

    इसमें उच्च उच्च श्रेणी के ब्रायोफाइट्स आते हैं। ये ठण्डे एवं नम स्थानों पर तथा पुरानी दीवारों पर समूहों में पाए जाते हैं। इसमें तना तथा पत्ती जैसी रचना पाई जाती है। मूल की जगह पर बहुकोशिकीय मूलांग होते हैं। मॉस का पौधा युग्मकोद्भिद् होता है। इसका बीजाणुद्भिद् आंशिक रूप से युग्मकोद्भिद् पर निर्भर रहता है।

    जैसे : मॉस में।

    स्फैगनम नामक मॉस का उपयोग कटे हुए पौधों के अंगों को नम रखने के लिए किया जाता है। मॉस को स्थल वनस्पति का पुरोगामी कहा जाता है। इसका आशय यह है कि मॉस लाइकेन के साथ सतह पर एक पर्त बनाते हैं तथा मृत्यु के बाद सतह पर ह्यमस की परत जम जाती है, जिस पर अन्य पौधे उगते हैं।

    Water moss (Fontinalis).

    ब्रायोफाइटा का महत्व

    1. शाकाहारी स्तनधारी कुछ ब्रायोफाइट्स पौधे का प्रयोग भोजन के रूप में करते है

    2. स्फेगमन व अन्य जाति के ब्रायोफाइटा को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

    3. इनमें पानी रोकने की क्षमता होती है इसलिए पैकिंग व सजीवो के स्थानान्तरण में उपयोग किया जाता है। साथ ही जल अवशोषण की क्षमता अधिक होने की वजह से ये बाढ़ रोकने में मदद करते हैं

    4. ये अनुक्रमण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

    5. पूर्तिरोधी अर्थात् ऐण्टिसेप्टिक होने के कारण स्फैगनम का उपयोग सर्जिकल ड्रेसिंग के लिए किया जाता है। स्फैगनम के पौधों से स्फैगनाल नामक प्रतिजैविक प्राप्त किया जाता है।

    6. ब्रायोफाइट्स दुनिया के विभिन्न हिस्सों के जनजातीय लोगों के बीच लोकप्रिय उपाय हैं। आदिवासी लोग इन पौधों का उपयोग अपने दैनिक जीवन में विभिन्न बीमारियों को ठीक करने के लिए करते हैं।

    7.  ब्रायोफाइट्स का उपयोग अफ्रीका, अमेरिका, यूरोप, पोलैंड, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, तुर्की, जापान, दक्षिण, उत्तर और पूर्वी भारत, चीन, ताइवान के विभिन्न आदिवासी समुदायों द्वारा यकृत विकारों, त्वचा रोगों, हृदय रोगों, ज्वरनाशक, रोगाणुरोधी, घाव भरने और कई अन्य बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है।

    8. इन उपयोगों के अलावा कुछ ब्रायोफाइट्स में विभिन्न कैंसर सेल लाइनों के खिलाफ एंटीट्यूमर गतिविधियां (antitumor activities) का गुण होता है जो कि बहुत ही महत्वपुर्ण है और कैंसर जैसे रोग के इलाज के लिय इस पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

    ब्रायोफाइटा से जुड़े हुए कुछ प्रश्न और उनके जवाब

    प्रश्न  – ब्रायोफाइटा का अर्थ क्या है?

    उत्तर – ब्रायोफाइटा के अन्तर्गत वे सभी पौधें आते हैं जिनमें वास्तविक संवहन ऊतक (vascular tissue) नहीं होते, जैसे मोसेस (mosses), हॉर्नवर्ट (hornworts) और लिवरवर्ट (liverworts) आदि। ब्रायोफाइटा (Bryophyta) वनस्पति जगत का एक बड़ा वर्ग है और यह एम्ब्रियोफाइटा का सबसे साधारण व आद्य समूह है। एंजियोस्पर्म के बाद ब्रायोफाइट्स भूमि पौधों का दूसरा सबसे बड़ा समूह है। पौधों के वर्गीकरण में ब्रायोफाइटा का स्थान शैवाल (Algae) और टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) के बीच में आता है। यह पृथ्वी पर लगभग हर जगह पाया जाता है परन्तु इसका मानव जीवन में खास उपयोग नही है l ब्रायोफाइटा प्रथम स्थलीय पौधे हैं, जो शैवाल से विकसित हुए हैं। डासोनियाँ ब्रायोफाइटा का सबसे बड़ा पौधा है जिसकी ऊँचाई 40 से 70 सेमी. है।

    प्रश्नब्रायोफाइटा का आर्थिक महत्व क्या है?

    उत्तर – ब्रायोफाइटा वर्ग के पोधों में जल अवशोषण (water absorption) की क्षमता अधिक होने की वजह से ये बाढ़ (flood) रोकने में मदद करते हैं l इस वर्ग के पौधे मृदा अपरदन (soil erosion) को रोकने में भी सहायता होते हैं। स्फेगमन (Sphagnum) व अन्य जाति के ब्रायोफाइटा को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। पूर्तिरोधी अर्थात् ऐण्टिसेप्टिक होने के कारण स्फैगनम का उपयोग सर्जिकल ड्रेसिंग (surgical dressing) के लिए किया जाता है। स्फैगनम के पौधों से स्फैगनाल नामक प्रतिजैविक प्राप्त किया जाता है। आदिवासी लोग इन पौधों का उपयोग अपने दैनिक जीवन में विभिन्न बीमारियों को ठीक करने के लिए करते हैं। कुछ ब्रायोफाइट्स में विभिन्न कैंसर सेल लाइनों के खिलाफ एंटीट्यूमर गतिविधियां (antitumor activities) का गुण होता है जो कि बहुत ही महत्वपुर्ण है और कैंसर जैसे रोग  के इलाज के लिय किया जाता है l

  • शैवाल या एल्गी (Algae) क्या है ? परिभाषा, वर्गीकरण और आर्थिक महत्त्व

    शैवाल या एल्गी (Algae) क्या है ? परिभाषा, वर्गीकरण और आर्थिक महत्त्व

    What is Algae? Definition, Classification and Importance

    शैवाल को सामान्यतया प्रोटिस्टा जगत (Kingdom Protista) के अन्तर्गत रखा जाता है। अधिकांश शैवालों के लक्षण पौधों से मिलते-जुलते है; जैसे – पर्णहरिम की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा स्वयं भोजन निर्माण करना। उपर्युक्त सारणी के आधार पर हम कह सकते हैं कि शैवाल का वर्गीकरण मोनेरा (Monera), प्रोटिस्टा (Protista) एवं पादप (Plantae) जगत के अन्तर्गत किया गया है। पादप जगत के अन्तर्गत शैवालों के तीन समूह निम्नलिखित हैं :

    लाल शैवाल (Red Algae)

    इसकी कोशिकाओं में (r-फाइकोइरिथ्रिन – Rph8ycoerythrin) नामक लाल वर्णक अधिकता से मिलते हैं। इसकी कोशिका भित्ति में कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) होता है, जिससे इसका आवरण कठोर एवं पृथक होता है। अधिकांश लाल शैवाल समुद्री होते हैं परन्तु कुछ शैवाल मीठे पानी जैसे नदी, तालाब, झील आदि में भी पाए जाते हैं। समुद्री तट पर उच्च ज्वार तथा निम्न ज्वारीय तलों के बीच अधिकांशतया लाल शैवाल ही होती है।

    भूरा शैवाल (Brown Algae)

    इस शैवाल का रंग भूरा फ्यूकोजैन्थिन (Fucoxanthin) नामक वर्णकों के कारण होता है। इन्हें पादप जगत के फीयोफाइटा (Pheophyta) में रखा गया है। भूरे शैवाल अधिकांशतया समुद्री तथा बहुकोशिकीय होते हैं। इस वर्ग में समुद्री घास (sea ​​grass) आते हैं।

    हरे शैवाल (Green Algae)

    स्थल पर सबसे पहले पौधों का विकास हरे शैवालों से ही हुआ है। हरे शैवाल में क्लोरोफिल (chlorophyll) -a तथा 6 और कुछ कैरोटिनॉइड क्लोरोप्लास्ट (carotenoids chloroplasts) की ग्रेना में उपस्थित रहते हैं। इसमें सेलुलोज (Cellulose) की बनी कोशिका भित्ति होती है। तथा खाद्य पदार्थों का संचय स्टार्च के रूप में करते हैं। स्पाइरोगाइरा (Spirogyra) एक तन्तुमयी हरा शैवाल (Green Algae) है, जो अलवणी जल में पाया जाता है।

    स्मार्ट फैक्ट्स – शैवाल या एल्गी (Algae)

    शैवालों का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Algae)

