15 जनवरी 2022 को जब समुद्र के नीचे टोंगा-हुंगा हापाई ज्वालामुखी (Tonga volcano) फटा था तो इस घटना ने एक नया इतिहास बना था क्योकीं इसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली ज्वालामुखी विस्फोट बताया गया है।
हंगा टोंगा-हंगा हाआपाई (Hunga Tonga–Hunga Ha’apai) दक्षिण प्रशांत महासागर में एक ज्वालामुखी है जो फोनुआफोउ के ज्वालामुखी से लगभग 30 किमी दक्षिण में स्थित है और टोंगा के मुख्य द्वीप टोंगा टापु (Tongatapu, Tonga’s main island ) से 65 किमी उत्तर में स्थित है।
15 जनवरी 2022 को, हंगा टोंगा-हंगा हाआ में यह ज्वालामुखी फट गया और एक शक्तिशाली शॉक वेव (shock wave) इस ज्वालामुखी से निकली । इसके शक्तिशाली विस्फोट ने 36 मील जितना ऊंचाई पर एरोसोल, गैस, भाप और राख को निकल दिया था, जो शायद उपग्रह रिकॉर्ड में सबसे ऊंचा ज्वालामुखी है। इस विस्फोट ने 100 से अधिक घरों को क्षतिग्रस्त कर दिया और टोंगा द्वीप पर कम से कम तीन लोगों की जान चली गई। एक नए अध्ययन से यह भी पता चलता है कि ज्वालामुखी ने अभूतपूर्व मात्रा में जल वाष्प जारी किया, एक मजबूत ग्रीनहाउस गैस जो पृथ्वी पर गर्मी को बाहर नही निकलने दे रही है।
GOES-17 (GOES-17) उपग्रह ने 15 जनवरी को हुंगा टोंगा-हंगा हाआपाई ज्वालामुखी के पानी के भीतर विस्फोट से उत्पन्न एक बड़े बादल की इस इमेज को कैप्चर किया। ((NOAA/NESDIS))
हाल ही में Geophysical Research Letters में एक स्टडीप्रकाशित की गई है जिसमें दक्षिणी कैलिफोर्निया में नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के वायुमंडलीय वैज्ञानिक और स्टडी के लेखक लुइस मिलान ने कहा, ”हमने ऐसा कभी कुछ नहीं देखा है।” ज्वालामुखी में जब विस्फोट हुआ तो इसमें सोनिक बूम पैदा हुआ था। यह इतना शक्तिशाली फोर्स था कि इसने भाप बने पानी को पृथ्वी के 12 से 53 किलोमीटर में फैले स्ट्रेटोस्फीयर यानि समताप मंडल में भेज दिया, यह इतना पानी था कि जिससे ओलंपिक के आकार के 60 हजार के लगभग स्वीमिंग पूल को भरा जा सकता है। (रिसर्च स्टडी यहाँ पढ़े : The Hunga Tonga-Hunga Ha’apai Hydration of the Stratosphere)
अंतरिक्ष से 15 जनवरी को हंगा टोंगा-हंगा हाआपाई ज्वालामुखी के पानी के भीतर विस्फोट का लूपिंग वीडियो, GOES-17 उपग्रह (NOAA/NESDIS) द्वारा कैप्चर किया गया।
NASA के Microwave Limb Sounder ने भी इसके बारे में जानकारी दी है। नासा का यह यंत्र पृथ्वी के वायुमंडल के ऊपरी छोर के बारे में जानकारी इकट्ठा करता रहता है। वैज्ञानिकों ने इससे प्राप्त जानकारी के आधार पर कहा है कि इस विस्फोट ने जो जलवाष्प वायुमंडल में भेजा है वह पृथ्वी के औसत तापमान में बढ़ोत्तरी का कारण बन सकता है जिसका व्यापक असर दुनियाभर में देखा जा सकता है। इसका एक और दुष्प्रभाव पृथ्वी की ओजोन परत पर हो सकता है, जिसे यह कमजोर बना सकता है।
अब वैज्ञानिकों ने इससे पैदा होने वाले कई खतरे गिनाए हैं जो काफी चिंता का विषय है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह विस्फोट धरती पर गर्मी बढ़ने का कारण बन सकता है। साथ ही इसके कारण सूर्य की हानिकारक किरणों से रक्षा करने वाली पृथ्वी की ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचने की बहुत अधिक संभावना है।
वैज्ञानिकों ने एक अनुमान के मुताबिक कहा है कि वायुमंडल में जितना जलवाष्प पहले से मौजूद था, विस्फोट ने उसका 10 गुना पानी वायुमंडल में भेज दिया। इस पानी की कुल मात्रा 146 टेराग्राम बताई गई है। इससे पहले एक और जो बड़ा विस्फोट 1991 में फिलिपींस में हुआ था, उसमें जितना पानी वायुमंडल में पहुंचा था, यह उसका 4 गुना था।
आमतौर पर ज्वालामुखी फटने से जो धुंआ और धूल आदि पैदा होता है, वह सूरज की किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है, और गर्मी कुछ स्थानों पर कम हो जाती है। लेकिन टोंगा का विस्फोट अलग बताया जा रहा है, इसने जो पानी वायुमंडल में भेजा है, वो धरती की सतह की गर्मी को यहीं पर कैद करेगा जिससे सतह का तापमान कुछ समय के लिए काफी बढ़ जाएगा। हालांकि, यह प्रभाव अस्थायी होगा।
पृथ्वी (Earth) पर दिन रहस्यमयी तरीके से लंबा हो रहा है यानी धरती के दिन का समय बढ़ रहा है और वैज्ञानिकों को यह रहस्यमय लग रहा है क्योकीं वैज्ञानिक इसके पीछे जुड़े कारण पर अभी तक नही पहुच पा रहे है |
दुनिया भर के एटॉमिक क्लॉक्स ने गणना करके यह बताया है कि पृथ्वी के दिन का समय रहस्यमयी तरीके से बढ़ रहा है इससे न सिर्फ हमारे समय की कैलकुलेशन पर असर पड़ेगा, बल्कि जीपीएस, नेविगेशन और संचार संबंधी कई अन्य तकनीकों में भी समस्या आएगी |
धरती के दिन की गणना उसकी धुरी पर लगने वाले चक्कर से होती आई है लेकिन धरती के अपनी धुरी पर घूमने की गति लगातार बढ़ रही है | पिछले कुछ दशकों से हमारे दिन की लंबाई छोटी हो रही थी | जून 2022 में सबसे छोटे दिन का रिकॉर्ड भी दर्ज किया गया यानी पिछली आधी सदी में यह सबसे छोटा दिन था लेकिन साल 2020 के बाद और इस रिकॉर्ड के गठन के बाद अब धरती ने गति धीमी हो रही है और दिन लंबे हो रहे हैं जिसकी वजह वैज्ञानिकों को पता नहीं है |
सामान्य फोन या घड़ी में तो 24 घंटे का सटीक समय दिखा रहे है लेकिन पृथ्वी के 24 घंटे में लगने वाला चक्कर अब कुछ समय ज्यादा ले रहा है | आमतौर पर यह बदलाव करोड़ों सालों में होता है | हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे की वजह धरती पर आने वाले भूकंप (Earthquake) और तूफान (Storm) भी हो सकते हैं |
पिछले कई करोड़ वर्षों से धरती के घूमने की गति धीमी हो रही है और इसके पीछे चंद्रमा से निकलने वाले टाइड्स का घर्षण है | हर एक सदी में 2.3 मिलिसेकेंड धरती के दिन के समय में जुड़ रहा है |
कुछ करोड़ साल पहले धरती का दिन सिर्फ 19 घंटे का होता था लेकिन पिछले 20 हजार सालों से दूसरी प्रक्रिया शुरू हो गई जो कि विपरीत दिशा में है इस वजह से धरती की गति बढ़ने लगी | यह प्रक्रिया तब शुरू हुई जब जब Ice Age में ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से सरफेस प्रेशर कम हो रहा था और धरती का मैंटल धीरे-धीरे ध्रुवों की तरफ खिसक रहा था |
इसे एक उदाहरण से समझते है जैसे कोई बैले डांसर अपने घूमने की गति बढ़ाने के लिए अपने हाथों को अपने शरीर के करीब रख लेती है ताकि वह अपनी धुरी यानी पैर पर तेजी से गोल घूम सके | इसी तरह हमारी पृथ्वी के घूमने की गति तब बढ़ जाती है, जब उसका मैंटल धुरी के नजदीक पहुंचता है इसकी वजह से धरती का हर दिन 0.6 मिलिसेकेंड्स कम हो जाता है| धरती के एक दिन में 86,400 सेकेंड्स होते हैं |
पिछले कई दशकों से धरती की आंतरिक संरचना और सतह के बीच एक संबंध बना हुआ है | अगर बड़े भूकंप आते हैं तो ये धरती के दिन की लंबाई को बदल देते हैं भले ही अंतर कम समय का हो | जैसे साल 2011 में जापान में आए 8.9 तीव्रता के भूकंप ने धरती की घूमने की गति को 1.8 मिलिसेकेंड बढ़ा दिया था | इसके अलावा कई ऐसी छोटी घटनाएं होती रहती हैं, जो धरती के दिन के समय को बदलते हैं. जैसे- जलवायु परिवर्तन, मौसमों में बदलाव आदि | ये धरती के घूमने की गति को हर दिशा से प्रभावित करती हैं |
हर 15 दिन पर या महीने में टाइडल साइकिल (fortnightly and monthly tidal cycles) यानी लहरों की गति भारी मात्रा में ग्रह के चारों तरफ मूवमेंट करती हैं | इनकी वजह से भी पृथ्वी के दिन का समय कम या ज्यादा होता है | समुद्र की लहरों की वजह से होने वाला बदलाव आमतौर पर 18.6 वर्षों में एक बार होता है | वायुमंडल के मूवमेंट का सबसे ज्यादा असर धरती की गति पर पड़ता है | इसके अलावा बर्फबारी, बारिश, जमीन से पानी निकालना ये चीजें भी धरती की गति पर असर डालती हैं |
Odd news considering we just had the shortest day every recorded, neh?https://t.co/4lrC82a0YO
वर्ष 1960 से अब तक धरती पर मौजूद रेडियो टेलिस्कोप्स ग्रहों के चारों तरफ मौजूद क्वासार (Quasars) और अन्य अंतरिक्षीय वस्तुओं की गणना से धरती के घूमने की गति का पता लगाते आ रहे हैं | इन रेडियो टेलिस्कोप और एटॉमिक घड़ी के आंकड़ों से पता चला है कि पिछले कुछ सालों से धरती के दिन का समय कुछ कम हो रहा था | लेकिन रोटेशन में इतना बदलाव आता है कि वैज्ञानिक कई बार धोखा खा जाते हैं |
29 जून 2022 को सबसे छोटा दिन होने के बावजूद साल 2020 के बाद धरती के घूमने की ट्रैजेक्टरी (trajectory) में समय बढ़ा है | यह बदलाव पिछले 50 सालों में कभी नहीं देखा गया था | अभी तक इस बदलाव की सही और सटीक वजह पता नहीं चल पाई है | ये बदलाव मौसम के परिवर्तन की वजह से हो सकते है या फिर ला नीना इवेंट्स (La Niña events की वजह से | बर्फ के लगातार पिघलने की वजह से यह प्रक्रिया और बढ़ सकती है |
वर्तमान समय के बदलाव को लेकर पहले चैंडलर वॉबल (Chandler Wobble) को वजह बताया जा रहा था | यह हर 430 दिन में होता था | लेकिन रेडियो टेलिस्कोप की जांच से पता चला कि चैंडलर वॉबल खत्म हो चुका है | एक आखिरी संभावना ये बनती है कि धरती के अंदर या बाहर कुछ बेहद खास बदलाव न हुआ हो, जो समझ में नहीं आ रहा है | लंबे समय के टाइडल इफेक्ट की वजह से भी पृथ्वी में यह परिवर्तन हो सकता है |
क्या हमे नेगेटिव लीप सेकंड की जरूरत है ?
