Category: बायोलॉजी

  • तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना पौधे का वह भाग है जो कि भूमि एवं जल के विपरीत तथा प्रकाश (Light) की ओर वृद्धि करता है। तना प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है और शाखाओं, पतियों, फूल एवं फल धारण करता है।

    तना पौधे का आरोही भाग है, जो भूमि के विपरीत प्रकाश की ओर गति करता है। (Negatively geotropic but positively phototropic). तने का आकार बेलनाकार, चपटा अथवा कोणीय (Angular) होता है। तने की अग्र सिरे पर कलिकाएँ (Buds) पायी जाती हैं, जिनसे तना वृद्धि करता है।

    तने की विशेषताएं (Characteristics of stem):

    • तना पौधे को दृढ़ता प्रदान करता है, जो तना में उपस्थित जाइलम तथा दृढ़ोत्तक (soloronchyma) के कारण होता है।
    • यह शाखाओं, पत्तियों एवं पुष्पों को जन्म देता है।
    • यह जड़ों द्वारा अवशोपित जल और खनिज लवणों को अन्य भागों तक तथा पत्तियों में संश्लेपित भोजन को जड़ सहित अन्य भागों तक पहुँचाता है।
    • तनों में निश्चित पर्वसन्धियाँ (nodes) तथा पर्व (inter-nodes) होते है। शाखाएँ एवं पत्तियाँ सामान्यतया पर्वसन्धियों से ही निकलता है।
    • तना जड़ों की भाँति खाद्य संग्रह भी करती है। जैसे-आलू, हल्दी, अदरक, गन्ना आदि। तना धनात्मक प्रकाशानुवर्ती तथा ऋणात्मक गुरुत्वानुवव्रती होता है ।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने में अन्तर

    एकबीजपत्री तनाद्विबीजपत्री तना
    इसमें कैम्बियम नहीं पाया जाता। फलतः द्वितीयक वृद्धि का अभाव होता है।इसमें कैम्बियम पाया जाता है, इसलिए द्वितीयक वृद्धि भी पाई जाती है।
    मज्जा (pith) अनुपस्थित होता है।मज्जा उपस्थित होता है।
    इसकी एपीडर्मिस पर रोम नहीं पाए जाते।इसकी एपीडर्मिस पर रोम पाए जाते हैं।
    इसकी हाइपोडर्मिस स्क्लेरेन्काइमा की बनी होती हैं।इसकी हाइपोडर्मिस कोलेन्काइमा की बनी होती है।
    इसमें संवहन बण्डल बन्द प्रकार के होते हैं।इसमें संवहन बण्डल खुलै प्रकार के होते हैं।
    इसमें मज्जा किरणे नहीं पाई जाती हैं।इसमें मज्जा किरणें पाई जाती हैं।

    तने के विभिन्न प्रकार (Type of Plant Stem)

    भूमि की स्थिति के अनुसार तने के तीन प्रकार होते है जो निम्न है :

    1. भूमिगत तना (Underground Stem)

    भूमिगत तना पौधे के तने का वह भाग जो भूमि के अंदर पाया जाता है । भूमिगत तने में पर्व सन्धियाँ, पर्ण कलिकाएँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भूमिगत तने भोजन संग्रह करने के कारण मोटा एवं मांसल हो जाता है।

    जैसे- हल्दी, अदरक, केला, फर्न, आलू, प्याज, लहसुन, कचालू, जिमीकन्द, अरबी आदि।

    भूमिगत तने का रूपान्तरण (Modifications of underground stem)

    भूमिगत तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) प्रकन्द (Rhizorne): 

    यह मोटा, फैला हुआ भूमिगत तना होता है। इसमें कक्षस्थ तथा अग्रस्थ कलिकाएँ भी पायी जाती हैं। यह तना शाखारहित या शाखायुक्त हो सकता है। कभी-कभी इसमें अपस्थानिक जड़ (Adventitious roots) भी विकसित हो जाती है। इनमें स्पष्ट पर्व, पर्व सन्धियाँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। इस प्रकार का भूमिगत तना हल्दी, अदरक, केला, फर्न आदि पौधों में पाया जाता है।

    (ii) स्तम्भ कन्द (stem tuber): 

    यह एक प्रकार का भूमिगत तना है। यह भोजन संग्रह करने के कारण शीर्ष पर फ्ल जाता है। इस प्रकार के तने की सतह पर अनेक गड्ढ़े होते हैं, जिन्हें आंखें (eyes) कहते हैं। प्रत्येक आंख एक शल्क पत्र होता है, जो पर्व-सन्धि की स्थिति को दशतिा है तथा प्रसुप्त कलिकाएँ होती हैं। इन्हीं प्रसुप्त कलिकाओं से वायवीय (Aerial) शाखाएँ निकलती हैं जिनके अगले सिरे पर अग्रस्थ कलिका होती है जो कि अनुकूल परिस्थितियों में वृद्धि करके नए पौधे को जन्म देते हैं। इस प्रकार का तना आलू में पाया जाता है।

    (iii) शल्क कन्द (Bulb): 

    इस प्रकार का भूमिगत तना बहुत से छोटे-छोटे शल्क पत्रों (scaly leaves) से मिलकर बना होता है। यह शल्क पत्र जल तथा भोजन संग्रह करने के कारण मांसल (fleshy) हो जाते हैं। इस प्रकार के भूमिगत तने की बाहरी परत शुष्क (dry) होती है। यह तना संकेन्द्रीय क्रम में व्यवस्थित शल्क पत्र लिये हुए पाये जाते हैं। प्याज (Onion) तथा लहसुन (Garlic) इस प्रकार के भूमिगत तने का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) घनकन्द (Corm): 

    इस प्रकार का भूमिगत तन प्रकन्द (Rhizome) का संघनित रूप है। यह भूमि के नीचे उर्ध्व दिशा में वृद्धि करता है। इसमें अधिक मात्रा में भोजन संचित हो जाता है। शल्क पत्रों के कक्षा में कलिकाएँ पायी जाती हैं जबकि इसके आधार से अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं। कचालू एवं जिमीकन्द में इस प्रकार का भूमिगत तना देखने को मिलता है।

    2. अर्द्धवायवीय तना (Sub Aerial Stem):

    जब तने का कुछ भाग भूमि के अन्दर तथा कुछ भाग भूमि के बाहर वायु में पाया जाता है, तब इस प्रकार के तने की अर्द्धवायवीय तना कहते हैं। जैसे – दूब घास, मर्सीलिया, पैसीफ्लोरा, अरुई, जलकुम्भी, समुद्री सोख, गुलदाऊदी, पिपरमिन्ट आदि।

    अर्द्धवायवीय तने में कायिक जनन के लिए कलिकाएँ पायी जाती हैं, जिनसे पार्श्व शाखाओं (Lateral branches) की उत्पत्ति होती है।

    अर्द्धवायवीय तने का रूपान्तरण (Modification of sub aerial stem):

    अर्द्धवायवीय तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) उपरिभूस्तरी (Runner)-

    यह भूमि की सतह के समानान्तर फैला हुआ अर्द्धवायवीय तना है। इस प्रकार के तने में लम्बे एवं पतले पर्व (Inter nodes) पाये जाते हैं। पर्वसन्धियों से ऊपर की ओर शाखाएँ एवं तना तथा भूमि के अन्दर अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं दूब घास, मर्सीलिया आदि में उपरिभूस्तरी तना पाया जाता है।

    (ii) भूस्तरी (Stolon): 

    इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना भूमि के अन्दर क्षैतिज दिशा में वृद्धि करता है। इस प्रकार के तने पर पर्व (Internode) तथा पर्व सन्धियाँ (Nodes) पाये जाते हैं। पर्व सन्धियों से नीचे की ओर अपस्थानिक जड़ें तथा ऊपर की ओर शाखाएँ विकसित होती हैं। अरुई तथा पैसीफ्लोरा में इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना पाया जाता है।

    (iii) भूस्तारिका (offset): 

    इस प्रकार का अर्द्ध वायवीय तना उपरिभूस्तरी (Runner) की तरह ही होता है, परन्तु इनके पर्व (nodes) मोटे तथा छोटे होते हैं। पर्व सन्धियों से ऊपर पतियाँ एक स्वतंत्र पौधे की भाँति होती है। जलकुम्भी भूस्तारिका का अच्छा उदाहरण है।

    (iv) अन्तः भूस्तरी (suckers):

    इस प्रकार के अर्द्धवायवीय तने में भूस्तरी (stolon) तने की तरह एक पार्श्व शाखा होती है, परन्तु यह ऊपर की ओर तिरछा बढ़ता है और एक नए पौधे को जन्म देता है। यह भूस्तरी (stolon) की तुलना में छोटा होता है। इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना गुलदाऊदी, पिपरमिण्ट आदि में देखने को मिलता है।

    3. वायवीय तना (Aerial stem): 

    जब सम्पूर्ण तना भूमि के ऊपर स्थित होता है, तो ऐसे तने को वायवीय तना कहते हैं। इस प्रकार के तने में शाखाएँ, पत्तियाँ, पर्व, पर्वसन्धियाँ, कलिकाएँ, फल, फूल सभी पाये जाते हैं। उदाहरण- गुलाब, अंगूर, नागफनी, रस्कस, कोकोलोवा आदि।

    वायवीय तने का रूपांतरण (Modification of Aerial Stem):

    वायवीय तने के पांच प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) कटक स्तम्भ (stem thorn): 

    इस प्रकार के तने में कक्षस्थ कलिकाएँ काँटे (thorn) के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। इन काँटों पर पत्ती, शाखा एवं पुष्प विकसित होते हैं। नींबू, वोगेनविलिया आदि पौधों में कटक स्तम्भ पाये जाते हैं।

    (ii) स्तम्भ प्रतान (stem tendril): 

    इस प्रकार के तने में पत्तियों के कक्ष से निकली शाखा बनाने वाली कलिका एक कुण्डलित, तन्तु बना लेती है जो कमजोर तने वाले पौधों के आरोहण में सहायता करती है। यह तन्तु (Filament) ही स्तम्भ प्रतान कहलाता है। अंगूर तथा कुकुरबिटेसी कुल के पौधों में स्तम्भ प्रतान पाया जाता है।

    (iii) पर्णकाय स्तम्भ (Phyloclade): 

    यह एक हरा, चपटा तथा कभी-कभी गोल-सा तना होता है जो कि पत्तियों की भाँति कार्य करता है। इसकी पत्तियाँ कॉटे रूपी संरचना में परिवर्तित हो जाती हैं। यह रूपान्तरण पौधों से होने वाले जल हानि को रोकता है। पर्णकाय स्तम्भ अनिश्चित वृद्धि वाले शाखा से विकसित होता है। नागफनी (Opuntia) तथा केजुराइना (Casurina) पर्णकाय स्तम्भ का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) पर्णाभ पर्त (Cladode): 

    कुछ पौधों की पर्त सन्धियाँ से छोटी, हरी, बेलनाकार अथवा चपटी शाखाएँ निकलती हैं। इस प्रकार की शाखाएँ पत्तियों के कक्ष से निकलती हैं, जो स्वयं शल्क पत्र (scaly leaves) में रूपांतरित हो जाती हैं। ऐसा रूपांतरण पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करने के उद्देश्य से होता है। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हरे तने एवं उसकी शाखाओं के द्वारा सम्पादित होती है। तनों के इस प्रकार के रूपान्तरण को पर्णाभ पर्व (Cladode) कहते हैं। सतावर (Asparagus), रस्कस (Ruscus) पणभि पर्व का सुन्दर उदाहरण हैं।

    (v) पत्र प्रकलिका (Bulbil): 

    कुछ पौधों की कक्षस्थ एवं पुष्प कलिकाएँ विशेष छोटे आकार की रचना में रूपांतरित हो जाती हैं, जिन्हें पत्र-प्रकलिका (Bulbil) कहते हैं। ये पत्र-प्रकलिका अपने मातृ पौधे (Mother plant) से अलग होकर मिट्टी में गिर जाती हैं तथा अनुकूल परिस्थितियों में विकसित होकर नए पौधों को जन्म देती हैं। अलोय (Aloe), अगेव (Agave) आदि पौधों में पत्र-प्रकलिका देखने को मिलता है।



  • जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root,  its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root, its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    जड़ (Root) मूलांकुर (radicle) से निर्मित विभिन्न शाखाओं में फैलकर, भूमि के अन्दर प्रकाश से दूर (negatively phototropic), जल की तलाश में, गुरुत्व की ओर वृद्धि करता है। जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।

    जड़ पौधे का वह भाग है जो बीजों के अंकुरण के समय मूलांकर (Radicle) से विकसित होता है और प्रकाश के विपरीत (negatively phototropic) लेकिन जल एवं भूमि की तरफ बढ़ता है |

    जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।

    मूलांकुर से विकसित प्रथम जड़ प्राथमिक जड़, जबकि सभी शाखाएँ द्वितीयक जड़ कहलाते हैं। जड़ो में एककोशिकीय मूलरोम पाए जाते हैं।

    जड़ों में सन्धियाँ, पर्वसन्धियाँ, पत्तियाँ आदि नहीं पाई जाती है। जडें नकारात्मक प्रकाशानुवर्ती और धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती होती हैं।

    जड़ों के प्रकार (Types of Roots)

    सामान्यतः जड़ें दो प्रकार की होती हैं-

    मूसला जड़ (Tap Root )
    अपस्थानिक जड़ (Adventitious Root)

    मूसला जड़ (Tap Root)

    मूसला जड़ वह जड़ है, जिसमें मूलांकुर (Radicle) विकसित होकर एक मुख्य या प्राथमिक जड़ (Primary root) का निर्माण करता है, जो अन्य शाखाओं से मोटी होती है तथा अधिक गहराई तक जाती है। इससे कई शाखाएँ निकलती हैं, जिन्हें द्वितीयक जड़ (Secondary root) कहते हैं।

    द्वितीयक जड़ों से निकलने वाली शाखाओं को तृतीयक जड़ (Tertiary root) कहते हैं।

    इस प्रकार बनी प्राथमिक जड़ तथा इसकी शाखाओं को मूसला जड़ तन्त्र (Tap root system) कहते हैं।

    ऐसी जड़ें द्विबीजपत्री पौधों में पायी जाती हैं तथा भूमि में बहुत गहराई तक वृद्धि करके पौधे को मजबूती से खड़ा रखती हैं। यह जड़, चना, मटर, गाजर, मूली, सरसों, आम, नीम इत्यादि  पौधों में पायी जाती है।

    मूसला जड़ (Tap Root) के प्रकार

    1. तर्कुरूप (Fusiform)
    इस प्रकार की जड़ें बीच से मोटी और किनारों पर पतली होती है जैसे-मूली।

    2. कुम्भी रूप (Napiform)
    ये जड़ें शीर्ष पर मोटी और फूली हुई होती है तथा नीचे की ओर पतली होती है जैसे – शलजम (Turnip), चुकन्दर (Beet) 

    3. शंकु रूप (Conical)
    इस प्रकारी की मूसला जड़े आधार की ओर मोटी तथा नीचे की ओर क्रमशः पतली होती हैं। जैसे-गाजर।

    4. श्वसन मूल (Pneumatophores (न्यूमेटाफ़ोर) root)  – राइजोफोरा (Rhizophora), सुन्दरी (Sundari) आदि पौधे जो दलदली स्थानों पर उगते हैं, में भूमिगत मुख्य जड़ों से विशेष प्रकार की जड़ें निकलती हैं, जिसे न्यूमेटाफोर कहते हैं। ये खूंटी के आकार की होती हैं, जो ऊपर वायु में निकल आती हैं। इनके ऊपर अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें न्यूमेथोडस (Pneumathodes) कहते हैं। 

    अपस्थानिक जड़ (Adventitious root or Fibrous root system)

    कुछ पौधों में अकुंरण के कुछ समय बाद मूलांकुर (Redicle) की वृद्धि रुक जाती है और प्रांकुर के आधार या तने की निचली पर्वसन्धियों से रेशे के रूप में जड़ें विकसित हो जाती हैं, उन्हें ही अपस्थानिक या रेशेदार जड़ (Fibrous root) कहते हैं। इस प्रकार से बने जड़ गुच्छ को अपस्थानिक जड़ तन्त्र (Adventitious root system) कहते हैं।

    अपस्थानिक जड़ मूलांकुर की वृद्धि एक जाने के कारण जड़े शाखाओ, तनों के आधारीय भागों तथा पत्तियों में निकलती है। यह प्रायः एकबीजपत्री (monocot plants) पौधों में पाई जाती है जैसे-धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा, गन्ना इत्यादि। 

    कुछ द्विबीजपत्री पादकों जैसे बरगद, पान, अमरबेल इत्यादि  में भी अपस्थानिक जड़ें पायी जाती हैं। ये जड़ें भूमि में गहराई तक न जाकर केवल ऊपरी सतह तक फैली होती हैं।

    विभिन्न प्रकार की अपस्थानिक जड़ें

    भोजन संग्रह, पौधों को यांत्रिक सहारा (Mechanical support) प्रदान करने अथवा अन्य विशिष्ट कार्यों को करने के उद्देश्य से अपस्थानिक जड़ें अनेक प्रकार से रूपांतरित हो जाती हैं।

    मूसला तथा अपस्थानिक जड़ों में अन्तर (Difference between Tap root and Adventitious roots)

    मूसला जड़ (Tap root) अपस्थानिक जड़
    मूसला जड़ की प्राथमिक जड़ समाप्त नहीं होती तथा यह क्रमश: पतली होती जाती है। अपस्थानिक जड़ों की प्राथमिक जड़ बनने के तुरन्त बाद समाप्त हो जाती है और प्ररोह के अन्तिम भाग से अनेक रेशेदार जड़ें निकलती हैं।
    यह भूमि के अन्दर गहराई तक जाती है । यह भूमि की ऊपरी सतह पर ही स्थित होती है ।
    यह बीज के मूलांकुर से पैदा होती है। यह पौधे के प्ररोह भाग (वायवीय भाग) से पैदा होती है।
    इसकी प्राथमिक जड़ से अनेक शाखाएँ निकलती हैं। उदाहरण- मटर, चना, अरहर इत्यादि की जड़ें। इसकी प्राथमिक जड़ विलुप्त हो जाती हैं। उदाहरण-गेहूँ, जौ, धान, मक्का इत्यादि की जड़ें ।

    जड़ की विशेषताएँ (Characteristics of root)

    जड़ पौधों के अक्ष का अवरोही (Descending) भाग है, जो मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है।

    जड़ सदैव प्रकाश से दूर भूमि में वृद्धि करती है।

    भूमि में रहने के कारण ही जड़ों का रंग सफेद अथवा मटमैला होता है।

    जड़ों पर तनों के समान पर्व (Nodes) एवं पर्व सन्धियाँ (Internodes) नहीं पायी जाती है।

    जड़ों पर पत्र एवं पुष्प कलिकाएँ भी नहीं होती हैं। अतः ये पतियाँ, पुष्प एवं फल धारण नहीं करती हैं।

    जड़ें सामान्यतः धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (Positive geotropic) तथा ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती (Negative phototropic) होती हैं।

    जड़ का सिरा मूल गोप (Root cap) द्वारा सुरक्षित रहता है।

    जड पर एककोशिकीय रोम (Unicellular hairs) होते हैं।

    जड़ों के कार्य (Functions of Roots)

    जड़ें मूल रोमों की सहायता से जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते है।

    (जलोद्भिद् में मूल रोमों का अभाव होता है) पिस्टिया व लेमना पौधों में मूल गोप की जगह मूल पॉकेट (root pocket) पाया जाता है।

    मूल रोम (Root hairs) तथा जड़ों के कोमल भाग जल और घुलित खनिज लवण का अवशोषण करते हैं।

    यह पौधों को भूमि में स्थिर रखती है।

    कुछ जड़ें अपने अंदर भोज्य पदार्थों का संग्रह करते हैं प्रतिकूल परिस्थितियों में इन संचित भोज्य पदार्थों का पौधों द्वारा उपयोग किया जाता है।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री जड़ में अन्तर

    एकबीजपत्री जड़

    इसमें द्वितीयक वृद्धि नहीं पाई जाती है।

    इसमें पिथ पूर्ण विकसित होता है। 

    परिरम्भ से केवल पार्थ मूलों का निर्माण करती है। 

    इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छ: से अधिक होती है। 

    इसमें कैम्बियम का अभाव होता है। ।

    द्विबीजपत्री जड़

    इसमें द्वितीयक वृद्धि पाई जाती है। 

    इसमें पिथ अल्प विकसित होता है। 

    परिरम्भ पार्श्व मूलों तथा द्वितीयक विभज्योतक दोनों का निर्माण करती है।

    इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छः से कम होती है।

    इसमें कैम्बियम पाया जाता है।

  • पादप ऊतक | Plant Tissue | जाइलम, फ्लोएम, Phloyem, Xylem, Plant Tissues in Hindi

    पादप ऊतक | Plant Tissue | जाइलम, फ्लोएम, Phloyem, Xylem, Plant Tissues in Hindi

    इस आर्टिकल में जीवधारियों की बनावट के साथ उत्तक के बारे में विस्तृत रूप से जानेगें | पादप उत्तक क्या है उसके प्रकार क्या है इसके बारे में जानेगें | साथ ही स्थायी उत्तक (Permanent Tissue) और जटिल स्थायी उत्तक (Complex Permanent Tissue) को समझेगें | जाइलम क्या है ?, फ्लोएम क्या है ? जाइलम और फ्लोएम में क्या अंतर है ? विशिष्ट स्थायी उत्तक (Special Permanent Tissue) क्या है उसके प्रकार क्या है और वह पोधो के लिय किस प्रकार सहायक है ? रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रंथिया क्या होती है और किस प्रकार बनती है आदि के बारे में बात करेगे |

    उत्तक क्या है (What is Tissues)

    बहुकोशिकीय जीवों में विभिन्न शारीरिक कायों के सम्पादन हेतु समान उत्पत्ति, संरचना एवं कार्यो वाली कोशिकाओं का समूह संगठित होता है। कोशिकाओं का यह विशेष समूह जिसे ऊतक (tissue) कहते हैं, निश्चित कार्य हेतु जिम्मेदार होते हैं। ऊतक शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम विचट (Witchet) ने किया। जीव विज्ञान की वह शाखा, जिसमें ऊतकों का अध्ययन किया जाता है उसे औतिकी (Histology) कहते हैं।

    विभिन्न कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनते है। ऊतकों का समूह मिलकर अंग, अंगों का समूह अंगतन्त्र बनाता है और अगतन्त्र मिलकर जीव के जीवन प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाते हैं।

    बहुकोशिकीय जीवों का यह संगठन पादपों और प्राणियों में अलग-अलग प्रकार का होता है।

    जैसा कि हम जानते है कि पादप भी जीवित होते हैं, और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ उनको भी होती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए उनमें अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। किंतु पादपों का शरीर और शरीर में होने वाली क्रियाएँ जंतुओं से पूर्णतः भिन्न होती हैं। अतः पादप ऊतक भी जंतु ऊतकों से भिन्न होते हैं जो अपने शरीर में होने वाली क्रिया-विधियों के लिए अनुकूलित होते हैं।

    जेवियर बिचैट (Xavier Bichat ) ने 1801 anatomy (शरीर रचना विज्ञान) के अध्ययन के दौरान ऊतक (Tissue) शब्द की शुरुआत की। बिचैट ने 21 प्रकार के प्राथमिक ऊतकों की पहचान की, जिनसे मानव शरीर के अंगों की रचना होती है ।

    पादप तथा जंतु ऊतक (Plant and Animal Tissues)

    विभज्योतक (Meristematic Tissue) – इनमें विभाजन की अपार क्षमता पाई जाती है।
    स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) – ये विभाजन की क्षमता खो कर विभिन्न प्रकार के कार्यों को संपादित करते हैं।

    स्थायी ऊतक को पुनः उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जाता है-

    सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
    जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)

    सरल स्थायी ऊतकों को पुनः उनकी कोशिकाओं की प्रवृत्यिों एवं अंतराकोशिकीय अवकाश के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

    पैरेनकाईमा (Parenchyma)
    कोलेनकाईमा (Cholenchyma)
    स्केलेरेनकाईमा (Schalerenchyma)

    इसी प्रकार जटिल स्थायी ऊतक भी उनके द्वारा संपादित कार्यों के आधार पर दो प्रकार के होते हैं-

    जाइलम (Xylem)
    फ्लोएम (Pholem)

    इसी प्रकार जंतु ऊतकों को भी मोटे तौर पर चार भागों में बाँटा जा सकता है-

    उपकला ऊतक (Epithelial Tissue)
    संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
    पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
    तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)

    पादप ऊतक (Plant Tissue) क्या है ?