    • भूरे शैवाल : जैसे – लेमिनेरिया (Laminariales), फ्यूकस (Fucales (Fucoids) एवं एकलोनिया, से आयोडीन का निर्माण होता है।  
    • अगार (Agar) – अगार का उत्पादन लाल शैवाल से होता है, जो जेलिडियम (Gelidium) और ग्रेसीलेरिया (Gracilaria) नामक शैवाल से प्राप्त होता है।
    • शैवालों से प्राप्त एलीजन का उपयोग टाइप राइटरों में तथा अज्वलनशील फिल्मों के निर्माण में प्रयुक्त होता है।
    • भूरे शैवालों में पोटैशियम क्लोराइड होता है, जिसके कारण इससे पोटैशियम लवण प्राप्त होते हैं।
    • पोरफाइरा (Porphyra), अल्वा (Ulva), सरगासम (Sargassum), नॉस्टॉक (Nostoc) आदि शैवाल का उपयोग भोजन के रूप में होता है।
    • शैवाल भोजन तथा ऑक्सीजन का स्रोत होने के कारण अन्तरिक्ष यात्रियों द्वारा उपयोग होते हैं। इसमें विटामिन तथा क्लोरेला नामक प्रोटीन की प्रचुर मात्रा पाई जाती है।
    • नाइट्रोजन स्थिरीकरण (N2), जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है में नॉस्टॉक ( (Nostoc), एनाबीना (Anabaena) जैसे नीले-हरे शैवाल प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
    • मलेरिया उन्मूलन के सम्बन्ध में कुछ शैवाल; जैसे- नाइट्रेला और कारा प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
    • कैराजीनिन कोन्ड्रस क्रिस्पस (carrageen Chondrus crispus) नामक लाल शैवाल से प्राप्त होता है, यह आइसक्रीम, जैली, चॉकलेट आदि में प्रयुक्त होता है।

    हानिकारक शैवाल (Harmful Algae)

    कुछ शैवाल; जैसे-माइक्रोसिस्टिस, ऑसीलेटीरिया इत्यादि जल में जहर पैदा कर देते हैं। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है।

    सिफेल्यूरोस नामक शैवाल चाय के पौधों पर ‘लाल किट्ट’ (red rust) नामक रोग उत्पन्न करता है।

    शैवाल पीने के पानी को दूषित कर देते हैं।

    पत्थर में काई के रूप में जमकर फिसलन पैदा करते हैं।

    लाइकेन

    लाइकेन शैवाल तथा कवक से बने होते हैं, ये सहजीवी होते हैं। शैवालांश (phycobiont) प्रकाश-संश्लेषण, जबकि कवकांश (mycobiont) शुष्कन से रक्षा तथा अवशोषण का कार्य करता है ये नंगी चटटानों पर सबसे पहले उगते हैं। रोसेला टिक्टोरिया लाइकेन से लिटमस प्राप्त होता है।

  • प्लांटी (पादप जगत) Kingdom Plante क्या है ? उसके वर्गीकरण, विशेषताएँ और प्रकार (Hindi me)

    प्लांटी (पादप जगत) Kingdom Plante क्या है ? उसके वर्गीकरण, विशेषताएँ और प्रकार (Hindi me)

    What is Kingdom Plante? Padap Jagat kya hai ?

    बहुकोशिकीय, प्रकाश-संश्लेषी, यूकैरियोटिक तथा उत्पादक जीवों को पादप जगत के अन्तर्गत रखा जाता है। पादप जगत का विस्तृत वर्गीकरण निम्न रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।

    शैवाल (Algae)

    शैवाल को सामान्यतया प्रोटिस्टा जगत के अन्तर्गत रखा जाता है। अधिकांश शैवालों के लक्षण पौधों से मिलते-जुलते है; जैसे – पर्णहरिम की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा स्वयं भोजन निर्माण करना। उपर्युक्त सारणी के आधार पर हम कह सकते हैं कि शैवाल का वर्गीकरण मोनेरा, प्रोटिस्टा एवं पादप जगत के अन्तर्गत किया गया है। पादप जगत के अन्तर्गत शैवालों के तीन समूह निम्नलिखित हैं:

    लाल शैवाल (Red Algae)

    इसकी कोशिकाओं में (r-फाइकोइरिथ्रिन) नामक लाल वर्णक अधिकता से मिलते हैं।

    भूरा शैवाल (Brown Algae)

    इस शैवाल का रंग भूरा फ्यूकोजैन्थिन नामक वर्णकों के कारण होता है। इन्हें पादप जगत के फीयोफाइटा में रखा गया है।

    हरे शैवाल (Green Algae)

    स्थल पर सबसे पहले पौधों का विकास हरे शैवालों से ही हुआ है। हरे शैवाल में क्लोरोफिल-a तथा 6 और कुछ कैरोटिनॉइड क्लोरोप्लास्ट की ग्रेना में उपस्थित रहते हैं।

    लाइकेन (Lichen)

    लाइकेन शैवाल तथा कवक से बने होते हैं, ये सहजीवी होते हैं। शैवालांश (phycobiont) प्रकाश-संश्लेषण, जबकि कवकांश (mycobiont) शुष्कन से रक्षा तथा अवशोषण का कार्य करता है ये नंगी चटटानों पर सबसे पहले उगते हैं। रोसेला टिक्टोरिया लाइकेन से लिटमस प्राप्त होता है।

    ब्रायोफाइटा (Bryophyta)

    सर्वाधिक सरल छोटे स्थलीय पौधे हैं, जो आर्द्र स्थानों में विकसित होते हैं। पादप का शरीर थैलस या पर्णिल अर्थात् तना तथा पत्ती सदृश रचनाओं में विभेदित होता है परन्तु वास्तविक तना एवं पत्ती नहीं होता है। ये पौधे मूलाभास (राइजोड) के द्वारा मिट्टी से जुड़े होते हैं। इसमें जड़, पुष्प तथा बीज का अभाव होता है। इनमें युग्मकोद्भिद् अवस्था प्रभावी होती है। ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर के रूप में जाना जाता है

    ट्रेकियोफाइटा (Tracheophyta)

    वे पौधे, जिनमें संवहनी ऊतक पाए जाते हैं उन्हें ट्रेकियोफाइट कहते हैं। इनके शरीर में जड़, तना, पत्ती होते हैं। तथा जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक होते हैं। वर्ग-ट्रेकियोफाइटा के तीन प्रकार- -टेरिडोफाइटा (बीजविहीन संवहनी पौधे), अनावृतबीजी (फलविहीन बीज वाले पौधे) तथा आवृतबीजी (पुष्पी पादप, जिसमें फल तथा बीज बनते हैं) हैं।

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

    बीज रहित थैलीनुमा पादप, जो प्राचीनतम संवहनी पौधा है। यह मुख्यतया स्थलीय तथा छायादार और नम स्थानों पर पाया जाता है, परन्तु कुछ टेरिडोफाइट जलीय होते हैं; जैसे-एजोला, साल्वीनिया तथा मार्सिलिया आदि। टेरिडोफाइटा को मुख्यतया तीन समूहों-क्लब मॉस, हॉर्स टेल तथा फर्न में बाँटा जाता है।

    अनावृतबीजी (Gymnosperms)

    इस समूह के पौधों में बीज किसी प्रकार की संरचना से ढके हुए नहीं होते हैं अर्थात् बीज नग्न (खुला हुआ एवं अण्डाशय का अभाव) होता है। यह पौधा सदाबहार, काष्ठीय तथा लम्बा होता है। ये मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं, जिनमें रन्ध्र पत्ती में घुसे होते हैं तथा बाह्य त्वचा पर क्यूटिकल की पर्त चढ़ी होती है। अनावृतबीजी के अन्तर्गत शंकुधारी पौधे रखे गये हैं, जिसमें चीड़, फर, स्पूस आदि आते हैं।

    आवृतबीजी (Angiosperms)

    ये पुष्प युक्त पौधे होते हैं, जिसमें बीज सदैव फलों के अन्दर होता है। इस वर्ग के पौधों में जड़, तना, पत्ती, फूल और फल लगते हैं। ये शाक, झाड़िया या वृक्ष तीनों ही रूप में मिलते हैं। आवृतबीजी में परागकण तथा बीजाण्ड विशिष्ट रचना के रूप में विकसित होते हैं, जिन्हें पुष्प कहा जाता है, जबकि अनावृतबीजी में बीजाण्ड अनावृत होते हैं। आवृतबीजी को दो वर्गों एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में बाँटा गया है। एकबीजपत्री बीज में बीजपत्रों की संख्या एक होती है। जबकि द्विबीजपत्री में दो बीजपत्र होते हैं।

  • कवक (फंजाई) जगत (Kingdom Fungi) क्या है ?

    कवक (फंजाई) जगत (Kingdom Fungi) क्या है ?

    What is Fungi Kingdom ?

