Category: बायोलॉजी

  • प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला या कोशिका कला (Plasma membrane) क्या है ? इसकी संरचना (Structure) एवं कार्य।

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला या कोशिका कला क्या होती है, प्लाज्मा झिल्ली की संरचना (Structure), इकाई झिल्ली संकल्पना, फ्ल्यूइड मोजैक मॉडल और कोशिका कला या प्लाज्मा झिल्ली के कार्य क्या होता है आदि |

    प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला या कोशिका कला (Plasma membrane) क्या है

    कोशिका कला कोशिका की सबसे बाहरी परत है, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है। सभी कोशिकाओं (जन्तु कोशिका या पादप या नग्न कोशिकाएँ) के अवयव चारों तरफ से एक अत्यन्त पतली, लचीली तथा अर्द्धपारगम्य झिल्ली (Semi-permeable membrane) घिरे रहते हैं, जिसे जीवद्रव्य कला या कोशिका कला (Plasma membrane) कहते हैं ।

    यह झिल्ली जीवद्रव्य कला, जीवद्रव्य तथा ऊतक द्रव्य (Tissue fluid) के बीच एक अवरोधक की तरह कार्य करती है, जिससे होकर कुछ विलयन, विलायक तथा यौगिक अन्दर – बाहर हो सकते हैं। इस तरह यह झिल्ली आवश्यक पदार्थों को अन्दर अथवा बाहर जाने देती है। इसी को चयनात्मक पारगम्यता (selective permeability) कहते हैं। इस दृष्टि से O2 एवं CO2, कोशिका झिल्ली के आर-पार विसरण प्रक्रिया तथा जल परासरण प्रक्रिया द्वारा कोशिका के अन्दर एवं बाहर होते हैं।

    प्लाज्मा झिल्ली की संरचना (Structure of Plasma membrane)

    रॉबर्टसन (1959) की इकाई झिल्ली अवधारणा के अनुसार सभी कोशिकाएँ दो प्रोटीन परतों (प्रत्येक 20 Å मोटी) के मध्य फॉस्फोलिपिड की परत (35 Å मोटी) की बनी होती है।

    इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से प्लाज्मा शिल्ली का अध्ययन करने पर ये तीन स्तरों की बनी दिखाई देती है :

    (i) 20 Å मोटी, बाह्य सघन स्तर (External dense layer) – यह प्रोटीन की बनी होती है।

    (ii) 35 Å मोटी, मध्य हल्की स्तर (Middle light layer) – यह द्विध्रुवीय तथा फॉस्फोलिपिड की बनी होती है।

    (iii) 20 Å मोटी भीतरी सघन स्तर (Internal dense layer) – यह भी प्रोटीन की बनी होती है।

    इकाई झिल्ली संकल्पना (Unit membrane concept)

    रॉबर्ट्सन (Robertson) ने सन् 1959 में प्लाज्मा झिल्ली के बारे में जो परिकल्पना का प्रतिपादन किया, जिसे ‘इकाई झिल्ली परिकल्पना‘ कहते हैं।

    इस परिकल्पना के अनुसार, प्रोटीन-लिपिड तथा प्रोटीन की बनी त्रिस्तरीय प्लाज्मा झिल्ली को ‘इकाई झिल्ली‘ (Unit membrane) कहते हैं और प्लाज्मा झिल्ली के अलावा कोशिका के अन्दर मिलने वाली सभी झिल्लियाँ इकाई झिल्ली की ही बनी होती हैं । रॉबर्ट्सन  की परिकल्पना के अनुसार एण्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम, माइटोकॉण्ड्रिया, लाइसोसोम, गॉल्जीकाय, राइबोसोम, केन्द्रक कला (Nuclear membrane) व लवक आदि भी इसी इकाई झिल्ली के बने होते हैं। इस परिकल्पना के अनुसार, विभिन्न प्रकार के कोशिकाओं की संरचना प्लाज्मा झिल्ली या इकाई झिल्ली के द्वारा होती है।

    फ्ल्यूइड मोजैक मॉडल (Fluid Mosaic Model)

    सिंगर एवं निकोलसन (1972) ने तरल मोजैक मॉडल प्रस्तुत किया इसके अनुसार, कोशिका कला में दो प्रकार की प्रोटीन (परिधीय अथवा बाह्य तथा समाकल या आन्तरिक), ग्लाइकोप्रोटीन तथा ग्लाइकोलिपिड होते हैं। सर्वप्रथम प्लाज्मा झिल्ली की त्रिस्तरीय संरचना के बारे में डेनियली तथा डेवसन (Danielli and Davson) ने सन् 1935 में बताया। इसके बाद हार्वे तथा डेनियली ने इसकी रचना का एक कल्पित चित्र बनाया।

    कोशिका कला या प्लाज्मा झिल्ली के कार्य (Functions cell membrane or plasma
    membrane)

    कोशिका झिल्ली लचीली होती है और कार्बनिक अणुओं; जैसे-ग्लाइकोप्रोटीन तथा ग्लाइकोलिपिड की बनी होती है।

    कोशिका झिल्ली का लचीलापन एककोशिकीय जीवों में कोशिका के बाह्य वातावरण से भोजन तथा अन्य पदार्थ ग्रहण करने में सहायता करता है। इस प्रक्रिया को एण्डोसाइटोसिस कहते हैं। अमीबा इसी प्रक्रिया द्वारा भोजन ग्रहण करता है।

    पारगम्यता (Permeability)

    कोशिका कला पतली, लचीली झिल्ली होती है, जो आवश्यक पदार्थों को कोशिका के अन्दर व बाहर आने-जाने देती है। कोशिका कला की इस प्रवृत्ति को पारगम्यता (Permeability) कहते है। पारगम्यता के आधार पर कोशिका कला के अलग अलग प्रकार होते है  –

    ऐसी कोशिका कला जो किसी भी पदार्थ को आर-पार नहीं जाने देती, अपारगम्य होती है।

    ऐसी कोशिका कला जो कुछ चुने हुये पदार्थों को ही कोशिका के अन्दर एवं बाहर आने-जाने देती है, चयनात्मक पारगम्य कला (Selective permeable membrane) होती है। सभी कोशिका कला इस श्रेणी की ही होती है।

    ऐसी कोशिका कला जो जल को कोशिका के अन्दर एवं बाहर आने-जाने देती है, “अर्द्धपारगम्य कोशिका कला होती है।

    ऐसी कोशिका कला, जो केवल गैस पदार्थों को कोशिका के अन्दर व बाहर नहीं आने-जाने देती है, अपारगम्य कोशिका कला होती है।

    परासरण (Osmosis)

    जब कम सान्द्र एवं अधिक सान्द्र विलयनों को अर्द्धपारगम्य झिल्ली के द्वारा अलग रखा जाता है, तो जल कम सान्द्रता वाले विलयन से अधिक सान्द्रता वाले विलयनों की ओर बहता है, तो यह क्रिया परासरण (Osmosis) कहलाती है। जब जल कोशिका के अन्दर से बाहर जाता है, तो बाह्य परासरण (Exosmosis) कहलाता है। जब जल कोशिका में बाहर से अन्दर जाता है, तो अन्तःपरासरण (Endosmosis) कहलाता है

    विसरण (Diffusion)

    जब कोशिका कला के द्वारा दो अलग-अलग सान्द्रता वाले विलयन अलग होते हैं, तो कम सान्द्रता वाला विलयन अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर बहने लगता है तथा सान्द्रता समान होने पर बहना बन्द हो जाता है।

  • जंतु कोशिका और पादप कोशिका में अंतर || तुलना तथा समानता

    हम इस आर्टिकल में जानेगे में की जंतु कोशिका और पादप कोशिका में क्या अंतर है ? जंतु कोशिका किसे कहते हैं और पादप कोशिका किसे कहते हैं। इसके साथ ही हम जंतु कोशिका और पादप कोशिका में क्या अंतर है , जंतु कोशिका तथा पादप कोशिका में क्या समानता है, साथ ही जंतु कोशिका और पादप कोशिका का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे।

    जंतु कोशिका और पादप कोशिका के बीच के अंतर को जानने के लिय हम सबसे पहले कोशिका के बारे में जानेगें |