    पादप ऊतक दो प्रकार के विभज्योत्तक ऊतक और स्थायी ऊतक होते है

    विभज्योत्तक ऊतक (Meristematic Tissue)

    इस ऊतक की कोशिकाओं में तीव्र गति से विभाजन (सूत्री विभाजन) होने की प्रवृत्ति होती है। यह ऊतक पौधों के वर्धी भागों, जैसे तने तथा जड़ों के अग्र सिरे (apical rogion) में पाए जाते हैं। यह ऊतक पौधों की लम्बाई एवं मोटाई बढ़ाने हेतु उत्तरदायी होते हैं। यह मुख्यतया तीन प्रकार के होते हैं:

    शीर्षस्थ अथवा अग्रही विभज्योत्तक (Apical Meristematic Tissue)

    यह ऊतक जड़ एवं तने के अग्र (शीर्ष) भाग तथा पत्तियों के कक्षों में स्थित कलिकाओं में ऊतक पाया जाता है। यह ऊतक मुख्य रूप से पौधों की लम्बाई में वृद्धि के लिए उत्तरदायी होते हैं। उदाहरण – प्ररोह शीर्ष तथा मूल शीर्ष

    पार्श्व विभज्योत्तक (Lateral Meristematic Tissue)

    ये ऊतक पौधों के तने एवं जड़ों के पार्श्व भागों में पाए जाते है, जो पौधों की मोटाई के लिए विशेष महत्व रखती है। इसी में जाइलम और फ्लोएम, जैसे संवहनी तन्त्र पाए जाते हैं। उदाहरण – संवहन कैम्बियम तथा कॉर्क कैम्बियम

    अन्तर्वेशी विभज्योत्तक (Intercalary Meristematic Tissue)

    ये ऊतक हमेशा पर्व सन्धि (nodes) पर पाए जाते हैं तथा इन ऊतकों के कारण पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है। ये वास्तव में शीर्षस्थ विभज्योत्तकों के अवशेष है, जो बीच में स्थायी ऊतकों के आ जाने के कारण अलग हो जाते हैं। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा घासों के अग्र भाग खा लिए जाने पर, उसमें अन्तर्वेशी विभज्योत्तक के माध्यम से ही वृद्धि होती है।

    स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)

    विभज्योत्तक ऊतक परिपक्व होने पर स्थायी ऊतकों में परिवर्तित हो जाती है। किन्तु स्थायी ऊतकों में विभाजन की क्षमता नहीं होती है। इन ऊतकों की कोशिकाएँ मृत अथवा जीवित, पतली या मोटी भित्ति वाली होती है। यह तीन प्रकार की होती हैं :

    साधारण स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)

    इस ऊतक की यही विशेषता होती है कि इसमें एक ही प्रकार की आकृति तथा एक ही तरह के कार्य करने वाली (homogeneous) कोशिकाओं का समूह होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं :

    मृदूतक (Parenchyma)

    यह ऊतक पौधों के मुलायम भागों तथा विभिन अंगों (बाहरी त्वचा तथा फल के गूदे आदि) में पाए जाते हैं। इसका मुख्य कार्य खाद्य पदार्थों जैसे मण्ड, प्रोटीन तथा वसा का संग्रह करना है। कुछ पौधों जैसे नागफनी तथा यूफोरबिया के माँसल तनों तथा पत्तियों में जल संग्रह का कार्य करते हैं। यदि इनमें हरित लवण उपस्थित होता है तो यह प्रकाश-संश्लेषण करते हैं और क्लोरेनकाइमा कहलाते हैं।

    स्थूलकोणोत्तक (Collenchyma)

    यह ऊतक मृदूतक का ही रूपान्तरित रूप है तथा यह शाकीय पौधों की बाहरी त्वचा के नीचे और पत्तियों के पर्णवृन्तों में पाए जाते है। इसकी कोशिकाएँ जीवित, रिक्तिकायुक्त एवं कोशिकाद्रव्य युक्त होती है। इसकी कोशका भित्तियों के कोनों पर सेलुलोज तथा पेक्टिन के जमाव के कारण असमान रूप से मोटी होती है। इसका मुख्य कार्य पौधों को यान्त्रिक बल तथा लचीलापन प्रदान करने तथा हरितलवक की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया करना है ।

    दृढ़ोतक (Sclerenchyma)

    यह ऊतक मोटी कोशिका भित्ति तथा लिग्निन युक्त मृत (dead), लम्बी, संकरी तथा दोनों सिरों पर नुकीली होती है। यह ऊतक पौधों को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। इसकी कोशिका भित्ति में अनेक जगहों पर सेलुलोज का जमाव नहीं होता है चूँकि इन स्थानों पर जीवद्रव्य तन्तु होते हैं। ऐसे स्थान सरल गर्त (simple pits) कहलाते हैं। लिग्निन युक्त होने के कारण इसका तन्तु अत्यन्त ही दृढ़ होता है, जिसे स्क्लेरिड्स कहते हैं। अखरोट तथा नारियल की अन्तः फल भित्तियों में तथा लेग्युमिनोसी कुल के बीजों के बीजाकरण में यह ऊतक पाए जाते हैं।

    जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)

    इस प्रकार के ऊतक एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। इसे संवहन ऊतक भी कहा जाता है क्योंकि पादपों में यह संवहन का कार्य करते हैं। इसके अन्तर्गत जाइलम एवं फ्लोएम जैसे संवहनीय ऊतक आते हैं।

    1. जाइलम (Xylem) क्या है ?

    यह पतली एवं लम्बी नलिकाओं के रूप में पौधों की जड़ों से लेकर पत्तियों तक फैले होते हैं। ये जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज-लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है तथा पौधों को दृढ़ता प्रदान करता है इसे प्रायः काष्ठ (wood) भी कहा जाता है। जाइलम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि यह चार प्रकार की कोशिकाओं- वाहिनिकाओं (tracheids), वाहिकाओं (vessel), काष्ठ तन्तु (wood fibres) और काष्ठ मृदूतक (wood parenchyma) की बनी होती है।

    वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ मृत कोशिकाओं की बनी होती है। वाहिकाएँ टेरिडोफाइट्सजिम्नोस्पर्म में अनुपस्थित होती हैं।

    आवृतबीजियों में उपस्थित जल एवं खनिज लवणों के संवहन हेतु इसमें अनेक वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ होती है। जाइलम के अन्तर्गत आने वाले काष्ठ मृदूतक (जीवित व अधिक मात्रा में होती है) स्टार्च तथा वसीय पदार्थों का संचय तथा जल परिवहन में सहायता करते हैं। इसकी कोशिका भित्ति सख्त तथा लिग्निनयुक्त होती है, जो पौधों को अतिरिक्त यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। सामूहिक रूप से इसे काष्ठ तन्तु (Xylem Fibre) कहते हैं।

    2. संवहन पूल (Vascular Bundle) क्या है ?

    संवहन पूल कैम्बियम सहित या कैम्बियम रहित जाइलम तथा फ्लोयम का बना होता है। कैम्बियम युक्त संवहन पूल खुले (open vascular bundle), जबकि कैम्बियम रहित संवहन पूल बन्द (closed vascular bundle) कहलाते हैं।

    • एण्डार्क (Endarch) सेन्ट्रीफ्यूगल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम मध्य भाग की ओर तथा मेटाजाइलम बाहर की ओर होता है)।
    • एक्सार्क (Exarch) सेन्ट्रीपीटल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम बाहर की तथा मेटाजाइलम केन्द्र की ओर होता है)।
    • संयुक्त संवहन पूल (Conjoint vascular bundle) जाइलम व फ्लोएम एक अर्द्धव्यास पर साथ-साथ पाए जाते हैं ।
    • संकेन्द्री (Concentric) एक प्रकार का संवहन ऊतक है, जो दूसरे प्रकार के संवहन ऊतक को घेरे रहता है।

    द्वितीयक वृद्धि

    जब पौधा छोटा होता है, तब उसमें ऊतक प्राथमिक विभज्योत्तक द्वारा बनते हैं अर्थात् इनके द्वारा निर्मित ऊतकों को प्राथमिक ऊतक कहते हैं।

    आयु बढ़ने के साथ द्विबीजपत्री पौधों में नई कोशिकाओं का निर्माण स्थायी मृदूतक द्वारा उत्पन्न नई विभज्योत्तक से होता है। ये नई कोशिकाएँ द्वितीयक ऊतक कहलाती हैं।

    इन्हीं द्वितीयक ऊतकों के कारण पौधे के अंगों की मोटाई में वृद्धि होती है, जिसे द्वितीयक वृद्धि कहते हैं।

    द्वितीयक वृद्धि एधा (cambium) एवं कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण होती है। द्वितीयक वृद्धि केवल द्विबीजपत्री पादपों में ही पाई जाती है। इससे बनने वाले वार्षिक वलयों के आधार पर ही वृक्षों की आयु निर्धारित होती है।

    3. फ्लोएम (Phloem) क्या है ?

    प्रकाश-संश्लेषण में निर्मित भोज्य पदार्थ का पौधों के विभिन्न भागों में पहुँचाने का कार्य फ्लोएम संवहनीय ऊतक द्वारा संचालित होता है।

    यह चार प्रकार की कोशिकाएँ-चालनी नलिकाएँ (sieve tubes), सखि कोशिकाएँ (companion cells), फ्लोएम मृदूतक (phloem parenchyma) तथा फ्लोएम तन्तु (phloem fibres) से मिलकर बनता है।

    इनमें से चालनी नलिका में छिद्रित भित्ति मुख्य रूप से भोज्य पदार्थ के संवहन का कार्य करती है, जबकि अन्य शेष कोशिका उसे इस कार्य में सहायता करती है। फ्लोएम की नलिकाएँ जीवित कोशिकाएँ होती हैं तथा पौधों की यान्त्रिक दृढ़ता में विशेष योगदान नहीं करती है। चालनी नलिकाएँ परिपक्व अवस्था में अकेन्द्री (enucleate) हो जाती हैं। ये कोशिकाएँ अनावृतबीजी (gymnosperm) में अनुपस्थित होती हैं।

    जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) में क्या अंतर है ?

    1. जाइलम के ऊतक (Tissue) ट्यूबलर के आकार की संरचना के होते हैं, जिसमें क्रॉस दीवारों (Cross walls) की अनुपस्थिति होती है । यह ऊतक एक तारे के आकार जैसा दिखता है. वहीं फ्लोएम ऊतक ट्यूबलर के आकार के, लम्बें होते हैं, पतली छलनी नलिकाओं (Thin Sieve Tubes) के साथ दीवारों (Walls) की उपस्थिति के साथ संरचनाएं वाले ।

    2. जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो पानी और विघटित खनिजों को जड़ से अवशोषित कर शेष पौधे तक पहुँचाता है और फ्लोएम एक संवहनी ऊतक है जो पौधे के हरे भागों से पौधे के बाकी हिस्सों में प्रकाश संश्लेषण के दौरान तैयार घुलनशील कार्बनिक यौगिकों को स्थानांतरित करता है।

    3. जाइलम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) के केंद्र में स्थित होते हैं और फ्लोएम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों की परिधि (Periphery) की ओर स्थानीयकृत होते हैं।

    4. जाइलेम के फाइबर छोटे होते हैं और फ्लोएम के फाइबर बड़े होते हैं ।

    5. जाइलेम जड़ों, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं और फ्लोएम, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं, जो बाद में जड़ों, फलों और बीजों में स्थानांतरित और विकसित होते हैं ।

    6. जाइलम का मूवमेंट एक ही दिशा में होता है यानी यूनीडायरेक्शनल (Unidirectional) ऊपर की ओर, वहीं फ्लोएम का द्विदिश यानी दोनों दिशा में (Bidirectional) मूवमेंट होता है (Up and Down) ।

    7. जाइलम में ट्रेकिड्स (Tracheids), Vessel Elements, जाइलम पैरेन्काइमा, और जाइलम फाइबर शामिल हैं । वहीं फ्लोएम में शामिल हैं: सह कोशिकाएं (Companion Cells), छलनी नलिकाएं (Sieve Tubes), बास्ट फाइबर (Bast Fibres), फ्लोएम फाइबर, और फ्लोएम पैरेन्काइमा ।

    8. जाइलम ऊतक की कोशिकाएं पैरेन्काइमा कोशिकाओं को छोड़कर मृत कोशिकाएं (Dead cells) होती हैं और फ्लोएम ऊतक की कोशिकाएं बास्ट फाइबर को छोड़कर जीवित कोशिकाएं होती हैं।

    9. जाइलम में कोशिकाओं की कोशिका भित्ति (Cell wall) मोटी होती है और फ्लोएम की कोशिकाओं की कोशिका भित्ति पतली होती है।

    10. लिग्नीफाइबड (Lignified) कोशिका भित्ति (Cell wall) जाइलम में मौजूद होती हैं और फ्लोएम में कोशिका भित्ति (Cell wall) लिग्नीफाइबड (Lignified) नहीं होती है।

    11. संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) में जाइलम ऊतक की मात्रा फ्लोएम ऊतक से अधिक होती है यानी संवहनी ऊतक में फ्लोएम ऊतक की मात्रा तुलनात्मक रूप से कम होती है।

    12. जाइलम ऊतक के दो प्रकार के तत्वों अर्थात जाइलम वाहिकाओं (Xylem Vessels) और वाहिनिकाओं (Tracheid) से होकर ही जल एवं खनिजों को पौधों की जड़ों से उसकी पत्तियों तक पहुंचाया जाता है और फ्लोएम की जीवित कोशिकाएं ‘चालनी नलिकाएँ’ (Sieve Tubes) कहलाती हैं. फ्लोएम में कोशिकाओं की अंतिम भित्ति पर चालनी पट्टियाँ (sieve plates) पायी जाती हैं, जिनमें छोटे–छोटे छिद्र बने होते हैं।

    13. जाइलेम घुलनशील खनिज पोषक तत्वों और पानी के अणुओं को जड़ों से पौधे के अन्य हिस्सों तक पहुंचाता है और फ्लोएम भोजन और अन्य पोषक तत्वों सहित चीनी और अमीनो एसिड पत्तियों से भंडारण अंगों और पौधे के बढ़ते भागों तक पहुंचाता है।

    14. जाइलेम, पौधे को यांत्रिक शक्ति (Mechanical Strength) प्रदान करता है और स्टेम को मजबूत रहने में मदद करता है वहीं जड़ों, बल्ब (Bulbs) और Tubers जैसे अंगों के भंडारण के लिए पौधों के प्रकाश संश्लेषक क्षेत्रों द्वारा संश्लेषित शर्करा का परिसंचरण करता है।

    15. जाइलेम वाष्पशील (Transpiration) और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के माध्यम से खोए हुए पानी के अणुओं की कुल मात्रा को पूरा करता है और पूरे पौधे में प्रोटीन और mRNAs के परिवहन के लिए जिम्मेदार है ।

    विशिष्ट स्थायी ऊतक (Special Permanent Tissue)

    बाह्य त्वचा (Epidermis) यह पादप देह की सबसे बाहर वाली पर्त है, जो मुख्यतया सुरक्षात्मक कार्य करती है। यह पादपों के सामान्य प्ररोहों (shoots) से वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा अत्यधिक जल हानि से बचाव करती है। इसका कारण एपिडर्मिस की बाह्य सतह पर क्यूटिन अथवा सुबेरिन नामक कड़ा पदार्थ का जमा होना है, जो पौधों में वाष्पोत्सर्जन क्रिया में होने वाली जलहानि को कम करता है।

    स्टोमेटा (Stomata) शाखाओं की बाह्य त्वचा में छोटे-छोटे अति सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिन्हें रन्ध्र कहते हैं, जो सेम या गुर्दे (kidneys) के आकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं से घिरे होते हैं, जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ जीवित, हरितलवक युक्त तथा केन्द्रयुक्त होती हैं। द्वार कोशिकाएँ और आस-पास की बाह्य कोशिकाएँ मिलकर रन्ध्री समूह (Stomatal complex) बनाती है।

    बाह्य त्वचा के त्वचा रोम एककोशिकीय या बहुकोशिकीय शाखित या सरल होते हैं। यदि त्वचा रोम स्रावण का कार्य करते हैं, तो उन्हें ग्रन्थिल रोम कहते हैं, यह दो प्रकार की होती हैं

    बाह्य ग्रन्थियाँ बाह्य त्वचा पर उपस्थित दंशन रोम विषैले पदार्थ का स्रावण करते हैं, जैसे-बिच्छू पौधे मकरन्दकोष (nectaries), शर्करा जैसे पदार्थ मकरन्द का स्रावण करती है। कीटभक्षी पौधों की पाचक ग्रन्थियाँ प्रोटिओलिटिक एन्जाइम का स्रावण करती हैं।

    आन्तरिक ग्रन्थियाँ यह ऊतकों के अन्दर पाई जाती हैं। इसके अन्तर्गत नींबू तथा सन्तरे के फलों के छिलके में तेल ग्रन्थियाँ एवं पान की पत्तियों में श्लेष्मक स्रावी ग्रन्थियाँ, पाइनस में रेजिन एवं टेनिन का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। हाइडेथोड जल का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ हैं।

    रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रन्थियाँ कोशिकाएँ लम्बी, पतली भित्ति युक्त, बहुकेन्द्री, गाढ़े तरल लैटेक्स से युक्त कुछ कोशिकाओं में रबरक्षीर भरी होती हैं। ये कोशिकाएँ पतली भित्ति युक्त शाखित तथा बहुकेन्द्रकी एवं स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में जैसे यूफोरबिया, मदार तथा कनेर में रबरक्षीरी कोशिकाएँ होती हैं।

    पोस्त, रबड़ आदि में रबरक्षीरी वाहिकाएँ पाई जाती हैं, जो अनेक कोशिकाओं के मिलने तथा बीज की परतों के घुल जाने से बनती हैं।

    उत्तक से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    वास्तव में काष्ठ द्वितीयक जाइलम होता है, जो द्वितीयक वृद्धि के दौरान संवहन एधा की सक्रियता के फलस्वरूप बनता है।

    पौधों के तनों एवं जड़ों में द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा तथा कॉर्क एथा की सक्रियता के फलस्वरूप होता है।

    द्वितीयक वृद्धि का आशय-पौधों के तनों या जड़ों में स्थायी पैरेन्काइमा ऊतकों द्वारा उत्पन्न नए विभज्योत्तक से है, जिसके फलस्वरूप पौधों की लम्बाई और मोटाई में वृद्धि होती है। यह वृद्धि सिर्फ द्विबीजपत्री पौधों में ही पाई जाती है, चूँकि ये उसी में ही पाए जाते हैं जबकि एकबीजपत्री पौधों में इसका अभाव होता है। कॉर्क मोटी भित्ति वाली मृत कोशिका होती है जो पौधों की तनों की परिधि पर एक पर्त के रूप में रहती है।

    कॉर्क ऊतकों के लिए सुरक्षा का काम करता है।

    व्यवसायिक रूप से कॉर्क का उत्पादन क्यूरकस सुबरनामक वृक्ष से होता है।

  • पादप आकारिकी | (Plant Morphology) in Hindi | Phytomorphology | पौधों के भौतिक रूप एवं बाहरी संरचना का अध्ययन 

    पादप आकारिकी | (Plant Morphology) in Hindi | Phytomorphology | पौधों के भौतिक रूप एवं बाहरी संरचना का अध्ययन 

    इस आर्टिकल में हम पादपों के विभिन्न अंगो के बारे में जानेगे जैसे जड़, तना, पत्ती, फूल, फल एवं बीज आदि |

    पादप आकारिकी | (Plant Morphology) क्या है ?

    पादप आकारिकी का अर्थ है पादप की बाह्य संरचना का अध्ययन। अर्थात् इसके अंतर्गत पादप की सभी बाहर से दिखने वाली संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है। आकारिकी शब्द का अर्थ होता है बाह्य संरचना का अध्ययन।

    एक पादप को बाहर से दिखने पर उसमें जड़ (Root), तना (Stem), पत्ते (Leaves), फूल (Flower), फल (Fruit), छाल (Bark) आदि दिखाई पड़ते हैं, पादप आकारिकी के अंदर इन्हीं संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है।

    आकारिकी जीव विज्ञान की वह शाखा होती है जो अंगों की कार्य पद्धति से अधिक महत्व उनके आकार, आकृति, रंग, रूप और रूप में रूपान्तरण, शरीर में उनके स्थान को देती है।

    पादप आकारिकी के अन्तर्गत पौधों के शारीरिक आकार जैसे उसके विभिन्न अंगों जड़, तना, पत्ती, फूल, फलों एवं बीजों की रचना व उसके विकास का अध्ययन किया जाता है। पादप के विभिन्न वर्गों; जैसे

    1. थैलोफाइटा (शैवाल तथा कवक) जिसमें जड़, तना तथा पत्ती) का अभाव होता है

    2. ब्रायोफाइटा वर्ग मे पौधा मूलाभासों (rhizoids), (जड़ों के समान) तनों तथा पत्तियों में विभक्त होता है।

    3. टैरिडोफाइट पौधों में सामान्यतया जड़, तना तथा पत्ती भाग उपस्थित होते हैं एवं उसमें संवहन ऊतक जाइलम एवं फ्लोएम युक्त होते हैं।

    4. जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी पौधे) का शरीर जड़, तना तथा पत्तियों में विभेदित होता है जिसमें पूर्णतया विकसित संवहन ऊतक होते हैं।

    5. एन्जिमोस्पर्म (आवृतबीजी) पौधे पूर्णत: विकसित तथा अत्यन्त जटिल संरचनाओं से युक्त होते हैं। इसका शरीर जड़, तना एवं पत्तियों में विभक्त होता है। प्रत्येक आवृतबीजी (पुष्पीय) पौधे में प्राय: दो (i) एक भूमिगत मूल तत्र एवं (ii) एक वायवीय प्ररोह तन्त्र, भाग होते हैं |

    जड़ तथा उसकी शाखाओं को सामूहिक रूप से मूल तन्त्र कहते हैं। जड़ तथा उसकी शाखाएँ मूल तन्त्र जबकि तना एवं उसकी शाखाएँ, पत्तियाँ, पुष्प एवं फल सम्मिलित रूप से प्ररोह तन्त्र के अन्तर्गत आते हैं।

    जड़, तना तथा पत्तियाँ कायिक अंग, जबकि पुष्प और फल प्रजनन अंग होते है। पुष्प में उपस्थित जननांगों के संयोजन क्रिया के फलस्वरूप नई पीढ़ी का विकास होता है।

    स्वभाव तथा पोषण के आधार पर पौधों में भिन्नता पाई जाती है। स्वभाव के आधार पर यह शाक, झाड़ी तथा वृक्ष होते है, जबकि पोषण के आधार पर स्वपोषी, परपोषी आदि होते हैं। इन सभी में पादप अंगो का कार्य मूल रूप से समान होता है। इन पौधों का प्रत्येक भाग विशेष कार्य को करने के लिए अनुकूलित होता है |

    पादप आकारिकी | (Plant Morphology) के महत्वपुर्ण भाग

    जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root, its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem

    पत्ती (Leaf) किसे कहते है? पत्ती/पर्ण क्या है, परिभाषा, पत्ती की संरचना, भाग, पत्ती के प्रकार, रूपान्तरण, पत्ती के कार्य What is leaf, its type (Leaf in Hindi)

    पुष्पक्रम (Inflorescence) किसे कहते हैं? परिभाषा , पुष्पक्रम के प्रकार, उदाहरण Inflorescence in Hindi | What Is Inflorescence

    पुष्प या फूल (Flowers) , पुष्प के प्रकार, मुख्य विशेषताएँ, परागण | निषेचन | पुंकेसर | बीजाण्डासन (Placentation) और अण्डप | Flowers in Hindi

    फल क्या है | What is Fruit? | फलों के प्रकार | Types of Fruits in Hindi (फलों से जुडी सम्पूर्ण जानकारी)

