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  • मानव प्रजनन तंत्र | Human Reproductive System

    मानव प्रजनन तंत्र | Human Reproductive System

    इस आर्टिकल में हम प्रजनन तंत्र के बारे में जानेगे | प्रजनन तंत्र (Reproductive System) क्या है, मानव प्रजनन तंत्र | Human Reproductive System क्या है, अलैगिक जनन (Asexual Reproduction) और लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) क्या है, नर प्रजनन तंत्र (Male reproductive system) और उसके मुख्य अंग कोनसे है, मादा जनन तंत्र (Female reproductive system)  और उसके मुख्य अंग कोनसे है, मानव प्रजनन की क्रियाविधि (Mechanism of human reproduction) कोन कोनसी है, आदि |

    प्रजनन तंत्र (Reproductive System)

    प्रजनन तन्त्र (Reproductive System) वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा जीवधारी अपने जैसा जीव उत्पन्न करता है, जनन या प्रजनन (reproduction) कहलाता है। इस प्रक्रम द्वारा जीव अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं | प्रजनन वह प्रक्रम है जिसके द्वारा जीव अपनी ही जैसी अन्य उर्वर सन्तानों की उत्पत्ति करता है और इस प्रकार अपनी संख्या में वृद्धि कर अपनी जाति के अस्तित्व को बराबर बनाए रखकर उसे विलुप्त होने से बचाता है। जीवों के प्रजनन में भाग लेने वाले अंगों को प्रजनन अंग (Reproductive organs) और एक जीव के सभी प्रजनन अंगों को सम्मिलित रूप से प्रजनन तंत्र (Reproductive system) कहते हैं।

    प्राणियों में जनन के प्रकार

    प्राणियों में जनन के निम्न प्रकार है :

    अलैगिक जनन (Asexual Reproduction)

    जनक की इस विधि में जीव की कायिक कोशिकाओं में कई बार विभाजन होता है, जिससे समान रूप के दो अथवा अधिक नए जीव बनते हैं। अलैगिक जनन निम्न विधियों द्वारा होता है

    (i) द्विविखण्डन (Binary fission) – एककोशिकीय जीव; जैसे अमीबा, पैरामीशियम।

    (ii) बहुविखण्डन (Multiple fission) – एक कोशिका से अनेक कोशिकाओं अर्थात् जीवों की उत्पत्ति होती है; जैसे- मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम में

    (iii) मुकुलन (Budding) – इस विधि में शरीर में एक उभार बन जाता है। इस पार्श्व उभार को मुकुल (bud) कहते हैं। जनक शरीर के ऊपर मुकुल धीरे-धीरे बड़ा होकर एक नए जीव बन जाते हैं। हाइड्रा एवं यीस्ट कोशिकाओं में होता है।

    (iv) पुनरुद्भवन (Regeneration) खण्डित शारीरिक भागों को पुनः प्राप्त करने की जीव की क्षमता पुनर्जनन या पुनरुद्भवन है। हाइड्रा, प्लेनेरिया तथा स्पंजों में यह क्रिया होती है। हाइड्रा को यदि टुकड़ों में काटा जाए, तो इसका प्रत्येक टुकड़ा एक नया हाइड्रा होगा।

    लैंगिक जनन (Sexual Reproduction)

    लैंगिक जनन के लिए दो लिंगों, नर और मादा का होना आवश्यक है। अधिकतर प्राणियों में मनुष्यों की भाँति नर तथा मादा जनन अंग अलग-अलग जीव में होते हैं ऐसे जीव एकलिंगी (unisexual) कहलाते हैं। पौधों तथा कुछ प्राणियों में जैसे फीताकृमि, केंचुआ, तारामीन आदि में नर तथा मादा लैंगिक अंग एक ही जीव में पाए जाते हैं। ऐसे जीवों को द्विलिंगी या उभयलिंगी (hermaphrodite) कहते हैं।

    लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

    1. जनद प्राथमिक लैंगिक अंग होते हैं, जो अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा युग्मक बनाते हैं। वृषण नर जनद होता है, जो शुक्राणुओं को उत्पन्न करता है तथा अण्डाशय मादा जनद है, जो अण्डाणुओं को उत्पन्न करता है।

    2. लैंगिक जनन का प्रारम्भ दो विभिन्न युग्मकों के सम्मिलन (fusion) से होता है, जिसे निषेचन (fertilization) कहते हैं। निषेचन के बाद एक युग्मनज (zygote) बनता है, जो नए जीव में विकसित होता है।

    3. मछलियों एवं उभयचरों में निषेचन सामान्यतया शरीर के बाहर होता है। इसे बाह्य निषेचन (जो सदैव जलीय माध्यम में होता है), कहते हैं, जबकि आन्तरिक निषेचन सरीसृपों, पक्षियों तथा स्तनधारियों में होता है।

    4. लैंगिक जनन एक उच्च विकसित प्रक्रिया है तथा अलैंगिक जनन की तुलना में इसके बहुत लाभ हैं। लैंगिक जनन संततियों में गुणों की विभिन्नताओं को बढ़ावा देता है क्योंकि इसमें दो विभिन्न तथा लैंगिक असमानता वाले जीवों से आए युग्मकों का संलयन होता है।

    मानव प्रजनन तन्त्र (Human Reproductive System)

    मानव एकलिंगी (Unisexual) प्राणी है, अर्थात् नर और मादा लिंग अलग-अलग जीवों में पाये जाते हैं। जो जीव केवल शुक्राणु उत्पन्न करते हैं उसे नर कहते हैं। जिन जीवों से केवल अण्डाणु की उत्पत्ति होती है, उन्हें मादा कहते हैं। शुक्राणु तथा अंडाणु के निषेचन ( Fer tilization ) से युग्मनज ( Zygote ) का निर्माण होता है जो आगे चल कर नए जीव का निर्माण करता है ।

    मानव में प्रजनन तंत्र अन्य जन्तुओं की अपेक्षा बहुत अधिक विकसित और जटिल होता है। मानव में अंडे का निषेचन (Fertilization) फैलोपियन नलिका (Fallopian tube) तथा भ्रूणीय तथा (Embryonic development) गर्भाशय (Uterus) में होता है।

    मानव जरायुज (viviparous) होते हैं अर्थात् ये सीधे शिशु को जन्म देते हैं। मानव में जनन अंग मादा में 12 से 13 वर्ष की उम्र में तथा नर में 15 से 18 वर्ष की उम्र में प्रायः क्रियाशील हो जाते हैं। प्रजनन अंग भी कुछ हार्मोन (Hormone) का स्राव (secretion) करते हैं जो शरीर में अनेक प्रकार के परिवर्तन लाते हैं। ऐसे परिवर्तन मादा में प्रायः वक्ष तथा जनन अंगों पर बाल उगने तथा नर में दाढ़ी एवं मूंछ आने से परिलक्षित होता है। मानव में नर तथा मादा प्रजनन अंग पूर्णतया अलग अलग होते हैं।

    लैंगिक जनन हेतु इस के लिए उत्तरदायी जनन कोशिकाओं का विकास एक विशेष अवधि जिसे यौवनांरभ (Puberty) कहा जाता है में होता है । इस अवस्था में लैगिंक विकास दृष्टिगोचर होने लगता है तथा जनन परिपक्वता आती है ।


    मनुष्य में लैगिंक परिपक्वता 18 – 19 वर्ष की उम्र में पूर्ण हो जाती है । इस अवधि में मनुष्यों की संवेदनाओं तथा उसके बौद्धिक व मानसिक स्तर में परिवर्तन आता है । यौवनांरभ से लैगिंक परिपक्वता तक आए परिवर्तनों के मूल में विभिन्न हार्मोनो का स्त्रावंण है | मानव नर में टेस्टोस्टेरोन Testosterone ) तथा स्त्रियों में एस्ट्रोजन (Estrogen) तथा प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) प्रमुख लिंग हार्मोन हैं ।

    लड़को में यौवनांरभ के लक्षण – आवाज का भारी होना , दाढ़ी मूंछ आना , काँख एंव जननांग क्षेत्र में बालों का आना , त्वचा तैलीय होना आदि ।

    लड़कियों में यौवनांरभ के लक्षण – लड़कियों में में स्तन का बनाना तथा आकार में वृद्धि , त्वचा का तैलीय होना, जननांग क्षेत्र में बालों का आना, रजोधर्म (Menstrual cycle) का शूरू होना, आदि यौवनांरभ के लक्षण हैं।

    नर जनन अंग – वृषण , वृषणकोष , शुक्रवाहिनी , शुक्राशय , प्रोस्टेट ग्रन्थि, मूत्र मार्ग तथा शिश्न ।

    मादा जनन अंग – अण्डाशय , अण्डवाहिनी , गर्भाशय तथा योनि ।

    नर प्रजनन तंत्र (Male reproductive system)

    जनन कोशिका उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान तक पहुँचाने वाले अंग संयुक्त रूप से नर प्रजनन तंत्र कहलाते हैं।

    मानव के नर प्रजनन तंत्र में निम्नलिखित लैंगिक अंग (Sex Organs) एवं उनसे सम्बद्ध अन्य रचनाएँ पायी जाती हैं –

    वृषण एवं वृषण कोष (Scrotum), 2. अधिवृषण (Epididymis) 3. शुक्रवाहिका, 4. शुक्राशय (Seminal vesicles), 5. मूत्र मार्ग (Urethera), 6. शिश्न (Penis), 7. पुरःस्थ या प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland)

    जनद अंग (Gonads)

    ये वे अंग छोटे होते हैं जो या तो लैंगिलैं क कोशिकाओं या युग्मकों (Sex cells तथा Gametes) का निर्माण करते हैं । साथ ही ये कुछ हार्मोन का स्त्राव भी करते है । ये अंग जनद (Gonads) कहलाते हैं । नर में जनद वृषण (Testis) कहलाते है तथा नर जनन कोशिका – शुक्राणु का निर्माण करने के लिए उत्तरदायी होते हैं । यह उदर गुहा के बाहर वृषण कोष (Scrotum) में उपस्थित होता है । वृषण के दो भाग होते है | प्रथम जो शुक्राणु निर्माण करता है तथा द्वितीय अंतः स्त्रावी ग्रन्थि के तौर पर टेस्टोस्टेरान हार्मोन का स्त्राव करता है ।

    वृषण एवं वृषण कोष (Testes and scrotal sac)

    मानव प्रजनन अंगों में वृषण मुख्य तथा अन्य सहायक अंग हैं। इसमें शुक्राणुओं का निर्माण होता है तथा इससे पुरुष हॉमोन टेस्टोस्टेरॉन का अन्तःस्राव होता है। वृषण नर में पाया जाने वाला प्राथमिक जनन अंग है। ये नर जनन ग्रन्थियाँ हैं जो अण्डाकार होती हैं। इनकी संख्या दो होती है। वृषण त्वचा की बनी एक थैली जैसी रचना में स्थित रहते हैं जो शरीर के बाहर लटकती रहती है। इसे वृषण कोष (Scrotal Sae )कहते हैं। वृषण की कोशिकाओं द्वारा नर युग्मक अर्थात् शुक्राणुओं का निर्माण होता है।

    शुक्राणु (sperm) उत्पादन के लिए आवश्यक ताप शरीर के ताप से कम होता है। यही कारण है कि वृषण उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्थित होते हैं। एक औसत स्खलन में लगभग एक चम्मच शुक्र स्राव होता है। इसमें शुक्राणुओं की संख्या 20 से 20 लाख तक होती है।

    शुक्राणु की लम्बाई 5 माइक्रॉन होती है। यह तीन भाग में विभाजित रहता है- सिर, ग्रीवा और पुच्छ। शुक्राणु शरीर में 30 दिन तक जीवित रहते हैं जबकि मैथून के पश्चात स्त्रियों में केवल 72 घण्टे तक ये जीवित रहते हैं। वृषण में एक प्रकार का द्रव भरा रहता है जिसे वृषण द्रव (seminal fluid) कहते हैं। वृषण का प्रत्येक खण्ड शुक्रजनन नलिकाओं (seminiferous tubules) से भरा रहता है। ये नलिकाएँ छल्लेदार होती है।

    शुक्रजनन नलिकाओं के बीच अंतराली कोशिकाओं (Interstitial cells) के समूह पाये जाते हैं जो नर जनन हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन (Testosterone) का स्राव करती है। यह हार्मोन गौण लैंगिक लक्षणों (secondary sexual characters) के विकास और नियंत्रण में सहायक होता है। सभी शुक्रजनन नलिकाएँ आपस में मिलकर शुक्र अपवाहिका (vas efferentia) बनाती है। शुक्र-अपवाहिकाएँ मिलकर अन्त में अधिवृषण-वाहिनी (Epididymis duct) बनाती है।

    वृषण में ही शुक्रजनन नलिकाओं द्वारा शुक्राणु कोशिकाओं की उत्पत्ति होती है। वृषण से शुक्राणु कोशिकाएँ अधिवृषण (Epididyonis) में चली जाती हैं जहाँ वे संचित रहती हैं। वृषण का प्रमुख कार्य शुक्राणुओं का निर्माण करना और नर हार्मोन टेस्टोस्टेरान की उत्पत्ति करना है।

    अधिवृषण (Epididymis)

    यह एक 6 मीटर लम्बी कुण्डलित नलिका होती है जो प्रत्येक वृषण के पीछे स्थित होती है। यह वृषण से अच्छी तरह जुड़ी रहती है। इसका एक छोर वृषण से जुड़ा रहता है तथा दूसरा छोर अधिवृषण से आगे बढ़कर शुक्रवाहिका (vas deferens) बनाता है। अधिवृषण शुक्राणुओं के प्रमुख संग्रह स्थान का कार्य करता है। इसके अतिरिक्त अधिवृषण में शुक्राणुओं का परिपक्वन (Maturation) भी होता है। शुक्राणु यहीं सक्रियता प्राप्त करते हैं।

    शुक्रवाहिका (Vas deferens)

    यह एक पतली नलिका होती है जिसकी भित्तियाँ मांसपेशियों की बनी होती है। अधिवृषण से शुक्राणु शुक्रवाहिका में पहुँचते हैं। शुक्रवाहिका अधिवृषण को शुक्राशय (seminal vesicle) से जोड़ती है। ये शुक्राणुओं को आगे की ओर बढ़ाने का काम करती हैं।

    शुक्राशय (vas vesicles)

    यह एक जोड़ी पतली पेशीयुक्त भितियोंवाली रचना होती है। ये पालियुक्त (Lobed) रचनाएँ होती हैं। यह प्रोस्टेट ग्रन्थियों (Prostate glands) के ऊपर स्थित रहता है। दोनों ओर के शुक्राशय मिलकर स्खलनीय वाहिनी (Ejaculatory duct) का निर्माण करते हैं। शुक्राशय से एक प्रकार का चिपचिपा पदार्थ स्रावित होता है। 

    पुरःस्थ या प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate Gland)

    यह मूत्र मार्ग (Urethra) से मूत्राशय (Urinary bladder) तक सम्बद्ध रहता है। इसका आकार गोल सुपारी जैसा होता है। दोनों पुरःस्थ (Prostate) ग्रन्थियाँ संयुक्त होकर एक सामान्य पुरःस्थ ग्रन्थि का निर्माण करती है। इसमें लगभग दो दर्जन नलिकाएँ होती हैं जो मूत्रमार्ग (Urethra) में खुलती है। पुरःस्थ से एक प्रकार का द्रव स्रावित होता है जिसे पुरःस्थ द्रव (Prostate fluid) कहते हैं। यह द्रव शुक्र (semen) को विशिष्ट गंध (smell) प्रदान करता है। पुरःस्थ द्रव शुक्राशय द्रव के साथ मिलकर मूत्रमार्ग (Urethra) में पहुँचते हैं।

    शिश्न (Penis)

    शिश्न पुरुषों का संभोग करने वाला अंग होता है। शिश्न के माध्यम से ही शुक्राणु मादा के प्रजनन तंत्र में पहुँचते हैं। मूत्र मार्ग (Urethra) मूत्राशय से प्रारम्भ होकर शिश्न से गुजरकर उसके (शिश्न के) ऊपरी भाग में खुलता है। शिश्न में अत्यधिक रक्त की आपूर्ति होती है। साथ-ही-साथ इसकी पेशियाँ भी विशिष्ट प्रकार की होती है। जो इसे कड़ापन प्रदान करती है। शिश्न शुक्र (semen) को शरीर से बाहर निकालकर मादा की योनि (vagina) के भीतर तक पहुँचाता है।

    मादा जनन तंत्र (Female reproductive system) 

    मादा जनन तंत्र में निम्नलिखित जनन अंग होते हैं- 1. अण्डाशय, 2. अण्डवाहिनियाँ, 3. गर्भाशय, 4. योनि।

    अण्डाशय (Ovaries)

    प्रत्येक मादा में एक जोड़ा अंडाशय होता है। ये उदर के निचले भाग में श्रोणिगुहा (Pelvie cavity) में दोनों ओर दाएँ और बाएँ एक-एक स्थित होते हैं। प्रत्येक अंडाशय एक अंडाकार (Oval) रचना होती है। प्रत्येक अंडाशय लगभग 4 सेमी लम्बा, 2.5 सेमी चौड़ा और 1.5 सेमी मोटा होता है। अंडाशय पेरिटोनियम (Peritoneurn) झिल्ली द्वारा उदर (Abdomen) से सटा रहता है। अंडाशय के भीतर अंडाणुओं का अंडजनन द्वारा निर्माण होता है। अंडाशय का बाह्य स्तर एपिथीलियम का बना होता है जिसे जनन एपिथीलियम (Germinal epithelium) कहते हैं।

    अंडाशय का आन्तरिक भाग तंतुओं एवं संयोजी ऊतक (Connective tissue) का बना होता है, जिसे स्टोमा (stroma) कहते हैं। अंडाशय का मुख्य कार्य अंडाणु (Ovum) पैदा करना है। अंडाशय से दो हार्मोन आस्ट्रोजन (Oestrogen) तथा प्रोजेस्टेरान (Progesterone) का स्राव (Secretion) होता है, जो ऋतुस्राव (Menstruation) को नियंत्रित करते हैं।

    अण्डवाहिनियाँ (Fallopian tube)

    अण्डवाहिनी या फैलोपियन नलिका की संख्या दो होती है, जो गर्भाशय के ऊपरी भाग के दोनों बगल लगी रहती है। प्रत्येक फेलोपियन नलिका लगभग 10 सेमी लम्बी होती है। इस नलिका का एक सिरा गर्भाशय से सम्बद्ध रहता है और दूसरा सिरा अण्डाशय की ओर अंगुलियों के समान झालर बनाता है। इस रचना को फिम्ब्री (Fimbri) कहते हैं।

    अण्डाणु जब अण्डाशय से बाहर निकलता है तब वह फिम्ब्री द्वारा पकड़ लिया जाता है। इसके बाद अण्डाणु फेलोपियन नलिका की गुहा में पहुँच जाता है। फेलोपियन नलिका से अण्डाणु गर्भाशय में पहुँचता है। फेलोपियन नलिका का प्रमुख कार्य फिम्ब्री द्वारा अण्डाणु को पकड़ना और गर्भाशय में पहुँचाना है।

    गर्भाशय (Uterus)

    यह एक नाशपाती के समान रचना होती है जो श्रोणिगुहा (Pelvie Cavity) में स्थित होती है। यह सामान्यतः 7.5 सेमी लम्बा, 5 सेमी चौड़ा तथा 3.5 सेमी मोटा होता है। इससे ऊपर की तरफ दोनों ओर अर्थात् दाएँ और बाएँ कोण पर अण्डवाहिनी खुलती है। इसका निचला भाग सँकरा होता है जिसे ग्रीवा (Cervix) कहते हैं। ग्रीवा आगे की ओर योनि में परिवर्तित हो जाता है।

    गर्भाशय का निचला छिद्र इसी में खुलता है। गर्भाशय की भित्ति पेशीय (Muscular) होती है, जिसके भीतर खाली जगह होती है। गर्भाशय की भित्ति के अंदर की ओर एक कोशिकीय स्तर होता है जिसे गर्भाशय अंत: स्तर (Endometrium) कहते हैं। गर्भाशय प्रमुख कार्य निषेचित अण्डाणुओं को भ्रूण परिवर्द्धन हेतु उचित स्थान प्रदान करना है।

    योनि (vagina)

    यह एक नली के समान रचना होती है। यह लगभग 7.5 सेमी लम्बी होती है। यह बाहर के तल से गर्भाशय तक फैली रहती है। इसके सामने मूत्राशय (Urinary bladder) तथा नीचे मलाशय (Recturn) स्थित होता है। योनि की दीवार पेशीय ऊतक की बनी होती है। योनि का एक सिरा मादा जनन छिद्र के रूप में बाहर खुलता है तथा दूसरा सिरा पीछे की ओर गर्भाशय की ग्रीवा (Cervix) से जुड़ा रहता है। योनि के शरीर के बाहर खुलने वाले छिद्र की योनि द्वार (Vaginal orifice) कहते हैं।

    योनि की दीवार में वल्बोरीथल ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं, जिससे एक चिपचिपा द्रव निकलता है। यह द्रव संभोग के समय योनि को चिकना बनाता है। योनि एवं मूत्रवाहिनी के द्वार के ऊपर एक छोटा-सा मटर (Pea) के दाने के जैसा उभार स्थित होता है जिसे भग शिशिनका (Clitoris) कहते हैं। यह एक अत्यन्त ही उत्तेजक अंग होता है, जिसे स्पर्श करने या शिश्न (Penis) के सम्पर्क में आने पर स्री को अत्यधिक सुखानुभूति होती है। मैथून के समय शिश्न से वीर्य निकलकर योनि में गिरता है तथा योनि इसे गर्भाशय में पहुँचा देती है।

    अण्डोत्सर्ग (Ovulation)

    अण्डाणु के परिवर्द्धन के साथ-साथ गर्भाशय भी परिवर्द्धित होता है। परिवर्द्धन की ये क्रियाएँ हार्मोन द्वारा नियंत्रित होती हैं। 28 दिन की सक्रियता में मानव अण्डाशय सामान्यतः केवल एक अण्डाणु की उत्पत्ति करता है। अण्डाशय द्वारा अण्डाणु की निर्मुक्ति को अण्डोत्सर्ग (Ovulation) कहते हैं।

    ऋतुस्राव चक्र (Menstruation cycle)

    ऋतुस्राव चक्र का पाया जाना प्राइमेट्स का प्रमुख लक्षण है। स्त्री का प्रजनन काल 12-13 वर्ष की उम्र में प्रारम्भ होता है जो 40-50 वर्ष की उम्र तक चलता है। इस प्रजनन काल में गर्भावस्था को छोड़कर प्रति 26 से 28 दिनों की अवधि पर गर्भाशय से रक्त तथा इसकी आन्तरिक दीवार से शलेष्म का स्राव होता है। यह स्राव तीन-चार दिनों तक चलता है। इसे ही रजोधर्म या मासिक धर्म या ऋतुस्राव चक्र (Menstruation cycle) कहते हैं। ऋतुस्राव के प्रारम्भ होने के 14 दिन बाद अण्डोत्सर्ग होता है। यह अण्डोत्सर्ग दोनों अण्डाशयों से बारी-बारी से होती है।

    अण्डोत्सर्ग के कुछ समय के पश्चात अण्डाणु अण्डवाहिनी में पहुँच जाता है और 15वें से 19वें दिन तक इसमें रहता है। इस बीच यदि स्त्री सम्भोग करे, तो यह अण्डाणु निषेचित होकर गर्भाशय में चला जाता है, अन्यथा वह अगले ऋतुस्राव में बाहर निकल जाता है। लड़कियों में मासिक धर्म या ऋतुस्राव चक्र प्रथम बार 12-13 वर्ष की उम्र में प्रारम्भ होता है, इसे मेनार्कि (Menarche) कहते हैं।

    अण्डोत्सर्ग के पश्चात पुटक (Follicle) पीले रंग का हो जाता है। अब इस पुटक को पीत पिण्ड या कॉर्पस ल्यूटियम (Corpus leuteum) कहते हैं। पीतपिण्ड या कॉर्पसल्यूटियम के परिवर्द्धन का भी नियंत्रण हार्मोन द्वारा होता है। कॉर्पस ल्यूटियम द्वारा एक हार्मोन का स्राव होता है जिसे प्रोजेस्टेरॉन (Progesterone) कहते हैं।

    गर्भधारण हेतु उपयुक्त परिस्थितियां (Favourable conditions for pregnancy): 

    सम्भोग क्रिया द्वारा हमेशा गर्भधारण नहीं होता है। इसके लिए कुछ परिस्थितियों का अनुकूल होना आवशयक है ये परिस्थितियाँ हैं-

    1. गर्भधारण के लिए आवश्यक है कि ऋतुस्राव के 14वें दिन के आस-पास या 11वें से 18वें दिन के अन्दर सम्भोग अनिवार्य रूप से हो।
    2. अण्डवाहिनी (Fallopian tube) एवं गर्भाशय सूजन एवं संक्रमण से मुक्त हो।
    3. वीर्य (semen) में शुक्राणुओं (sperms) की संख्या सामान्य हो।

    मानव प्रजनन की क्रियाविधि (Mechanism of human reproduction)

    मानव के प्रजनन में तीन अवस्थाएँ होती हैं। ये हैं-

    युग्मक जनन (Gametogenesis)

    वृषण तथा अण्डाश्य में अगुणित युग्मकों ( Haploid gametes ) की निर्माण विधि को युग्मकजनन कहा जाता है । नर के वृषण में होने वाली इस क्रिया द्वारा शुक्राणुओं का निर्माण होता है तथा यह क्रिया शुक्रजनन कहलाती है । मादा के अण्डाशय में युग्मको ‘ की निर्माण क्रिया जिस के द्वारा अण्डाणु का निर्माण होता है । अण्डजनन कहलाती है ।

    निषेचन (Fertilization)

    मादा में उपस्थित अण्डाणु मेथुन के दौरान नर द्वारा छोड़े गए शुक्राणुओं के संपर्क में आते हैं तथा संयुग्मन कर युग्मनज ( Zygote ) का निर्माण करते है । यह प्रक्रिया निषेचन कहलाती है

    भ्रूणीय विकास (Gametogenesis)

    वृषण (Testes) एवं अण्डाशयों (Ovaries) में युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मक जनन (Gametogenesis) कहते हैं। युग्मकों का निर्माण वृषण तथा अण्डाशय की जनन कोशिकाओं में अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा होता है। वृषण में शुक्राणुओं (sperms) का निर्माण शुक्रजनन (Spermatogenesis) तथा अण्डाणु (ovum) का अण्डाशय में निर्माण अण्डजनन (Oogenesis) कहलाता है।