    कवक जगत के अन्तर्गत एक या बहुकेन्द्रकीय जीव आते हैं, जो अवशोषण द्वारा गैर प्रकाश-संश्लेषक पोषण करते हैं साथ ही ऊतक विभेदन का अभाव होता है।

    विशेषताएँ :

    1. कवक में विषमपोषी पोषण होता है क्योंकि इनमें पूर्णहरिम का अभाव होता है।

    2. ये परजीवी, सहजीवी अथवा मृतोपजीवी होते हैं।

    3. यह अवशोषण के माध्यम से पोषण करते हैं। भोजन का पाचन शरीर के बाहर होता है तथा पोषक तत्व सीधे अवशोषित किए जाते हैं।

    4. इनकी कोशिका भित्ति रेशेदार पदार्थ काइटिन को बनी होती है। यह नाइट्रोजन युक्त पॉलीसेकैराइड है, जिसकी संरचना सेलुलोज के समान होती है।

    5. कवक में संचित कार्बोहाइड्रेट ग्लाइकोजन होता है न कि मण्ड (starch) यह बीजाणुओं के द्वारा प्रजनन करते हैं।

    6. कवक विश्वव्यापी है और ये वायु ,जल , मिट्टी में तथा जन्तु एवं पादपों पर पाए जाते है । ये जीव नम तथा गरम स्थानों पर सरलता से उग जाते है ।

    कवक – एक सपाट, लाल शीर्ष के साथ सफेद धब्बों वाला एक मशरूम, और जमीन पर उगने वाला एक white stem; लकड़ी पर उगने वाला लाल कप के आकार का कवक; एक प्लेट पर हरे और सफेद फफूंदीदार ब्रेड स्लाइस का ढेर

    भोजन के स्रोत के आधार पर कवक तीन प्रकार के होते है –

    मृतोपजीवी कवक

    ये कवक अपना भोजन मृत कार्बनिक पदार्थों जैसे ब्रेड, सड़े हुए फल एवं सब्जियों, गोबर इत्यादि से प्राप्त करते है । इनमें पोषण अवशोषणी या परासरणीय विधि से होता है ।

    परजीवी कवक

    ये अपना भोजन जीवित जीवों जैसे पादप, जंतु एवं मनुष्यों से प्राप्त करते है । ये कवक रोग उत्पन्न करते है । परजीवी कवक अपना पोषण चूसकांगों के द्वारा प्राप्त करते है ।

    सहजीवी

    इसके अंतर्गत ऐसे प्रकार के कवक आते है जो अपने साथ विकसित होने वाले पौधे के लिए सहायक होते है एवं ये एक दूसरे को विकसित एवं भरण पोषण के लिए मदद करते है एवं लाभ पहुचाते है| लाइकेन इसका अच्छा उदहारण है|

    कवक की सरंचना (Structure of Fungi)

    कवक के शरीर को माइसिलियम (कवक जाल) कहते है । माइसिलियम एक जालनुमा संरचना है जो कई सारे कवक तंतुओं के मिलने से बनती है । कवक तंतु को कवक की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई कहते है ।

    कवक तंतु के चारों ओर कोशिका भित्ति पाई जाती है जो काइटिन की बनी होती है । काइटिन के साथ कुछ मात्रा में सेल्युलोज, प्रोटीन एवं लिपिड पाए जाते है ।

    कवकों में जनन (Reproduction in Fungi)

    कवकों में कायिक जनन , अलैंगिक जनन व लैंगिक जनन पाया जाता है ।

    कायिक जनन – यह निम्न प्रकार का होता है –

    खण्डन (फ्रेग्मेंटेशन)

    जब माइसिलियम किसी भी कारण से छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है तो प्रत्येक टुकड़ा एक नये कवक तंतु या पूर्ण कवक का निर्माण कर लेता है, इसे ही खण्डन कहते है ।

    मुकुलन विधि

    जब कवक में कलिका के समान उभार बनता है तो यह कलिका मातृ कवक से अलग होकर एक नये कवक के रूप में कार्य करने लगती है । इस प्रक्रिया में मातृकोशिका का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है । उदाहरण – सेक्रोमाइसीज (यीस्ट)

    विखण्डन (fission)

    जब कवक कोशिका बीच में से दो भागों में विभक्त हो जाती है , साथ ही इनका केन्द्रक दो भागों में बंट जाता है । तो इसे विखण्डन कहते है । उदाहरण – साइजोसेक्रोमाइसीज

    अलैंगिक जनन

    यह प्रक्रिया विभिन्न प्रकार के बीजाणुओं जैसे स्पोरेंजियोस्पोर , चल बीजाणु (जूस्पोर) , अचल बीजाणु (Aplanospore) तथा कोनेडिया द्वारा होता है । कोनेडिया का निर्माण सीधे कवक तंतु पर बहिर्जात रूप से होता है । प्रत्येक कोनेडिया अंकुरित होकर एक नये कवक तंतु का निर्माण करता है ।

    लैंगिक जनन

    यह जनन निषिक्तांड(ऊस्पोर) , ऐस्कस बीजाणु तथा बेसिडियम बीजाणु द्वारा होता है । विभिन्न बीजाणु सुस्पष्ट संरचनाओं में उत्पन्न होते है , जिन्हें फलनकाय कहते है ।

    कवक जगत के विभिन्न वर्ग

    फाईकोमाईसिटिज

    इस प्रकार के कवक गीले एवं आद्र स्थानों पर पाए जाते है| जैसे- सदी हुई लकड़ी, अथवा सीलन युक्त स्थान आदि| इनमे अलेंगिक जनन प्रक्रिया द्वारा जनन होता है, एवं युग्मको के मिलने से युग्माणु निर्मित होते है |

    एस्कोमाईसिटिज (Ascomycetes Fungi)

    इस प्रकार के कवक एक कोशिकी या बहुकोश्किय दोनों ही हो सकते है| इन्हें थैली कवक भी कहा जाता है| न्यूरोसपेरा इसका अच्छा उदहारण है, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के रासायनिक प्रयोगों के अंतर्गत किया जाता है| इनमे भी अलेंगिक जनन पाया जाता है |

    बेसीडियोमाईसिटिज (Basidiomycete Fungi)

    ये कवक विभिन्न प्रकार के पौधो पर परजीवियों के रूप में विकसित होते है, इनमे अलेंगिक बीजाणु नहीं पाए जाते| इनके साधरण उदहारण मशरूम, पफबॉल आदि है| इनमे द्विकेंद्र्क सरंचना का निर्माण होता है, जिससे आगे चलकर बेसिडियम का निर्माण होता है |

    ड्यूटीरोमासिटिज (Deuteromycota Fungi)

    इस प्रजाति को अपूर्ण कवक की सूचि में रखा गया है, क्योकि इसकी लेंगिक प्रावस्था के आलावा और कुछ ज्ञात नहीं हो पाया है |

    लाइकेन (Lichen)

    लाइकेन को कवक के सहजीवी के रूप में जाना जाता है, क्योकि यह कवक के विकसित होने में सहायता करता है |

    कवकों का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Fungi)

    1. मशरूम नामक कवक का उपयोग सब्जी के रूप में व्यापक रूप से होता है।

    2. पनीर उद्योग में एस्परजिलस नामक कवक का उपयोग होता है।

    3. यीस्ट नामक कवक में किण्वन का गुण होता है, जिसके कारण इसका उपयोग एल्कोहॉल, शराब, बीयर आदि बनाने में होता है।

    4. नाइट्रिक अम्ल का निर्माण एस्परजिलस नामक कवक से होता है।

    5. जिबरेलिन्स हॉर्मोन्स, फ्यूजेरियम मोनिलीफॉर्म नामक कवक से प्राप्त होता है।

    6. बेकरी उद्योग में सैकेरोमाइसिस सेरीविसी, कवक का उपयोग डबलरोटी बनाने में होता है।

    7. कवक अपमार्जन का कार्य करते है जो विभिन्न प्रकार के मृत अवशेषों को नष्ट करने का कार्य करने के लिए जाने जाते है|

    8. कई प्रकार के कवक सब्जी बनाने के लिए काम में लिए जाते है|

    9. कवक से प्रतिरोधी दवाइयों का निर्माण किया जाता है जो मनुष्य के प्राण बचाने में सहायक होते है|

  • प्रोटिस्टा जगत  (Protista Kingdom) क्या है ? हिंदी में

    प्रोटिस्टा जगत (Protista Kingdom) क्या है ? हिंदी में

    What is Protista Kingdom ? (in Hindi)

    प्रोटिस्टा जगत के अन्तर्गत सभी एककोशिकीय (Unicellular) यूकैरियोटिक (Eukaryotic) मुख्यतया जलीय यूकैरियोटिक आते हैं; जैसे – एककोशिकीय शैवाल, प्रोटोजोआ डाइटम इत्यादि। इन्हें प्रजीव (Parasites) अथवा प्रोटिस्ट भी कहते है l यूकेरियोट्स ऐसे जीव हैं जिनकी कोशिकाओं में एक नाभिक होता है जो एक परमाणु से घिरा रहता है।

    ये जीव अपने सारे कार्य जो कि जीवन यापन के लिए आवश्यक होते हैं एक कोशिका(single cell) से ही संपन्न करते हैं यानी शारीरिक कार्य के हिसाब से सभी प्रोटिस्टा जगत के जीव बहुकोशिकीय जीवो के शरीर के जैसे ही होते हैं। इस जगत को प्रोकैरियोटिक जीवो वाले जगत मोनेरा (Monera)  एवं यूकैरियोटिक बहुकोशिकीय जीवो (पादप तथा प्राणी) वाले जगतो के बीच में रखा जाता है।

    मोनेरा (Monera Kingdom) एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीवों से बना है। अन्य चार kingdoms, प्रोटिस्टा, कवक, प्लांटे और एनिमिया सभी यूकेरियोटिक जीवों (Eukaryotic Organisms) से बने हैं।  वैज्ञानिक रॉबर्ट विटाकर (Robert H. Whittaker) द्वारा सन 1969 में प्रस्तावित प्रख्यात पांच जगत वर्गीकरण में सभी एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों, एककोशीय निवही या कोलोनियल जीवों व ऐसे जीवों को जो ऊतक नहीं बनाते,को ‘प्रॉटिस्टा’ के रूप में वर्गीकृत किया गया l यह सभी यूकैरियोटिक तो हैं लेकिन इनके जीवन चक्र,पोषण स्तर, गमन या चलन की विधियां व कोशिकीय सरंचना भिन्न भिन्न हैं।