    कोशिका

    जीवों के उनके जैविक क्रियाओं में आकार प्रदान करने वाली मूलभूत इकाई को कोशिका कहा जाता है। उसका जीवन की सबसे छोटी कार्यात्मक और संरचनात्मक इकाई है।

    मुख्य रूप से दो प्रकार की कोशिकाएं होती हैं।

    1. प्रोकैरियोटिक कोशिका 2. यूकैरियोटिक कोशिका

    प्रोकैरियोटिक कोशिका

    प्रोकैरियोटिक कोशिका ऐसी कोशिका होती है जिसमें केंद्रक नहीं होता है तथा इनमें कोशिकांग भी सुविकसित नहीं होता है प्रोकरयोटिक कोशिका में कोशिका भित्ति म्यूरॉन की बनी होती है इनके गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन नहीं पाया जाता है

    उदाहरण – जीवाणु ( Bacteria ) , साइनोबैक्टीरिया अर्कीबैक्टीरिया , विषाणु ( Virus ) , बैक्टीरियोफेज , माइकोप्लाज्मा ( PPLO ) , नील हरित शैवाल ( Blue green algae ) रिकेट्सिया की कोशिकाएं आदि |

    यूकैरियोटिक कोशिका

    यूकैरियोटिक कोशिका में केंद्रक पाए जाते हैं इनमें कोशिकांग पूर्ण रूप से विकसित होता है यूकैरियोटिक कोशिका के गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन पाया जाता है तथा ये क्षारीय प्रकृति के होते हैं।

    उदाहरण – सभी जन्तु कोशिका , प्रोटोजोआ , जीव, पादप कोशिका, जन्तु आदि।

    यूकैरियोटिक कोशिका दो प्रकार की होती है।

    जन्तु कोशिका

    पादप कोशिका।

    मूल रूप से जो कोशिका जंतुओं में पाई जाती हैं उसे जंतु कोशिका कहते हैं |

    जो कोशिकाएं पोधों में पाई जाती है उन्हें पादप कोशिका कहते है |

    जन्तु  एवं पादप कोशिका में अन्तर (Difference between Plant and Animal cell)

    जन्तु कोशिकापादप कोशिका
    कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है।कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता हैबड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं।
    लवक नहीं पाए जाते हैं।लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)।
    अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं।अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं।
    लाइसोसोम पाए जाते हैं।अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।
  • कोशिका संरचना और कार्य || कोशिका के प्रकार

    कोशिका जीवों की संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई है, 1665 में इसकी खोज रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने की थी |

    एक ही कोशिका से बने जीवों, जैसे- जीवाणु, प्रोटोज़ोआ और यीस्ट्स, आदि को एककोशिकीय प्राणी (Unicellular Organisms) और एक से अधिक कोशिका से बने जटिल जीवों को बहुकोशिकीय जीव (Multicellular Organisms) कहा जाता है |

    सभी प्रकार की कोशिकाएँ कोशिका झिल्ली तथा जीवद्रव्य से बनी होती हैं। कोशिका झिल्ली कोशिका का बाहरी आवरण बनाती है तथा उसके भीतर के पदार्थ को जीवद्रव्य कहा जाता है। 1932 में जर्मनी के दो वैज्ञानिकों नॉल और रस्का ने इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार किया। इस सूक्ष्मदर्शी की सहायता से वस्तु अपने आकार से एक लाख गुना बड़ी दिखाई पड़ती है।

    पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों को दो वर्गों में बाँटा गया है :

    1. अकोशिकीय जीव अर्थात् ऐसे जीव जिनमें कोई कोशिका नहीं पाई जाती है, जैसे- विषाणु (Virus) जीवाणु, प्रोटोज़ोआ आदि |

    2. कोशिकीय जीव अर्थात् ऐसे जीव जिनमें एक या एक से अधिक कोशिकाएं पाई जाती हैं | कोशिकीय प्राणियों को पुनः प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक नामक दो भागों में बाँटा जाता है|

    A. प्रोकैरियोटिक जीव

    B. यूकैरियोटिक जीव

    कोशिका के प्रकार

    इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा हमें कोशिकाओं के अनेक घटक दिखाई देते हैं, जो इस प्रकार हैं :

    (a) कोशिका कला

    (b) कोशिकाद्रव्य

    (c) कोशिकांग

    (d) केन्द्रक

    कोशिका की संरचना

    सभी कोशिकाओं में तीन कार्यात्मक क्षेत्र (Functional Region) होते है जो इस प्रकार है:

    1. कोशिका या प्लाज्मा झिल्ली (Cell or Plasma Membrane) और कोशिका भित्ति (Cell Wall)

    2. केन्द्रक/न्यूक्लियस (Nucleus)

    3. केन्द्रक द्रव्य/साइटोप्लाज्म (Cytoplasm)

    कोशिका की बाहरी सतह प्लाज्मा झिल्ली होती है, जिसके अन्दर केन्द्रक द्रव्य/साइटोप्लाज्म पाया जाता है |

    माइटोकांड्रिया (Mitochondria), क्लोरोप्लास्ट (Chloroplasts) आदि विभिन्न कोशिकांग साइटोप्लाज्म में ही तैरते हुए पाए जाते हैं |

    प्लाज्मा झिल्ली के मुख्य कार्य

    प्लाज्मा झिल्ली कुछ पदार्थों के कोशिका के अन्दर और बाहर जाने पर नियंत्रण रखती है | अतः प्लाज्मा झिल्ली को चयनात्मक पारगम्य झिल्ली (Selective Permeable Membrane) भी कहते हैं |

    (i) प्रसरण (Diffusion) : अधिक सघन (Condense) पदार्थ से कम सघन पदार्थ की ओर प्रवाह प्रसरण कहलाता है| यह प्रवाह तब तक होता रहता है जब तक दोनों पदार्थों की सघनता समान न हो जाये| प्रसरण की दर गैसीय पदार्थों में द्रव व तरल पदार्थों की तुलना में अधिक होती है |

    (j) परासरण (Osmosis) : आंशिक रूप से पारगम्य (Permeable) झिल्ली के सहारे उच्च जलीय सांद्रता (Concentration) वाले भाग से निम्न जलीय सांद्रता वाले भाग की ओर जल का प्रवाह परासरण कहलाता है |

    (k) एंडोसाइटोसिस (Endocytosis) : प्लाज्मा झिल्ली के सहारे कोशिका द्वारा पदार्थों का अंतर्ग्रहण (Ingestion) एंडोसाइटोसिस कहलाता है | (l) एक्सोसाइटोसिस (Exocytosis) : इस प्रक्रिया में पुटिका (Vesicle) झिल्ली प्लाज्मा झिल्ली से टकराकर अपने पदार्थों को आस-पास के माध्यम में निकाल देती है | इसे ‘कोशिका वमन (Cell Vomiting)’ कहते हैं |

    अंग और कोशिकांग में अंतर (Difference between Organs and Cell Organelles)

    अंग (Organs)कोशिकांग (Cell Organelles)
     अंग बहुकोशिकीय जीवों में पाए जाते हैं|कोशिकांग सभी यूकैरियोटिक जीवों में पाए जाते हैं|
    इनका आकार बड़ा होता है |इनका आकार छोटा होता है |
    ये किसी भी जीव के शरीर के ऊपर या नीचे पाए जा सकते हैं |ये प्रायः आतंरिक (Internal) होते हैं |
    अंगों का निर्माण ऊतकों (Tissues) से होता है और ऊतकों का निर्माण कोशिकाओं से होता है | कोशिका के अन्दर ही कोशिकांग पाए जाते हैं |इनका निर्माण सूक्ष्म और वृहद् अणुओं (Molecules) से होता है |
    अंग आपस में मिलकर अंग-प्रणाली का निर्माण करते हैं और अंग प्रणाली किसी जीव के शरीर का निर्माण करती है |कोशिकांग आपस में मिलकर कोशिका का निर्माण करते हैं |
  • कोष्ठीकरण (Compartmentalisation) क्या है ? कोशिका का कोष्ठीकरण क्या होता है ?