    शुक्रजनन (Spermatogenesis) एवं अण्डजनन (Oogenesis) में समानता एवं विभिन्नताएं

    समानता (Similarities)
    शुक्रजननअण्डजनन
    1. शुक्राणुओं का निर्माण जनन एपिथीलियम की कोशिकाओं के विभाजन से होता है।1. अण्डाणुओंका निर्माण भी जनन एपिथीलियम की कोशिकाओं के विभाजन से होता है।
    2. शुक्रजनन क्रिया में गुणन, वृद्धि एवं परिपक्वन तीनों प्रावस्थाएँ होती हैं।2. अण्डजनन क्रिया में भी शुक्रजनन की तरह तीनों प्रावस्थाएँ होती हैं।
    3. शुक्रजनन के परिपक्वन प्रावस्था में दो विभाजन होते हैं।3. अण्डजनन के परिपक्वन प्रावस्था में भी शुक्रजनन के परिपक्वन प्रावस्था की तरह दो विभाजन होता है।
    4. समसूत्री विभाजन द्वारा गुणन प्रावस्था में कोशिकाएँ संख्या में वृद्धि करती है।4. इसमें भी समसूत्री विभाजन द्वारा गुणन प्रावस्था में कोशिकाएँ संख्या में वृद्धि करती हैं।
    5. इसमें अन्तिम उत्पाद नर युग्मक (Male gametes) बनते हैं।5. इसमें अन्तिम उत्पाद मादा युग्मक (Female gametes) बनते हैं।
    विभिन्नताएं (Dissimilarities):
    1. एक स्पर्मेटोसाइट से चार शुक्राणुओं का निर्माण होता है।1. एक ऊगोनिया (Oogonia) से केवल एक अण्डाणु का निर्माण होता है।
    2. शुक्रजनन क्रिया में कोई भी ध्रुव कोशिका नहीं बनती है।2. अण्डजनन में दो या तीन ध्रुव कोशिकाएँ बनती हैं।
    3. स्पर्मेटोसाइट से बने चारों शुक्राणु निषेचन क्रिया में भाग ले सकते हैं।3. ऊगोनिया से बना अण्डाणु निषेचन क्रिया में भाग ले सकता है। ध्रुव कोशिकाए निषेचन क्रिया में भाग नहीं लेती हैं।
    4. शुक्राणु छोटे एवं सक्रिय होते हैं।4. अण्डाणु बड़े एवं निष्क्रिय होते हैं।

    निषेचन (Fertilization)

    नर युग्मक (शुक्राणु) एवं मादा युग्मक (अण्डाणु) के आपस में सम्मिलन से युग्मनज (zygote) बनने की क्रिया को निषेचन कहते हैं। मनुष्य में अन्तः निषेचन (Internal fertilization) पाया जाता है। मनुष्य में निषेचन की क्रिया मादा की अण्डवाहिनी (Fallopian tube) में होती है। इस क्रिया में नर युग्मक का केवल केन्द्रक भाग लेता है जबकि सम्पूर्ण मादा युग्मक इसमें भाग लेता है।

    भ्रूणीय विकास (Embryonic development)

    निषेचन क्रिया के बाद बना युग्मनज तीव्रता से समसूत्री विभाजनों द्वारा विभाजित होने लगता है, और अन्ततः गर्भाशय में एक पूर्ण विकसित शिशु को स्थापित करता है। निषेचन के लगभग 10 सप्ताह तक के विकसित युग्मनज को भ्रूण (Embryo) तथा युग्मनज में होने वाले विभिन्न क्रमिक परिवर्तनों को भ्रूणीय विकास कहते हैं।

    भ्रूण में 5वें सप्ताह तक तीन जननिक स्तरों का निर्माण हो जाता है। ये तीन जननिक स्तर हैं- (a) इण्डोडर्म (Endoderm) (b) मीसोडर्म (Mesoderm) तथा (c) एक्टोडर्म (Ectoderm)

    इसके पश्चात इन स्तरों से विभिन्न शारीरिक अंगों का निर्माण होता है। भ्रूण में 7वें से 9वें सप्ताह के मध्य तक हाथ, पैर, श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र एवं पाचन तंत्र बन जाते हैं। तीसरे माह में भ्रूण में कंकाल तंत्र बन जाता है। चौथे माह में सिर एवं शरीर पर रोएँ, पाँचवें माह में आहारनाल, रुधिर व अस्थिमज्जा बन जाते हैं। छठे माह में भ्रूण छोटे शिशु का रूप धारण कर लेता है।

    सातवें माह तक शिशु के सभी अंग अच्छी तरह कार्य करने लगते हैं। आठवें माह में उसमें वसा का जमाव होने लगता है जबकि नवें माह में वह जन्म के लिए तैयार हो जाता है। भ्रूण का पोषण जरायु (Chorin) एम्नियान एवं अपरा (Placenta) द्वारा होता है। मनुष्य में गर्भाधान काल 280 दिनों का होता है। इसके पश्चात प्रसव द्वारा शिशु मादा के शरीर के बाहर आ जाता है।

    मानव प्रजनन तंत्र | Human Reproductive System – महत्वपूर्ण तथ्य

    1. यौवनारम्भ (Puberty): मनुष्य के जीवन काल में जब उसमें जनन क्षमता आरम्भ होती है, वह समय यौवनारम्भ (Puberty) कहलाता है। जनन की क्षमता स्त्रियों में सामान्यतः 12-16 वर्ष की उम्र में प्रारम्भ होती है जबकि 40-50 वर्ष की आयु में समाप्त हो जाती है। पुरुषों में भी यौवनारम्भ प्रायः 12-16 वर्ष की उम्र में होता है जबकि 50 वर्ष की उम्र के बाद धीरे-धीरे जनन क्षमता घटती जाती है।
    2. गौण लैंगिक लक्षण (Secondary Sexual Characters): यौवनारम्भ के समय मनुष्य के शरीर में अनेक प्रकार के परिवर्तन होते हैं तथा अनेक ऐसे परिवर्तन होते हैं जो मादा को नर से विभेदित करते हैं। इन लक्षणों को गौण लैंगिक लक्षण कहते हैं।
    3. मेनार्कि (Menarche)– लड़कियों में मासिक चक्र का प्रथम बार प्रारम्भ होना (12-13 वर्ष की उम्र में) मेनार्कि (Menarche) कहलाता है।
    4. रजनोवृति (Menopause): स्त्रियों में 40-50 वर्ष की उम्र के पश्चात ऋतु स्राव नहीं होता है। इसे ही रजनोवृति (Menopause) कहते हैं।
    5. अण्डोत्सर्ग (Ovulation): अण्डाशय द्वारा अण्डाणु की निर्मुक्ति को अण्डोत्सर्ग कहते हैं।
    6. जरायु (Chorion): गर्भ की सबसे बाहरी झिल्ली को जरायु कहते हैं।
    7. अंकुर (Villi): जरायु से अंगुलियों के आकार के अनेक प्रवर्द्ध निकलते हैं, जिन्हें अंकुर कहते हैं।
    8. अपरा (Placenta): अंकुर और गर्भाशय कोशिकीय परत के सम्पर्क क्षेत्र को अपरा कहते हैं।
    9. नाभिरज्जु (Umbilical cord): गर्भ अपरा से एक मजबूत डोरी जैसी रचना से जुड़ा रहता है जिसे नाभिरज्जु कहते हैं। यह माता और गर्भ के बीच सम्पर्क अंग का कार्य करता है।
    10. युग्मनज (zygote): निषेचित अण्डाणु को युग्मनज कहा जाता है।
    11. कृत्रिम वीर्य सेचन (Artificial insemination): जब शुक्राणु की मादा योनि (Vagina) में कृत्रिम विधि द्वारा स्थानान्तरित किये जाते हैं तो इस क्रिया को कृत्रिम वीर्यसेचन कहते हैं।
    12. आन्तरिक निषेचन (Internal fertilization): उच्च स्तनधारियों में निषेचन की क्रिया मादा के शरीर के अंदर होती है। इस प्रकार के निषेचन की आन्तरिक निषेचन कहते हैं।
    13. वीर्य सेचन (Insemination): मैथुन के समय नर के शिशन द्वारा मादा की योनि में वीर्य जमा करना वीर्य सेचन या इनसेमिनेशन कहलाता है।

    पादप प्रजनन (Plant Reproduction)

    अधिकांश आवृतबीजी पौधों में लैंगिक जनन होता है लेकिन कुछ में कर्तन; जैसे-गन्ने में, रोपण; जैसे- गुलाब, बौगेनविलिया में आदि पाया जाता है।

    लैंगिक जनन में अर्द्धसूत्री विभाजन से वीजाणुओं तथा इनके संलयन से द्विगुणित युग्मनज का निर्माण होता है।

    परागकण नर युग्मकोद्भिद् की प्रथम कोशिका है इसकी बाह्य परत स्पोरोपोलेनिन की बनी होती है। यह अधिक प्रतिरोध क्षमता रखती है।

    मादा जनन अंग में गुरूबीजाणु मात्र कोशिका से चार गुरूबीजाणु बनते हैं परन्तु केवल एक कार्यशील होता है, जो विभाजित होकर समान्यतया 7 कोशिकीय, 8 केन्द्रकीय पॉलीगोनम प्रकार का भ्रूणकोष बनाता है।

    एक नर युग्मक अण्ड से संयोग कर युग्मनज बनाता है, जबकि दूसरा नर युग्मक द्वितीयक केन्द्रक से संयोग कर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक बनाता है अर्थात् आवृतबीजियों के निषेचन में पाँच केन्द्रक भाग लेते हैं, इसे द्विनिषेचन कहते है।


  • मानव कंकाल तंत्र (Human Skeletal System)

    मानव कंकाल तंत्र (Human Skeletal System)

    हमारे शरीर को निश्चित आकार एवं आकृति प्रदान करने के लिए एक ढांचे (structure) की आवश्यकता होती है। बिना ढांचे के शरीर न तो चल-फिर सकेगा और न ही कार्य कर सकेगा। यह ढांचा कंकाल तंत्र कहलाता है। कंकाल तन्त्र बाह्य व अन्तः सजीव या मृत कठोर संरचनाओं का एक तन्त्र है, जो शरीर को सहारा, आकार, सुरक्षा, सन्धि और गति प्रदान करता है।

    कंकाल तंत्र का निर्माण अस्थियाँ, उपास्थियाँ, संधियाँ आदि मिलकर करते हैं। इस तरह अस्थियों, उपास्थियों से मिलकर बने शरीर के ढाँचे को ही कंकाल तंत्र कहते हैं।

    मनुष्य का कंकाल तन्त्र (Human Skeletal System)

    मानव कंकाल तन्त्र छोटी-बड़ी कुल 206 अस्थियों से मिलकर बना हुआ है। मनुष्य की शिशु अवस्था में 300 अस्थियाँ पाई जाती है। अस्थियाँ आपस में सन्धियों द्वारा जुड़ी होती हैं, जिसके ऊपर मांसपेशियाँ पाई जाती है। अस्थि में 50% जल एवं 50% ठोस, अकार्बनिक एवं कार्बनिक पदार्थ पाए जाते हैं।

    मानव अन्तःकंकाल की उत्पत्ति मीसोडर्म से होती है। संरचनात्मक दृष्टि से अंतःकंकाल दो भागों अस्थि एवं उपास्थि से मिलकर बना होता है।

    कंकाल तंत्र के प्रकार (Type of Skeletal System)

    शरीर में उपस्थिति के आधार पर कंकाल तंत्र के दो प्रकार के होते हैं:

    (i) बाहय कंकाल (Exo-skeleton)

    (ii) अंतः कंकाल (Endo-skeleton)

    बाहय कंकाल (Exo-skeleton)

    शरीर की बाहरी सतह पर पाये जाने वाले कंकाल को बाह्य कंकाल (Exo-skeleton) कहा जाता है। बाह्य कंकाल की उत्पत्ति भ्रूणीय एक्टोडर्म या मीसोडर्म से होती है । त्वचा की उपचर्म या चर्म ही बाह्य ककाल के रूप में रूपान्तरित हो जाती है।

    बाह्य कंकाल शरीर के आंतरिक अंगों की रक्षा करता है तथा यह मृत होता है। मछलियों में शल्क, कछुओं में ऊपरी कवच, पक्षियों में पिच्छ, तथा स्तनधारियों में बाल, बाह्य कंकाल के उदाहरण हैं जो इन प्राणियों को अत्यधिक सर्दी एवं गर्मी से सुरक्षित रखने के साथ ही शरीर को सुरक्षा प्रदान करते है |

    अंतः कंकाल (Endo-skeleton)

    शरीर के अंदर पाये जाने वाले कंकाल को अन्तः कंकाल (Endo-skeleton) कहते हैं। इसकी उत्पत्ति भ्रूणीय मीसोडर्म से होती है। अन्तःकंकाल सभी कशेरुकियों में पाया जाता है।

    कशेरुकियों में अन्तःकंकाल ही शरीर का मुख्य ढ़ाँचा बनाता है। यह मांसपेशियों (Muscles) से ढंका रहता है। संरचनात्मक दृष्टि से अन्तःकंकाल दो भागों से मिलकर बना होता है-

    1. अस्थि (Bone)

    2. उपास्थि (Cartilage)

    अस्थि (Bone)

    अस्थि एक ठोस, कठोर एवं मजबूत संयोजी ऊतक है जो तन्तुओं एवं मैट्रिक्स का बना होता है। इसके मैट्रिक्स में कैल्सियम और मैग्नीशियम के लवण पाये जाते हैं तथा इसमें अस्थि कोशिकाएँ एवं कोलेजन तंतु व्यवस्थित होते हैं।

    कैल्सियम एवं मैग्नीशियम के लवणों की उपस्थिति के कारण ही अस्थियाँ कठोर होती हैं। प्रत्येक अस्थि के चारों ओर तंतुमय संयोजी ऊतक से निर्मित एक दोहरा आवरण पाया जाता है जिसे परिअस्थिक कहते हैं। इसी परिअस्थिक के द्वारा लिगामेण्ट्स टेन्ड्न्स तथा दूसरी मांसपेशियाँ जुड़ी होती हैं।

    अस्थि मज्जा (Bone Marrow)

    मोटी तथा लम्बी अस्थियों में एक खोखली गुहा पाई जाती है, जिसे मज्जा गुहा (marrow cavity) कहा जाता है। इसमें स्थित तरल पदार्थ अस्थि मज्जा कहलाता है। यह दो प्रकार की होती है।

    (i) लाल अस्थि मज्जा – इसमें लाल रुधिर कणिकाओं (RBC) का निर्माण होता है। लाल अस्थि मज्जा केवल स्तनधारियों में पायी जाती है

    (ii) पीला अस्थि मज्जा – इसमें श्वेत रुधिर कणिकाओं (WBC)का निर्माण होता है।

    अस्थि के प्रकार

    विकास के आधार पर अस्थियाँ दो प्रकार की होती हैं।

    (i) कलाजात अस्थि (Investing bone)

    (ii) उपास्थिजात अस्थि (Cartilage bone)

    कलाजात अस्थि (Investing bone)

    यह अस्थि त्वचा के नीचे संयोजी ऊतक की झिल्लियों से निर्मित होती है। इसे मेम्ब्रेन अस्थि कहते हैं। खोपड़ी की सभी चपटी अस्थियाँ कलाजात अस्थियाँ होती हैं।

    उपास्थिजात अस्थि (Cartilage bone)

    यह अस्थियाँ सदैव भ्रूण की उपास्थि को नष्ट करके उन्हीं के स्थानों पर बनती हैं। इस कारण इन्हें रिप्लेसिंग बोन भी कहा जाता है। कशेरुक दण्ड तथा पैरों की अस्थियाँ उपास्थिजात अस्थियाँ होती हैं।

    2. उपास्थि (Cartilage)

    उपास्थि का निर्माण ककाली संयोजी ऊतकों से होता है। यह भी एक प्रकार का संयोजी ऊतक होता है। यह अर्द्ध ठोस, पारदर्शक एवं लचीले ग्लाइकोप्रोटीन से बने मैट्रिक्स से निर्मित होता है। उपास्थि का मैट्रिक्स थोड़ा कड़ा होता है। इसके मैट्रिक्स के बीच में रिक्त स्थान में छोटी-छोटी थैलियाँ होती हैं जिसे लैकुनी कहते हैं।

    लैकुनी में एक प्रकार का तरल पदार्थ भरा रहता है। लैकुनी में कुछ जीवित कोशिकाएँ भी पायी जाती हैं, जिसे कोण्ड्रियोसाइट कहते हैं। इसके मैट्रिक्स में इलास्टिन तन्तु एवं कोलेजन भी पाये जाते हैं। उपास्थि के चारों ओर एक प्रकार की झिल्ली पायी जाती है जिसे पेरीकोण्ड्रियम कहते हैं।

    मानव कंकाल तंत्र की अस्थियाँ

    मनुष्य के कंकाल में कुल 206 अस्थियाँ होती हैं। मनुष्य के कंकाल को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

    (i) अक्षीय कंकाल

    (ii) उपांगीय कंकाल

    1. अक्षीय कंकाल (Axial skeleton)

    शरीर का मुख्य अक्ष बनाने वाले कंकाल को अक्षीय कंकाल कहते हैं। इसमें खोपड़ी की हड्डी, मेरुदंड, पसलियां एवं उरोस्थि होते हैं।

    अक्षीय कंकाल के दो प्रकार होते हैं।

    (i) खोपड़ी (Skull)

    (ii) कशेरुक दण्ड (Vertebral Column)

    खोपड़ी

    मनुष्य के सिर के अन्तः कंकाल के भाग को खोपड़ी कहते हैं इसमें 29 अस्थियाँ होती हैं इसमें से 8 अस्थियाँ संयुक्त रूप से मनुष्य के मस्तिष्क को सुरक्षित रखती हैं। इन अस्थियों से बनी रचना को कपाल कहते हैं।

    कपालों की सभी अस्थियाँ सीवनों के द्वारा दृढ़तापूर्वक जुड़ी रहती हैं इनके अतिरिक्त 14 अस्थियाँ चेहरे को बनाती हैं 6 अस्थियाँ कान को हायड नामक एक और अस्थि खोपड़ी में होती हैं।

    मनुष्य की खोपड़ी में कुल 22 अस्थियाँ होती हैं। इनमें से 8 अस्थियाँ संयुक्त रूप से मनुष्य के मस्तिष्क को सुरक्षित रखती है। इन अस्थियों से बनी रचना को कपाल कहते हैं। ये सभी अस्थियाँ सीवनों के द्वारा जुड़ी रहती है।

    इनके अतिरिक्त 14 अस्थियाँ और होती हैं जो चेहरे को बनाती है। मनुष्य की खोपड़ी में महारन्ध्र नीचे की ओर होता है। महारन्ध्र के दोनों ओर अनुकपाल अस्थिकन्द  होते हैं, जो एटलस कशेरुक के अवतलों में स्थित होते हैं।

    खोपड़ी की मुख्य अस्थियाँ निम्न हैं :

    फ्रॉण्टल (Frontal),

    पेराइटल (Parietal),

    ऑक्सीपिटल (Occipital),

    टेम्पोरल (Temporal),

    मेलर (Maler),

    मैक्सिला (Maxilla),

    डेण्टरी (Dentary),

    नेजल (Nasal)

    कशेरुक दण्ड

    मनुष्य का कशेरुक दण्ड 33 कशेरुकाओं से मिलकर बना है सभी कशेरुक उपास्थि गदिदयो के द्वावा जुड़े रहते हैं। इन गदिदयो से कशेरुक दण्ड लचीला रहता हैं | कशेरुक दण्ड सिर को साधे रहता है तथा गर्दन एवं घड़ को आधार प्रदान करता है। इसमें छोटी-बड़ी 33 हड्डियाँ होती हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से कशेरुक कहते हैं।

    कशेरुक दण्ड में अस्थियों का योग

    1. गर्दन (Cervical region) 7 कशेरुक

    2. वक्ष (Thoracic region) 12 कशेरुक

    3. कटि (Lumber region) 5 कशेरुक

    4. त्रिक (Sacral region) 5 कशेरुक

    5. पुच्छ (Caudal region) 4 कशेरुक

    कुल = 33 कशेरूक

    इसका पहला कशेरुक दण्ड जो कि एटलस कशेरुक दण्ड कहलाता हैं।

    कशेरुक दण्ड के कार्य

    यह सिर को साधे रहता हैं।

    यह गर्दन तथा धड़ को आधार प्रदान करता हैं।

    यह मनुष्य को खड़े होकर चलने, खड़े होने आदि में मदद करता हैं।

    यह गर्दन व धड़ को लचक प्रदान करते हैं जिससे मनुष्य किसी भी दिशा में अपनी गर्दन और धड़ को मोड़ने में सफर होता हैं। यह मेरुरज्जु को सुरक्षा प्रदान करता हैं।

    अक्षीय कंकाल खोपड़ी के घटक

    मानव की खोपड़ी में 29 अस्थियां होती हैं जिनमें से 8 अस्थियां मानव के मस्तिष्क को सुरक्षा प्रदान करती हैं और खोपड़ी के अस्थि के जोड़ से जुड़ी होती हैं। बाकी की अस्थियां मनुष्य का चेहरा बनाती है जिनमें से 14 अस्थियां उल्लेखनीय रूप से प्रतिवादी होती हैं।

    2. उपांगीय कंकाल (Appendicular Skeleton)

    उपांगीय कंकाल के अन्तर्गत मेखलाएँ तथा हाथ-पैरों की अस्थियाँ आती हैं।

    • मेखलाएँ
    • अंसमेखला
    • श्रोणि मेखला तथा पैर की अस्थियाँ

    मेखलाएँ (Girdles)

    मनुष्य में अग्रपाद तथा पश्चपाद् को अक्षीय कंकाल पर साधने के लिए दो चाप पाये जाते हैं, जिन्हें मेखलाएँ कहते हैं। अग्रपाद की मेखला को अंसमेखला तथा पश्च पाद की मेखला को श्रोणि मेखला कहते हैं।

    अंस मेखला से अग्रपाद की अस्थि ह्यूमरस एवं श्रोणि मेखला से पश्च पाद की अस्थि फीमर जुड़ी होती है। ये अस्थियाँ गुहाओं में व्यवस्थित होती हैं जिन्हें एसिटेबुलम कहते हैं।

    अंसमेखला तथा हाथ की अस्थियाँ (Bones of dectoral girdle and hand)

    मनुष्य की अंसमेखला के दोनों भाग अलग-अलग होते हैं। इसके प्रत्येक भाग में केवल एक चपटी व तिकोनी अस्थि होती है, जिसे स्कैपुला कहते हैं। यह आगे की पसलियों को पृष्ठ तल की ओर ढके रहती है। इसका आगे वाला मोटा भाग क्लेविकिल से जुड़ा रहता है।

    इसी सिरे पर एक गोल गड्ढ़ा होता है, जिसे ग्लीनॉइड गुहा कहते हैं। ग्लीनॉइड गुहा में ह्यूमरस का सिर जुड़ा रहता है। ग्लीनॉइड गुहा के निकट ही एक प्रवर्द्ध होता है जिसे कोरोकॉइड प्रवर्द्ध कहते हैं। अंसमेखला हाथ की अस्थियों को अपने से जोड़ने के लिए सन्धि स्थान प्रदान करती है। यह हृदय तथा फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करती है। यह मांसपेशियों को अपने से जोड़ने के लिए स्थान प्रदान करती है। मनुष्य के हाथ की अस्थियों में ह्यूमरस, रेडियस अलना, कार्पलस, मेटाकार्पल्स तथा फैलेन्जस होती है। मनुष्य की रेडियस अलना जुड़ी न होकर एक-दूसरे से स्वतंत्र होती है।

    श्रोणि मेखला तथा पैर की अस्थियाँ (Bones of Pelvic girdle and legs)

    मनुष्य की श्रोणि मेखला तीन प्रकार की अस्थियों से मिलकर बनी होती है।

    ये तीनों अस्थियाँ हैं:  इलियम, इश्चियम तथा प्यूबिस

    वयस्क में ये तीनों अस्थियाँ आपस में जुड़ी रहती हैं। प्यूबिस अधर तल पर दूसरी ओर की प्यूबिस से, इलियम आगे की ओर सेंक्रम से तथा इश्चियम पृष्ठ तल की ओर दूसरी ओर की इश्चियम से जुड़ी रहती है। इलियम, इश्चियम तथा प्यूबिस के संधि स्थल पर एक गड्ढ़ा होता है जिसे एसिटेबुलम कहते हैं। एसिटेबुलम में फीमर अस्थि का सिर जुड़ा रहता है।

    श्रोणि मेखला पैरों की अस्थियों को अपने से जोड़ने के लिए संधि स्थान प्रदान करती है। यह अन्तरांगों को सुरक्षा प्रदान करती है। मनुष्य के पैर में फीमर, टिबियो फिबुला, टॉर्सल्स तथा मेटा टॉर्सल्स अस्थियाँ होती हैं। इनमें टिबियोफिबुला मुक्त रहती है।

    फीमर तथा टिबियोफिबुला के सन्धि स्थान पर एक गोल अस्थि होती है, जिसे घुटने की अस्थि या पटेला कहते हैं। इस जोड़ पर मनुष्य का पैर केवल एक ओर ही मुड़ सकता है। टॉर्सल्स में से एक बड़ी होती है जो ऐड़ी बनाती है। तलवे की अस्थियाँ मेटाटॉर्सल्स कहलाती है। अँगूठे में केवल दो तथा अन्य अँगुलियों में तीन-तीन अंगुलास्थियाँ होती हैं।

    कंकाल तंत्र के कार्य :-

    यह शरीर को निश्चित आकृति एवं आधार प्रदान करता है।

    शरीर के आंतरिक कोमल अंगों की बाह्य आघातों से रक्षा करता है।

    यह पेशियों की सहायता से सम्पूर्ण शरीर एवं शरीर के अंगों को गति प्रदान करता है।

    यह शरीर को मजबूती प्रदान करता है।

    हड्डियों के कार्य (Function of skeleton)

    हड्डियां शरीर को एक निश्चित रुप देता है।

    हड्डियां से शरीर को सहारा मिलता है।

    कंकाल से शरीर के अंगों की रक्षा होती है।

    शरीर को बाहरी आघातों से रक्षा करता है।

    कंकाल की मज्जा गुहा फैट को इकट्ठा करता है।

    RBC यानि लाल रक्त कंडिकाओ का निर्माण करता है।

  • मनुष्य के संवेदी अंग (Human Sense Organs) (ज्ञानेन्द्रिय) | ह्यूमन सेंस ऑर्गन्स

    मनुष्य के संवेदी अंग (Human Sense Organs) (ज्ञानेन्द्रिय) | ह्यूमन सेंस ऑर्गन्स

    इस आर्टिकल में हम मानव के प्रमुख संवेदी अंगों (Human Sense Organs) के बारे में बात करेगे | मनुष्य के संवेदी अंग (Human Sense Organs) कोनसे है और उनके प्रमुख कार्य क्या है, मानव कान (Human Ear), मानव नेत्र (Human Eye), मनुष्य का नाक (Human Nose), मानव त्वचा (Human Skin), मानव जीभ (Human Tongue) आदि Human Sense Organs के क्या कार्य है | साथ ही हम मनुष्य के संवेदी अंग (Sense Organs) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य जानेगे |

    संवेदी तन्त्रिकाएँ उद्दीपनों को मस्तिष्क तक पहुंचाती है तथा आवश्यकतानुसार चालक तन्त्रिका तन्तुओं द्वारा इन्हें प्रतिक्रियाओं के रूप में अपवाहक अंगों को भेज दिया जाता है। मनुष्य के प्रमुख संवेदी अंग कान (Ear), आँख (eye), नाक (Nose) तथा त्वचा (skin) है।

    मानव कान (Human Ear)

    कान ध्वनि तरंगों को सुनने एवं सन्तुलन बनाने में सहायक होते हैं

    मध्य कर्ण में शरीर की सबसे छोटी अस्थि स्टेपीस होती है।

    कर्ण पल्लव की तन्तुमय उपास्थि ध्वनि तरंगों का संग्रह करती है। मनुष्य में कर्ण पल्लव अवशेषी अंग हैं।