धरती के घूमने की दर (Earth’s rotation rate) की वजह से कई तरह के आधुनिक एप्लीकेशन काम करते हैं. जैसे- जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम | यदि धरती का घूमना बदलता है तो इनकी प्रणाली में दिक्कत आना शुरु हो जाएगी | हर कुछ साल पर समय की जानकारी रखने वालों को लीप सेकेंड जोड़ना पड़ेगा ताकि वो धरती की गति के साथ सामंजस्य बिठा सकें | इस तरह अगर धरती और लंबे दिनों की ओर बढ़ेगी तो हमें निगेटिव लीड सेकेंड जोड़ना पड़ सकता है |
निगेटिव लीप सेकेंड को अपने समय के साथ जोड़ने को वैज्ञानिक सही नहीं मानते हैं | अगर ऐसा करना पड़ेगा तो पूरी दुनिया के जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम को अपना समय एडजस्ट करना होगा |
एस्टरॉयड (Asteroid) लगातार पृथ्वी के नजदीक से गुजरते रहते है और पृथ्वी लगातार इन एस्टरॉयड (Asteroid) का सामना करती रहती है।
29 और 30 जुलाई को लगातार दो एस्टरॉयड पृथ्वी के करीब से गुजरे, जिनका साइज मल्टीस्टोरी बिल्डिंग जितना था। इसके अलावा 4 अगस्त को एक और एस्टरॉयड पृथ्वी के नजदीक से होकर गया। इसमें एक हजार परमाणु बमों जितनी ताकत थी।
जब भी कोई एस्टरॉयड पृथ्वी के करीब से गुजरता है, तो दुनियाभर की स्पेस एजेंसियां उसे मॉनिटर करती हैं, क्योंकि अंतरिक्ष में तैरती ये चट्टानें पृथ्वी को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं, आखिर डायनासोर भी तो एस्टरॉयड के पृथ्वी पर टकराने से ही खत्म हुए थे।
क्या होते हैं एस्टरॉयड (Asteroids) ?
एस्टेरॉयड (Asteroids) को हिन्दी में उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह भी कहते हैं। इसे मीटीऑराइट ( meteorite ) भी कहते हैं। एस्टेरॉयड को किसी ग्रह या तारे का टूटा हुआ टुकड़ा माना जाता है। ये पत्थर या धातु के टूकड़े होते हैं जो एक छोटे पत्थर से लेकर एक मील बड़ी चट्टान तक और कभी-कभी तो एवरेस्ट के बराबर तक हो सकते हैं। आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में ‘टूटतेहुएतारे‘ अथवा ‘लूका‘ कहते हैं।
नासा के अनुसार, इन्हें लघु ग्रह भी कहा जाता है। जैसे हमारे सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं, उसी तरह एस्टरॉयड भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। लगभग 4.6 अरब साल पहले हमारे सौर मंडल के शुरुआती गठन से बचे हुए चट्टानी अवशेष एस्टरॉयड हैं । वैज्ञानिक अभी तक 11 लाख 13 हजार 527 एस्टरॉयड का पता लगा चुके हैं। हमारे सौर मंडल में करीब 20 लाख एस्ट्रेरॉयड घूम रहे हैं। NASA के पास पृथ्वी के आसपास 140 मीटर या उससे बड़े करीब 90 प्रतिशत एस्टेरॉयड को ट्रैक की क्षमता है।
अतीत में इन उल्कापिंडों से कई बार जीवन लगभग समाप्त हो चुका है। एक बार फिर मंडरा रहा है डायनासोर के जमाने का खतरा। अंतरिक्ष में भटक रहा सबसे बड़ा उल्का पिंड ‘2005 वाय-यू 55’ है लेकिन फिलहाल खतरा एस्टेरॉयड एपोफिस से है।
इस तरह का सबसे पिछला प्रलयंकारी पिंड साढ़े छह करोड़ साल पहले टकराया था। उसने न जाने कितने जीव-जंतुओं की प्रजातियों का पृथ्वी पर से अंत कर दिया। डायनासॉर इस टक्कर से लुप्त होने वाली सबसे प्रसिद्ध प्रजाति हैं। समस्या यह है कि हम नहीं जानते कि कब फिर ऐसा ही हो सकता है।’ वह लघु ग्रह सेनफ्रांसिस्को की खाड़ी जितना बड़ा था और आज के मेक्सिको में गिरा था। इस टक्कर से जो विस्फोट हुआ, वह दस करोड़ मेगाटन टीएनटी के बराबर था। पृथ्वी पर वर्षों तक अंधेरा छाया रहा।
1994 में एक ऐसी ही घटना घटी थी। पृथ्वी के बराबर के 10-12 उल्का पिंड बृहस्पति ग्रह से टकरा गए थे जहां का नजारा महाप्रलय से कम नहीं था। आज तक उस ग्रह पर उनकी आग और तबाही शांत नहीं हुई है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि बृहस्पति ग्रह के साथ जो हुआ वह भविष्य में कभी पृथ्वी के साथ हुआ तो तबाही तय हैं, लेकिन यह सिर्फ आशंका है। आज वैज्ञानिकों के पास इतने तकनीकी साधन हैं कि इस तरह की किसी भी उल्का पिंड की मिसाइल द्वारा दिशा बदल दी जाएगी। इसके बावजूद फिर भी जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग तबाही का एक कारण बने हुए हैं।
मंगल और बृहस्पति के बीच घूमते हैं ज्यादातर एस्टरॉयड
ज्यादातर एस्टरॉयड एक मुख्य एस्टरॉयड बेल्ट में पाए जाते हैं, जो मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच है। इनका साइज 10 मीटर से 530 किलोमीटर तक हो सकता है। अबतक खोजे गए सभी एस्टरॉयड का कुल द्रव्यमान पृथ्वी के चंद्रमा से कम है।
ज्यादातर एस्टरॉयड का आकार अनियमित होता है। कुछ लगभग गोलाकार होते हैं, तो कई अंडाकार दिखाई देते हैं। कुछ एस्टरॉयड तो ऐसे भी हैं, जिनका अपना चंद्रमा है। कई के दो चंद्रमा भी हैं। वैज्ञानिकों ने डबल और ट्रिपल एस्टरॉयड सिस्टम की खोज भी की है, जिनमें ये चट्टानों एक-दूसरे के चारों ओर घूमती रहती हैं।
एस्टरॉयड को तीन वर्गों- सी, एस और एम टाइप में बांटा गया है। सी–टाइप (चोंड्राइटChondrite) एस्टरॉयड सबसे आम हैं। ये संभवतः मिट्टी और सिलिकेट चट्टानों से बने होते हैं और दिखने में गहरे रंग के होते हैं। ये सौर मंडल की सबसे पुरानी चीजों में एक हैं। एस–टाइप के एस्टरॉयडसिलिकेटमटेरियल और निकल–लौह से बने होते हैं। वहीं M-Type (एमटाइप) एस्टरॉयडमैटलिक (निकल–लौह) हैं। इनकी संरचना सूर्य से दूरी पर निर्भर करती है।
आज वैज्ञानिकों के पास इतने तकनीकी साधन हैं कि इस तरह की किसी भी उल्का पिंड की मिसाइल द्वारा दिशा बदल दी जाएगी। इसके बावजूद फिर भी जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग तबाही का एक कारण बने हुए हैं |
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने एक नया पृथ्वी जैसा ग्रह खोजा है। यह काफी दूर हमारी आकाशगंगा के बाहरी इलाके में है। ‘रॉस 508 बी’ (ROSS 508 b) नाम के इस नए सुपर अर्थ (Super Earth) ने खगोलविदों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं, क्योंकि यह अपने लाल बौने तारे के रहने योग्य जोन में स्थित है। पृथ्वी जैसे इस ग्रह की खोज में सुबारू टेलीस्कोप (Subaru Telescope) ने भूमिका निभाई जिस पर इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ का इस्तेमाल करते हुए ग्रह को खोजा गया।
Discovery Alert! A recently discovered exoplanet skims in and out of its star's habitable zone. It's 37 light-years from Earth and about four times our planet's mass, making Ross 508b a super-Earth. A year there, one orbit, takes just 10.8 days! https://t.co/qmEDhIuS3Apic.twitter.com/MW7Cap45If
— ARCHIVED NASA Exoplanets (@NASAExoplanets) August 3, 2022
पृथ्वी से बाहर जीवन की मौजूदगी की बात आती है, तो एक्सोप्लैनेट (Exoplanets) सबसे बड़े संभावित उम्मीदवारों के रूप में नजर आते हैं । ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं, एक्सोप्लैनेट कहलाते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे कई एक्सोप्लैनेट को अब तक खोजा है, जो पृथ्वी की तरह ही चट्टानी हैं। हालांकि विस्तृत शोध में वहां जीवन की संभावनाएं नजर नहीं आईं, क्योंकि कई ग्रहों का तापमान बहुत अधिक है।