    कोशिका में कोष्ठीकरण का आशय उस संगठन से है, जिसमें यूकैरियोटिक कोशिका के अन्तर्गत विभिन्न कोशिकांग अर्थात् माइटोकॉण्ड्रिया, लाइसोसोम आदि अंग प्लाज्मा झिल्ली द्वारा घिरे होते हैं, इसी को कोशिका का कोष्ठीकरण कहते हैं।

    कोशिकीय जीवन के लिए कोष्ठीकरण की आवश्यकता

    कोशिकीय जीवन के लिए कोष्ठीकरण बहुत आवश्यक है। प्लाज्मा, झिल्लीयुक्त कोशिका कोष्ठक के रूप में होती है। पादप कोशिका में प्लाज्मा झिल्ली के चारों ओर सैल्यूलोज भित्ती होती है। यूकैरिआटिक कोशिका में बहुत से झिल्लीयुक्त अंगक अर्थात् कोष्ठक होते हैं। प्रत्येक अंगक की रचना तथा कार्य विशिष्ट होते हैं। प्रोकैरिआटिक कोशिकाओं में अन्त:कोष्ठक नहीं होते हैं।

  • प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिका में क्या अन्तर है ?

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)और यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell) क्या है और किस तरह एक दुसरे से भिन्न है | प्रोकैरियोटिक कोशिका और यूकैरियोटिक कोशिका के बीच क्या अंतर है और इनकी विशेषताएँ क्या है |

    प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell) क्या है ?

    इस प्रकार की कोशिकाओं में केन्द्रक कला नहीं होती है। इस प्रकार केन्द्रकीय पदार्थ कोशिकाद्रव्य में बिखरा होता है। गुणसूत्र के स्थान पर हिस्टोन प्रोटीन रहित DNA के धागे होते हैं। ऐसी कोशिकाओं में पूर्ण रूप से विकसित कोशिकांगों का अभाव रहता है। ये कोशिकाएँ अर्थात् वास्तविक केन्द्रक रहित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ नीले-हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा और जीवाणु में पाई जाती हैं।

    यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell) क्या है ?

    इस प्रकार की कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्रक अर्थात् केन्द्रक कला और केन्द्रिका युक्त तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं। इस प्रकार की कोशिकाओं के गुणसूत्र में DNA तथा हिस्टोन प्रोटीन से बनी इकाई न्यूक्लिओसोम पाई जाती हैं। ये कोशिका अर्थात् वास्तविक केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिकांश शैवाल, उच्च पादप एवं जन्तुओं में पाई जाती हैं।

    प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिका में अन्तर (Difference between Prokaryotic and Eukaryotic Cell)

    प्रोकैरियोटिक कोशिकायूकैरियोटिक कोशिका
    इनमें प्रारम्भी अविकसित केन्द्रक होता है।इनमें पूर्ण विकसित केन्द्रक होता है।
    ये आदिम (primitive) कोशिकाएं हैं।ये सुविकसित कोशिकाएँ हैं। 
    कोशिकाद्रव्य पूर्ण कोशिका में फैला रहता है।केन्द्रक एवं कोशिका कला के बीच सीमित रहता है।
    केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका अनुपस्थित होती है।केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका उपस्थित होती हैं।
    DNA हिस्टोन प्रोटीन रहित होता है।DNA के साथ हिस्टोन प्रोटीन जुड़ी होती है। 
    गॉल्जी तन्त्र, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, लवक तथा माइटोकॉण्ड्रिया अनुपस्थित होते हैं।उपस्थित होते हैं (लवक केवल पादप कोशिका में)।
    श्वसन तन्त्र जीवद्रव्व कला में उपस्थित होता है।श्वसन तन्त्र माइटोकॉण्ड्रिया में उपस्थित होता है।
    प्रकाश-संश्लेषण क्रोमेटोफोर में होता है।प्रकाश-संश्लेषण पादप कोशिका के हरितलवक में होता है।
    राइबोसोम 70 S प्रकार के होते हैं।राइबोसोम 70 S या 80S प्रकार के होते हैं।
    कशामिका में सूक्ष्म तन्तुओं की (9+2) व्यवस्था नहीं होती।कशामिका में सूक्ष्म नलिकाओं की (9+2) व्यवस्था होती है। 
    रिक्तिका अनुपस्थित होती हैं।रिक्तिका उपस्थित होती है।
    लयनकाय या लाइसोसोम अनुपस्थित होते हैं।लयनकाय या लाइसोसोम जन्तु कोशिका में उपस्थित होते हैं।
    सूत्री कोशिका विभाजन (mitosis) नहीं होता।सूत्री कोशिका विभाजन होता है।
    कोशिका भित्ति पतली होती है।इनमें कोशिका भित्ति मोटी होती है | 
  • कोशिका (Cell) क्या है ? कोशिका के प्रकार और विशेषताएँ (Koshika – Sampurn Jankari Hindi me)

    प्रत्येक जीव का जीवन एक कोशिका से आरम्भ होता है | यदि वह इसी एक कोशिका के सहारे अपने जीवन को चलाता रहता है तो उसे एककोशिकीय जीव (Unicellular) जीव कहा जाता है, परन्तु अधिकांश जीवों में यह कोशिका विभाजन करती है और अंत में बहुकोशिकीय जीव बन जाता है | कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है |

    • ‘कोशिका’ का अंग्रेजी शब्द सेल (Cell) लैटिन भाषा के ‘शेलुला’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ ‘एक छोटा कमरा’ है। कुछ सजीव जैसे जीवाणुओं के शरीर एक ही कोशिका से बने होते हैं, उन्हें एककोशकीय जीव कहते हैं जबकि कुछ सजीव जैसे मनुष्य का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है उन्हें बहुकोशकीय सजीव कहते हैं। कोशिका की खोज रॉबर्ट हूक ने १६६५ ई० में किया।
    • १९३९ ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।
    • सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। कोशिकाओं के भीतर ही आवश्यक आनुवांशिक सूचनाएँ होती हैं जिनसे कोशिका के कार्यों का नियंत्रण होता है तथा सूचनाएँ अगली पीढ़ी की कोशिकाओं में स्थानान्तरित होती हैं।

    कोशिका के प्रकार

    वास्तविक केन्द्रक की उपस्थिति के आधार पर कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं

    1. प्रोकैरियोटिक 2. यूकैरियोटिक

    प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ प्रायः स्वतंत्र होती हैं जबकि यूकैरियोटिक कोशिकाएँ, बहुकोशीय प्राणियों में पायी जाती हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिका में कोई स्पष्ट केन्द्रक नहीं होता है। केन्द्रकीय पदार्थ कोशिका द्रव में बिखरे होते हैं। इस प्रकार की कोशिका जीवाणु तथा नीली हरी शैवाल में पायी जाती है। सभी उच्च श्रेणी के पौधों और जन्तुओं में यूकैरियोटिक प्रकार की कोशिका पाई जाती है। सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओ में संगठित केन्द्रक पाया जाता है जो एक आवरण से ढका होता है।

  • Antioxidants हमें स्वस्थ रहने में कैसे मदद करते हैं ?

    Antioxidants हमें स्वस्थ रहने में कैसे मदद करते हैं ?

    आहार में नियमित रूप से ताजे फल और सब्जियां ग्रहण करना वांछनीय है क्योंकि एक ऑक्सीकरण रोधी अच्छे स्रोत होते हैं | ऑक्सीकरण रोधी तत्व व्यक्ति के स्वस्थ बने रहने और दीर्घायु होने में सहायक सिद्ध होते हैं | क्योंकि यह शरीर में चयापचय के उपोत्पाद के रूप में उत्पन्न मुक्त मूलकों को निष्क्रिय बनाते हैं |

    ऑक्सीकरण एक रासायनिक अभिक्रिया है जिसमें इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण किसी पदार्थ से ऑक्सीकारक एजेंट में होता है |

    ऑक्सीकरण अभिक्रिया के परिणाम स्वरूप मुक्त मूलक उत्पन्न हो सकते जिनके द्वारा कोशिकाओं को क्षति पहुंचाने वाली श्रंखला अभिक्रिया आरंभ हो सकती है |

  • जन्तु जगत (एनिमेलिया) Animal kingdom क्या है ? जन्तु जगत का वर्गीकरण (Taxonomy of Animal Kingdom)

    जन्तु जगत (एनिमेलिया) Animal kingdom क्या है ? जन्तु जगत का वर्गीकरण (Taxonomy of Animal Kingdom)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि जंतु जगत (Jantu Jagat) क्या है और जंतु जगत (एनिमल किंगडम) का वर्गीकरण किस प्रकार है ?