    कान को भीतर से देखने के लिए अरीस्कोप का प्रयोग करते हैं।

    मानव नेत्र (Human Eye)

    नेत्र या आँखे प्रकाश संवेदी अंग हैं। प्रत्येक नेत्र एक गेंद के आकार की गोल एवं खोखली रचना है, इसे नेत्र गोलक (eyeball) कहते हैं।

    दृढ़ पटल (Sclerotia)

    दृढ़ पटल (Sclerotia) बाह्य दृढ़ तथा गोलक के कोटर से बाहर पारदर्शी कॉर्निया (cornea) बनाता है।

    रक्तक पटल (Choroid)

    रक्तक पटल (Choroid) कोमल, संयोजी ऊतक का बना होता है । इसमें रंगा कणिकाएँ होती हैं। रंगा कणिकाएँ खरगोश में लाल, मनुष्य में काली, भूरी या में नीली होती हैं।

    दृष्टि पटल (Retina)

    दृष्टि पटल (Retina) सबसे भीतरी परत है, जो संवेदी होती है। दृष्टि पटल पर प्रतिविम्व सत्य एवं उल्टा बनता है। यह नेत्र गोलक की सबसे भीतरी संवेदी परत है, यह दो प्रकार की कोशिकाओं, दृष्टि शलाकाएँ (rods) एवं दृष्टि शंकुओं (cones) की बनी होती है।

    शलाकाएँ

    शलाकाएँ कम प्रकाश के लिए संवेदी होती हैं तथा इनमें लाल गुलावी वर्णक, रोडोप्सिन पाया जाता है।

    शंकु तेज प्रकाश के लिए संवेदी है तथा रंगों में अन्तर उत्पन्न करते हैं; जैसे- लाल, हरा, नीला आदि ।

    मानव के प्रमुख दृष्टि दोष

    निकट दृष्टि दोष (Myopia)

    इसमें केवल कम दूरी की वस्तुएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल के सामने बनता है यह रोग अवतल लेन्स के उपयोग द्वारा ठीक हो सकता है।

    दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia)

    इसमें केवल दूर की वस्तुएँ दिखाई देती हैं। प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल के पीछे बनता है। इस रोग को उत्तल लेन्स (convex lens) का उपयोग करके दूर किया जा सकता है।

    दृष्टिवैषम्य (Astigmatism)

    इसमें कॉर्निया की आकृति असामान्य हो जाती है। सिलैण्ड्रोकल लेन्स द्वारा यह रोग दूर हो सकता है।

    कन्जक्टीवाइटिस (Conjunctivitis)

    जीवाणु द्वारा कन्जक्टिवा में सूजन आ जाती है। 5. रतौंधी (Night blindness ) विटामिन A की कमी से रोडोप्सिन का निर्माण कम होता है, जिसके कारण कम प्रकाश में दिखाई नहीं देता।

    वर्णान्धता (Colour blindness)

    यह आनुवंशिक रोग है, जो आँखों में शंकु कोशिकाओं की कमी से होता है। ऐसे व्यक्ति लाल व हरे रंग में अन्तर नहीं कर पाते।

    मनुष्य का नाक (Human Nose)

    नाक गन्ध ग्रहण करने वाला संवेदी अंग है।

    नासावेश्मों (nasal chamber) की दीवार घ्राण उपकला (olfactory epithelium) अस्थियों पर मढ़ी रहती है।

    घ्राण ग्राही कोशिकाएँ लम्बी पतली एवं तुर्क रूप तथा द्विध्रुवीय तन्त्रिका कोशिकाएँ होती हैं। घ्राण कोशिकाएं, स्वाद कोशिकाओं की तुलना में अधिक रसायन संवेदी होती हैं। प्राण संवेदनाओं; जैसे-मिर्च, क्लोरोफार्म, अमोनिया आदि से आँसू निकल आते हैं। कुत्ते तीव्र घ्राण संवेदी होते हैं।

    कुत्ते विभिन्न मनुष्यों की पहचान इसलिए कर लेते हैं क्योंकि इनमें अन्तर करने की क्षमता होती है।

    विभिन्न मनुष्यों की गन्ध में मॉथ, तितली आदि को एन्टीना में घ्राण रसायन संवेदांग होते हैं।

    नासावश्मों के आधार पर जैकोब्सन के अंग (Jacobson’s organs ) नामक दो खोखले कोश होते हैं। मनुष्य में ये अवशेषो होते हैं।

    मानव त्वचा (Human Skin)

    त्वचा शरीर का बाह्य आवरण है। यह शरीर की सुरक्षा का पहला बाहरी कवच है।

    त्वचा का बाहरी स्तर उपचर्म या एपीडर्मिस (epidermis) होता है, जो एक्टोडर्म (ectoderm) से बनता है। त्वचा का आन्तरिक स्तर चर्म या डर्मिस (dermis) होता है, जो मीसोडर्म (mesoderm) से बनता है।

    त्वचा में त्वक् संवेदी (Cutaneous Receptors) होते हैं, जो निम्न हैं:
    एल्जीसी रिसेप्टर (algecireceptor) पीड़ा ग्राही
    मीसनगर के देहाणु (Meissner’s corpuscles) तथा मरकेल की तश्तरियाँ (Merkel’s discs) स्पर्शग्राही (tangoreceptor) है।

    पैसीनी के देहाणु (Pacini’s corpuscles) दाब तथा कम्पन ग्राही होते हैं।

    क्राउस के देहाणु (Krause’s corpuscles) शीत उद्दीपन ग्रहण करते हैं और शीत ग्राही (cold receptors) कहलाते हैं।

    रूफिनी के छोर अंग (end organ of Ruffini) गर्मी का उद्दीपन ग्रहण करते हैं और ऊष्मा ग्राही (heat receptors) कहलाते हैं।

    मानव जीभ (Human Tongue)

    जीभ मुख के तल पर एक पेशी होती है, जो भोजन को चबाना और निगलना आसान बनाती है। यह स्वाद अनुभव करने का प्रमुख अंग होता है, क्योंकि जीभ स्वाद अनुभव करने का प्राथमिक अंग है, जीभ की ऊपरी सतह पेपिला और स्वाद कलिकाओं से ढंकी होती है। जीभ का दूसरा कार्य है स्वर नियंत्रित करना। यह संवेदनशील होती है और लार द्वारा नम बनी रहती है, साथ ही इसे हिलने-डुलने में मदद करने के लिए इसमें बहुत सारी तंत्रिकाएं तथा रक्त वाहिकाएं मौजूद होती हैं। इन सब के अलावा, जीभ दातों की सफाई का एक प्राकृतिक माध्यम भी है।

    मनुष्य के संवेदी अंग (Sense Organs) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    उभयचर, सरीसृप तथा पक्षियों में एक ही कर्ण अस्थि मैलियस पाई जाती है।

    आइरिस के केन्द्र में दिखाई पड़ने वाला काला छिद्र तारा (pupil) है।

    उल्लू की रेटिना में शलाकाएँ अधिक, जबकि मुर्गा (fowl) की रेटिना में शंकु अधिक पाए जाते हैं।

    कॉर्निया नेत्र का असंवहनीय भाग है।
    कशेरुकियों की त्वचा का रंग मिलेनीन वर्णक के कारण होता है।

    मांसाहारी जन्तुओं; जैसे बिल्ली, कुत्ता, शेर आदि की आँखें टेपिटम ल्यूसीडम के कारण रात में चमकती है।
    पीले-हरे रंग के लिए आँखें सबसे अधिक संवेदी होती हैं।

    मधुमक्खियाँ पराबैंगनी किरणें देख सकती हैं, जबकि गिद्ध में सबसे तीव्र दृष्टि पाई जाती है।

    शरीर अनुपात के आधार पर हिरन में सबसे बड़ी आँखें होती हैं।

    दृष्टिपटल पर प्रतिबिम्ब सत्य एवं उल्टा बनता है।

  • तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System) | मानव तंत्रिका तन्त्र (Human Nervous System) | मस्तिष्क (Brain)

    तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System) | मानव तंत्रिका तन्त्र (Human Nervous System) | मस्तिष्क (Brain)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System) क्या होता है, तन्त्रिका कोशिका क्या है और उसके प्रमुख भाग कोनसे है, मानव तन्त्रिका तन्त्र (Human Nervous System) क्या है, मानव तन्त्रिका तन्त्र (Human Nervous System) के कितने भाग होते है, केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central Nervous System) क्या है, केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र के कोन कोनसे भाग है, मस्तिष्क (Brain) किस प्रकार कार्य करता है, मस्तिष्क (Brain) के प्रमुख भाग कोनसे है, अग्रमस्तिष्क (Fore Brain), मध्यमस्तिष्क (Mid Brain) और पश्चमस्तिष्क (Hind Brain) क्या है, मेरूरज्जु (Spinal Cord) क्या है, परिधीय तन्त्रिका तन्त्र (Peripheral Nervous System) क्या है, स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomic Nervous System) क्या है, मानव तंत्रिका तंत्र का महत्त्व आदि

    तन्त्रिका तन्त्र (Nervous System)

    जिस तन्त्र के द्वारा विभिन्न अंगों का नियंत्रण और अंगों और वातावरण में सामंजस्य स्थापित होता है उसे तन्त्रिका तन्त्र कहते हैं। मनुष्य शरीर में तंत्रिकाएँ शरीर के लगभग हर भाग को मस्तिष्क या मेरूरज्जु से जोड़कर उनमें आपसी संपर्क रखतीं हैं।तन्त्रिका तन्त्र सिर्फ जन्तुओं में पाया जाता है, जबकि पौधों में अनुपस्थित होता है। इसका निर्माण एक्टोडर्म से होता है। तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क, मेरुरज्जु और इनसे निकलनेवाली तंत्रिकाओं की गणना की जाती है।

    तन्त्रिका तन्त्र की कार्यात्मक इकाई न्यूरॉन (neuron) होती है, जो एक महीन धागे के रूप में जाल सदृश सम्पूर्ण शरीर में फैली होती है। तंत्रिका कोशिका एवं इसकी सहायक अन्य कोशिकाएँ मिलकर तन्त्रिका तन्त्र के कार्यों को सम्पन्न करती हैं। तन्त्रिका कोशिकाएँ वातावरणीय परिवर्तनों की सूचनाओं को संवेदी अंगों से प्राप्त कर विद्युत रासायनिक आवेगों (electrochemical impulses) के रूप में इनका प्रसारण करती है। विद्युतरोधी तन्त्रिकाएँ चारों ओर से माइलिन आच्छाद से घिरी होती हैं।

    इससे प्राणी को वातावरण में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त होती है |

    एककोशिकीय प्राणियों जैसे अमीबा इत्यादि में तन्त्रिका तन्त्र नहीं पाया जाता है। हाइड्रा, प्लेनेरिया, तिलचट्टा आदि बहुकोशिकीय प्राणियों में तन्त्रिका तन्त्र पाया जाता है। मनुष्य में सुविकसित तन्त्रिका तन्त्र पाया जाता है।

    नोट: मनुष्य में, नियंत्रण और समन्वय, तंत्रिका तंत्र (nervous system) और हार्मोनल प्रणाली (hormonal system) के माध्यम से होता है जिसे अंत: स्रावी प्रणाली (endocrine system) कहा जाता है। हमारे शरीर की पांच इंद्रियों, आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा को रिसेप्टर्स (receptors) कहते है।  हमारे शरीर की पांच इंद्रियों, आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा को रिसेप्टर्स (receptors) कहते है। इसका कारण यह है कि वे हमारे आसपास के माहौल से जानकारी प्राप्त करते हैं। इसलिए, रिसेप्टर भावना अंग में कोशिकाओं का एक समूह है जो प्रकाश, ध्वनि, गंध, स्वाद, गर्मी, आदि के प्रति विशेष प्रकार से संवेदनशील है।

    सभी रिसेप्टर्स संवेदी तंत्रिकाओं (sensory nerves) के माध्यम से रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क को विद्युत तरंगों के रूप में संदेश भेज सकते हैं। नसों  के अन्य प्रकार को मोटर तंत्रिका (motor nerves ) कहा जाता है जो कि मस्तिष्क और प्रभावोत्पादक करने के लिए रीढ़ की हड्डी को प्रतिक्रिया पहुंचाता है। प्रेरक शरीर का वह हिस्सा है जो तंत्रिका तंत्र से भेजे गए निर्देशों के अनुसार एक उत्तेजना को प्रतिक्रिया देता है। मांसपेशियां और ग्रंथियां शरीर के एफ्फेक्टर्स (effectors ) हैं।

    तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन्स – Neurons)

    कोशिकाएं जो कि तंत्रिका तंत्र को बनाती हैं, उसको तंत्रि कोशिका या तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन्स) ( neurons) कहते है। न्यूरॉन्स तंत्रिका तंत्र की सरंचनात्मक व क्रियात्मक इकाई है जिसके द्वारा यह तन्त्र शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक संकेत भेजता है । ये कोशिकाएँ शरीर के लगभग हर ऊतक / अंगों को केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र से जोड़कर रखती हैं । न्यूरॉन्स शरीर में सबसे बड़ा सेल हैन्यूरॉन्स की संरचना ऐसी है कि यह जल्दी से शरीर में संदेशों को ले जा सकती है। यह संदेश विद्युत के तरंगों या तंत्रिका आवेग के रूप में होते हैं।

    तंत्रिका कोशिकाएँ (Neurons) शरीर के बाहर से अथवा भीतर से उद्दीपनों ( Stimuli ) को ग्रहण करती है । आवेगों ( संकेतो ) के माध्यम से उद्दीपन एक से दूसरी तंत्रिका कोशिका में अभिगमन करते हुए केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र तक पहुँचते हैं । केन्द्रीय तन्त्र से प्राप्त प्रतिक्रियात्मक संदेशों को वापस पहुँचाने का कार्य भी तंत्रिका कोशिका के माध्यम से ही संपादित होता है । प्रत्येक तंत्रिका कोशिका तीन भागों में मिल कर बनी होती है :

    (i) कोशिका काय (Cell Body)

    इस भाग को साइटोन (Cytone) भी कहा जाता है । कोशिका काय में एक केन्द्रक तथा प्रारूपिक कोशिकांग पाए जाते हैं । कोशिका द्रव्य में अभिलक्षणिक अति – अभिरंजित निसेल ग्रेन्यूल ( Nissl’S Granules ) पाए जाते है ।

    (ii) द्रुमाक्ष्य (Dendron)

    ये कोशिका काय से निकले छोटे तन्तु होते हैं । जो कोशिका काय की शाखाओं के तौर पर पाये जाते है । ये तन्तु उद्दीपनों को कोशिका काय की ओर भेजते है ।

    (iii) तंत्रिकाक्ष (Axon)

    यह लम्बा बेलनाकार प्रवर्ध है जो कोशिकाकाय के एक हिस्से से शुरू होकर धागेनुमा शाखाएँ बनाता है। तंत्रिकाक्ष की प्रत्येक शाखा एक स्थूल संरचना का निर्माण करती है जिसे अवग्रथनीघुण्डी या सिनैप्टिक नोब ( Synaptic Konb ) कहा जाता है।

    सिनैप्सिस (Synapsis) – सिनैप्टिक नोब में सिनेप्टिक पुटिकाएँ पाई जाती है। सिनैप्टिक पुटिकाओं में न्यूरोट्रांसमीटर नामक पदार्थ पाए जाते हैं तंत्रिका आवेगों के सम्प्रेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तंत्रिकाक्ष के माध्यम से आवेग न्यूरोन सेबाहर निकलते हैं।  एक न्यूरोन के द्रुमाक्ष्य के दूसरे न्यूरोन के तंत्रिकाक्ष से मिलने के स्थान को सन्धिस्थल (Synapse) कहा जाता है।

    मानव तन्त्रिका तन्त्र (Human Nervous System)

    मानव तंत्रिका तन्त्र एक ऐसा तंत्र है जो अगों व वातावरण के मध्य तथा विभिन्न अंगो के मध्य सा मंजस्य स्थापित करता है साथ ही विभिन्न अंगों के कार्यों को नियंत्रित करता है ।

    मानव तन्त्रिका तन्त्र (Human Nervous System) के तीन भाग होते हैं :

    1. केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र – केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र में मुख्य रूप से मस्तिष्क , मेरूरज्जू तथा इसमें निकलने वाली तंत्रिका कोशिकाएँ शामिल होती है ।

    2. परिधीय तन्त्रिका तन्त्र – परिधीय तंत्रिका तन्त्र दो प्रकार की तंत्रिकाओं से मिलकर बना है (i) संवेदी या अभिवाही ( Sensory nerves) – ऐसी तंत्रिकाएँ जो उदीपनों ( Stimulus) को ऊतको व अंगो से केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र तक लाती हैं । (ii)प्रेरक या अपवाही ( Motor nerve): ये ऐसी तंत्रिकाएँ हैं जो केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से नियामक उद्दीपनों ( Regulatory stimulus)को सबंधित अंगों तक पहुँचाती हैं ।

    3. स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र – यह तन्त्र उन अंगों की क्रियाओं का संचालन करता है जो व्यक्ति की इच्छा से नहीं वरन् स्वतः ही कार्य करते है जैसे ह्रदय, फेफड़ा, अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ आदि

    केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central Nervous System)

    यह सम्पूर्ण शरीर पर नियन्त्रण रखता है। इसमें तन्त्रिका कोशिका तथा तन्त्रिका तन्तु (fibres) दोनों होते हैं। यह केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र दो भागों के मेल से बनता है :

    1. मस्तिष्क (Brain)

    2. मेरूरज्जु (Spinal Cord)

    मस्तिष्क (Brain)

    मानव मस्तिष्क शरीर का एक केन्द्रीय अंग है जो सूचना विनिमय तथा आदेश व निंयत्रण का कार्य करता है । शरीर के विभिन्न कार्य कलापों जैसे तापमान नियंत्रण, मानव व्यवहार, रुधिर परिसंरण, श्वसन, देखने, सुनने, बोलने, ग्रन्थियों के स्त्रावण आदि को नियंत्रित करता है ।

    यह करीब 1 . 5 किलो वजन का शरीर का सर्वाधिक जटिल अंग है | मस्तिष्क खोपड़ी के क्रेनियम में स्थित होता है। क्रेनियम मस्तिष्क को बाहरी आघातों से बचाता है। । मस्तिष्क के आवरण के बीच एक खाँच की तरह का द्रव्य जिसे मस्तिष्क मेरूद्रव्य कहते है ।

    इसमें करीब 100 बिलियन तन्त्रिका कोशिकाएँ होती हैं।

    स्तनधारियों में मस्तिष्क और मेरूदण्ड तीन मिनिंग्स (meninges)- ड्यूरामेटर, अरेक्नॉइड और पायामेटर) द्वारा घिरे होते हैं। मिनिंग्जाइटिस में यही मिनिंग्स जीवाणुओं द्वारा संक्रमित हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप सिरदर्द, उल्टी एवं दर्द होता है।

    मस्तिष्क एवं मेरूदण्ड के अन्दर तथा बाहर सेरेब्रोस्पाइनल द्रव (cerebrospinal fluid) पाया जाता है, जो मस्तिष्क तथा मेरूदण्ड की बाहरी धक्कों से रक्षा करती हैं। मस्तिष्क के तीन भाग होते हैं

    1. अग्रमस्तिष्क (Fore Brain)

    2. मध्यमस्तिष्क (Mid Brain)

    3. पश्चमस्तिष्क (Hind Brain)

    अग्रमस्तिष्क (Fore Brain)

    प्रमस्तिष्क (Cerebrum ),थेलेमस तथा हाइपोथेलेमस मिलकर अग्र मस्तिष्क का निर्माण करते हैं । अग्रमस्तिष्क के दो भाग होते हैं

    (i) प्रमस्तिष्क (सेरेब्रम) (Cerebrum) – प्रमस्तिष्क मानव मस्तिष्क का 80 – 85 प्रतिशत भाग बनाता है । यह बुद्धिमता, स्मृति, इच्छा शक्ति, ऐच्छिक गतियों, वाणी एवं चिन्तन का केन्द्र है। ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त प्रेरणाओं का इसमें विश्लेषण और समन्वय होता है। अग्रमस्तिष्क सेरेब्रम में दो दायाँ और बायाँ गोलार्द्ध होते हैं। दोनों गोलार्द्ध कार्पस कैलोसम द्वारा जुड़े होते हैं। एक लम्बा गहरा विदर प्रमस्तिष्क को दाएँ व बांए गोलार्धों ( Cerebral Hemisphere ) में विभक्त करता है । प्रत्येक गोलार्द्ध में घूसर द्रव्य ( Grey Matter ) पाया जाता है जो प्रान्तरथा या वल्कुट या कोर्टेक्स ( Cortex ) कहलाता है । अन्दर की ओर श्वेत द्रव्य ( White Matter ) से बना हुआ भाग अन्तस्था या मध्याशं ( Medudla ) कहा जाता है । घूसर द्रव्य ( Grey Matter ) में कई तंत्रिकाएँ पाई जाती हैं । इनकी अधिकता के कारण ही इस द्रव्य का रंग घूसर दिखाई देता है । दोनों गोलार्द्ध आपस में कार्पस कैलोसम की पट्टी द्वारा जुड़े होते हैं । प्रमस्तिष्क चारों ओर से थेलेमस से घिरा हुआ रहता है ।

    (ii) डाइएनसेफैलॉन (Diencephanol) यह सेरेब्रम के पीछे तथा नीचे और सेरेब्रल गोलार्द्ध एवं मध्य मस्तिष्क के बीच स्थित होता है। इसके दो भाग थैलेमस और हाइपोथैलेमस हैं।

    थैलेमस (Thalamus)

    इसकी दो गोलाकार संरचनाएँ होती हैं, जो दर्द, ठण्ड एवं गर्म आदि को पहचानने का कार्य करती है। यह ज्ञानेन्द्रियों तथा सेरेब्रम के मध्य संचार की मुख्य कड़ी है।

    हाइपोथैलेमस (Hypothalamus)

    यह भूख, प्यास, ताप नियन्त्रण, प्यार, घृणा आदि का केन्द्र होता है तथा वसा एवं कार्बोहाइड्रेट के उपापचय पर नियन्त्रण के साथ ही साथ अंतःस्रावी ग्रन्थियों से स्रावित हॉर्मोन पर नियन्त्रण करता है।

    (b) सेरेबेलम (Cerebullum), सेरेब्रम के ठीक नीचे पश्च भाग में होता है। इसका मुख्य कार्य शरीर का सन्तुलन बनाए रखना तथा ऐच्छिक पेशियों के संकुचन पर नियन्त्रित करना है। पॉन्स वैरोलाई श्वसन को नियन्त्रित करता है।

    (c) मेड्यूला ऑब्लोंगेटा (Medulla Oblongata) मस्तिष्क का सबसे पीछे का भाग, जो पॉन्स और मेरूरज्जु के मध्य स्थित होता है। इसका पिछला भाग ही मेरूरज्जु बनाता है। यह हृदय स्पन्दन, रुधिर नलिकाओं, लार स्राव, श्वसन गति की दर तथा प्रत्यावर्ती एवं अनैच्छिक गतियों को नियन्त्रित करती है।

    मध्यमस्तिष्क (Mid Brain)

    यह चार पिण्ड़ों में बंटा हुआ भाग है जो हाइपोथेलेमस तथा पश्चमस्तिष्क के मध्य स्थित होता है। प्रत्येक पिण्ड को कॉर्पोराक्वाड्रीजेमीन ( CorporaQuadrigemina ) कहा जाता है। ऊपरी दो पिण्ड दृष्टि के लिए तथा निचले दो पिण्ड श्रवण के लिए उत्तरदायी हैं।

    पश्चमस्तिष्क (Hind Brain)

    यह भाग अनुमस्तिष्क (Cerebellum) , पोंस (Pons) तथा मध्यांश (Medulla Oblongata) को समाहित करता है। अनुमस्तिष्क मस्तिष्क का दूसरा बड़ा भाग है जो एच्छिक पेशियों ( जैसे हाथ व पैर की पेशियाँ ) को नियंत्रित करता है । यह एक विलगित सतह वाला भाग है जो न्यूरोंसरों को अतिरिक्त स्थान प्रदान करता है । पोंसपों मस्तिष्क के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ता है । मध्यांश अनैच्छिक क्रियाओं को नियत्रित करता है जैसे हृदय की घड़कन , रक्तदाब , पाचक रसों का स्त्राव आदि | यह मस्तिष्क का अन्तिम भाग है जो मेरूरज्जु से जुड़ा होता है । 

    मेरूरज्जु (Spinal Cord)

    मेड्यूला ऑब्लोंगेटा (Medulla Oblongata) का पिछला भाग ही मेरूरज्जु बनाता है इससे 31 जोड़ी तन्त्रिका निकलती हैं। यह प्रतिवर्ती क्रिया (reflex action) का केन्द्र होता है तथा मस्तिष्क एवं मेरू तन्त्रिकाओं (spinal nerves) के बीच सेतु का कार्य करती है।

    मेरूरज्जु की दोनों सतह पर एक-2 खाँच पाई जाती हैं, जिसे डॉर्सल फिशर और वेन्ट्रल फिशर कहते हैं | मेरूरज्जु के मध्य में केन्द्रीयनाल पाई जाती है, जिसमें सेरेब्रोस्पाइनल द्रव भरा रहता है। मेरूरज्जु के भीतरी स्तर को घूसर पदार्थ (Grey Matter) तथा बाहरी स्तर को श्वेत पदार्थ (White Matter) कहते हैं।

    सिनेप्स

    एक तन्त्रिका तन्तु का एक्सॉन जहाँ दूसरे तन्त्रिका तन्तु डेन्ड्राइट पर समाप्त होता है, उसे सिनेप्स कहते हैं।

    सिनैप्स पर एक्सॉन तथा डेन्ड्राइट एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते हैं वरन उस बीच का स्थान पतले द्रव से भरा होता है। एक्सॉन के अन्तिम सिरे पर सिनैप्टिक आशय (synaptic vesicles) होती है, जिससे न्यूरोट्रान्समीटर, एड्रिनेलिन तथा ऐसीटिलकोलीन निकलते हैं।

    सिनैप्स के अन्तर्गत तन्त्रिका आवेग का संचरण एक तन्त्रिका कोशिका से दूसरे में या तन्त्रिका कोशिका से पेशी कोशिका में एसीटिलकोलीन द्वारा होता है।

    परिधीय तन्त्रिका तन्त्र (Peripheral Nervous System)

    यह मस्तिष्क तथा मेरूरज्जु से निकलने वाली तत्रिकाओं का समूह है जो केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र को जाने व वहाँ से आने वाले संदेशो को पहुँचाने का कार्य
    करता है । यह तन्त्र केन्द्रीय तन्त्र के बाहर कार्य करता है अतः इसे परिधीय तन्त्र कहा जाता है । यह मूलतः दो प्रकार का होता है :

    ( A ) कायिक तंत्रिका तन्त्र ( Somatic Nervous System )

    यह तन्त्र उन क्रियाओं को संपादित करने में मदद करता है जो हम अपनी इच्छानुसार करते हैं । केन्द्रीय तन्त्र इस तन्त्र के सहारे ही बाह्य उत्तेजनाओं पर
    प्रतिक्रिया तथा मांसपेशियों आदि के कार्य संपादित करवाता है ।