    इनमें प्रजनन लैगिक और अलैगिक दोनों ही प्रकार का होता है। प्रोटिस्टा की एक खास विशेषता है कि यह प्रोकैरियोट और आधुनिक यूकैरियोट (पादप तथा प्राणी) के मध्य कड़ी का कार्य करता है। जन्तु एवं पौधे के मध्य आने वाला युग्लिना भी इसी जगत का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है|

    पादपों की भाँति अनेक प्रोटिस्टा प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं। वस्तुतः पादपों और जन्तुओं की भांति इनकी कोशिकाएँ विभिन्न प्रकार के उतकों में संगठित नहीं होती है।

    प्रोटिस्ट के अध्ययन को प्रोटिस्टोलॉजी (Protistology) कहा जाता है

    ऊपर बाईं ओर से : लाल शैवाल (Chondrus crispus); भूरा शैवाल (Giant Kelp); ciliate (Frontonia); स्वर्ण शैवाल (Dinobryon); Foraminifera (Radiolaria); parasitic flagellate (Giardia muris); pathogenic amoeba (Acanthamoeba); amoebozoan slime mold (Fuligo septica)

    संरचना (Structure of Protists)

    प्रोटिस्टा में कोशिकाएँ एक कला द्वारा घिरी होती है। प्रकाश-संश्लेषी प्रोटिस्टा कोशिका में पर्णहरिम होते हैं प्रत्येक कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया, गॉल्जीकाय, केन्द्रक, गुणसूत्र आदि अंग कलाओं से घिरे हुए होते हैं। प्रोटिस्टा में गमन कशाभिका, रोमाभि और कूटपादों द्वारा होता है। इस जगत के प्राणी मृतोपजीवी या परजीवी अथवा प्रकाश संश्लेषण क्रिया के द्वारा अपना भरण पोषण करते है |

    जनन (Reproduction system in Protists)

    प्रोटिस्टा में जनन दो प्रकार की क्रियाओ लैंगिक जनन और अलेंगिक (asexual) जनन द्वारा होता है | लेंगिक प्रजनन के अंतर्गत नर एवं मादा जाइगोट का निर्माण करते है, जो युग्मक संयोजन द्वारा किया जाता है, जिससे अर्धसूत्री विभाजन फलित होता है एवं जीव का विकास सम्भव हो पाता है, जबकि अलेंगिक जनन प्रक्रिया द्विविभाजन प्रणाली द्वारा पूरी होती है, जिसमे पुटी निर्मित करके जीव का जन्म होता है|

    प्रोटिस्टा जीवो के प्रकार (Type of Protists)

    अवपक कवक

    इस प्रकार के प्रोटिस्ट जीव प्रकाश संश्लेषण वर्णक (Photosynthesis Pigment) तथा कोशिका भित्ति (Cell Wall) हीन जीव द्रव्य वाले तथा अनियमित आकार के होते हैं। जिसमें कई |केंद्रक पाए जाते हैं। शैशव अवस्था में कोशिका के चारों और भीति का अभाव होता है, लेकिन वयस्क अवस्था में लसलसे (Gluttonous) पदार्थ का एक स्तर कोशिका के चारों ओर बन जाता है। इसी कारण इन्हें अवपक कवक (Depigmented Fungus) कहते हैं। उदाहरण – फाइसेरम (Physarum polycephalum) आदि।

    स्वपोषी प्रोटिस्ट (Autotrophic protists)

    ऐसे प्रोटिस्ट जो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की क्षमता युक्त होते हैं। अथवा इनमें पर्णहरिम (Chlorophyll) तथा दूसरे प्रकाश संश्लेषण वर्णक पाए जाते हैं। स्वपोषी यानी प्रकाश संश्लेषण प्रोटेस्ट के अंतर्गत डाइनोफ्लेजेलेट्स (Dinoflagellates), डाइटम (Diatoms) तथा यूग्नीला (Eugenila) के समान जीव आते हैं।

    प्रोटोजोअन (Protozoa) प्रोटिस्ट

    इस प्रकार के प्रोटिस्टा जगत के सदस्य अप्रकाश संश्लेषी होते हैं अर्थात इनमें प्रकाश संश्लेषी वर्णक का अभाव होता है। यह एक कोशिकीय परपोषी जन्तुसम (Cellular Host Organism) जीव होते हैं। जन्तुसम पोषण करते हैं यानी यह अपने भोजन को निकलते हैं। इनके एककोशकीय शरीर के चारों तरफ आवरण पाया जाता है। जिसे पैलिकल कहते हैं। उदाहरण – अमीबा, पेरमिसियम। अधिकांश प्रोटोजोआ को नग्न आंखों से नही देखा जा सकता है क्योकिं ये लगभग 0.01-0.05 मिमी के होते हैं, लेकिन इन्हें एक माइक्रोस्कोप की मदद से आसानी से देखा जा सकता है।

    प्रोटिस्टा जगत के अंतर्गत आने वाले जीवो के कुछ उदाहरण

    Example of some Protists

    अमीबा (Amoeba)

    ऊपर दाईं ओर से : अमीबा प्रोटीस, एक्टिनोफ्रीस सोल, एकैन्थअमीबा एसपी।, पॉम्फॉलीक्सोफ्री एसपी।, यूग्लिफा एसपी।, न्यूट्रोफिल अंतर्ग्रहण बैक्टीरिया

    अमीबा प्रोटिस्टा जगत का महत्वपूर्ण प्राणी माना जाता है, जो ताल्राबो, झीलों आदि में पाया जाता है| अमीबा के भीतर संचरण के लिए पादाभ उपस्थित रहते है, जिससे ये अपना भोजन प्राप्त करता है | अमीबा के पादाभ इसे भोजन ग्रहण करने में सहायक होते है | अमीबा का कोई मुंह नहीं है; कोशिका की सतह के किसी भी बिंदु यह  भोजन ग्रहण करते है और उसे उत्सर्जित करते है । ये भोजन के दौरान, साइटोप्लाज्म के विस्तार खाद्य कणों के चारों ओर प्रवाहित होते हैं, उन्हें घेरते हैं और एक रिक्तिका बनाते हैं जिसमें कणों को पचाने के लिए एंजाइम स्रावित होते हैं।

    अमीबा में जनन के लिए द्विविभाजन प्रणाली का उपयोग किया जाता है, अत: इसमें लेंगिक जनन का गुण नहीं पाया जाता है | प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थियों में अमीबा एनसिस्टमेंट (Encystment) द्वारा जीवित रहते हैं l चूँकि अमीबा गोलाकार होता है इसलिय वो अपना अधिकांश पानी खो देता है, और एक सिस्ट झिल्ली को स्रावित करता है जो उसे एक सुरक्षात्मक आवरण प्रदान करती है l जब पर्यावरण अनुकूल होता, तो उस झिल्ली से  अमीबा बाहर निकल जाता है।

    एंटअमीबा

    इसका आकार व् बनावट अमीबा के समान ही होता है, अधिकांशत: ये प्रदूषित जल में पाए जाते है l इसकी एक साधारण प्रजाति को हिस्टोलिका कहा जाता है | इस प्रदूषित जल के सेवन से कई बीमारियां हो सकती है l

    नर एंटअमीबा का आक्रमण सिस्ट के द्वारा फलित होता है, और यदि यह गाँठ मनुष्य के शरीर में पैदा होकर फट जाए एवं पेट एवं आंतड़ियो में फ़ैल जाए तो यह गम्भीर रोग उत्पन्न कर सकते है l

    प्लाजमोडियम (Plasmodium)

    प्लास्मोडियम एककोशिकीय यूकेरियोट्स का ही एक जीनस है जो कशेरुक (vertebrates) और कीड़ों (insects) के परजीवी हैं। प्रोटिस्टा जगत के इस परजीवी को मलेरिया परजीवी भी कहा जाता है| इसका जीवन चक्र 2 मुख्य प्रवस्थाओ में सम्पन्न होता है, जिसमे से लेंगिक जनन प्रावस्था मादा एनाफिलिज मच्छर द्वारा की जाती है, जो मलेरिया वाहक कहलाती है, एवं अलेंगिक जनन प्रावस्था मानव के रक्त द्वारा सम्पन्न की जाती है |

    युग्लिना (Euglena)

    इस जीव का बाहरी आवरण बेहद लचीला होता है, जिसे पेलिकल कहा जाता है और यह प्रोटीन से निर्मित होता है |  यह जीव गंदे स्थानों, जैसे नाले, गड्ढे, गंदे पानी के जलाशयों आदि में उपस्थित रहता है| जनन के लिए द्विविभाजन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है, एवं जल में संचरण कशाभ द्वारा किया जाता है |

    डायटम (Diatom)

    इसकी हजारो की संख्या में प्रजातिया जल में स्थित रहती हैं जो जलीय प्राणियों का भोजन करती है | डायटम तन्तु के रूप में विद्यामान हो सकते है, ये एक कोशिकीय भी हो सकते है तथा आकृतियों में भेद हो सकता है | यह जीव नाम मिटटी, जल एवं गीली जगहों पर पाया जाता है | डायटम कोशिका भित्ति निर्मित करते हैं जिसके अंदर सिलिका उपस्थित रहती है| इनमे केन्द्रक पाया जाता है, एवं ये कई प्रकार के मिनरल्स का अच्छा स्त्रोत है |

  • विषाणु (Virus) क्या है ? वायरस क्या है (हिंदी में)

    विषाणु (Virus) क्या है ? वायरस क्या है (हिंदी में)

    What is Virus ?