    जंतु जगत (Animal kingdom)

    जन्तु जगत के अन्तर्गत सभी प्रकार के यूकैरियोटिक बहुकोशिकीय तथा विषमपोषी (जो पोषण के लिए प्रत्यक्ष रूप से दूसरे जीवों पर निर्भर हो) जीव आते हैं।  यह यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय, विषमपोषी प्राणियों का वर्ग है जिसमे कोशिका भित्ति रहित कोशिकाओं से बना है।

    ये अधिकांशतया भोजन का अन्तर्ग्रहण करते हैं तथा आन्तरिक गुहा में इसका पाचन होता है। प्रोटोजोआ तथा पोरोफेरा को छोड़कर सभी में तन्त्रिका तन्त्र पाया जाता है। जन्तु जगत के अन्तर्गत विशिष्ट संघ आते हैं |

    चुकीं इन प्राणियों की संरचना एवं आकार में विभिन्नता होते हुए भी उनकी कोशिका व्यवस्था, शारीरिक सममिति, पाचन तंत्र, परिसंचरण तंत्र एवं जनन तंत्र की रचना में कुछ आधारभूत समानताएँ पाई जाती हैं। इन्हीं विशेषताओं को वर्गीकरण का आधार बनाया गया है।

    जंतु जगत का वर्गीकरण

    जंतु जगत का वर्गीकरण निम्न प्रकार से है :

    प्रोटोजोआ (Protozoa)

    प्रोटोजोआ का सर्वप्रथम अध्ययन ल्यूवेनहॉक ने किया तथा गोल्डफस ने इस संघ को प्रोटोजोआ नाम दिया। प्रोटोजोआ को सामान्यतया प्रोटिस्टा जगत के अर्न्तगत रखा जाता है। यह एककोशिकीय सूक्ष्मजीव है। इसकी सभी क्रियाएँ कोशिका के अन्तर्गत घटित होती हैं; जैसे-अमीबा, सारकोडिना आदि।

    इसके अन्तर्गत फ्लेजैलायुक्त यूमेस्टिजिना भी आते हैं, जिसकी अनेक जातियाँ पादपों तथा जन्तुओं पर परजीवी के रूप में रहती हैं। तथापि कई वर्गीकरणों में प्रोटोजोआ को अन्य एककोशिकीय जीवों के साथ प्रोटिस्टा जगत में रखा जाता है।

    अमीबा (Amoeba)

    अमीबा की खोज रसेल वॉन रोजेनहॉफ ने 1755 में की। इसका शरीर प्लाज्मालेमा से ढका होता है। यह प्लाज्मालेमा श्वसन और उत्सर्जन दोनों का कार्य करती है। अमीबा कूटपादों (pseudopodia) द्वारा गमन करता है। अमीबा में परासरण संकुचनशील रिक्तिका द्वारा होता है। इसके शरीर में कंकाल नहीं होता है।

    अमीबा में प्राणिसमभोजी पोषण की विधि महत्त्वपूर्ण होती है। इसमें अलैंगिक जनन द्विखण्डन विधि द्वारा होता है। साथ ही भक्षकाणु क्रिया (invagination) की विधि द्वारा भोजन ग्रहण करता है।

    प्लाज्मोडियम (Plasmodium): मलेरिया परजीवी

    यह मलेरिया फैलाने वाला अन्त:परजीवी है। यह दो पोषकों (digenetic) में अपना पूरा जीवन चक्र सम्पन्न करता है-प्रथम मनुष्य व दूसरा मादा एनॉफिलीज मच्छर। प्लाज्मोडियम का अलैंगिक जीवन मनुष्य में तथा लैंगिक जीवन मच्छर में घटित होता है।

    मनुष्य में पूरा होने वाला जीवन चक्र शाइजोगोनी तथा मच्छर में पूरा होने वाला जीवन चक्र स्पोरोगोनी कहलाता है। प्रासी नामक वैज्ञानिक ने मादा एनॉफिलीज मच्छर में प्लाज्मोडियम के जीवन चक्र का वर्णन किया।

    पोरीफेरा (Porifera)

    छिद्रधारी जन्तु इस संघ के सभी जन्तु सामान्यतया खारे जल में पाए जाते हैं। इसके शरीर में कई छिद्र होते हैं और कांटे जैसे स्पिक्यूल रेशाओं का बना एक कंकाल होता है। इन्हें आमतौर पर स्पंज कहा जाता है। इसके शरीर में दो प्रकार के छिद्र ऑस्टिया और ऑस्कुलम होते हैं। स्पंज में ही केवल नाल तन्त्र (canal system) पाया जाता है।

    कंकाल कैल्शियम काबोंनेट या सिलिका नामक कार्बनिक पदार्थ का बना होता है। स्पंज के शरीर में पाए जाने वाले असंख्य छिद्र (ostia), जिसके माध्यम से जल तथा जल के साथ ऑक्सीजन व भोजन शरीर में पहुँचती है। स्पंज अमोनिया उत्सर्जी पदार्थ होता है। कीप कोशिकाएँ (collar cell) स्पंजों का एक विशिष्ट गुण हैं।

    सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata)

    इस वर्ग के सभी प्राणी जलीय होते है, जो मुख्य रूप से समुद्री जल में तथा कुछ, जैसे-हाइड्रा मीठे जल में पाए जाते है। इस वर्ग के सभी प्राणी द्विस्तरीय तथा बहुकोशिकीय होते हैं, जिसमें बाहरी स्तर एपीडमिंस तथा भीतरी स्तर गैस्ट्रोडर्मिस के बीच मीसोग्लिया नामक जैली स्तर पाया जाता है। इसमें लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों प्रकार का जनन होता है। अलैंगिक जनन मुकुलन (budding) द्वारा होता है।

    इसकी मेड्यूसा अवस्था में केवल लैंगिक जनन होता है। इसकी देहगुहा को सीलेन्ट्रॉन कहते हैं तथा इसी के द्वारा भोजन प्राप्त करना तथा अपच भोजन बाहर निकलने की क्रिया सम्पन्न होती है। संघ-सीलेन्ट्रेटा का मुख्य सदस्य हाइड्रा, जेलीफिश आदि हैं।

    हाइड्रा (Hydra)

    हाइड्रा की खोज ल्यूवेनहॉक ने की थी। यह मीठे जल में पाया जाता है, जबकि इस वर्ग के अधिकांश जीव समुद्री लवणीय जल में पाए जाते हैं। इसके शरीर की सममिति अरीय (radial symmetry) होती है। इसकी देह भित्ति द्विजन स्तरी (diploblastic) होती है। बाहरी भाग में घनाकार कोशिकाओं के बने अधिचर्म में उपकला पेशी कोशिकाएँ, संवेदी, तत्रिका, जनन तथा दंश कोशिकाएँ होती हैं।

    हाइड्रा सबसे छोटा पॉलिप होता है। हाइड्रा विरडिस्सिमा हरे रंग का तथा हाइड्रा ओलाइगैक्टिस भूरे रंग का होता है। इसके शरीर पर उपस्थित स्पर्शक चलन, भोजन ग्रहण एवं सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसकी देह गुहा सीलेन्ट्रॉन कहलाती है तथा इसमें गुही नहीं होती है। हाइड्रा में पुनरुद्भवन (regeneration) की अपार क्षमता होती है।