‘रॉस 508 बी‘ (ROSS 508 b) को पृथ्वी से भी बड़ी संभावित चट्टानी दुनिया माना जा रहा है, लेकिन यह अपने रहने योग्य जोन से मूव कर रहा है। इसके बावजूद उम्मीदें बरकरार हैं, क्योंकि यह ग्रह अपनी सतह पर पानी को बनाए रखता है, जिससे जीवन की संभावना को बल मिलता है। नासा ने बताया है कि ‘रॉस 508 बी (ROSS 508 b)‘ एक सुपर अर्थ एक्सोप्लैनेट है। यह M-टाइप तारे की परिक्रमा करता है, जो पृथ्वी से लगभग 37 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। इस ग्रह का द्रव्यमान 4 पृथ्वी के बराबर है और ग्रह को अपने तारे की एक परिक्रमा करने में 10.8 दिन लगते हैं।
कैसे खोजते है ऐसे ग्रहों को वैज्ञानिक
सवाल उठता है कि आखिर वैज्ञानिक उन ग्रहों को कैसे ढूंढते हैं, जो रहने लायक हो सकते हैं। इसका जवाब हैं गोल्डीलॉक्स जोन (Goldilocks Zone) या वासयोग्य क्षेत्र (Habitable Zone) ।
ये ऐसे जोन होते हैं जिनसे होकर गुजरने वाले ग्रहों में जीवन की संभावना हो सकती है। नासा ने कहा है कि यह ऐसा ग्रह है, जो अपनी सतह पर पानी बनाए रखने में सक्षम हो सकता है और भविष्य में M क्लास वाले बौने तारों के आसपास जीवन की संभावना का अध्ययन करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
हाल में एक अध्ययन से पता चला है कि विभिन्न परिस्थितियों में भी कई अरबों वर्षों तक लिक्विड वॉटर, एक्सोप्लैनेट की सतह पर मौजूद रह सकता है। पृथ्वी की तरह जीवन दे सकने वाले एक्सोप्लैनेट की खोज में लिक्विड वॉटर यानी पानी की भूमिका महत्वपूर्ण है। बर्न यूनिवर्सिटी, ज्यूरिख यूनिवर्सिटी और नेशनल सेंटर ऑफ कॉम्पीटेंस इन रिसर्च (NCCR) के रिसर्चर्स ने समझाया है कि रहने योग्य एक्सोप्लैनेट की खोज के लिए इस दृष्टिकोण की बेहद जरूरत है।
इस आर्टिकल में हम रुधिर (Blood) जिसे खून या ब्लड भी कहा जाता है के बारे में बतायेगे | इस आर्टिकल में हम जानेगे कि रुधिर क्या होता है ? रुधिर का शरीर के लिए क्या महत्त्व है ? रुधिर के कार्य क्या है ? रुधिर के प्रमुख घटक कोनसे है ? रुधिर कोशिकाय क्या है ? लाल रुधिर कोशिकाएँ, श्वेत रुधिर कोशिकाएँ, विंबाणु, या प्लेटलेट् क्या होते है ? प्लाज्मा (Plasma) क्या होता है ? हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) क्या होता है ? खून का स्कन्दनयाथक्का कैसे जमता है ? Rh-समूह और रुधिर समूह (Blood Group) क्या होते है ? लसिका क्या है ? आदि |
रुधिर क्या होता है ? (What is Blood)
रुधिर एक लाल, वाहक संयोजी ऊतक (vascular connective tissue) है, जो एक चिपचिपा अपारदर्शी द्रव है। इसकी श्यानता (viscosity) 4.7 तथा क्षारीय प्रकृति (pH 7.54) होती है। ऑक्सीकृत रुधिर चमकीले लाल रंग का होता है, जबकि अनॉक्सीकृत रुधिर गुलाबी नीले रंग का होता है। रूधिर में प्लाज्मा एवं रुधिर कोशिकाएँ होती है |
यह सम्पूर्ण शरीर का लगभग 6-10% भाग बनाता है। एक वयस्क मनुष्य में लगभग 5.8 लीटर रुधिर पाया जाता है। ऊँचे स्थानों पर रहने वाले लोगों में नीचे स्थानों पर रहने वाले लोगों की तुलना में अधिक रुधिर पाया जाता है। रुधिर दो भागों यथा प्लाज्मा और रुधिर कणिकाओं का बना होता है।
उच्च अकशेरुकी , कशेरुकी एवं मानव में पोषक पदार्थो , गैसों , हार्मोन , अपशिष्ट पदार्थों एवं अन्य उत्पादों के परिवहन के लिए रुधिर पाया जाता है जिसे एक पेशीय ह्रदय द्वारा पम्प किया जाता है , इस सम्पूर्ण तंत्र को परिसंचरण तन्त्र कहते है , परिसंचरण तंत्र के निम्न भाग होते है –
(i) रुधिर (ii) ह्रदय (iii) रुधिर वाहिकाएँ (iv) रुधिर (blood)
रुधिर के दो भाग है : (1) द्रव भाग, जिसे प्लाज़्मा कहते हैं और (2) ठोस भाग, जो कोशिकाओं का बना होता है। रुधिर कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं : (1) लाल रुधिर कोशिकाएँ (2) श्वेत रुधिर कोशिकाएँ और (3) विंबाणु, या प्लेटलेट्। प्लाज़्मा में 91 से 92 प्रति शत जल और शेष में (क) सोडियम, पोटैशियम और कैल्सियम, (ख) वसा, (ग) शर्करा, (घ) प्रोटीन आदि होते हैं।
प्लाज्मा (Plasma)
प्लाज्मा पीले रंग का निर्जीव द्रव है, जो हल्का क्षारीय होता है। यह रुधिर के सम्पूर्ण आयतन का लगभग 55-60% भाग होता है।
प्लाज्मा के संघटक
जल – 90-62%
अकार्बनिक लवण – 1-2%
प्लाज्मा प्रोटीन – 6-7%
अन्य अकार्बनिक यौगिक – 1-2%
अवयव
मात्रा
प्रमुख कार्य
1. जल
90%
रुधिर दाब व आयतन बनाए रखना
2. कार्बनिक पदार्थ
(a) एल्बुमिन
45%
परासरण दाब उत्पन्न करना
(b) ग्लोबुलिन
2.5%
परिवहन व प्रतिरक्षी उत्पन्न करना
(c) फाइब्रिनोजन
0.3%
रुधिर स्कंदन
(d) प्रोयोम्बिन
–
रुधिर स्कंदन
(e) ग्लूकोज
0.1%
पोषक पदार्थ , कोशिकीय इंधन
(f) एमीनो अम्ल
0.4%
पोषक पदार्थ
(g) वसा अम्ल
0.5%
पोषक पदार्थ
(h) हार्मोन एंजाइम
–
नियामक पदार्थ
(i) यूरिया , यूरिक अम्ल
0.4%
अपशिष्ट पदार्थ
(j) अकार्बनिक पदार्थ
0.9%
विलेय विभव एवं pH का नियमन करना
प्लाज्मा के कार्य (Function of Plasma)
सरल भोज्य पदार्थों (ग्लूकोज, अमीनो अम्ल आदि) का आँत्र एवं यकृत से शरीर के अन्य भागों से में परिवहन करता है।
यह उपापचयी वर्ज्य पदार्थों; जैसे- यूरिया, यूरिक अम्ल आदि का ऊतकों से वृक्कों (kidney) तक उत्सर्जन हेतु परिवहन करता है।
यह अन्तःस्रावी ग्रन्थि से लक्ष्य अंगों तक हॉर्मोनों का परिवहन करता है।
यह रुधिर का pH स्थिर रखने में सहायक होता है।
प्लाज्मा में उपस्थित रुधिर प्रोटीन एवं फाइब्रिनोजन रुधिर का थक्का जमाने में सहायक होते हैं ।
रुधिर कणिकाए (Blood Corpuscles or Blood Cells)
ये कोशिकाएँ प्लाज्मा में पाई जाती हैं, जो रुधिर प्लाज्मा का 40-45% भाग होती है। रुधिर कणिकाओं का प्रतिशत हीमेटोक्रिट मूल्य (Haematocrit Value) या पैक्ड सैल वॉल्यूम) (Packed Cell Volume) कहलाता है। इसमें तीन कणिकाएँ – लाल रुधिर कणिकाएँ, श्वेत रुधिर कणिकाएँ तथा रुधिर प्लेटलेट्स होती हैं।
लाल रुधिर कणिकाएँ (Red Blood Corpuscles-RBCs)
ये स्तनधारियों के अतिरिक्त सभी कशेरुकियों में अण्डाकार, द्विउत्तल एवं केन्द्रकीय होती हैं। स्तनियों में (ऊँट एवं लामास को छोड़कर) RBCs गोलाकार, द्विअवतल और केन्द्रक विहीन होती हैं। लाल रुधिर कोशिकाएँ लाल रंग की होती हैं। हीमोग्लोबिन के कारण इनका रंग लाल होता है। ये 7.2 म्यू व्यास की गोल परिधि की और दोनों ओर से पैसे या रुपए के समान चिपटी होती हैं। इनमें केंद्रक नहीं होता। वयस्क पुरुषों के रुधिर के प्रति घन मिलीमीटर में लगभग 50 लाख और स्त्रियों के रुधिर के प्रति घन मिलिमीटर में 45 लाख लाल रुधिर कोशिकाएँ होती हैं। इनकी कमी से रक्तक्षीणता तथा रक्त श्वेताणुमयता (Leukaemia) रोग होते हैं। इन्हें इरिथ्रोसाइट्स भी कहते है |
RBCs की अतिरिक्त मात्रा प्लीहा (spleen) में संग्रहित होती है, जो रुधिर बैंक (Blood Bank) की भाँति कार्य करती है। गर्भस्थ शिशु में RBCs का निर्माण यकृत एवं प्लीहा में, जबकि शिशु के जन्म के उपरान्त इसका निर्माण मुख्यतया अस्थि मज्जा (bone-marrow) में होता है। मनुष्य का RBCs का औसत जीवनकाल 120 दिन का, जबकि मेंढक एवं खरगोश के RBCs का औसत जीवनकाल क्रमशः 100 तथा 50-70 दिन होता है।