    विषाणु (वायरस) अतिगृश्य, परजीवी, अकोशिकीय और विशेष न्यूक्लियोप्रोटीन (Nucleoproteins) कण हैं। ये सजीव एवं निर्जीव के मध्य की कड़ी है। वायरस या विषाणु बहुत छोटे रोगाणु होते हैं, जो प्रोटीन की खोल के अंदर अनुवांशिक सामग्री से बने होते हैं। एक वायरस की अनुवांशिक सामग्री आरएनए या डीएनए हो सकती है, जो आम तौर पर प्रोटीन, लिपिड (Lipid) या ग्लाइकोप्रोटीन (Glycoproteins) की खोल से घिरी रहती है या तीनों का थोड़ा-थोड़ा संयोजन (Combination) होता है।

    वायरस के अस्तित्व की खोज रूसी वैज्ञनिक इवानोस्की ने 1892 में तम्बाकू के पौधों से चितेरी रोग के कारण का निरीक्षण करते समय की थी। 1898 में फ्रेडरिक लोफ्लर और पॉल फ्रॉश ने शोध में देखा कि पशुओं में पैर और उनके मुंह की बीमारी का कारण कोई बैक्टीरिया से भी छोटा संक्रामक है। यह वायरस की प्रकृति का पहला संकेत था l विषाणु (वायरस) एक ऐसा जेनेटिक तत्व जो जीवित और निर्जीव अवस्थाओं के बीच में कहीं आता है।

    विषाणु (वायरस) की विशेषताएं क्या है ?

    What are the characteristics of Virus ?

    वायरस की मूल संरचना

    ये नाभिकीयअम्लऔरप्रोटीन(न्यूक्लिओप्रोटीन्स) से मिलकर बनते हैं, जो जन्तुओं व पादपों के गुणसूत्रों के न्यूक्लिओप्रोटीन्स के समान होते हैं। ये जन्तुओं, पेड़-पौधों व वैक्टीरिया सभी में पाये जाते हैं।

    वायरस बेहद छोटे, व्यास में लगभग 20 – 400 नैनोमीटर तक होते हैं। मिमिवायरस के रूप में जाना जाने वाला सबसे बड़ा वायरस 500 नैनोमीटर के व्यास तक होता है।

    शरीर के बाहर तो ये मृत-जैसे होते हैं लेकिन शरीरकेअंदरजीवितहोजाते हैं। इन्हे क्रिस्टल के रूप में इकट्ठा किया जा सकता है। एक वायरस बिनाकिसीसजीवमाध्यमकेपुनरुत्पादन नहीं कर सकता है।

    वायरस अन्य जीवों से अलग स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि उन्हें पुनरुत्पादन के लिए एक जीवित कोशिका पर निर्भर रहना पड़ता है।

    यह सैकड़ों वर्षों तक सुसुप्तावस्था में रह सकता है और जब भी एक जीवित माध्यम या धारक के संपर्क में आता है, तो उस जीव की कोशिका को भेद कर अन्दर चला जाता है और जीव को बीमार कर देता है l  एक बार जब वायरस जीवित कोशिका में प्रवेश कर जाता है, वह कोशिकाकेमूलआरएनएएवंडीएनएकीजेनेटिकसंरचनाकोअपनीजेनेटिकसूचनासेबदलदेता है और संक्रमित कोशिका अपने जैसे संक्रमित कोशिकाओं का पुनरुत्पादन शुरू कर देती है। जिससे वायरस का शरीर में तेजी से प्रसार होता है l

    वायरस कोशिकाएं नहीं बल्कि गैर-जीवित, संक्रामक कण होते हैं। वे विभिन्न प्रकार के जीवों में कैंसर समेत कई बीमारियों को जन्म देने में सक्षम हैं।

    वायरल रोग जनक न केवल मनुष्यों और जानवरों को संक्रमित करते हैं, बल्कि पौधों, बैक्टीरिया इत्यादि को भी संक्रमित करते हैं। ये बेहद छोटे कण बैक्टीरिया से लगभग 1000 गुना छोटे होते हैं और लगभग किसी भी पर्यावरण में पाए जा सकते हैं।

    अधिकांश वायरस जन्तुओं व पौधों में घातक रोग उत्पन्न करते हैं। इनको क्रिस्टलीय अवस्था में अलग करके मंचित किया जा सकता है, किन्तु ये केवल जीवित कोशिका के अंदर वृद्धि कर सकते हैं।

    वे जीवित, सामान्य कोशिकाओं को कमजोर करते है और उन कोशिकाओं का उपयोग अपने जैसे अन्य वायरस की संख्या बढ़ाने के लिए करते हैं।

    वायरस कोशिकाओं को मार सकता हैं, उन्हें क्षति पहुंचा सकता हैं या उनकी जेनेटिक संरचना को बदल सकते हैं । विभिन्न वायरस आपके शरीर में कुछ कोशिकाएं जैसे आपके लिवर, श्वसन तंत्र या खून पर हमला करते हैं और स्वस्थ शरीर को बीमार कर देते है ।

    कुछ सबसे साधारण या सबसे प्रसिद्ध वायरस में ह्यूमन इम्यूनो डेफिशियेंसी वायरस (Human Immunodeficiency Viruses – HIV-एचआईवी) जो एड्स का कारण बनता है, हर्पीस सिम्पलेक्स वायरस (Herpes Simplex Virus), जो ठंडे घावों, चेचक, मल्टीपल स्क्लेरोसिस (Multiple sclerosis (MS)) का कारण बनता है और ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (Human papillomavirus (HPV) जो अब वयस्क महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा (CERVIX) के कैंसर का एक प्रमुख कारण माना जाता है, इत्यादि शामिल है।

    आम सर्दी जुकाम भी एक वायरस के कारण होता है। चूंकि अभी भी नए-नए विषाणुओं की उत्पत्ति का मुद्दा रहस्य से घिरा हुआ है, इन वायरस या विषाणु के कारण होने वाली बीमारियां और उन्हें ठीक करने के तरीके अभी भी विकास के शुरुआती चरणों में हैं।

    निर्जीव जैसे लक्षण

    विषाणु कोशिकीय रूप में नहीं होते हैं तथा इनमें कोशिकीय अंग नहीं पाये जाते।

    इनमें पोषण, श्वसन, बुद्धि, उत्सर्जन और उपापचय क्रियाएँ नहीं होती है।

    इनके रवे को क्रिस्टल बनाकर निर्जीव पदार्थ की भाँति बोतलों में भरकर वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

    प्रत्येक वाइरस प्रोटीन खोल (capsid) में बंद RNA या DNA का अणु होता है।

    सजीव जैसे लक्षण

    विषाणु में न्यूक्लिक अम्ल का द्विगुणन होता है। – किसी जीवित कोशिका में पहुँचते ही ये सक्रिय हो जाते हैं और एन्जाइमों का संश्लेषण करने लगते हैं।

    सजीव कोशिकाओं की भाँति इनमें भी RNA अथवा DNA मिलता है।

    विषाणु (Virus) के प्रकार – (Type of Virus)

    वायरस को उसके होस्ट के प्रकार के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसी आधार पर होम्स ने 1948 में वायरस को तीन समूहों में विभाजित किया है। वे हैं:

    जन्तु विषाणु (Animal Virus – एनिमल वायरस)

    वायरस जो मनुष्य सहित पशुओं की कोशिका को संक्रमित करते हैं, उन्हें जन्तु विषाणु कहा जाता है।

    उदाहरण के लिए, इन्फ्लूएंजा वायरस (Influenza Virus), रैबीज वायरस (Rabies Virus), मम्प्स वायरस (Mumps Virus) (जिससे गलसुआ रोग होता है), पोलियो वायरस (Polio Virus), स्माल पॉक्स वायरस (Small Pox Virus), हेपेटाइटिस वायरस (Hepatitis Virus), राइनो वायरस (Rhino Virus) (सामान्य सर्दी जुकाम वाला वायरस) आदि। इनकी आनुवंशिक सामग्री आरएनए या डीएनए होता है।

    मुख्य प्रकार के वायरल संक्रमण और इसमें शामिल सबसे उल्लेखनीय प्रजातियों का अवलोकन

    पादप विषाणु (प्लांट वायरस – Plant Virus)

    पौधों को संक्रमित करने वाले वायरस को पादप विषाणु कहा जाता है। इनकी अनुवांशिक सामग्री आरएनए होता है जो प्रोटीन की खोल में रहता है।

    उदाहरण के लिए, तंबाकू मोजेक वायरस (Tobacco Mosaic Virus), पोटैटो वायरस (आलू विषाणु), बनाना बंची टॉप वायरस (Banana bunchy top Virus), टोमॅटो येलो लिफ कर्ल वायरस (Tomato Yellow Leaf Curl Virus) (टमाटर की पत्ती ), बीट येलो वायरस (Beat Yellow Virus) और टर्निप येलो वायरस (Turnip Yellow Virus) इत्यादि हैं।

    जीवाणुभोजी (Bacteriophage – बैक्टीरियोफेज)

    वायरस जो जीवाणु या बैक्टीरिया की कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं उन्हें बैक्टीरियोफेज या बैक्टीरिया खाने वाले (जीवाणुभोजी) के रूप में जाना जाता है। उनमें आनुवांशिक सामग्री के रूप में डीएनए होता है।

    बैक्टीरियोफेज की कई किस्में हैं। आम तौर पर, प्रत्येक प्रकार का बैक्टीरियोफेज केवल एक प्रजाति या बैक्टीरिया के केवल एक स्ट्रेन पर हमला करता है।

    Structure of Bacteriophage. Created with BioRender.com

    वायरस कैसे फैलता है – How the Virus Spreads?