    प्लेटिहेल्मिन्थीज (Platyhelminthes): फीताकृमि

    ये परजीवी तथा स्वतन्त्रजीवी दोनों प्रकार के होते हैं। इसके तीन वर्ग टवेलेरिया, टमेंटोडा तथा सेस्टोडा हैं वे सामान्यतया फीते के समान चपटे अथवा पत्ती के समान आकृति के द्विपार्श्व सममिति (bilaterally symmetrical) तथा त्रिस्तरीय जन्तु है। श्वसन अधिकांशतया अवायवीय (anaerobic) होता है तथा उत्सर्जन हेतु ज्वाला कोशिकाएँ होती हैं इस वर्ग के जीव उभयलिंगी होते हैं अर्थात् एक ही जीव में नर तथा मादा जननांग पाए जाते हैं। इस संघ के अन्तर्गत प्लेनेरिया, टीनिया सोलियम जैसे कोड़े के समान अखण्डित जन्तु आते हैं तथा अधिकांशतया परजीवी होते हैं।

    एस्केल्मिन्थीज (Aschelminthes): गोलकृमि

    इनका शरीर गोल होता है। इसके अन्तर्गत ऐस्कैरिस, ये परजीवी तथा स्वतन्त्रजीवी दोनों प्रकार के होते हैं। हुकवर्म, फाइलेरिया कृमि, पिनकृमि, गीनिया कृमि आदि आते हैं। इसके शरीर में बहुकेन्द्रकी एपीडर्मिस (Syncytial epidermis) पाई जाती है। ये नलिका के अन्दर नलिका शरीर संरचना प्रस्तुत करते हैं।
    इसके शरीर में परिवहन अंग तथा श्वसन अंग नहीं होते हैं परन्तु तन्त्रिका तन्त्र काफी विकसित होता है। इसके शरीर में उत्सर्जन प्रोटोनेफ्रीडिया द्वारा होता है। इसमें उत्सर्जी पदार्थ यूरिया उत्सर्जी प्रकार का होता है।

    ऐकैरिस लुम्बीक्वॉएडिस

    ऐस्कैरिस अन्तःपरजीवी है, जो मनुष्य के छोटी आंत में पाया जाता है। इसमें उत्सर्जन रेनेट कोशिका द्वारा होता है। ऐस्कैरिस अमोनिया तथा यूरिया का उत्सर्जन करती है। ऐस्कैरिस द्वारा उत्पन्न रोग को ऐस्कैरिएसिस कहते हैं। ऐस्कैरिस को रोगी के आंत से निकालने हेतु चीनोपोडियम का तेल प्रयोग किया जाता है। इसमें लार ग्रन्थियाँ नहीं पाई जाती हैं।

    एनीलिडा (Annelida)

    खण्डित जन्तु ये स्वतन्त्र जीवी कृमि सदृश जीव होते हैं, जिसका शरीर मुलायम, गोल तथा खण्डित होता है। इसके अन्तर्गत केंचुआ, जोंक, समुद्री चूहा आदि जीव आते हैं।

    आर्थोपोडा (Arthropoda) (संयुक्त पाद प्राणी)

    अप-आर्थोपोडा प्राणी संसार का सबसे बड़ा वर्ग माना जाता है। आपापोडा संघ के जन्तुओं की सबसे अधिक संख्या कीट वर्ग में है। ‘आर्थोपोडा’ शब्द का अर्थ होता है-संयुक्त उपांग (Arthron = Joint; podes Front)। इस संघ के जन्तुओं में चलन एवं कुछ अन्य कायों के लिए जोड़ीदार, दृढ़ एवं पाश्चीय संयुक्त उपांग होते हैं। ये जन्तु बहुकोशिकीय, द्विपार्थ सममित तथा खण्डयुक्त शरीर वाले हैं। शरीर तीन भागों सिर, वक्ष और उदर में बँटा होता है। इसमें काश्टीन युक्त बाह्य कंकाल होता इसके पाद सन्धियुक्त होते हैं। इसकी देहगुहा हीमोसील क्यूटिकल का बन कहलाती है।
    इस वर्ग के अन्तर्गत तिलचट्टा, झींगा मछली, केकड़ा, खटमल, मकड़ी, मच्छर, मक्खी, टिड्डी, मधुमक्खी आदि आते हैं।

    मोलस्का (Mollusca) (कोमल शरीर युक्त प्राणी)

    मोलस्का नॉन-कॉडेटा का दूसरा सबसे बड़ा संघ है। यह मीठे समुद्री जल तथा स्थल पर पाए जाते हैं। इसका शरीर कोमल, अखण्डित तथा उपांगरहित एवं त्रिस्तरीय होता है। शरीर त्वचा की एक तह से ढका रहता है, जिसे मैण्टल कहा जाता है। इनमें एक अधर पेशी अंग होता है, जिसे पाद कहते हैं, जिसकी सहायता से चलन कार्य सम्पन्न होता है। ये एकलिंगी होते हैं। इसमें उत्सर्जन मेटानेफ्रिडिया के द्वारा, जबकि श्वसन क्लोन, टिनिडिया या फेफड़ों द्वारा होता है। उदाहरण ऑक्टोपस (डेविलफिश), (कटलफिश), सिप्रिया (कौड़ी)।

    इकाइनोडर्मेटा (Echinodermata)

    इस संघ के सभी सदस्य समुद्री होते हैं। इसके अन्तर्गत कांटेदार त्वचा वाले प्राणी आते हैं। इसमें अनेक तन्तु सदृश मुलायम संरचनाएँ होती हैं, जिसे ट्यूब फीट कहते हैं। इसी के माध्यम से ये चलन करते हैं। इकाइनोडर्म त्रिजनस्तरीय जन्तु है, जिसमें पंचकोणीय अरीय सममिति है परन्तु लार्वा अवस्था में द्विपार्श्व सममिति होती है। जल संवहन तन्त्र की उपस्थिति इसका विशिष्ट लक्षण है। इसके अन्तर्गत स्टारफिश, समुद्री आर्चिन, समुद्री खीरा तथा ब्रिटील स्टार आदि जीव आते हैं।

    कॉर्डेटा (Chordata)

    इस संघ के अन्तर्गत वे प्राणी आते हैं, जिसमें नोटोकॉर्ड के साथ-साथ पृष्ठ नालाकार तन्त्रिका तन्त्र और ग्रसनीय क्लोम दरारें पाई जाती हैं।

    मत्स्य (Pisces) वर्ग

    इसका हृदय द्वि-कोष्ठीय तथा शिरीय होता है हृदय में केवल अशुद्ध रुधिर ही बहता है। श्वसन की क्रिया गिल्स द्वारा होती है।

    एम्फीबिया (Amphibia): उभयचर

    यह जल और थल दोनों में पाए जाते हैं; जैसे-मेंढक लार्वा अवस्था (टैडपोल) में जलीय तथा परिपक्व होकर स्थल पर अनुकूलित हो जाते हैं। जलीय से थलीय होने पर इसमें पूँछ समाप्त हो जाती है औरहोने लगता है।

    सरीसृप (Reptilia) वर्ग

    ये थल पर रेंगकर चलने वाले प्राणी हैं। मीसोजोइक युग को सरीसृपों का युग कहा जाता है। चूँकि इस युग में डायनासोर तथा अन्य सरीसृप काफी प्रभावशाली थे। इस वर्ग के अन्तर्गत रेंगने वाले तथा बिल में रहने वाले, शीत रुधिरतापी (cold-blooded) तथा एपिडर्मल शल्क वाले जन्तु आते हैं। इसके हृदय में तीन कोष्ठ होता है परन्तु मगरमच्छ और घड़ियाल में चार-कोष्ठीय हृदय होते हैं। सर्पो एवं मगरमच्छ में मूत्राशय नहीं पाया जाता है। इसमें निषेचन आन्तरिक होता है तथा ये अधिकतर अण्डज (oviparous) होते हैं। इसके अण्डे कैल्सियम कार्बोनेट की बनी कवच से ढके रहते हैं। इस वर्ग के अन्तर्गत छिपकली, सांप, कछुआ, घड़ियाल, मगरमच्छ आदि जीव आते हैं।