लाल रुधिर कोशिका का विकास
आधुनिक मत के अनुसार लाल रुधिर कोशिकाओं का निर्माण रक्त परिसंचरण तंत्र के बाहर होता है।सबसे पहले बनी कोशिका हीमोसाइटोब्लास्ट (Haemoctoblast) कहलाती है। पीछे यह कोशिका लाल रुधिर कोशिका में बदल जाती है। भ्रूण में लाल रुधिर कोशिका रुधिर परिसंचरण क्षेत्र में बनती है। पहले इसके मध्य में केंद्रक होता है, जो पीछे विलीन हो जाता है। शिशुओं के मध्यभ्रूण जीवन से लेकर जन्म के एक मास पूर्व तक लाल रुधिर कोशिकाओं का निर्माण यकृत एवं प्लीहा में होता है। शिशु जन्म के बाद लाल रुधिर कोशिकाएँ अस्थिमज्जा में बनती हैं।
हीमोग्लोबिन (Haemoglobin)
RBCs में एक लाल प्रोटीन रंजक हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो एक प्रोटीन ग्लोबिन (96%) तथा रंजक हीम (4-5%) से बना होता है। हीम अणु के केन्द्र में ‘लौह’ होता है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के परिवहन का कार्य करता है । RBCs का रंग वैसे तो पीला होता है, परन्तु हीमोग्लोबिन के कारण लाल दिखाई देता है।
हीमोग्लोबिन ही ऑक्सीजन का अवशोषण करता है और इसको रक्त द्वारा सारे शरीर में पहुँचता है। रुधिर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 14.5 ग्राम प्रतिशत है। अनेक रोगों में इसकी मात्रा कम हो जाती है। हीम (Haem) का सूत्र (C34 H30 N4 O4 FcOH) है। इसमें लोहा रहता है। इसमें चार पिरोल समूह रहते हैं, जो क्लोरोफिल से समानता रखते हैं। इसका अपचयन और उपचयन सरलता से हो जाता है। अल्प मात्रा में यह सब प्राणियों और पादपों में पाया जाता है। हीमोग्लोबिन क्रिस्टलीय रूप से सरलता से प्राप्त हो सकता है।
रुधिर परीक्षा के लिए वयस्क व्यक्ति की अंगुली से या शिरा से रुधिर निकाला जाता है। रुधिर को जमने से बचाने के लिए स्कंदन प्रतिरोधी पदार्थ डालते हैं। इसके लिए प्राय: अमोनियम और पोटैशियम ऑक्सेलेट प्रयुक्त किए जाते हैं।
डबल ऑक्सेलेटेड रुधिर को लेकर, अपकेंद्रित में रखकर, आधे घंटे तक घुमाते हैं। रुधिर का कोशिकायुक्त अंश तल में बैठ जाता है और तरल अंश ऊपर रहता है। यही तरल अंश प्लैज़्मा है।
RBCs की संख्या का निर्धारण हीमोसाइटोमीटर द्वारा किया जाता है। इसकी संख्या WBCs (White Blood Corpuscles) से अधिक होती है।
हेमरेज (Haemorrhage) एवं होमोलाइसिस (Haemolysis) से RBCs की संख्या घट जाती है, जिसे एनिमिया (Anaemia) कहा जाता है। RBCs की संख्या में सामान्य स्तर से अधिक वृद्धि पॉलीसाइमिया (polycythemia) कहलाती है।
श्वेत रुधिर कणिकाएँ (White Blood Corpuscles-WBCs)
इन्हें ल्यूकोसाइट्स भी कहते है | ये आकार में गोल अथवा अमीबाकार, केन्द्रकयुक्त तथा वर्णकविहीन कणिकाएँ होती हैं। WBCs का आकार RBCs से बड़ा, जबकि संख्या में RBCs से कम होती है। ल्यूकीमिया (रुधिर कैंसर) में WBCs की संख्या बढ़ जाती है। इनका निर्माण श्वेत अस्थि मज्जा में होता है , इनमें हिमोग्लोबिन का अभाव होता है परन्तु केन्द्रक उपस्थित होता है , इनकी संख्या 6000 -8000 प्रतिघन मि.मी होती है | WBC की औसत आयु 45 दिन की होती है | ये लाल रुधिर कोशिकाओं से पूर्णतया भिन्न होती हैं। कुछ श्वेत रुधिर कोशिकाओं में कणिकाएँ होती हैं।
श्वेत रुधिर कोशिकाओं में जीवाणुओं के भक्षण करने की शक्ति होती है। संक्रामक रोगों के हो जाने पर इनकी संख्या बढ़ जाती है, पर मियादी बुखार, या तपेदिक हो जाने पर इनकी संख्या घट जाती है। श्वेत रुधिर कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं, एक में कणिकाएँ नहीं होतीं और दूसरी में कणिकाएँ होती हैं। पहले प्रकार को एग्रैन्यूलोसाइट्स (Agranulocytes) और दूसरे प्रकार को ग्रैन्यूलोसाइट्स (Granulocytes) कहते हैं।
एग्रैन्यूलोसाइट्स कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं : (1) लसीकाणु (Lymphocyte) कोशिका और (2) मोनोसाइट (Monocyte) कोशिका। लसीका कोशिकाएँ लघु और विशाल दो प्रकार की होती है। मोनोसाइट कुल श्वेत रुधिर कोशिकाओं की 5 से 10 प्रतिशत तक होती हैं।
ग्रैन्यूलोसाइट कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं : (1) न्यूट्रोफिल्स (Neutrophiles, 60 से 70 प्रतिशत), (2) ईओसिनोफिल्स (Eosinophilesm, 1 से 4 प्रतिशत) और (3) बेसोफ़िल्स (Basophiles 0.5 से 1 प्रतिशत)।
ग्रेन्यूलोसाइट्स (Granulocytes)
ये कोशिकाएँ लाल अस्थि मज्जा में बनती हैं।
ये कुल ल्यूकोसाइट्स की लगभग 65% होती हैं।
ये केन्द्रक के आकार एवं उनके कणों की अभिरंजक क्रियाओं के आधार पर पुनः निम्न प्रकार विभाजित की जा सकती हैं :
न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils)
ये WBCs की कुल संख्या का लगभग 62% होती है।
इनके कोशिकाद्रव्य में महीन कण पाए जाते हैं, जो अम्लीय एवं क्षारीय अभिरंजकों द्वारा अभिरंजित होते हैं तथा बैंगनी रंग के दिखाई देते हैं।
ये शरीर के रक्षक की भाँति कार्य करती हैं
न्यूट्रोफिल्स शरीर की रक्षा, एसिडोफिल्स घावों को भरने, बेसोफिल्स रुधिर का थक्का जमाने, लिम्फोसाइट प्रतिरक्षियों का संश्लेषण तथा मोनोसाइट जीवाणुओं का भक्षण का कार्य करती है।
बेसोफिल्स (Basophils)
ये सायनोफिल्स भी कहलाती हैं।
कोशिकाद्रव्यी कण बड़े होते हैं, जो नीले रंग के दिखाई पड़ते हैं।
ये हिपेरिन एवं हिस्टेमिइन (histamine) को स्रावित कर कोशिकाओं में रुधिर का थक्का जमने से रोकती हैं।
एसिडोफिल्स (Acidophils)
इनका केन्द्रक द्विपालीयुक्त (bilobed) होता है।
एलर्जी में इनकी संख्या बढ़ जाती हैं।
ये घावों को भरने में सहायक होती हैं।
एग्रेन्यूलोसाइट्स (Agranulocytes)
ये कुल WBCs का लगभग 35% भाग होती है।
एग्रेन्यूलोसाइट्स को मोनोसाइट्स (Monocytes) व लिम्फोसाइट्स में विभाजित किया जा सकता है
मोनोसाइट्स (Monocytes)
ये सबसे बड़ी ल्यूकोसाइट्स (WBCs) है।
इनका केन्द्रक अण्डाकार, वृक्क अथवा घोड़े की नाल के आकार का और बाह्य केन्द्रीय होता है।
इनका निर्माण लिम्फनोड एवं प्लीहा में होता है।
ये अत्यधिक चल होती हैं तथा जीवाणु एवं अन्य रोगकारक जीवों का भक्षण करने का कार्य करती हैं।
लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes)
ये ल्यूकोसाइट्स (WBCs) का लगभग 30% भाग बनाती हैं।
इनका केन्द्रक बड़ा और गोल होता है तथा कोशिकाद्रव्य पतली परिधीय परत बनाता है।
ये प्रतिरक्षियों का निर्माण कर शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।
श्वेत रुधिर कोशिकाएँ निम्नलिखित कार्य करती हैं :
(1) आगंतुक जीवाणुओं का भक्षण करती हैं,
(2) ये प्रतिपिंडों की रचना करती हैं,
(3) हिपेरिन उत्पन्न कर रुधिरवाहिकाओं में ये रुधिर को जमने से रोकती हैं,
(4) ये प्लाज्मा प्रोटीन और कुछ कोशिका प्रोटीन की भी रचना करती हैं तथा
(5) हिस्टामिनरोधी कार्य कर शरीर को एलर्जी से बचाने में सहायक होती हैं।
रुधिर प्लेटलेट्स (Blood Platelets)