    वायरस पर्यावरण से या अन्य व्यक्तियों के माध्यम से मिट्टी से पानी में या हवा में पहुंच कर नाक, मुंह या त्वचा में किसी भी कट के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं और संक्रमित करने के लिए किसी कोशिका की तलाश करते हैं।

    उदाहरण के लिए एक सर्दी जुकाम या फ्लू का विषाणु उन कोशिकाओं को target करता है जो श्वसन (यानी फेफड़ों) या पाचन नली (यानी पेट) में होती हैं। एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशियेंसी वायरस) जो एड्स का कारण होता है, हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की टी-कोशिकाओं (एक प्रकार की सफेद रक्त कोशिकाएं जो संक्रमण और बीमारी से लड़ती हैं) पर हमला करता है।

    विषाणु और जीवाणु संक्रमण दोनों मूल रूप से मनुष्यों में एक ही तरह से फैलते हैं।

    वायरस मनुष्यों में निम्नलिखित कुछ तरीकों से फैल सकते हैं

    वायरस किसी अन्य व्यक्ति के हाथ को छूने या हाथ मिलाने से फैल सकता है। यदि कोई व्यक्ति गंदे हाथों से भोजन को छूता है तो वायरस आंत में भी फैल सकता है।

    जिस व्यक्ति को सर्दी जुकाम है उस व्यक्ति की खांसी या छींक से वायरस संक्रमण फैल सकता है।

    शरीर के तरल पदार्थ जैसे कि खून, लार और वीर्य और ऐसे ही अन्य तरल पदार्थों के इंजेक्शन या यौन संपर्क द्वारा संचरण से वायरस, विशेष रूप से हेपेटाइटिस या एड्स जैसे वायरल संक्रमण अन्य व्यक्तियों में फैल सकते हैं।

    Corona Virus – Covid -19 (कोरोना वायरस) क्या है ?

    कोरोनावायरस रोग 2019 से एक नई उभरती हुई संक्रामक बीमारी है जो वर्तमान में दुनिया भर में फैल गई है। यह महामारी दिसंबर 2019 में आए एक नए कोरोनावायरस के कारण हुई थी, और अब यह एक वैश्विक महामारी (Global Pandemic) में बदल गई है।

    Covid – 19 बीमारी नोवेल कोरोनावायरस (Novel Coronavirus), सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस 2 (Severe Acute Respiratory Syndrome Coronavirus 2 (SARS-CoV-2) की वजह से होती है l यह कोरोनावायरस की β family से संबंधित है।

    SARS-CoV-2 की बाहरी संरचना का वैज्ञानिक रूप से सटीक परमाणु मॉडल। प्रत्येक “गेंद” (Ball) एक परमाणु है

    यह मनुष्यों को संक्रमित करने वाला सातवां ज्ञात कोरोनावायरस है; इनमें से चार कोरोनावायरस (229E, NL63, OC43, और HKU1) केवल सामान्य सर्दी के मामूली लक्षण पैदा करते हैं। इसके विपरीत, अन्य तीन, SARS-CoV, MERS-CoV, और SARS-CoV-2, क्रमशः 10%, 37% और 5% की मृत्यु दर के साथ गंभीर लक्षण और यहां तक कि मृत्यु का कारण बन सकते हैं।

    SARS-CoV-2 का स्पाइक (S) प्रोटीन, जो Receptor Recognition और कोशिका झिल्ली संलयन प्रक्रिया (Cell Membrane Fusion Process) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है l

    यह दो सबयूनिट्स, S1 और S2 से बना है। S1 सबयूनिट में एक रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन (Receptor-Binding Domain) होता है जो होस्ट रिसेप्टर एंजियोटेंसिन-कनवर्टिंग एंजाइम 2 (Angiotensin-Converting Enzyme 2)  को पहचानता है और बांधता है, जबकि S2 सबयूनिट दो-हेप्टैड रिपीट डोमेन के माध्यम से छह-हेलिकल बंडल (Six-Helical Bundle) बनाकर वायरल सेल मेम्ब्रेन फ्यूजन (Viral Cell Membrane Fusion) की मध्यस्थता करता है।

    कोरोना कैसे फैलता है ?

    कोरोना आमतौर पर एक संक्रमित व्यक्ति की सांस की बूंदों (droplets) के माध्यम से दूसरे व्यक्ति में फैलता है l जब किसी संक्रमित व्यक्ति को खांसी या छींक आती है तो ये बूंदें जो लोग उनके पास है, उन लोगों के मुंह या नाक में जा सकती हैं । फैलने की संभावना तब अधिक होती है जब लोग एक दूसरे के साथ संपर्क में होते हैं (जब लगभग 6 फीट से कम दूरी होती है)।

    इसमे यह भी संभव होता है कि कोई संक्रमित व्यक्ति किसी सतह या वस्तु को छूता है तो वह वायरस रह जाते है और बाद में एक स्वस्थ उस जगह को छूकर अपने हाथ मुंह, नाक या आंखों को छूने से भी फैलता है । फिर भी इसे वायरस फैलने का मुख्य कारण नहीं माना जा रहा है और इस पर अभी research चल रहे है ।

  • माइकोप्लाज्मा क्या है ?

    माइकोप्लाज्मा क्या है ?

    What is Mycoplasma ?

    माइकोप्लाज्मा सूक्ष्मतम, एक कोशिकीय, बहुरूपी, प्रोकैरियोटिक जीव हैं। इन्हें “पादप जगत का जोकर’ कहा जाता है। माइकोप्लाज्मा को विभिन्न तापमान, दाब पर उत्पन्न किया जा सकता है और यह ‘तापीय‘ या ‘अतापीय‘ प्लाज्मा हो सकता है।


    माइकोप्लाज्मा की खोज नोकॉर्ड एवं रॉक्स 1898 ने की थी और इन्हें PPLO (Pleuro-Pneumonia Like Organism) कहा। माइकोप्लाज्मा अभी तक खोजी गई सबसे छोटी जीवाणु कोशिकाएं हैं ऑक्सीजन के बिना माइकोप्लाज्मा जीवित रह सकते हैं, और कई आकारों में पाए जाते है । उदाहरण के लिए, एम. जेनिटेलियम (M. Genitalium) फ्लास्क के आकार का (लगभग 300 x  600 nm) है, जबकि एम. न्यूमोनिया (M. Pneumoniae) अधिक लम्बा (लगभग 100 x 1000 nm) है। सैकड़ों माइकोप्लाज्मा की प्रजातियां जानवरों को संक्रमित करती हैं।


    इनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है। इसलिए कोशिका भित्ति पर क्रिया करने वाली प्रतिजैविकों, जैसे पेनिसिलिन का कोई प्रभाव नहीं होता। और प्लाज्मा झिल्ली कोशिका की बाहरी सीमा बनाती है। कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति के कारण ये जीव अपना आकार बदल सकते हैं

    माइकोप्लाज्मा कोशिका की संरचना। जीवाणु यौन संचारित रोगों (sexually transmitted diseases), निमोनिया, एटिपिकल निमोनिया और अन्य श्वसन विकारों (respiratory disorders) का प्रेरक एजेंट (causative agent)है। कई एंटीबायोटिक दवाओं से यह अप्रभावित होते है

    माइकोप्लाज्मा का वर्गीकरण

    • सन् 1966 में अंतरराष्ट्रीय जीवाणु नामकरण समिति ने माइकोप्लाज्मा को जीवाणुओं से अलग करके वर्ग- मॉलीक्यूट्स में रखा है।
    • वर्ग- मॉलीक्यूट्स
    • गण- माइकोप्लाज्माटेल्स
    • वंश- माइकोप्लाज्मा

    माइकोप्लाज्मा के लक्षण

    आनुवंशिक सामग्री एक एकल डीएनए डुप्लेक्स है और नग्न है। (Genetic material is a single DNA duplex and is naked)

    यह राइबोसोम 70S प्रकार के होते हैं।

    इनमें DNA तथा RNA दोनों उपस्थित होते हैं।

    एक कठोर कोशिका भित्ति (Rigid Cell Wall) की कमी के कारण, Mycoplasmataceae गोल से लेकर आयताकार आकार की एक विस्तृत श्रृंखला में विपरीत हो सकता है। इसलिए उन्हें छड़, कोक्सी (spherical) या स्पाइरोकेट्स (long) के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।