    पक्षी (Aves) वर्ग

    इसके अन्तर्गत पक्षी तथा द्विपाद पंखयुक्त प्राणी आते हैं, जो ऊष्म रुधिरीय कशेरुकी हैं। इनकी अग्रभुजाएँ परों (wings) में परिणत हो जाती हैं। इसमें दाँत का अभाव होता है। पक्षियों के शरीर के सभी अंग उड़ने के लिए अनुकूलित होते हैं, जैसे-पंख का दण्ड खोखला होता है, पूंछ में हड्डियों का अभाव होता है। सुदृढ़ वक्ष मांसपेशी उड़ने के लिए आवश्यक दृढ़ता प्रदान करता है। इसके आहारनाल में दो अतिरिक्त कोष्ठक होते हैं, जिसमें से एक क्रॉप भोजन संचय करता है तथा गिजार्ड इसे पीसने का कार्य करता है। इसका हृदय चार कोष्ठीय होता है दो अलिंद तथा दो निलय। ये समतापी होते हैं।

    स्तनधारी (Mammalia) वर्ग

    सीनोजोइक काल को स्तनधारियों का युग कहा जाता है। ‘स्तनधारी’ शब्द का अर्थ होता है स्तन ग्रंथियाँ वाले जन्तु, जो अपने बच्चों को दूध पिलाती है। स्तनी वर्ग के सभी प्राणी अधिक विकसित और समतापी होते हैं। इस वर्ग के अन्तर्गत आने वाले प्राणी के दाँत जीवन में दो बार निकलते हैं।

    स्तनधारी तीन प्रकार के होते है
    (i) प्रोटोथीरिया – अण्डे देते हैं। उदाहरण एकिडना
    (ii) मेटाथीरिया – अपरिपक्व बच्चे देते हैं। उदाहरण कंगारू
    (iii) यूथीरिया – पूर्ण विकसित शिशुओं को जन्म देते हैं। उदाहरण मनुष्य

  • अनावृतबीजी (Gymnosperms) एवं आवृतबीजी (Angiosperm) क्या है ? अनावृतबीजी एवं आवृतबीजी पोधों के बीच अंतर, लक्षण, विशेषताएँ और महत्त्व क्या है ?

    अनावृतबीजी (Gymnosperms) एवं आवृतबीजी (Angiosperm) क्या है ? अनावृतबीजी एवं आवृतबीजी पोधों के बीच अंतर, लक्षण, विशेषताएँ और महत्त्व क्या है ?

    इस आर्टिकल में हम जानेगें: अनावृतबीजी (Gymnosperms – जिम्नोस्पर्म) पोधे क्या होते है ?, अनावृतबीजी पोधों की विशेषताएँ, लक्षण और उदहारण क्या है ?, अनावृतबीजी पोधों का आर्थिक महत्त्व  क्या है ?, आवृतबीजी (Angiosperm – एंजियोस्पर्म) पोधे क्या होते है ?, आवृतबीजी पोधों की विशेषताएँ, लक्षण और उदाहरण क्या है ? आवृतबीजी पोधों का आर्थिक महत्त्व  क्या है ? और अनावृतबीजी और आवृतबीजी पोधों के अंतर क्या है ?

    अनावृतबीजी और आवृतबीजी पौधों की दो मुख्य श्रेणियां हैं। दोनों बीज वाले (seed bearing) पौधे हैं जिनमें कुछ समानताएं हैं। अनावृतबीजी आवृतबीजी विकसित होने के 200 मिलियन से अधिक वर्षों से पहले ही पृथ्बी पर इनकी उपस्थिती थी l इन दोनों के बीच मुख्य अंतर इनकी विविधता (diversity) है। 

    अनावृतबीजी (Gymnosperms – जिम्नोस्पर्म) पोधे क्या होते है ?

    अनावृतबीजी समूह के पौधों में बीज किसी प्रकार की संरचना से ढके हुए नहीं होते हैं अर्थात् बीज नग्न (खुला हुआ एवं अण्डाशय का अभाव) होता है। जैसा कि नाम से पता चलता है कि अनावृतबीजी पादप जगत के संवहनी पौधे हैं जो नग्न बीज धारण करते हैं। इनकी बहुत ही कम प्रजाति पृथ्वी पर पाई जाती है इसका मुख्य कारण इनके बीजों के संरक्षण का अभाव है। बीज निकलने पर वो खुले और असुरक्षित होते हैं। इन बीजों को जल्दी से जमीन में उतर कर पनपने की आवश्यकता होती है ताकि ख़राब मौसम, जानवरों या अन्य कारणों से इनको क्षति न पहुचे l

    अनावृतबीजी पोधों की विशेषताएँ और लक्षण

    यह पौधा सदाबहार, काष्ठीय तथा लम्बा होता है। ये मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं, जिनमें रन्ध्र पत्ती में घुसे होते हैं तथा बाह्य त्वचा पर क्यूटिकल की पर्त चढ़ी होती है। अनावृतबीजी के अन्तर्गत शंकुधारी पौधे रखे गये हैं, जिसमें चीड़, फर, स्पूस आदि आते हैं।

    भारत में विशेषकर मैदानी भागों में साइकेड नामक पौधे पाए जाते हैं। इस वर्ग के पौधे काष्ठीय, लम्बे एवं बहुवर्षीय होते हैं। इसमें वायु परागण होता है तथा बहुभ्रूणता पाई जाती है, जिसमें मूलांकुर तथा प्राकुंर (plumule) के साथ ही एक या एक से अधिक बीजपत्र बनते हैं।

    अनावृतबीजी पोधों के उदाहरण

    जिम्नोस्पर्म की बहुत कम प्रजातियाँ हैं, इन पौधों के कुछ उदाहरण सरू (cypress), गनेटम (Gnetum), पाइन (pine), स्प्रूस (spruce), रेडवुड (redwood), जिन्कगो (Ginkgo), साइकैड्स (Cycads), जुनिपर (Juniper), फ़िर (Fir) और वेलवित्चिया (Welwitschia) हैं।

    अनावृतबीजी पोधों का आर्थिक महत्त्व

    • साइकस के तनों से मण्ड निकालकर खाने वाला साबूदाना बनाया जाता है। इसलिए साइकस को सागोपाम भी कहा जाता है।
    • चीड़ के पेड़ से तारपीन का तेल, देवदार की लकड़ी से सिड्रस का तेल तथा जूनीपेरस की लकड़ी से सिड्रस काष्ठ तेल का उत्पादन होता है।
    • जूनीपेरस की लकड़ी का उपयोग पेन्सिल तथा पैन होल्डर बनाने में होता है। एबीज तथा पीसिया की लकड़ी को माचिस की डिब्बियाँ तथा उसके काष्ठ लुग्दी से कागज तैयार किया जाता है। 3
    • चीड़ के पेड़ से रेजिन का उत्पादन होता है।
    • इफेड्रीन दवा, जो इफेड्रा से प्राप्त होता है, का उपयोग दमा की बीमारियों के इलाज हेतु किया जाता है।

    आवृतबीजी (Angiosperm – एंजियोस्पर्म) क्या है

    जैसा कि नाम से पता चलता है, आवृतबीजी संवहनी पौधे हैं, जो फलों या परिपक्व अंडाशय में बीज देते हैं। आवृतबीजी फूल बनाता है जो प्रजनन अंगों और फलों (reproductive organs and fruits ) को carry करता है । ये पौधे स्थलीय आवास के लिए अधिक अनुकूल हैं और इनका बहुत व्यापक रुप से फैले हुए है, अभी तक इनकी लगभग 250000 प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है

    आवृतबीजी पोधों की विशेषताएँ और लक्षण

    ये पुष्प युक्त पौधे होते हैं, जिसमें बीज सदैव फलों के अन्दर होता है। इस वर्ग के पौधों में जड़, तना, पत्ती, फूल और फल लगते हैं। ये शाक, झाड़िया या वृक्ष तीनों ही रूप में मिलते हैं। आवृतबीजी में परागकण तथा बीजाण्ड विशिष्ट रचना के रूप में विकसित होते हैं, जिन्हें पुष्प कहा जाता है, जबकि अनावृतबीजी में बीजाण्ड अनावृत होते हैं।

