Category: बायोलॉजी

  • किंग कोबरा घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    किंग कोबरा घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    विश्व में किंग कोबरा एकमात्र ऐसा सर्प है जो घोंसला बनाता है पर क्या आपको पता है वो घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    वास्तव में ये एक अंडप्रजक सर्प है जो घोंसले में अंडे देता है और अंडों से सर्प निकलने तक घोंसले की पहरेदारी करता है ! विश्व में सर्प प्रजाति का केवल किंग कोबरा ही अपना घोंसला बनाता है !

    King Kobra संसार का सबसे लम्बा विषधर सर्प है। इसकी लम्बाई 5.6 मीटर तक होती है। सांपों की यह प्रजाति दक्षिणपूर्व एशिया एवं भारत के कुछ भागों में खूब पायी जाती है। एशिया के सांपों में यह सर्वाधिक खतरनाक सापों में से एक है।

    इसकी लंबाई 20 फिट तक हो सकती है। तथा यह भारत के दक्षिण क्षेत्रों में बहुतायात में पाया जाता है।

    भारत में, किंग कोबरा वन्यजीव संरक्षण की अनुसूची द्वितीय अधिनियम, 1972 (यथा संशोधित) और एक व्यक्ति को सांप के ऊपर से 6 साल के लिए कैद हो सकती है हत्या का दोषी के तहत रखा जाता है।

  • LASIK (लेसर असिस्टेड इन सीटू केराइटोमील्यूसिस) क्या है ?

    LASIK (लेसर असिस्टेड इन सीटू केराइटोमील्यूसिस) क्या है ?

    LASIK एक लेजर तकनीक है जो निकट दृष्टि दोष दूर दृष्टि दोष और जरा दृष्टि दोष आदि नेत्र संबंधी दोषों के उपचार में लिया जाता है किंतु उसका उपयोग अधिक उम्र के व्यक्ति पर नहीं किया जा सकता |

    LASIK नेत्र शल्य चिकित्सा दृष्टि की समस्याओं को ठीक करने के लिए सबसे प्रसिद्ध और सबसे अधिक प्रदर्शन की जाने वाली लेजर अपवर्तक सर्जरी है। लेज़र-असिस्टेड इन सीटू केराटोमाइल्यूसिस (LASIK) चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस का विकल्प हो सकता है।

    LASIK सर्जरी के दौरान, दृष्टि में सुधार के लिए आपकी आंख (कॉर्निया) के सामने गुंबद के आकार के स्पष्ट ऊतक के आकार को ठीक से बदलने के लिए एक विशेष प्रकार के काटने वाले लेजर का उपयोग किया जाता है।

    सामान्य दृष्टि वाली आंखों में, कॉर्निया आंख के पिछले हिस्से में रेटिना पर प्रकाश को ठीक से झुकता है (अपवर्तित करता है)। लेकिन निकट दृष्टि (मायोपिया), दूरदर्शिता (हाइपरोपिया) या दृष्टिवैषम्य के साथ, प्रकाश गलत तरीके से मुड़ा हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप धुंधली दृष्टि होती है।

    चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस दृष्टि को सही कर सकते हैं, लेकिन कॉर्निया को फिर से आकार देने से भी आवश्यक अपवर्तन प्रदान होगा।

    लैसिक नेत्र शल्य चिकित्सा के कुछ दुष्प्रभाव, विशेष रूप से शुष्क आंखें और अस्थायी दृश्य समस्याएं जैसे चकाचौंध, काफी सामान्य हैं।

    ये आमतौर पर कुछ हफ्तों या महीनों के बाद साफ हो जाते हैं और बहुत कम लोग इन्हें दीर्घकालिक समस्या मानते हैं।

  • राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    इस आर्टिकल में राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार के बारे में जानेगें | राइबोसोम की खोज किसने की ? उसके प्रमुख कार्य क्या है ? राइबोसोम को प्रोटीन का कारखाना (फैक्ट्री) क्यों कहा जाता है ? राइबोसोम के प्रकार क्या है आदि के बारे में जानकारी लेगें |

    राइबोसोम का परिचय (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम एक गोलाकार, दो उपइकाइयों के बने, झिल्ली विहीन राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन के सूक्ष्म कण होते हैं, जो हरितलवक, केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य में (अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर राइबोफोरोन प्रोटीन द्वारा जुड़ा) पाए जाते हैं।

    यह एक झिल्ली विहीन कोशिकांग है। राइबोसोम सभी कोशिकाओं (सार्वभौमिक कोशिकांग) में पाया जाता है। कोशिकाद्रव्य में यह स्वतंत्र रूप में तथा खुरदरीअन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर दाने के रूप में पाया जाता है। राइबोसोम सबसे छोटी कोशिकांग इकाई भी है और इसका आकार 15-20nm होता है।

    राइबोसोम RBC कोशिका को छोड़कर शेष सभी कोशिकाओं में (यूकैरियोटिक कोशिकाप्रोकैरियोटिक कोशिका) में पाया जाता है। ये प्रोटीन संश्लेषण नामक प्रक्रिया में अमीनो एसिड से प्रोटीन को बनाते हैं | राइबोसोम परिपक्व आरबीसी (Mature RBC) में अनुपस्थित होता हैं। रीबोफोरिन प्रोटीन की मदद से RER (खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका) पर उपस्थित होता है।

    राइबोसोम की खोज (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम की खोज सर्वप्रथम रोमानिया के जीववैज्ञानिक जॉर्ज पैलाडे (George Emil Palade) ने 1955 में की थी | उन्होंने इस खोज के लिए इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग किया था जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। राइबोसोम नाम 1958 में वैज्ञानिक रिचर्ड बी. रॉबर्ट्स (Richard B. Roberts) ने प्रस्तावित किया था।

    राइबोसोम और उसके सहयोगी अणु 20वीं शताब्दी के मध्य से जीवविज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। 7 अक्टूबर, 2009 को भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन को रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें राइबोसोम की कार्यप्रणाली व संरचना के उत्कृष्ट अध्ययन के लिए यह पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया |

    राइबोसोम की संरचना (Structure of Ribosome)

    प्रत्येक राइबोसोम लगभग दो गोलाकार सबयूनिट्स (Subunits) का बन जाता है. इनमें एक छोटी (छोटी इकाई) एवं एक बड़ी सब-यूनिट (बड़ी उप इकाई) होती है | छोटी इकाई की आकृति अण्डाकार एवं बड़ी इकाई की आकृति गुंबद के आकार जैसी होती है

    छोटी इकाई व बड़ी उप इकाई के क्रमशः कार्य m- RNA को जोड़ना व t- RNA को जोड़ने का काम करते हैं। राइबोसोम की संरचना के स्थाइत्व के लिए mg2+ की आवश्यकता होती है जिसका मान 0.001 मोलर होता है।