    इन जीवों पर उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित करने वाले प्रतिजैविकों (जैसे – टेट्रासाइक्लिन, क्लोरेमफेनिकोल) आदि का प्रभाव पड़ता है।

    इनमें जनन द्विखण्डन, मुकुलन तथा एलिमेन्टरी बॉडीज द्वारा होता है।

    ये किसी जीवित जंतु या पेड़ पौधों पर आश्रित रहते हैं। तथा उनमे कई तरह की बीमारियां उत्पन्न करते हैं। कई बार ऐसे जीव मृत कार्बनिक पदार्थों पर मृतोपजीवी के रूप में भी पाए जाते हैं। यह परजीवी अथवा मृतोपजीवी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।

    इनका आकार 100 से 500 nm तक होता है। इसलिए इन्हें जीवाणु फिल्टर से नहीं छाना जा सकता है।

    इन्हें वृद्धि के लिए स्टेरॉल की आवश्यकता होती है।

    माइकोप्लाज्मा प्रजातियां अक्सर research laboratories  में कोशिका संवर्धन (cell culture) में contaminants के रूप में पाई जाती हैं। [Mycoplasmal cell culture contamination occurs due to contamination from individuals or contaminated cell culture medium ingredients]

    कुछ माइकोप्लाज्मा का प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है l जन्म के समय कम वजन होना या समय से पहले जन्मे शिशु, माइकोप्लाज्मा संक्रमण के लिए, अतिसंवेदनशील होते हैं l

    माइकोप्लाज्मा की उपस्थिति पहली बार 1960 के दशक में कैंसर के ऊतकों के नमूनों में दर्ज की गई थी। तब से, कई अध्ययनों ने माइकोप्लाज्मा और कैंसर के बीच संबंध को खोजने और साथ ही कैंसर के गठन में जीवाणु कैसे शामिल हो सकता है, को साबित करने की कोशिश की l

    (A) माइकोप्लाज्मा न्यूमोनिया कोशिकाएं (Mycoplasma pneumoniae cells) (Gram Stain)

    माइकोप्लाज्मा की सिग्नेट-रिंग के आकार (signet-ring-shaped) की कोशिका ग्राम – (negative),  होती है, और कोशिका का आकार 0.2–0.3 माइक्रोन होता है और सामान्य रूप से 1.0 माइक्रोन से छोटा होता है। कोशिकाओं में कोशिका भित्ति नहीं होती है। प्रोटीन और लिपिड बाहरी कोशिका झिल्ली का निर्माण करते हैं और कोशिकाएं स्पष्ट रूप से फुफ्फुसावरणीय (pleomorphic) होती हैं, जिसमें गोलाकार, रॉड जैसी, बार जैसी, और सूक्ष्मदर्शी के नीचे दिखाई देने वाले फिलामेंटस आकारिकी होती है। typical cell एक सिग्नेट रिंग के आकार का होता है। कोशिकाएं ग्राम – (negative), हल्के बैंगनी रंग की होती हैं जिसमें गिमेसा दाग (Giemsa stain) होता है

    (B) M. Pneumoniae (एम. न्यूमोनिया) signet ring cell (Giemsa stain) – एम. न्यूमोनिया कोशिका हल्के बैंगनी रंग की होती है जिसमें गिमेसा दाग (Giemsa stain) होता है।

    (C) एम। निमोनिया आमलेट जैसी कॉलोनियां (M. pneumoniae omelet-like colonies)

    (D) एम. निमोनिया की शहतूत के आकार की कॉलोनियां (Mulberry-shaped colonies of M. Pneumonia)

    माइकोप्लाज्मा जनित पादप रोग और उनकी पहचान

    माइकोप्लाज्मा पौधों में लगभग 40 रोग उत्पन्न करते हैं। जो निम्न लक्षणों द्वारा पहचाने जा सकते हैं।

    पत्तियां पीली पड़ जाती हैं अथवा एंथोसाइएनिन वर्णक के कारण लाल रंग की हो जाती हैं।

    पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है।

    पुष्प पत्तियाँ आकार में बदल जाते हैं।

    पर्व छोटी पड़ जाती है।

    पत्तियाँ भुरभुरी हो जाती है।

    माइकोप्लाज्मा जनित पादप रोग से प्रभावित पौधे

    चंदन का स्पाइक रोग

    आलू का कुर्चीसम रोग

    कपास का हरीतिमागम

    बैंगन का लघु पर्ण रोग

    गन्ने का धारिया रोग

    ऐस्टर येलो आदि

    माइकोप्लाजमा जनित मानव रोग

    अप्रारूपिक निमोनिया – माइकोप्लाज्मा न्यूमोनी के कारण होता है।

    माइकोप्लाज्मा जनित जंतु रोग

    भेड़ और बकरियों का एगैलेक्टिया – माइकोप्लाज्मा एगैलेक्टी के कारण होता है।

    माइकोप्लाज्मा द्वारा उत्पन्न रोग का उपचार

    माइकोप्लाज्मा द्वारा उत्पन्न रोग का उपचार टेट्रोसाइक्लिन औषधि द्वारा किया जाता है

  • मोनेरा जगत (Monera Kingdom) क्या है ?

    मोनेरा जगत (Monera Kingdom) क्या है ?

    What is Monera Kingdom ?

    इसके अन्तर्गत सभी प्रोकैरियोटिक जीव आते हैं। इस जगत में जीवाणु (बैक्टीरिया), एक्टिनोमाइसिटीज, आर्कीबैक्टीरिया और और सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) आते हैं। बैक्टीरिया सर्वाधिक प्राचीन जीव हैं। ये विभिन्न पर्यावरण मृदा, जल, वायु, पादप तथा जन्तु में व्याप्त होते हैं।

    जीवाणु विभिन्न आकृतियों में मिलते हैं; जैसे – विब्रियो (कोमा), स्पाइरिलम (सर्पिलाकार)

    जीवाणु (Bacteria)बैक्टीरिया

    जीवाणुओं का अभिरंजन (Staining of Bacteria)

    ग्राम अभिरंजन की क्रिया में जीवाणुओं को क्रिस्टल वायलेट एवं आयोडीन के घोल में अभिरंजन करने पर सभी बैंगनी हो जाते हैं। इसके पश्चात् एसीटोन या एल्कोहॉल से साफ करने पर ग्राम धनात्मक जीवाणुओं में बैंगनी रंग बना रहता है, जबकि ग्राम ऋणात्मक जीवाणु रंगहीन हो जाते हैं। इसके पश्चात सेफरेनीन या कार्बोल फ्यूसीन से अभिरंजन देने पर ग्राम धनात्मक जीवाणु बैंगनी ही रहते हैं, जबकि ग्राम ऋणात्मक गुलाबी लाल हो जाते हैं।

    क्रिश्चिन ग्राम ने अभिरंजन के आधार पर जीवाणुओं को दो समूह ग्राम धनात्मक (Gram positive) व ग्राम ऋणात्मक (Gram negative) में रखा।

    ग्राम धनात्मक तथा ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं में अन्तर

    Difference between Gram Positive and Gram Negative Bacteria

    जीवाणुओं की संरचना (Structure of Bacteria)

    जीवाणुओं में फ्लेजेलीन नामक प्रोटीन से बनी कशाभिकाएँ होती हैं। ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं में रोम अथवा फिम्ब्री पाये जाते हैं।

    जीवाणुओं की कोशिका भित्ति म्यूरीन, पेप्टाइडोग्लाइकन या म्यूकोपेप्टाइड की बनी होती है। ग्राम धनात्मक जीवाणु की कोशिका भित्ति में टिकॉइक अम्ल पाया जाता है।

    कोशिका भित्ति के अन्दर जीवद्रव्य होता है, जो फॉस्फोलिपिड एवं प्रोटीन की बनी जीवद्रव्य कला से घिरा रहता है। जीवद्रव्य कला अन्तवलित होकर मीसोसोम बनाती है। जीवद्रव्य कला में इलेक्ट्रॉन अभिगमन तन्त्र (Electron Transport System-ETS) तथा ऑक्सीकीय फॉस्फोरिलीकरण के एन्जाइम पाये जाते हैं।

    जीवाणुओं में वास्तविक केन्द्रक का अभाव होता है और सामान्य गुणसूत्र नहीं होते। वलयाकार, द्विरज्जुकी DNA होता है परन्तु इसके साथ हिस्टोन प्रोटीन जुड़ी हुई नहीं होती, इस पूर्ण समूह को केन्द्रकाभ (nucleoid) या जीनोफोर (genophore) कहते हैं।

    कुछ जीवाणुओं; जैसे-ई.कोलाई में प्लाज्मिड पाया जाता है। यह लैंगिक जनन में सहायक (F-कारक), प्रतिरोधक शक्ति प्रदान करने (R-कारक) तथा कोलिसन्स संश्लेषण की क्षमता (Col-कारक) रखता है। जब प्लाज्मिड, केन्द्रकीय DNA से जुड़ा होता है, तब इपिसोम (Episome) कहलाता है।

    जीवाणु एवं पोषण (Nutrition)

    पोषण के आधार पर जीवाणु परपोषी एवं स्वपोषित होते हैं

    परपोषी (Heterotrophic)