    यह 12 जोड़ी कपाल तन्त्रिकाओं तथा 31 जोड़ी मेरू तन्त्रिकाओं का बना होता है।

    मनुष्य में 31 जोड़ी मेरू तन्त्रिकाएँ निम्न प्रकार से होती हैं।

    ग्रीवा – 8 जोड़ी

    वक्षीय – 12 जोड़ी

    लुम्बर – 5 जोड़ी से क्रल – 5 जोड़ी
    कॉक्सीजियल तन्त्रिकाएँ – 1 जोड़ी

    (B) स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र (Autonomic Nervous System)

    यह तन्त्र उन अंगों की क्रियाओं का संचालन करता है । जो व्यक्ति की इच्छा से नहीं वरन् स्वतः ही कार्य करते है जैसे ह्रदय , फेफड़ा , अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ आदि । यह तन्त्र तंत्रिका के समूहों की एक श्रृंखला होती है जिससे शरीर के विभिन्न आन्तरिक अंगो के तंत्रिका तन्तु ( Nerve Fibers ) जुड़े होते हैं । स्वायत तंत्रिका तन्त्र के दो भाग है (i) अनुकम्पी और (ii) परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र

    अनुकम्पी तथा परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं तथा शरीर की सभी क्रियाओं पर नियन्त्रण रखते हैं।

    (i) अनुकम्पी तंत्रिका तन्त्र (Sympathetic Nervous System)

    यह तन्त्र व्यक्ति में सतर्कता तथा उत्तेजना को नियंत्रित करता है । यह तन्त्र व्यक्ति के शरीर को आपातकालीन परिस्थिति में अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है । आपातकालीन स्थिति में ह्रदय गति का तेज होना , श्वास गति का बढ़ना आदि क्रियाएँ अनुकम्पी तन्त्र के द्वारा ही संपादित की जाती हैं । अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र हृदय की धड़कन, आँसू, ग्रन्थियों के स्रावण, एड्रिनल ग्रन्थि के स्रावण, इन्सुलिन के स्रावण को बढ़ाता है |

    (ii) परानुकम्पी तंत्रिका तन्त्र (Parasympathetic Nervous System)

    यह तन्त्र शारीरिक ऊर्जा का संचयन करता है । विश्रामावस्था में यह तन्त्र क्रियाशील होकर ऊर्जा का संचय प्रांरभ करता है । यह आँख की पुतली को सिकोड़ता है तथा लार व पाचक रसों में वृद्धि करता है । परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र हृदय की धड़कन, आँसू, ग्रन्थियों के स्रावण, एड्रिनल ग्रन्थि के स्रावण, इन्सुलिन के स्रावण को रोकता है।

    अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र आपातकाल तथा तनाव की स्थितियों में कार्य करता है, जबकि परानुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र शान्ति तथा विश्राम की स्थितियों में कार्य करता है।

    तंत्रिका तन्त्र की कार्यिकी (Physiology of Nervous System)

    कई तंत्रिकाएँ मिलकर कडीनुमा संरचना का निर्माण करती हैं जो शरीर के विभिन्न भागों को मस्तिष्क तथा मेरूरज्जु के साथ जोड़ता है । संवेदी तंत्रिकाएँ बहुत से उदीपनों को जैसे आवाज , रोशनी , स्पर्श आदि पर प्रतिक्रिया करते हुए इन्हें केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचाती हैं । यह कार्य वैद्यु त रासायनिक आवेग ( Electro Chemical Impulse ) के जरिए संपादित किया जाता है । इसे तंत्रिका आवेग भी कहा जाता है ।

    यह तंत्रिका आवेग ही उद्दीपनों को संवेदी अंगों ( त्वचा , जीभ , नाक , आँखे तथा कान ) से केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक प्रसारित करते हैं । तंत्रिका आवेग दुमाक्ष्य से तंत्रिकाक्ष तक पहुँचते – पहुँचते कमजोर पड़ जाते है । ऐसे शिथिल आवेगों को सन्धि स्थल पर अधिक शक्तिशाली बनाकर आगे भेजने का कार्य न्यूरोट्रां समीटर द्वारा संपादित होता है । केन्द्रीय तन्त्र से संचारित संकेत जो चालक तंत्रिकाओं द्वारा प्रसारित होते हैं , व मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों को सक्रिय करते है ।

    तन्त्रिका आवेग का संचरण

    यह एक न्यूरॉन (neuron) के एक्सॉन (axon) के अन्त से दूसरे न्यूरॉन के डेन्ड्राइट (dendrite) पर होता है।

    यह केवल एक ही दिशा में (unidirectional) होता है। यह एक विद्युत रासायनिक प्रक्रिया है।

    विश्रामावस्था में तन्त्रिका कोशिका के कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में K+ की सान्द्रता अधिक होती है तथा कोशिका के बाहर Na+ की सान्द्रता अधिक होती है, जिसके कारण कोशिका कला के भीतर -80mV का विद्युत विभव (electrical potential) होता है। यह सुप्त कला अवस्था (polarised state) कहलाती है।

    तन्त्रिका कोशिका की कला में विद्युत विभवान्तर (electrical potential difference) होता है, जिसे कला विभव (membrane potential) कहते हैं। न्यूरॉन की प्लाज्मा कला में आयन चैनल (ion channel) उपस्थित होते हैं। ये केवल एक ही प्रकार के आयन के लिए पारगम्य होते हैं; जैसे—Na+ या K+ या Ca2+ आदि।

    तन्त्रिका कोशिका में ध्रुवित अवस्था (polarised state) बनाये रखने के लिए कोशिका कला में सोडियम-पोटैशियम पम्प होता है। इसके द्वारा कोशिकाद्रव्य से तीन सोडियम आयन बाहर निकाले जाते हैं तथा बाहर से दो पोटैशियम आयन कोशिकाद्रव्य में प्रवेश करते हैं।

    इलेक्ट्रोएन्सिफेलोग्राम (EEG)

    पहला EEG बर्गर ने 1929 में अंकित किया था।

    EEG मस्तिष्क के विभिन्न भागों की विद्युतीय सक्रियता की रिकॉर्डिंग है।

    EEG में चार तरंग होती हैं :

    (i) एल्फा तरंगें – ये मस्तिष्क का विश्राम दर्शाती हैं।

    (ii) बीटा तरंगें – ये तनाव दर्शाती हैं।

    (iil) थीटा तरंगें – ये भावात्मक दवाव; जैसे निराशा के दौरान उभरती हैं। (iv) डेल्टा तरंगें ये सोते समय आती हैं। ये मस्तिष्क की चोट या विकार दर्शाती हैं।

    न्यूरोट्रान्समीटर (Neurotransmitter)

    न्यूरोट्रांसमीटर एक प्रकार का रासायनिक संदेशवाहक है जो एक रासायनिक सिनैप्स में मौजूद संकेतों को एक न्यूरॉन से दूसरे तक पहुंचाता है। न्यूरोट्रांसमीटर अणु होते हैं जो न्यूरॉन्स से मांसपेशियों तक या विभिन्न न्यूरॉन्स के बीच संकेतों को संचारित करते रहते हैं। 

    अरबों न्यूरोट्रांसमीटर अणु हमारे दिमाग को काम करने के लिए लगातार काम करते रहते हैं, हमारे सांस लेने से लेकर हमारे दिल की धड़कन तक हमारे सीखने और एकाग्रता को भी न्यूरोट्रांसमीटर व्यवस्थित करता है। न्यूरोट्रांसमीटर विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक कार्यों जैसे भय, मनोदशा और आनंद को भी प्रभावित करते हैं। न्यूरोट्रांसमीटर का कार्य तंत्रिका कोशिकाओं से लक्ष्य कोशिकाओं तक संकेतों को संचारित करना होता है। ये लक्ष्य कोशिकाएं मांसपेशियों, ग्रंथियो या शरीर में मौजूद अन्य नसों में हो सकती हैं।

    (A) उत्तेजक (Excitory) न्यूरोट्रान्समीटर – इस प्रकार के न्यूरोट्रांसमीटर का न्यूरॉन पर उत्तेजक प्रभाव पड़ता है, जिसका अर्थ है कि वे  पोटेंशिअल को फायर करने की संभावना को बढ़ाते हैं। एपिनेफ्रीन और नॉरपेनेफ्रिन दो उत्तेजक न्यूरोट्रांसमीटर हैं।

    उत्तेजक (Excitory) न्यूरोट्रान्समीटर के प्रकार

    (i) एसीटिलकोलिन (ii) नॉरएपिनेफ्रिन (iii) सिरोटोनिन (iv) डोपामाइन (v) हिस्टामिन (vi) ग्लुटामेट

    (B) अवरोधक (Inhibitory) न्यूरोट्रान्समीटर – इस प्रकार के न्यूरोट्रांसमीटर का न्यूरॉन पर निरोधात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसका अर्थ है कि वे पोटेंशिअल के फायरिंग की संभावना कम होती है।

    अवरोधक (Inhibitory) न्यूरोट्रान्समीटर के प्रकार

    (i) गामा एमिनो ब्यूट्रीरिक अम्ल (γ-Aminobutyric acid or GABA ) (ii) गलाईसिन

    (C) मॉड्यूलर न्यूरोट्रांसमीटर – ये न्यूरोट्रांसमीटर, जिन्हें अक्सर न्यूरोमोड्यूलेटर के रूप में भी जाना जाता है, ये एक ही समय में बड़ी संख्या में न्यूरोट्रांसमीटर को प्रभावित करते हैं। ये अन्य रासायनिक दूतों के प्रभाव को भी प्रभावित करने में सक्षम हैं।

    प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action)

    कुछ आवेग अथवा संकेत, जिनकी मस्तिष्क में विश्लेषण की आवश्यकता नहीं होती। इनकी अनुक्रिया के लिए तत्काल आदेश की जरूरत होती है। ऐसे आवेगों की अनुक्रिया के लिए निर्देश मस्तिष्क के बजाए मेरूरज्जु द्वारा निर्गत किये जाते हैं। ऐसे निर्देशों को प्रतिवर्ती क्रिया या रिफ्लेक्स एक्सन कहते हैं।

    उदाहरण के लिए, किसी सुईं के चुभने अथवा किसी बहुत गर्म या ठण्डे पदार्थों को छूने पर हम तुरन्त अपने हाथों पर पैरों को हटाते हैं। किसी उद्दीपन के प्रति इस प्रकार की होने वाली अभिक्रिया अनैच्छिक (अचेतन) होती है।

    प्रतिवर्ती क्रियाओं में ग्राही अंगों से सूचनाएँ संवेदी तन्त्रिकाओं द्वारा मेरूरज्जु तक जाती हैं। वहाँ से अभिक्रिया के लिए प्रेरत तन्त्रिकाओं द्वारा अभिवाही अंग तक पहुँचती हैं। इस पथ को प्रतिवर्ती चाप कहते हैं।

    अन्य प्रतिवर्ती क्रियाएँ खांसना, छींकना, उबासी लेना, नेत्रों का झपकना मध्यपट की गति है।

    मानव तंत्रिका तंत्र का महत्त्व

    तंत्रिका तंत्र हमारे शरीर की गतिविधियों का समन्वय है। यह सब हमारे व्यवहार, सोच और कार्यों को नियंत्रित करता है।

    ऐसा केवल तंत्रिका तंत्र के माध्यम से होता है जिससे हमारे शरीर की अन्य सभी प्रणालियां कार्य करती हैं। यह एक आंतरिक प्रणाली से दूसरे को जानकारी भेजती है। उदाहरण के लिए, जब हम मुंह में खाने को रखते हैं, तब इसी वजह से लार ग्रंथियों के द्वारा लार का निर्माण होता है |

    जब हमारे शरीर का कोई भी अंग तंत्रिका तंत्र से प्रभावित होता है तो यह विद्युत की तरंगों के रूप में मस्तिष्क को संदेश भेजता है। यह संदेश संवेदी न्यूरॉन्स के माध्यम से भेजा जाता है।

    मस्तिष्क संदेश का विश्लेषण करता है और उसके अनुसार कार्य करता है। मस्तिष्क तब मोटर नसों के माध्यम से शरीर संबंधित अंग के लिए निर्देश भेजता है।

    मानव तंत्रिका तन्त्र ( Human Nervous System) से जुड़े प्रमुख प्रश्न और उनके उत्तर

    मानव तंत्रिका क्या है?

    जिस तन्त्र के द्वारा विभिन्न अंगों का नियंत्रण और अंगों और वातावरण में सामंजस्य स्थापित होता है उसे तन्त्रिका तन्त्र (Nerve System) कहते हैं। मनुष्य शरीर में तंत्रिकाएँ शरीर के लगभग हर भाग को मस्तिष्क या मेरूरज्जु से जोड़कर उनमें आपसी संपर्क रखतीं हैं। तन्त्रिका तन्त्र सिर्फ जन्तुओं में पाया जाता है, जबकि पौधों में अनुपस्थित होता है। इसका निर्माण एक्टोडर्म से होता है। तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क, मेरुरज्जु और इनसे निकलनेवाली तंत्रिकाओं की गणना की जाती है।

    मानव तंत्रिका तंत्र के कितने भाग होते हैं?

    मानव तन्त्रिका तन्त्र (Human Nervous System) के तीन भाग होते हैं (i)  केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र जिसमे मुख्य रूप से मस्तिष्क, मेरूरज्जू तथा इसमें निकलने वाली तंत्रिका कोशिकाएँ शामिल होती है । (ii) परिधीय तन्त्रिका तन्त्र – ये दो प्रकार की तंत्रिकाओं से मिलकर बना है (i) संवेदी या अभिवाही ( Sensory nerves) – ऐसी तंत्रिकाएँ जो उदीपनों ( Stimulus) को ऊतको व अंगो से केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र तक लाती हैं । (ii) प्रेरक या अपवाही ( Motor nerve): ये ऐसी तंत्रिकाएँ हैं जो केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से नियामक उद्दीपनों ( Regulatory stimulus)को सबंधित अंगों तक पहुँचाती हैं । (iii) स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र – यह तन्त्र उन अंगों की क्रियाओं का संचालन करता है जो व्यक्ति की इच्छा से नहीं वरन् स्वतः ही कार्य करते है जैसे ह्रदय, फेफड़ा, अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ आदि

    मानव शरीर में तंत्रिका तंत्र का क्या महत्व है?

    जब हमारे शरीर का कोई भी अंग तंत्रिका तंत्र से प्रभावित होता है तो यह विद्युत की तरंगों के रूप में मस्तिष्क को संदेश भेजता है। यह संदेश संवेदी न्यूरॉन्स के माध्यम से भेजा जाता है। मस्तिष्क संदेश का विश्लेषण करता है और उसके अनुसार कार्य करता है। मस्तिष्क तब मोटर नसों के माध्यम से शरीर संबंधित अंग के लिए निर्देश भेजता है।

    मनुष्य के तंत्रिका तंत्र में कौन कौन से अंग होते हैं?

    मनुष्य के तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क ((Brain), मेरुरज्जु (spinal cord), तंत्रिकाएँ (nerve) और संवेदी अंग (Sense organs) शामिल है |

    मानव शरीर में तंत्रिका कहां है?

    न्यूरॉन्स तंत्रिका तंत्र की सरंचनात्मक व क्रियात्मक इकाई है जो पूरे शरीर में मौजूद होते हैं, साथ ही मनुष्य के तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क ((Brain), मेरुरज्जु – रीढ़ की हड्डी (spinal cord), तंत्रिकाएँ (nerve) और संवेदी अंग (Sense organs) शामिल है | ये सारे अंग मिलकर तंत्रिका तंत्र कहलाते है | तंत्रिका तंत्र के दो मुख्य भाग होते हैं: केंद्रीय तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी से बना होता है। परिधीय तंत्रिका तंत्र नसों से बना होता है जो रीढ़ की हड्डी से निकलती है और शरीर के सभी हिस्सों तक फैली होती है ।

    न्यूरॉन्स क्या होते है ?

    कोशिकाएं जो कि तंत्रिका तंत्र को बनाती हैं, उसको तंत्रि कोशिका या तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन्स) ( neurons) कहते है। न्यूरॉन्स तंत्रिका तंत्र की सरंचनात्मक व क्रियात्मक इकाई है जिसके द्वारा यह तन्त्र शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक संकेत भेजता है । ये कोशिकाएँ शरीर के लगभग हर ऊतक / अंगों को केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र से जोड़कर रखती हैं । न्यूरॉन्स शरीर में सबसे बड़ा सेल हैन्यूरॉन्स की संरचना ऐसी है कि यह जल्दी से शरीर में संदेशों को ले जा सकती है। यह संदेश विद्युत के तरंगों या तंत्रिका आवेग के रूप में होते हैं।

    न्यूरॉन्स के कितने भाग होते है ?

    प्रत्येक न्यूरॉन्सतीन भागों में मिल कर बनी होती है (i) कोशिका काय ( Cell Body ) – कोशिका काय में एक केन्द्रक तथा प्रारूपिक कोशिकांग पाए जाते हैं (ii) द्रुमाक्ष्य (Dendron) – ये कोशिका काय से निकले छोटे तन्तु होते हैं । जो कोशिका काय की शाखाओं के तौर पर पाये जाते है (iii) तंत्रिकाक्ष (Axon) – यह लम्बा बेलनाकार प्रवर्ध है जो कोशिकाकाय के एक हिस्से से शुरू होकर धागेनुमा शाखाएँ बनाता है।

    न्यूरॉन का क्या कार्य है?

    न्यूरॉन्स तंत्रिका तंत्र की सरंचनात्मक व क्रियात्मक इकाई है जिसके द्वारा यह तन्त्र शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक संकेत भेजता है । ये कोशिकाएँ शरीर के लगभग हर ऊतक / अंगों को केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र से जोड़कर रखती हैं । तंत्रिका कोशिकाएँ (Neurons) शरीर के बाहर से अथवा भीतर से उद्दीपनों ( Stimuli ) को ग्रहण करती है । आवेगों ( संकेतो ) के माध्यम से उद्दीपन एक से दूसरी तंत्रिका कोशिका में अभिगमन करते हुए केन्द्रीय तंत्रिका तन्त्र तक पहुँचते हैं । केन्द्रीय तन्त्र से प्राप्त प्रतिक्रियात्मक संदेशों को वापस पहुँचाने का कार्य भी तंत्रिका कोशिका के माध्यम से ही संपादित होता है ।

    मस्तिष्क का कार्य क्या है?

    मानव मस्तिष्क शरीर का एक केन्द्रीय अंग है जो सूचना विनिमय तथा आदेश व निंयत्रण का कार्य करता है । शरीर के विभिन्न कार्य कलापों जैसे तापमान नियंत्रण, मानव व्यवहार, रुधिर परिसंरण, श्वसन, देखने, सुनने, बोलने, ग्रन्थियों के स्त्रावण आदि को नियंत्रित करता है ।इसका मुख्य कार्यों में ज्ञान, बुद्धि, तर्कशक्ति, स्मरण, विचार निर्णय, व्यक्तित्व आदि का नियंत्रण एवं नियमन भी है।  मस्तिष्क को शरीर का मालिक अंग कहते हैं।

    मस्तिष्क का सोचने वाला भाग कौन सा होता है?

    मानव मस्तिष्क का मुख्य सोचने वाला हिस्सा प्रमस्तिष्क (सेरेब्रम) (Cerebrum) है। प्रमस्तिष्क, मस्तिष्क का बड़ा और बाहरी भाग है। यह पढ़ने, सोचने, सीखने, बोलने, भावनाओं और चलने जैसे नियोजित मांसपेशी गतियों को नियंत्रित करता है। प्रमस्तिष्क (अग्रमस्तिष्क (Fore Brain) का एक प्रमुख हिस्सा) मस्तिष्क का मुख्य सोच वाला हिस्सा है।

    अग्रमस्तिष्क (Fore Brain) के कितने भाग है ?

    प्रमस्तिष्क (Cerebrum ),थेलेमस तथा हाइपोथेलेमस मिलकर अग्र मस्तिष्क का निर्माण करते हैं ।

    न्यूरोट्रान्समीटर (Neurotransmitter) क्या है ?

    न्यूरोट्रांसमीटर एक प्रकार का रासायनिक संदेशवाहक है जो एक रासायनिक सिनैप्स में मौजूद संकेतों को एक न्यूरॉन से दूसरे तक पहुंचाता है। न्यूरोट्रांसमीटर अणु होते हैं जो न्यूरॉन्स से मांसपेशियों तक या विभिन्न न्यूरॉन्स के बीच संकेतों को संचारित करते रहते हैं। 

  • Plant Hormone | प्लांट हार्मोन | पादप हार्मोन क्या हैं ? | Types of Plant Hormones in Hindi

    Plant Hormone | प्लांट हार्मोन | पादप हार्मोन क्या हैं ? | Types of Plant Hormones in Hindi

    पादप हार्मोन शब्द स्टर्लिंग द्वारा दिया गया। पौधों में उसकी वृद्धि और विकास को नियंत्रित करने रासायनिक पदार्थों का समूह पादप हार्मोन कहलाता है। पादप हार्मोन को फाइटोहार्मोन भी कहते हैं।

    ये पौधों की वृद्धि एवं विभिन्न उपापचयी क्रियाओं को नियन्त्रित तथा प्रभावित करते हैं। यह पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं एवं विकास करती हुई पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होती है।

    एब्सीकिक एसिड, एथिलीन ,साइटोका़निन, ऑक्सिन और जिबरेलिन आदि पादप हार्मोन कहलाते हैं।

    ये पादप हार्मोन विभिन्न प्रकार से पौधों में वृद्धि और विकास को प्रभावित करते हैं और नियंत्रण रखते हैं।

    पादप हार्मोन के प्रकार

    ऑक्सिन (Auxin)

    जिबरेलिन्स (Gibberellins)

    साइटोकाइनिन (Cytokinin)

    ऐबसिसिक एसिड (Abscisic Acid)

    एथीलीन (Ethylene)

    ऑक्सिन (Auxin) (वृद्धिकारक हॉर्मोन)

    इसका खोज डार्विन ने की थी। इसका निर्माण पौधे के ऊपरी भाग में होता है। यह हॉर्मोन प्राकृतिक एवं संश्लेषित दोनों रूपों में मिलते हैं। ऑक्सिन (Auxin) कार्बनिक यौगिकों का समूह है जो पौधों में कोशिका विभाजन (Cell division) तथा कोशिका दीर्घन (Cell elongation) में भाग लेता है।

    इन्डोल एसीटिक एसिड (Indole acetic acid—I.A.A) एवं नैफ्थेलीन (Naphthalene acetic acid—N.A.A) इसके प्रमुख उदाहरण हैं। तने में जिस ओर ऑक्सिन (Auxin) की अधिकता होती है, उस ओर वृद्धि अधिक होती है। जड़ में इसकी अधिकता वृद्धि को कम करती है।

    प्राकृतिक ऑक्सिन

    1. इन्डोल एसीटिक एसिड (IAA)

    2. इन्डोल 3 – एसिटेल्डिहाइड

    3. इन्डोल 3 – पाइरुविक एसिड

    संश्लेषित ऑक्सिन (Auxin)

    1. 2, 4 – डाइक्लोरो फिनॉक्सी एसोटिक अम्ल

    2. ट्राइक्लोरो फिनॉक्सी एसीटिक अम्ल

    प्राकृतिक ऑक्सिन (Auxin) के कार्य

    यह वृद्धि नियन्त्रक हॉर्मोन है।

    ऑक्सिन के कारण पौधों में शीर्ष प्रमुखता हो जाती है तथा पाश्र्वय कक्षीय कलिकाओं की वृद्धि रुक जाती है। यह पत्तियों के विलगन (abscission) को रोकता है। 2, 4-D खरपतवार को नष्ट करता है।

    इसके द्वारा अनिषेक फल (parthenocarpic); जैसे-सन्तरा, नीबू, अंगूर, केला आदि में बीजरहित फल बनते हैं। द्वितीयक वृद्धि के समय ऑक्सिन कैम्बियम में विभाजन को बढ़ाता है।

    कटे पौधों, कलम इत्यादि में कटे सिरे पर ऑक्सिन का घोल लगा देने पर अपस्थानिक जड़ें बनने लगती हैं।

    यह पुष्प बनाने पर रोक लगाता है, परन्तु अनानास नॅ ऑक्सिन छिड़कने से पूरे पौधों में एक साथ पुष्पन होता है।

    यह प्रसुप्ता नियन्त्रक (control of dormancy) का कार्य करता है। ऑक्सिन तथा साइटोकाइनिन का निश्चित अनुपात पादप ऊतक संवर्धन (plant tissue culture) नें प्रयोग होता है |

    जिबरेलिन (Gibberellins) (वृद्धिकारक हार्मोन)

    एक दुर्बल अम्लीय पादप हार्मोन है | इस हॉर्मोन को घान के खेत मे अत्यधिक लम्बे पौधे को देखा। इस बीमारी को बेकेन (Bakane) या फूलिश सोडलिंग (Foolish seedling) कहा जाता है, जिसका कारण जिवरेला फ्यूजीकोराई नामक फफूंद है। याबुता एवं हमाशी नामक वैज्ञानिक ने इसी फफूंद से एक वृद्धि नियन्त्रक प्राप्त किया, जिसे जिबरेलिन – A नाम दिया गया।

    यह हार्मोन पौधों में कोशिका वृध्दि को नियंत्रित करता है। जिबरेलिन पादप हार्मोन पत्तियों की वृद्धि प्रक्रिया को भी नियंत्रित करता है यह पौधों में पुष्पन को प्रारंभ करता है। फलों की पार्थेनोकॉपी में जिबरेलिन महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है।

    जिबरेलिन (Gibberellins) के कार्य

    जिबरैलिन्स बौने पौधों को लम्बा कर देता है तथा फूल बनने में मदद करता है।

    जिबरेलिन्स हार्मोन बीजो की प्रसुप्ति भंग कर अंकुरित होने हेतु प्रेरित करता है।

    जिबरेलिन्स हार्मोन काष्ठीय पौधों में कैम्वियम की सक्रियता को बढ़ाता है।

    जिबरेलिन-3 मुख्य रूप से प्रयोग में आने वाला जिबरेलिन है।

    साइटोकाइनिन (Cytokinin) (वृद्धिकारक हॉर्मोन)

    साइटोकाइनिन क्षारीय प्रकृति का हार्मोन है। इस हॉर्मोन को स्कूग एवं जबलोंस्की ने खोजा मिलर ने मक्का के अपरिपक्व बीज से एक साइटोकाइनिन प्राप्त किया, जिसे जीयाटिन (zeatin) नाम दिया गया। काइनिटीन (Kinetin) एक संश्लेषित साइटोकाइनिन है। साइटोकाइनिन का संश्लेषण जड़ों के अग्र सिरों पर होता है, जहाँ कोशिका-विभाजन (Cell division) होता है।

    साइटोकाइनिन (Cytokinin) के कार्य

    साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन के लिए एक आवश्यक हार्मोन है।

    साइटोकाइनिन ऑक्सिन की उपस्थिति में कोशिका विभाजन एवं विकास में योगदान देता है।

    साइटोकाइनिन जीर्णता अर्थात् पर्णहरित का विलोपन एवं प्रोटीन के नष्ट होने की क्रिया को रोकता है।

    साइटोकाइनिन RNA एवं प्रोटीन बनने में मदद करती है। इसके द्वारा शीर्ष प्रमुखता की समाप्ति तथा पाश्र्वय वृद्धि होती है।

    एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid) (वृद्धिरोधक हॉमोन)

    यह एक वृद्धरोधी (Growth inhibitor) हार्मोन है, अर्थात् यह पौधे की वृद्धि को रोकता है। इस हॉर्मोन को कॉर्न्स और एडिकोट (कपास के पौधे से) में पाया जाता है