स्तनधारियों में रुधिर प्लेटलेट्स सूक्ष्म, रंगहीन, केन्द्रकविहीन गोलाकार तथा चक्रिक (discoidal) होती है। मेंढ़क के शरीर के रुधिर में छोटी-छोटी तर्क के आकार की केन्द्रक युक्त कोशिका थ्रोम्बोसाइट होती है। ये मेगाफेरियोसाइट कोशिकाओं की कोशिका द्रव्य टुकड़े होते है, ये अनियमित आकृति की होती है | इनमें केंद्रक का अभाव होता है , इनका निर्माण अस्थि मज्जा में होता है | इनका विनाश यकृत प्लीहा में होता है |
ये प्रति घन मिलीमीटर रुधिर में 2.5 लाख से 5 लाख तक होते हें। इनका आकर 2.5 म्यू होता है। इनका जीवन चक्र चार दिन का होता है। इनके कार्य निम्नलिखित हैं :
(1) ये रुधिर के जमने (स्क्रंदन) में सहायक होते हैं तथा
(2) रुधिरवाहिका के किसी कारणवश टूट जाने पर ये टूटे स्थान पर एकत्र होकर कोशिकाओं को स्थिर करते हैं।
लसीका (Lymph)
यह अर्ध पारदर्शी क्षारीय तरल है, जो रुधिर कोशिकाओं तथा ऊतक के बीच स्थित होता है। इसमें RBCs अनुपस्थित तथा प्लाज्मा प्रोटीन की मात्रा कम होती है। इसमें प्लाज्मा तथा ल्यूकोसाइट पाई जाती है। रुधिर की अपेक्षा इसमें कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोषक पदार्थ एवं ऑक्सीजन की मात्रा कम जबकि CO, एवं अपशिष्ट पदार्थ अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।
लसीका के कार्य (Functions of Lymph)
जल का अस्थायी संचय
अधिशेष जल का अवशोषण
दीर्घाणुओं का परिवहन, जैसे- प्रोटीन, हॉर्मोन आदि को रुधिर परिसंचरण में ले जाता है चूँकि ये अणु रुधिर कोशिकाओं की भित्तियों को नहीं भेद पाते । यही कारण है कि ये अणु सीधे रुधिर परिसंचरण में नहीं पहुँच पाते हैं।
वसा का परिवहन
संक्रमण से सुरक्षा – लिम्फोसाइट की मौजूदगी के कारण होता है ।
लसीका एवं रुधिर में अन्तर
लसिका
रुधिर
लसीका में श्वेत रुधिर कणिकाएँ अधिक संख्या में होती हैं।
रुधिर में श्वेत रुधिर कणिकाएँ लसीका के अनुपात में कम संख्या में होती हैं।
लसीका में फाइब्रिनोजन की मात्रा कम होती है, फिर भी थक्का जमने की शक्ति इसमें निहित होती है।
रुधिर में फाइबिनोजन की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह आसानी के साथ थक्का बन जाता है।
लसीका द्रव रंगहीन होता है।
रुधिर का रंग लाल होता है।
लसीका में लाल रुधिर कणिकाएँ कम संख्या में होती हैं।
रुधिर में लाल रुधिर कणिकाएँ अधिक संख्या में होती हैं।
रुधिर का थक्का बनना, या जमना (रुधिर का स्कन्दन) (Blood Coagution)
रुधिर का रुधिर वाहिकाओं से बाहर आते ही रुधिर के अवयव एक जैल समान संरचना में परिवर्तित हो जाते है , जिसे रक्त स्कंदन कहते है | यह एक सुरक्षात्मक प्रणाली है जो घाव में रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है तथा रुधिर क्षति को रोकती है | सरल शब्रुदों में रुधिर द्रव होता है, पर शरीर से बाहर निकलने पर वह कुछ मिनटों में जम जाता है, जिसे थक्का या रक्त स्कंदनकहते हैं। थक्का बनने के समय का निर्धारण कई विधियों से किया जा सकता है।
रुधिर का थक्का बनने की विधियाँ या प्रक्रिया
रुधिर के जमने में (1) प्रथ्रोम्बिन, (2) कैल्सियम परमाणु, (3) फाइब्रिनोजिन और (4) थ्रांबोप्लास्टिन की आवश्यकता होती है। पहले तीन पदार्थ रक्त में रहते हैं और चौथा प्लेटलेट के टूटने से निकलता है। इनके अतिरिक्त ऐंट्थ्राम्बिन और हिपेरिन भी रहते हैं। ताप के नीचा होने और कैल्सियम को निकाल लेने से तथा जल मिलाकर रुधिर के पतला कर देने से रुधिर का जमना रुक जाता है। मैग्नीशियम तथा सोडियम सल्फेट को मिलाने से तथा हिपेरिन, जोंकसत और डिकूमेरिन आदि रुधिर के जमने में बाधक होते हैं। रुधिर के शीघ्र जमने में ऊष्मा, थ्रांबीन, ऐड्रीनलीन, कैल्सियम क्लोराड तथा विटामिन के (k) से सहायता मिलती है।
जब किसी कटे हुए भाग से रुधिर बाहर निकलता है, तब यह जैली के रूप में कुछ ही मिनटों में जम जाता है। इसे स्कन्दन कहते हैं। रुधिर के थक्का बनने की क्रिया एक जटिल क्रिया है। जब किसी स्थान से रुधिर बढ़ने लगता है और यह वायु के आता है, तो रुधिर में उपस्थित थ्रॉम्बोसाइट्स टूट जाती है तथा इससे एक विशिष्ट रासायनिक पदार्थ मुक्त होकर रुधिर के प्रोटीन से क्रिया करता है तथा प्रोथॉम्बोप्लास्टीन नामक पदार्थ में बदल जाता है। यह प्रोथॉम्बोप्लास्टीन रुधिर के कैल्शियम आयन से क्रिया करके थ्रॉम्बोप्लस्टीन बनाती है। थॉम्बोप्लास्टीन, कैल्शियम आयन (Ca+) तथा ट्रिपटेज नामक एन्जाइस के साथ क्रिया करके निष्क्रिय प्रोथॉम्बिन को सक्रिय थ्रॉम्बीन नामक पदार्थ में परिवर्तित कर देती है।
यह सक्रिय थ्रॉम्बिन रुधिर के प्रोटीन फाइब्रिनोजेन पर क्रिया करता है और उसे फाइब्रिन में परिवर्तित कर देता है। फॉइब्रिन बारीक एवं कोमल तन्तुओं का जाल होता है। यह जाल इतना बारीक एवं सूक्ष्म होता है कि इसमें रुधिर के कण, विशेषकर RBC, फँस जाते हैं और एक लाल ठोस पिण्ड-सा बन जाता है। इसे रुधिर थक्का कहते हैं। थक्का बहने वाले रुधिर को बन्द कर देता है। रुधिर स्कन्दन के बाद कुछ पीला-सा पदार्थ रह जाता है जिसे सीरम कहते हैं। सीरम का थक्का नहीं बन सकता क्योंकि इसमें फाइब्रिनोजन नहीं होता हैं। रुधिर में प्रायः एक प्रति स्कन्दन होता है जिसे हिपेरिन कहते हैं। यह प्रोथॉम्बिन के उत्प्ररेण को रोकता है। इसी कारण शरीर में बहते समय रुधिर नहीं जमता।
रुधिर के थक्का बनने के दौरान होने वाली महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया; थ्रॉम्बोप्लास्टिन + प्रोथॉम्बिन + कैल्शियम = थ्रॉम्बिन; थ्रॉम्बिन + फाइब्रिनोज़न = फाइब्रिन; फाइब्रिन + रुधिर रुधिराणु = रुधिर का थक्का
रुधिर वाहिका से निकाले गए रुधिर को जमने से बचाने के लिए उसमें थोड़ा-सा ऑक्जेलेट (सोडियम अयदा पोटैशियम ऑक्जेलेट) मिलाया जाता है।
रुधिर समूह (Blood Groups)
रुधिर समूह के खोजकर्ता कार्ल लैण्डस्टीनर थे, जिन्होंने 1902 में इसकी खोज की थी। रुधिर को चार समूहों में बाँटा गया है (i) समूह-A (ii) समूह-B (iii) समूह- AB एवं (iv) समूह – O
रुधिर समूह-A (Blood Group A) – इसमें प्रतिजन – A तथा प्रतिरक्षी – b पाए जाते हैं।
रुधिर समूह-B (Blood Group-B) – इसमें प्रतिजन – B तथा प्रतिरक्षी – a पाए जाते हैं। रुघिर समूह – AB (Blood Group-AB) इसमें प्रतिरक्षी अनुपस्थित रहता है तथा एन्टीजन- AB रहता है। इस समूह के व्यक्ति किसी भी समूह का रुधिर प्राप्त कर सकता है। इसलिए, इसे सर्वग्राही रुधिर समूह (Universal Blood Recipient) कहते हैं।
रुधिर समूह-O (Blood Group-O) – इसके खोजकर्ता डी कास्टलो तथा स्टल थे। इसमें प्रतिरक्षी-ab उपस्थित रहता है। लेकिन प्रतिजन अनुपस्थित रहता है। इस समूह का व्यक्ति किसी भी समूह को रुधिर प्रदान कर सकता है। इसलिए, इसे सर्वदाता समूह (Universal Blood Donor) कहते हैं।