    राइबोसोम की बड़ी उपइकाई में तीन स्थल (साइट) होते हैं :

    ए-स्थल (A-Site): – यह अमीनोएसिल स्थल तथा टी-आरएनए के लिए ग्राही स्थल होता है।

    पी-स्थल (P-Site): – यह पेप्टाइडल साइट, पेप्टाइड श्रंखला के दीर्घीकरण के लिए स्थल होता है।

    ई-स्थल (E-Site): – यह टी-आरएनए के लिए राइबोसोम से बाहर निकलने के लिए स्थल होता है।

    इसकी उपइकाईयाँ राइबोप्रोटीन और आर-आरएनए द्वारा बनी होती है। जो निम्न प्रकार की होती है-

    50s उपइकाई – 34% प्रोटीन + 23 एस और 5 एस आर-आरएनए

    30s उपइकाई – 21% प्रोटीन + 16 एस आर-आरएनए

    60s उपइकाई – 40% प्रोटीन + 28 एस, 5.8 एस और 5 एस आर-आरएनए

    40s उपइकाई 33% प्रोटीन + 18 एस आरआरएनए

    Ribosome का निर्माण न्यूक्लियोलस (केन्द्रिक) में 40-60% प्रोटीन और 60-40% आरएनए द्वारा होता है। न्यूक्लियोलस को राइबोसोमल उत्पादक फैक्टरी (Ribosomal Manufactring Factory) माना जाता है।

    राइबोसोम के प्रकार (Types of Ribosome)

    राइबोसोम प्रोकेरियोटिक कोशिका और यूकैरियोटिक कोशिका दोनों में पाया जाता है। राइबोसोम के प्रकार निम्न है-

    प्रोकेरीयोट राइबोसोम (Prokaryotic Ribosome) 

    प्रोकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 70S  प्रकार का पाया जाता है जो बड़ी उप इकाई 50S की इकाई 25s + 5S) एवं छोटी उप इकाई 30S की इकाई 16S प्रकार की बनी होती है

    युकेरीयोट  राइबोसोम (Eukaryotic Ribosome)

    यूकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 80S प्रकार का पाया जाता हैं जो बड़ी उप इकाई 60S की इकाई (28S + 5.8S + 5S) एवं छोटी उप इकाई 40S की इकाई 18S  प्रकार की बनी होती है।

    हरितलवक राइबोसोम (Chloroplast Ribosome)

    यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है।

    माइटोकांड्रिया राइबोसोम (Mitochondrial Ribosome)

    माइटोकॉन्ड्रिया के राइबोसोम को माइटोराइबोसोम भी कहते हैं यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है। माइटोकॉन्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट का राइबोसोम 70S प्रकार का पाया जाता है। क्लोरोप्लास्ट के राइबोसोम को प्लास्टीड्यिल राइबोसोम कहते हैं।

    ध्यान दें :

    s = अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) (राइबोसोम के आकार की मापने की इकाई होती है)

    70S राइबोसोम्स: ये आकार में छोटे होते हैं एवं इनका अवसादन गुणांक 70S होता है. ये माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट एवं बैक्टीरिया आदि में पाए जाते हैं |

    80S राइबोसोम्स: ये आकार में कुछ बड़े होते हैं और इनका अवसादन गुणांक 80S होता है. ये उच्च विकसित पौधों एवं जन्तु कोशिकाओं में पाए जाते हैं |

    राइबोसोम की प्रमुख विशेषताएं

    • राइबोसोम झिल्ली विहीन (Membraneless) होते हैं।
    • राइबोसोम कोशिकाद्रव्य, माइटोकॉन्ड्रिया, केंद्रक, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, हरितलवक में पाए जाते है।
    • यह गोलाकार (spherical) होते हैं।
    • इनका व्यास 150- 250 Å होता है
    • यह राइबोप्रोटीन तथा mRNAके बने होते हैं।
    • इनके आकार का निर्धारण अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) के आधार पर किया जाता है।

    राइबोसोम के कार्य (Functions of Ribosome)

    राइबोसोम एक ऐसी कोशिका संरचना है जो प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक होती है | कई कोशिकाओं को उनकी मरम्मत या रासायनिक प्रक्रियाओं को निर्देशित करने के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है | राइबोसोम का मुख्य कार्य अमीनों अम्ल के द्वारा प्रोटीन संश्लेषण में सहायता करना है | प्रोटीन के निर्माण की प्रक्रिया ट्रांसलेशन या अनुवादन (Translation) कहलाती है।

    पॉलीराइबोसोम

    प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)के दौरान कई Ribosome एम-आरएनए से जुड़कर एक सरंचना बनाता है, जिसे पॉलीराइबोसोम या पोलीसीम कहा जाता है।

    राइबोसोम को प्रोटीन की फैक्ट्री क्यों कहा जाता है ?

    चूँकि राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) में भाग लेता है, इसलिए इसे सेल के इंजन या प्रोटीन फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है। इस को कोशिका का प्रोटीन कारखाना (Protein Factory of the Cell) या प्रोटीन की फैक्ट्री कहा जाता है |

    यदि कोशिका में राइबोसोम हटा दिया जाए तो क्या होगा?

    यदि कोशिका से राइबोसोम हटा दिए जाते हैं, तो प्रोटीन संश्लेषण नहीं होगा। इस प्रकार कोशिका चयापचय उत्पादों की कमी के कारण आगे प्रदर्शन करने की क्षमता खो देगी। कोशिका अंततः मर जाएगी | 
  • लाइसोसोम या लयनकाय (Lysosome) क्या है ? लाइसोसोम का निर्माण, प्रकार एवं कार्य

    लाइसोसोम या लयनकाय (Lysosome) क्या है ? लाइसोसोम का निर्माण, प्रकार एवं कार्य

    लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं, जो लगभग 5pH पर कार्य करते हैं। इसमें पाचन एंजाइम होते हैं।

    लाइसोसोम की खोज डी डवे (De Duve) ने की थी। एलेक्स नोविकॉफ़ (Alex Novikoff ) ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप द्वारा कोशिका में लाइसोसोम को देखा तथा इसे लाइसोसोम नाम दिया।

    Lysosome शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों Lyso तथा Soma से बना है। लाइसो का अर्थ पाचक तथा सोमा का अर्थ काय है यानि Lysosome का अर्थ पाचककाय या लयनकाय है।

    लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली क्यों कहा जाता है ?