    एब्सिसिक अम्ल (Abscisic Acid) के कार्य

    एब्सिसिक अम्ल बीजों को सुषुप्तावस्था में रखता है।

    एब्सिसिक अम्ल पत्तियों के विलगन तथा जीर्णावस्था को बढ़ावा देता है।

    एब्सिसिक अम्ल पुष्पन में बाधक होता है।

    एब्सिसिक अम्ल वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण के रूप में काम करता है अर्थात् रन्ध्रों को बन्द करता है फलतः वाष्पोत्सर्जन कम होता है।

    इथाइलीन (Ethylene) (वृद्धिरोधक हॉर्मोन)

    इथाइलीन की खोज बुर्ग है | इथाइलीन गैसीय रूप में पाया जाने वाला एकमात्र पादप हॉर्मोन है। यह इथेफोन (2-chlorethyl phosphoric acid) से निकलती है, जिसका प्रयोग फलों को कृत्रिम रूप से पकाने में किया जाता है।

    इथाइलीन या एथिलीन (Ethylene) के कार्य

    इथाइलीन फल पकाने वाला हॉर्मोन है।

    इथाइलीन तने की लम्बाई का वृद्धिरोधक, तने के फूलने से सहायक तथा गुरूत्वानुवर्तन गति को नष्ट करता है ।

    इथाइलीन पत्तियों, फूलों एवं फलों के विलगन को तीव्र करता है ।

    इथाइलीन मादा पुष्पों की संख्या में वृद्धि, जबकि नर पुष्पों की संख्या में कमी करता है।

    फ्लोरिजिन्स Florigens

    फ्लोरिजिन्स का संश्लेषण पत्तियों में होता है, परन्तु ये फूलों के खिलने (Blooming) में मदद करते हैं। इसलिए फ्लोरिजिन्स को फूल खिलाने वाला हार्मोन (Flowering hormone) भी कार्य करते हैं।

    फ्लोरिजिन्स Florigens के कार्य

    इस हार्मोन के द्वारा फलों का खिलना नियंत्रित होता है।

    अन्य हॉर्मोन

    मोर्फेक्टिन (Morphactins) ये कृत्रिम वृद्धिरोधक है।

    क्लोरोकोलीन क्लोराइड (Chlorocholine Chloride CCC) यह जिबरेलिन संश्लेषण को रोकता है।

    मैलिक हाइड्राजाइड (Maleic hydrazide) यह पौधों की वृद्धि को रोकता है

  • मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System in Hindi) (ग्रंथियां (Glands) एवं हार्मोन्स (Harmones)

    मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System in Hindi) (ग्रंथियां (Glands) एवं हार्मोन्स (Harmones)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System) किस प्रकार कार्य करता है, अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System) में ग्रंथियां (Glands) एवं हार्मोन्स (Harmones) की क्या भूमिका है, हॉर्मोन (Harmone) क्या होते है, हॉर्मोन अन्तःस्रावी ग्रन्थिया (Glands) क्या है, पिट्यूटरी ग्रन्थि या पीयूष ग्रंथि (मास्टर ग्रन्थि) (Pituitary gland) क्या है, थाईराइड ग्रंथि (Thyroid Gland) क्या है, पैराथायरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid glands), एड्रिनलिन ग्रन्थि (Adrenal Gland), पीनियल ग्रन्थि, अग्न्याशय ग्रन्थि, थाइमस ग्रन्थि, पैंक्रियास ग्रंथि (Pancreatic gland) और हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) ग्रन्थि आदि | साथ ही जानेगे की हॉर्मोन के अल्पस्रावण के कारण होने वाले रोग, हॉर्मोन के अतिस्रावण के कारण होने वाले रोग विभिन्न मानव हॉर्मोन, उनके स्रोत, स्वभाव तथा मानव शरीर पर प्रभाव आदि

    मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System)

    शरीर के विभिन्न भागों में उपस्थित नलिकाविहीन ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी तन्त्र कहा जाता है। थामस एडिसन को अन्तःस्त्रावी विज्ञान का जनक कहा जाता है। अंतःस्त्रावी तंत्र के अध्ययन को एन्ड्रोक्राइनोलोजी कहते है | तन्त्रिका तंत्र से इसका घनिष्ठ संबंध है।

    इसलिए इन दोनों को संयुक्त कर एक नयी विज्ञान की शाखा का विकास हुआ है, जिसे “न्यूरोऐण्डोक्राइनोलॉजी” कहते है।

    अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से हॉर्मोन का स्राव होता है तथा समूह को इन्हीं हॉर्मोनों के द्वारा शरीर की सभी रासायनिक क्रियाओं का नियन्त्रण होता है, जहाँ वहिःस्रावी ग्रन्थियाँ स्राव वाहिनियों (ducts) द्वारा विसर्जित करती है जैसे लार ग्रन्थियाँ वहीं अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ वाहिनी विहीन (ductless) ग्रन्थियाँ होती हैं, जो अपना स्राव रुधिर में मुक्त करती है और यह स्राव रुधिर के माध्यम से निर्धारित अंगों में पहुँचकर रासायनिक क्रियाओं का समन्वय करता है।

    रासायनिक स्तर पर हार्मोन्स मुख्यत: स्टीरॉएड्स या प्रोटीन्स या प्रोटीन्स से उत्पन्न पदार्थ होते है।

    हॉर्मोन (Harmone)

    हॉर्मोन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से अल्प मात्रा में स्रावित होने वाला कार्बनिक पदार्थ है। इसकी खोज बेलिस और स्टारलिंग ने सीक्रिटिन हॉर्मोन के रूप में की। रसायनिक दृष्टि से हॉर्मोन प्रोटीन, स्टीरॉइड्स तथा अमीनो अम्ल के व्युत्पन्न पदार्थ होते हैं।

    प्रोटीन हॉर्मोन (जल में घुलनशील) – इन्सुलिन

    स्टीरॉयड हॉर्मोन (वसा में घुलनशील) लिंग हॉर्मोन – एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टीरॉन

    अमीनो अम्ल – थायरॉक्सिन

    अतः हॉर्मोन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से स्रावित होने वाला वह तत्व है, जो जैव-उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है तथा अन्तः वातावरण को नियन्त्रित करता है एवं अन्य हॉर्मोनों की क्रिया को अनुमति प्रदान करता है।

    हॉर्मोन कोशिका कला (cell membrane) की पारगम्यता को बदलकर उसे चयनात्मक पारगम्य बनाता है ताकि आवश्यक अणुओं का विनियम हो सके।

    मनुष्य की अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ मनुष्य के शरीर में कुल 9 अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश नर एवं मादा में समान होती हैं, जो निम्न हैं:

    पिट्यूटरी ग्रन्थि या पीयूष ग्रंथि (मास्टर ग्रन्थि) (Pituitary gland)

    पीयूष ग्रन्थि मस्तिष्क में पाई जाती है। यह मटर के दाने के समान होती है। यह शरीर की सबसे छोटी अतःस्त्रावी ग्रंथी है। यह कपाल की Sphenoid हड्डी में एक गड्डे में स्थित होती है। इसे Cell Turcica कहते है। इसका भार- 0.6gm होता है। इसे “मास्टर ग्रंथि’ भी कहते है।

    इसके द्वारा आक्सीटोसीन, ADH/वेसोप्रेसीन हार्मोन, प्रोलेक्टीन होर्मोन, वृद्धि हार्मोन स्त्रावित होते है। इन्हें संयुक्त रूप से पिट्यूटेराइन हार्मोन कहते है।

    पश्चपालि (POSTERIER LOBE)

    अथवा न्यूरोहाइपोफाइसिस से। इसमें दो हार्मोन स्रावित होते है —

    आक्सीटोसीन हार्मोन

    यह हार्मोन मनुष्य में दुध का निष्कासन व प्रसव पीड़ा के लिए उत्तरदायी होता है। इसे Love हार्मोन भी कहते है। है। यह गर्भावस्था के या प्रसव के समय गर्भाशय के फैलने तथा प्रसव के पश्चात गर्भाशय के सिकुड़ने को प्रेरित करता है। यह “Pitocin” भी कहलाता है |

    ADH/ वैसोप्रेसीन

    इसे “एंटिडाइयूरेटिक हार्मोन” भी कहते है अर्थात ADH अथवा पिट्रेसिन ADH वृक्क की वाहिनियों एवं कोशिकाओं में जल के अवशोषण को नियन्त्रित करता है व शरीर में जल संतुलन का भी कार्य करता है। यह हार्मोन वृक्क नलिकाओं में जल के पुनरावशोषण को बढ़ाता है व मूत्र का सांद्रण करता है इसकी कमी से बार-बार पेशाब आता है।

    अग्रपालि (ANTERIOR LOBE)

    अथवा एडीनोहाइपोफाइसिस से उत्सर्जित होने वाले हार्मोन्स

    STH = Somatotropic Hormone

    यह शरीर के वृद्धि व लम्बाई को नियन्त्रित करती है। अधिकता से:- भीमकायता, एक्रोमिगली विकार उत्पन्न हो जाता है। कमी से:- बौनापन (Dwarfism)

    GTH = Gonadotropic Hormone

    यह जनन अंगों के कार्यो का नियन्त्रण करता है।

    (a) FST = Follicle Stimulating hormone – नर में वृषण शुक्रजनन नलिकाओं तथा यह अंडाशय में फालिकल की

    वृद्धि में मदद करता है।

    (b) LH = Luteiniging hormone – इससे नर में टेस्टोस्टीरोन H.एवं मादा में एस्ट्रोजन H. स्रावित होता है। मादा की माहवारी को नियन्त्रित करता है।

    ACTH = Andrenocorticotropic Hormone –

    यह Adrenal Cortex के स्राव को नियन्त्रित करता है।

    TSH = Thyroid Stimulating Hormone –

    इसे थाइरोट्रोपिन हार्मोन भी कहते है। यह थाइराइड ग्रंथि की वृद्धि एवं स्रावण क्रिया का प्रेरक होता है।

    LTS = Lactogenic Hormone

    “प्रोलेक्टिन” भी कहते है। यह गर्भित मादा में दुग्ध-निर्माण एवं स्राव को प्रेरित करता है।

    (vi) Diabetogenic Hormone

    यह कार्बोहाइड्रेट के उपापचय को प्रभावित करता है। इसका प्रभाव इंसुलिन के ठीक विपरीत होता है।

    (vii) MSH = Melenocite Stimulating Hormone

    शरीर के अंग (मिलैनिन) को नियन्त्रित करता है।

    मध्यपालि (Intermediate Lobe)

    पीयूषग्रंथि का यह भाग अविकसित होता है।

    थाईराइड ग्रंथि (Thyroid Gland)

    यह ग्रन्थि गले में श्वास नली के पास होती है यह शरीर की सबसे बड़ी अंतरस्त्रावी ग्रन्थि है। इसकी आकृति एच होती है। इसके द्वारा थाइराॅक्सीन हार्मोन स्त्रावित होता है। ये भोजन के आक्सीकरण व उपापचय की दर को नियंत्रित करता है। कम स्त्रवण से गलगण्ड रोग हो जाता है।

    इसके कम स्त्रवण से बच्चों में क्रिटिनिज्म रोग व वयस्क में मिक्सिडीया रोग हो जाता है। अधिकता से ग्लुनर रोग, नेत्रोन्सेधी गलगण्ड रोग हो जाता है।

    थाईराइड ग्रंथि (Thyroid Gland) से जुड़े रोग

    (i) जड़वामनता (Cretinism):- यह बच्चों में होता है। मानसिक व शारीरिक वृद्धि अवरूध हो जाता है।

    (ii) Myxodema:- यह यौवनावस्था में होने वाले इस रोग में उपापचय भली-भाँति नहीं हो पाता, जिससे हृदय स्पंदन व रक्त चाप कम हो जाता है।

    (iii) Hypothyroidism:- सामान्य जनन कार्य सम्भव नहीं हो पाता। कभी-कभी इस रोग से मनुष्य गूंगा व बहरा भी हो जाता है।

    (iv) Simple Goitre:- आयोडिन की कमी से Thyroid Gland का आकार काफी बड़ जाता है।

    अधिकता से रोग

    (i) Toxic Goitre – उदर गति तीव्र रक्त चाप बढ़ जाता है।

    ii) Exophthalmic Goitre – आँख फूलकर नेत्रकोटर से बाहर निकल आती है।

    पैराथायरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid glands)

    यह ग्रन्थि गले में थाइराॅइड ग्रन्थि के पीछे स्थित होती है। इस ग्रन्थि से पैराथार्मोन हार्मोन स्त्रावित होता है। यह हार्मोन रक्त में Ca++ बढ़ाता है जो विटामिन डी की तरह कार्य करता है। इस हार्मोन की कमी से टिटेनी रोग हो जाता है। इस हार्मोन के अधिक स्राव से ओस्टिओपोरोसिरा रोग हो जाता है |

    एड्रिनलिन ग्रन्थि (Adrenal Gland)

    इसे अधिवृक्क ग्रन्थि भी कहते है। यह वृक्क के ऊपर स्थित होती है। यह ग्रन्थि संकट, क्रोध के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होती है।

    इस ग्रन्थि के बाहरी भाग को कार्टेक्स व भीतरी भाग को मेड्यूला कहते है।

    कार्टेस से कार्टीसोल हार्मोन स्त्रावित होता है। जिसे जिवन रक्षक हार्मोन कहते है। मेड्यूला में एड्रिनलीन हार्मोन स्त्रावित होता है जिसे करो या मरो हार्मोन भी कहते है। यह मनुष्य में संकट के समय रक्त दाब हृदयस्पंदन, ग्लुकोज स्तर, रक्त संचार आदि बढ़ा कर शरीर को संकट के लिए तैयार करता है।

    Adrenal Cortex से स्रावित हार्मोन्स

    मिनरैलो कॉर्टिकोइडस – एल्डोस्टीरान = शरीर में लवण का नियन्त्रण करना।

    ग्लुकोकॉर्टिकोइडस

    कार्टिसोल व कॉर्टिकोस्टीरोन ये दोनों शरीर में उपापचय, यकृत में Glycogenesis, आदि का नियन्त्रण करते है।

    लिंग हार्मोन्स

    एण्डोजेन्स व इस्ट्रोजन ये दोनों नर में स्रावित होने वाले हार्मोन है, जो Endogens नर व Estrogen मादा में पेशियों तथा जनन अंगों के विकास को प्रेरित करते है।

    (B) Adrenal Medulla से स्रावित हार्मोन्स :– (i) एड्रीनलीन या ऐपीनैफ्रीन व नॉरएड्रीनलीन या नॉरऐपीनैफ्रीन एड्रीनलीन हमें संकट कालीन परिस्थतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। गुस्स या डर के समय उत्पन्न होने वाले हाव-भाव ऐड्रीनेंलीन के द्वारा ही उत्पन्न होते है। इसका चिकित्सा में अत्यंत महत्वपूर्ण है- क्योंकि “इसे हृदय में Inject कभी-कभी रूके हुये हृदय में हत् स्पंदन प्रारंभ किया जा सकता है। नार ऐड्रीनेलीन भी हृदय को नियन्त्रित करता है।

    Gonadotropic Hormone (GTH)

    यौवनावस्था से केवल 2-3 वर्ष पहले ही इनका स्राव शुरू होता है। “Hypothalmus” में स्थित जैनेटिक जैव घड़ी (Genetic biology Clock) इनके प्राव के समय को नियन्त्रित करती है।

    हाशी मोटो रोग

    यह रोग में Thyroid Gland के द्वारा हार्मोन्स का भाव अत्यन्त कम हो जाता है। स्राव को बढ़ाने के लिए दी गई दवाई शरीर में विष की तरह काम करने लगती है। इसे खत्म करने के लिए शरीर में Antibodies बनने लगती है जो Thyroid को नष्ट कर देती है। इसे Anti-immune रोग या “थायराइड की आत्म हत्या” कहते है |

    Addison’s disease

    Adrenal Hormone की कमी से होता है। इसका वर्णन सर्वप्रथम Thomus Addision ने किया था। इससे मूत्र के साथ अधिक मात्रा में जल के लवण भी निष्कासित हो जाता है। इसे शरीर Dehydration हो जाता है। अत: Adrenal Hormone को “जीवन-रक्षक हार्मोन्स” कहते है।

    कुशिंग रोग

    Adrenal Hormone के अधिक स्राव से होता है।

    इडीमा रोग (Edema disease)

    Adrenal Hormone के अधिक स्राव व साथ में Na+ के स्राव के कारण होता है।

    पीनियल ग्रन्थि

    यह ग्रन्थि अग्र मस्तिष्क के थैलेमस भाग में स्थित होती है। इसे तीसरी आंख भी कहते है। यह मिलैटोनिन हार्मोन को स्त्रावित करती है। जो त्वचा के रंग को हल्का करता है व जननंगों के विकास में विलम्ब करता है। इसे जैविक घड़ी भी कहते है।

    अग्न्याशय ग्रन्थि

    अग्नाश्य ग्रन्थि को मिश्रत(अन्तः व बाहरी) ग्रन्थि कहते है। यकृत के बाद दुसरी सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इस ग्रन्थि में लैग्रहैन्स द्वीप समुह पाया जाता है। इसमें α व β कोशिकाएं पाई जाती है। जिनमें α कोशिकाएं ग्लुकागाॅन हार्मोन का स्त्रवण करती है। जो रक्त में ग्लुकोज के स्तर को बढ़ाता है।

    β कोशिकाएं इंसुलिन हार्मोन का स्त्राव करती है। जो रक्त में ग्लुकोज को कम करता है। यह एक प्रकार की प्रोटिन है। जो 51 अमीनो अम्ल से मिलकर बनी होती है। इसका टीका बेस्ट व बेरिंग ने तैयार किया ।

    इंसुलिन की कमी से मधुमेह(डाइबिटिज मेलिटस) नामक रोग हो जाता है व अधिकता से हाइपोग्लासिनिया रोग हो जाता है।

    थाइमस ग्रन्थि

    थाइमस ग्रन्थि को प्रतिरक्षी ग्रन्थि भी कहते है। इससे थाइमोसिन हार्मोन स्त्रावित होता है। यह हृदय के समीप पाई जाती है। यह ग्रन्थि एंटीबाॅडी का स्त्रवण करती है। यह ग्रन्थि बचपन में बड़ी व वयस्क अवस्था में लुप्त हो जाती है। यह ग्रन्थि टी-लिम्फोसाडट का परिपक्वन करती है। इसका प्रभाव लैंगिक परिवर्धन व प्रतिरक्षी तत्वों के परिवर्धन पर पड़ता है।

    जनन ग्रन्थियां

    पुरूष – वृषण – टेस्टोस्टीराॅन

     मादा – अण्डाश्य – एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान

    जनद – यह भी अंतः स्रावी ग्रंथियां हैं जो हमारे द्वितीयक लैंगिक लक्षणों को उत्पन्न करती है पुरुषों में जैसे आवाज का भारी होना दाढ़ी मूछ का आना,  महिलाओं में आवाज का पतला होना और दाढ़ी मूछ का नहीं आना

    वृषण- यह पुरुषों की अंतः स्रावी ग्रंथि होती है जो उन में द्वितीयक लैंगिक लक्षण के लिए उत्तरदाई होती है इसमें निकलने वाला हार्मोन टेस्टोस्टेरोन कहलाता है या हार्मोन पुरुषों में दाढ़ी मूछ का आना, आवाज का भारी होना आदि के लिए उत्तरदाई होता है साथ ही वृषण में स्पर्मेटोजेनेसिस अर्थात शुक्राणु निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है

    अंडाशय – यह दो गुलाबी संरचनाएं होती है जो शरीर के अंदर स्थित होती है इसमें दो हार्मोन एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन निकलते हैं जो मादा में द्वितीय लक्षण के लिए आवश्यक है |

    पैंक्रियास ग्रंथि (Pancreatic gland) 

    यह एक मिश्रित ग्रंथि होती है जिसकी लैंगर हैंस दीप कोशिकाओं में स्थित अल्फा और बीटा कोशिकाएं क्रम से ग्लूकेगन और इंसुलिन हार्मोन का श्रवण करती है ग्लूकेगन शरीर में शुगर की मात्रा को बढ़ाकर तथा इंसुलिन बढ़ी हुई शुगर को कम करके रक्त में शुगर की मात्रा का नियमन करता है इस हार्मोन की कमी से मधुमेह नामक रोग हो जाता है |

    सामान्य भाषा में कहें तो व्यक्ति चाहे कितना भी भोजन करें यदि वह प्रतिदिन व्यायाम और रनिंग करता है तो उसके शरीर में शर्करा की मात्रा के नियमन के लिए सही मात्रा में हार्मोन बनते रहेंगे और व्यक्ति को कभी मधुमेह से जूझना ही नहीं पड़ेगा |

    हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) 

    यह ग्रंथि थैलेमस के नीचे मस्तिष्क में स्थित होती है यह ग्रंथि हमारी मास्टर ग्रंथि अर्थात पीयूष ग्रंथि पर कंट्रोल करती है इसलिए इसे सुपर मास्टर ग्रंथि भी कहते हैं |

    हारमोंस के शरीर पर प्रभाव के बारे में वैज्ञानिक अभी तक रिसर्च कर रहे हैं बहुत ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं हुई है क्योंकि प्रकृति और शरीर में कितनी मात्रा में इनका प्रभाव क्या होता है इस पर खोज अभी जारी है |

    पौधों के हारमोंस

    पौधों में किसी भी प्रकार का अंतः स्रावी तंत्र नहीं पाया जाता है उसके बावजूद भी पौधों में हारमोंस बनते हैं जिन्हें पादप हार्मोन कहा जाता है सभी प्रकार के पादप हारमोंस या तो पौधों की वृद्धि को प्रेरित करते हैं या पौधों में प्रीति को संदमित करते हैं उदाहरण जिबरेलिन

    ग्रन्थि से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य (स्मार्ट फैक्ट्स)

    पिनियल ग्रन्थि (pineal gland) को लैंगिक जैव घड़ी (biological clock) भी कहा जाता है, जो 70 वर्ष की आयु में घटनी प्रारम्भ हो जाती है।

    थॉमस एडीसन को अन्तःस्रावी विज्ञान का जनक कहा जाता है।

    अग्न्याशय और जनद (gonad) मिश्रित ग्रन्थियाँ हैं।

    पिट्यूटरी ग्रन्थि को मास्टर ग्रन्थि (master gland) भी कहते हैं।

    थायरॉइड ग्रन्थि सबसे बड़ी अन्तः स्रावी ग्रन्थि है।

    अग्न्याशय एक मिश्रित ग्रन्थि है, जिसमें अन्तःस्रावी एवं बहिःस्रावी दोनों भाग होते हैं। इसके लैंगरहैन्स की द्वीपिकाओं में तीन प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं। यथा – α – कोशिकाओं से ग्लूकेगॉन हॉर्मोन, β-कोशिकाएँ से इन्सुलिन हॉर्मोन, δ – कोशिकाओं से सोमेटोस्टेटिन हॉर्मोन स्रावित होता है।

    रेनिन (Rennin) जठर ग्रन्थि (gastric gland) की जाइमोजन कोशिकाओं से स्रावित प्रोटीन अपघटनी एन्जाइम है, जबकि रेनिन (renin) वृक्क से स्रावित एक एन्जाइम है, जो हॉर्मोन की भाँति कार्य करता है। एड्रीनेलीन या एपीनेफ्रिन को संकटकालीन (emergency) हॉर्मोन कहा जाता है।

    मानव शरीर के सबसे छोटी अंत: स्रावी ग्रंथि है- “पिटयूटरी ग्रंथि’। व सबसे बड़ी अंत: स्रावी ग्रंथि- Thyroid Gland |

    एडीनल ग्रंथि की स्रावित हार्मोन को “लड़ो या उड़ो अथवा संघर्ष या पलायन की उपमा प्रदान की गई।

    एक्रोमेगाली रोग “सोमेट्रोट्रॉपिक हार्मोन (STH) के अधिक मात्रा में स्रावण से होता है।

    उत्तेजक पदार्थों को हार्मोन्स सर्वप्रथम-स्टारलिंग (1905) ने कहा था।

    स्तनधारियों में दुग्ध स्राव को- “आक्सीटोसिन व प्रोलैक्टिन” उत्तेजित करता है।

    एक्रोमेगाली रोग “सोमेट्रोट्रॉपिक हार्मोन (STH) के अधिक मात्रा में स्रावण से होता है।

    एड्रीनल ग्रंथि के हार्मोन के कम स्रावण से एडीसन, हाइपोग्लाइसीमिया तथा काँस्य वर्ण रोग हो जाते है।

    3F (Fight, Flight & Fright) हार्मोन्स-एड्रीनलिन को कहते है।

    Thyroid Gland के अति स्रावण से ग्रवसरोग, प्लूमर रोग, एक्सोफ्थैल्मिक ग्वाटर नामक रोग हो जाते है।

    हॉर्मोन के अल्पस्रावण के कारण होने वाले रोग

    रोगहार्मोनग्रंथिप्रमुख प्रभाव
    बौनापनSTHएड्रिनोहाइपोफाइसिसबाल्यावस्था में वृद्धि का निरोधन।
    सायमण्ड रोगSTHएड्रिनोहाइपोफाइसिसवयस्क अवस्था में व्यक्ति समय से पूर्व बूढ़ा दिखाई देता है।
    अवटुमनताथायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिशारीरिक वृद्धि व मानसिक वृद्धि मन्द हो जाती है व बौनापन।
    मिक्सोडेमाथायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिहृदय गति मन्द, रोगी सुस्त त्वचा, पलकें व होंठ मोटे हो जाते हैं।
    हाशीमोटो रोगथायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिथायरॉइड की आत्महत्या
    हाइपोकैल्सीमियाPTHपैराथायरॉइडCa2+ की कम व फास्फेट की मात्रा बढ़ जाती है |
    टिटेनीPTHपैराथायरॉइडCa2+ की कमी व पेशियों में ऐंठन
    एडीसन रोगमिनरेलोकोर्टिकॉइड्सएड्रिनल कॉर्टेक्सNa2+ की कमी, रुधिर दाब कम हो जाता है (हाइपोनेट्रिया)
    डाइबिटीज मेलीटसइन्सुलिनलैंगरहैन्स के द्वीप समूह (B-कोशिकाएँ)रुधिर में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है व मूत्र से होकर उत्सर्जन होने लगता है।
    डाइबिटीज इन्सीपीडसADHन्यूरोहाइपोफाइसिसपॉलियूरिया