    आवृतबीजी पोधों के उदाहरण

    आम, सेब, केला, आड़ू, चेरी, नारंगी और नाशपाती सहित फलों के पेड़ अक्सर फल देने से पहले फूल दिखाते हैं और परागण प्रक्रिया आमतौर पर मधुमक्खियों के जरिये संपन्न करते है । चावल, मक्का और गेहूं सहित अनाज भी एंजियोस्पर्म के उदाहरण हैं। इन पौधों में परागण प्रक्रिया पवन द्वारा की जाती है। एंजियोस्पर्म के अन्य उदाहरणों में गुलाब, लिली, ब्रोकोली, केल, पेटुनीया, बैंगन, टमाटर, मिर्च और गन्ना शामिल हैं।

    आवृतबीजी पोधों के प्रकार

    आवृतबीजी को दो वर्गों एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में बाँटा गया है।

    एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधों में अन्तर

    एकबीजपत्रीद्विबीजपत्री
    बीज में बीजपत्रों की संख्या एक होती है।इसमें दो बीजपत्र होते हैं।
    पुष्प प्रायः त्रितयी (timerous) अर्थात् पुष्पांग प्रायः तीन के जोड़े में होते हैं।पुष्प प्रायः चतुर्तयी एवं पंचतयी होती हैं अर्थात् इसमें पुष्पांग 4 – 5 के जोड़े होता है।
    प्रायः अपस्थानिक जड़ें तथा इनमें संवहन पूल प्राय 8-32 होती हैं।इसमें प्रायः मूसला जड़ें तथा इनमें संवहन पूल 2-6 होती हैं। 
    तने में संवहन पूल (vascular bundles) बिखरे हुए होते हैं।इसमें संवहन पूल घेरे में व्यवस्थित होती है तथा संवहन पूलों में कैम्बियम की पट्टी उपस्थित होती है।
    पत्तियों में शिराएँ एक-दूसरे के समानान्तर होती हैं।इसमें शिरा-विन्यास जालिकावत् शिराओं का जाल होता है।

    आवृतबीजियों का आर्थिक महत्त्व

    • हेविया ब्रेसिलिएन्सिस एवं फाइकस इलास्टिका से रबर प्राप्त होती है। कोको तथा चॉकलेट थियोब्रोया कोको के बीजों से प्राप्त होती है। इलायची इलेटेरिया कोडेमोमम का फल है।
    • (Economic Importance of Angiosperms) कोयर नामक रेशा नारियल के फल की मध्यफलभित्ति से प्राप्त होता है।
    • क्रिकेट बल्ले सैलिक्स एल्बा की लकड़ी से बनाये जाते हैं।
    • हॉकी के बल्ले, टेनिस व बैडमिन्टन के रैकेट तथा क्रिकेट स्टम्प मोरस एल्वात्र लकड़ी से बनाये जाते हैं।
    • केसर क्रोकस सटाइवस के पुष्पों की वर्तिकार तथा वर्तिका से प्राप्त होती है। च्युइंगम, एक्रेस सैपोटो के दूधिया क्षीर से प्राप्त होती है।

    अनावृतबीजी और आवृतबीजी पोधों में क्या अंतर है ?  

    आवृतबीजी और अनावृतबीजी के बीच मुख्य अंतर इनकी विविधता है। आवृतबीजी की विविधता अनावृतबीजी से अधिक है। उच्च विविधता क्षमता की वजह से ही आवृतबीजी पोधें स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र की एक विस्तृत विविधता के अनुकूल हैं। आवृतबीजी की एक अन्य विशेषता फूल और फलों का उत्पादन है।

    आवृतबीजीअनावृतबीजी
    आवृतबीजी पोधों में बीज फूलों के पौधों द्वारा निर्मित होता है और एक अंडाशय के भीतर संलग्न होता हैअनावृतबीजी पोधों में बीज नग्न (खुले) एवं इनमे अण्डाशय का अभाव होता है
    इन पौधों का जीवनचक्र मौसमी (seasonal) होता हैये पौधे सदाबहार होते हैं
    इनमे ट्रिपलोइड ऊतक (triploid tissue) होते हैइनमे हैप्लोइड उत्तक होते है 
    पत्तियाँ आकार में चपटी होती हैंपत्तियां सुई के आकार की होती हैं
    यह पोधे कठोर लकड़ी के साथ होते है यह पोधे नर्म होते है 
    इनका प्रजनन जानवरों पर निर्भर रहता हैइनका प्रजनन हवा पर निर्भर करता है
    इन पोधों की प्रजनन प्रणाली Reproductive system (उभयलिंगी unisexual or bisexual) फूलों में मौजूद होती है इन पोधों की प्रजनन प्रणाली Reproductive system शंकु (corn) में मौजूद होती है और उभयलिंगी प्रकार की होती हैं
  • टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) के प्रकार, मुख्य लक्षण, विशेषताएं और गुण (in Hindi)

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) के प्रकार, मुख्य लक्षण, विशेषताएं और गुण (in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि :

    टेरिडोफाइटा या टेरिडोफाइट क्या है ? What is Pteridophyta

    टेरिडोफाइटा के प्रकार क्या है ? What are the types of Pteridophyta

    टेरिडोफाइटा की विशेषताएं क्या है ?

    टेरिडोफाइटा पादपों के मुख्य लक्षण क्या है ? What are the Main characteristics of Pteridophyta ?

    टेरिडोफाइटा के प्रमुख आर्थिक महत्व Economic importance of Pteridophyta

    टेरिडोफाइटा या टेरिडोफाइट क्या है ? (What is Pteridophyta)

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) ऐसे थैलीनुमा पादप, जो प्राचीनतम संवहनी पौधा है। यह मुख्यतया स्थलीय तथा छायादार और नम स्थानों पर पाया जाता है l परन्तु कुछ टेरिडोफाइट जलीय होते हैं; जैसे-एजोला, साल्वीनिया तथा मार्सिलिया आदि।

    टेरिडोफाइट्स (टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)पहले सही अर्थों में land plants रूप में पौधों के जगत में एक महत्वपूर्ण समूह का गठन करते हैं। टेरिडोफाइट्स को “बीजाणु वाले संवहनी पौधे” या बीज रहित संवहनी पौधे भी कहा जाता है, वे क्रिप्टोगैम से संबंधित हैं।

    टेरिडोफाइट्स (Pteridophytes) शब्द दो शब्दों “”Pteron meaning feather” और ” phyton meaning plant” से लिया गया है। इस प्रकार टेरिडोफाइट पंख जैसी पत्तियों वाले पौधे होते हैं। टेरिडोफाइट्स ब्रायोफाइट्स (bryophytes) और स्पर्मेटोफाइट्स (spermatophytes) के बीच एक संक्रमणकालीन स्थिति पर कब्जा कर लेते हैं।

    टेरिडोफ़ाइटा (Pteridophyta) फर्न और फर्न किस्म के पौधे हैं। इनमें कुछ पौधे आज भी पाए जाते हैं, पर एक समय, 35 करोड़ वर्ष पूर्व, डिवोनी युग में इनका बाहुल्य और साम्राज्य था, जैसा इनके फाँसिलों से पता लगता है और ये संसार के प्रत्येक भाग में फैले हुए थे। कोयले के फॉसिलों में ये विशेष रूप से पाए जाते हैं। टेरिडोफाइटा ही कोयला क्षेत्र की उत्पत्ति के कारण हैं।

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) कभी एक बड़ा पादप वर्ग हुआ करता था जिसके बड़े आकार के वृक्ष होते थे। किंतु जलवायु में निरंतर  परिवर्तन से  यह पोधे समाप्त हो गये  और इनकी जगह विवर्तबीज (Gymnosperm) और आवृतबीजी किस्म के पौधों ने ले लिया है, पर कही कही यह आज भी पृथ्वी पर छोटे कद के टेरिडोफाइटा के रूप में मौजूद हैं।

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) – जीवन चक्र (Life Cycle)

    टेरिडोफाइटा के प्रकार (Types of Pteridophyta)

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) को मुख्यतया तीन समूहों – क्लब मॉस (also known as Lycopods or Lycophytes), हॉर्स टेल (Horsetails) तथा फर्न (Ferns) में बाँटा जाता है।