    पादप आकारिकी के महत्वपुर्ण तथ्य

    • थैलोफाईटा का शरीर जड, तना पत्ति में विभक्त नहीं होता, इसके शरीर को थैलस कहा जाता है।
    • भूमि के ऊपर रहने वाला भाग प्ररोह तंत्र (Shoot system) कहलाता है।
    • भूमि के नीचे रहने वाला भाग जड़ तंत्र (Root System) कहलाता है।
    • एन्जियोस्पर्म पादपों को आकार एवं शरीर की बनावट के हिसाब से तीन प्रकारों में विभक्त किया जाता है- शाक, झाड़ी और वृक्षा
    • तनें विभिन्न कारणों के रूपान्तरित हो जाते हैं जिनमें से मुख्य है- भोजन का संग्रह एवं निर्माण, वाष्पोत्सर्जन कम करना, जनन सुरक्षा आदि।
    • कुछ पौधों के तनों में कायिक जनन (Vegetative reproduction) के लिए तनों के आकार में रूपान्तरण होता है। उदाहरण- घाँस (दूब घाँस) स्ट्रॉबेरी आदि।
    • भोजन संग्रह के लिए पौधों के तनों में अनेक प्रकार के रूपान्तरण होते हैं- (1) बल्ब (Bulb) – उदाहरण- प्याज (2) ट्यूबर (Tuber) -उदाहरण- आलू (3) क्राउन (Crown) – उदाहरण- मकड़ी पादप (Spider plant) (4) कोर्म (Corms) – उदाहरण- लहसून
    • क्लोरोफिल के अतिरिक्त भी कुछ पत्तियों में अनेक वर्णक क्रोमोप्लास्ट (Chromoplast) पाये जाते हैं।
    • घटपर्णी पादप की पत्तियाँ कीट भक्षण के लिए अत्यधिक रूपान्तरित होकर कलश की आकृति ले लेती हैं।
    • फूल पौधे का जनन अंग होता है।
    • फूल मुख्य रूप चार मुख्य भागों में विभक्त होता है- (1) कैलिक्स (Calyx) इसकी एक इकाई सेपल (Sepal) कहलाती है। (2) करोला (Corolla) इसकी इकाई पेटल (Petal) कहलाती है। (3) पुंकेसर (Androecium) इसकी इकाई स्टेमिन (Stemen) कहलाती है। (नर जननांग (4) स्त्रीकेसर (Gyenoecium) इसकी इकाई पिस्टिल (Pistil) कहलाती है। (मादा जननांग) अक्ष (Axis) पर फूलों के खिलने के क्रम को पुष्पविन्यास (Infloresence) कहते हैं। यह अक्ष रैकिस (Rachis) कहलाता है। पुष्पविन्यास विभिन्न पादपों में भिन्न प्रकार का होता हैं।
    • गोभी का फूल, सूरजमुखी का फूल तथा गेंदे का फूल एकल फूल न होकर पुष्पविन्यास होता है।
    • लौंग अधखिली कलियाँ होती हैं। जिन्हें इनके खिल कर फूल बनने से ठीक पहले तोड़ लिया जाता है।
    • रेफलिशिया दुनिया का सबसे बड़ा फूल है, जिसका व्यास लगभग एक मीटर होता है, इससे सड़े मॉस जैसी बदबू आती है।
    • वोल्फिया विश्व का सबसे छोटा पुष्प है।
    • केसर में खाने योग्य भाग इसका लंबा स्टिगमा होता है जो इसके स्त्रीकेसर का भाग है।
    • वास्तविक फूल मात्र एन्जियोस्पर्म पादप में पाये जाते हैं, अन्य निम्न वर्ग के पौधों में फूलों का अभाव होता है।
    • फलों का निर्माण दो प्रक्रियाओं के द्वारा होता है-(1) निषेचन (Fertilization) के द्वारा (2) पार्थिनोकॉर्पो (Parthenocarpy) के द्वारा अनिषेचित फूलों से बने फलों में बीजों का अभाव होता है। उदाहरण- केले के फल पार्थिनोकॉपी के द्वारा बनते है
    • फलों की उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) सामान्य फल (Simple Fruit) (2) संयुक्त फल (Aggregat Fruit) (3) बहु फल (Multiple fruits) मात्र एन्जियोस्पर्म पादपों में ही फल बनते हैं।
    • लीची में खाने योग्य भाग ऐरिल होता है जो कि हाइलम (Hylem) के अतरिक्त रूप से बड़े और मॉसल होने के कारण बनता है। यह हाइलम बीजों के जुड़ने के अण्डाशय से जुड़ने का स्थान होता है।
    • सेब में जो भाग खाया जाता है, वह वास्तविक फल न होकर मिथ्या फल (Pseudo fruit) होता है, जो फूल के अण्डाशय की दीवार के फूल जाने के कारण बनता है, वास्तविक फल इसके अंदर का बीज वाला भाग होता है |
    • मूंगफली एक अंतभौमिक (Underground) फल है।
    • नारियल का पानी इसका तरल भ्रूणपोष (Liquid endosperm) होता है।
    • मूसला जड़ें सामान्यतः द्विबीजपत्रीय (Dicot) बड़े पादपों में पाई जाती हैं। ये भूमि में अत्यधिक गहराई तक चली जाती हैं। इनमें प्राथमिक जड़ (Primary root) द्वितीयक जड़ें (Secondary root) तृतीयक जड़ें (Tertiary root) कहते हैं।
    • भोजन संग्रह के लिए जड़ें रूपान्तरित होकर विभिन्न आकारें में वृद्धि करने लगती है उदाहरण- गाजर, मूली, अदरक, शकरकंद, चुकंदर, शलजम आदि जड़ों के भोजन संग्रह के लिए रूपान्तरण ही हैं।
    • अमरबेल की जड़ों में चूषण क्षमता आ जाती है और ये दूसरे पादप (Host plant) के ऊतकों से भोजन को चूस कर अपना पोषण करते हैं। यह प्रवृत्ति परजीविता (Parasitism) कहलाती है।
    • दलदली भूमि में पाई जाने वाले वाले मैंग्रूव की द्वितीयक जड़ें जमीन के बाहर निकल आती हैं और वातावरणीय नाइट्रोजन अवशोषित करती हैं। इन रूपान्तरित जड़ों को न्यूमेटोफोर (Pneumatophore) कहते हैं।

  • जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals)  एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    इस आर्टिकल में हम जंतुओं के पोषण और पोषक पदार्थों के बारे में बात करेगें | जंतुओं के विकास के लिए कोनसे पोषक पदार्थ आवश्यक होते है ? जंतुओं के विकास के लिय पोषक पदार्थ क्यों जरूरी है ? जैविक क्रियाओं के लिय कोनसे पोषक पदार्थ जरूरी होते है और वो जीवों के कहा से प्राप्त होते है या उन पोषक पदार्थों का स्त्रोंत क्या है ? रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों के कितने प्रकार है ?

    साथ ही इस आर्टिकल में हम जानेगे कि कार्बोहाइड्रेट्स क्या होते है ? वसा क्या है ? विटामिन क्या होते है ? प्रोटीन क्या होते है और इनका जीवों के शारीरिक विकास में किस प्रकार योगदान है ? खनिज लवण क्या होते है ? आदि

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) क्यों जरूरी है ?

    जन्तु अपने पोषण के लिए वनस्पतियों एवं अन्य जन्तुओं पर निर्भर होता है अर्थात् जन्तु उत्पादक न होकर उपभोक्ता होता है।

    जन्तु पोषण के दो प्रकार-प्राणिसम पोषण तथा अवशोषी पोषण हैं। प्राणिसम पोषण के अन्तर्गत जन्तु भोजन को अपने शरीर के अन्दर ले जाते हैं अर्थात् निगलते हैं। इसके बाद भोजन का पाचन एवं अवशोषण होता है। वहीं अवशोषी पोषण के अन्तर्गत भोजन का अन्तर्ग्रहण न होकर उसका अवशोषण होता है। उदाहरण फफूंदी में।

    जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals) कोनसे है ?

    भोज्य पदार्थों में निहित वे उपयोगी रासायनिक घटक, जिनका उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध होना शरीर के विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए अति आवश्यक है, पोषक पदार्थ कहलाते हैं। रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों को निम्न भागों में बाँटा गया है

    1. कार्बोहाइड्रेट्स

    2. वसा

    3. प्रोटीन

    4. विटामिन

    5. खनिज लवण

    6. जल

    इन पोषक तत्वों में से कार्बोहाइड्रेट तथा वसा ऊर्जा उत्पादन तथा प्रोटीन निर्माणकारी पदार्थ और विटामिन, खनिज लवण एवं जल उपापचयी नियन्त्रक हैं।

    कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) क्या है ? कार्बोहाइड्रेट्स के प्रकार, स्त्रोत और कार्य

    यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का कार्बनिक यौगिक है, जिसका अनुपात क्रमश: 1 : 2 : 1 है यह पचने के उपरान्त ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से र को ऊर्जा मिलती है। शरीर की कुल ऊर्जा का 50-79% मात्रा को पूर्ति कार्बोहाइड्रेट से ही होती है।

    1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण से 45 किलो कैलोरी ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

    इसका सामान्य सूत्र (CH2O)n होता है। खाद्य पदार्थों में ये शर्करा, स्टार्च एवं सेलुलोज के रूप में पाए जाते हैं। कुछ कार्बोहाइड्रेट जल में घुलनशील होती है, जैसे शकंरा, जो स्वाद में मीठा होता है, जबकि स्टार्च (मण्ड) एवं सेलुलोज अघुलनशील कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण हैं।

    पोषण के अन्तर्गत शर्करा ग्लूकोज के रूप में बदल जाता है, जिसका भण्डारण ग्लाइकोजन के रूप में होता है। ग्लूकोज से ग्लाइकोजन बनने की क्रिया ग्लाइकोजेनेसिस कहलाती है।

    सेलुलोज क्या है ?

    यह पौधे की कोशिका मित्ति में पाए जाते हैं।

    कपास एवं कागज शुद्ध सेलुलोज होते हैं।

    यह ग्लूकोस का बहुलक है।

    पशु, जैसे-गाय, भैंस, बकरी आदि में सेलुलोज का पाचन होता है, परन्तु मनुष्य में इसका पाचन नहीं होता।

    कार्बोहाइड्रेट के प्रकार (Types of Carbohydrate) क्या है ?

    रासायनिक संरचना के आधार पर इसे तीन श्रेणियों में बाटां गया है।

    मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides)

    इसमें कार्बोहाइड्रेट की एक ही इकाई होती है।

    यह सभी कार्बोहाइड्रेट की सबसे सरल अवस्था होती है।

    ये जल में घुलनशील तथा मीठो होती है। .

    ग्लूकोज और फ्रक्टोस पौधों में सामान्य रूप से पाया जाने वाला मोनोसैकेराइड्स है।

    इनमें से ग्लूकोज प्रकाश-संश्लेषण का मुख्य उत्पाद है तथा इससे ऊर्जा उपलब्ध होते हैं, जबकि फ्रक्टोस फलों में पाए जाते हैं।

    ग्लूकोज सबसे महत्वपूर्ण मोनोसैकेराइड्स है, जो फलों में मुख्यतया अंगूर और शहद में मिलता है। फ्रक्टोस शरीर के अन्दर ग्लाइकोजन में परिवर्तित हो जाती है।

    शरीर में पहुंचे सभी कार्बोहाइड्रेट्स सर्वप्रथम ग्लूकोज में जल अपघटित होते हैं।

    ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides)

    ये मोनोसैकेराइड्स के 2-10 अणुओं से मिलकर बनता है, जैसे

    ग्लूकोस + ग्लूकोस = माल्टोस

    ग्लूकोस + फ्रक्टोस = सुक्रोस

    ग्लूकोस + ग्लैक्टोस = लैक्टोस

    सुक्रोस, माल्टोस और लैक्टोस प्रमुख डाइसैकेराइड्स हैं।

    सुक्रोस गन्ना, चुकन्दर, गाजर तथा मीठे फलों में पाया जाता है।

    माल्टोस स्वतन्त्र रूप से नहीं वरन् बीजों की (मुख्यतया जौ) शर्करा अर्थात् माल्ट शुगर होती है।

    पॉलीसैकेराइड्स (Polysaccharides)

    ये जल में अघुलनशील होते हैं, जो अनेक मोनोसैकेराइड्स अणुओं के मिलने से बनता है।

    ये पौधों में मुख्य रूप से सेलुलोज में पाए जाते हैं।

    आवश्यकता पड़ने पर यह जल-अपघटन (hydrolysis) द्वारा ग्लूकोस में बदल जाता है। इस रूप में यह ऊर्जा उत्पादन हेतु संग्रहित ईंधन का कार्य करता है।

    पॉलीसैकेराइड के प्रमुख उदाहरण

    मण्ड या स्टार्च सभी प्रकार के अनाजों, सब्जियों, विशेषकर आलू, शकरकन्द आदि में मिलता है।

    ग्लाइकोजन जन्तु के शरीर में संचित अवस्था में रहता है और आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग होता है।

    काइटिन आर्थोपोडा संघ के जन्तुओं के बाहा कंकाल का निर्माण।

    सेलुलोज पौधों की कोशिका भित्ति का निर्माण करती है।

    कार्बोहाइड्रेटस के कार्य कोनसे है ?

    यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले मुख्य स्रोत होते हैं।

    ये मण्ड के रूप में ‘संचित ईंधन’ का कार्य करते हैं।

    यह वसा में बदलकर ‘संचित भोजन’ का कार्य करते हैं।

    यह DNA और RNA के घटक पेन्टोज शर्करा होता है।

    प्रोटीन को शरीर के निर्माणकारक कार्यों हेतु सुरक्षित रखते हैं

    शरीर में वसा के उपयोग हेतु यह अत्यन्त ही आवश्यक है।

    वसा (Fats) क्या है ? वसा के स्त्रोत, प्रकार और कार्य

    ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के असंतृप्त यौगिक होते हैं किन्तु रासायनिक रूप से कार्बोहाइड्रेट से भिन्न होती है।

    इसमें कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में ऑक्सीजन की बहुत कम मात्रा होती है। ये पानी में अघुलनशील परन्तु क्लोरोफॉर्म, बेन्जीन, पेट्रोलियम आदि कार्बनिक विलायकों में घुलनशील होती है। क्षार द्वारा इसका पायसीकरण किया जा सकता है।

    वसा एक अणु ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल (fatty acid) के तीन अणुओं के एस्टर बन्ध द्वारा बनते हैं इसलिए इन्हें ट्राइग्लिसराइड्स कहते हैं।

    शरीर की कुल ऊर्जा का 20-30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होती है, जबकि एक ग्राम वसा के पूर्ण ऑवसीकरण से 9.3 किलो कैलोरी ऊर्जा मुक्त होती है। वसा का संचय विशिष्ट वसीय ऊतक (adipose tissues) में होता है। 20°C पर वसा तेल कहलाते हैं।

    वसा के प्रकार (Type of Fats) कोनसे है ?

    रासायनिक दृष्टि से वसा मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं-1. सरल वसा 2. संयुक्त वसा 3. व्युत्पन्न वसा।

    सरल वसा (Simple Fats)

    सरल वसा में केवल ग्लिसरॉल व वसा अम्ल एस्टर बन्ध द्वारा संयुक्त होते हैं।

    संयुक्त वसा (Complex Fats)

    इन वसाओं में अम्ल तथा एल्कोहॉल के साथ-साथ नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस भी होते हैं। इन्हें जटिल लिपिड्स (compler lipids) भी कहा जाता है।

    ये मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं – फॉस्फोलिपिड और ग्लाइकोलिपिडा

    इनमें से फॉस्फोलिपिड में फॉस्फोरस का अंश होता है, जो पित्त, यकृत एवं पेशियों में संचित होती है। परन्तु ग्लाइकोलिपिड तत्रिका तत्र के ऊतक में पाई जाती है।

    व्युत्पन्न वसा (Derived Fats)

    ये संयुक्त वसाओं के जल अपघटन से बनती हैं, जैसे-स्टीरॉयड (लिंग हॉर्मोन, पित्त अम्ल), स्टीरॉल (कोलेस्ट्रॉल, विटामिन-D), प्रोस्टाग्लैन्डिन वसा अम्ल व्युत्पन्न है, जो अरेखित पेशियों के संकुचन, रुधिर स्कन्दन, शोघ तथा एलर्जी प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं।

    वानस्पतिक वसा (Plant Fats)

    यह प्रकृति के मुख्य रूप से वनस्पतियों, फलों तथा बीजों में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है।

    जन्तुओं में वसा ऊतक, यकृत तथा अस्थि मज्जा में संचित रहती है। वसा अम्ल दो प्रकार के होते हैं

    संतृप्त वसा और असंतृप्त वसा अम्ला अधिकतर संतृप्त वसा जन्तु वसा होता है।

    सामान्य ताप पर यह ठोस होता है, जैसे-मक्खन परन्तु नारियल का तेल एवं ताड़ का तेल ही संतृप्त वनस्पति तेल के उदाहरण हैं, जबकि असंतृप्त वसा मछली के तेल एवं वनस्पति तेलों में मिलते हैं।

    वसा के प्रमुख कार्य

    यह ठोस रूप में शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।

    यह त्वचा के नीचे जमा होकर शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है।

    शरीर के विभिन्न अंगों की चोवें से बचाती है। – आरक्षित भोजन के रूप में।

    प्लाज्मा झिल्ली के निर्माण में सहायक होती है।

    प्रोटीन (Protein) क्या है ? प्रोटीन के प्रकार, स्त्रोत एवं कार्य

    यह एक जटिल कार्बनिक यौगिक होता है। प्रोटीन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1938 में वरजेलियस ने किया। शरीर की वृद्धि एवं ऊतकों के टूट-फूट की मरम्मत में प्रोटीन की भूमिका अहम होती है।

    इसके अलावा शरीर में विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के लिए उत्प्रेरक के रूप में विभिन्न एन्जाइम की भूमिका होती है, जो प्रोटीन ही होता है। प्रोटीन अमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं इनमें लगभग 20 प्रकार के अमीना अम्ल पाए जाते हैं।

    मानव शरीर में इनमें से 10 प्रकार के अमीनो अम्ल का संश्लेषण शरीर में स्वयं होता है, जबकि शेष 10 प्रकार के अमीनो अम्ल भोजन के द्वारा प्राप्त करते हैं।

    कुछ आवश्यक प्रोटीन के प्रकार

    शारीरिक प्रोटीन कार्य एन्जाइम्स जैव उत्प्रेरक, जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं में सहायक हैं। हॉर्मोन्स शरीर की क्रियाओं का नियनन करते हैं।

    परिवहन प्रोटीन हीमोग्लोबिन, विभिन्न पदार्थों का परिवहन करती है। संरचनात्मक प्रोटीन कोशिका एवं ऊतक निर्माण करती है।

    रक्षात्मक प्रोटीन संक्रमण से रक्षा करने में सहायक है। उदाहरण-प्रतिरक्षी। संकुचन प्रोटीन ये पेशी संकुचन एवं चलन हेतु उत्तरदायी है, उदाहरण-मायोसिन, एक्टिन आदि।

    प्रोटीन के कार्य

    यह शरीर की वृद्धि तथा ऊतकों की मरम्मत करता है।

    यह एन्जाइम तथा विटामिन का निर्माण करता है। – प्रोटीन श्वसन अंगों के निर्माण में भाग लेता है।

    यह संयोजी ऊतकों, अस्थियों तथा उपास्थियों के निर्माण में भाग लेता है।

    प्रोटीन की कमी से मैरेस्मस नामक रोग हो जाता है।

    विटामिन (Vitamins) क्या है ? विटामिन (Vitamins) के प्रकार, स्त्रोत और उपयोग

    कैसिमिर फूंक ने इस शब्द का प्रतिपादन किया। यह स्वयं ऊर्जा उत्पादन तो नहीं कर सकता परन्तु ऊर्जा सम्बन्धी रासायनिक क्रियाओं को नियन्त्रित करता है।

    हमारा शरीर विटामिन – D एवं K का संश्लेषण कर सकता है, जबकि अन्य विटामिन बाह्य स्रोत (भोजन) से प्राप्त किए जाते हैं।

    इनका नामकरण अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के अनुसार किया गया है; जैसे-A, B, C, D, E एवं KI

    विलेयता के आधार पर विटामिनों को दो वर्गों में बाँटा गया है।

    1. जल में घुलनशील विटामिन – विटामिन-B समूह और विटामिन-C

    2. वसा में घुलनशील विटामिन – विटामिन- A, D, E एवं KI

    विटामिनों के स्रोत, कार्य एवं कमी के प्रभाव

    खनिज लवण (Minerals)

    खनिज लवण (Minerals) भोजन के अकार्बनिक अवयव है, जो शरीर के उपापचयी क्रिया को नियन्त्रित करते हैं। यह शरीर के ऊतकों के निर्माण के लिए कच्चा पदार्थ है और एन्जाइम तथा विटामिन के आवश्यक अंग है।

    खनिज पदार्थ के मुख्य स्त्रोत और कार्य

    सन्तुलित भोजन (Balanced Diet) क्या है ?

    वह भोजन, जिसमें सभी पोषक तत्त्व उचित अनुपात में सम्मिलित होते हैं सन्तुलित भोजन कहलाते हैं। इसका निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और कार्य के अनुरूप होता है।

    पोषक तत्त्वों के स्रोत : एक दृष्टि में

    पोषक पदार्थस्रोत
    कार्बोहाइड्रेटचीनी, शहद, दूध, अनाज, आलू आदि
    प्रोटीनअण्डा, दूध, पनीर, दाल, मछली आदि
    वसाघी, तेल, दूध, मांस आदि
    विटामिनमांस, मछली, दूध, गाजर, हरी सब्जी आदि
    खनिज लवणमांस, दूध, अनाज, हरी सब्जी आदि

    कुपोषण (Malnutrition) क्या है ?

    भोजन की आवश्यक मात्रा तथा आवश्यक तत्त्वों का समावेश न होना कुपोषण की स्थिति पैदा करती है। सामान्यतया कुपोषण की स्थिति प्रोटीन की कमी के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, जिसके कारण शरीर के वृद्धि एवं विकास में बाधा उत्पन्न होती है।

    अपोषण (Under-nutrition)

    इसका आशय भोजन में आवश्यक तत्त्वों का सर्वथा अभाव होना है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती है।

    पोषण की अधिकता के परिणाम

    संतृप्त वसा की अधिकता से रुधिर में कॉलेस्टरॉल को मात्रा बढ़ जाती है, जो रुधिर वाहिनियों की दीवार पर जम जाती है। फलत: रुधिर को गति कम हो जाती है एवं रुधिर दाब बढ़ जाता है एवं हृदय सम्बन्धी रोग हो जाते हैं।

    अधिक कैलोरी वाले भोजन, जैसे-घी, शक्कर आदि के सेवन से मोटापा तथा डायबिटीज की समस्या आती है।

  • प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) क्या है ? Praakash Sanshleshan | प्रक्रिया, प्रभाव व महत्व

    प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) क्या है ? Praakash Sanshleshan | प्रक्रिया, प्रभाव व महत्व

    इस आर्टिकल में हम प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के बारे में विस्तृत से जानेगे | प्रकाश संश्लेषण क्या है? (Definition of Photosynthesis in Hindi), प्रकाश संश्लेषण की अभिक्रिया क्या है ? ऑक्सीजन युक्त प्रकाश संश्लेषण क्या है ? (Photosynthesis with oxygen in Hindi), प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? (factors effecting photosynthesis in Hindi), प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) क्या है ?