    हॉर्मोन के अतिस्रावण के कारण होने वाले रोग

    रोगहार्मोनहार्मोन स्त्रावी ग्रंथिप्रमुख प्रभाव
    महाकायता या भीमकायता (Gigantism)STHएड्रिनोहाइपोफाइसिसबाल्यावस्था में अतिस्रावण से भीमकाय शरीर
    अग्राभिकायता (Acromegaly)STHएड्रिनोहाइपोफाइसिसवयस्कावस्था में चेहरे की अस्थियों का लम्बा होना, इसे रिवर्सल टू गॉरिला भी कहते हैं।
    नैत्रोत्सेंधी गलगण्ड (Exophthalmic goitre)थायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिनेत्र गोलक बाहर की ओर उभर जाते हैं।
    प्लूमर रोग (Plummer disease)थायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिग्रन्थि में जगह-जगह गाठें हो जाती हैं।
    ग्रेव का रोग (Grave’s disease)थायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिसम्पूर्ण ग्रन्थि फूल जाती है।
    ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis)PTHपैराथायरॉइड ग्रन्थिअस्थियाँ कमजोर व भंगुर हो जाती हैं व अस्थियों से Ca2+ निकल कर रुधिर सीरम में बढ़ जाता है। इसे हाइपरकैल्सीमिया कहते हैं।
    संपुटीतन्तुमय अस्थि विकृति (Osteitis fibrosa cystica)PTHपैराथायरॉइड ग्रन्थिहाइपोकैल्सीमिया
    कुशिंग रोग (Cushing disease)कॉर्टीसोलएड्रिनल कॉर्टेक्सवक्षीय भाग में वसा के जमाव से शरीर भौंडा हो जाता है।
    एड्रिनोजेनाइटल सिण्ड्रोम हिरसुटिज्मडीहाइड्रोएपी एण्डोस्टीरॉनएड्रिनल कॉर्टेक्समहिलाओं में नर के लक्षण-दाढ़ी मूँछ आना, आवज में भारीपन, क्लाइटोरिस का बड़ा होना।

    विभिन्न मानव हॉर्मोन, उनके स्रोत, स्वभाव तथा मानव शरीर पर प्रभाव

    क्र. सं.हार्मोन का नामस्त्रोतस्वभावप्रभाव
    1.सोमेटोस्टेटिन हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनGH का श्रावण रोकता है।
    2.थायरोट्रॉपिन मुक्ति हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनTSH का स्रावण प्रेरित करता है।
    3.कॉर्टिकोटॉपिन मुक्ति हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनACTH का स्रावण प्रेरित करता है।
    4.गोनेडोट्रॉपिन मुक्ति हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनगोनेडोट्रॉपिन का स्रावण प्रेरित करता है।
    5.सोमेटोट्रॉफिक या वृद्धि हॉर्मोन (STH or GH)अग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. DNA, RNA व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक।
    2. ग्लूकोनियोजेनेसिस प्रेरित करता है।
    3. शरीर की वृद्धि में सहायक।
    6.एड्रिनोकॉर्टिकोट्रॉफिक हॉर्मोन (ACTH)अग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीनएड्रिनल कॉर्टेक्स को हॉर्मोन स्रावण के लिए प्रेरित करता है।
    7.थायरॉयड प्रेरक हॉर्मोन (TSH)अग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीनथायरॉइड ग्रन्थि को हॉर्मोन स्रावण के लिए प्रेरित करता है।
    8.गोनेडोट्रॉफिक हॉर्मोन (a) पुटिका प्रेरक हॉर्मोन     (b) ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोनअग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. जनदों का विकास।
    2. गेमीटोजेनेसिस को प्रेरित करता है।

    1. जनदों से लिंग हॉर्मोनों के स्रावण को प्रेरित करता है। 2. अण्डोत्सर्ग प्रेरित करता है।
    9.प्रोलैक्टिन हॉर्मोनअग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. दुग्ध निर्माण प्रेरित करता है।
    2. स्तन ग्रन्थियों का विकास।
    10.मेलेनोसाइट प्रेरक हॉर्मोनमध्य पीयूष ग्रन्थिप्रोटीनमेलेनोसाइट में मेलेनिन निर्माण व वितरण में सहायक।
    11.वेसोप्रेसिन या पिट्रेसिन या मूत्र  बहुलता हॉर्मोनपश्च पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. धमनियों का संकुचन
    2. नेफ्रॉन्स द्वारा जल का पुनरावशोषण।
    12.ऑक्सीटोसिन या पिटोसिनपश्च पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. शिशु जन्म के समय प्रसव वेदना प्रारम्भ करता है। 2. स्तन ग्रन्थियों से दुग्ध स्रावण को प्रेरित करता है।
    13.मैलेटोनिनपिनियल कायअमीनो अम्ल1. स्तनधारियों में लैंगिक परिपक्वन को रोकता है।
    2. अभयचरों में त्वचा के रंग को हल्का करता है।
    14.थायरॉक्सिन या टैट्राआयोडो थायरोनिनथायरॉइड ग्रन्थिअमीनो अम्ल1. आधारी उपापचय का नियन्त्रण।
    2. हृदय स्पंदन का नियमन तथा शरीर ताप का नियन्त्रण । 3. ऊतक विभेदन में सहायक है अन्तःकायान्तरण प्रेरित करता है।
    4. ग्लूकोनियोजेनेसिस
    15.थायरोकैल्सिटोनिनथायरॉइड ग्रन्थि की C-कोशिकाएँप्रोटीनमूत्र में Ca का उत्सर्जन बढ़ाता है तथा अन्तरा-कोशिकीय द्रव (ECF) में Ca स्तर बढ़ाता है।
    16.पैराथॉर्मोन या कोलिप का हॉर्मोनपैराथायरॉइड ग्रन्थिप्रोटीन1. Ca तथा P उपापचय का नियन्त्रण ।
    2. होमियोस्टेसिस तथा रुधिर में Ca तथा P स्तर का नियन्त्रण | 3. अस्थियों तथा दाँतों का निर्माण व वृद्धि।   
    17.कैल्सीटोनिनपैराथायरॉइडप्रोटीनपैराथॉर्मोन का विपरीत प्रभाव।
    18.थायमोसीनथायमस ग्रन्थिप्रोटीनलिम्फोसाइटों के विभेदीकरण में सहायक तथा शरीर के रक्षा तन्त्र का भाग
    19.ग्लूकोकॉर्टिकॉएड, कॉर्टीसोल तथा कार्टिकॉस्टीरॉनएड्रिनल कॉर्टेक्सकॉर्टिकॉएडकार्बोहाइड्रेट, वसा तथा प्रोटीन उपापचय का नियन्त्रण
    20.मिनरेलोकॉर्टिकॉएड एल्डोस्टीरॉनएड्रिनल कॉर्टेक्सकॉर्टिकॉएड1. Na तथा K उपापचय का नियन्त्रण 2. रुधिर में Na की मात्रा बढ़ाने में सहायक
    21.लिंग कॉर्टिकॉएड, एण्डस्टेनेडिओन तथा एस्ट्रोजन  एड्रिनल  कॉर्टेक्सकॉर्टिकॉएडबाह्य लिंग लक्षणों के विकास में सहायक
    22.एड्रिनेलीन या एपीनेफ्रीनएड्रिनल मेड्यूलाकैटकोलेमिन1. हृदय स्पंदन, रुधिर दबाव तथा श्वसन का नियमन । 2. शरीर को युद्ध या पलायन के लिए तैयार करता है।
    23.नॉरड्रिनेलीन या नॉर-एपीनेफ़ोनएड्रिनल मेड्यूलाकैटकोलेमिनरुधिर वाहिनियों के संकुचन द्वारा रुधिर दाब में वृद्धि
    24.इन्सुलिनअग्न्याशय में उपस्थित लेंगरहैन्स की द्वीपकाओं की β-कोशिकाएँप्रोटीन1. ग्लूकोस उपापचय का नियन्त्रण 2. ग्लाइकोजेनेसिस तथा लाइपोजेनेसिस में सहायक । 3. ग्लूकोनियोजेनेसिस में वृद्धि | 4. प्रोटीन संश्लेषण बढ़ाता है।
    25.ग्लूकागॉन या
    हाइपरग्लाइसेमिक कारक
    अग्न्याशय में उपस्थित लेंगरहैन्स की द्वीपकाओं की α-कोशिकाएँप्रोटीनइन्सुलिन का विपरीत ग्लाइकोजीनोलिसिस प्रेरित करता है तथा प्रोटीनों का अपचय बढाता है।
    26.एस्ट्रोजनअण्डाशय की ग्राफियन पुटिकाएँस्टीरॉइड1. मादा में सहायक प्रजनन अंगों की वृद्धि व विकास। 2. मादा में द्वितीयक लिंग लक्षणों का विकास।
    27.प्रोजेस्टेरॉन1. अण्डाश्य की कॉर्पस ल्यूटियम 2. अपरास्टीरॉइड1. गर्भाशय को भ्रूण के अधिरोपण के लिए तैयार करता है। 2. गर्भावस्था बनाए रखने में सहायक है।
    28.टेस्टोस्टीरॉनवृषण की लीडिंग कोशिकाएँस्टीरॉइड1. नर के सहायक प्रजनन अंगों की वृद्धि तथा विकास। 2. द्वितीयक लिंग लक्षणों का विकास।
    3. पेशियों के विकास में सहायक
    29.कोरियोनिक गोनैडोट्रॉपिक  हॉर्मोनअपराप्रोटीनकॉर्पस ल्यूटियम को बनाए रखने में सहायक।
    30.प्लेसेण्टल लैक्टोजनअपराप्रोटीनदुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।
    31.रिलेक्सिनअपराप्रोटीनप्यूबिक संघान की पेशियों को लचीला बनाकर बच्चे के जन्म में सहायता करता है।
    32.रेनिनवृक्कप्रोटीन1.   एल्डोस्टीरॉन के स्रावण को प्रेरित करता है।
    2.  प्लाज्मा प्रोटीन एन्जियोटेन्सीनोजन को एन्जियोटेन्सिन में तोड़ता है, जो हृदय स्पंदन की दर को बढ़ाता है।
  • मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र | Human Excretory System | Kidney | गुर्दा | वृक्क | मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi)

    मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र | Human Excretory System | Kidney | गुर्दा | वृक्क | मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की उत्सर्जन तंत्र (Excretory System) क्या है, मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi) किस तरह से कार्य करता है,  मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi) के मुख्य अंग कोनसे है, मानव उत्सर्जन तंत्र की क्रियाविधि क्या है, उत्सर्जन के प्रकार कितने है, वृक्क (गुर्दा) (kidney) क्या है, वृक्क का क्या कार्य है, वृक्क का चित्र, वृक्क नलिका (नेफ्रॉन (Nephron) क्या है? नेफ्रॉन कहा पाया जाता है, नेफ्रॉन के कार्य, नेफ्रॉन की सरंचना और क्रियाविधि, मनुष्य के उत्सर्जी अंग, वृक्क द्वारा मूत्र निर्माण और नेफ्रॉन (वृक्काणु या वृक्क नलिका का कार्य) आदि

    उत्सर्जन (excretion) क्या है ?

    जन्तुओं के शरीर में उपापचय के परिणामस्वरूप CO2, जल, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल आदि कई ऐसे अपशिष्ट पदार्थों का निर्माण होता रहता है, जो शरीर के लिए काफी हानिकारक हैं। अतः उपयुक्त स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए इसका शरीर से बाहर निकलना आवश्यक है। इसी क्रिया को उत्सर्जन (excretion) कहते हैं।

    विभिन्न जन्तुओं में उत्सर्जी अंग

    • प्लाज्मा झिल्ली अमीबा सदृश प्रोटोजोआ
    • नेफ्रीडिया एनीलिडा
    • मैल्पीघियन नलिका आर्थ्रोपोडा (कॉकरोच)
    • कोक्सल ग्रन्थि मकड़ी
    • ग्रीन ग्रन्थि प्रॉन
    • क्लोरैगोगन कोशिकाएँ केंचुआ
    • वृक्क सभी कशेरुकियों में
    • विसरण द्वारा एककोशिकीय जीवों में
    • ज्वाला कोशिकाएँ प्लैटीहैल्मिन्थीज

    अकशेरुकियो के उत्सर्जी अंग

    शरीर की सामान्य सतह द्वारा – प्रोटोजोआ , पोरीफेरा , सिलेन्ट्रेटा

    आदि वृक्कक (protonephridia) :- चपटे कृमि (प्लेटीहेल्मिन्थिज)

    उत्सर्जी नलिकाएं :- निमेटोडा संघ

    पश्च वृक्कक (meta nephridia) :- एनिलिडा

    मैलपिघी नलिकाओं द्वारा :- आर्थोपोडा

    बोजेनस के अंगो द्वारा :- मौल्स्का

    कशेरुकियो के उत्सर्जी अंग

    प्राकृवृक्क (pronephron) : टेडपोल , डेलोस्ट्रोमा

    मध्यवृक्क (mesonephron) : लैम्पे , मछली , उभयचर पश्चवृक्क (metanephron) : पक्षी , सरीसृप , स्तनी

    नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन – उत्सर्जी तत्व

    मुख्य रूप से प्रोटीन अपचय के परिणामस्वरूप निर्मित जटिल नाइट्रोजन पदार्थ का ही उत्सर्जन तंत्र द्वारा निष्काषित होता है |

    ● अमोनिया के रूप में उदाहरण जलीय कशेरुकी, अस्थिल मछलियों एवं उभयचर प्राणियों में ।

    ● यूरिया के रूप में उदाहरण स्तनधारी, मेंढक |

    ● यूरिक अम्ल के रूप में उदाहरण पक्षी, सरीसृप तथा कीट ।

    • अमीनो अम्ल के रूप में उदाहरण मोलस्का में ।

    अमोनिया उत्सर्जीकरण (Amnateusm)

    जन्तुओं की यकृत कोशिकाओं में अमीनो अम्लों के विएमीकरण के फलस्वरूप अमोनिया का निर्माण होता है | वे जन्तु जो नाइट्रोजनी अपशिष्टो को अमोनिया के रूप में उत्सर्जित करते है अमोनोटेलिक जन्तु कहलाते है तथा यह क्रिया अमोनिया उत्सर्जीकरण कहलाती है |

    उदाहरण – प्रोटोजोआ , पोरिफेरा व जलीय जन्तु |

    यूरिया उत्सर्जीकरण (Urecoteusm)

    ऐसे प्राणी जो उत्सर्जी पदार्थ के रूप में यूरिया का उत्सर्जन करते है , यूरियोटेलिक जन्तु कहलाते है तथा यह क्रिया यूरिया उत्सर्जीकरण कहलाती है | उदाहरण – मेंढक व सभी स्तनी प्राणी |

    यूरिक अम्ल उत्सर्जीकरण (Uricotelusm)

    वे जन्तु जिनमे उत्सर्जी पदार्थ के रूप में यूरिक अम्ल का उत्सर्जन होता है , यूरिकोटेलिक जन्तु कहलाते है तथा यह क्रिया यूरिको उत्सर्जीकरण कहलाती है |

    उदाहरण – पक्षी , कीट , मरुस्थलीय प्राणी |

    मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi)  | मानव का उत्सर्जी तन्त्र

    मानव का उत्सर्जी तन्त्र निम्न उत्सर्जन अंगों से बना है :

    (i) वृक्क (Kidney)

    (ii) मूत्रवाहिनी नलिका (Ureters)

    (iii) मूत्राशय (Urinary Bladder) (iv) मूत्रमार्ग (Urethra)

    वृक्क (Kidney in Hindi)

    वृक्क उदरगुहा में पायी जाने वाली सेम के आकार की भूरी – चॉकलेटी रंग की संरचना है। मनुष्य के शरीर में एक जोड़ा वृक्क होता है। वृक्क के चारों तरफ पेरिटोनियम नामक झिल्ली पायी जाती है। बायाँ वृक्क दायाँ वृक्क की की तुलना में कुछ ऊँचाई पर स्थित होता है।

    वृक्क के आधार तल पर आगे की ओर एक गोल अधिवृक्क ग्रन्थि ( adrenal gland) होती है। प्रत्येक वृक्क का बाहरी भाग उत्तल व भीतरी भाग अवतल होता है , अवतल भाग गड्ढे के समान होता है , जिसे हाइलम कहते है | हाइलम में वृक्क धमनी व तंत्रिका प्रवेश करती है तथा वृक्क शिरा व मूत्रवाहिनी बाहर निकलती है | प्रत्येक वृक्क के ऊपर टोपी के समान अधिवृक्क ग्रन्थि पायी जाती है |

    प्रत्येक वृक्क से एक मूत्रवाहिनी निकलती है, जो मूत्राशय में खुलती है, जिसमें एकत्रित मूत्र, मूत्रमार्ग द्वारा बाहर निकल जाता है। वृक्क को मनुष्य में पूर्ण उत्सर्जी अंग की उपमा दी गई है

    वृक्क की आन्तरिक संरचना

    वृक्क की आन्तरिक संरचना में दो मुख्य भाग दिखाई देते है –

    वल्कुट (cortex)

    यह वृक्क का परिधीय भाग होता है, यह लाल रंग का कणिकामय भाग होता है |

    मध्यांश (Medula)

    यह वृक्क का मध्य भाग होता है, मध्यांश के वल्कुट की ओर पाये जाने वाले भाग पिरैमिड कहलाते है | मध्यांश में पिरैमिड के मध्य वल्कुट के छोटे छोटे भाग धंसे रहते है जिन्हें बर्टीनी के वृक्क स्तम्भ कहते है, प्रत्येक वृक्क में लाखो की संख्या में वृक्क नलिकाएं पायी जाती है |

    वृक्क द्वारा उत्सर्जन

    शरीर में प्रोटीन के अपचयन के कारण नाइट्रोजन युक्त वज्र्य पदार्थ बनते हैं, जिसे यूरिया एवं यूरिक अम्ल के रूप में जल में विलेय मूत्र के साथ उत्सर्जित किया जाता है। यूरिया का निर्माण यकृत में होता है। इनका उत्सर्जन वृक्क के माध्यम से होता है।

    शरीर में जल की हानि या निकासी फेफड़ों में श्वसन से, त्वचा से एवं मूत्र के द्वारा पूर्ण की जाती है। शरीर से अतिरिक्त जल वृक्क द्वारा मूत्र के रूप में उत्सर्जित किया जाता है।

    यकृत में पित्त का निर्माण होता है। पित्त का निर्माण टूटी-फूटी लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबीन से होता है। यकृत से पित्त सदैव निकलता रहता है परन्तु यह पित्ताशय में आकर संग्रहीत हो जाता है। पित्ताशय से यह समय-समय पर ड्योडिनम में पित्त वाहिनी द्वारा उत्सर्जित कर दिया जाता है।

    वृक्क के शरीर में कार्य

    वृक्क में बहुत सी वृक्क नलिकायें होती है। इन्हीं वृक्क नलिकायों में मूत्र का निर्माण होता है।

    मूत्र में 95% जल, 2% यूरिया, 0.6% नाइट्रोजन एवं थोड़ी मात्रा में यूरिक अम्ल पाया जाता है।

    शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने की अवस्था में विशेष एन्जाइम के स्रवण से वृक्क एरिथ्रोपोइटिन नामक हार्मोन द्वारा लाल रुधिराणुओं के तेजी से बनने में सहायक होता है।

    शरीर में परासरण नियंत्रण द्वारा वृक्क जल की निश्चित मात्रा को बनाए रखता है।

    वृक्क ऊतक की तीन परतों से ढका रहता हैः

    इसकी सबसे अंदर की परत मजबूत और तंतुमय पदार्थ की बनी होती है, जिसे वृक्कीय (गुर्दे) सम्पुट कहा जाता है। यह परत मूत्रनलियों की सतही परत में विलीन हो जाती है।

    इसकी मध्य की परत परिवृक्कीय (गुर्दे) वसा की बनी होती है जिसे वसीय सम्पुट कहा जाता है। वसा की यह गद्दीनुमा परत गुर्दे को झटकों और आघातों से बचाती है।

    इसकी बाह्य परत सीरमी कला के नीचे स्थित प्रावरणी होती है, जिसे वृक्कीय प्रावरणी कहते हैं। वृक्कीय प्रावरणी के चारों ओर वसा की एक दूसरी परत और होती है जिसे परिवृक्कीय वसा कहते हैं। वृक्कीय प्रावरणी संयोजी-ऊतक की बनी होती है, जो गुर्दे को घेरे रहती है तथा इसे पश्च उदरीय भित्ति से कसकर जोड़े रहती है।

    नेफ्रॉन (Nephron) (वृक्क नलिका)

    प्रत्येक वृक्क में दो भाग यथा – अन्दर वाले भाग मेड्यूला तथा बाहर वाले भाग को कॉर्टेक्स (cortex) कहते हैं। कॉर्टेक्स में लगभग एक करोड़ नेफ्रॉन (nephrons) होते हैं। यही नेफ्रॉन वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई होती है।

    प्रत्येक नेफ्रॉन बोमेन्स कैप्सूल (बोमेन सम्पुट) तथा ग्लोमेरुलस का बना होता है। बोमेन्स कैप्सल में रुधिर नलिकाओं का जाल बिछा होता है यही जाल ग्लोमेरुलस (glomerulus) कहलाता है।

    बोमेन्स कैप्सूल (Bowmen’s capsule) (बोमेन सम्पुट) में रुधिर चौड़ी अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) द्वारा प्रवेश करती है और फिर संकरी अपवाही धमनिका (efferent arteriole) द्वारा बाहर निकल जाती है।

    इस रूप में रुधिर का दबाव ग्लोमेरुलस में बढ़ जाता है और इस प्रकार रुधिर में घुले सभी पदार्थ छन जाते हैं। छने हुए पदार्थ में लाभदायक पदार्थ जैसे ग्लूकोज को वृक्क नलिका की दीवार सोख लेती है तथा हानिकारक पदार्थ मूत्रवाहिनी द्वारा मूत्राशय फिर मूत्रमार्ग द्वारा शरीर के बाहर निकल जाते हैं।

    वृक्क नलिका की संरचनाएँ

    मैलपिघी काय : यह दो भागों से मिलकर बना होता है –

    बोमेन सम्पुट : यह एक प्यालेनुमा संरचना होती है , यह पोड़ोसाइड कोशिकाओं से बनी होती है |

    ग्लोमेरुलस : बोमेन सम्पुट में अभिवाही धमनिका एक गुच्छे के रूप में उपस्थित रहती है , जिसे ग्लोमेरूलस कहते है |

    समीपस्थ कुंडलित नलिका : यह बोमेन सम्पुट से जुडी रहती है , इसका व्यास 50 म्यू का होता है | यह घनाकार एपिथिलयम कोशिकाओ से बनी होती है |

    हेन्ले लूप : यह u आकार की नलिका होती है जो समीपस्थ व दूरस्थ कुंडलिका नलिका के बीच में होती है , यह शल्की उपकला कोशिकाओं से बनी होती है |

    दूरस्थ कुंडलित नलिका : यह संग्राहक नलिका व हेन्ले लूप के मध्य स्थित होती है , यह घनाकार एपिथिलियम कोशिकाओ से निर्मित होती है |

    संग्राहक नलिका : प्रत्येक वृक्क नलिका आगे की ओर संग्राहक नलिका में खुलती है , संग्राहक नलिकाएँ आपस में मिलकर बेलिनाइ नलिका बनाती है |

    मूत्रवाहिनी (ureters) 

    मनुष्य में एक जोड़ी मूत्रवाहिनियाँ पायी जाती है जो पोल्विस से प्रारम्भ होकर मूत्राशय में खुलती है | मुत्रवाहिनी की भित्ति मोटी व गुहा संकरी होती है, इसकी भित्ति में क्रमाकुंचन गति होती है |

    मूत्राशय (Urinary Bladder)

    यह पेशियों से बना थैले के समान संरचना होती है जिसमें मूत्रवाहिनियाँ खुलती है,  इसमें मूत्र का संचय किया जाता है |

    मूत्रमार्ग (Urethra)

    मूत्राशय मूत्रमार्ग के रूप में बाहर खुलता है, पुरुष में मूत्रमार्ग की लम्बाई 15-20cm तथा स्त्रियों में 4cm होती है |

    मनुष्य के उत्सर्जी अंग

    उत्सर्जी अंगकार्य
    वृक्कनाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ, जल की अतिरिक्त में मात्रा एवं टॉक्सिन्स को बाहर करना ।
    फेफड़ेCO2 एवं जल को जल वाष्प के रूप में बाहर करना।
    आंत्रअनपचे भोजन एवं अन्य उत्सर्जी पदार्थों को मल के रूप में बाहर करना।
    यकृतअमोनिया को यूरिया में बदलना।
    त्वचाजल, खनिज लवण, स्वेद तथा कुछ मात्रा में नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर करना।

    मनुष्य के शरीर से उत्सर्जित होने वाले प्रमुख उत्सर्जी पदार्थ हैंः

    1. कार्बन डाइऑक्साइड

    2. जल

    3. खनिज लवण

    4. पित्त

    5. यूरिया

    उत्सर्जन तन्त्र के विकार

    1. मूत्राशय

    2. वृक्क पथरी (कैल्शियम ऑक्सेलेट तथा फॉस्फेट्स के जमाव के कारण)

    मनुष्य में उत्सर्जन कार्य

    त्वचा

    त्वचा में उपस्थिति तैलीय ग्रन्थियां एवं स्वेद ग्रन्थियां क्रमशः सीबम एवं पसीने का स्राव करती हैं। सीबम एवं पसीने के साथ अनेक उत्सर्जी पदार्थ शरीर से बाहर निष्कासित हो जाते हैं।

    फेफड़ा

    मनुष्यों में वैसे तो फेफड़ा श्वसन तंत्र से सम्बन्धित अंग है लेकिन यह श्वसन के साथ-साथ उत्सर्जन का भी कार्य करता है। फेफड़े द्वारा दो प्रकार के गैसीय पदार्थों कार्बन डाइऑक्साइड एवं जलवाष्प का उत्सर्जन होता है। कुछ पदार्थ जैसे-लहसुन, प्याज और कुछ मसाले जिनमें कुछ वाष्पशील घटक पाये जाते हैं, का उत्सर्जन फेफड़ों के द्वारा होता है।

    यकृत

    यकृत कोशिकाएं आवश्यकता से अधिक ऐमीनो अम्ल तथा रुधिर की अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित करके उत्सर्जन में मुख्य भूमिका निभाती हैं। इसके अतिरिक्त यकृत तथा प्लीहा कोशिकाएं टूटी-फूटी रुधिर कोशिकाओं को विखंडित कर उन्हें रक्त प्रवाह से अलग करती हैं। यकृत कोशिकाएं हीमोग्लोबिन का भी विखण्डन कर उन्हें रक्त प्रवाह से अलग करती हैं।

    पाचन तंत्र

    यह शरीर से कुछ विशेष लवणों, कैलिशयम, आयरन, मैगनीशियम और वसा को उत्सर्जित करने के लिए जिम्मेदार होता है।

    वृक्क द्वारा मूत्र निर्माण और नेफ्रॉन (वृक्काणु या वृक्क नलिका का कार्य)

    हर वृक्क या गुर्दे में पाया जाने वाला हर वृक्काणु मूत्र बनाने वाला एक स्वतंत्र इकाई होता है। इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी के द्वारा ही देखा जा सकता है।

    जैसा की पहले भी बताया गया है वृक्क के कार्यात्मक इकाई के रूप में वृक्काणु रक्त का प्रारम्भिक निस्यन्दन पूर्ण करके, निस्यन्द से उन पदार्थों का दुबारा अवशोषण कर लेते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी होते हैं तथा व्यर्थ पदार्थ मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

    वृक्काणु दो प्रकार के होते हैं- कॉर्टिकल और जक्स्टामेड्यूलरी।

    कॉर्टिकल वृक्काणु कॉर्टेक्स के शुरुआती दो तिहाई भाग में रहते हैं जिनकी नलिकीय संरचनाएं केवल मेड्यूला के वृक्कीय पिरामिड के आधार तक होती है जबकि जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु के लम्बे लूप वृक्कीय पिरामिड की गहराई में निकले रहते हैं।