    इनमें पर्णहरिम नहीं होता, अत: ये अन्य जीवित या मृत जीवों पर निर्भर होते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं जैसे – माइकोबैक्टीरियम, क्लॉस्ट्रिडियम एवं स्ट्रेप्टोकोकस ।

    1. परजीवी, जो जीवित पौधों तथा जन्तुओं से अपना भोजन लेते है,

    2. मृतोजीवी, जो मृत कार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन लेते है; जैसे-बेसिलस माइकोइडिस

    3. सहजीवी, जो दूसरे जन्तु या पौधों के साथ रहकर एक दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं; जैसे – राइजोबियम

    स्वपोषी (Autotrophic)

    ये CO2, H2S व अन्य पदार्थों से अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। ये प्रकाश-संश्लेषी एवं रसायन-संश्लेषी होते हैं।

    जीवाणुओं में जनन प्रक्रिया (Reproduction system in Bacteria)


    कायिक जनन विखण्डन एवं मुकुलन द्वारा होता है।

    अलैंगिक जनन, अन्त:बीजाणुओं; जैसे-क्लॉस्ट्रिडियम एवं बैसिलस में, चलबीजाणुओं द्वारा; जैसे – राइजोबियम में तथा कोनिडिया (conidia) द्वारा जैसे – स्ट्रेप्टोमाइसिस में होता है।

    जीवाणुओं में लैंगिक जनन नहीं होता, परन्तु आनुवंशिक पुनर्योजन (Genetic Recombination) परन्तु होता है।

    1. रूपान्तरण (Transformation). सर्वप्रथम ग्रिफिथ ने 1928 में रूपान्तरण की खोज की तथा एवरी, मैकलियोड और मैककार्टी ने 1944 में इसका विस्तृत अध्ययन किया। इस क्रिया में एक जीवाणु कोशिका का DNA दूसरी जीवाणु कोशिका में प्रवेश कर जाता है।

    2. संयुग्मन (Conjugation) लैडरबर्ग एवं टैटम 1946 ने ई. कोलाई में इसकी खोज की, जबकि वॉलमैन एवं जैकोब 1956 ने इसका विस्तृत अध्ययन किया। संयुग्मन में दाता (= नर) का DNA (आनुवंशिक पदार्थ) ग्राही (= मादा) में संयुग्मन नलिका द्वारा चला जाता है। दाता कोशिका में लैंगिक कारक (sex factor) या उर्वरता कारक (fertility factor) होता है, जो लैंगिक रोमों के निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है। F – कारक के मुख्य गुणसूत्र से संलग्न होने पर दाता कोशिका को Hfr (High frequency recombination) कहते हैं।

    3. पारक्रमण (Transduction) जिण्डर एवं लैडरबर्ग ने 1952 में इसको खोज की। इसमें एक जीवाणु के गुण जीवाणुभक्षी (Bacteriophage) विषाणु के DNA द्वारा दूसरे जीवाणु में स्थानान्तरित होते रहते हैं, संक्रमण के समय जीवाणुभोजी विषाणु अपना DNA जीवाणु कोशिका में प्रविष्ट करा देता है और जीवाणु कोशिका में ही विषाणु के DNA का गुणन होता है तथा जीवाणु के DNA का कुछ भाग जीवाणुभोजी विषाणु के DNA से संयुक्त हो जाता है। जीवाणु भित्ति के फटने पर विषाणु स्वतन्त्र हो जाते हैं और नयी जीवाणु कोशिका पर आक्रमण करते हैं।

    जीवाणुओं का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Bacteria)

    लाभप्रद क्रियाएँ (Useful Activities)

    नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणु पृथ्वी में स्वतन्त्र रूप से; जैसे-एजोटोबैक्टर तथा क्लॉस्ट्रिडियम या सहजीवी के रूप में; जैसे-लेग्युमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों में, राइजोबियम लेग्युमिनोसेरम, सेस्बेनिया के तने की गाँठों में एरोराइजोबियम, ऑर्डीसिया की पत्ती की गाँठो में माइकोबैक्टीरियम तथा कैजुराइना एवं रूबस पौधों की जड़ों में, फ्रेन्क्रिया आदि में रहते हैं।

    नाइट्रीकारी जीवाणु नाइट्रोसोमोनास एवं नाइट्रोबैक्टर क्रमश: अमोनिया को नाइट्राइट व नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदलते हैं।

    अमोनीकारी जीवाणु; जैसे बैसिलस जटिल प्रोटीन को सरल अमीनो अम्लों में परिवर्तित करते हैं।

    सल्फर जीवाणु; जैसे थायोबैसिलस प्रोटीन पदार्थों के सड़ने से प्राप्त HIS को H,SO, में बदल देते हैं, जो कुछ लवणों से क्रिया करके सल्फेट बनाता है। दूध में उपस्थित जीवाणु लैक्टोस शर्करा को लैक्टिक अम्ल में परिवर्तित कर देते हैं। लेक्टोबैसिलस लैक्टिस तथा ल्यूकोनॉस्टॉक सिट्रोवोरम पनीर बनाने तथा स्ट्रेप्टोकोकस थमोफिलस व लैक्टोबैसिलस वल्गेरिस योगहर्ट बनाने में प्रयोग होते हैं।

    एसिटोबैक्टर एसिटी सिरका बनाने में, बैसिलस मैगाथीरियम तम्बाकू की पत्तियों को स्वाद तथा सुगन्ध देने में माइकोकोकस कन्डीडेंस चाय की पत्तियों को स्वाद व सुगन्ध प्रदान करने, माइक्रोकोकस ग्लूटैमिकस लाइसीन बनाने तथा लेक्टोबैसिलस डेलबुक्री लैक्टिक अम्ल बनाने में प्रयोग होते हैं।

    हानिकारक क्रियाएँ (Harmful Activities)

    अनेक विनाइट्रीकारी जीवाणु; जैसे-बैसिलस डीनाइट्रीफिकेन्स, थायोबैसिलस डीनाइट्रीफिकेन्स मृदा में उपस्थित नाइट्रेट तथा अमोनिया के लवणों को स्वतन्त्र नाइट्रोजन में बदल देते हैं।

    अनेक जीवाणु; जैसे-स्टेफिलोकोकस, साल्मोनेला आदि खाद्य विषाक्ता उत्पन्न करते हैं। DPT वेक्सीन डिफ्थीरिया, परटुसिस या काली खाँसी तथा टिटनेस की रोकथाम के लिए जबकि BCG वेक्सीन ट्यूबरकुलोसिस की रोकथाम के लिए दी जाती है।

  • जीवधारियों का वर्गीकरण

    जीवधारियों का वर्गीकरण

    Division of organisms into kingdoms (Taxonomy)

    जीवधारियों का वर्गीकरण

    जीवधारियों के वर्गीकरण के अन्तर्गत जीवधारियों को निश्चित नियमों एवं सिद्धान्तों के अनुरूप व्यवस्थित किया जाता है। सबसे पहले अरस्तू ने जन्तुओं का प्राकृतिक समानताओं और असमानताओं के आधार पर जीवधारियों का वर्गीकरण किया था। लिनियस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सिस्टेमा नेचुरी’ में सभी जीवधारियों को दो जगतों-पादप जगत और प्राणि जगत, में प्रस्तुत किया। इसी आधार पर आधुनिक वर्गीकरण की प्रणाली की शुरूआत हुई।

    नामकरण की द्विनाम पद्धति (Binomial System of Nomenclature)

    वर्गीकरण के जनक, कैरोलस लिनियस जीवों के नामकरण की द्विनाम पद्धति प्रतिपादित किया गया, जिसके अनुसार जीवधारी का नाम लैटिन भाषा के दो शब्दों-वंश (Generic) और जाति (Species) से मिलकर बना होता है। इसके बाद उस वैज्ञानिक का नाम लिखा जाता है, जिसने सबसे पहले उस जाति को खोजा या इस जाति को सर्वप्रथम वर्तमान नाम प्रदान किया। वंश नाम का पहला अक्षर बड़ा (capital) तथा जाति नाम के सभी अक्षर छोटे (small) लिखे जाते हैं।

    उदाहरण मनुष्य, जिसका वैज्ञानिक नाम होमो सेपिएन्स लिन है। इसमें पहला शब्द होमो उस वंश को प्रदर्शित करता है, जिसकी एक जाति सेपिएन्स है तथा लिन, कैरोलस लिनियस का लघु नाम है। इसका अर्थ है कि सर्वप्रथम कैरोलस लिनियस द्वारा इस जाति को होमो सेपिएन्स नाम दिया गया था। जॉन रे ने सर्वप्रथम जाति (species), वंश (genus) आदि के आधार पर जाति की संकल्पना (Concept of Species) प्रस्तुत की।

    परम्परागत द्वि-जगत वर्गीकरण का स्थान अन्ततः व्हिटेकर द्वारा सन् 1969 में प्रस्तावित पाँच जगत प्रणाली ने ले लिया। इसके अनुसार समस्त जीवों को निम्नलिखित पाँच जगतों (kingdom) में वर्गीकृत किया गया

    1. मोनेरा  (Monera)

    2. प्रोटिस्टा (Protista)

    3. प्लान्ट (Plant)

    4. फंजाई (Fungi)

    5. एनीमेलिया (Animal)