    लाइसोसोम कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है। लाइसोसोम विभिन्न कोशिका प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। वे अतिरिक्त या घिसे-पिटे सेल भागों को तोड़ देते हैं। उनका उपयोग हमलावर वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए किया जा सकता है। यदि कोशिका मरम्मत से परे क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो लाइसोसोम एपोप्टोसिस (programmed cell death, or apoptosis) नामक प्रक्रिया से स्वयं का आत्म-विनाश कर सकते हैं।

    लाइसोसोम का निर्माण

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) और गॉल्जी काय (Golgi body) के द्वारा लाइसोसोम का निर्माण के द्वारा होता है।

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) के द्वारा  लाइसोसोम के एंजाइमों का निर्माण होता है। तथा चारों ओर की झिल्ली का निर्माण गॉल्जी काय द्वारा होता है।

    लाइसो सोम के प्रकार (Types of Lysosome)

    लाइसोसोम के चार प्रकार होते हैं: –

    1. प्राथमिक लाइसोसोम (Primary lysosome)
    2. द्वितीयक लाइसोसोम (Secondary Lysosome)
    3. अवशिष्ट काय (Residual body)
    4. ऑटोफैगोसोम (Autophagosomes)

    लाइसोसोम के कार्य (Functions of Lysosome)

    1. फागोसाइटोसिस या पिनोसाइटोसिस के माध्यम से कोशिका में प्रवेश करने वाले कणों का पाचन करना। इसे हेटरोफैगी (Heterophagy) कहते है।
    2. कोशिका के आंतरिक पदार्थो का पाचन करना। इसे ऑटोफैगी कहते है।
    3. ऑटोलाइसिस प्रक्रिया से पुरानी कोशिकाओं और संक्रमित कोशिकाओं नष्ट किया जाता हैं। कोशिका के सभी लाइसो सोम फट जाते है जिससे इसके सभी पाचक एंजाइम कोशिकांगों को पचाने लगते हैं। इसलिए इसे कोशिका की आत्मघाती थैली (Suicidal bag of the cell) भी कहते है।

    लाइसोसोम के कार्य करने की प्रक्रिया

    लाइसोसोम एक विशिष्ट प्रकार का अंग होता है जो बहुत अम्लीय होता है। तो इसका मतलब है कि इसे सेल के अंदर के बाकी हिस्सों को damage होने से बचाना होगा ।

    यह एक कम्पार्टमेंट है, जिसके चारों ओर एक झिल्ली होती है जो पाचन एंजाइमों को संग्रहीत करती है जिन्हें इस एसिड, निम्न-पीएच (low-pH) वातावरण की आवश्यकता होती है। उन एंजाइमों को हाइड्रोलाइटिक एंजाइम ( hydrolytic enzymes) कहा जाता है, और वे बड़े अणुओं को छोटे अणुओं में तोड़ देते हैं।

    उदाहरण के लिए, ये एंजाइम बड़े प्रोटीन को अमीनो एसिड में, या बड़े कार्बोहाइड्रेट को सरल शर्करा में, या बड़े लिपिड को एकल फैटी एसिड में बदल देते है और जब वे ऐसा करते हैं, तो वे शेष कोशिका के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं |

    अब मान लीजिये की ये एंजाइम बड़े अणुओं को छोटे अणुओं में नहीं तोड़े तो शरीर में उन बड़े अणुओं का भंडारण होगा और वह एक प्रकार की बीमारी के रूप में बदल जायेगा । चूँकि लाइसोसोम संक्रमण के खिलाफ कार्य करता है तो कोशिका अक्सर एक जीवाणु को नष्ट करने के लिए इसे अपने लाइसोसोम में डाल देती है। लाइसोसोम उस जीवाणु को नष्ट कर देता है |

    यदि कोशिका में लाइसोसोम को हटा दे तो क्या होगा ? What if remove lysosome from cell ?

    स्तनधारी कोशिकाएं (Mammalian cells ) सैकड़ों लाइसोसोम से जुडी होती हैं, जिनमें 60 से अधिक विभिन्न प्रकार के एंजाइम पाए जाते हैं जो खराब हो चुके कोशिका भागों और बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं और एक कोशिका के स्वयं के वसा, शर्करा और प्रोटीन का पुनर्चक्रण करते हैं। इस तरह यदि कोशिका में लाइसोसोम नही हो तो एंजाइम कोशिका को पूरी तरह खत्म कर सकते है ।

  • गाल्जिकाय (Golgi body) क्या है ? गाल्जिकाय के कार्य और सरंचना क्या है ? in Hindi

    गाल्जिकाय (Golgi body) क्या है ? गाल्जिकाय के कार्य और सरंचना क्या है ? in Hindi

    गॉल्जीकाय (Golgi body) झिल्ली युक्त पुटिका है, जो एक-दूसरे के ऊपर समानान्तर रूप से रहती है।

    इन झिल्लियों का सम्पर्क अन्तःप्रद्रव्यो जालिका को झिल्लियो से होता है और इसलिए जटिल कोशिकीय झिल्ली तन्त्र के दूसरे भाग को बनाती हैं।

    अन्तःप्रद्रव्यो जालिका में संश्लेषित पदार्थ गॉल्जीकाय में पैक किए जाते हैं और इस रूप में उसे कोशिका के बाहर तथा अन्दर विभिन्न क्षेत्रों में भेज दिया जाता है।

    गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्यिा या डिक्टियोसोम भी कहा जाता है।

    गॉल्जीकाय को कोशिका को ट्रैफिक पुलिस‘ भी कहा जाता है। ये कोशिका पट्ट, कोशिका भित्ति, शुक्राणु के एक्रोसोम, लयनकाय तथा हॉरमोन के संश्लेषण का कार्य करती है।

  • अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) क्या है ? उसके प्रकार, संरचना और कार्य (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में )

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) क्या है ? उसके प्रकार, संरचना और कार्य (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में )

    इस आर्टिकल में हम जानेगें की अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)या अंतर द्रव्य जालिका किसे कहते है ? अन्तःप्रद्रव्यी जालिका कितने प्रकार की होती है ? अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) की सरंचना कैसी होती है ?, और अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के कार्य क्या होते है ? और अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के रूपांतर क्या होते है ? आदि

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका ( एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम) या अंतर द्रव्य जालिका क्या है ?