    कॉर्टिकल वृक्काणु जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु की अपेक्षा लगभग सात गुने अधिक होते हैं। सामान्य अवस्थाओं में गुर्दो का कार्य, कॉर्टिकल वृक्काणु में होता रहता है लेकिन जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु दबाव अधिक होने की स्थितियों में ही सक्रिय होते हैं।

    हर वृक्काणु के निम्न दो मुख्य भाग होते हैंः

    * कोशिकागुच्छीय या बोमैंस सम्पुट,

    * वृक्कीय (गुर्दे) नलिका

    मूत्र को बनाने में वृक्क तीन प्रक्रियाओं का प्रयोग करते हैंः

    * कोशिका गुच्छीय निस्यन्दन

    * नलिकीय पुनरवशोषण

    * नलिकीय स्रवण

    कोशिका गुच्छीय निस्यन्दन

    गुच्छ एक निस्यन्दक के रूप में कार्य करता है। जब रक्त अभिवाही धमनिका से गुच्छ में से होकर बहता है तो इसका दबाव अधिक होता है । इस दबाव से रक्त प्लाज्मा का कुछ भाग गुच्छ कैप्सूल में पहुंच जाता है लेकिन रक्त कोशिकाएं और प्लाज्मा प्रोटीन्स के बड़े अणु गुच्छ के अंदर ही रह जाते हैं क्योंकि ये कैप्सूल की अर्द्धपारगम्य भित्तियों के छिद्रों से होकर गुजर नहीं पाते हैं। इस प्रक्रिया को ‘गुच्छ निस्यन्दन या फिल्ट्रेशन’ कहते हैं तथा उत्पन्न हुए द्रव को गुच्छ निस्यन्द या फिल्ट्रेट कहते हैं।

    नलिकीय पुनरवशोषण

    छनकर आया हुआ द्रव (ग्लोमेरुलर निस्यन्द) फिर वृक्काणुओं या वृक्कीय (गुर्दे) नलिकाओं से होकर गुजरता है तो शरीर के लिए उपयोगी पदार्थों जैसे- जल, सोडियम, आयन्स, ग्लूकोज तथा अमीनो अम्लों का वृक्काणु नलिकाओं की कोशिकाओं द्वारा पुनः अवशोषण हो जाता है तथा शरीर की चयापचयी क्रियाओं के दौरान उत्पन्न तथा रक्त में जमा विषैले पदार्थ, जैसे- यूरिया, यूरिक एसिड और क्रिएटिनीन आदि का अवशोषण नहीं होता और ये मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यह प्रक्रिया ‘नलिकीय पुर्नवशोषण’ कहलाती है।

    नलिकीय स्रवण

    शरीर के लिए कुछ अनावश्यक आयन्स और पदार्थ परिनलिकीय कोशिकाओं के रक्त से गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द में पहुंच जाते हैं जो संवलित नलिकाओं में होकर गुजरते हैं। इस प्रकार पोटैशियम आयन्स, हाइड्रोजन आयन्स जैसे उत्पाद, कुछ औषधियां और कार्बनिक यौगिक मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यह प्रक्रिया नलिकीय स्रवण कहलाती है।

    गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द वृक्काणु (नेफ्रॉन) में होकर गुर्दे के अंदरूनी भाग मेड्यूला में तथा फिर दुबारा कॉर्टेक्स में पहुंचता है। इस प्रक्रिया में जरूरी पदार्थ जैसे- जल और ग्लूकोज का रक्त में पुनरवशोषण हो जाता है। अंत में, गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द दुबारा मेड्यूला में पहुंचता है, जहां यह मूत्र कहलाता है तथा मूत्रनली से होकर मूत्राशय में पहुंच जाता है। छना हुआ रक्त दुबारा वृक्कीय शिरा द्वारा शरीर में पहुंच जाता है।

    उत्सर्जन से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य (Smart facts about Excretory System)

    केंचुआ, ऐस्कैरिस, फुफ्फुस मछली तथा जीनोपस में यूरिया व अमोनिया दोनों का उत्सर्जन होता है। मूत्र त्याग की प्रक्रिया को मिक्टयूरेशन (micturition) कहते हैं।

    मनुष्य में प्यूरीन का उत्सर्जी पदार्थ यूरिक अम्ल तथा पिरीमिडीन का उत्सर्जी पदार्थ एलेनीन है।

    डायलाइसिस ( dialysis) अर्द्धपारगम्य झिल्ली से विसरण के द्वारा रुधिर से उत्सर्जी पदार्थों को पृथक करना डायलेसिस कहलाता है। प्रत्येक केशिका गुच्छ (glomerulus) एक डायलेसिस थैली का कार्य करती है।

    वृक्क में प्रति मिनट एक लीटर रुधिर बहता है।

  • मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) | हृदय (Heart) और रुधिर (Blood) | जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals)

    मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) | हृदय (Heart) और रुधिर (Blood) | जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) क्या है ? जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals) से क्या तात्पर्य है ? रुधिर परिसंचरण क्षेत्र और लसीका परिसंचरण तन्त्र क्या होते है ? हृदय (Heart) कैसे कार्य करता है ? हृदय (Heart) की संरचना और कार्य क्या है ? लसीका तंत्र (Lymphatic system in Hindi) क्या है ? आदि | साथ ही इसमें मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) सचित्र और हृदय की संरचना (सचित्र)) (Structure of Heart) के बारे में बताया गया है |

    जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals)

    उच्च बहुकोशिकीय जन्तुओं में आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति एवं अनावश्यक पदार्थों का बहिष्करण सीधे कोशिका द्वारा न होकर एक विशेष तन्त्र, जिसे परिसंचरण तन्त्र कहा जाता है, द्वारा होता है।

    परिसंचरण तंत्र का अर्थ होता है, एक तत्व को एक स्थान से दुसरे स्थान तक परिवहन करना यानी परिसंचरण तंत्र यातयात का साधन है, जो रक्त का परिवहन करता है |

    यह तन्त्र दो प्रकार का होता है :

    खुला परिसंचरण तन्त्र (Open Circulatory System)

    इसमें केशिका तन्त्र नहीं पाया जाता है। हृदय द्वारा पम्प किया गया रुधिर वाहिकाओं द्वारा सीधे निर्धारित स्थान पर पहुँचता है। इस तन्त्र में रुधिर कम दाब तथा कम वेग से बहता है। इस प्रकार का रुधिर परिसंचरण तन्त्र संघ – एनीलिडा के जन्तुओं तिलचट्टा, कीट, मछली आदि में पाए जाते हैं।

    बन्द परिसंचरण तन्त्र (Closed Circulatory System)

    इसमें रुधिर बंद नलिकाओं में अधिक दाब एवं वेग से बहता है। इसमें पदार्थों का आदान प्रदान ऊतक द्रव्य द्वारा होता है। यह केंचुएँ, मोलस्का एवं सभी कशेरुकियों में पाया जाता है। मनुष्य में विकसित बन्द तथा दोहरा परिसंचरण तन्त्र पाया जाता है।

    मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System)

    सर विलियम हार्वे व मारसेली मैल्पिजी ने सबसे पहले रुधिर परिसंचरण (Blood circulation) के बारे में बताया था | मनुष्य में बंद परिसंचरण तंत्र (Closed circulatory system) एवं कीटों में खुला परिसंचरण तंत्र  (Open circulatory system) पाया जाता हैं | मानव रुधिर का pH 7.3 से 7.4 होता हैं. यह हल्का क्षारीय होता हैं |

    मनुष्य के रुधिर परिसंचरण तन्त्र में मुख्य संवहनी पदार्थ रुधिर होता है। रक्त परिसंचरण तंत्र शरीर की सभी कोशिकाओ तक प्रयुक्त पोषक तत्व ऑक्सीजन जल तथा अन्य पदार्थो को पहुंचाता है | तथा हमारे शरीर की आंतरिक सुरक्षा करता है |

    ये हमारे शरीर के pH मान को संतुलित बनाए रखता है | ये गैसे से लेकर हार्मोन तक सभी का परिवहन करता है | मनुष्य का रुधिर परिसंचरण तन्त्र दो भागों से मिलकर बना होता है।

    1. रुधिर परिसंचरण क्षेत्र

    2. लसीका परिसंचरण तन्त्र

    हृदय (Heart)

    हृदय

    हृदय एक मोटा, पेशीय, संकुचनशील स्वतः पम्पिंग अंग है। इसका वह भाग, जो शरीर के ऊतकों से रुधिर ग्रहण करता है, अलिन्द (auricle) कहलाता है तथा हृदय वह भाग है, जो ऊतकों में रुधिर पम्प करता है, निलय (ventricle) कहलाता है।

    हृदय वक्ष गुहा (thoracic cavity)

    हृदय वक्ष गुहा (thoracic cavity) में दोनों फेफड़ों के मध्य स्थित होता है।

    हृदय के चारों और द्विकलायुक्त कोष पाया जाता है। यह कला पेरीकार्डियम कहलाती है। दोनों कलाओं के मध्य पेरीकार्डियल द्रव से भरी एक गुहा पाई जाती है। पेरीकार्डियल द्रव हृदय की धक्कों से सुरक्षा करता है।

    मनुष्य का हृदय चार-कोष्ठीय होता है, जिसमें दो अलिन्द एवं दो निलय पाए जाते हैं। अलिन्द की दीवार पतली होती है, जबकि निलय की दीवार अपेक्षाकृत मोटी होती है |

    दायाँ अलिन्द

    दायाँ अलिन्द में सुपीरियर वेना कावा एवं इन्फीरियर वेना कावा से अनॉक्सीकृत रुधिर आता है। दायाँ अलिन्द, दाएँ निलय में एक चौड़े, वृत्तीय दाएँ अलिन्द निलय छिद्र (Auriculoventricular Aperture) द्वारा खुलता है, जो ट्राइकस्पिड वाल्व (Tricuspid Valve) द्वारा ढका होता है।

    ट्राइकस्पिड वाल्व, दाएँ अलिन्द से दाएँ निलय की ओर रुधिर के एक दिशीय प्रवाह को नियन्त्रित करता है।

    दायाँ निलय

    इससे फुफ्फुस धमनी (pulmonary artery) निकल कर फेफड़ों में पहुँचती है, जिसमें अनॉक्सीकृत प्रवाहित होता है।

    बायाँ अलिन्द

    इससे फुफ्फुस शिरा के द्वारा फेफड़ों से ऑक्सीकृत रुधिर आता है। इनमें वाल्व अनुपस्थित होते हैं। बायाँ अलिन्द, बायाँ निलय में, बाएँ अलिन्द-निलय छिद्र द्वारा खुलता है। अलिन्द-निलय छिद्र बाइकस्पिड वाल्व अथवा मिट्रल वाल्व (mitral valve) द्वारा ढका रहता है। बाइकस्पिड वाल्व बाएँ अलिन्द से बाएँ निलय में रुधिर के विपरीत प्रवाह को रोकता है।

    बायाँ निलय

    इससे बड़ी रुधिर नलिका निकलती है जिसे महाधमनी (aorta) कहते हैं। महाधमनी शरीर के विभिन्न भागों में ऑक्सीकृत रुधिर प्रवाहित करती है ।

    हृदय की क्रियाविधि (Mechanism of Heart)

    शरीर में रुधिर का परिसंचरण हृदय की पम्प क्रिया द्वारा सम्पन्न होता है। इसमें दो अवस्थाएँ होती हैं। प्रथम प्रंकुचन (systole) की अवस्था, जिसमें निलय सिकुड़ते हैं और उनमें भरे रुधिर को महाधमनियों में पम्प करते हैं। द्वितीय अवस्था को अनुशिथिलन (diastole) कहते हैं, जिसमें निलय फैलते हैं और अलिन्द से रुधिर प्राप्त करते हैं।

    एक प्रकुंचन तथा एक अनुशिथिलन मिलकर हृदय धड़कन (Heart Beat) का निर्माण करते हैं।

    एक स्वस्थ्य मनुष्य का हृदय 1 मिनट में 72 बार धड़कता है, जबकि कड़ी मेहनत या व्यायाम के फलस्वरूप बढ़कर 1 मिनट में 180 बार तक हो सकता है।

    हृदय की धड़कन दाहिने अलिन्द के ऊपरी भाग में स्थित ऊतकों के समूह शिरा अलिन्द नोड से शुरु होती है, इसे ही पेसमेकर (Pacemaker) कहते हैं

    हृदय के भीतर संकुलन एवं अनुशीथिलन के आवेग का प्रसारण विद्युत रासायनिक तरंगों के रूप में होता है, जो शिरा- अलिन्द नोड (SAN) से प्रारम्भ होकर निलयों तक जाता है। हृदय के धड़कन के दौरान वैद्युत परिवर्तन को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम नामक उपकरण द्वारा रिकार्ड किया जाता है, जिसे इलैक्ट्रोकार्डियोग्राफ या ECG कहते हैं।

    हृदय की संरचना (सचित्र)) (Structure of Heart)

    लसीका तंत्र (Lymphatic system in Hindi)

    लसिका वाहिनियों में लसिका बहती हैं जिसका कार्य कोशिका एवं रुधिर के मध्य पदार्थों के विसरण में सहायता पहुचाना एवं रुधिर से विसरित प्रोटीन एवं श्वेत रक्त कणिकाओं को वापिस रुधिर तक ले जाना हैं | इनका संचरण हमेशा ऊतकों से ह्रदय की ओर ही होता हैं |

    लसिका वाहिनियाँ शिराओं में जाकर खुलती हैं | इन वाहिनियों के मार्ग में मुख्यतः गले, बगल, जांघ एवं पेट आदि में लसिका ग्रंथियां होती हैं इन ग्रंथियों में लिम्फोसाइटस एकत्रित रहती हैं | लसिका ग्रंथियां हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधकता में प्रमुख भूमिका निभाती हैं |

    ह्रदय की धड़कन को पेसमेकर नियंत्रित करता हैं.

    एक स्वस्थ वयस्क का रक्त दाब लगभग 120/90 होता हैं ह्रदय के प्रकुचन (Systole) के समय दाब अधिकतम होता हैं और शिथिलन (Diastole) के समय निम्नतम रहता हैं |

    ह्रदय व धमनी सम्बन्धी रोग (Heart and artery disease)

    आस्टियो क्लोरोसिस (Osteosclerosis) – धमनी की दीवारों का अपेक्षाकृत कठोर हो जाना

    उच्च रुधिर दाब (High Blood Pressure)

    थम्बोसिस (Thrombosis) – इसमें रुधिर वाहिका के भीतर रुधिर का धक्का जम जाता हैं.

    ह्रदय मरमर – कई बच्चों में ह्रदय सामान्य परिवर्धित नही होता हैं | और शुद्ध व अशुद्ध रुधिर मिल जाते हैं | या निलय से आलिंद में रुधिर टपकने लगता हैं | जिसे ह्रदय मरमर कहते हैं |

    ह्रदयाघात (Heart attack) – रुधिर वाहिका (धमनियों) में कोलिस्टरोल (cholesterol) जम जाने से रक्त प्रवाह में रुकावट आ जाती हैं और ह्रदय के कार्य करने में रुकावट हो जाती हैं. इससे व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती हैं |

    हृदय से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य (Smart facts about Heart)

    • मछलियों में केवल दो-कोष्ठीय हृदय पाया जाता है जिसमें एक अलिन्द एवं एक निलय होता है।
    • सरीसृपों के हृदय संरचना में तीन कोष्ठीय तथा कार्य में चार-कोष्ठीय (four-chambered) होता है।
    • पक्षियों एवं स्तनियों में हृदय चार कोष्ठीय होता है, जिसमें दो अलिन्द एवं दो निलय होते हैं।
    • पुरुषों में हृदय का औसत वजन 280-340 ग्राम तथा महिलाओं में 230-380 ग्राम होता है।
    • पहली हृदय ध्वनि लब आलिन्द निलय कपाट के बन्द होने के कारण जबकि द्वितीय हृदय ध्वनि डप अर्द्धचन्द्राकार कपाटों के अचानक बाद होने के कारण होती है।
    • दो हृदय ध्वनियों के बीच मरमर की ध्वनि किसी कपाट के खराब होने पर रूधिर के टपकने के कारण होती है।
    • आरटीरियोस्क्लेरोसिस (arteriosclerosis) में धमनी की भित्ती में कोलेस्ट्राल जम जाने के कारण भित्तियाँ कठोर हो जाती है।

    रुधिर (Blood)

    यह लाल संवहनी (vascular) संयोजी ऊतक है, जिसमें हीमोग्लोबिन, हीमोसायिक प्लाज्मा प्रोटीन आदि उपस्थित होते हैं।

    रुधिर नलिकाएँ (Blood Vessels)

    रुधिर नलिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं :

    1. धमनियाँ (Arteries)

    मोटी भित्तियुक्त रुधिर नलिकाएँ, जो रुधिर को हृदय से विभिन्न अंगों में पहुँचाती हैं। ये शरीर में गहराई में स्थित होती है तथा इनमें वाल्व का अभाव होता है। फुफ्फुस धमनी के अतिरिक्त सभी धमनियों में ऑक्सीकृत रुधिर प्रवाहित होता है। सभी धमनियों में रुधिर अधिक दाब एवं अधिक गति से बहता है।

    2. शिराएँ (Veins)

    ये पतली भित्ति वाली रुधिर नलिकाएँ हैं, जो विभिन्न अंगों से रुधिर को हृदय तक ले जाती है। ये शरीर में अधिक गहराई में नहीं होती तथा इनमें रुधिर की विपरीत गति को रोकने हेतु वाल्व पाए जाते हैं। इनमें रुधिर कम दाब एवं कम गति से बहता है। फुफ्फुस शिरा के अतिरिक्त सभी शिराओं में अनॉक्सीकृत रुधिर प्रवाहित होता है।

    3. वाहिनियाँ (Capillaries)

    ये सबसे पतली रुधिर नलिकाएँ हैं, जो धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं। प्रत्येक वाहिनी चपटी कोशिकाओं की एक परत से बनी होती है। ये पोषक पदार्थों, वर्ज्य पदार्थों, गैस आदि का रुधिर एवं कोशिका के मध्य आदान-प्रदान करने में सहायक हैं।

    मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) सचित्र

    समीपस्थ संवलित नलिका (Proximal Convoluted Tubule-PCT)

    सरल घनाकार ब्रुश बॉर्डर उपकला से बनी यह नलिका अवशोषण के लिए सतह क्षेत्र को बढ़ाती है। सभी आवश्यक पोषक 70-80% वैद्युत अपघट्य और जल का पुनः अवशोषण इसी भाग द्वारा होता है। यह pH तथा आयनी सन्तुलन को बनाए रखने का लिए अमोनिया का निस्यन्द में स्रवण और HCO3 का पुनरावशोषण करती है।

    ग्लोमेरुलस में रुधिर लाने वाली अभिवाही धमनिका (afferent arteriole)

    अपवाही धमनिका (efferent arteriole) की अपेक्षा अधिक चौड़ी होती है। इस असामनता के फलस्वरूप गतिरोध उत्पन्न होता है। गतिरोध के कारण ग्लोमेरुलस की रुधिर केशिकाओं में रुधिर दाब काफी बढ़ जाने से रुधिर का प्लाज्मा छनकर (ग्लोमेरूलर निस्यन्द या नेफ्रिक निस्यन्द) बोमैन सम्पुट में आ जाता है।

    हेनले लूप (Loop of Henle)

    न्यूनतम पुनरावशोषण होता है। हेनले लूप की अवरोही भुजा जल के लिए पारगम्य होती है, परन्तु वैद्युतअपघट्य के लिए लगभग अपारगम्य होती है। आरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य होती है। अवरोही शाखा में अन्तराकाशी द्रव की बढ़ी समसान्द्रता के कारण जल का पुनरावशोषण होता है। यहाँ पर निस्यन्द प्लाज्मा से अतिपरासारी बन जाता है। आरोही शाखा Na+, K+, Ca+2, Mg+2 तथा CI का पुनरावशोषण होता है।

    दूरस्थ संवलित नलिका (Distal Convoluted Tubule-DCT)

    विशिष्ट परिस्थितियों में Na+ और जल का कुछ पुनरावशोषण रुधिर में सोडियम-पोटैशियम का सन्तुलन तथा pH बनाए रखने के लिए बाइकार्बोनेट्स का पुनरावशोषण एवं H+, K और NH3 का चयनात्मक स्रावण होता है।

    संग्रह नलिका (Collecting Tubule)

    मूत्र को सान्द्र करने के लिए जल का बड़ा हिस्सा इस भाग में अवशोषित किया जाता है। यह pH के नियमन तथा H+ व K+ आयनों के चयनात्मक स्रवण का कार्य करती है।

    मूत्र का संघटन

    24 घण्टे में 1-1.8 लीटर मूत्र का उत्सर्जन

    रंग = पीला (यूरोक्रोम)

    pH = 6.0

    विशिष्ट घनत्व = 1.015-1.02 गन्ध का कारण = यूरीनोड

    जल = 95%

    यूरिया = 2.6%, यूरिक अम्ल = 0.03%, अमोनिया = 0.25%, लवण = 2%

    मूत्र में अनियमितता (Abnormality in Urine)

    (i) प्रोटीन यूरिया – मूत्र में प्रोटीन की उपस्थिति

    (ii) एल्ब्यूमिनयूरिया – मूत्र में एल्ब्यूमिन की उपस्थिति

    (ii) यूरेमिया – मूत्र में अत्यधिक यूरिया का पाया जाना

    (iv) हीमेट्यूरिया – मूत्र में रुधिर का पाया जाना

    (v) पाइयूरिया – मूत्र में WBCs या मवाद (pus) का पाया जाना

    (vi) हीमोग्लोबिनयूरिया – मूत्र के साथ हीमोग्लोबिन का त्याग

    (vi) कीटोन्यूरिया – मूत्र में कीटोन बॉडीज (vill) ग्लाइकोसूरिया – मूत्र में ग्लूकोस

  • पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि | पौधों में परिवहन (Transportation in Plants in Hindi)

    पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि | पौधों में परिवहन (Transportation in Plants in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि और पौधों में परिवहन (Transportation in Plants क्या है ? पादप और जल के बीच में क्या सम्बन्ध है ? पोधों में परिवहन की प्रक्रिया (Transportation in Plants) क्या है ? पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) का क्या योगदान है ? पौधों में परिसंचरण की विधियां कोनसी है ? रसारोहण (Desertification) क्या है ? विसरण दाब न्यूनता (Diffusion Pressure Deficit — DPD) क्या है ? वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) क्या है ? वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रावण में क्या अन्तर है ? आदि

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation) क्या है ? What is Transportation in Plants

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation) का तात्पर्य जड़ द्वारा भूमि से अवशोषित जल एवं खनिज लवणों की पत्तियों तक पहुँचकर प्रकाश संश्लेषण हेतु विशिष्ट स्थिति उत्पन्न करना तथा पत्तियों में संश्लेषित कार्बनिक पदार्थ को अन्य अंगों तक पहुँचता है।

    सरल शब्दों में कहे तो परिवहन वह प्रक्रिया है जिसे जरिये पौधे अपने जीवन के लिए उसके सभी भागों में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करते है |

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation in Plants) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। पेड़ अपनी जड़ों से पत्तियों की युक्तियों तक जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों और पानी का परिवहन करते हैं। पौधों में परिवहन के मामले में, सबसे बड़ी बाधा पानी है क्योंकि यह विकास में एक सीमित कारक के रूप में समाप्त होता है। इस समस्या को दूर करने के लिए, पेड़ों और अन्य पौधों में पानी के अवशोषण (absorption) और स्थानान्तरण (translocation) की सही व्यवस्था होती है।

    पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem)

    पौधों में पानी और खनिजों का परिवहन दो प्रकार के संवाहक ऊतकों द्वारा किया जाता है:

    1. जाइलम

    2. फ्लाएम

    पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) से युक्त नलिकाओं का एक विशाल नेटवर्क होता है। यह उस  संचार प्रणाली (Circulatory system) की तरह है जैसी प्रणाली से पूरे मानव शरीर में रक्त का संचार होता है । मनुष्यों में संचार प्रणाली के समान, जाइलम और फ्लोएम ऊतक (tissue) पूरे पौधे में फैले होते हैं। ये संवाहक ऊतक (conducting tissues ) जड़ों से उत्पन्न होते हैं और पेड़ों की टहनियाँ के माध्यम से ऊपर जाते हैं। बाद में वे शाखाओं में बंट जाते हैं और फिर मकड़ी के जाले की तरह हर पत्ते में ओर भी आगे बढ़ते हैं।

    जाइलम (Xylem)

    जाइलम एक लंबी, निर्जीव नली है जो जड़ों से पत्तियों तक तने के माध्यम से चलती है। पानी जड़ के बालों (root hair) द्वारा अवशोषित किया जाता है और जब तक यह जाइलम तक नहीं पहुंच जाता, तब तक परासरण द्वारा कोशिका से कोशिका की गति (cell movement) से गुजरता है। यह पानी तब जाइलम वाहिकाओं के माध्यम से पत्तियों तक पहुँचाया जाता है और वाष्पोत्सर्जन (transpiration) की प्रक्रिया द्वारा वाष्पित हो जाता है।

    जाइलम भी फ्लोएम जैसी लम्बी कोशिकाओं से बना होता है। हालांकि, जाइलम विशेष रूप से जड़ों से सभी पौधों के हिस्सों तक पानी पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है। चूंकि वे इतना महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, एक पेड़ में बहुत सारे जाइलम ऊतक होते है ।

    फ्लाएम (Phloem)

    फ्लोएम पोधों में पोषक तत्वों और शर्करा जैसे कार्बोहाइड्रेट के स्थानान्तरण के लिए जिम्मेदार होता है, जो पत्तियों द्वारा पौधे के उन क्षेत्रों में उत्पादित होता है जो चयापचय (metabolically) रूप से सक्रिय होते हैं। यह जीवित कोशिकाओं से बना होता है। इन कोशिकाओं की कोशिका भित्ति कोशिकाओं के सिरों पर छोटे-छोटे छिद्र बनाती है जिन्हें चालनी प्लेट (sieve plates) कहा जाता है।

    पौधों में परिवहन स्तर

    एक कोशिका से दूसरी कोशिका में पदार्थ का परिवहन (Transportation of substance from one cell to another)

    फ्लोएम और जाइलम के भीतर रस का लंबी दूरी तक परिवहन (Long-Distance transport of sap within phloem and xylem)

    अलग-अलग कोशिकाओं द्वारा विलेय और पानी का विमोचन और अवशोषण (The release and uptake of solute and water by individual cells)

    पौधों में परिसंचरण की विधियां

    विसरण (Diffusion)

    सभी पदार्थ (ठोस, द्रव एवं गैस) के अणु गतिज ऊर्जा (kinetic energy) के कारण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थान की और गति करते हैं यहीं गति विसरण कहलाती है।

    परासरण (Osmosis)

    यह विसरण की एक विशिष्ट प्रक्रिया है, जब दो भिन्न सान्द्रता वाले विलयनों को अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक किया जाता है, तो विलायक का कम सान्द्रता वाले विलयन से अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर होने वाला विसरण परासरण कहलाता है।

    किसी विलयन का परासरण दाब वह दाब है, जो उस विलयन की अर्द्धपरागम्य झिल्ली द्वारा विलायक (अथवा कम सान्द्रता वाले विलयन) से पृथक करने पर अधिक सान्द्रता वाले विलयन में विलायक के परासरण के कारण उत्पन्न होता है।

    स्फीति दाब तथा भित्ति दाब (Turgor Pressure and Wall Pressure)

    जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भित्ति पर डाला गया दाब ही स्फीति दाब कहलाता है। यह क्रिया अन्तः परासरण की स्थिति में होता है।

    स्फीति दाब के साथ-साथ ही इसके बराबर व विपरीत (Equal and Opposite ) एक दाब कोशिका भित्तियों द्वारा भी उत्पन्न होता है, जो भित्ति दाब कहलाता है।

    विसरण दाब न्यूनता (Diffusion Pressure Deficit — DPD)

    किसी शुद्ध विलायक (अर्थात् सर्वाधिक विसरण दाब युक्त) में पदार्थों को घोलने पर उसके विसरण दाब में आई कमी को विसरण दाब न्यूनता या चूषण दाब (Suction Pressure) कहते हैं। यह दाब न्यूनता परासरण दाब तथा स्फीति दाब के अन्तर के बराबर होती है। इसे ही जल विभव (water potential) कहा जाता है।

    जल का अवशोषण (Absorption of water) शैवालों में जल का अवशोषण सभी कोशिकाओं द्वारा, ब्रायोफाइटा में मूलाभासों (rhizoids) द्वारा तथा टेरिडोफाइटा, अनावृतबीजी व आवृतबीजी में जड़ों द्वारा होता है। जड़ में कोशिका परिपक्वन प्रदेश (Zone of Cell Maturation) में उपस्थित मूलरोमों के द्वारा पौधे जल का अवशोषण करते हैं।

    रसारोहण (Desertification) क्या है ?