    प्रकाश संश्लेषण क्या है? (Definition of Photosynthesis in Hindi)

    (Photosynthesis Photo = प्रकाश; Synthesis = जुड़ना, निर्माण) 

    प्रकाशसंश्लेषण पृथ्वी पर होने वाली एकमात्र प्रक्रिया है जिस पर मनुष्य तथा समस्त जीवधारियों का जीवन निर्भर होता है।

    इस प्रक्रिया द्वारा हरे पौधे, शैवाल तथा हरित लवक-धारी जीवाणु, अकार्बनिक अणुओं से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन (कार्बनिक पदार्थ) बनाते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण सिर्फ हरे पौधों एवं कुछ जीवाणुओं (साइनोबैक्टीरिया) में घटित होने वाली वह क्रिया है जिसमें पौधों के हरे भाग सौर ऊर्जा को ग्रहण कर वायुमण्डल से ली गई कार्बनडाइऑक्साइड Co2 तथा भूमि से अवशोषित जल (H20) के द्वारा कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण ही एकमात्र ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ती है तथा सभी जीवित प्राणी श्वसन हेतु इसी ऑक्सीजन पर निर्भर हैं। हरितलवकों में प्रकाशसंश्लेषण क्रिया सम्पन्न होती है अथवा अन्य शब्दों में हरितलवक सौर-बैटरी की तरह कार्य करके कार्बोहाइड्रेटों का निर्माण करते हैं।

    इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन एवं जल सहउत्पाद (byproduct) के रूप में निष्काषित होते हैं। यह क्रिया क्लोरोफिल को उपस्थिति में सम्पन्न होती है।

    जोसेफ प्रीस्ट्ले तथा इसके पश्चात् जान इंजेनहॉज ने बताया कि पौधों में वायुमंडल से CO2 को ग्रहण करने एवं वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ने की क्षमता है।

    इंजेनहॉज ने यह भी बताया कि पौधो द्वारा ऑक्सीजन छोड़ने की प्रक्रिया सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति तथा पौधो के हरे भाग में ही होती हैं।

    रॉबर्ट हिल ने प्रदर्शित किया कि यदि पृथक्कृत हरितलवकों को इलेक्ट्रॉन ग्राही की उपस्थिति में प्रतिदीप्त किया जाए तो वह ऑक्सीजन मुक्त करते हैं तथा इलेक्ट्रॉन ग्राही अपचयित हो जाते हैं। इस अभिक्रिया को हिल प्रतिक्रिया कहते हैं। इसके द्वारा जल (प्रकाश अपघटन) को इलेक्ट्रॉन के स्रोत के रूप में प्रयोग करके कार्बन स्थिरीकरण द्वारा ऑक्सीजन एक उपोत्पाद के रूप में मुक्त होती है।

    प्रकाश संश्लेषण का रासायनिक समीकरण 

    CO2 के 6 अणु, पानी (H2O) के 12 अणुओं के साथ सौर ऊर्जा की सहायता से जुड़ जाते हैं| परिणामस्वरूप कlरबोहाइडरेट (C6H12O6)  या शर्करा का 1 अणु, सांस लेने लायक ऑक्सीजन और पानी के 6 अणुओं के साथ मिलता है।

    इस प्रक्रिया का सबसे प्रमुख घटक क्लोरोफिल है जो हर प्रकार के पौधों में पायी जाती है। इनका मुख्य काम सूर्य की रौशनी को सोखने का होता है। यह हरे रंग की होती है सूर्य के किरणों के लाल और नीले रंगो को सोख  लेते हैं। इसका एक बैक्टीरियल संस्करण भी होता है जिसको बक्टेरिओक्लोरोफिल कहते  हैं|

    प्रकाश-संश्लेषी वर्णक (Photosynthetic Pigments)

    1. क्लोरोफिल-a, b, c, d तथा e प्रकार के होते हैं और मुख्य सौर ऊर्जा अवशेषी वर्णक हैं।

    2. कैरोटिनॉइड्स अर्थात् कैरोटीन एवं जेन्थोफिल, जिसमें कैरोटीन नारंगी और पीले रंग के होते हैं। हरे पौधों में β-कैरोटीन प्रमुखता से पाया जाता है। जन्तु β-कैरोटीन को विटामिन-A में बदल देते हैं। जैन्थोफिल पौधों के हरे भागों में कैरोटीन के साथ पाए जाते हैं।

    कैरोटिनॉइड्स सहायक वर्णक है तथा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित कर क्लोरोफिल को स्थानान्तरित कर देते हैं।

    3. फाइकोबिलिन लाल फाइकोइरिथ्रिन तथा नीला फाइकोसायनिन प्रमुख फाइकोबिलिन है। यह सहायक वर्णक है, जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित कर क्लोरोफिल को देते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण क्रिया (Photosynthesis Process)

    यह क्रिया एक उपचयन-अपचयन (oxidation redution) अभिक्रिया है। इसमें जल का उपचयन ऑक्सीजन के बनने में तथा कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन शर्करा के निर्माण में होता है।

    प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया दो अवस्थाओं में होती हैं

    1. प्रकाशिक अभिक्रिया 2. अप्रकाशिक अभिक्रिया।

    प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction)

    यह अभिक्रिया प्रकाश की उपस्थिति में हरितलवक के ग्रेना में होती है। इसे हिल अभिक्रिया भी कहते हैं प्रकाशिक अभिक्रिया के सम्बन्ध में रॉबर्ट इमर्सन ने विभिन्न तरंगदैथ्यों के प्रकाश में क्वाण्टम अर्थात् प्रत्येक क्वाण्टम उपलब्धि उपभोग से मुक्त हुए ऑक्सीजन अणुओं की संख्या, ज्ञात की और यह बताया कि 680 nm से अधिक तरंगदैर्ध्य में क्वाण्टम उपलब्धि में कमी आ जाती है। यह कमी दृश्य प्रकाश के लाल क्षेत्र में होने के कारण रेड ड्रॉप कहलाती है। यदि 680 nm से अधिक तरंगदैर्ध्य के साथ लघु तरंगदैर्ध्य भी दे दी जाए तो प्रकाश-संश्लेषण की दर दोनों अलग-अलग तरंगदैर्ध्या में कुल दर की तुलना में बढ़ जाती है। इसे ही इमरसन प्रभाव कहा जाता है।

    प्रकाश अभिक्रिया में दो वर्णक तन्त्र भाग लेते हैं, जो क्रमशः वर्णक तन्त्र (pigment system I) तथा वर्णक तन्त्र ।। (pigment system II) कहलाते हैं।

    P700 वर्णक तन्त्र I का प्रतिक्रिया केन्द्र है, जिसमें प्रकाश-रासायनिक क्रिया होती है अर्थात् यहाँ से उच्च उर्जा इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन होता है। वर्णक तन्त्र । का उपयोग चक्रीय प्रकाश फॉस्फोरिलेशन तथा अचक्रीय प्रकाश की फॉस्फोरिलेशन दोनों में होता है। वर्णन तन्त्र ।। 600mµ की लघु तरंगदैर्घ्य अवशोषित करता है। इस तन्त्र के प्रमुख वर्णक क्लोरोफिल-b तथा फाइकोबिलिन्स है। इस वर्णक तन्त्र का उपयोग केवल अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलेशन में होता है।

    ग्रेना के प्रमुख कार्य क्या होते है ?

    1. सूर्य प्रकाश से क्लोरोफिल के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर अपनी कक्षा छोड़ देते हैं। जब ये इलेक्ट्रॉन इस ऊर्जा को मुक्त करते हैं तो ADP + P संयुक्त होकर ATP बनाते है इस प्रकार सूर्य का प्रकाश ऊर्जा रसायनिक ऊर्जा में बदल जाती है।

    2. उत्तेजित इलेक्ट्रॉनों द्वारा जल का हाइड्रोजन आयन (H+) और हाइड्रॉक्सिल (OH) आयनों में अपघटन हो जाता है। जल के अपघटन के लिए ऊर्जा प्रकाश द्वारा मिलती है। इस प्रक्रिया के अन्त में ऊर्जा के रूप में ATP तथा NADPH निकलता है, जो अप्रकाशिक क्रिया में मदद करते हैं। इसमें ऑक्सीजन की विमुक्ति जल से होती है न कि Co2 से। इस प्रकार प्रकाशिक क्रिया से (1) ATP बनते हैं (2) NADPH2 बनता है (3) O2 विमुक्त होती है।

    अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark Reaction) C3

    इस क्रिया में प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती है। यह क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) के स्ट्रोमा में होती है। इस अभिक्रिया के लिए ऊर्जा प्रकाश अभिक्रिया से मिलती है। इस अभिक्रिया में प्रकाश अभिक्रिया के क्रम में उत्पन्न NADPH एवं ATP दोनों ही अणुओं का उपयोग कार्बन डाइऑक्साइड से कार्योहाइड्रेट के संश्लेषण के लिए किया जाता है।

    मैल्विन कैल्विन एवं बेन्सन ने कैल्विन चक्र (C3 चक्र) की खोज की। इसमें राइबुलोज वाई फॉस्फेट CO2 को ग्रहण कर फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल का संश्लेषण होता है। यह प्रथम उत्पाद है।

    हैच एवं स्लैक ने एकबीजपत्री पौधों (जैसे-गन्ना, मक्का, साइप्रस आदि) में C4 चक्र की खोज में इसका प्रथम स्थायी उत्पाद 4-C यौगिक ऑक्सेलो एसोटिक अम्ल है। इसमें पर्णमध्योतक कोशिकाएँ तथा पूलाच्छद कोशिकाएँ भाग लेती हैं।

    C3 पौधों में प्रकाश-श्वसन उपस्थित होता है, जबकि C4 पौधों में अनुपस्थित होता है।

    C3 पादपों में CO2 उपयोग की कम कार्यक्षमता के एक अणु के स्थिरीकरण के लिए 3ATP व 2NADPH23 की आवश्यकता होती है, जबकि C4 पादपों में CO2 उपयोग की अधिक कार्यक्षमता, CO2 के एक अणु के स्थिरीकरण के लिए 5ATP व दो NADPH2 की आवश्यकता होती है।

    मांसलोद्भिद् पौधों, जैसे-नागफनी, अजूबा, अगेव, क्लेचू में CO2 स्थिरीकरण रात में होता है इसे CAM (क्रेसुलेसिन एसिड मेटाबॉल्जिम) कहते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक

    1. प्रकाश लाल तरंगदैर्ध्य में प्रकाश-संश्लेषण की दर अधिकतम उसके बाद नीला तथा हरे तरंगदैर्ध्य में सबसे कम होती है। इसके अलावा पीली और अवरक्त प्रकाश में यह क्रिया बिल्कुल ही नहीं होती है।

    2. CO2 वायुमण्डल में CO2 की मात्रा बढ़ने पर प्रकाश-संश्लेषण की दर बढ़ जाती है।

    3. तापमान पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की दर 10°C से 35°C तापमान तक बढ़ती है। इससे अधिक ताप पर एन्जाइम का विकृतिकरण (denaturation) हो जाता है।

    4. प्रकाश तीव्रता प्रकाश की निम्न तीव्रता पर प्रकाश-संश्लेषण की दर बढ़ती है और जैसे-जैसे तीव्रता उच्च होती है, यह घटती है।

    5. ऑक्सीजन C3 पौधों में विशेषकर अधिक तापमान पर ऑक्सीजन प्रकाश-संश्लेषण के दर को कम करती है।

    6. वायुमण्डलीय प्रदूषक SO2, ओजोन, CO आदि प्रकाश-संश्लेषण दर को कम करता है।

    7. खनिज लवण Mg, Mn, Fe, N, S, की कमी से प्रकाश-संश्लेषण की दर घटती है।

    8. प्रकाश-संश्लेषी उत्पाद प्रकाश-संश्लेषी अन्तिम उत्पाद (मण्ड) के कोशिका में संचय होने से प्रकाश-संश्लेषी दर घट जाती है।

  • पोषण किसे कहते हैं | पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) | नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    पोषण किसे कहते हैं | पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) | नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा जीवों को खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। पोषण उन सभी क्रियाओं का योग है, जिसमें भोजन का अन्तर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण तथा वहिष्करण होता है।

    पादपों में पोषण (Nutrition in Plants)

    विधि के आधार पर पौधों को दो भागों स्वपोषित तथा परपोषी अथवा विषमपोषी पौधे में बाँटा गया है।

    स्वपोषित पौधे (Autotrophic Plants)

    अधिकांश पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पर्णहरित (Chlorophyl) की सहायता से वायुमण्डल से CO2 और भूमि से जल ग्रहण कर प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बनिक भोज्य पदार्थ बना लेते हैं। ये पौधे जड़ों द्वारा भूमि से विभिन्न खनिज पोषकों का अवशोषण करते हैं।

    परपोषित पौधे (Heterotrophic Plants)

    पर्णहरित की अनुपस्थिति के कारण ये पौधे अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते हैं। अत: ये अपना भोजन अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं।

    भोजन स्रोत के आधार पर परपोषित पोधों के प्रकार

    1. परजीवी (Parasitic) 2. मृतोपजीवी (Saprophytic) 3.  सहजीवी (Symbiotic 4. कीटभक्षी (Insectivorous)

    परजीवी पौधे (Parasitic Plants)

    परजीवी पौधे अपने भोजन के लिए दूसरे जीवित पौधों अथवा जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं। परजीवी पौधे के शरीर का कोई भी भाग परजीवी मूल (Haustorium) में रूपान्तरित हो जाता है और पोषक से भोज्य पदाथों का अवशोषण करता है।

    मृतोपजीवी पौधे (Saprophytic Plants)

    इस प्रकार के पौधों में पोषण जीवों के मृत, सड़े हुए शरीर से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। अनेक कवक तथा जीवाणु मृतोपजीवी होते है।

    सहजीवी पौधे (Symbiotic Plants)

    इसके अन्तर्गत दो पौधे एक-दूसरे का पूरक बनकर एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हुए जीवित रहते हैं। इसके अन्तर्गत लाइकेन (शैवाल और कवक) सहजीवी के रूप में, मुख्य रूप से आते हैं, जिसमें कवक को शैवाल से पोषण की प्राप्ति तथा शैवाल को कवक से कवक जाल द्वारा सुरक्षा प्रदान किया जाता है। लेग्युमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों के गाँठ में पाए जाने वाले राइजोबियम बैक्टीरिया भी सहजीवी के उदाहरण हैं, जिसमें उसे उस पौधों से पोषक तत्व प्राप्त होते हैं तथा पौधे को नाइट्रोजन तत्व की प्राप्ति होती है।

    कीटभक्षी पौधे (Insectivorous Plants)

    इस प्रकार के पौधे आंशिक रूप से स्वपोषी तथा परपोषी दोनों होते हैं। इसका आशय यह है कि ये पौधे पर्णहरित की उपस्थिति के कारण

    अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं, परन्तु नाइट्रोजन की पूर्ति कीटों को पकड़कर तथा उनका पाचन कर पूरी करते हैं।

    पौधों में पोषण के लिए अनिवार्य तत्व

    डी. साउसर ने बताया कि पौधे खनिज पदार्थों पर निर्भर हैं और खनिज पदार्थों को मूल तन्त्र द्वारा मिट्टी से शोषित करते हैं। खनिज तत्वों को दो समूहों में रखते हैं।

    अत्यावश्यक तत्व C, H, O, N, P, K, Mg, Ca, S (कुल = 9 तत्व)

    कम आवश्यक तत्व Zn, Cu, Mn, Fe, B, Cl, Mo आदि

    नाइट्रोजन पोषण

    पौधों को न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन तथा अन्य नाइट्रोजन युक्त पदार्थों के संश्लेषण हेतु नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है, यद्यपि 78% नाइट्रोजन वायुमण्डल में है, किन्तु पौधे वातावरण से सीधे नाइट्रोजन को गैसीय रूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं बल्कि नाइट्राइट (NO2), नाइट्रेट (NO3) व अमोनियम (NH4+) के रूप में प्राप्त करते हैं। इसलिए नाइट्रोजन के यौगिकीकरण (nitrogen fixation) का पौधों के लिए महत्त्व है।

    नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    वायुमण्डल की मुक्त नाइट्रोजन जैविक और अजैविक विधियों द्वारा विभिन्न यौगिकों में बदल जाती है अजैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण बादलों में बिजली के चमकने से होता है।

    जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण दो प्रकार से होता है

    असहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Asymbiotic Nitrogen Fixaton)

    मिट्टी में स्वतन्त्र रूप से पाए जाने वाले अवायवीय (anaerobic) जीवाणु; जैसे-क्लॉस्ट्रिडियम, वायवीय (aerobic) जीवाणु; जैसे- एजोटोबैक्टर स्वतन्त्र नीले-हरे शैवाल; जैसेनॉस्टॉक, एनाबीना आदि स्वतन्त्र नाइट्रोजन का। स्थिरीकरण करने में सक्षम होते हैं क्योंकि वे अपने निफ जीन (नाइट्रोजन स्थिरीकारक जीन) की सहायता से नाइट्रोजिनेस नामक एन्जाइम का संश्लेषण कर लेते हैं जो उत्प्रेरक का कार्य करता है।

    नाइट्रोजीनेस एन्जाइम नाइट्रोजन को अमोनियम यौगिकों में अपचयित करने की क्षमता रखता है।

    सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Symbiotic Nitrogen Fixation)

    राइजोबियम लेग्युमिनोसेरम नामक जीवाणु लेग्युमिनोसी कुल के पौधों (जैसे-चना, मटर, मूंगफली आदि) की जड़ में प्रवेश कर ग्रन्थिकाएँ बनाता है, जिसमें लाल रंग का वर्णक लैगहीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो प्रकृति से नाइट्रोजन लेकर नाइट्रेट में बदल देते हैं।

    अमोनीकरण (Ammonification)

    जीवाणु; जैसे – बैसिलस रेमोसस, बैसिलस वल्गेरिस तथा बैसिलस मायकॉइड्स द्वारा पौधे तथा जन्तुओं के मृत शरीर की प्रोटीन से अमोनिया बनाने की क्रिया अमोनीकरण कहलाती है।

    नाइट्रीकरण (Nitrification)

    पुष्पी पादप नाइट्रेट (NO3) आयनों का अवशोषण करते हैं। नाइट्रोसोमोनास अथवा नाइट्रोसोकोकस नामक जीवाणु अमोनियम आयनों (NH4+) का ऑक्सीकरण करके उन्हें (NO2) (नाइट्राइट) आयन में परिवर्तित कर देता है। फिर नाइट्रोबैक्टर नामक जीवाणुओं द्वारा इनको नाइट्रेट (NO3) में बदलने की क्रिया नाइट्रीकरण कहलाती है।

    विनाइट्रीकरण (Denitrification)

    कुछ जीवाणु; जैसे – थायोबैसिलस डीनाइट्रीफिकेंस, स्यूडोमोनास डीनाइट्रीफिकेन्स आदि नाइट्रोजन और अमोनियम यौगिकों को नाइट्रोजन में परिवर्तन कर देते हैं, जो पुन: वायुमण्डल में पहुँच जाती है। इसी तरह में नाइट्रोजन चक्र चलता रहता है।

    विभिन्न तत्त्वों के कार्य तथा कमी के प्रभाव

    तत्वस्त्रोंत विशेष कार्य न्यूनता लक्षण 
    NNO2, NO3या NH4+ प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, हॉर्मोन, विटामिन, हरितलवक तथा ATP के निर्माण में।हरिमाहीनता तथा स्तम्मित वृद्धि। 
    KK+रन्ध्र के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान। कोशिका को स्फीत बनाए रखने में, प्रोटीन संश्लेषण में।पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते हैं। ऊतकक्षयी क्षेत्र बनते हैं, पत्तियों नीचे की ओर मुड़ जाती हैं तथा तना कमजोर हो जाता है।
    PH2PO4कोशिका झिल्ली, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल आदि का मुख्य अवयव।वृद्धि निरुद्ध हो जाती है। पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। काल पूर्व मृत्यु।
    CaCa2+झिल्ली की विभेदी पारगम्यता बनाए रखने में, कुछ एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा मिडिल लेमेला में कैल्शियम पेक्टेट के रूप में।स्तम्भित वृद्धि, युवा पत्तियाँ कुरुना (molted) हो जाती हैं, पौधे स्थायी रूप से मुरझा जाते हैं।
    MgMg2+फॉस्फेट उपापचय में एन्जाइम क्रियाशील करने के लिए, राइबोसोम को जोड़ने में, पर्णहरिम का मुख्य अवयव।हरिमाहीनता, ऊतकक्षयी क्षेत्र, एन्थोसायनिन का बनना। 
    SSO2+ 4प्रोटीन, विटामिन, फेरोडोक्सिन आदि का मुख्य घटकनई पत्तियों में हरिमाहीनता, तना सख्त, मूल तन्त्र अधिक विकसित।
    FeFe3+फेरोडोक्सिन, साइटोक्रोम आदि में, केटालेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा क्लोरोफिल के संश्लेषण में।हरिमाहीनता, शिराएँ गहरे हरे रंग की, वृन्त छोटे तथा क्लोरोफिल नहीं बनता है।
    MnMn2+कार्बोक्सीलेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में।हरिमाहीनता तथा ऊतकक्षयी क्षेत्र, क्लोरोफिल नहीं बनता है।  
    BBO3-3 याB4O2-7परागकणों के अंकुरण में, कोशिका विभेदन में तथा कार्बोहाइड्रेट स्थानान्तरण में।ब्राऊन हार्ट रोग, शिखाग्र काले, पत्तियाँ ताम्रक तथा भंगुर हो जाती है।
    CuCu2+एन्जाइम क्रियाशीलता में।शीर्ष ऊतकक्षयी, प्ररोह डाइ बैक रोग।
    ZnZn2+ऑक्सिन संश्लेषण में।पत्तियाँ हरिमाहीन विकृत, पर्व छोटे, पुष्पन निरुद्ध।
    ClClNa+ तथा K+ के धनायन तथा ऋणायन सन्तुलन बनाए रखने में, प्रकाश-संश्लेषण में ऑक्सीजन के निकलने की क्रिया में।जड़ें छोटी, पत्तियाँ हरिमाहीन तथा ऊतक्क्षयी क्षेत्र बनते हैं।
  • जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की जैव विकास ((Bio evolution) क्या है ? जैव विकास के प्रमुख सिद्धांत (theories of Bio evolution) क्या है ? जीवन का विकास क्या है ? जैव विकास के संबंधित प्रमुख परिकल्पनाएँ कोन – कोनसी है ? जैव विकास के प्रमुख आधार क्या है ? जैव विकास की विशेषताएं क्या है ? आनुवंशिकता एवं जैव विकास के बीच संबंध क्या है ? आदि

    जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life) और जैव विकास (Bio evolution)

    जैव विकास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होने वाला आनुवंशिक (Genetic) परिवर्तन है। पृथ्वी के प्रारंभ से ही निम्नकोटि के जीवों का क्रमिक परिवर्तनों द्वारा निरंतर अधिकाधिक जटिल जीवों की उत्पत्ति वास्तविक रूप से जैव विकास ही है। जैव विकास के अनुसार पृथ्वी पर पहले की पूर्वज जातियों के जैव विकास के द्वारा ही, नई-नई जातियां उत्पन्न हुई और हो रही हैं। 

    पृथ्वी का उद्गम लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुआ, जबकि इस पर जीवन की उत्पत्ति लगभग 3.5 – 4 अरब वर्ष पूर्व हुई। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई विचार धाराएं प्रचलित हैं, अरस्तू द्वारा प्रतिपादित स्वत:जनन के सिद्धान्त के अनुसार, निम्न वर्ग के जीवधारी निर्जीव पदार्थों से स्वतः पैदा हो जाते हैं।

    17 वीं शताब्दी के दौरान फ्रांसिस्को रेड्डी ने दो अलग-अलग बर्तनों, जिनमें एक खुला तथा दूसरा बन्द उसमें मांस का नमूना रखा। इस परीक्षण के निष्कर्ष में खुले बर्तन वाले मांस में कीड़े दिखाई दिए, जवकि बन्द बर्तन में नहीं। इससे अरस्तू के जीवन की स्वत: उत्पत्ति सिद्धान्त कमजोर पड़ा फिर लुई पाश्चर के प्रयोग से स्वत: जनन सिद्धान्त धराशायी हो गया। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ओपेरिन एवं हेल्डेन द्वारा आधुनिक सिद्धान्त, प्रकृतिवाद या जैव-रसायन विकास (Bio-chemical evolution) सिदान्त  प्रतिपादित किया गया।

    ओपेरिन ने 1936 में अपनी पुस्तक द ऑरिजिन ऑफ लाइफ (The Origin of Life) में इस सिद्धान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया,  जिसके अनुसार आदिकाल में हाइड्रोजन गैस अधिक मात्रा में होने के कारण पृथ्वी का वायुमण्डल अपचायक था तथा इसमें ऑक्सीजन अनुपस्थित थी। तापमान कम होने पर हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन आदि परमाणुओं के आपस में संयोग से इसके अणु बने। इस प्रक्रम में पहले जटिल कार्बनिक यौगिक तथा कोएसरवेट एवं न्यूक्लियोप्रोटीन्स का निर्माण हुआ।

    स्टैनले मिलर अपने विख्यात प्रयोग में उसने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल जैसी स्थितियों को पैदा करते हुए एवं बन्द फ्लास्क (स्वान आकार के) में विद्युत धारा को अमोनिया, मीथेन, हाइड्रोजन और वाष्प के मिश्रण में से गुजारकर कार्बोहाइड्रेड एवं अमीनो अम्लों का मिश्रण प्राप्त किया। इन पदार्थों में अभिक्रिया के परिणास्वरूप पॉलीसैकेराइड, प्रोटीन, लिपिड एवं न्यूक्लिक अम्ल बने।

    न्यूक्लिक अम्ल में अभिक्रिया कर स्वप्रतिकृतियन की क्षमता थी। इनके विकास से निर्जीव एवं सजीव के बीच की एक सीमा निर्धारित हो गई और आगे चलकर प्रारम्भिक कोशिकाएँ, संश्लेषण वृद्धि तथा परिवर्धन करने लगी, जिसकी परिणति पोषण-विधियों के विकास के साथ सम्पन्न हुई। परजीविता, मृतजीविता, प्राणो सदृश पोषण विधियों के पश्चात् स्वपोषी पोषण विधि का भी विकास हुआ। ये स्वपोषी जीव दो प्रकार के रसायन-संश्लेषी तथा प्रकाश-संश्लेषी थे। इसकी अन्तिम कड़ी के रूप में वायुमण्डल का निर्माण हुआ तथा ऑक्सीजन की उपस्थिति से यह काफी महत्वपूर्ण हो गया।

    जैविक विकास (Biological Evolution) क्या है ?