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका झिल्ली युक्त नलिकाओं का एक बहुत बड़ा तन्त्र होता है। यह दोहरी झिल्ली से घिरी होती है। यह जन्तु एवं पादप कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अत्यंत सूक्ष्म, शाखित, झिल्लीदार, अनियमित नलिकाओं के घने जाल के रूप में पाई जाती है ।  यह लाइपोप्रोटीन की बनी होती है और कोशिकाओं में समानान्तर नलिकाओं के रूप में फैली रहती है। कोशिकाओं में इनका विस्तार कभी-कभी केन्द्रक की बाह्य झिल्ली से प्लाज्मा झिल्ली तक होता है।

    Endoplasm का अर्थ है जीवद्रव्य में और रेटिकुलम (reticulum) का अर्थ होता है एक प्रकार का जाल या जालिका | एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की इस झिल्ली को पहली बार 1945 में कीथ आर. पोर्टर, अल्बर्ट क्लाउड और अर्नेस्ट एफ. फुलम द्वारा देखा गया था। बाद में, रेटिकुलम शब्द, जिसका अर्थ है “जाल या नेटवर्क”, पोर्टर द्वारा 1953 में इस झिल्ली युक्त नलिकाओं का वर्णन करने के लिए लागू किया गया था।

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम को झिल्ली युक्त नलिकाओं का पूरा एक नेटवर्क होने के कारण झिल्लियों का तंत्र (system of membrane) भी कहा जाता है।

    यह परिपक्व RBC को छोड़कर सभी यूकेरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाता है। मांसपेशियों में एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम को सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम कहा जाता है। जिसमें Ca की अधिकता होती है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका की संरचना (Structure of Endoplasmic reticulum)

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की सामान्य संरचना सिस्टर्न नामक झिल्लियों का एक बना एक जाल या नेटवर्क होता है।

    ये थैली जैसी संरचनाएं साइटोस्केलेटन (cytoskeleton) द्वारा एक साथ रखी जाती हैं। फॉस्फोलिपिड झिल्ली (phospholipid membrane) सिस्टर्नल स्पेस (या लुमेन) को घेर लेती है, जो पेरिन्यूक्लियर स्पेस (perinuclear space) के साथ निरंतर होती है लेकिन साइटोसोल से अलग होती है।

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम तीन प्रकार की सरंचनाओं का एक जाल होता है जो निम्न है :

    सिस्टर्नी (Cisternae)

    ये लंबी, चपटी, अशाखित झिल्ली से बनी संरचना है। ये सिस्टर्नी समानांतर व्यवस्थित होकर  लैमिली (lamellae) का निर्माण करती हैं। ये खुरदरी अन्त: प्रद्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum or RER) में अच्छी तरह से विकसित होती है।

    पुटिका (Vesicle)

    ये सिस्टर्नी से अलग, गोल और अंडाकार थैलीनुमा संरचना हैं, जो चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका (Smooth endoplasmic reticulum – SER) में प्रचुर मात्रा में पायी जाती हैं।

    नलिकाएँ (Tubule)

    ये पुटिका तथा सिस्टर्नी से अलग-थलग और शाखित संरचना हैं जो चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका में अच्छी तरह से विकसित है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के समान होती है, लेकिन इसके घटक भागों को अलग किया जा सकता है। गॉल्जीकाय (Golai Body) की तरह जीवद्रव्य में इसका कोई निश्चित स्थान नहीं है

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के प्रकार (Types of Endoplasmic reticulum)

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका दो प्रकार की खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका खुरदरी अन्त: प्रद्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum or RER) तथा चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका (Smooth endoplasmic reticulumSER) होती है।

    खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum)

    खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (rough ER) का खुरदरापन उस पर स्थित राइबोसोम के कारण होता है। राइवोसोम पर प्रोटीन-संश्लेषण होता है। RER में राइबोसोम की बड़ी उपइकाई राइबोफ़ोरिन नामक ट्रांसमेम्ब्रेग्लाइकोप्रोटीन द्वारा जुड़ी होती है।

    अन्त:प्रद्रव्यी जालिका का प्रमुख कार्य उन सभी वसाओं व प्रोटीनों का संश्लेषण करना है, जो विभिन्न कोशिका झिल्ली अथवा केन्द्रक झिल्ली का निर्माण करते हैं।

    खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Rough Endoplasmic Reticulum-RER)

    इसके द्वारा लाइसोसोम के एंजाइमों का निर्माण किया जाता है। विभिन्न प्रकार की प्रोटीन का संश्लेषण (Synthesis of Protein) करती है | ग्लाइकोसिलेशन (Glycosylation) की प्रक्रिया RER में ही होती है।
    RER में प्रोटियोसोम (proteasome) की सहायता से अनफोल्डेड प्रोटीन (Unfolded protein) को नष्ट किया जाता है।

    चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulum)

    चिकनी अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (smooth ER) पर राइबोसोम नहीं पाए जाते हैं। SER कोशिकाझिल्ली के लिपिड का संश्लेषण तथा स्टेरॉयड हार्मोन संश्लेषण का प्रमुख स्थल है।

    चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Smooth Endoplasmic Reticulum)

    SER पर एस्कॉर्बिक एसिड (Vitamin C) का संश्लेषित किया जाता है। इसी पर विटामिन ए से रेटिना के वर्णकों का निर्माण होता है।
    ये लिपिड संश्लेषण और स्टेरॉयड हार्मोन में भाग लेता है
    ऑक्सीजन स्थानांतरण एंजाइम (ऑक्सीजिनेज) की सहायता से SER आविषालु पदार्थ की विषालुता को कम (Detoxification of drug) किया जाता है।
    पौधों में SER स्फिरोसोमे (Sphaerosomes) का निर्माण करती है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के रूपांतरण (Modification of Endoplasmic Reticulum)

    सारकोप्लाज्मिक रेटिकुलम (Sarcoplasmic reticulum)

    ये SER के रूपांतरण से बनते है। इनमें Ca2+ संचित रहता है। कंकाली पेशियों और हृद पेशियों में सारकोप्लाज्मिक रेटिकुलम पाए जाते है।

    ग्लाइकोसोम (Glycosome)

    यकृत कोशिकाओं में SER ग्लाइकोजन का संग्रहण करता है जिसे ग्लाइकोसोम कहते है।

    माइलॉयड काय (Myeloid Bodies)

    ये रेटिना की वर्णकित उपकला कोशिकाओं (pigmented epithelial cells) में मौजूद विशेष प्रकार की SER हैं। ये प्रकाश संवेदी (light sensitive) होते है |

    एर्गैस्टोप्लाज्म (Ergastoplasm)

    ये ER की लैमिला (lamellae) में पाए जाने वाले राइबोसोम का समूह हैं।

    माइक्रोसोम (Microsome)

    ये राइबोसोम से संबंधित ER का हिस्सा हैं। जो जीवित कोशिकाओं में नहीं पाया जाता। इनका पात्रे प्रोटीन संश्लेषण (in vitro protein synthesis) के अध्ययन में उपयोग किया जाता है।

    टी-नलिकाएं (T-Tubules)

    ये कंकाली पेशियों और हृद पेशियों की कोशिकाओं में अनुप्रस्थ व्यवस्थित होते हैं। ये पेशियों की कोशिकाओं में संकुचन को उत्तेजित और संचालित करते हैं।

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका आर्टिकल में शामिल महत्वपूर्ण प्रश्न :