    टेरिडोफाइटा के प्रकार

    टेरिडोफाइट्स (फर्न और लाइकोफाइट्स) बीजाणु वाले संवहनी पौधे (Free-sporing vascular plants)  हैं जिनका जीवन चक्र बारी-बारी से, मुक्त-जीवित गैमेटोफाइट (Gametophyte) और स्पोरोफाइट (Sporophyte) चरणों के साथ होता है जो पूरी तरह परिपक्व होने पर यह  स्वतंत्र हो जाते हैं। स्पोरोफाइट का शरीर जड़ों, तने और पत्तियों में अच्छी तरह से विभेदित (differentiated ) होता है। इनकी जड़ बहुत strong होती है और इनका तना या तो भूमिगत होता है या हवा में लटकता रहता है ।

    टेरिडोफाइटा के प्रकार

    पत्तियां माइक्रोफिल (Microphylls ) या मेगाफिल (Megaphylls ) दोनों में से कोई एक होती हैं। इनमे वैस्कुलर प्लांट एपोमॉर्फीज़ (Vascular Plant Apomorphies) (जैसे, वैस्कुलर टिश्यू (vascular tissue) और लैंड प्लांट प्लेसीओमॉर्फीज़ (Land Plant Plesiomorphies) (जैसे, बीजाणु फैलाव और बीजों की अनुपस्थिति) शामिल हैं।

    फर्न का तना भूमिगत होता है, जो राइजोम (प्रकन्द) कहलाता है। यह भूमि में तिरछा उगता है। इसी कारण से इसका शीर्ष भाग भूमि में से कुछ बाहर निकला रहता है। यह फर्न का एक महत्त्वपूर्ण भाग है, जिसके निचले भाग से जड़ तथा ऊपरी भाग से पत्ती निकलती है। एजोला एक जलीय फर्न है, इसका उपयोग जैव-उर्वरक की तरह होता है।

    टेरिडोफाइटा के मुख्य लक्षण और विशेषताएं (Characteristic of Pteridophyta)

    यह टेरिडोफाइटा पादप जगत का एक ऐसा वर्ग है जिनमें फूलों (पुष्पों) और बीजों का निर्माण तो नहीं होता किंतु संवहन ऊतक (Vascular plants) उपस्थित होते हैं अर्थात टेरिडोफाइटा पादप वर्ग के पौधों में फूल और बीज नही पाए जाते है

    संवहन ऊतक के द्वारा ही शरीर के संपूर्ण भागों में जल, खनिज लवण और भोजन का संवहन होता है। टेरिडोफाइटा पादप वर्ग के पादपों का शरीर जड़, तना और पत्ती में विभक्त होता है।

    टेरिडोफाइट जाइलम और फ्लोएम के साथ एक संवहनी पौधा है जो बीजाणुओं (spores) को फैलाता है। क्योंकि टेरिडोफाइट्स न तो फूल पैदा करते हैं और न ही बीज, उन्हें कभी-कभी “क्रिप्टोगैम” (cryptogams) कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि उनके प्रजनन के साधन छिपे हुए हैं।

    जैसा की उपर बताया गया है इस प्रकार के पोधों में संवहन ऊतक जाइलम और फ्लोएम होते हैं, जो खनिज लवण, जल और भोजन का संवहन करते हैं।

    कुछ फॉसिलों में जड़ें और पत्तियाँ नहीं पाई गई हैं। ये संवहनीय (vascular) पौधे हैं

    इनके बीजाणु अंकुरित होकर फर्न नहीं बनते, अपितु ये सूक्ष्म और नगण्य thallus बनते हैं, जिनमें लैंगिक इंद्रियों जैसे भाग रहते हैं।

    टेरिडोफाइटा प्रजाति के वृक्षों का शरीर जड़, तना और पत्ती में विभाजित होता है। किन्तु कुछ पादपों में यह संरचनाएँ विकसित होती है, जबकि कुछ पादपों में अल्प विकसित होती हैं।

    टेरिडोफाइटा पादप वर्ग के ऊतक अधिक विकसित नहीं होते हैं। जबकि कुछ पादपों में जड़े पूरी तरह से अनुपस्थित होती है।

    टेरिडोफाइटा वर्ग का मुख्य पौधा बीजाणुभिद होता है, जो जड़, तना, तथा पत्ती में विभक्त रहता है।

    यह उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन में इसकी अधिकता मिलती है।

    फर्न के जीवन चक्र में प्रभावी प्रवस्था द्विगुणित बीजाणुद्भिद् होती है अर्थात् जीवन चक्र बीजाणुद्भिद् में दो प्रावस्था युग्मकोद्भिद् एवं बीजाणुद्भिद् होती हैं।

    जीवन चक्र में प्रभावी पौधा बीजाणुद्भिद् ही होता है

    बीजाणुद्भिद् जड़, तना और पत्तियों में विभक्त होता है।

    जड़ का स्वरूप अपस्थानिक होता है, जो राइजोम (प्रकन्द) से नीचे की और निकलती है। यद्यपि एडिएण्टम नामक फर्न अपस्थानिक जड़ें पत्तियों से तब निकलती है, जब पत्तियों के शीर्ष भाग मिट्टी के सम्पर्क में आते हैं इन पत्तियों से नए पौधे निकलते हैं इसी आधार पर एडिएण्टम को घुमक्कड़ फर्न (walking fern) कहा जाता है।

    युग्मोदभिद पौधे पर नर और मादा जननांग होते है, नर जननांग को पुंधानी तथा मादा जननांग को स्त्रीधानी के नाम से जाना जाता है।

    टेरिडोफाइटा के प्रमुख आर्थिक महत्व Economic importance of Pteridophyta

    टेरिडोफाइटा का को विशेष आर्थिक महत्त्व नही है  फिर भी इसके कुछ सामान्य आर्थिक महत्व निम्न है :

    मरसीलिया और  सिरेटोप्टेरिस जैसे कुछ टेरिडोफाइटा का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है।

    टेरिडियम जैसे टेरिडोफाइटा का उपयोग पालतू पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है l

    लाइकोपोडियम के बीजाणु का उपयोग विभिन्न प्रकार की दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है।

    सिलेजिनेला जैसे टेरिडोफाइटा की पुनर्जीवन की खास विशेषता होने के कारण इन टेरिडोफाइट्स पोधों का उपयोग सजावट के रूप में किया जाता है l

    टेरिडोफाइटा से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न – उत्तर

    टेरिडोफाइटा क्या होते है ?

    टेरिडोफाइट्स संवहनी पौधे (vascular plants ) होते हैं जो बीजाणुओं का उपयोग करके प्रजनन करते हैं। वे फूल और बीज नहीं पैदा करते हैं और इसलिए उन्हें क्रिप्टोग्राम्स (cryptogams) भी कहा जाता है।

    टेरिडोफाइट्स के तीन अलग-अलग प्रकार क्या हैं?

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) को मुख्यतया तीन समूहों – क्लब मॉस (also known as Lycopods or Lycophytes), हॉर्स टेल (Horsetails) तथा फर्न (Ferns) में बाँटा जाता है।

    टेरिडोफाइट्स (Pteridophytes) को ट्रेकोफाइट्स (tracheophytes) क्यों कहा जाता है?

    टेरिडोफाइट्स को ट्रेकोफाइट्स के रूप में जाना जाता है क्योंकि उनमें पानी और पोषक तत्वों के संचालन के लिए विशेष ऊतक होते हैं। इन विशिष्ट ऊतकों को जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) के रूप में जाना जाता है।

    टेरिडोफाइट्स कहाँ पाए जाते हैं?

    टेरिडोफाइट नम, छायादार और नम स्थानों में पाए जाते हैं। वे चट्टानों, दलदलों और दलदलों और उष्णकटिबंधीय पेड़ों की दरारों में पाए जाते हैं।

    टेरिडोफाइट्स को “वानस्पतिक सर्प (botanical snakes)” क्यों कहा जाता है?

    सरीसृप (Reptiles) उभयचरों (amphibians)के बाद भूमि पर विकसित होने वाले वाला दुसरे जानवर थे उसी तरह टेरिडोफाइट्स पहले भूमि पर पाए जाने पोधे थे जो ब्रायोफाइट्स (Bryophytes) के बाद विकसित हुए | यही कारण है कि टेरिडोफाइट्स को “वानस्पतिक सर्प (botanical snakes) या “पादप जगत के सर्प” कहा जाता है।