    जीवन की उत्पत्ति आदिसागर के जल में न्यूक्लियोप्रोटीन्स के विषाणु, जैसे कणों के रूप में, आज से लगभग 3.7 अरब वर्ष पूर्व, पृथ्वी के इतिहास के प्रीकैम्ब्रियन महाकल्प में हुई और ये प्रारम्भिक जीव परपोषी एवं अवायवीय थे। इनकी कोशिका आज के विषाणु तथा माइकोप्लाज्मा के समान थी। कुछ समय संग्राहक का रूप ले लिया तथा आनुवंशिक कोड के बाद कोशिका के DNA ने आनुवंशिक सूचनाओं के द्वारा RNA एवं प्रोटीन-संश्लेषण से जुड़ गया।

    ऐसा माना जाता है कि प्रारम्भिक जीव रसायनी परपोषी थे, जो जटिल कार्बनिक पदार्थों के किण्वन से ऊर्जा प्राप्त करते थे। तदन्तर पर्णहरिम के विकास से प्रकाश-स्वपोषी जीवों का विकास हुआ। प्रारम्भिक प्रकाश-स्वपोषी-जीव-अवायवीय थे जो 3.5 अरब पूर्व वायवीय प्रकाश-स्वपोषी जीवों में रूपान्तरित हो गए।

    लिन मारगुलिस के अनुसार, कुछ अवायवीय परभक्षी के कोशिकाओं ने प्रारम्भिक वायवीय जीवाणुओं का भक्षण किया और प्रथम यूकैरियोटिक कोशिका बन गई। परभक्षी कोशिका, जिसने वायवीय जीवाणु तथा प्रकाश-संश्लेषी नीली-हरी शैवाल कोशिका का भक्षण किया। वह यूकैरियोटिक पादप कोशिका बन गई अर्थात् वायवीय जीवाणु माइटोकॉण्ड्रिया तथा नीले-हरे शैवाल हरितलवक के रूप में स्थापित हो गए।

    जैव विकास के सिद्धान्त (Theories of Organic Evolution)

    जैव विकास एक विकासीय घटना है, जो क्रमिक एवं सतत् प्रक्रिया के अनुरूप सरल से जटिल जीवों की ओर होती है। जीवन की उत्पत्ति से संबंधित सबसे प्राचीन परिकल्पना, स्वतः उत्पादन की है, जबकि आधुनिक परिकल्पना प्रकृतिवाद की है। 

    इसके अन्तर्गत उपार्जित लक्षणों की वंशागति पर आधारित लैमार्कवाद, प्राकृतिक चयन सिद्धान्त पर आधारित डार्विनवाद तथा उत्परिवर्तन पर आधारित ह्यूगो डी व्रीज का सिद्धान्त प्रमुख रूप से शामिल है।

    लैमार्कवाद (Lamarckism) क्या है ?

    फ्रांसीसी वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने 1809 ई. में फिलोसफी जूलोजिक (Philosophie Zoologique) नामक प्रसिद्ध पुस्तक में उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

    इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक जीव अपने जीवन काल में जिस वातावरण में रहता है, उसके प्रभाव से अनेक लक्षण उपार्जित करता है। यही उपार्जित लक्षण उसकी सन्तानों में पहुँच जाते हैं तथा धीरे-धीरे नई जाति (new species) बन जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार, जिस अंग का लगातार प्रयोग होता है वह धीरे-धीरे आकार में बढ़ जाता है तथा जिस अंग का प्रयोग नहीं होता है या काफी कम होता है उसका क्रमशः ह्यस होता जाता है तथा अन्त में वह समाप्त हो जाता है; जैसे-अवशेषी अंग।

    लैमार्क का सिद्धान्त मूलतः चार अवधारणाओं पर आधारित है, जो इस प्रकार हैं:

    बड़े होने की प्रवृति

    वातावरण का सीधा प्रभाव

    अंगों के उपयोग एवं उसके अनुप्रयोग का प्रभाव

    उपार्जित लक्षणों की वंशागति

    लैमार्क के अनुसार, वर्तमान जिराफों के पूर्वज छोटी गर्दन एवं छोटी टाँगों वाले थे तथा वृक्षों की पत्तियाँ खाते थे, जिसके लिए उसे गर्दन ऊपर करनी पड़ती थी। ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के प्रयास में जिराफ की गर्दन एवं अगली टाँगें लम्बी हो गईं। अत: इस आधार पर किसी अंग के सक्रियता से उस अंग का विकास होता है। अंगों के कम उपयोग का उदाहरण लैमार्क ने साँपों में दिया, जिनके पैर गायब हो गए।

    लैमार्कवाद की सबसे अधिक आलोचना जर्मन वैज्ञानिक वीजमान ने की, जिन्होंने अपने प्रयोग में 21 पीढ़ियों तक चूहों की पूँछ काटकर आपस में प्रजनन करवाया, परन्तु किसी भी पीढ़ी में पूंछ विहीन चूहे उत्पन्न नहीं हुए। इससे प्रमाणित होता है कि वातावरण से प्राप्त उपार्जित लक्षणों की वंशागति नहीं होती है। वीजमान ने जननद्रव्य की निरन्तरता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

    जैव विकास के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

    * पेलिओजोइक महाकल्प को प्राचीन जीवन का उद्भव काल भी कहते हैं।

    * डेवोनियन कल्प को मछलियों का युग भी कहा जाता है।

    * कार्बोनिफेरस कल्प को उभयचरों का युग कहा जाता है।

    * मीसोजोइक महाकल्प को सरीसृपों का युग भी कहा जाता है।

    * सीनोजोइक महाकल्प को स्तनधारियों का युग भी कहा जाता है।

    * प्लीस्टोसीन युग को मानव युग कहा जाता है।

    डार्विनवाद (Darwinism) क्या है ?

    चार्ल्स डार्विन के जैव विकास के सम्बन्ध में विचार विस्तारपूर्वक उनकी पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाइ नेचुरल सेलेक्शन’ (प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का विकास) में सन् 1859 में प्रकाशित हुए।

    डार्विनवाद के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं:

    जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता प्रत्येक जीव जाति में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, फल-मक्खी (ड्रोसोफिला) एक बार में 200 अण्डे देती हैं, जिससे 10-14 दिनों में वह मक्खियाँ बन जाती हैं। यदि सभी अण्डों से उत्पन्न मक्खियाँ जीवित रहें एवं जनन करें, तो 40-45 दिनों में इसकी संख्या लगभग 20 करोड़ हो जाएगी।

    जीवन संघर्ष सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता के बावजूद प्रकृति में प्रत्येक जाति के जीवधारियों की संख्या लगभग स्थिर रहती है। इसका कारण यह है कि जीवधारियों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने, वृद्धि करने एवं जनन करने के लिए भोजन, प्रकाश, वास-स्थान, जनन के लिए साथी आदि की आवश्यकता होती है। परन्तु ये सब प्रकृति में सीमित हैं। अर्थात् जीवधारियों को पैदा होते ही इनके लिए संघर्ष करना पड़ता है।

    जैव विकास के बारे में डार्विन की व्याख्या का आधार एच एम एस बीगल नामक जहाज पर की गई समुद्री यात्रा के समय का प्राकृतिक अवलोकन एवं माल्थस का जनसंख्या सिद्धान्त था।

    अपनी यात्रा के दौरान डार्विन ने गैलापैगोज द्वीप समूह पर 20 प्रकार की चिड़ियाएँ देखीं। बाद ये चिड़ियाएँ डार्विन की फिन्चिस के नाम से प्रसिद्ध हुई।

    विभिन्नताएँ एवं उनकी वंशागति संसार में सभी जीवधारियों में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। एक ही माता-पिता की सन्तानें भी बिल्कुल एक जैसी नहीं होती हैं। विभिन्नताएँ केवल रंग रूप में ही नहीं बल्कि विभिन्न लक्षणों के लिए हो सकती हैं, जैसे-दौड़ने की शक्ति, रोगों से लड़ने की शक्ति, कार्य क्षमता आदि, जो भिन्नताएँ किसी जीवधारी का अस्तित्व बनाए रखने में सहयोगी होती हैं, ये लाभदायक विभिन्नताएँ अगली पीढ़ियों में पहुँचती हैं।

    योग्यतम की उत्तरजीविता व प्राकृतिक चयन जीवन संघर्ष में वही जीवधारी सफल होते है, जिनमें परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्नताएँ होती है और जनन करके जनसंख्या में वृद्धि करते हैं। अधिक-से-अधिक अनुकूल लक्षणों वाले जीवधारियों (योग्यतम) का एक प्रकार से प्रकृति द्वारा चयन होता है। इसी को योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक चयन (Natural Selection) कहते हैं, जिसे हरबर्ट स्पेन्सर ने सामाजिक विकास के सन्दर्भ में योग्यतम की अतिजीविता (Survival of the Fittest) कहा।

    नई जातियों की उत्पत्ति वातावरण या परिस्थितियाँ निरन्तर बदलती रहती हैं। फलस्वरूप निरन्तर नए लक्षणों का प्राकृतिक चयन होता रहता है। उपयोगी विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी इकट्ठी होती रहती हैं और काफी समय बाद (सैकड़ों-हजारों वर्षों बाद) उत्पन्न जीवधारियों के लक्षण मूल जीवधारियों से इतने भिन्न हो जाते हैं कि एक नई जाति बन जाती है।

    विभिन्नताओं के कारण, उत्पत्ति तथा आनुवंशिकता की व्याख्या न होने, अवशेषी अंगों की उपस्थिति न होने आदि के कारण डार्विनवाद की आलोचना की गई।

    नव-डार्विनवाद क्या है ?

    नव-डार्विनवाद के अनुसार लैंगिक जनन करने वाले जीवों की सन्तानों में उत्परिवर्तन के कारण विभिन्नताएँ होती हैं। प्रकृति इनमें से लाभदायक विभिन्नताओं का चयन करती है। एक जाति के विभिन्न समूहों के प्रजनन काल भिन्न होने के कारण लैंगिक पृथक्करण हो जाता है, जिसके फलस्वरूप नयी जातियों का विकास होता है। पेपर्ड मॉथ की ग्रे किस्म का औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् काली किस्म में रूपान्तरित होना प्राकृतिक चयन का उदाहरण है।

    ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन वाद  (Mutation Theory of Hugo de Vries)

    ह्यूगो डी वीज नामक वैज्ञानिक ने 1901 ई. में इवनिंग प्रिमरोज (ऑइनोथेरा लैमार्कियाना) में उत्परिवर्तन (mutation) की खोज की और उत्परिवर्तन सिद्धान्त दिया, जिसके अनुसार नई जाति की उत्पत्ति अचानक एक ही बार में होने वाली स्पष्ट एवं स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के कारण होती है।

    उत्परिवर्तन वाद सिदांत की प्रमुख विशेषताएं

    नई जातियों की उत्पत्ति एक ही बार में स्पष्ट एव स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के परिणामस्वरूप होती है, न कि छोटी-छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचय व क्रमिक विकास के फलस्वरूप है।

    सभी जीवधारियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है, जो कभी कम या अधिक या लुप्त हो सकती है।

    उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं। ये किसी एक अंग विशेष में अथवा अनेक अंगों में एक साथ ठत्पन्न हो सकते हैं। परिणामस्वरूप अंग अचानक लुप्त या अधिक विकसित हो सकते हैं।

    एक ही जाति के विभिन्न सदस्यों में विभिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

    उपरोक्त उप्परिवर्तनों के परिणामस्वरूप अचानक ऐसे जीवधारी उत्पन्न हो सकते हैं, जो जनक से इतने अधिक भिन्न हों कि उन्हें नई जाति माना जा सके।

    प्रकृति में स्वयं होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक (spontaneous) तथा X-किरणों, α-किरणों, β-किरणों या रासायनिक पदार्थों (जैसे-मस्टर्ड गैस) आदि के द्वारा प्रेरित किए जाने वाले उत्परिवर्तन कृत्रिम (induced) कहलाते हैं।

    जाति निर्माण (Speciation)

    जाति अन्तः प्रजनन करने वाले ऐसे जीवों का समूह है, जो एक या अनेक जनसंख्याओं में रहते हैं।

    किसी जनसंख्या के सारे सदस्यों की जीन मिलकर उस जनसंख्या की जीन राशि (gene pool) बनाते हैं।

    एक जननिक रूप से समांग जनसंख्या का दो या अधिक जनसंख्याओं, जो आनुवंशिक रूप से भिन्न तथा जननिक पृथक्करण युक्त हो, में टूटना जाति निर्माण या स्पीसिएशन (speciation) कहलाता है।

    जाति निर्माण मुख्यतया दो प्रकार से होता है:

    एलोपैट्रिक स्पीसिएशन

    एक जाति को कुछ जनसंख्याओं का भौगोलिक पृथक्करण (geographical isolation) हो जाता है। हजारों वर्षों बाद ये दो जनसंख्याएँ विकास के क्रम में भिन्न हो जाती हैं। जब ये दो जनसंख्याएँ दोबारा सम्पर्क में आती हैं तब इनके बीच प्रजनन नहीं होता है। इस प्रकार प्रत्येक जनसंख्या एक नई जाति वन जाती है।

    सिम्पैट्रिक स्पीसिएशन

    जब एक जाति को, एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाली दो जनसंख्याएँ जननिक रूप से पृथक् हो जाती है, तब ये जनसंख्या धीरे-धीरे एक-दूसरे से भिन्न होती चली जाती हैं और अलग जातियाँ बन जाती हैं।

    जैव विकास के प्रमाण (Evidences of Organic Evolution)

    आकारिकी एवं शारीरिकी से प्रमाण

    समजात अंग (Homologous organs)

    ऐसे अंग, जो रचना और उत्पत्ति में समान परन्तु कार्य में भिन्न हो; जैसे-मेंढक, पक्षी एवं मनुष्य के अग्रपाद।

    समवृति अंग (Analogous organs)

    ऐसे अंग, जो समान कार्यों में उपयोग होने के कारण समान दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उनकी मूल रचना एवं भ्रूणीय प्रक्रिया में भिन्नता पाई जाती है समवृति अंग कहलाते हैं; जैसे-पक्षियो एवं कीटों के पंखा

    अवशेषो अंग (Vestigial organs)

    वे अंग, जो वे पूर्वजों में कार्यशील थे, परन्तु वर्तमान में कार्यविहीन है; जैसे-साँपों के अल्पविकसित पाद, कोबी पक्षी के पंख, मनुष्य के त्वचा के वाल, वर्माफॉर्म एपेन्डिक्स आदि। जीवों में कभी-कभी अचानक कोई ऐसा लक्षण विकसित हो जाता है, जो वर्तमान जातीय लक्षण न होकर किसी निम्न वर्गीय पूर्वव जाति का होता है इसो क्रिया को प्रत्यावर्तन (atavism) कहते हैं।

    संयोजक जातियों से प्रमाण

    कुछ जीव-जन्तुओं में उनसे कम विकसित निन्न वर्गीय जातियों के तथा उनसे अधिक विकसित उच्च वर्गीय जातियों के लक्षणों का सम्मिश्रण पाया जाता है।

    उदाहरण             संयोजक कड़ी

    आर्किऑटेरिक्स – सरीसृपों एवं पक्षियों

    निओपिलिना   – मौलस्का एवं एनीलिडा

    पेरीपेटस      – एनीलिडा एवं ऑर्थोपोडा

    प्रोटोथीरिया    – सरीसृप एवं स्तनधारी

    यूग्लीना      –  पादप एवं जन्तु

    आनुवंशिकी से प्रमाण

    विभिन्न जातियों के सदस्यों में परस्पर संकरण जातियों के घनिष्ट विकासीय सम्बन्धों को प्रमाणित करता है, जैसे – घोड़े तथा गधे से वर्णसंकर खच्चर का बनना।

    तुलनात्मक कार्यिकी एवं जैव-रसायन से प्रमाण (Evidences from Comparative Physiology and Biochemistry)

    फ्लोकिन एवं वाल्ड ने जन्तुओं एवं पादपों की कार्यिकी एवं जैव-रसायन से सम्बन्धित प्रमाण प्रस्तुत किए

    प्रारम्भिक जीवों से लेकर जटिलतम स्तनियों तक जीवद्रव्य के समान रासायनिक संयोजन, प्रोटोजोआ से स्तनियों तक अधिकांश जन्तुओं में ट्रिप्सिन नामक एन्जाइम की उपस्थिति, एमाइलेस की उपस्थिति, सभी कशेरुकियों में थायरॉक्सिन हॉर्मोन की उपस्थिति तथा हीमोग्लोबिन से बनाए गए | हिमेटिन रवों की आकृति एवं माप में समानता, मानव व चिम्पैंजी में रुधिर सीरम प्रोटीन में समानता आदि जैव विकास को दर्शाते हैं।

    बायोजेनेटिक नियम अथवा पुनरावृत्ति सिद्धान्त या भ्रौणिकी से प्रमाण

    हैकेल ने इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया जिसके अनुसार, व्यक्तिवृत्त में जातिवृत्त की पुनरावृत्ति होती है अर्थात् जन्तु अपनी भ्रूणावस्था में पूर्वजों की अवस्थाओं को दोहराते हैं। (Ontogeny Repeats Phylogeny)

    जीवाश्म

    प्राचीन जीवों के शेष बचे भार्गों; जैसे – हड्डी दाँत, शैल आदि को जीवाश्म कहते हैं। ये मुख्यतया अवसादी चट्टानों में पाए जाते हैं। जीवाश्म की आयु यूरेनियम लैड विधि, रेडियोधर्मी कार्बन विधि, फिसन ट्रैक तथा इलेक्ट्रॉन चक्रण रेजोनेन्स आदि विधियों द्वारा ज्ञात की जाती है। कॉपोलाइट ऐसे जीवाश्म होते हैं, जिनमें जन्तुओं के मल में फॉस्फेट लवणों का संचय होता है।

    मानव का विकास (Human Evolution) – सम्पूर्ण जानकारी

    मानव या होमीनिड वंश, जो मनुष्य व कपियों के पूर्वज थे, का उद्भव आज से लगभग 2.4 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ। होमीनिड वंश का विकास एशिया तथा अफ्रीका में हुआ।

    * डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘डेसेन्ट ऑफ मैन एण्ड सेलेक्शन इन रिलेशन टू सैक्स’ (Descent of Man and Selection in Relation to Sex) में मानव का विकास कपियों जैसे पूर्वज से होने के सिद्धान्त का वर्णन किया।

    * लिनियस ने मनुष्य को वानरों व कपियों के साथ रखा तथा उसे वैज्ञानिक नाम होमो सेपियन्स (Homo sapiens) दिया, जिसका अर्थ है –  बुद्धिमान प्राणी।

    मानव का वर्गीकरण

    संघ  – कॉर्डेटा

    वर्ग – स्तनधारी

    गण – प्राइमेट

    उपगण – एन्थ्रोपोइडिया

    कुल – होमीनिडी

    वंश – होमो

    जाति – सेपियन्स

    उपजाति – सेपिएन्स

    – गज-श्रूज (Elephant shrews) मानव के प्रारम्भिक पूर्वज माने जाते हैं।

    – गिब्बन भारत में पाया जाने वाला अकेला कपि है।

    • मानव व कपियों का विकास एक सम्मिलित पूर्वज से हुआ था।

    . प्रोप्लिओपिथेकस मानव-पूर्व पूर्वज है, जिसके जीवाश्म लगभग 3.5 करोड़ वर्ष पूर्व ओलिगोसीन युग की चट्टानों में मिले हैं। इसमें मनुष्य व कपि दोनों के लक्षण हैं।

    – मायोसीन में पाए जाने वाले कपि लिम्नोपिथेकस को गिब्बन का पूर्वज माना जाता है।

    आधुनिक चिम्पैन्जी का पूर्वज प्रोकोंसल को माना जाता है

    प्रोकोंसल के जीवाश्म लीकी द्वारा पूर्वी अफ्रीका से प्राप्त किए गए।

    ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus)

    . ड्रायोपिथेकस अफ्रीकेन्स (Dryopithecus Africans) का जीवाश्म अफ्रीका और यूरोप की चट्टानों से प्राप्त हुआ ।

    • इसे मनुष्य एवं कपि दोनों का पूर्वज माना जाता है।

    • यह चिम्पैन्जी से करीबी समानता दिखाता है।

    • यह मायोसीन के समय 250 लाख साल पहले जीवित था।

    • यह शाकाहारी था और कोमल फलों व पत्तियों को खाता था।

    रामापिथेकस (Ramapithecus)

    लेविस (Lewis) ने 1932 में भारत की शिवालिक पहाड़ी की प्लीयोसीन चट्टानों से रामापिथेकस के जीवाश्म को खोजा।

    यह 14-15 मिलियन वर्ष पहले पश्च-मायोसीन से प्लायोसीन युग में जीवित था।

    रामापिथेकस अपनी पिछली टाँगों पर सीधा खड़ा होकर चलता था।

    यह आधुनिक मानव की तरह कठोर नट व बीज खाता था।

    ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus)

    इसे प्रथम कपि मानव माना जाता है।

    यह लगभग 4 से 1.5 मिलियन वर्ष पहले प्लीस्टोसीन युग के दौरान गुफाओं में रहता था।

    इसकी कपाल क्षमता 500-700 घन सेमी थी। .

    यह पूरी तरह द्विपद (bipedal) होमोनिड था।

    जबड़े तथा दाँत मनुष्य के समान थे और यह सर्वाहारी था। .