एक रुधिर वर्ग के व्यक्ति को उसी वर्ग का रक्त दिया जा सकता है। दूसरे वर्ग का रक्त देने से उस व्यक्ति की लाल रुधिर कोशिकाएँ अवक्षिप्त हो सकती हैं। पर समान वर्ग का रक्त देने से अवक्षेपण नहीं होता। दूसरे वर्ग का रक्त देने से व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। दुर्घटना में कही कट जाने से, या शल्य कर्म में कभी कभी इतना रक्तस्राव होता है कि शरीर में रक्त की मात्रा बहुत कम हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। ऐसी दशा में रोगी के शरीर में रुधिर पहुँचाने से उसकी प्राणरक्षा संभव होती है। उस समय रुधिरपरीक्षा द्वारा रोगी का रुधिर वर्ग मालूम कर, उसी वर्ग के रुधिरवाले मनुष्य का रुधिर लेकर, रोगी को दिया किंतु ओ (O) वर्ग का रुधिर ऐसा होता है कि उसको अन्य वर्गों के व्यक्ति ग्रहण कर सकते हैं। इस कारण ओ (O) वर्ग के रुधिर वाले व्यक्ति सर्वदाता (Universal Donors) कहे जाते हैं। एबी (AB) वर्ग के रुधिरवाले व्यक्ति अन्य सब वर्गों का रुधिर ग्रहण कर सकते हैं। इसलिए ये व्यक्ति सर्वग्रहणकर्ता (Universal Receipients) कहे जाते हैं। रक्त में आर, एच (Rh) तत्व भी होता है, जिसकी परीक्षा भी आवश्यक है।
रुधिर समूह
लाल रुधिर कणिका में प्रतिजन
प्लाज्मा में उपस्थित प्रतिरक्षी
रक्तदान की संभावना
A
A
b
A तथा AB वर्ग के रक्तदान कर सकता है।
B
B
a
B तथा AB वर्ग को रक्तदान कर सकता है।
AB
A तथा B
कोई नही
किसी भी वर्ग का रुधिर प्राप्त (सर्वग्राही) कर सकता है, परन्तु केवल AB वर्ग के व्यक्ति को ही रक्तदान कर सकता है।
O
कोई नही
तथा
किसी भी वर्ग को रक्तदान (सर्वदाता) कर सकता है, परन्तु o से ही रुधिर प्राप्त कर सकता है।
मानव में रुधिर आधान (Blood Transfusion in Human Being)
मनुष्य के रुधिर समूहों में सामान्यतया कोई भी रुधिर – अभिश्लेषण (agglutination) नहीं होता। इसका कारण यह है कि किसी भी रुधिर समूह में अनुरूप (corresponding) प्रतिरक्षी एवं प्रतिजन उपस्थित नहीं होते अर्थात् प्रतिजन A के साथ प्रतिरक्षी-a, एन्टीजन-B के साथ प्रतिरक्षी – b उपस्थित नहीं होते।
यदि किसी रुधिर समूह के रुधिर को किसी ऐसे रुधिर वर्ग के रुधिर में मिश्रित कर दिया जाए जिसमें अनुरूप प्रतिजन एंव प्रतिरक्षी उपस्थित हैं, तब रुधिर की लाल कोशिकाओं का अभिश्लेषण हो जाएगा।
उदाहरण, A रुधिर समूह के रुधिर का, B रुधिर समूह के रुधिर में मिश्रण कर दें, तो रुधिर कोशिकाओं का अभिश्लेषण हो जाएगा। इसमें लाल रुधिर कोशिकाएँ एक-दूसरे से चिपक जाती हैं।
इस प्रकार के चिपकाव के फलस्वरूप रुधिर वाहिनियों में अवरोध उत्पन्न हो जाता है एवं प्राणी की मृत्यु हो जाती है। अतः रुधिर आधान में एन्टीजन एवं प्रतिरक्षी का ऐसा ताल-मेल करना चाहिए, जिससे रुधिर का अभिश्लेषण न हो सके।
हीमोग्लोबिन की मात्रा पुरुषों में 2.5-17.5 ग्राम / 100 घन सेमी तथा स्त्रियों में 11.5-16.6 ग्राम / 100 घन सेमी होती है। रुधिर में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है परन्तु लसीका में कम होती है। ब्लड बैंक में रुधिर 10°C पर सुरक्षित रहता है।
Rh कारक (Rh-factor)
1940 में लैण्डस्टीनर और वीनर ने रुधिर में एक अन्य प्रकार के प्रतिजन का पता लगाया। इन्होंने इस प्रतिजन की खोज रीसस नामक बन्दर में की थी। इसलिए, इस प्रतिजन का नामकरण Rh कारक (Rh-factor) किया गया।
जिन व्यक्तियों के रुधिर में यह तत्व पाया जाता है, उनका रुधिर Rh सहित (Rh+) कहलाता है तथा जिनके रुधिर में नहीं पाया जाता, उनका रुधिर Rh रहित (Rh–) कहलाता है। रुधिर आधान के समय Rh-कारक की भी जाँच की जाती है। Rh+ को Rh+ का रुधिर ही दिया जाता है। यदि Rh+ रुधिर वर्ग का रुधिर Rh– रुधिर वर्ग वाले व्यक्ति को दिया जाए, तो प्रथम बार कम मात्रा होने के कारण कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। किन्तु, जब दूसरी बार यदि इसी प्रकार रक्ताधान किया जाएगा तो रुधिर अभिश्लेषण के कारण Rh– रुधिर वर्ग वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी।
यदि पिता का रुधिर Rh+ हो तथा माता का रुधिर Rh– हो तो जन्म लेने वाले शिशु की जन्म से पहले गर्भावस्था में अथवा जन्म के तुरन्त बाद मृत्यु हो जाती है। ऐसा प्रथम सन्तान के जन्म के समय होता है। इस बीमारी को इरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस (Erythroblastosis Foetalis) कहते हैं।
विभिन्न समूह वाले माता-पिता से उत्पन्न होने वाले बच्चों के सम्भावित रुधिर समूह
इजरायल के एक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की अगुवाई में शोधकर्ताओं की टीम ने पृथ्वी वाले सौर मंडल के दायरे से काफी बाहर मौजूद दूसरी दुनिया में टेलीस्कोप के माध्यम से जाकर दो विशाल ग्रहों का पता लगाया है। ये इतने विशाल ग्रह हैं कि अपने बृहस्पति ग्रह के आकार के बराबर हैं। जानते हैं इन दोनों नए ग्रहों और उनकी खोज के बारे में।
आकाशगंगा की दूसरी दुनिया में दो नए ग्रहों की खोज
इजरायल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की अगुवाई में वैज्ञानिकों की एक टीम ने मिल्की वे आकाशगंगा के अंदर सौर मंडल के दूरस्थ क्षेत्र में दो नए ग्रहों की खोज की है। इन्होंने यूरोपीय स्पेस एजेंसी और इसकी गैया स्पेसक्राफ्ट की टीमों के साथ सहयोग से शोध के हिस्से के रूप में गैया-1 बी और गैया -2 बी नाम से इन दोनों विशाल ग्रहों की पहचान की है। ऐसा पहली बार हुआ है कि गैया स्पेसक्राफ्ट ने सफलतापूर्वक दो नए ग्रहों को खोज निकाला है।
आकाशगंगा के 3डी मैप तैयार करने के मिशन के दौरान मिली सफलता
गैया एक तारा सर्वेक्षण उपग्रह है। इसे आकाशगंगा के 3डी मैप तैयार करने के मिशन पर भेजा गया है। इसकी सटीकता को अभूतपूर्व रखने की कोशिश की गई है, इतनी सटीक कि कोई पृथ्वी पर खड़े होकर भी चांद पर मौजूद 10-शेकेल (यहूदियों का प्राचीन सिक्का) सिक्कों की पहचान कर ले। इस शोध के परिणाम को साइंटिफि जर्नल एस्ट्रोनॉमी और ऐस्टेरफिजिक्स में प्रकाश किया गया है। इस खोज के अगुवा और तेल अवीव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाय जुकर ने कहा, ‘दो नए ग्रहों की खोज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सूक्ष्म छानबीन के दौरान की गई।
40 और ग्रहों की हो सकती है खोज
दोनों नए ग्रहों को उनके आकार और उनके मेजबान तारों से निकटता की वजह से ‘हॉट जुपिटर’ कहा गया है। प्रोफेसर जुकर के मुताबिक, ‘अमेरिका में हमने टेलीस्कोप से जो माप किए, उससे इसकी पुष्टि हुई कि ये असल में दो विशाल ग्रह थे, जो हमारे सौर मंडल में बृहस्पति ग्रह के आकार जैसे थे, और अपने सूर्य के इतने पास मौजूद थे कि चार दिनों से भी कम समय में एक कक्षा पूरी कर लेते थे। इसका मतलब हुआ कि प्रत्येक पृथ्वी वर्ष उस ग्रह के 90 वर्ष के बराबर होता है।’ उन्होंने कहा, ‘हमने 40 और कैंडिडेट के बारे में भी प्रकाशित किया है, जिन्हें हमने गैया के माध्यम से पता लगाया है। खगोलीय समुदाय को अब इन ग्रहों की प्रकृति की पुष्टि करने की कोशिश करनी होगी, जैसा कि हमने पहले दो कैंडिडेट के लिए किया।’
1995 में पहली बार हुई थी दूसरी दुनिया के ग्रह की खोज
हमारा सौर मंडल सूर्य और उसके आठ ग्रहों से बना है। जबकि, आकाशगंगा में हजारों दूसरे अज्ञात और कम ज्ञात ग्रह मौजूद हैं, जो अनगिनत सौर मंडल शामिल हैं। दूरस्थ सौर मंडल में पहला ग्रह 1995 में खोजा गया था। यही वजह है कि इनके बारे में जानने-समझने को लेकर खगोलविदों की ओर से एक सतत प्रयास जारी है; और उसी का परिणाम है कि इन दो नए और विशाल ग्रहों के बारे में पता चल पाया है।
जीवन के लक्षण को लेकर अनुमान क्या है ?
सवाल है कि जो बृहस्पति के आकार वाले दोनों नए ग्रहों का वैज्ञानिकों ने पता लगाया है, वहां जीवन के लक्षण मिलने की कितनी संभावनाएं हैं? इस रिसर्च में शामिल रेमंड के डॉक्टरेट के एक छात्र एवियाद पान्ही ने बताया, ‘नए ग्रह अपने सूर्य के बहुत ही करीब हैं और इसलिए वहां का तापमान बहुत ही ज्यादा है, करीब 1,000 डिग्री सेल्सियस, इसलिए वहां जीवन के विकसित होने की संभावना शून्य है।’
पृथ्वी लगातार जलवायु परिवर्तन, भयानक सूखा, तूफान, हीट वेव और ग्लेशियर की वजह से समुद्री जलस्तर बढ़ने जैसे विनाश को झेल रही है और इस विनाश को रोकने के लिए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी के बीच ‘स्पेस बबल्स‘ बनाने का प्रस्ताव दिया है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि, सूरज और पृथ्वी के बीच एक विशालकाय बुलबुले (Space Bubbles) का निर्माण किया जाए, ताकि सूरज से धरती की तरफ आने वाली भयानक रेडिएशन को धरती पर पहुंचने से रोका जा सके।
ब्राजील के आकार का बुलबुला
वैज्ञानिकों की इस इस जियोइंजीनियरिंग के विचार के मुताबिक, ब्राजील के आकार के एक गोलाकार बुलबुले, जिसे वैज्ञानिक भाषा में इन्फ्लेटेबल बुलबुला (Inflatable Bubbles) कहा जाता है, उसका निर्माण पृथ्वी और सूर्य के बीच किया जाएगा, ताकि रेडिएशन को हमारे ग्रह से टकराने से रोका जा सकेगा। वैज्ञानिकों की टीम ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि, ‘हम सूरज और पृथ्वी के बीच स्पेस बबल का निर्माण करना चाहते हैं, जिसे लिक्विड सिलिकॉन (Liquid Silicon) से बनाया जाएगा और उसे विशालकाय बुलबुला बनाकर सूरज और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि, ऐसा करने से सूरज से आने वाली रेडिएशन की किरणें परावर्तित हो जाएंगी और हमें अंतरिक्ष में बड़ी बड़ी फिल्म लांच करने की भी जरूरत नहीं होगी।
क्या जलवायु परिवर्तन से निपट पायेगा यह बुलबुला
वैज्ञानिकों का मानना है कि, सूरज से आने वाले रेडिएशन को इस स्पेस बुलबुले के जरिए पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता है, हां उसे रेडिएशन को कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के मौजूदा प्रयासों को रिप्लेस कर देगा। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो भी मौजूदा उपाए किए जा रहे हैं, उनमें से ये सबसे ज्यादा बेहतर है।
सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता
अंतरिक्ष में किया गया टेस्ट शोधकर्ताओं का कहना है कि, ये एक तरह से सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता बनाने जैसा है, जो रेडिएशन को बहुत हद तक रोक सकेगा। वहीं, एमआईटी की सेंसेबल सिटी लैब के मुताबिक, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुले का टेस्ट किया जा चुका है और एमआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि, आने वाले दिनों में सूरज के रेडिएशन को रोकने के लिए अंतरिक्ष बुलबुलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अंतरिक्ष में किया जाने वाला ये उपाए आने वाले दिनों में काफी सुरक्षित होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर हम धरती पर टकराने से पहले 1.8 प्रतिशत सौर रेडिएशन को परावर्तित कर देते हैं, तो हम आज की ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से उलट सकते हैं।
बुलबुलों को कभी भी किया जा सकता है खत्म
एमआईटी वैज्ञानिकों की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच जिस बुलबुले का निर्माण किया जाएगा, उसे कभी भी नष्ट किया जा सकता है। इससे सौर जियोइंजीनियरिंग समाधान पूरी तरह से प्रतिवर्ती हो जाएगा और अंतरिक्ष मलबे को काफी कम कर देगा।’ वैज्ञानिकों ने कहा कि, पृथ्वी और सूर्य के बीच का वो क्षेत्र, जहां जेम्स वेब टेलीस्कॉप स्थिति है, वहां पर अंतरिक्ष बुलबुले को रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, सूरज से निकलने वाले रेडिएशन को परावर्तित करने के लिए वो सबसे सही स्थान है।
जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है प्रयोग
स्पेस बबल्स रिसर्च प्रोजेक्ट वैज्ञानिक जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है, जिन्होंने पहले लैग्रैंगियन पॉइंट (Lagrange Point) पर एक डिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट को तैनात करने का सुझाव दिया था, और खगोलविद रोजर एंजेल, जिन्होंने बबल-बेड़ा का प्रस्ताव रखा था। हालांकि जियोइंजीनियरिंग एक साइंस फिक्शन फिल्म की तरह लगती है, लेकिन इसका इस्तेमाल वास्तविक दुनिया में किया जा रहा है। पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने 122 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान को कम करने के लिए दुबई में बारिश बनाने के लिए जियोइंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया था। बादल का निर्माण ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किया गया था, जिसमें बारिश करवाने के लिए बिजली का झटका दिया गया था।
महासागरों में जियोइंजीनियरिंग का प्रस्ताव 2021 में जारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन (NASEM) की एक रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए पृथ्वी के महासागरों को जियोइंजीनियरिंग करने का प्रस्ताव दिया था। इस आइडिया के तहत छोटे प्रकाश संश्लेषक के विकास को बढ़ाने के लिए उर्वरक जोड़ना, क्षारीयता को बढ़ावा देने के लिए पानी के माध्यम से विद्युत धाराओं को पारित करना और समुद्री जल के कैमिकल साइंस को बदलना शामिल है। स्कॉट डोनी, जो वर्जीनिया विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान में प्रोफेसर हैं और इस रिपोर्ट के लेखक हैं, उन्होंने एक बयान में कहा कि, ‘महासागर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की रणनीतियों पर पहले से ही वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और द्वारा चर्चा की जा रही है। संभावित जलवायु प्रतिक्रिया रणनीतियों के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है’।
अंतरिक्ष पर्यटन (Space Tourism) के साथ अब विमानन (Aviation) के क्षेत्र में क्रांतिकारी आविष्कारों की तैयारी हो रही है| कई कंपनियां आधुनिक तकनीक से युक्त विमान विकसित कर रही हैं जो जीवाश्वम ईंधन पर नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक मोटर (Electric Motors) की ताकत के जरिए उड़ सकेंगे | कुछ कंपनियां तो इस दशक में ही इस तरह के विमानों का व्यवसायिक उपयोग शुरू करने की योजना बना रहे हैं |
दुनिया में अभी अंतरिक्ष पर्यटन की बातें तो होने लगी हैं | अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ता ऐसा रॉकेट विकसित करने में लगे हैं जिससे लोगों को अंतरिक्ष में पहुंचाने की लागत बहुत कम हो सके | इस लिहाज से देखा जाए तो हमारा विमानन या उड्डयन (Aviation) का क्षेत्र भी पीछे नहीं रहा हैं | विशेषज्ञ विमान तकनीक में नए नवाचारों पर काम रहे हैं जिसमें व्यवसायिक विद्युतीय विमानन (Electrical Aviation) भी शामिल है |
इनमें से फैराडेयर एविएशन (Faradair Aviation) का हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान (Hybrid Electric Passenger Plane), राइट इलेक्ट्रिक का विमान (Wright Electric is an American startup company developing an electric airliner), इजराइल का ईविएशन का एलिस (Eviation Alice), जैसे विमानों पर काम चल रहा है| फैराडेयर कंपनी एक हाइब्रिड-इलेक्ट्रिक विमान की अवधारणा विकसित कर रही है जो क्षेत्रीय उड़ान विकास में बाधा डालने वाली तीन मुख्य समस्याओं (संचालन लागत(Operation Costs), उत्सर्जन (Emissions ), शोर (Noise) को हल करती है।
फैराडेयर का विमान (Faradair’s plane)
यूके में एक स्टार्टअप इसी व्यवसायिक इलेक्ट्रिफाइट एविएशन पर काम कर रहा है| क्षेत्रीय विमानन बाजार को देखते हुए फैराडेयर एविएशन कंपनी एक हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान को विकसित पर बेचने की योजना पर काम कर रही है| इसमें 19 सीटें होंगी और इसके पंखों को चलाने के ले इलेक्ट्रिक मोटर ही काफी होगी| इसके लिए जरूरी बिजली एक छोटे से गैसे टर्बाइन से आएगी|
विमान की विशेषता
इतना ही नहीं अतिरिक्त उठाव के लिए और छोटी हवाई पट्टी पर उड़ान भरने और उतरने के लिए भी इन विमानों में त्रिस्तरीय पंख होंगे इनसे शानदार एरोडायनामिक्स होने के बाद भी वे वर्ल्ड वार वन फाइटर प्लेन के जैसे दिखाई देते हैं| कंपनी के प्रमुख नील क्लॉग्ले का दावा है कि ऐसे विमानों में परम्परागत प्रोपेलर की तुलना में हिलने वाले कम पुर्जे होंगे| इससे वह सस्ता होने के साथ ज्यादा शांत और कम उत्सर्जन पैदा करने वाला विमान होगा|
विमानों का उपयोग
इस तरह के किफायती विमानों पर काम केवल यात्रियों के लिए ही नहीं बल्कि माल ढोने वाले विमानों पर भी चल रहा है| ऐसे विमान रेलवे लाइन बिछाने या सड़क बनाने के खर्चे को भी बचा सकते हैं| फैराडेयर 2025 तक इस तरह के विमान की उड़ान शुरू कर सकता और 2027 से उनका व्यवसायिक उपयोग भी शुरू हो जाएगा|
कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक (Wright Electric) का plane
लेकिन इस क्षेत्र में केवल फैराडेयर ही अकेली कंपनी नहीं है| कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक भी 100 सीटों वाला पूरी तरह से इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट बनाने की तैयारी में है और इस सदी के मध्य में लोगों को उपलब्ध कराने की भी तैयारी कर रही है| यह विमान वर्तमान बे146 पर आधारित होगा जिसके टर्बोफैन इंजन की जगह इलेक्ट्रिक मोटर होंगी| कंपनी की ईजीजेट से साझेदारी भी होगी और यह लंदन –पेरिस, न्यूयॉर्क वॉशिंगटन या हॉन्गकॉन्ग ताईपेई के बीच एक घंटे वाली उड़ान भी मुहैया कराएगी|
हाइब्रिड से इलेक्ट्रिक तक का सफ़र
ये विमान अभी हाइब्रिट विमान की तरह ही होंगे जिसमें केवल चार इंजन को ही इलक्ट्रिक मोटर से बदला जाएगा| और बाकियों को सफल परीक्षणों के बाद ही बदला जाएगा| कंपनी का कहना है कि इससे ग्राहकों में एक विश्वास विकसित करने में मदद मिलेगी| कार उद्योग भी इस तरह से बदलाव ला रहा है| लेकिन विमानन में बैटरी का उपयोग एक बड़ी चुनौती है|
इजराली ईविएशन कंपनी का विमान
इजराइल की एक कंपनी ईविएशन एक नौ सीटों वाला विमान विकसित कर रही है| छोटी श्रेणी का यह विमान कई सालों से विकसित किया जा रहा है| इसे 600 मील तक की उड़ान के लिए डिजाइन किया गया है और यह पूरी तरह से इलेक्ट्रिक है| वहीं विशाल हाइब्रिड विमान 500 किलोमीटर की दूरी तय कर सकेंगे|
यूरोपीय विमानन कंपनी एयरबस ने 2017 वमें अपने प्रोटोटाइप हाइब्रिड विमान ई-फैन एक्स पर काम करना शुरू किया था| यह राइट इलेक्ट्रिक्स के BAe 146 पर आधारित था| लेकिन तीन साल बाद इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया| इसके अलावा एयर बस हाइड्रोजन ऊर्जा के उपयोग पर भी काम कर रही है| कंपनी की टीम क्रायोजेनिक और सुपरकंडक्टिंग तकनीकों पर काम रही हैं| कंपनी का लक्ष्य साल 2035 तक हाइड्रोजन आधारित व्यवसायिक उड़ान भरने का है|
गुरुत्व के नए सिद्धांत (New Gravity Theory) के बारे में दावा किया गया है कि इसके जरिए खगोलीय परिघटनाओं की पूरी व्याख्या की जा सकती है और डार्क मैटर (Dark Matter) जैसे किसी अदृश्य पदार्थ के अस्तित्व की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian Dynamics) नाम का यह सिद्धांत गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या के साथ उसका पूर्वानुमान तक लगा सकता है जिसके लिए अभी तक वैज्ञानिक डार्क मैटर को जिम्मेदार बता रहे थे |
पिछले कुछ दशकों से विज्ञान जगत में डार्क मैटर (Dark Matter) की खूब चर्चा रही है | अभी तक इसके अस्तित्व सिद्ध किए बिना ही कई परिघटनाओं की व्याख्या में इसका उपयोग हुआ है | डार्क मैटर के बारे में बताया जाता है कि यह अदृश्य पदार्थ प्रकाश से तो अप्रभावित होता है, लेकिन गुरुत्व से नहीं | नई समीक्षा में वैज्ञानिकों ने सुझाया है कि विभिन्न पैमानों पर किए गए व्यापक अवलोकन बताते हैं कि गुरुत्व का एक वैकल्पिक सिद्धांत (New Gravity Theory), जिसे मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian dynamics) या मोंड भी कहते है, सभी परिघटनाओं की व्याख्या कर सकता है जिसके लिए डार्क मैटर जैसे अदृश्य की जरूरत ही नहीं होगी |
डार्क मैटर की अवधारणा
न्यूटन के भौतिकी के नियम सौरमडंल के ग्रहों की चाल तो सटीकता से बता पाते हैं, लेकिन 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसा गैलेक्सी की चक्रिका (Galaxy Discs) के साथ नहीं हो रहा है | बाहरी किनारे पर तारों की घूमने की गति न्यूटन के सिद्धांत के द्वारा बताई गई गति से कहीं ज्यादा थी | यहीं से डार्क मैटर की अवधारणा आई जिसे उस अतिरिक्त गुरुत्व खिंचाव के लिए जिम्मेदार माना गया जो तारों को गति प्रदान कर रहा था |
गुरुत्व और डार्क मैटर
गुरुत्व का यह नया सिद्धांत 40 साल पहले इजराइली भौतिकविद मोर्डेहाई मिलग्रोम ने दिया था | बताया जा रहा है कि यह सिद्धांत डार्क मैटर की आवश्यकता को खत्म कर देगा | मोंड सिद्धांत में मूलतः बताया गया है कि जब गुरुत्व बहुत ही कमजोर हो जाती है, जैसा की गैलेक्सी के किनारों पर होता है, तब वह न्यूटन की भौतिकी से अलग बर्ताव करने लगती है | इस तरह से इसकी व्याख्या करना संभव हो सकेगा कि 150 गैलेक्सी के किनारों पर तारे, ग्रह और गैस आदि तेजी से क्यों घूमते हैं |
मानक प्रतिमान से बेहतर?