    • अंतर द्रव्य जालिका की खोज किसने की थी?
    • एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की खोज किसने की
    • एण्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम in Hindi क्या है ?
    • अन्तः प्रदव्ययी जलिका परिभाषा
    • अंतर द्रव्य जालिका का चित्र
    • अंतर द्रव्य जालिका को इंग्लिश में क्या कहते हैं
    • अंतर द्रव्य जालिका कितने प्रकार की होती हैं
    • अन्तः प्रदव्ययी जलिका के कार्य
    • अंतर द्रव्य जालिका के प्रमुख कार्य क्या है?
    • Smooth endoplasmic reticulum in Hindi
    • चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका क्या है ?
    • खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Rough Endoplasmic Reticulum-RER) क्या है ?
  • माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना, संख्या और कार्य क्या है ? सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना, संख्या और कार्य क्या है ? सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना क्या है, माइटोकॉन्ड्रिया के प्रकार या संख्या कितनी है और माइटोकॉण्ड्रिया का कार्य क्या है ? इसी के साथ हम जानेगे की माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का शक्ति गृह क्यों कहा जाता है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया की खोज 1890 ई. में अल्टमेन (Altman) नामक वैज्ञानिक ने की थी। अल्टमेन ने इसे बायोब्लास्ट तथा बेण्डा ने माइटोकॉण्डिया कहा। जीवाणु एवं नील हरित शैवाल को छोड़कर शेष सभी सजीव पादप एवं जंतु कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अनियमित रूप से बिखरे हुए दोहरी झिल्ली आबंध कोशिकांगों (organelle) को सूत्रकणिका या माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) कहा जाता हैं। कोशिका के अंदर सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखने में ये गोल, लम्बे या अण्डाकार दिखते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया सभी प्राणियों में और उनकी हर प्रकार की कोशिकाओं में पाई जाती हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाद्रव्य में की एक बहुत महत्वपूर्ण रचना है जो की कोशिकाद्रव्य में बिखरी रहती है। माइटोकॉण्ड्रिया दोहरी झिल्ली के आवरण से घिरी हुई रचनाएँ होती हैं। माइटोकॉण्ड्रिया का आकार (size) और आकृति (shape) परिवर्तन होता रहता है ।

    माइटोकॉण्ड्रिया की संरचना और विशेषताएँ क्या है ?

    प्रत्येक माइटोकॉण्ड्रिया एक बाहरी झिल्ली एवं एक अन्तः झिल्ली से चारों ओर घिरी रहती है तथा इसके बीच में एक तरलयुक्त गुहा होती है, जिसे माइटोकॉण्ड्रियल गुहा (Mitochondrial cavity) कहते हैं। बाहरी झिल्ली की सतह पर वृंतविहीन कण पाये जाते है, जिन्हें पारर्सन की उपइकाई (subunits of parson) कहा जाता है।

    माइटोकॉण्ड्रिया की बाहरी झिल्ली सपाट और अन्दर वाली झिल्ली मैट्रिक्स की ओर ऊँगली समान नलिकाओं (पादपों में) अथवा क्रिस्टी (जन्तुओं में) जैसी रचनाएँ बनाती हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाद्रव्य में कणों (Chondriomits), सूत्रों (Filament), छड़ों (Chondriconts) और गोलकों (Chondriospheres) के रूप में बिखरा रहता है।

    बाहरी झिल्ली

    माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली प्रोटीन और फॉस्फोलिपिड  की बनी होती है इसमें फॉस्फेटिडिल कोलीन की मात्रा अधिक होती है। इसकी मोटाई 60-70 Å होती है।

    इसकी बाहरी झिल्ली द्वारा बहुत बड़े अणुओं (6000 kD) का स्थानांतरण हो सकता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया में बड़ी संख्या में धंसे हुए प्रोटीन (integral proteins) होते हैं जिन्हें पोरिन (porins) कहा जाता है।

    आंतरिक झिल्ली

    माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली पर ऑक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन के एंजाइम पाए जाते है इस झिल्ली पर एटीपी संश्लेषण की प्रक्रिया होती है।

    भीतरी झिल्ली (Inner membrane) की बाहरी सतह को सी-फेस (C-Face) तथा आंतरिक सतह को एम-फेस (M – Face) कहा जाता है।

    क्रिस्टी (Cristae)

    आंतरिक झिल्ली में कई उभार (projection) होते हैं जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहा जाता है।

    क्रिस्टी में टेनिस के रेकेट के समान की संरचना होती हैं जिन्हें ऑक्सीसोम या F2 कण या आंतरिक झिल्लिका उपइकाई (inner membrane subunit) कहा जाता है।

    ऑक्सीसोम का निर्माण दो कारकों F0 तथा F1 के द्वारा होता है। F0 कण ऑक्सीसोम के आधार पर होता है।ऑक्सीसोम एटीपीस एंजाइम होते हैं जो ऑक्सीडेटिव फास्फोरिलीकरण में भाग लेता हैं। जो आंतरिक झिल्ली के साथ F1 कण के जुड़ने में मदद करता है। और F0 F1 कण  को OSCP (oligomycin sensitivity conferring protein) कहा जाता है। दो ऑक्सीसम के बीच की दूरी 100Å होती  है।

    आधात्री (Matrix)

    आंतरिक झिल्ली से घिरे हुए स्थान में भरे द्रव को मैट्रिक्स कहते है जिसमे कुल माइटोकॉन्ड्रियन प्रोटीन का लगभग 2/3 भाग होता है। ये प्रोटीन में क्रेब्स चक्र एंजाइम, श्वसनकारी एंजाइम होते है।

    विशेष माइटोकॉन्ड्रियल राइबोसोम, टी-आरएनए और माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए जीनोम की कई प्रतियां शामिल हैं।

    माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (Mitochondrial DNA)

    माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle)कहा जाता है।

    इसमें माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mt-DNA) उपस्थिति होता है। जिसके कारण यह अपने प्रोटीन एवं एंजाइमों का निर्माण खुद कर सकता है।

    Mitochondrial DNA द्विरज्जुकी (double stranded), नग्न (naked) दानेदार (granular), गोलाकार (circular), उच्च G-C अनुपात (higher G-C ratio) वाला अणु है। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mt-DNA) कोशिक के कुल डीएनए का 1% भाग होता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया में  जीनोम (mt-DNA) का आकार छोटा होता है। लेकिन जीन की संख्या बहुत अधिक होती है।

    mt-DNA का आकार जानवरों की तुलना में पौधे में अधिक होता है।

    mt-DNA में उत्परिवर्तन से लेबर ऑप्टिक न्यूरोपैथी(Labour Optic Neuropathy) विकार उत्पन्न होता है। जिसमें नेत्र की दृक तंत्रिका (Optic Nerve) से जुड़े न्यूरॉन क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।

    mt-डीएनए का उपयोग Phylogenetic संबंधों के अध्ययन के लिए किया जाता है।

    माइट्रोकान्ड्रिया के द्वारा मानव इतिहास का अध्ययन और खोज भी की जा सकती है, क्योंकि उनमें पुराने गुणसूत्र उपलब्ध होते हैं। शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने पहली बार कोशिका के इस ऊर्जा प्रदान करने वाले घटक को एक कोशिका से दूसरी कोशिका में स्थानान्तरित करने में सफलता प्राप्त की है। माइटोकांड्रिया में दोष उत्पन्न हो जाने पर मांस-पेशियों में विकार, एपिलेप्सी, पक्षाघात और मंदबद्धि जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं

    माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य

    इसमें कोशकीय श्वसन (Cellular respiration)  होता है।

    न्यूरॉन्स में पाए जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया न्यूरोहोर्मोन के निर्माण में मदद करते हैं।

    विटललोजेनेसिस (Vitellogenesis) के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया में mitochondrial kinase एंजाइम पीतक (Yolk) को घना और अघुलनशील बनाता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस क्यों कहा जाता है ?