    इसकी खोज एल. बी. वी. लिकी ने की थी।

    जावा मानव (होमो इरेक्टस इरेक्टस)

    • जावा मानव का विकास पूर्व तथा मध्य प्लीस्टोसीन में लगभग 600000 वर्ष पूर्व हुआ।

    • इसका जीवाश्म जावा के त्रिनिल स्थान से प्राप्त हुआ, जिसे डुबॉइस ने खोजा।

    होमो इरेक्टस इरेक्टस नाम मेयर (1950) ने दिया।

    • इसके जबड़े बड़े तथा भारी लेकिन आधुनिक मानव के लगभग समान थे

    • इसकी कपाल क्षमता लगभग 40 घन सेमी थी।

     औसत शारीरिक सम्बाई 170 सेमी तथा भार 70 किग्रा था।

    यह सर्वाहारी था इसने सबसे पहले नि का उपयोग भोजन पकान, अपनी रक्षा करने तथा शिकार में किया था।

    पेकिंग मानव (होमो इरेक्टस पेकिनेंन्सिंस)

    पैकिंग मानत की खोज पाईनै 1924 में चीन के पैकिंग (बीजिंग) की।

    पैकिंग मानव के जीवाश्म लगभग 6 लाख वर्ष पुराने थे।

    इराकी कपाल गुहा का आयराम लगभग 850-1200 घन सेमी था।

    ये जावा मानव की तरह सर्वाहारी तथा कनीयल थे। इनमें ठोड़ी अनुपस्थित थी।

    ये पत्थर के औजारों को शिकार करने तथा अपनी रक्षा के लिए प्रयोग करते थे।

    निएन्डरथल मानव (होमो सेपियन्स निएन्डरथेलेन्सिस)

    जर्मनी की निएन्डर घाटी से 1856 में सी फूलरॉट ने निएन्डरथल मानव के जीवाश्म प्राप्त किए थे। ये सबसे पुराने जीवाश्म है।

    इनका विकास लगभग 150000 वर्ष पूर्व हुआ था और लगभग 25000 वर्ष पहले ये विलुप्त हो गए।  इनकी कपाल गुहा का आयतन 1450 घन सेमी था।

    इनका जबड़ा गहरा, ठोड़ी रहित और खोपड़ी की अस्थियाँ चौड़ी थी।

    ये सर्वाहारी और केनिबल थे और आग का प्रयोग खाना पकाने व गर्म रखने के लिए करते थे।

    ये वास्तविक मनुष्य थे, जिनमें संस्कृति की उत्पत्ति हुई और ये हथियार बनाना भी जानते थे।

    क्रो-मैग्नॉन मानव (होमो सेपियन्स फॉसिलिस)

    ये लगभग 50000 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए तथा 20000 वर्ष पूर्व विलुप्त हो गए। इनके जीवाश्म क्रो-मैग्नॉन (फ्रांस) के पत्थरों से मैक प्रीगर ने 1868 में प्राप्त किया।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन 1660 घन सेमी था, जो कि आधुनिक मानव से भी अधिक था अर्थात् ये आधुनिक मानव से अधिक बुद्धिमान थे।

    ये गुफाओं में सुन्दर चित्रकारी करते थे। निएन्डरथल व क्रो-मैग्नॉन दोनों ही आधुनिक मानव के सीधे पूर्वज माने जाते हैं।

    आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स)

    लगभग 10000 वर्ष पूर्व आखिरी हिम युग (glacial period) के पश्चात् आधुनिक मानव का विकास क्रो-मैग्नॉन मानव से हुआ।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन लगभग 1460 घन सेमी होता है।

    इनमें सेरीब्रम अत्यधिक विकसित होता है। आधुनिक मानव की कुछ प्रजातियाँ निम्न हैं:

    (a) नीग्रोइड्स (Negroids)

    (b) कॉकेसोइड्स (Caucasoids)

    (c) मोन्गोलॉयड्स (Mongoloids)

    डॉ. शैपीरो के अनुसार, होमो सेपियन्स सेपियन्स धीरे-धीरे होमो सेपियन्स फ्युचुरिस में विकसित हो जाएगा इस मानव का मस्तिष्क अधिक उन्नत व जटिल होगा, सिर गुम्बद के आकार का होगा, यह अधिक लम्बा होगा तथा शरीर बाल रहित होगा।

  • आनुवंशिकता किसे कहते है ? आनुवंशिकी (Genetics) की परिभाषा क्या है ? hereditary meaning in Hindi | Biology in Hindi

    आनुवंशिकता किसे कहते है ? आनुवंशिकी (Genetics) की परिभाषा क्या है ? hereditary meaning in Hindi | Biology in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि आनुवंशिकता क्या है ? आनुवंशिकी क्या है ? जेनेटिक्स के प्रमुख नियम क्या है ? आनुवंशिक विज्ञान किससे सम्बन्धी है ? मेण्डलवाद(Mendelism) क्या है और इसके प्रमुख नियम कोनसे है ? प्रभाविता का नियम का नियम क्या है ? पृथक्करण का नियम क्या है ? स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम क्या है ? प्रतीप संकरण (Back Cross) और परिक्षार्थ संकरण (Test Cross) क्या होते है ? जीनों में अन्योन्य क्रिया (Interaction in Genes) क्या होती है ? उत्परिवर्तन (Mutation) क्या है ? गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) क्या है ? जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) क्या होते है ? DNA की संरचना (Structure of DNA) कैसी होती है ? सहलग्नता (Linkage) क्या होती है ? वर्णान्धता (Colour Blindness) क्या होती है ? वाटसन एवं क्रिक मॉडल क्या है ? और साथ ही हम बात करेगे की आनुवंशिक कोड (Genetic Code) क्या होते है और किस तरह महत्वपुर्ण होते है ? साथ ही हम जानेगे मानव जीनोम (Human Genome) क्या है और कैसे यह विज्ञान जगत में महत्वपुर्ण है ? आदि

    आनुवंशिकी Genetics

    जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत आनुवांशिक लक्षणों के संतान में पहुंचने की रीतियों एवं आनुवंशिक समानता एवं विभिन्नताओं का अध्ययन करते हैं आनुवंशिक विज्ञान या आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) कहलाती है।”

    प्रत्येक जीव में बहुत से ऐसे गुण होते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी माता-पिता से उनकी संतानों में संचारित होते रहते हैं। ऐसे गुणों को आनुवंशिक गुण (Hereditary characters) या पैतृक गुण कहते हैं। जीवों के इन मूल गुणों का संचरण आनुवंशिकता कहलाता है। दूसरे शब्दों में वंशागत लक्षणों (Inherited Characters) का अध्ययन आनुवंशिकता (Heredity) कहलाता है। इसी के कारण ही प्रत्येक जीव के गुण अपने माता-पिता के गुणों के समान होते हैं।  

    जीवों में प्रजनन के द्वारा संतान उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता होती है। संतानों में कुछ लक्षण माता-पिता से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचते रहते हैं, जिन्हें आनुवंशिक लक्षण कहते हैं। इन्हें आनुवंशिक गुण (Hereditary characters) या पैतृक गुण भी कहा जाता है | इन गुणों का संचरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जनकों के युग्मकों (Gametes) के द्वारा होता है।

    डब्ल्यू वाटसन ने 1905 में सर्वप्रथम ‘जेनेटिक्स (Genetics)’ शब्द का प्रयोग किया। आनुवंशिकी के क्षेत्र में मार्गन, ब्रिजेज, मूलर, सटन, बीडल, नौरेनबर्ग एवं डॉ. हरगोविन्द खुराना का कार्य अविस्मरणीय है।

    आणविक आनुवंशिकी

    प्रत्येक जीव में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है। गुणसूत्र हिस्टोन प्रोटीन एवं न्यूक्लिक अम्ल (डीएनए व आरएनए) से बना होता है। डीएनए एवं आरएनए दोनों ही न्यूक्लियोटाइड के बहुलक होते हैं। न्यूक्लियोटाइड निम्नलिखित पदार्थों से मिलकर बनते हैंः

    1. शर्करा

    2. नाइट्रोजीनस झार

    3. फॉस्फेट

    आनुवंशिक अभियांत्रिकी

    यह एक ऐसी आनुवंशिक तकनीक है जिसमें जीवों के जीन का परिचालन किया जाता है, जिसकी वजह से इसमें जेनेटिक कोड स्थायी रूप से बदल जाते हैं।

    डीएनए की सफलतापूर्वक ग्राफ्टिंग सर्वप्रथम पॉलवर्ग द्वारा की गई थी। इसे डीएनए ैट-40 (सिमियन वायरस-40) से लिया गया था और इसे बैक्टीरिया के डीएनए से मिलाया गया।

    मेण्डलवाद (Mendelism)

    ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-84) ने मटर के पौधे पर संकरण का प्रयोग कर आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक नयी अवधारणा की शुरूआत की। मेंडल को आनुवंशिकी का जनक या आनुवंशिकी का पिता (Father of Genetics) कहा जाता है। ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor John Mendel) ने अपने वैज्ञानिक खोजों से आधुनिक आनुवंशिकी (Modern genetics) की नींव डाली।

    ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor John Mendel, 1822-84) आस्ट्रिया देश के ब्रून (Brunn) नामक स्थान में ईसाइयों के एक मठ के पादरी थे।

    मेण्डल ने ‘मटर’ (Pisum sativum) के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों पर आधारित निष्कर्षों को आनुवंशिकता के नियमों के रूप में 1865 में “प्रोसिडिंग ऑफ द नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी ऑफ बून” पत्रिका में प्रकाशित किया।  मटर के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों के निष्कर्षों को उन्होंने 1866 ई. में Annual proceedings of the natural history society or brunn में प्रकाशित कराया, परन्तु विज्ञान जगत में 34 वर्षों तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया।  मेण्डल के कार्यों के महत्त्व को 1900 में ह्यूगो डी ब्रीज (हॉलैण्ड), कार्ल कॉरेन्स (जर्मनी) और एरिक वान शारमैक (आस्ट्रिया) ने विश्व के समक्ष रखा।

    मेण्डल द्वारा लिए गए लक्षणों के प्रभावी तथा अप्रभावी रूप

    लक्षणप्रभावीअप्रभावी
    पौधे की ऊँचाई                      लम्बा बोना 
    पुष्प की स्थिति कक्षस्थ अग्रस्थ 
    फली का रंगहरा पीला 
    फली की प्रकृति फूली हुई संकुचित 
    बीज का आकार गोल झुर्रीदार 
    पुष्प का रंग लाल सफ़ेद 
    बीजपत्र का रंग पीला हरा 

    मेण्डल ने मटर के पौधे में सात जोड़े लक्षण लिए, जो चार अलग-अलग गुणसूत्रों पर उपस्थित थे।

    मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम

    मेण्डल ने मटर के विभिन्न गुणों वाले पौधों के बीज का संकरण कराकर वंशागति के तीन महत्वपूर्ण नियमों का प्रतिपादन किया। इन्हें ‘मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम’ के नाम से जाना जाता है। इस नियम के अनुसार युग्मकों के निर्माण के समय कारकों (जीन) के जोड़े के कारक अलग-अलग हो जाते हैं और इनमें से केवल एक कारक ही युग्मक में पहुंचता है। दोनों कारक एक साथ युग्मक में कभी नहीं जाते । इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम भी कहा जाता है। मेंडल के नियमों में पहला एवं दूसरा एकसंकरीय क्रॉस के आधार पर तथा तीसरा नियम द्विसंकरीय क्रॉस के आधार पर आधारित है।

    ये तीनों नियम इस प्रकार है:

    प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

    एक जोड़ा विपरीत गुणों वाले शुद्ध पिता और माता में संकरण कराने से प्रथम पीढ़ी में प्रभावीगुण (dominant character) प्रकट होते हैं, जबकि अप्रभावीगुण (recessive character) छिप जाते हैं। जैसे, लाल पुष्प वाले पौधे का सफेद पुष्प वाले पौधे से संकरण कराने पर प्रथम पीढ़ी (R) में केवल लाल में पुष्प वाले पौधे पैदा होते हैं, जबकि सफेद रंग वाला लक्षण दब जाता है। लालरंगप्रभावी (dominant) लक्षण है, जबकि सफेदरंगअप्रभावी (recessive) लक्षण है।

    पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)

    इसके अनुसार, युग्मकों के निर्माण के समय कारकों (जीन) के जोड़े के कारक अलग-अलग हो जाते हैं और इनमें से केवल एक कारक ही किसी एक युग्मक में पहुँचता है।

    इस नियम को शुद्धता का नियम (Law of Purity) भी कहते हैं। जब F पीढ़ी के संकर पौधों में स्वपरागण कराया जाता है, तो द्वितीय पीढ़ी में पैतृक लक्षण 3 : 1 के अनुपात में पृथक हो जाते हैं।

    फीनोटिपिक अनुपात = 3:1

    जीनोटिपिक अनुपात = 1 : 2 : 1

    स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

    इस नियम के अनुसार, जब दो जीव दो या दो से अधिक लक्षणों में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, तो उनमें से एक लक्षण की वंशागति पर दूसरे लक्षण की, वंशागति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

    जब गोल पीले बीज वाले पौधे का झुरींदार हरे बीज वाले पौधे से संकरण कराया जाता है, तो F1  पीढ़ी में सभी गोल पीले बीज वाले पौधे उगते हैं, परन्तु F2 पीढ़ी में 9 : 3 : 3 : 1 का फिनोटिपिक अनुपात प्राप्त होता है।

    फीनोटिपिक अनुपात – 9 : 3 : 3 : 1

    जीनोटिपिक अनुपात -1:2:2:4:1:2:1:2:1

    प्रतीप संकरण (Back Cross)

    विषमयुग्मजी F1 संकर का समयुग्मजी प्रभावी जनक से क्रॉस प्रतीप संकरण कहलाता है।

    परिक्षार्थ संकरण (Test Cross)

    विषमयुग्मजी F1 संकर का समयुग्मजी अप्रभावी जनक के साथ क्रॉस परिक्षार्थ संकरण कहलाता है। इस क्रॉस से पता किया जाता है कि कोई पौधा समयुग्मजी है या विषमयुग्मजी।

    परीक्षार्थ संकरण में एकसंकर क्रॉस का अनुपात 1:1 तथा द्विसंकर क्रॉस का अनुपात 1 : 1 : 1 : 1 प्राप्त होता है।

    फिनोटाइप जीवधारी के जो लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं, उसे फिनोटाइप कहते हैं, उदाहरण पौधे का लम्बापन।

    जीनोटाइप जीवधारी के आनुवंशिक संगठन को उसका जीनोटाइप कहते हैं, जो करकों का बना होता है। उदाहरण TT (कोशिकाओं में दो कारक-दोनों लम्बे लक्षण वाले) जीनोटाइप कहलाता है।

    मेण्डलवाद के अपवाद (Exceptions of Mendelism)

    अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete dominance) – कुछ लक्षणों की आनुवंशिकता के दौरान मेण्डल का प्रभाविता का नियम पूरी तरह काम नहीं करता। E पीढ़ी की संतति में कोई भी लक्षण पूर्णतया प्रभावी नहीं होता है अर्थात् मध्यवर्ती होता है, इसे अपूर्ण प्रभाविता कहते हैं।

    स्नैपड्रैगन (snapdragon) तथा गुलाबाँस (4 O’ Clock) में लाल (RR) और सफेद (rr) फूलों वाली किस्मों के बीच संकरण के फलस्वरूप F1 पीढ़ी में गुलाबी फूल उत्पन्न होते हैं। इसका कारण यह है कि लाल रंग सफेद पर पूरी तरह प्रभावी नहीं है। अब यदि F1 पीढ़ी के गुलाबी पुष्पों में स्वपरागण होने दिया तो F2पीढ़ी में फीनोटाइप अनुपात 25% लाल (RR), 50% गुलाबी (Rr) व 25% सफेद (rr) प्राप्त होता है।

    सहप्रभाविता (Co-dominance) – इसमें दोनों ही जनकों के लक्षण पृथक रूप से F1 पीढ़ी में प्रकट होते हैं। उदाहरण यदि एक लाल रंग के पशु को श्वेत रंग के पशु से क्रॉस कराया जाता है तो F1 पीढ़ी में चितकबरी सन्तान पैदा होती है।

    बहुविकल्पता (Multiple allelism) – मेण्डल के अनुसार जीन के दो ही विकल्पी रूप होते हैं, परन्तु एक ही जीन के एक ही लोकस पर दो से अधिक एलील हो सकते हैं, जो बहुविकल्पी कहलाते हैं; जैसे – मनुष्य में रुधिर वर्ग A, B, AB और O के लिए तीन एलील (IAIBIO) एक ही लोकस पर स्थित होते हैं।

    जीनों में अन्योन्य क्रिया (Interaction in Genes)

    कभी-कभी दो या दो से अधिक जीन अन्योन्य क्रिया द्वारा एक ही लक्षण को प्रभावित करती है। इस प्रकार की अन्योन्य क्रिया के दौरान कुछ जीन योगात्मक (additive), कुछ पूरक (complementary) तथा कुछ निरोधक (inhibitory) होते हैं।

    पूरक जीन (Complementary gene)

    जब दो नॉन एलीलिक जीन अकेले-अकेले एक ही लक्षण को अभिव्यक्त करते हैं परन्तु एक साथ होने पर पूर्णतया भिन्न लक्षण प्रदर्शित करते हैं, तो ऐसे जीन पूरक जीन कहलाते हैं। उदाहरण लेथाइरस ऑडोरेटस में CCPP से बैंगनी पुष्प, जबकि ccPP एवं CCpp से सफेद पुष्प उत्पन्न होते हैं। इसमें द्विसंकर अनुपात 9 : 7 प्राप्त होता है।

    अनुलिपिक जीन (Duplicate geno)

    एक ही गुणसूत्र पर समान प्रभाव दिखने वाले दो जीन अनुलिपिक जीन कहलाते हैं। उदाहरण के तौर पर कैपसेला फलों का प्रकार A तथा B जीन से नियन्त्रित होता है। इसमें द्विसंकर अनुपात 15 : 1 प्राप्त होता है।

    प्रबलता (Epistasis)

    इसमें एक जीन दूसरे नॉन-एलीलिक जीन के प्रभाव को छिपा देता है। अप्रभावी प्रबलता में 9 : 3 : 4 का द्विसंकर अनुपात, जबकि प्रभावी प्रबलता में 12 : 3 : 1 का द्विसंकर अनुपति प्राप्त होता है।

    संदमक जीन (Inhibitory gene)

    पृथक गुणसूत्रों पर उपस्थित प्रभावी जीन पारस्परिक क्रिया से दूसरे जीन के लक्षण को अप्रभावी कर देते हैं। इसी कारण द्विसंकर क्रॉस का अनुपात बदलकर 13 : 3 हो जाता है।

    बहुजीनी या मात्रात्मक वंशागति (Polygenic or Quantitative inheritance)

    जब एक लक्षण एक से अधिक जीनों द्वारा नियन्त्रित होता है। गेहूँ में केरनल रंग के लिए बहुजीनी वंशागति, जिसमें द्वितीय पीढ़ी में 1: 4:6:4:1 का अनुपात प्राप्त होता है।

    बाह्य केन्द्रकीय वंशागति

    माइटोकॉण्ड्रिया तथा हरितलवक में उपस्थित आनुवंशिक कारक को प्लाज्मा जीन तथा उसके समूह को प्लाज्मोन कहते हैं। युग्मनज को अधिकांश कोशिकाद्रव्य मादा युग्मक से प्राप्त होता है इसलिए संतति प्रायः मादा जनक के समान होती है। घोंघे की खोल में कुण्डलन तथा मक्का में कोशिकाद्रव्यी नर नपुंसकता की वंशागति बाह्य केन्द्रकीय आनुवंशिक पदार्थ द्वारा ही होती है।

    उत्परिवर्तन (Mutation) क्या होते है ? उत्परिवर्तन (Mutation) के प्रकार

    किसी जाति के पौधों या जन्तुओं में, जो आकस्मिक विभिन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं, उन्हें उत्परिवर्तन कहते हैं अर्थात् जीन अथवा गुणसूत्र की संरचना या संख्या में वंशागत परिवर्तन होना उत्परिवर्तन कहलाता है।

    प्रकृति में अपने-आप होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक (spontaneous) तथा X,  β, γ एवं UV-किरणों सहित रासायनिक पदार्थों (मस्टर्ड गैस, इथाइल मीथेन सल्फोनेट, मिथाइल मीथेन सल्फोनेट) आदि के द्वारा प्रेरित किए जाने वाले उत्परिवर्तन कृत्रिम (induced) कहलाते हैं।

    उत्परिवर्तन (Mutation) के प्रकार

    आकार के आधार पर उत्परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं

    (i) गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन

    (ii) जीन उत्परिवर्तन

    गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) क्या होते है ?

    इसके अन्तर्गत संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एवं संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन आते हैं।

    संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन गुणसूत्र के किसी भाग की हानि (अभाव), किसी भाग के द्विगुणन, एक गुणसूत्र के किसी भाग का दूसरे गुणसूत्र पर स्थानान्तरण तथा प्रतिपन (180° पर घूमने) के कारण होता है, जबकि संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एक या अधिक गुणसूत्र की कमी या अधिकता के कारण या फिर गुणसूत्रों की संख्या या उनके जीनोम के गुणांक में होने से होता है।

    संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एवं संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन विशेषताएँ और अन्तर

    संरचनात्मक                                                संख्यात्मक
    अमाव सिरे पर या अन्तराली भाग में गुणसूत्र की हानि होती है, यह समयुग्मी अवस्था में हानिकारक होता है, समजात गुणसूत्रों में सिनैप्सिस के समय पता चलता है।एन्यूप्लॉइडी इसमें द्विगुणित गुणसूत्रों की संख्या से एक या अधिक गुणसूत्र कम या अधिक हो जाते हैं; जैसे-मोनोसोमी (2n – 1), नलीसोमी (2n – 2), ट्राइसोमी (2n + 1), टेट्रासोमी (2n + 2) आदि। मानव में डाउन सिन्ड्रोम, एडवार्ड सिन्ड्रोम, पटाऊ सिन्ड्रोम, क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम ट्राइसोमी के उदाहरण हैं।
    द्विगुणन कुछ जीनों के दो या अधिक बार एक ही गुणसूत्र में जुड जाने से उत्पन्न उदाहरण ड्रोसोफिला में बार आँखें।यूप्लॉइडी जीवों में गुणसूत्रों की संख्या, उनके जीनोम के गुणांक में होती है, इसलिए ये डिप्लॉइड, पॉलीप्लॉइड होते हैं। पॉलीप्लॉइडी दो प्रकार की होती हैं
    स्थानान्तरण एक गुणसूत्र का भाग दूसरे असमजात गुणसूत्र पर स्थानान्तरित होता है, साधारण (एक गुणसूत्र में हानि, जबकि असमजात गुणसूत्र में जोड़) या पार (असमजात गुणसूत्रों में आदान-प्रदान) हो सकता है।स्वबहुगुणिता बहुगुणित गुणसूत्र एक ही जाति के होते हैं यह F, संकर में कोल्चीसीन से गुणसूत्रों की संख्या दुगुनी करके उत्पन्न की जाती है। इसके कारण पत्तियों, फूलों तथा फलों का आकार बड़ा हो जाता है।
    प्रतिपन गुणसूत्र का कोई भाग 180° पर घूम जाता है। यदि इसमें सेन्ट्रोमीटर भाग लेता है, तो इसे पेरासेन्ट्रिक और यदि सेन्ट्रोमीयर भाग नहीं लेता, तो पैरासेन्ट्रिक प्रतिपन कहते हैं।परबहुगुणिता ये विभिन्न जातियों अथवा वंशों के संकरण से बनते हैं। उदाहरण रेफेनोफ्रेसिका, रेफेनस सटाइवस तथा बॅसिका ओलेरेशिया के संकरण से प्राप्त की गयी थी तथा ट्रिटिकेल, ट्रिटिकम ड्यूरम व सिकेल सिरेल के संकरण से बनाया गया है।

    जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) क्या होते है ?

    यह न्यूक्लियोटाइड के प्रकार या उनके क्रम में बदलाव के कारण होता है। गेहूँ की सरबती सोनारा, सोनारा 64 में गामा किरणों द्वारा उत्परिवर्तन से पैदा की गई है।

    विस्थापन   फ्रेमशिफ्ट  टॉटोमेराइजेशन
    ट्रांजिशन एक प्यूरीन क्षार (A और G) का दूसरे प्यूरीन क्षार या एक पिरीमिडीन क्षार ( और C) का दूसरे पिरीमिडीन क्षार से विस्थापनन्यूक्लियोटाइड की श्रृंखला में एक क्षार कम या अधिक हो जाने पर पॉलीपेप्टाइड बनाने की सूचना पार्श्व दिशाओं में खिसक जाती है और बनने वाली पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला पूर्णरूप से बदल जाती है। उदाहरण थेलेसीमिया रोगDNA या RNA में प्यूरीन तथा पिरीमिडीन क्षार के किसी में प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन की पुनर्व्यवस्था।
    ट्रांसवर्जन एक प्यूरीन क्षार का पिरीमिडीन क्षार से या पिरीमिडीन क्षार का प्यूरीन क्षार से विस्थापन।  

    जीन और डीएनए से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण फैक्ट्स

    • जीन DNA का एक खण्ड है, जो प्रोटीन संश्लेषण को नियन्त्रित करता है।
    • बेन्जर ने ‘सिस्ट्रॉन’ अर्थात् जीन की कार्यात्मक इकाई, ‘रिकॉन’ अर्थात रिकॉम्बिनेशन की इकाई तथा ‘म्यूटॉन’ अर्थात् उत्परिवर्तन की इकाई शब्दों का प्रतिपादन किया।
    • यूकैरियोट में जीन सतत् नहीं होते वरन् इन्ट्रॉन और एक्सॉन में विभक्त होते हैं। ऐसे जीन विभक्त जीन (split gene) कहलाते हैं।
    • विपुन्सन’ द्विलिंगी पुष्प में परागकोशों के पकने एवं फटने से पूर्व ही उनको पृथक करना है।
    • ‘ऑक्सोट्रॉफ’ एक उत्परिवर्ती (mutant) जीव है, जिसमें एक या अधिक आवश्यक यौगिकों को संश्लेषित करने की क्षमता समाप्त हो चुकी है।
    • ‘क्लोन’ एक ही जनक से अलैंगिक जनन द्वारा बनने वाला जीव।
    • एच. जे. मुलर ने ड्रोसोफिला में सर्वप्रथम X-rays से उत्परिवर्तन किया।
    • ‘सौपरिवेशकी’ उत्तम परिस्थितियाँ उत्पन्न कर मानव समाज को सुधारना।

    सहलग्नता (Linkage) क्या है ?