    जड़ों द्वारा अवशोषित जल का गुरुत्वाकर्षण के विपरीत स्तम्भ, शाखाओं तथा पत्तियों तक पहुँचने की क्रिया रसारोहण कहलाती है। सर जे. सी. बोस ने रसारोहण का पल्सेशन वाद प्रस्तुत किया।

    डिक्सन तथा जोली द्वारा दिए गए वाष्पोत्सर्जनाकर्षण- जलीय संसंजक मत (Transpiration pull-cohesive force of water theory) के अनुसार, रसारोहण की क्रिया निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है।

    वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (Transpiration Pull)

    पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं की भित्तियों से जल के वाष्पन के कारण इनकी परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाब न्यूनता (DPD) अधिक हो जाती है, और परासरण द्वारा जल जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) से पर्ण मध्योतक कोशिकाओं में प्रवेश करता है। इससे जाइलम द्रव में उत्पन्न तनाव को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण कहा जाता है।

    जल का संसंजक बल (Cohesive Force of Water)

    हाइड्रोजन बन्धों के कारण जल के अणुओं के बीच परस्पर आकर्षण को संसंजक बल कहते हैं। संसंजक बल के कारण मूल रोम से पत्तियों तक जल का एक अविरल स्तम्भ (continuous column) बना रहता है ।

    जल का आसंजक बल (Adhesive Force of Water)

    जल के अणु संकीर्ण जाइलम वाहिकाओं तथा वाहिनिकाओं से आसंजक बल द्वारा जुड़े रहते हैं।

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation in Plants) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    सम परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरण दाब कोशिका रस (cell sap) के परासरण दाब के बराबर होता है।

    अति परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरणी दाब कोशिका रस के परासरण दाब की तुलना में अधिक होता है।

    अल्प परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरण दाब कोशिका रस के परासरण दाब की तुलना में कम होता है। किसी पदार्थ के ठोस कणों द्वारा किसी द्रव को बिना विलयन बनाए अवशोषण करने को अन्त शोषण (imbibition) कहते हैं। जैसे कपास के रेशे, बीज, लकड़ी के बुरादे आदि ऐसे पदार्थ हैं, जो इसी प्रक्रिया से जल सोखते हैं, और फुलकर मोटे हो जाते हैं। पौधों में अधिक वाष्पोत्सर्जन के कारण पत्तियों के मुरझा जाने की प्रक्रिया म्लानि (wilting) कहलाती है।

    पौधों की पत्तियों के किनारों पर उपस्थित जल रन्ध्रों (hydathodes) से बूँदों के रूप में जल की हानि बिन्दुस्राव ( guttation) कहलाती है। यह मूल दाब के कारण होता है। वाष्पोत्सर्जन की दर की माप पोटोमीटर (potometer) से की जाती है। जलोद्भिद पौधों की पत्तियों में रन्ध्रों का अभाव होता है।

    वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) क्या है ?

    पौधों के वायवीय भागों से जल की वाष्प के रूप में हानि वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहलाती है।

    वाष्पोत्सर्जन तीन प्रकार का होता है

    1. रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन – 80-90%

    2. उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन – 3-9%

    3. वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन – 0.1%

    रन्ध्र की संरचना

    रन्ध्र एक छोटा-सा छिद्र है, जो चारों ओर से गुर्दे या सेम के बीज के आकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं (epidermal cells) से घिरा होता है। इन कोशिकाओं को द्वार कोशिकाएँ या रक्षक कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ जीवित, हरितलवक युक्त तथा केन्द्रकयुक्त होती हैं। द्वार कोशिकाओं की अन्दर की भित्ति मोटी तथा बाहरी भित्ति पतली होती है।

    रक्षक कोशिकाओं के चारों ओर विभिन्न आकार के बाह्य त्वचीय कोशिकाएँ होती हैं, जिनको उपकोशिका या गौण कोशिका (subsidiary cells or accessory cells) कहते हैं।

    सक्रिय K+ स्थानान्तरण क्रियाविधि

    लेविट (1974) के अनुसार, प्रकाश की उपस्थिति में द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल उत्पन्न होता है, जो मैलेट व H+ में वियोजित हो जाता है और H+, K+ से बदल जाते हैं।

    H+ बाहर निकलते हैं और K+ अन्दर आ जाते हैं। K+ मैलेट से क्रिया करके पोटैशियम मैलेट का निर्माण करते हैं, जो कोशिका की रिक्तिका में स्थानान्तरित हो जाता है।

    पोटैशियम मैलेट की उपस्थिति में बाह्य त्वचा कोशिकाओं से द्वार कोशिकाओं में जल का परासरण होने से उनका स्फीति दाब बढ़ जाता है और रन्ध्र खुल जाते हैं।

    रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने की क्रियाविधि

    रन्ध्र प्रायः दिन में खुलते हैं, और रात्रि में बन्द रहते हैं, परन्तु CAM में रन्ध्र दिन में बन्द रहते हैं और रात्रि में खुलते हैं। रन्ध्र का खुलना व बन्द होना द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) तथा श्लथन (flaccidity) पर निर्भर करता है। स्फीति तथा श्लथ दशा के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत दिए गए  

    स्टार्च-शर्करा परिवर्तन मत

    सेयरे (1926) के अनुसार, प्रकाश → प्रकाश संश्लेषण → पत्ती में CO2 की सान्द्रता में कमी → द्वार कोशिकाओं की pH का बढ़ना → एन्जाइम द्वारा स्टार्च का शर्करा में परिवर्तन → द्वार कोशिकाओं के परासरण दाब का बढ़ना → द्वार कोशिकाओं में जल का गमन → द्वार कोशिकाएँ स्फीति दशा में → रन्ध्रीय छिद्र का खुलना

    वाष्पोत्सर्जन का महत्त्व

    वाष्पोत्सर्जन मूल से शीर्ष तक जल, खनिज लवणों के परिवहन तथा तापक्रम सन्तुलन में उपयोगी है।

    करटिस (1926) ने वाष्पोत्सर्जन को आवश्यक दुर्गुण कहा।

    वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक

    वाष्पोत्सर्जन की दर आपेक्षिक आर्द्रता व्युत्क्रमानुपाती होती है अर्थात् आर्द्रता के बढ़ने पर वाष्पोत्सर्जन की दर घटती है।

    वाष्पोत्सर्जन की दर वायु की गति के अनुक्रमानुपाती होती है। तापमान बढ़ने के साथ वाष्पोत्सर्जन की दर भी बढ़ जाती है।

    CO2 की कम सान्द्रता पर वाष्पोत्सर्जन अधिक व CO2 की अधिक सान्द्रता पर व वाष्पोत्सर्जन कम होता है।

    एब्सिसिक अम्ल, फिनाइल मरक्यूरिक एसीटेट, ऐस्पेरीन आदि वाष्पोत्सर्जन की दर को घटा देते हैं।

    वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रावण में अन्तर

    वाष्पोत्सर्जनबिन्दुस्रावण
    यह क्रिया दिन में होती है।यह क्रिया रात में होती है।
    पानी वाष्प बनकर उड़ता है।पानी द्रव के रूप में निकलता है।
    यह क्रिया रन्ध्रों द्वारा होती है।यह जल रन्ध्रों द्वारा होती है, जो शिराओं के अन्त में होते हैं।
    वाष्पोत्सर्जित जल शुद्ध होता है।जल शुद्ध नहीं होता है, अपितु इसमें खनिज तथा शर्करा आदि मिलते हैं।
    यह क्रिया रन्ध्रों से नियन्त्रित है।यह क्रिया अनियन्त्रित है।
    यदि सतह का तापमान घटा दिया जाए, तो वाष्पोत्सर्जन की क्रिया धीमी पड़ सकती है।इसमें ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है।
  • श्वसन तन्त्र | Respiratory System | मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)

    श्वसन तन्त्र | Respiratory System | मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की श्वसन तंत्र यानी Respiratory System क्या होता है, मानव श्वसन तंत्र, मानव श्वसन तंत्र की क्रियाविधि, मानव श्वसन तंत्र कैसे कार्य करता है?, मनुष्य श्वसन तंत्र की संरचना क्या होती है, श्वसन के लिय गैसों का विनिमय (Exchange of gases) किस प्रकार होता है, श्वसन से जुडी किण्वन (Fermentation) क्रिया क्या होती है, मानव श्वसन तंत्र से जुड़े महत्वपुर्ण अंग कोनसे है ? श्वसन तंत्र के कितने प्रकार होते है,

    श्वसन तन्त्र (Respiratory System) क्या है ?

    श्वसन एक ऑक्सीकारक एवं ऊर्जा प्रदान करने वाली प्रक्रिया है, जिसमें जटिल कार्बनिक यौगिकों के टूटने से सरल यौगिक बनते है और CO2 गैस मुक्त होती है। अर्थात् श्वसन का आशय ऐसी प्रक्रिया से है, जिसमें वायुमण्डलीय ऑक्सीजन शरीर की कोशिकाओं में पहुँचकर भोजन का ऑक्सीकरण या दहन सम्पूर्ण करती है तथा CO2 गैस बाहर निकलती है। श्वसन की सम्पूर्ण प्रक्रिया को दो भागों में बाँटा जा सकता है |

    बाह्य श्वसन (External Respiration)

    रुधिर एवं वायु के बीच O2 तथा CO2 का आदान-प्रदान बाह्य श्वसन कहलाता है। यह निम्नलिखित दो प्रकार से होता है:

    1. श्वासोच्छवास (Breathing)

    इसके अन्तर्गत फेफड़ों में निश्चित दर से वायु भरी एवं निकाली जाती है, जिसे साँस लेना भी कहते हैं। इसमें मुख्यतया दो क्रियाएँ होती हैं :

    (a) निःश्वसन (Inspiration)

    इस अवस्था में वायु वातावरण से वायु पथ द्वारा फेफड़े में प्रवेश करती है, जिसे नि: श्वसन कहते हैं। निः श्वसन में बाह्य अन्तरपर्शुक पेशियाँ सिकुड़ती हैं, पसलियाँ तथा स्टर्नम ऊपर तथा बाहर की और खिचतें हैं, जिससे वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है एवं फेफड़ों में निम्न दाब उत्पन्न हो जाता है।

    (b) उच्छश्वसन (Expiration)

    इस क्रिया में श्वसन के पश्चात वायु उसी वायु-पथ के द्वारा फेफड़े से बाहर निकलकर वातावरण में पुन: लौट आती है, जिस वायुपथ से वह फेफड़ों में प्रवेश करती है।

    श्वासोच्छ्वास में प्रयुक्त वायु का संगठन

     नाइट्रोजनऑक्सीजनकार्बनडाइऑक्साइड
    अन्दर ली गई वायु78.09%21%0.03%
    बाहर निकाली गई वायु78.09%17%4%

    निःश्वसन (Inspiration) तथा उच्छश्वसन (Expiration) में अन्तर

    निःश्वसनउच्छश्वसन
    यह वायुमण्डल की वायु का फेफड़ों में प्रवेश की प्रक्रिया है।यह फेफड़ों में भरी वायु का फेफड़ों से बाहर निकलने की क्रिया है।
    इससे फेफड़ों में वायुदाब कम होता है।इससे फेफड़ों में वायुदाब बढ़ता है।
    इसमें डायफ्राम की अरीय पेशियाँ सिकुड़ती हैं, जिससे डायफ्राम चपटा हो जाता है।इसमें डायफ्राम की अरीय पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, जिससे डायफ्राम गुम्बद के समान हो जाता है।
    इसमें प्ल्यूरल गुहाओं का आयतन अधिक होता है।इसमें प्ल्यूरल गुहाओं का आयतन कम होता है।

    2. गैसों का विनिमय (Exchange of gases)

    फेफड़ों के अन्दर गैसों का विनिमय होता है, यह प्रक्रिया घुली अवस्था या विसरणं प्रवणता (diffusion gradient) के आधार पर साधारण विसरण द्वारा होती है। इस क्रिया में फेफड़ों में O2 एवं CO2 का विनिमय उनके दाबों के अन्तर के कारण होता है। इन दोनों गैसों के विसरण की दिशा एक दूसरे के विपरीत होती है।

    श्वासोच्छवास के फलस्वरूप वायु फेफड़े के चारों और विभिन्न वायुकोष्ठकों घना जाल उपस्थित रहता है। इस समय वायु की ऑक्सीजन महीन शिरा केशिकाओं की दीवार से होकर रुधिर में पहुँच जाती है।

    गैसों का परिवहन

    इसके अन्तर्गत O2 का परिवहन रुधिर में पाए जाने वाले लाल वर्णक हीमोग्लोबिन के द्वारा शरीर के विभिन्न कोशिकाओं तक होता है जबकि, CO2 का परिवहन कोशिकाओं से फेफड़ों तक निम्न प्रकार से होता है:

    • CO2 के 70% भाग का परिवहन पोटैशियम बाइकार्बोनेट एवं सोडियम बाइकार्बोनेट के रूप में होता है।
    • CO2 के 23% भाग का परिवहन हीमोग्लोबिन द्वारा।
    • CO2 के 7% भाग का परिवहन प्लाज्मा में घुलकर कार्बनिक अम्ल के रूप में होता है।

    आन्तरिक श्वसन (Internal Respiration)

    शरीर के अन्दर रुधिर एवं ऊतक द्रव्य के बीच गैसीय विनिमय (O2 एवं CO2) आन्तरिक श्वसन कहलाता है।

    कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration)

    कोशिकाओं में कार्बनिक पदार्थों; जैसे ग्लूकोज का ऑक्सीजन द्वारा ऑक्सीकरण की क्रिया कोशिकीय श्वसन कहलाती है। ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर यह श्वसन वायवीय एवं अवायवीय होता है।

    किण्वन (Fermentation)

    यह अवायवीय श्वसन से मिलती-जुलती क्रिया है, जिसमें कार्बनिक यौगिकों का सरल पदार्थों के रूप में विघटन बैक्टीरिया एवं अन्य सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति में होता है। यीस्ट कोशिकाओं द्वारा शर्करा का एल्कोहॉलीय किण्वन इसका उदाहरण है। यीस्ट कोशिकाओं में शर्करा के किण्वन से एल्कोहॉल एवं CO2 बनते हैं।

    किण्वन की यह क्रिया जाइमेज (zymase) एन्जाइम की उपस्थिति में होती है। इस क्रिया में भी अवायवीय श्वसन की तरह ग्लाइकोलाइसिस प्रक्रम से बना पाइरुविक अम्ल दो चरणों में CO2 एवं एल्कोहॉल में टूट जाता है तथा समान मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। यद्यपि किण्वन में एल्कोहॉल एवं CO2 की उत्पत्ति कोशिकाओं के बाहर होती है, जिसके कारण सूक्ष्म जीवों की कोशिकाओं पर एल्कोहॉल का विषैला प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि अवायवीय श्वसन में एल्कोहॉल एवं CO2 कोशिकाओं के अन्दर उत्पन्न होते हैं। यही कारण है कि इस विषैले एल्कोहॉल के कारण कोशिकाएँ मृत्यु ग्रस्त हो जाती हैं।

    कोशिकीय श्वसन की क्रियाविधि

    श्वसन क्रिया ग्लूकोस से प्रारम्भ होती है। यह ग्लाइकोलाइसिस तथा वायवीय एवं अवायवीय ऑक्सीकरण में विभाजित होती है। ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) इसे EMP पथ भी कहा जाता है, चूँकि इसके विभिन्न पदों की खोज क्रमशः एम्बडेन मेयरहॉफ तथा पारनास ने की थी।

    ग्लाइकोलाइसिस की क्रिया कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में सम्पन्न होती है। इस चरण में ग्लूकोज के एक अणु से पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं का निर्माण होता है। इसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है अर्थात् यह चरण वायवीय एवं अवायवीय श्वसन दोनों में एक जैसा होता है।

    वायवीय एवं अवायवीय श्वसन में अन्तर

    वायवीय श्वसनअवायवीय श्वसन
    ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।
    श्वसनी पदार्थ का पूरा ऑक्सीकरण होता है।श्वसनी पदार्थ का पूरा ऑक्सीकरण नहीं होता है।
    CO2 व जल अन्तिम उत्पाद होते हैंअन्तिम उत्पाद कोई कार्बनिक यौगिक (जैसे, एल्कोहॉल, लैक्टिक अम्ल आदि) होता है।
    ग्लूकोज के एक अणु से 686 कि कैलोरी ऊर्जा निकलती है अर्थात् 38 ATP का निर्माण होता हैग्लूकोज के एक अणु से केवल 56 कि कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है अर्थात् 2 ATP का निर्माण होता है।
    वायवीय या ऑक्सीश्वसन का प्रथम चरण कोशिकाद्रव्य में तथा द्वितीय चरण माइटोकॉण्ड्रिया में सम्पन्न होता है।अवायवीय श्वसन की सम्पूर्ण प्रक्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है।

    ग्लाइकोलाइसिस में ग्लूकोस के एक अणु से

    1. पाइरुविक अम्ल के दो अणु बनते हैं।

    2. ATP के चार अणु बनते हैं, परन्तु इस क्रिया में 2 ATP अणु खर्च होते हैं अर्थात् शुद्ध लाभ 2 ATP का होता है।

    3. NADH + H+ के दो अणु बनते हैं। ग्लाइकोलाइसिस की क्रिया में CO2 उत्पन्न नहीं होती है।

    पाइरुविक अम्ल का वायवीय ऑक्सीकरण

    कोशिकाद्रव्य में उत्पन्न हुआ पाइरुविक अम्ल माइटोकॉण्ड्रिया में प्रवेश करता है जहाँ O2 की उपस्थिति में इसका वायवीय ऑक्सीकरण होता है। यहाँ पाइरुविक अम्ल Co-A से मिलकर एसीटाइल Co-A बनाता है, जिसके अर्न्तगत माइटोकॉण्ड्रिया में पाइरुविक अम्ल का ऑक्सीय विकार्बोक्सिलीकरण तथा विहाइड्रोजनीकरण होता है।

    इस क्रिया में 6 ATP अणुओं (2 NADH + H+ = 2×3) का लाभ होता है। यह क्रिया ग्लाइकोलाइसिस एवं क्रैब्स चक्र के मध्य संयोजी कड़ी का कार्य करती है।

    क्रैब्स चक्र (Kerb’s Cycle)

    इस क्रिया की खोज हैन्स क्रैब्स ने की थी। इसे साइट्रिक अम्ल चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र भी कहा जाता है। यह क्रिया माइटोकॉण्ड्रिया के अन्दर सम्पन्न होती है इस क्रिया के फलस्वरूप एसीटाइल Co-A का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है फलस्वरूप H2O, CO2, NADH+H+ तथा ATP उत्पन्न होते हैं।

    एसीटाइल Co-A कोशिका में उपस्थित ऑक्जलोएसीटिक अम्ल एवं जल से क्रिया कर साइट्रिक अम्ल बनाता है। इस साइट्रिक अम्ल का क्रेब्स चक्र में धीरे-धीरे कई अभिक्रियाओं के माध्यम से क्रमबद्ध विघटन होता है।

    इन अभिक्रियाओं के फलस्वरूप कई मध्यवर्ती अम्ल बनते हैं; जैसे—ऑक्जलोसक्सिनिक अम्ल, अल्फा-कीटोग्लूटेरिक अम्ल, सक्सिनिक अम्ल, फ्यूमेरिक अम्ल एवं मैलिक अम्ल। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप CO2 के 2 अणु एवं हाइड्रोजन के 8 परमाणु मुक्त होते हैं। अन्ततः मैलिक अम्ल का परिवर्तन ऑक्जलोएसिटिक अम्ल में हो जाता है। यह दूसरे एसिटाइल कोएन्जाइम-A के अणु के साथ संयुक्त होकर क्रैब्स चक्र में पुन: प्रवेश करता है।

    ऊर्जा का उत्पादन

    पाइरुविक अम्ल के एक अणु के ऑक्सीकरण से ATP का एक अणु पाँच अणु NADH2, के व 1 अणु FADH2 का बनता है NADH2 के एक अणु से 3 अणु ATP के , जबकि FADH2 के एक अणु से ATP के 2 अणु प्राप्त होते हैं। इस प्रकार पाइरुविक अम्ल के एक अणु से 1+ ( 3 × 5 ) + ( 2 × 1) = 1+ 15 + 2 = 18 अणु ATP के बनते हैं। चूँकि ग्लूकोज के एक अणु से दो पाइरुविक अम्ल के अणु बनते हैं 2 × 18 = 36 अणु ATP, पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं से प्राप्त होते हैं।

    ग्लाइकोलिसिस के दौरान भी 2 ATP अणुओं का लाभ होता है। अतः ग्लूकोज के 1 अणु के ऑक्सीकरण से 2 + 36 = 38 ATP अणु प्राप्त होते हैं। स्पष्ट है कि हमारे तन्त्र में अधिकतम ATP अणुओं को उत्पादन क्रैब्स चक्र के दौरान होता है।

    मानव श्वसन तन्त्र (Human Respiratory System)

    मानव में प्रमुख श्वसन अंग फेफड़े होते हैं, जो वक्षगुहा में, कशेरुकदण्ड तथा पसलियों द्वारा बने एक कटघरे में सुरक्षित रहते हैं। फेफड़ों तक बाहरी वायु के आवागमन हेतु नासिका, प्रसनी, वायुनाल तथा इसकी शाखाएँ मिलकर एक जटिल वायु मार्ग बनाती है अत: ये सारे अंग मिलकर श्वसन तन्त्र बनाते हैं।

    श्वसन पथ का क्रम

    नासाद्वार → ग्रसनी → कण्ठ → श्वासनाल →श्वसनी → श्वसनिकाएँ → फेफड़े → वायुकोष्ठक-केशिका → रुधिर

    मनुष्य में फेफड़े श्वसन तन्त्र में श्वसन अंग का कार्य करते हैं। फेफड़े के ऊपर दोहरी झिल्ली होती है, जिसे फुफ्फुसावरणी या प्लूरा (plura) कहते हैं। मनुष्य में फेफड़ा तीन पालियों में विभक्त होता है, जिसमें स्थित वायु कोष्ठक (alveoli) के माध्यम से गैसों का विनिमय होता है।

    श्वसन भागफल

    श्वसन भागफल (RQ)

    श्वसन भागफल का मान कार्बोहाइड्रेट के लिए = 1, प्रोटीन के लिए = 0.9, वसा के लिए = 0.7, जबकि कार्बनिक अम्ल के लिए = 1 से अधिक

    जन्तुओं में श्वसन वर्णक

    वर्णक स्थिति धात्विक समूह रंग जंतु
    हीमोग्लोबिनRBC एवं प्लाज्मालौहलालसभी कशेरूकी, एनीलिडा एवं मोलस्का
    हीमोसायनिनप्लाज्माताँबानीलाअधिकांश मोलस्का एवं आर्थोपोडा में
    हीमोएरिथिनRBCलौहलालकुछ एनीलिडा में
    क्लोरोक्रुओरिनप्लाज्माताँबाहराकुछ एनीलिडा में
    पिन्नोग्लोबिनप्लाज्मामैंगनीजभूराकुछ मोलस्का में

    कुछ जन्तुओं में श्वसन अंग

    श्वसन अंगजंतु
    फेफड़ेमनुष्य, मेंढक, पक्षी और छिपकली
    त्वचामेंढक और केंचुआ
    क्लोममेंढक का लार्वा और मछली
    श्वसन नालकीट
    बुक फेफड़ेमकड़ी और बिच्छु

    श्वसन विकार

    एम्फाइसमा सिगरेट पीने से फेफड़े में स्थित, वायु कूपिकाओं में समस्या आ जाती है । जैसे- श्वसनी दमा, श्वसनी शोथ, न्यूमोनिया, सायनोसिस आदि।

    मानव श्वसन तन्त्र (Human Respiratory System) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    मनुष्य में श्वसन को नियन्त्रण करने वाला श्वसन केन्द्र मेड्यूला ऑब्लोंगेटा में होता है।

    जब कार्बोहाइड्रेट का अवायवीय श्वसन होता है, तो श्वसन भागफल (RQ) अनन्त (infinite) होता है ।

    हीमोग्लोबिन से CO (कार्बन मोनोक्साइड) के मिलने की क्षमता ऑक्सीजन की क्षमता से लगभग 250 गुना अधिक होती है।

    हैमबर्गर प्रक्रिया का सम्बन्ध CO2 के परिवहन से है।

    फेफड़ों में हैल्डेन प्रभाव हीमोग्लोबिन द्वारा O2 ग्रहण करने के कारण CO2 के बहिष्कार को प्रोत्साहित करता है, जबकि ऊतकों में यह O2 के बहिष्कार को प्रोत्साहित करता है।
    श्वसन भागफल गैनाँग के रेसपाइरोमीटर द्वारा मापा जाता है।

    श्वसन को प्रभावित करने वाले कारक

    • ऑक्सीजन इसकी उपस्थिति में वायवीय श्वसन तथा अनुपस्थिति में अवायवीय श्वसन होता है।
    • तापमान 0°C-35°C तापक्रम के बीच प्रत्येक 10°C तापमान बढ़ने पर श्वसन की दर 2-2.5 गुना बढ़ती है।
    • कार्बन डाइऑक्साइड वायुमण्डल में CO2 की सान्द्रता बढ़ने पर श्वसन की दर कम हो जाती है।
    • जल इसकी मात्रा बढ़ने से श्वसन दर एक सीमा तक बढ़ती है। अत्यन्त कम जल मात्रा में श्वसन की दर न्यूनतम होती है।
    • प्रकाश श्वसन दिन-रात होता है, परन्तु प्रकाश की उपस्थिति में तापमान बढ़ने व श्वसन प्रयुक्त पदार्थों की मात्रा अधिक होने के कारण श्वसन दर बढ़ जाती है।
    • क्षति क्षतिग्रस्त ऊतकों में श्वसन की दर अस्थायी रूप से तीव्र हो जाती है।
    • संदमक विभिन्न रासायनिक पदार्थ-सायनाइड, CO मैलोनेट आदि श्वसन को संदमित करते हैं।