    माइटोकॉन्ड्रिया में एटीपी का संश्लेषण (ATP production), एटीपी का भंडारण (ATP storage) और एटीपी का परिवहन (transport) होता है। ये तीनों कार्य माइटोकॉन्ड्रिया में होने के कारण माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस (कोशिका का शक्ति गृह  (Power house of the cell) कहा जाता है।

    चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसे कोशिका का बिजलीघर भी कहा जाता है,

  • कोशिकांग (Cell Organelles) क्या होते हैं? कोशिकांग के प्रकार  (Types of Cell Organelles) | सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    कोशिकांग (Cell Organelles) क्या होते हैं? कोशिकांग के प्रकार (Types of Cell Organelles) | सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिकांग क्या होते है ? अंगक (Organelle) क्या होते है ? कोशिकांग के प्रकार कौन कौनसे है ? कोशिका अंगक क्या है ? कोशिकांग कितने होते है ?

    कोशिकांग (Cell Organelles) क्या होते हैं?

    जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग अलग अलग कार्य करते हैं, उसी तरह कोशिका के भीतर स्थित संरचनाएँ विशिष्ट कार्य करती हैं। इन्हीं संरचनाओं को कोशिकांग या अंगक या कोशिका अंगक (Organelle) कहते हैं।

    उदाहरण के लिये, माइटोकांड्रिया या सूत्रकणिका कोशिका का ‘शक्तिगृह’ (power house) कहलाता है क्योंकि इसी में कोशिका की अधिकांश रासायनिक ऊर्जा उत्पन्न होती है।

    कोशिकाद्रव्य में स्थित कोशिकांग कोशिकाओं के निर्णायक कार्य करते हैं। इन सभी कोशिकांगों का आवरण एक समान होता है। जैसे अन्तर्द्रव्यी जालिका, गॉल्जीकॉय परॉक्सीसोम, ग्लाइऑक्सीसोम आदि। परन्तु कुछ दूसरे कोशिकांगों का आवृत्त फॉस्फोलिपिड का नहीं बना होता है। जैसे– राइबोसोम ।

    कोशिका द्रव्य में पाई जाने वाली झिल्ली युक्त छोटी-छोटी संरचनाओं को कोशिका अंगक कहा जाता है । केंद्रक कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग है।

    जन्तु कोशिका के मुख्य अवयव:
    (1) केंद्रिक (Nucleolus)
    (2) केंद्रक (Nucleus)
    (3) राइबोसोम (Ribosome)
    (4) पुटिका (Vesicle)
    (5) खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum)
    (6) गॉल्जी काय (Golgi body)
    (7) कोशिकापंजर (Cytoskeleton)
    (8) चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (Smooth endoplasmic reticulum)
    (9) माइटोकोंड्रिओन (Mitochondrion)
    (10) धानिका (Vacuole)
    (11) साइटोसोल (Cytosol)
    (12) लयनकाय (Lysosome)
    (13) तारककाय (Centrosome)
    (14) कोशिका भित्ति (Cell membrane)

    कोशिकांग के प्रकार कौनसे है (Types of Cell Organelles)

    कोशिकांग के निम्न प्रकार है अर्थात विभिन्न कोशिकांग निम्नलिखित हैं:

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria)

    माइटोकॉण्ड्रिया की खोज सन् 1900 में अल्टमान नामक वैज्ञानिक ने की थी। इसे कोशिका का ऊर्जा गृह/शक्ति गृह (Power House) भी कहा जाता हैं।  माइटोकॉण्ड्रिया दोहरी झिल्ली के आवरण से घिरी हुई रचनाएँ होती हैं। ये कोशिकाद्रव्य में छोटे-छोटे कणों, गोलों या छड़ों के रूप में पाए जाते हैं। इसमें बाहरी झिल्ली सपाट तथा अन्दर वाली झिल्ली मैट्रिक्स की ओर ऊँगली समान नलिकाओं (पादपों में) अथवा क्रिस्टी (जन्तुओं में) जैसे रचनाएँ बनाती हैं। इसे कोशिका का बिजलीघर कहा जाता है, चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं।इसमें DNA एवं राइबोसोम पाए जाते हैं। राइबोसोम (Ribosome) राइबोसोम की खोज सन् 1955 में पैलाडे नामक वैज्ञानिक ने की थी। राइबोसोम राइबोन्यूक्लिक अम्ल (R.N.A.) तथा प्रोटीन के बने होते हैं।

    राइबोसोम (Ribosomes)

    राइबोसोम की खोज सन् 1955 में पैलाडे नामक वैज्ञानिक ने की थी। यह गोलाकार, दो उपइकाइयों के बने, झिल्ली विहीन राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन के सूक्ष्म कण होते हैं, जो हरितलवक, केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य में (अन्त:प्रद्रव्यो जालिका पर राइबोफोरोन प्रोटीन द्वारा जुड़ा) पाए जाते हैं।राइबोसोम राइबोन्यूक्लिक अम्ल (R.N.A.) तथा प्रोटीन के बने होते हैं। राइबोसोम गोलाकार, 140-160 A व्यास वाले सघन सूक्ष्म कण होते हैं। यह सभी प्रकार के जीवों में पाए जाते है। राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण का केन्द्र होते हैं। यह एमीनो अम्ल का निर्माण करता है। इसे प्रोटीन की फैक्ट्री कहा जाता Mg की कम सान्द्रता पर ये दो उप-इकाइयों में बँट जाते हैं।

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका की खोज सन् 1945 में पोर्टर तथा उनके सहयोगियों ने की थी।अन्तःप्रद्रव्यी जालिका झिल्ली युक्त नलिकाओं का एक बहुत बड़ा तन्त्र होता है। यह दोहरी झिल्ली से घिरी होती है। इसे कोशिका का कंकाल तन्त्र कहलाता है क्योकी यह कोशिका को ढाँचा तथा मजबूती प्रदान करता है । इस पर राइबोसोम लगे होते हैं, जो प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करते हैं। अन्त:प्रद्रव्यी जालिका का प्रमुख कार्य उन सभी वसाओं व प्रोटीनों का संश्लेषण करना है, जो विभिन्न कोशिका झिल्ली अथवा केन्द्रक झिल्ली का निर्माण करते हैं। चिकनी अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (smooth ER) पर राइबोसोम नहीं पाए जाते हैं। ये लिपिड व स्टीरॉल का संश्लेषण करती हैं।

    गॉल्जीकाय (Golai Body)

    गॉल्जीकाय की खोज सन् 1898 में केमिलो गॉल्जी नामक वैज्ञानिक ने की थी। गॉल्जोकाय झिल्ली युक्त पुटिका है, जो एक-दूसरे के ऊपर समानान्तर रूप से रहती है। इन झिल्लियों का सम्पर्क अन्तःप्रद्रव्यो जालिका को झिल्लियो से होता है और इसलिए जटिल कोशिकीय झिल्ली तन्त्र के दूसरे भाग को बनाती हैं। ये केन्द्रक के पास स्थित रहती हैं। कोशिका भित्ति के लिए हेमी सेल्युलोस का निर्माण तथा स्राव गॉल्जीकाय से होता है। गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्यिा या डिक्टियोसोम भी कहा जाता है। गॉल्जीकाय को कोशिका को ट्रैफिक पुलिस भी कहा जाता है। ये कोशिका पट्ट, कोशिका भित्ति, शुक्राणु के एक्रोसोम, लयनकाय तथा हॉरमोन के संश्लेषण का कार्य करती है।

    लाइसोसोम(लयनकाय) (Lysosome)

    सन् 1955में लाइसोसोम की खोज डी दुवे(De Duve)ने की थी। इसमें विभिन्न हाइड्रोलिटिक एन्जाइम्स भरे होते हैं। यह मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं, जो लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    तारककाय(सेन्ट्रोसोम) (Centrosome)

    प्राय: ये जन्तु कोशिका में पाए जाते हैं। इसके अलावा कुछ शैवालों तथा कवकों में दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स की बनी एक रचना होती है इसलिए इसे डिप्लोसोम भी कहा जाता है। प्रत्येक सेन्ट्रियोल्स सूक्ष्मनलिकाओं से निर्मित तीन तन्तुओं के नौ समूहों का बना होता है दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स सेन्ट्रोस्फीयर से घिरे होते हैं। इस सम्पूर्ण रचना को सेन्ट्रोसोम कहा जाता है। कोशिका विभाजन के समय सेन्ट्रोसोम दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स में विभाजित हो जाता है, जो दो विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं।

    रिक्तिका (रसधानियाँ)(Vacuoles)

    ये इकहरी झिल्ली (टोनोप्लास्ट) से घिरी तथा तरल पदार्थों से भरी रचनाएँ होती हैं। पादप कोशिका में, यह बड़े आकार में, जबकि जन्तु कोशिका में ये अनेक और बहुत ही छोटे आकार में होती है। इसे कोशिका का भण्डार घर कहा जाता है, जिसमें खनिज लवण, शर्करा, कार्बनिक अम्ल, O2 एवं Co2 आदि भरे होते हैं। इसमें स्थित रसधानी रस के कारण ही कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) बनी रहती है। इसमें एक वर्णक एन्थोसायनिन पाया जाता है।

    लवक (Plastids)

    सन् 1865 में लवक (Plastid) की खोज हैकेल ने की। लवक कोशिकाओं में स्थित होते हैं। इनकी भीतरी रचना में बहुत-सी झिल्ली वाली परतें होती हैं जो स्ट्रोमा में स्थित होती हैं। ये गोलकार या चपटे आकार के रंगीन अथवा रंगहीन होते हैं। लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। लवक पुष्पों तथा फलों को आकर्षक रंग देते हैं। पुष्पों का आकर्षक रंग कीटों को आकर्षित करता है, जिससे फूलों में परागण होता है। ये तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक, अवर्णी लवक तथा वर्णी लवक होते हैं।

  • कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) और जीव द्रव्य (Protoplasm) क्या है ?

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) क्या है उसकी संरचना क्या है और कोशिका द्रव्य की विशेषताएँ क्या है ? साथ ही हम जानेगे की जीवद्रव्य (Protoplasm) क्या है ? उसकी खोज किसने की | जीवद्रव्य (Protoplasm) की संरचना और विशेषताएँ क्या है ?

    कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) क्या है ?

    कोशिका का एक बड़ा भाग है, जो कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली से घिरा एक तरल पदार्थ होता है। अर्थात कोशिका मे कोशिका झिल्ली के अंदर केन्द्रक को छोड़कर सम्पूर्ण पदार्थों को कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) कहते हैं। इसमें बहुत से कोशिका के घटक होते हैं, जिसे कोशिका अंग कहते हैं, जो कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं।

    कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) सभी कोशिकाओं में पाया जाता है तथा कोशिका झिल्ली के अंदर तथा केन्द्रक झिल्ली के बाहर रहता है। यह रवेदार, जेलीनुमा, अर्धतरल पदार्थ है। यह पारदर्शी एवं चिपचिपा होता है। यह कोशिका के 70% भाग की रचना करता है।

    इसकी रचना जल एवं कार्बनिक तथा अकार्बनिक ठोस पदार्थों से हुई है। इसमें अनेक रचनाएँ होती हैं। प्रकाश सूक्ष्मदर्शी में सभी कोशिकांगों (Cell organelles) को स्पष्ट नहीं देखा जा सकता है। इन रचनाओं को स्पष्ट देखने के लिए इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी या किसी अन्य अधिक विभेदन क्षमता वाले सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता पड़ती है

    यूकैरियोटिक कोशिकाओं में कोशिकांग झिल्लीयुक्त होते हैं, जबकि प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में ये झिल्लीयुक्त नहीं होते हैं |

    इसके बारे में सबसे पहले पोर्टर ( Porter) ने सन् 1945 में बताया था ।

    जीवद्रव्य (Protoplasm) क्या है ?

    कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर जीवद्रव्य कहलाता है। यह कोशिकाद्रव्य अर्द्ध पारदर्शक चिपचिपा, रंगहीन तथा कणिकामय होती है। यहाँ एन्जाइम की प्रचुरता होती है।

    यह प्रत्येक कोशिका में कोशिका झिल्ली के अंदर पाया जाता है। रासायनिक दृष्टि से यह (जीवद्रव्य) कार्बोनिक तथाअकार्बनिक पदार्थो का एक मिश्रण है। इसका उपयोग सभी जीवों द्वारा ईंधन के रूप में किया जाता है।

    डुजार्डिन (Dujardin) ने 1835 में प्रोटोप्लाज्म (protoplasm) की खोज की और इसे “सरकोड (sarcode)” नाम दिया।

    जेई पुर्किनजे (J.E. Purkinje) ने 1839 में सबसे पहले ‘प्रोटोप्लाज्म (Protoplasm) शब्द की शुरुआत की और इस तरल जैविक पदार्थ को जीवद्रव्य  (Protoplasm) का नाम दिया।

    जीव द्रव्य के प्रकार

    जीव द्रव्य को दो भागों में बांटा गया है यह द्रव्य हर एक कोशिका में मौजूद होता है इसके दो भाग इस प्रकार हैं पहला कोशिका द्रव्य तथा दूसरा केंद्रक द्रव्य। किसी भी जीव की कोशिका में जीव द्रव्य अवश्य पाया जाता है तथा जीवित प्राणी के शरीर में यह जीवन का मूल संचरण होता है।

    मैक्स शुल्त्स (Max Schultze) ने प्रोटोप्लाज्म और सरकोड के बीच समानता स्थापित की जो उन्हें एक सिद्धांत का प्रस्ताव करने के लिए प्रेरित किया जिसे हर्टविग द्वारा प्रोटोप्लाज्मिक सिद्धांत (protoplasmic theory by Hertwig) कहा जाता है। यह सिद्धांत बताता है कि जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है (protoplasm is the physical basis of life) ।

  • कोशिका भित्ति (Cell Wall) क्या है ? कोशिका भित्ति के प्रकार, कार्य एवं सरंचना | कोशिका भित्ति एवं कोशिका झिल्ली में अंतर |

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिका भित्ति (Koshika Bhitti ) क्या है ? कोशिका भित्ति की सरंचना और उसके प्रकार क्या है ? कोशिका भित्ति के मुख्य कार्य क्या है ? कोशिका भित्ति और कोशिका झिल्ली में अंतर क्या है ? पादप कोशिका भित्ति क्या है ? आदि

    कोशिका भित्ति (Cell Wall) क्या है ?

    पादप कोशिका में कोशिका झिल्ली के चारों ओर एक परत होती है, जो कोशिका भित्ति कहलाती है | कोशिका भित्ति जंतु कोशिकाओं में अनुपस्थित होती हैं।

    कोशिका भित्ति (Cell Wall) की खोज किसने की ?

    1665 में रॉबर्ट हुक द्वारा ‘कोशिका भित्ति’ की खोज की गई | रॉबर्ट हुक ने इस पादप कोशिका भित्ति को “दीवार (wall)” का नाम दिया |

    यह जीवाणु एवं वनस्पति कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के बाहर निर्जीव, पारगम्य तथा मोटी दीवार के रूप में पायी जाती है । वनस्पति कोशिका में यह कोशिका झिल्ली के बाहर किन्तु जीवाणु में स्लाइम पर्त के नीचे रहती है।

    कुछ निम्न श्रेणी के एक कोशिकीय पौधे, वनस्पति की जनन कोशिका एवं प्राणी कोशिका में कोशिका भित्ति नहीं होती। कोशिका भित्ति का निर्माण सेलूलोज, पेक्टोज तथा अन्य निर्जीव पदार्थों द्वारा होता है

    कोशिका भित्ति की सरंचना और उसके प्रकार क्या है ?

    कोशिका भित्ति की मध्य पटलिका कैल्शियम व मैग्नीशियम पैक्टेट की बनी होती है। यह दो कोशिकाओं को जोड़े रखती है। कोशिका भित्ति मुख्यतया सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी अत्यन्त ही दृढ़ होती है। मोनेरा जगत, कवक जगत, पादप जगत, कुछ प्रोटिस्टा में कोशिका भित्ति होती है सिर्फ जंतु जगत और माइकोप्लाज्मा में नहीं होती है | शैवालों की कोशिका भित्ति द्विस्तरीय होती है आंतरिक स्तर सैलूलोज का बना होता है और बाह्य स्तर मुख्य रूप से प्रोटो-पेक्टिन का बना होता है जो जल में अघुलन शील होता है।

    अलग-अलग प्रकार के पौधों की कोशिका भित्ति संरचनात्मक एवं संगठनात्मक दृष्टि से अलग-अलग प्रकार की होती हैं।

    जैसे –

    जीवाणुओं की कोशिका भित्ति – पेप्टीडोग्लाइकॉन या म्यूकोपेप्टाइड + म्यूरेमिक अम्ल

    कवको की कोशिका भित्ति – काइटिन (एक तरह का पॉलीसैकेराइड)

    शैवालों की कोशिका भित्ति – सेल्युलोज + पेक्टिन

    अन्य विकसित पौधों में – सेल्युलोज से निर्मित

    कोशिका भित्ति के कार्य क्या है ?

    कोशिका भित्ति का मुख्य कार्य कोशिका को एक निश्चित आकार प्रदान करती हैं एवं प्रोटोप्लाज्म की रक्षा करती है | यह कोशिकाद्रव्य एवं कोशिका झिल्ली को बाह्य आघातों से रक्षा करती है।

    चुकीं कोशिका भित्ति मुख्यतया सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी अत्यन्त ही दृढ़ होती है। इसकी यही दृढ़तापन कोशिका की एक निश्चित आकृति और आकार बनाए रखने में सहायता करती है साथ ही यह भित्ति कोशिका को यान्त्रिक हानियों और संक्रमण से रक्षा तथा कोशिकाओं के बीच आपसी सम्पर्क बनाए रखने में सहायता प्रदान करते हैं।

    नोट :

    पृथ्वी पर सबसे छोटा जीव माइकोप्लाजमा है यह बहुत छोटे जीवाणु हैं, जिनमें कोशिका भित्ति नहीं होती और यह अपना रूप बदलते रहते हैं, इन्हें ‘प्रकृति का जोकर‘ कहते हैं |

    कोशिका भित्ति एवं कोशिका झिल्ली में अंतर

    पादप कोशिकाओं का सबसे बाहरी दृढ़ एवं निर्जीव आवरण कोशिका भित्ति कहलाता हैं। कोशिका भित्ति जंतु कोशिकाओं में अनुपस्थित होती हैं।

    कोशिका झिल्ली कोशिका की सबसे बाहरी परत है जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है।

    उपरोक्त आर्टिकल में आप निचे दिए गये प्रश्नों के उत्तर शामिल है :

    1. कोशिका भित्ति (Cell Wall) क्या है ?
    2. कोशिका भित्ति के कार्य क्या है ?
    3. कोशिका भित्ति के प्रकार क्या है ?
    4. कोशिका भित्ति की सरंचना क्या है ?
    5. पादप कोशिका भित्ति क्या है ?
    6. कोशिका भित्ति और कोशिका झिल्ली में क्या अंतर है ?
    7. जीवाणु में कोशिका भित्ति किसकी बनी होती है?
    8. शैवाल की कोशिका भित्ति किसकी बनी होती है?
    9. कोशिका भित्ति (Cell Wall) की खोज किसने की ?