    यह मेण्डल के स्वतन्त्र अपव्यूहन नियम का अपवाद है। जब दो विभिन्न लक्षण एक ही गुणसूत्र में बँधे होते हैं, तो उनकी वंशागति स्वतन्त्र न होकर एक साथ ही होती है। इसी को मॉर्गन ने ‘सहलग्नता’ कहा। \

    गुणसूत्र पर दो जीन, जितने निकटवर्ती होंगे (दूरी जितनी कम होगी) उनके बीच सहलग्नता उतनी ही तीव्र होगी। सहलग्न समूहों की संख्या अगुणित समूह में उपस्थित गुणसूत्रों की संख्या के बराबर होती है। पूर्ण सहलग्नता (complete linkage) में पैतृक संयोजन दो या तीन पीढ़ी में लगातार प्राप्त होते हैं, जबकि अपूर्ण सहलग्नता (incomplete linkage) में सहलग्न जीन विनियम (crossing over) के कारण अलग हो जाते हैं और 50% से कम पुनर्संयोजन (recombinant) मिलते हैं। सहलग्नता से जीनों का पुनयोजन सीमित रह जाता है। अत: जातीय लक्षणों के एक साथ बने रखने में सहायक होती है। वर्णान्धता (colour blindness) तथा हीमोफीलिया (haemophilia) मानव में लिंग सहलग्नता के उदाहरण हैं।

    वर्णान्धता (Colour Blindness) क्या है ?

    इस रोग से ग्रसित व्यक्ति लाल व हरे रंग का भेद नहीं कर पाता। इसका जीन X-गुणसूत्र पर उपस्थित होता है तथा अप्रभावी होता है।

    उदाहरण एक वर्णान्ध स्त्री का विवाह एक सामान्य पुरुष से होने पर उससे उत्पन्न सन्तानों में पुत्रों में वर्णान्धता के गुण होंगे, जबकि पुत्रियाँ वाहक (सामान्य) होंगी।

    हीमोफीलिया या ब्लीडर रोग (Haemophilia or Bleeder’s Disease)

    इस रोग में रोगी के खून का थक्का नहीं जम पाता है या काफी देर से बनता है। यह रोग अप्रभावी X- सहलान जीन के कारण होता है। उदाहरण हीमोफिलिक पुरुष और सामान्य स्त्री से उत्पन्न सन्तानों में से सभी पुत्रियाँ वाहक, जबकि सभी पुत्र सामान्य होंगे।

    लिंग-निर्धारण (Sex-Determination)

    मनुष्य में XY प्रकार के गुणसूत्रों द्वारा लिंग निर्धारण होता है। मनुष्य की प्रत्येक कोशिका में 46 गुणसूत्र अर्थात् 23 जोड़े होते हैं, जिनमें 22 जोड़े नर तथा मादा में एक समान होते हैं। इन 22 जोड़ों को अलिंगसूत्री युग्म या सहसूत्री युग्म (autosomes) कहते हैं। 23वें जोड़े को लिंग गुणसूत्र कहते हैं, जिसे पुरुष में XY से प्रदर्शित करते हैं, जबकि स्त्रियों में इसे XX से प्रदर्शित करते हैं।

    शुक्रजनन में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा दो प्रकार के शुक्राणु बनते हैं आधे वे, जिनमें 23वीं जोड़ी का X- गुणसूत्र आता है अर्थात् (22 + X) और आधे वे, जिनमें 28वाँ जोड़ा Y- गुणसूत्र (22 + Y) जाता है। स्त्रियों में एक समान प्रकार का गुणसूत्र अर्थात् (22 + X) तथा (22 + X) वाले अण्डाणु पाए जाते हैं। निषेचन के दौरान यदि अण्डाणु X- गुणसूत्र वाले शुक्राणु से मिलता है, तो इससे बनने वाली सन्तान लड़की होगी। इसके विपरीत यदि अण्डाणु Y- गुणसूत्र वाले शुक्राणु से निपेचित होगा, तब सन्तान लड़का होगा अर्थात् पुरुष का Y-गुणसूत्र सन्तान में लिंग निर्धारण के लिए उत्तरदायी है।

    मधुमक्खियों में लिंग-निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि सन्तान का विकास निपेचित अण्ड से हो रहा है या अनिषेचित अण्ड से। निषेचित अण्ड द्विगुणित (diploid) होता है इससे मादा मधुमक्खी का विकास होता है। मधुमक्खी के अनिषेचित अण्ड अगुणित होते हैं इनसे ड्रोन (drone) बनते हैं। मेलेन्ड्रियम, कोक्सीनिया, स्फीरोकार्पस नामक पौधों में लिंग निर्धारण की क्रिया का अध्ययन किया गया है।

    DNA की संरचना (Structure of DNA)

    DNA में उपस्थित नाइट्रोजनी क्षारक चार प्रकार के होते हैं; जैसे – एडीनीन (A), ग्वानीन (G), थायमीन (T) एवं साइटोसीन (C)

    सन् 1953 में वाटसन और क्रिक द्वारा DNA का द्विकुण्डलित प्रतिरूप बनाया जिसके अनुसार,

    (i) DNA का प्रत्येक अणु दो कुण्डलित पॉलिन्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं का बना होता है। ये दोनों श्रृंखलाएँ एक-दूसरे पर सर्पिल क्रम में लिपटी होती हैं।

    (ii) प्रत्येक पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला में डीऑक्सीराइबोज शर्करा और फॉस्फेट समूह एकान्तर क्रम में जुड़कर श्रृंखला का आधार तैयार करती है। फॉस्फेट समूह एक तरफ की शर्करा के 5′ कार्बन पर तथा दूसरी ओर 3’ कार्बन पर फॉस्फो डाइएस्टर बन्ध द्वारा जुड़ी होती है। दोनों शृखलाएँ प्रतिसमानान्तर दिशा में कुण्डलित होती हैं।

    (iii) एडीनीन और थायमिन के बीच दो हाइड्रोजन बन्ध तथा साइटोसीन और ग्वानीन के बीच तीन हाइड्रोजन बन्ध होते हैं।

    (iv) एक ही शृंखला में किन्हीं दो न्यूक्लियोटाइड्स के बीच 3.4 Å की दूरी होती है।

    वाटसन एवं क्रिक मॉडल

    DNA का द्विगुणन

    वाटसन एवं क्रिक ने DNA द्विगुणन की अर्धसरक्षी विधि (semiconservative method) का प्रतिपादन किया का द्विगुणन समारंभन बिन्दु (initiation point) से शुरू होता है। हेलिकेस एन्जाइम DNA के दोनों रज्जुओं को पृथक कर देता है तथा प्रत्येक रज्जुक, एकल रज्जुक बन्धन प्रोटीन (single strand binding protein) की सहायता से DNA स्थिर हो जाता है |

    टोपोआइसोमेरेस एन्जाइम रज्जुक में कुण्डलन के तनाव को समाप्त करता है। प्रत्येक रज्जुक फर्म (template) की तरह कार्य करता है। बहुलीकरण (polymerization) से पूर्व प्राइमेस एन्जाइम की सहायता से रज्जुक के 3′ छोर के पूरक RNA प्राइमर का संश्लेषण होता है, जिससे आगे DNA पॉलीमरेस-III द्वारा बहुलीकरण होता है।

    अग्रग रज्जुक (Leading strand) पर 5′ → 3′ दिशा में सतत् (continuous) संश्लेषण होता है, जबकि पश्चगामी रज्जुक (lagging strand) पर छोटे-छोटे टुकड़ों, जिन्हें ओकाजाकी टुकड़े कहते हैं, में असतत् (discontinuous) संश्लेषण होता है। प्रत्येक ओकाजाकी टुकड़े के लिए एक अलग RNA प्राइमर बनता है।

    ओकाजाको टुकड़े के पूर्ण निर्मित होने पर DNA पॉलीमरेस-I द्वारा RNA प्राइमर को हटा दिया जाता है और DNA लाइगेज एन्जाइम ओकाजाकी टुकड़ों को जोड़ने का कार्य करता है।

    DNA एवं RNA में अन्तर

    DNARNA
    इसमें डीऑक्सीराइबोज़ शर्करा होती है।इसमें राइबोज शर्करा होती है।
    क्षार, एडीनीन, ग्वानीन, थायमीन तथा साइटोसीन होते हैं।थायमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है।
    मुख्यतया केन्द्रक तथा कुछ मात्रा में माइटोकॉण्ड्रिया व हरितलवक में पाया जाताकेन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य दोनों में पाया जाता है।
    आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति का कार्य करता है।कुछ विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ तथा प्रोटीन संश्लेषण (सभी जीवों में) का कार्य करता है।

    आनुवंशिक कोड (Genetic Code) क्या होते है ?

    आनुवंशिक कोड mRNA अणुओं में स्थित नाइट्रोजनी क्षारों का वह क्रम है, जिसमें प्रोटीन संश्लेषण के लिए संदेश निहित (कूटित) होते हैं। एक अमीनो अम्ल के लिए संदेश देने वाला न्यूक्लियोटाइड का समूह कोडॉन कहलाता है। आनुवंशिक कोड की खोज नौरेनबर्ग एवं मथाई ने की थी।

    1. AUG तथा GUG (कभी-कभी) प्रारम्भिक कोडॉन, जबकि UAA, UGA, UAG समापन कोडॉन हैं। 2. जेनेटिक कोड अपभ्रष्टता (degeneracy), कोमाविहीन, सार्वत्रिकता, नॉन-ओवरलेपिंग होता है।

    3. जेनेटिक कोड असंदिग्धता दर्शाता है अर्थात् एक विशिष्ट कोडॉन एक ही अमीनो अम्ल को कोड करता है।

    4. एच सी क्रिक ने वोवल हाइपोथेसिस प्रस्तुत की, जिसके अनुसार, एक कोडॉन की विशिष्टता प्रथम दो क्षारकों द्वारा निर्धारित होती है।

    मानव आनुवंशिक रोग

    रंजकहीनताइसमें टाइरोसीनेज एन्जाइम अनुपस्थित
    एल्केप्टोन्यूरियाहोमोजेन्टिसिक अम्ल ऑक्सीडेज में उत्परिवर्तन
    दात्र कोशिका अरक्तताहीमोग्लोबिन में ग्लूटामिक अम्ल के स्थान पर वैलीन
    फिनाइलकीटोनूरियाफिनाइलएलेनीन हाइड्रोक्सीलेज की अनुपस्थिति
    थैलेसीमियाहीमोग्लोविन संश्लेषण की कमी
    डाउन्स सिन्ड्रोम21वीं जोड़ी गुणसूत्र की ट्राइसोमी
    एडवार्ड सिन्ड्रोम18वीं जोड़ी गुणसूत्र की ट्राइसोमी
    टर्नर सिन्ड्रोममादा में 45 (44+XO) गुणसूत्र
    क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम44+ XXY गुणसूत्र
    क्राइ-डू-चैट सिन्ड्रोमपाँचवें गुणसूत्र की छोटी भुजा में हानि
    पटाऊ सिन्ड्रोम13वें गुणसूत्र की ट्राइसोमी

    प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) एवं क्रिया

    पॉलीपेप्टाइड शृंखला के निर्माण हेतु सर्वप्रथम DNA के अणु के एक विशिष्ट खण्ड के द्वारा सूचना न्यूक्लियोटाइड के त्रिक (triplot) संकेतों के रूप में mRNA पर अनुलेखित हो जाती है। mRNA पर अनुलेखित सूचना का अनुवादन (RNA के द्वारा अमीनो अम्लों को निश्चित क्रम में जोड़कर प्रोटीन के रूप में किया जाता है अर्थात् प्रोटीन संश्लेषण में आनुवंशिक कोड द्वारा सूचनाओं का DNA से mRNA में अनुलेखन तथा mRNA से प्रोटीन में अनुलिपीकरण होता है।

    DNA (जीन्स) का प्रोटीनों तक सूचना का यह अप्रत्यक्ष प्रवाह सैन्ट्रल डोग्मा कहलाता है। तथापि कुछ प्रतिगामी विषाणुओं (rotrovirusos), जैसे HIV, रॉस सारकोमा वाइरस में RNA से DNA का संश्लेषण होता है, जिसे टेमिन एवं बाल्टीमोर ने खोजा।

    जॉर्ज बीडल एवं एडवर्ड टेटम ने न्यूरोस्पोरा क्रासा पर आनुवंशिक प्रयोग किए तथा एक जीन-एक एन्जाइम परिकल्पना प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार, एक जीन-एक एन्जाइम को नियन्त्रित करता है।

    प्रोटीन संश्लेषण की दो क्रियाएँ

    अनुलेखनअनुलिपीकरण
    DNA पर, RNA पॉलीमरेज की सहायता से RNA का बनना।राइबोसोम पर mRNA के निर्देश tRNA व अमीनो अम्लों की सहायता से प्रोटीन का बनना। 
    प्रोकिरियोट में एक ही RNA पॉलीमरेज से तीनों RNA (अर्थात् mRNA, tRNA व rRNA) का संश्लेषण होता है, जबकि युकैरियोट में RNA पॉलीमरेज-I से rRNA, RNA पॉलीमरेज-II से mRNA तथा RNA पॉलीमरेज-III से tRNA का संश्लेषण होता है।एक विशिष्ट अमीनो अम्ल ATP एन्जाइम से क्रिया कर AA-AMP एन्जाइम कॉम्पलैक्स बनाता है, जो tRNA के 3′ छोर पर जुड़ता है अमीनो अम्ल का सक्रियण अमीनो एसाइल tRNA सिन्थेटेस एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होता है।
    DNA के जिस रज्जुक पर RNA का संश्लेषण होता है, उसे एक निश्चित अमीनो अम्ल के लिए विशिष्ट IRNA होता है। टेम्पलेट रज्जुक या एन्टीसेन्स या नॉन-कोडिंग रज्जुक कहते हैं।एक निश्चित अमीनो अम्ल के लिय विशिष्ट tRNA होता है |
    ई. कोलाई में RNA पॉलीमरेज पाँच पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओ 2 α β β’ तथा ω से मिलकर बना होता है।mRNA समारम्भन कारक (Initiation factor) की उपस्थिति में राइबोसोम की छोटी इकाई से जुड़ जाता है। 
    जीवाणु RNA पॉलीमरेज आरम्भ स्थल से कुछ पहले प्रोमोटर भाग, जो 20-200 क्षारकों का एक विशिष्ट क्रम है, पर जुड़ता है।प्रोटीन संश्लेषण मेथयोनीन अमीनो अम्ल से आरम्भ होता है 
    जीवाणु में mRNA के प्रथम क्षारक से 5-10 क्षारक बायीं ओर कन्सेन्सस अनुक्रम युक्त प्रिनो बॉक्स होता है, जबकि यूकैरियोट में TATA बॉक्स या होगनेस बॉक्स होता है।प्रोकैरियोट में तीन समारम्भन कारक (initiation factor), जबकि यूकैरियोट में नौ समारम्भन कारक होते हैं।
    RNA का संश्लेषण 5’   3’ दिशा में होता है।समारम्भन कोडॉन के लिए विशेष अमीनो एसाइल tRNA कॉम्पलेक्स राइबोसोम की P-site तक पहुँचता है और इसका एन्टीकोडॉन भाग mRNA के कोडॉन से हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़ जाता है। यह क्रिया GTP की उपस्थिति में होती है।

    येनोटस्की ने एक जीन-एक पॉलीपेप्टाइड विचार धारा प्रस्तुत की।

    1. पहले कृत्रिम जीन का निर्माण हरगोविन्द खुराना ने 1970 में यीस्ट एलेनीन tRNA के लिए किया था

    2. ग्रिफिथ ने सर्वप्रथम प्रमाणित किया कि DNA एक आनुवंशिक पदार्थ है।

    जम्पिंग जीन

    इस जीन की खोज बारबरा मैकक्लिनटॉक ने की थी। इसका अर्थ- किसी जीन का अपने स्थान से न निकलकर उसी गुणसूत्र में दूसरे स्थान पर या दूसरे किसी गुणसूत्र में जाकर जुड़ जाना है और इस प्रकार नए लक्षण प्रारूपों को जन्म देती है। आभासी जीन वे जीन, जो कार्यात्मक जीन के समजात होते हैं परन्तु अभाव, जुड़ाव या प्रोमोटर भाग की अक्रियाशीलता के कारण कार्यात्मक उत्पाद पैदा करने में असमर्थ होती है।

    मानव जीनोम (Human Genome)

    डॉ. वाटसन मानव जीनोम परियोजना के प्रमुख निर्देशक थे इस सन्दर्भ में अमेरिकी सरकार ने 1988 में मानव जीनोम परियोजना नाम की परियोजना शुरू की। इस परियोजना के अध्यक्ष डा. कालिंस ने अप्रैल 2000 में घोषणा की कि अब तक मानव जीनोम के 3 अरब क्षार जोड़ों में से दो अरब क्षार जोड़ों की डिकोडिंग हो चुकी है। अभी हाल में हैदराबाद में स्थित सेन्टर फॉर सेल एण्ड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) में एक ह्यमन जीन डायमर्सिटी प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह पर रहने वाली चार प्राचीन जनजातियों के जीनोम का पता लगाया जाएगा।

    स्मार्ट फैक्ट्स

    एलील या युग्मविकल्पी (allele) एक ही जीन के दो या अधिक विकल्प; जैसे-लम्बापन (T) और बौनापन (t) एक दूसरे के एलील हैं।

    एकसंकर क्रॉस (Monohybrid cross) एक जोड़ी लक्षणों को लेकर कराया गया क्रॉस

    व्युत्पन्न क्रॉस (Reciprocal cross) जनक, पादपों की लैंगिकता को परस्पर बदलकर कराया गया क्रॉस।

    घातक जीन (Lethal gene) जीन, जो किसी जीव की मृत्यु का कारण बनते हैं।

    एपिस्टेटिक जीन (Epistatic gene) एक जीन, जो दूसरे नॉन एलिलिक जीन के प्रभाव को छिपा देता है।

  • कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?  कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ? कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिका विभाजन (cell division) क्या होता है ? koshika vibhajan के प्रकार क्या है ? koshika vibhajan क्यों जरूरी है ? साथ ही हम जानेगे कि समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन क्या है | समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन की परिभाषा, उनमे अंतर और उनके प्रकार क्या है ? आदि

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?

    कोशिका विभाजन का आशय उस प्रक्रिया से है, जिसके अन्तर्गत एक कोशिका से दो कोशिकाओं का निर्माण होता है, जिससे जीवों में प्रजनन और वृद्धि सम्भव हो पाती है। इस घटना में पहले DNA का द्विगुणन और फिर केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है।  कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमे कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है। ये सभी प्रक्रियाएं जैसे कोशिका विभाजन, डीएनए प्रतिकृति और कोशिका वृद्धि एक दूसरे के साथ समायोजित होकर, इस प्रकार संपन्न होती हैं कि कोशिका विभाजन सही होता है व संतति कोशिकाओं में इनकी पैतृक कोशिकाओं वाला जीनोम होता है।

    कोशिका विभाजन के प्रकार

    कोशिका विभाजन प्रमुख रुप से तीन प्रकार का होता है

    1. असूत्री विभाजन – प्रोकैरियोटिक जीवों में

    2. सूत्री विभाजन या समसूत्री विभाजन – कायिक कोशिकाओं में

    अर्द्धसूत्री विभाजन – जननिक कोशिकाओं में

    कोशिका विभाजन और कोशिका चक्र

    सभी सजीवों की कोशिकाएं दो भागों में विभाजित होकर जनन करती है, जिसमे प्रत्येक पैतृक कोशिका विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है ये नव निर्मित संतति कोशिकाएं स्वयं वृद्धि एवं पुन: विभाजन करती है |

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिय एक महत्वपुर्ण प्रक्रिया है | एक कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन व अन्य संघटकों का संश्लेषण और तत्पश्चात विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, इसे कोशिका चक्र कहते है | यद्यपि कोशिका वृद्धि (कोशिकाद्रव्यीय वृद्धि के संदर्भ में) एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें डीएनए का संश्लेषण कोशिका चक्र की किसी एक विशिष्ट अवस्था में होता है। कोशिका विभाजन के दौरान, प्रतिकृति गुणसूत्र (डीएनए) जटिल घटना क्रम के द्वारा संतति केंद्रकों में वितरित हो जाते हैं। ये सारी घटनाएं आनुवंशिक नियंत्रण के अंतर्गत होती हैं।

    एक प्ररूपी (यूकेरियोटिक) चक्र का उदाहरण मनुष्य की कोशिका के संवर्द्धन में होता है, जो लगभग प्रत्येक चौबीस घंटे में विभाजित होती है। यद्यपि कोशिका चक्र की यह अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिए बदल सकती है। उदाहरणार्थ- यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने मेंलगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    कोशिका चक्र की प्रावस्थाएँ

    कोशिका चक्र की अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिय बदल सकती है | कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाए होती है जो निम्न है :

    • अंतरावस्था (Interphase)
    • एम (M) प्रावस्था (सूत्री विभाजन) (Mitosis Phase)

    अन्तरावस्था (interphase)

    सूत्री विभाजन के प्रारम्भ से पहले एक अन्तरावस्था (interphase) होती है इसमें G1, S तथा G2,  उप-अवस्थाएँ होती हैं। अंतरावस्था को विश्राम अवस्था भी कहते है | यह वह प्रावस्था जिसमे कोशिका विभाजन के लिय तैयार होती है तथा इस दौरान क्रमबद्ध तरीके से कोशिका वृद्धि एवं डीएनए का प्रतिकृतिकरण दोनों होते है अंतरावस्था को तीन प्रावस्थाओं या उप-अवस्थाएँ में विभाजित किया जाता है :

    1. पश्च सूत्री अन्तरकाल प्रावस्था (G1 Phase या जी1 प्रावस्था)

    2. संश्लेषण प्रावस्था (S Phase या एस प्रावस्था)

    3. पुर्व – सूत्री विभाजन अंतरालकाल प्रावस्था (G2 Phase या जी2 प्रावस्था)

    G1 – प्रोटीन एवं RNA का संश्लेषण होता है।

    S – इसमें DNA का द्विगुणन एवं हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G2 – RNA व प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G0 – इसमें कोशिका विशेषीकृत हो जाती है और इसके बाद कोशिका विभाजन नहीं होता।

    जी1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप में सक्रिय होती है, एवं लगातार वृद्धि करती है, परन्तु इसका डीएनए प्रतिकृति नही करता है | एस प्रावस्था या संश्लेषण प्रावस्था के दौरान डीएनए का निर्माण एवं इसकी प्रतिकृति होती है | इस दौरान डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है |

    प्राणी कोशिका में एस प्रावस्था के दौरान केन्द्रक में डीएनए का जैसे ही प्रतिकृतिकरण प्रारम्भ होता है वैसे ही तारककेंद्र का कोशिकाद्रव्य में प्रतिकृतिकरण होने लगता है, कोशिका वृद्धि के साथ सूत्री विभाजन हेतु जी2 प्रावस्था के दौरान प्रोटीन का निर्माण होता है |

    जो कोशिकाएं आगे विभाजित नही होती है जी1 प्रावस्था से निकल कर निष्क्रिय अवस्था में पहुचती है, जिसे कोशिका चक्र की शांत अवस्था (G0) कहते है |