इससे भी खास बात यह है कि मोंड केवल घूर्णन वक्र की ही व्याख्या नहीं करता है, बल्कि इससे कई मामलों में सही पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है विज्ञान के दार्शनिकों का कहना है कि मोंड की पूर्वानुमान लगाने की यह क्षमता उसे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान (standard cosmological model) से ऊपर उठा देता है जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड में दिखाई देने वाला यानि सामान्य पदार्थ की तुलना में डार्कमैटर ज्यादा है | इस प्रतिमान के अनुसार गैलेक्सी में अनिश्चित लेकिन बहुत ही ज्यादा पदार्थ होता है. जिससे गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या नहीं हो सकती है |
मोंड के सटीक पूर्वानुमान
गैलेक्सी के किनारे के पिडों की घूमने की गति की व्याख्या के ना होने की जिम्मेदार डार्क मैटर को ही बताया जाता रहा है | लेकिन मोंड के अभी तक के पूर्वानुमानों की पुष्टि तक होती रही है | जहां सामान्य पदार्थ के वितरण के आधार पर गैलेक्सी के किनारों के घूर्णन की गति 100 और 300 किलोमीटर प्रतिघंटा का अनुमान लगा पता है, मोंड इसे 180-190 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति बताता है और बाद में अवलोकन करने में पता चलता है कि वास्तविक घूर्णन की गति 188 किलोमीटर प्रतिघंटा है, तो साफ है कि ऐसे में मोंड सिद्धांत को ही प्राथमिकता दी जाएगी |
मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की कमजोरी
मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की सबसे बड़ी नाकामी गैलेक्सी बार से संबंधित है जो तारों का बनाया छड़ के आकार के इलाके होते हैं | ये इलाके सर्पिल गैलेक्सी के केंद्रीय इलाके में पाए जाते हैं | यह छड़ समय के साथ घूर्णन करती है. यदि गैलेक्सी में विशालकाय भार डार्क मैटर मौजूद है तो उनके बार या छड़ों की गति धीमी हो जानी चाहिए, लेकिन बहुत सी गैलेक्सी के अवलोकनों में पाया गया है कि ये छड़े बहुत तेज हैं | इससे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान पर विश्वास काफी कम हो जाता है | डार्क मैटर (Dark Matter) की गैलेक्सी में उपस्थिति कई परिघटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाती है |
डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव
डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव तो होता है, लेकिन वे समान्य पदार्थ के गुरुत्व से प्रभावित नहीं होते हैं | इससे गणना में तो आसानी होती है, लेकिन यह वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती है | जब इसे बाद में सिम्यूलेशन के लिए उपयोग में लाया गया तो भी विशेषताओं की सही व्याख्या नहीं हुई. इसके अलावा मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान में कई और भी खामियां पाई गई हैं |
लेकिन कनवरसेशन में प्रकाशित लेख में वैज्ञानिकों ने मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान और मोंड के खगोलीय अवलोकनों के परिपेक्ष्य में परीक्षण के लिए ओकाम के रेजर की अवधारणा का उपयोग किया | जिसके मुताबिक मानदंडों से मुक्त एक सिद्धांत ज्यादा आकड़ों से संगत होता है जिससे वह और जटिल हो जाता है | इसकी व्याख्या लिए उन्होंने सैद्धांतिक लचीलेपन की भी अवधारणा दी | बहराल मोंड का सिद्धांत अवलोकनों से मेल खाता हुआ संगत दिखाई देता है लेकिन अभी डार्कमैटर या मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान को खारिज करना शायद जल्दबाजी हो |
वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीवाणु (Bacteria) की खोज की है, जो नंगी आंखों से भी दिखता है। अगर इंसान से तुलना करें तो इसका आकार दूसरी बैक्टीरिया के मुकाबले इतना ही विशालकाय है, जैसे मानव के लिए माउंट एवरेस्ट। गौरतलब है कि बैक्टीरिया से पृथ्वी का बहुत ही नजदीकी रिश्ता है। इंसान के शरीर में अनगिनत बैक्टीरिया होते हैं। ऐसा पहली बार हुआ है, जब इतना बड़ा बैक्टीरिया मिला है, जिसे हम बिना माइक्रोस्कोप की मदद से भी देख सकते हैं।
थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica)की खोज
कैरिबियन द्वीप समूह में मैंग्रोव के दलदल में दुनिया का सबसे विशाल बैक्टीरिया की खोज की गई है। वैज्ञानिकों को यह भी अनुमान लग रहा है कि किस वजह से इस बैक्टीरिया ने इतना विशाल आकार विकसित किया होगा। इस बैक्टीरिया को थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica) नाम दिया गया है, जो ज्यादातर जीवाणुयों की तुलना में 5,000 गुना विशाल है। जबकि, अबतक जितने भी विशाल बैक्टीरिया की जानकारी है, उनसे भी यह 50 गुना ज्यादा बड़ा है (इसके नाम में मैग्निफिका का संदर्भ लैटिन में ‘बड़ा’ और फ्रेंच शब्द मैग्निफिक्यू से है)।
इस शोध के लीड ऑथर और कैलिफोर्निया के मरीन बायोलॉजिस्ट जीन-मैरी वोलैंड ने इसकी विशालता के बारे में कहा कि, ‘इसका संदर्भ देखने के लिए, इसे ऐसे समझा जा सकता है, जैसे एक इंसान का सामना माउंट एवरेस्ट के रूप में दूसरे इंसान से होता है।’ दरअसल, इसकी सबसे बड़ी विशेषता ही यही है कि किसी भी बैक्टीरिया को देखने के लिए माइक्रोस्कोप की आवश्यकता होती है, लेकिन यह इतना अनोखा है कि इसे नंगी आंखों से भी देखा जा सकता है।
करीब एक सेंटीमीटर है थियोमार्गरीटा मैग्निफा की लंबाई
थियोमार्गरीटा मैग्निफा का आकार लगभग इंसान के पलकों जितनी है और यह करीब एक सेंटीमीटर लंबा है। एक सामान्य बैक्टीरिया प्रजाति की लंबाई 1 से 5 माइक्रोमीटर होती है। जबकि, इस प्रजाति की औसत लंबाई 10,000 माइक्रोमीटर है। इनमें से कुछ तो इससे भी करीब दोगुनी हैं। बैक्टीरिया एक कोशिका वाला जीव है, जो धरती पर हर जगह मौजूद है। कुछ तो पारिस्थितिक तंत्र और अधिकांश जीवित चीजों के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।
पृथ्वी का पहला जीव है बैक्टीरिया
माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत बैक्टीरिया से ही हुई और अरबों साल बाद भी इसकी संरचना काफी सामान्य है। हमारे शरीर में भी अनगिनत बैक्टीरिया मौजूद हैं, जिनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं, जो गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। बाकी हमारे शरीर में अच्छे जीवाणुओं की काफी जरूरत रहती है। यह शोध डिसकवरी साइंस जर्नल में विस्तार से प्रकाशित किया गया है।
मैंग्रोव के दलदल में अनेक चीजों से चिपका मिला
फ्रेंच वेस्ट इंडीज और गुयाना यूनिवर्सिटी के एक को-ऑथर और बायोलॉजिस्ट ओलिवियर ग्रोस ने 2009 में ग्वाडेलोप द्वीपसमूह में भी मैंग्रोव के पत्तों से चिपके हुए इस जीवाणु का पहला सैंपल देखा था। लेकिन, इसके विशाल आकार की वजह से वह तत्काल नहीं जान पाए थे कि एक यह बैक्टीरिया था। बाद में जेनेटिक एनालिसिस से यह खुलासा हुआ कि वह जीव एक कोशिका वाला बैक्टीरिया ही था। ग्रोस ने पाया कि बैक्टीरिया दलदल में सीप के शेल, चट्टानों और ग्लास की बोतलों से भी चिपका हुआ था।
अपनी रक्षा के लिए विशाल बना थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica)!
वैज्ञानिक इसे अभी लैब कल्चर में विकसित नहीं कर पाए हैं, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी कोशिका में एक ऐसी संरचना है,जो बैक्टीरिया के लिए असामान्य है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वे निश्चित नहीं हैं कि जीवाणु इतना बड़ा क्यों है, लेकिन को-ऑथर वोलैंड का अनुमान है कि छोटे जीवों से खाए जाने से बचने के लिए इसने इतना विशाल स्वरूप धारण किया हो सकता है।