    प्राणियों में सूत्री विभाजन केवल द्विगुणित कायिक कोशिकाओं में ही दिखाई देता है | इसके विपरीत पादपों में सूत्री विभाजन अगुणीत एवं द्विगुणीत दोनों कोशिकाओं में दिखाई देता है |

    सूत्री कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन (Mitosis)

    सभी जन्तुओं और पौधों में, जनन कोशिकाएँ एवं अन्य सारी कोशिकाएँ सूत्री विभाजन से विभाजन करती हैं। इस कोशिका विभाजन की खोज डब्ल्यू. फ्लेमिंग ने की। यह सभी प्रकार के कायिक कोशिकाओं (vegetative cells) में होती है। इसमें एक द्विगुणित मातृ-कोशिका से दो समान सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं। सूत्री विभाजन की प्रक्रिया दो भागों केन्द्रक विभाजन एवं कोशिकाद्रव्य विभाजन में सम्पन्न होती है।

    सूत्री विभाजन  (एम (M) प्रावस्था) उस अवस्था को व्यक्त करता है, जिसमे वास्तव में कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन होता है, और अंतरावस्था दो क्रमिक एम प्रावस्थाओं के बीच की प्रावस्था को व्यक्त करता है, कोशिका चक्र की कुल अवधि की 95 प्रतिशत से अधिक की अवधि अंतरावस्था में ही व्यतीत होती है |

    सूत्री विभाजन  का आरम्भ केन्द्रक के विभाजन (Kayokinesis कैरियो काईनेसिस) और इसका अंत कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis साईटो काईनेसिस) के साथ होता है

    विधा के लिए सूत्री विभाजन को केंद्रक विभाजन की चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है।

    केन्द्रक विभाजन (Kayokinesis)

    इस विभाजन की प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है | यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि कोशिका विभाजन एक प्रगतिशील प्रक्रिया है और इसकी विभिन्न अवस्थाओं के बीच स्पष्ट रूप से विभाजन करना मुश्किल है। केन्द्रक विभाजन यानि केरियोकाइनेसिस को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है :

    • पूर्वावस्था (Prophase)।
    • मध्यावस्था (Metaphase)।
    • पश्चावस्था (Anaphase)।
    • अंत्यावस्था (Telophase)।

    पूर्वावस्था (Prophase)

    अंतरावस्था की व G1 अवस्था के बाद पूर्वावस्था केरियोकाइनेसिस का पहला पड़ाव है। वास्तविक कोशिका विभाजन की शुरूआत इसी अवस्था से होती है। इसमें प्रत्येक गुणसूत्र लम्बाई में पूरी तरह से दो बराबर भागों में बैट जाती है। इस आधे भाग को अर्द्धगुणसूत्र कहा जाता है। ये अर्द्धगुणसूत्र सेन्ट्रोमीयर पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका नष्ट हो जाती है। कोशिका विभाजन का यह सबसे लम्बा चरण होता है।

    पूर्वावस्था के पूर्ण होने के दौरान की घटनाओं की विशेषताएं

    • गुणसूत्रीय द्रव्य संघनित होकर ठोस गुणसूत्र बन जाता है। गुणसूत्र दो अर्धगुणसूत्रों से बना होता है, जो आपस में सेंट्रोमियर से जुड़े रहते हैं। 
    • अंतरावस्था के समय जिस तारककाय का द्विगुण हुआ है वह कोशिका में विपरीत ध्रुव की ओर जाने लगता है। प्रत्येक तारककाय सूक्ष्म नलिकाओं को विकरित करता है, जिसे तारक (एस्टर) कहते हैं। ये तन्तु व तारक मिलकर समसूत्री विभाजन यंत्र बनाते हैं। पूर्वावस्था के अंत में यदि कोशिका को सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है तो इसमें गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, केंद्रिका व केंद्रक आवरण दिखाई नहीं देता है।

    मध्यावस्था (Metaphase)

    केंद्रक आवरण के पूर्णरूप से विघटित होने के साथ समसूत्री विभाजन की द्वितीय अवस्था प्रारंभ होती है, इसमें गुणसूत्र कोशिका के कोशिका द्रव्य में फैल जाते हैं। इस अवस्था तक गुणसूत्रों का संघनन पूर्ण हो जाता है यह अवस्था काफी छोटी होती है उच्च पादपों में अतारकीय (Anastral) और जन्तुओं में तारकीय (astral) सूत्री विभाजन होता है।  यही वह अवस्था है जब गुणसूत्रों की आकृति का अध्ययन बहुत ही सरल तरीके से किया जा सकता है। 

    मध्यावस्था गुणसूत्र दो संतति अर्धगुणसूत्रों से बना होता है जो आपस में गुणसूत्रबिंदु से जुड़े होते हैं गुणसूत्रबिंदु के सतह पर एक छोटा बिंब आकार की संरचना मिलती है जिसे काइनेटोकोर कहते हैं। गुणसूत्र के सेन्ट्रोमीयर से कुछ तन्तु (टेक्टाइल तन्तु) ध्रुवों से जुड़े रहते हैं।  सूक्ष्म नलिकाओं से बने हुए तर्कुतंतु के जुड़ने का स्थान ये संरचनाएं (काइनेटीकोर) हैं, जो दूसरी ओर कोशिका के केंद्र में स्थित गुणसूत्र से जुड़े होते हैं। इस अवस्था में गुणसूत्र मध्य रेखा पर आकर एकत्र हो जाते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र का एक अर्धगुणसूत्र एक ध्रुव से तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर के द्वारा जुड़ जाता है, वहीं इसका संतति अर्धगुणसूत्र तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर से विपरीत ध्रुव से जुड़ा होता है। मध्यावस्था में जिस तल पर गुणसूत्र पंक्तिबद्ध हो जाते हैं, उसे मध्यावस्था पट्टिका कहते हैं।

    मध्यावस्था की मुख्य विशेषता

    • तर्कुतंतु गुणसूत्र के काइनेटोकोर से जुड़े रहते हैं।
    • गुणसूत्र मध्यरेखा की ओर जाकर मध्यावस्था पट्टिका पर पंक्तिबद्ध होकर ध्रुवों से तर्कुतंतु से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था (anaphase)

    सूत्री विभाजन के अन्तर्गत इस अवस्था में सर्वाधिक कम समय (2-3 मिनट) लगता है। इस अवस्था में अर्धगुणसूत्र अलग हो जाते हैं और सन्तति गुणसूत्रों (daughter chromosomes) के मध्य प्रतिकर्षण ( बल या टेक्टाइल तन्तुओं के ध्रुवों की ओर खिंचाव के कारण ये विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं।

    पश्चावस्था की विशेषताएं

    • गुणसूत्रबिंदु विखंडित होते हैं और अर्धगुणसूत्र अलग होने लगते हैं।
    • अर्धगुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं।

    अन्त्यावस्था (Telophase)

    इस चरण में में नवजात गुणसूत्र के प्रत्येक जोड़े के चारों ओर एक केन्द्रक झिल्ली का निर्माण होता है और एक पूर्ण कोशिका का निर्माण होता है। इसके साथ ही सन्तति गुणसूत्र ध्रुवों पर एकत्र हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में को जन्तु कोशिकाओं में सन्तति कोशिकाओं को पृथक करने के लिए संकुचन होता है, परन्तु पादप कोशिकाओं में संकुचन के स्थान पर कोशिका प्लेट बनती हैं।

    अन्त्यावस्था की मुख्य घटनाएं

    • गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर एकत्रित हो जाते हैं और इनकी पृथक पहचान समाप्त हो जाती है। 
    • गुणसूत्र समूह के चारों तरफ केंद्रक झिल्ली का निर्माण हो जाता है। 
    • केंद्रिका, गॉल्जीकाय व अंतर्द्रव्यी जालिका का पुनर्निर्माण हो जाता है।

    कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis)

    केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है। सूत्री विभाजन के दौरान द्विगुणित गुणसूत्रों का संतति केंद्रकों में संपृथकन होता है जिसे केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) कहते हैं।  कोशिका विभाजन संपन्न होने के अंत में कोशिका स्वयं एक अलग प्रक्रिया द्वारा दो संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है, इस प्रक्रिया को कोशिकाद्रव्य विभाजन कहते हैं। प्राणी कोशिका का विभाजन जीवद्रव्यकला में एक खांच बनने से संपन्न होता है। खांचों के लगातार गहरा होने व अंत में केंद्र में आपस में मिलने से कोशिका का कोशिकाद्रव्य दो भागों में बँट जाता है। यद्यपि पादप कोशिकाएं जो अपेक्षाकृत अप्रसारणीय कोशिका भित्ति से घिरी होती हैं अतः इनमें कोशिकाद्रव्य विभाजन दूसरी भिन्न प्रक्रियाओं द्वारा संपन्न होता है। पादप कोशिकाओं में नई कोशिका भित्ति निर्माण कोशिका के केंद्र से शुरू होकर बाहर की ओर पूर्व स्थित पार्श्व कोशिका भित्ति से जुड़ जाता है। नई कोशिकाभित्ति निर्माण एक साधारण पूर्वगामी रचना से प्रारंभ होता है जिसे कोशिका पट्टिका कहते हैं, जो दो सन्निकट कोशिकाओं की भित्तियों के बीच मध्य पट्टिका को दर्शाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन के समय कोशिका अंगक जैसे सूत्रकणिका (माइटोकॉड्रिया) व प्लैस्टिड लवक का दो संतति कोशिकाओं में वितरण हो जाता है। कुछ जीवों में केंद्रक विभाजन के साथ कोशिकाद्रव्य का विभाजन नहीं हो पाता है। इसके परिणामस्वरूप एक ही कोशिका में कई केंद्रक बन जाते हैं। ऐसी बहुकेंद्रकी कोशिका को संकोशिका कहते हैं  नारियल का तरल भ्रूणपोश इसका एक उदाहरण है । यह पादप कोशिकाओं में फ्रेग्मोप्लास्ट से, कोशिका के मध्य से बाहर की ओर कोशिका प्लेट के निर्माण द्वारा तथा जन्तुओं में कोशिका कला के मध्यवर्ती स्थान से अन्तर्वलन (invagination) द्वारा होता है।

    जन्तु और पादप कोशिकाओं के सूत्री विभाजन में विभिन्नताएँ

    पादप कोशिकाजन्तु कोशिका
    सेन्ट्रियोल अनुपस्थित होते हैं।सेन्ट्रियोल उपस्थित होते हैं।
    एस्टर नहीं बनते हैं।एस्टर बनते हैं।
    कोशिका विभाजन में एक कोशिका प्लेट बनता हैकोशिका विभाजन में कोशिकाद्रव्य का निर्माण और दो भागों में बँटते हैं।

    सूत्री कोशिका विभाजन का महत्त्व (Importance of Mitosis)

    सूत्री विभाजन या मध्यवर्तीय विभाजन केवल द्विगुणित कोशिकाओं में होता है। यद्यपि कुछ निम्न श्रेणी के पादपों एवं सामाजिक कीटों में अगुणित कोशिकाएं भी सूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होती हैं। सूत्री विभाजन के कारण जीवों की वृद्धि तथा विकास सम्भव हो पाता है। यह अलैंगिक जनन का आधार है। इससे सन्तति कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती हैं। इसके साथ ही सन्तति कोशिकाओं के गुण भी मातृ कोशिका के ही समान होता है। बहुकोशिकीय जीवधारियों की वृद्धि सूत्री विभाजन के कारण होती है। कोशिका वृद्धि के परिणामस्वरूप केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच का अनुपात अव्यवस्थित हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि कोशिका विभाजित होकर केंद्रक कोशिकाद्रव्य अनुपात को बनाए रखे। सूत्री विभाजन का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके द्वारा कोशिका की मरम्मत होती है। अधिचर्म की उपरी सतह की कोशिकाएं, आहार नाल की भीतरी सतह की कोशिकाएं एवं रक्त कोशिकाएं निरंतर प्रतिस्थापित होती रहती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

    इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फॉर्मर एवं मूरे ने किया। लैंगिक प्रजनन द्वारा संतति के निर्माण में दो युग्मकों का संयोजन होता है, जिनमें अगुणित गुणसूत्रों का एक समूह होता है। युग्मक का निर्माण विशिष्ट द्विगुणित कोशिकाओं से होता है। यह विशिष्ट प्रकार का कोशिका विभाजन है, जिसके द्वारा बनने वाली अगुणित संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। इस प्रकार के विभाजन को अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं।  यह विभाजन केवल जनन कोशिकाओं (reproductive cells) में होता है। इस विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या कम होकर आधी रह जाती है, इसलिए इसे न्यूनकारी कोशिका विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    अर्धसूत्री विभाजन की मुख्य विशेषताएं

    अर्द्धसूत्री विभाजन केन्द्रक विभाजन का रूप है। सूत्री विभाजन की तरह इसमें मुख्य कोशिका में अन्तरावस्था के क्रम में ही DNA रेप्लीकेशन होता है, परन्तु यह केन्द्रक विभाजन (nucleus division) तथा कोशिका विभाजन (cell division) के दो चरणों में पूरा होता है, जिसे अर्द्धसूत्री I और अर्द्धसूत्री II के नाम से जाना जाता है। यह विभाजन जन्तु में शुक्राणु और अण्डाणु के बनने (gametogenesis) के दौरान और पौधों में स्पोर (spore) बनने के क्रम में होता है। यह विभाजन द्विगुणित (diploid) जनन कोशिकाओं में होता है, जिसके परिणामस्वरूप चार अगुणित कोशिकाएँ (haploid cells) बनती हैं।

    अर्धसूत्री विभाजन की अवस्थाएँ

    अर्धसूत्री Iअर्धसूत्री II
    पूर्वावस्था Iपूर्णावस्था II
    मध्यावस्था Iमध्यावस्था II
    पश्चावस्था Iपश्चावस्था II
    अंत्यावस्था Iअंत्यावस्था II

    अर्द्धसूत्री विभाजन। (Meiosis।)

    इसे न्यूनकारी विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    इसकी चार अवस्थाएँ होती हैं

    पूर्वावस्था I (Prophase I)

    अर्धसूत्री विभाजन I की पूर्वावस्था की तुलना समसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था से की जाए तो, यह अधिक लंबी व जटिल होती है। गुणसूत्रों के व्यवहार के आधार पर इसे पाँच प्रावस्थाओं में उपविभाजित किया गया है जैसे-तनुपट्ट (लेप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकेटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) व पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)।

    साधारण सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर तनुपट्ट (लिप्टोटीन) अवस्था के दौरान गुणसूत्र धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। गुणसूत्र का संहनन (कॉम्पैक्शन) पूरी तनुपट्ट अवस्था के दौरान जारी रहता है। इसके उपरांत पूर्वावस्था I का द्वितीय चरण प्रारंभ होता है, जिसे युग्मपट्ट कहते हैं। इस अवस्था के दौरान गुणसूत्रों का आपस में युग्मन प्रारंभ हो जाता है और इस प्रकार की संबद्धता को सूत्रयुग्मन कहते हैं।

    लेप्टोटीन

    इसमें केन्द्रक जाल संघनित होकर गुणसूत्र बनाते हैं। एक ही प्रकार के गुण रखने वाले गुणसूत्र समजात गुणसूत्र कहलाते हैं।

    युग्मपट्ट (जाइगोटीन) 

    इस उप-अवस्था में समजात गुणसूत्र युग्म बनाते हैं। इस क्रिया को सिनेप्सिस (synapsis) कहते हैं। इस प्रकार के गुणसूत्रों के युग्मों को समजात गुणसूत्र कहते हैं। इस अवस्था का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मलेखी यह दर्शाता है कि गुणसूत्र सूत्रयुग्मन के साथ एक जटिल संरचना का निर्माण होता है, जिसे सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र कहते हैं। जिस सम्मिश्र का निर्माण एक जोड़ी सूत्रयुग्मित समजात गुणसूत्रों द्वारा होता है, उसे युगली (bivalent) अथवा चतुष्क (tetrad) कहते हैं। यद्यपि ये अगली अवस्था में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। पूर्वावस्था I की उपर्युक्त दोनों अवस्थाएं स्थूलपट्ट (Pachytene) अवस्था से अपेक्षाकृत कम अवधि की होती हैं। इस अवस्था के दौरान प्रत्येक युगली गुणसूत्र के चार अर्ध गुणसूत्र चतुष्क के रूप में अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।

    इस अवस्था में पुनर्योजन ग्रंथिकाएं दिखाई देने लगती हैं जहाँ पर समजात गुणसूत्रों के असंतति अर्धगुणसूत्रों के बीच विनिमय (क्रासिंग ओवर) होता है। विनिमय दो समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान के कारण होता है। विनिमय एंजाइम द्वारा नियंत्रित प्रक्रिया है व जो एंजाइम इस प्रक्रिया में भाग लेता है, उसे रिकाम्बीनेज कहते हैं। दो गुणसूत्रों में आनुवंशिक पदार्थों का पुनर्योजन जीन विनिमय द्वारा अग्रसर होता है। समजात गुणसूत्रों के बीच पुनर्योजन स्थूलपट्ट अवस्था के अंत तक पूर्ण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप विनिमय स्थल पर गुणसूत्र जुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। द्विपट्ट (डिप्लोटीन) के प्रारंभ में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र का विघटन हो जाता है और युगली के समजात गुणसूत्र विनिमय बिंदु के अतिरिक्त एक दूसरे से अलग होने लगते हैं।

    विनिमय बिंदु पर X आकार की संरचना को काएज्मेटा कहते हैं। कुछ कशेरुकी प्राणियों के अडंकों में द्विपट्ट महीनों या वर्षों बाद समाप्त होती है।

    अर्धसूत्री पूर्वावस्था I की अंतिम अवस्था पारगतिक्रम (डायाकाइनेसिस) कहलाती है। जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन हो जाता है, जिसमें काएज्मेटा का अंत होने लगता है। इस अवस्था में गुणसूत्र पूर्णतया संघनित हो जाते हैं व तर्कुतंतु एकत्रित होकर समजात गुणसूत्रों को अलग करने में सहयोग प्रदान करते हैं। पारगतिक्रम के अंत तक केंद्रिका अदृश्य हो जाती है और केंद्रक-आवरण झिल्ली भी विघटित हो जाता है। पारगतिक्रम मध्यावस्था की ओर पारगमन को निरूपित करता है।

    पैकेटीन

    इस उप-अवस्था में गुणसूत्र के लम्बाई में फटने के कारण समजात गुणसूत्र जोड़े में चार क्रोमैटिड दिखाई देते हैं। इस स्थिति को चर्तुसंयोजक (tetrad) कहा जाता है। समजात गुणसूत्रों के अबहन अर्द्धगुणसूत्रों के मध्य विनियम (crossing over) भी होता है।

    डिप्लोटीन

    इसमें समजात गुणसूत्र का प्रत्येक अर्द्धगुणसूत्र एक-दूसरे से अलग होने लगता है, परन्तु कुछ स्थानों पर एक-दूसरे के साथ क्रॉस रखता है, जिसे क्याज्मेटा कहते हैं।

    डाइकाइनेसिस

    इस उप-अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला लुप्त हो जाती हैं तथा क्याज्मेटा गुणसूत्र के सिरे की ओर खिसकने लगते हैं, जिसे टर्मिनेलाइजेशन (terminalization) कहते हैं।

    मध्यावस्था I (Metaphase I)

    इसमें तर्कु उपकरण बन जाता है तथा तर्कु तन्तु गुणसूत्रों के सेन्ट्रोमीटर से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था I (Anaphase I)

    तर्कु तन्तुओं के संकुचन के कारण समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर जाने लगते हैं और प्रत्येक ध्रुव पर गुणसूत्र की संख्या आधी हो जाती है।

    अन्त्यावस्था I (Telophase I)

    इस अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला प्रकट हो जाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन शुरू हो जाता है और कोशिका की इस अवस्था को कोशिका द्विक कहते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा दो कोशिकाएँ बनती हैं, जो अन्त्यावस्था में प्रवेश करती है, परन्तु इसमें DNA का द्विगुणन नहीं होता है। उसके बाद पूर्वावस्था II आती है जो पूर्वावस्था I से काफी सरल होती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन || (Meiosis II)

    अर्द्धसूत्री I के बाद यह अवस्था शुरू होती है। दोनों के मध्य की अवस्था विरामावस्था कहलाती है। इस चरण में चार अवस्थाएँ होती हैं, जो सूत्री विभाजन के समान होता है।

    पूर्वावस्था II (Interphase II)

    अर्धसूत्री विभाजन II गुणसूत्र के पूर्ण लंबा होने के पहले व कोशिकाद्रव्य विभाजन के तत्काल

    बाद प्रारंभ होता है। इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक आवरण विखर जाते हैं साथ ही अर्द्धगुणसूत्र छोटे और मोटे हो जाते हैं तथा तर्कु (spindle fibre) बन जाते हैं।

    मध्यावस्था II (Metaphase II)

    इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक झिल्ली विलुप्त हो जाती है। तर्क बन जाती है और गुणसूत्र तर्क के मध्य रेखा (equator) पर सेन्ट्रोमीयर द्वारा चिपक जाते हैं।

    पश्चावस्था II (Anaphase II)

    इसमें सेन्ट्रियोल पहले सेन्ट्रोमीयर्स को और फिर क्रोमैटिड्स को विपरीत ध्रुवों पर खींचते हैं।

    अन्त्यावस्था II (Telophase II)

    यह अवस्था अर्धसूत्री विभाजन की अंतिम अवस्था है, जिसमें गुणसूत्रों के दो समूह पुनः केंद्रक आवरण द्वारा घिर जाते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन के उपरांत चार अगुणित संतति कोशिकाओं का कोशिका चतुष्टय बन जाता है। इस तरह इसमें चार नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। गुणसूत्र कुण्डली से खुलकर, सीधे, लम्बे और एक समान हो जाते है। तकुं (spindle fibre) विलुप्त हो जाते हैं और सेन्टियोल दोहरे हो जाते हैं। केन्द्रक आवरण केन्द्रक के चारों ओर फिर से बनते हैं, जहाँ गुणसूत्र संख्या अविभाजित कोशिका में मौजूद गुणसूत्रों की संख्या की आधी (haploid) की होती है। जीव को एक अविभाजित कोशिका से चार नए कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।

    मुख्यतया अगुणित जीवन चक्र वाले पौधों; जैसे-यूलोथ्रिक्स में युग्मनज में अर्द्धसूत्री विभाजन, द्विगुणित जीवन चक्र वाले पौधों में युग्मकी अर्द्धसूत्री विभाजन तथा उच्च वर्ग के पौधों में बीजाणुक अर्द्धसूत्री विभाजन (sporic meiosis) होता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व (Importance of Melosis)

    अर्द्धसूत्री विभाजन में विनिमय (crossing over) द्वारा नई किस्मों का विकास होता है। चूंकि एक जाति के समस्त जीवों में पीढ़ी दर पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या सदैव स्थिर रहती है, जो अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन के मौलिक लक्षण

    समसूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में अंतर (Differences between Mitosis and Meiosis)

    समसूत्री विभाजनअर्द्धसूत्री विभाजन
    यह शरीर के कायिक कोशिकाओं एवं लैंगिक कोशिकाओं में होता है।यह केवल लैंगिक कोशिकाओं में होता है।
    कोशिका के गुणसूत्रों में कोई परिवर्तन नहीं होता है।इसमें सन्तति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है।
    यह प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है।यह दो उपविभाजनों में पूरा होता है जिसमें पहला न्यूनकारी (reductional) तथा प्रत्येक विभाजन में 4-5 अवस्थाएँ होती हैं।
    गुणसूत्रों के आनुवंशिक पदार्थ में आदान-प्रदान नहीं होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं में भी उसी प्रकार के गुणसूत्र होते हैं, जैसे जनक कोशिका में।गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं के गुणसूत्र में कुछ भाग पितृ कोशिका से तथा कुछ भाग मातृ कोशिका से आ जाता है अतःसन्तति कोशिका के गुणसूत्र, जनकों के गुणसूत्र से भिन्न होते हैं।
    सन्तति कोशिका में जनक जैसे ही गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता नहीं होती है lसन्तति कोशिकाओं में जनकों से भिन्न गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता होती है।
    एक जनक (parents) से दो सन्तति कोशिकाएँ (daughter) बनती हैं।एक जनक से चार सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं।