Author: The Vigyan Team

  • मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System in Hindi) (ग्रंथियां (Glands) एवं हार्मोन्स (Harmones)

    मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System in Hindi) (ग्रंथियां (Glands) एवं हार्मोन्स (Harmones)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System) किस प्रकार कार्य करता है, अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System) में ग्रंथियां (Glands) एवं हार्मोन्स (Harmones) की क्या भूमिका है, हॉर्मोन (Harmone) क्या होते है, हॉर्मोन अन्तःस्रावी ग्रन्थिया (Glands) क्या है, पिट्यूटरी ग्रन्थि या पीयूष ग्रंथि (मास्टर ग्रन्थि) (Pituitary gland) क्या है, थाईराइड ग्रंथि (Thyroid Gland) क्या है, पैराथायरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid glands), एड्रिनलिन ग्रन्थि (Adrenal Gland), पीनियल ग्रन्थि, अग्न्याशय ग्रन्थि, थाइमस ग्रन्थि, पैंक्रियास ग्रंथि (Pancreatic gland) और हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) ग्रन्थि आदि | साथ ही जानेगे की हॉर्मोन के अल्पस्रावण के कारण होने वाले रोग, हॉर्मोन के अतिस्रावण के कारण होने वाले रोग विभिन्न मानव हॉर्मोन, उनके स्रोत, स्वभाव तथा मानव शरीर पर प्रभाव आदि

    मानव में अंतःस्त्रावी तंत्र (Endocrine System)

    शरीर के विभिन्न भागों में उपस्थित नलिकाविहीन ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी तन्त्र कहा जाता है। थामस एडिसन को अन्तःस्त्रावी विज्ञान का जनक कहा जाता है। अंतःस्त्रावी तंत्र के अध्ययन को एन्ड्रोक्राइनोलोजी कहते है | तन्त्रिका तंत्र से इसका घनिष्ठ संबंध है।

    इसलिए इन दोनों को संयुक्त कर एक नयी विज्ञान की शाखा का विकास हुआ है, जिसे “न्यूरोऐण्डोक्राइनोलॉजी” कहते है।

    अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से हॉर्मोन का स्राव होता है तथा समूह को इन्हीं हॉर्मोनों के द्वारा शरीर की सभी रासायनिक क्रियाओं का नियन्त्रण होता है, जहाँ वहिःस्रावी ग्रन्थियाँ स्राव वाहिनियों (ducts) द्वारा विसर्जित करती है जैसे लार ग्रन्थियाँ वहीं अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ वाहिनी विहीन (ductless) ग्रन्थियाँ होती हैं, जो अपना स्राव रुधिर में मुक्त करती है और यह स्राव रुधिर के माध्यम से निर्धारित अंगों में पहुँचकर रासायनिक क्रियाओं का समन्वय करता है।

    रासायनिक स्तर पर हार्मोन्स मुख्यत: स्टीरॉएड्स या प्रोटीन्स या प्रोटीन्स से उत्पन्न पदार्थ होते है।

    हॉर्मोन (Harmone)

    हॉर्मोन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से अल्प मात्रा में स्रावित होने वाला कार्बनिक पदार्थ है। इसकी खोज बेलिस और स्टारलिंग ने सीक्रिटिन हॉर्मोन के रूप में की। रसायनिक दृष्टि से हॉर्मोन प्रोटीन, स्टीरॉइड्स तथा अमीनो अम्ल के व्युत्पन्न पदार्थ होते हैं।

    प्रोटीन हॉर्मोन (जल में घुलनशील) – इन्सुलिन

    स्टीरॉयड हॉर्मोन (वसा में घुलनशील) लिंग हॉर्मोन – एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टीरॉन

    अमीनो अम्ल – थायरॉक्सिन

    अतः हॉर्मोन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से स्रावित होने वाला वह तत्व है, जो जैव-उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है तथा अन्तः वातावरण को नियन्त्रित करता है एवं अन्य हॉर्मोनों की क्रिया को अनुमति प्रदान करता है।

    हॉर्मोन कोशिका कला (cell membrane) की पारगम्यता को बदलकर उसे चयनात्मक पारगम्य बनाता है ताकि आवश्यक अणुओं का विनियम हो सके।

    मनुष्य की अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ मनुष्य के शरीर में कुल 9 अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश नर एवं मादा में समान होती हैं, जो निम्न हैं:

    पिट्यूटरी ग्रन्थि या पीयूष ग्रंथि (मास्टर ग्रन्थि) (Pituitary gland)

    पीयूष ग्रन्थि मस्तिष्क में पाई जाती है। यह मटर के दाने के समान होती है। यह शरीर की सबसे छोटी अतःस्त्रावी ग्रंथी है। यह कपाल की Sphenoid हड्डी में एक गड्डे में स्थित होती है। इसे Cell Turcica कहते है। इसका भार- 0.6gm होता है। इसे “मास्टर ग्रंथि’ भी कहते है।

    इसके द्वारा आक्सीटोसीन, ADH/वेसोप्रेसीन हार्मोन, प्रोलेक्टीन होर्मोन, वृद्धि हार्मोन स्त्रावित होते है। इन्हें संयुक्त रूप से पिट्यूटेराइन हार्मोन कहते है।

    पश्चपालि (POSTERIER LOBE)

    अथवा न्यूरोहाइपोफाइसिस से। इसमें दो हार्मोन स्रावित होते है —

    आक्सीटोसीन हार्मोन

    यह हार्मोन मनुष्य में दुध का निष्कासन व प्रसव पीड़ा के लिए उत्तरदायी होता है। इसे Love हार्मोन भी कहते है। है। यह गर्भावस्था के या प्रसव के समय गर्भाशय के फैलने तथा प्रसव के पश्चात गर्भाशय के सिकुड़ने को प्रेरित करता है। यह “Pitocin” भी कहलाता है |

    ADH/ वैसोप्रेसीन

    इसे “एंटिडाइयूरेटिक हार्मोन” भी कहते है अर्थात ADH अथवा पिट्रेसिन ADH वृक्क की वाहिनियों एवं कोशिकाओं में जल के अवशोषण को नियन्त्रित करता है व शरीर में जल संतुलन का भी कार्य करता है। यह हार्मोन वृक्क नलिकाओं में जल के पुनरावशोषण को बढ़ाता है व मूत्र का सांद्रण करता है इसकी कमी से बार-बार पेशाब आता है।

    अग्रपालि (ANTERIOR LOBE)

    अथवा एडीनोहाइपोफाइसिस से उत्सर्जित होने वाले हार्मोन्स

    STH = Somatotropic Hormone

    यह शरीर के वृद्धि व लम्बाई को नियन्त्रित करती है। अधिकता से:- भीमकायता, एक्रोमिगली विकार उत्पन्न हो जाता है। कमी से:- बौनापन (Dwarfism)

    GTH = Gonadotropic Hormone

    यह जनन अंगों के कार्यो का नियन्त्रण करता है।

    (a) FST = Follicle Stimulating hormone – नर में वृषण शुक्रजनन नलिकाओं तथा यह अंडाशय में फालिकल की

    वृद्धि में मदद करता है।

    (b) LH = Luteiniging hormone – इससे नर में टेस्टोस्टीरोन H.एवं मादा में एस्ट्रोजन H. स्रावित होता है। मादा की माहवारी को नियन्त्रित करता है।

    ACTH = Andrenocorticotropic Hormone –

    यह Adrenal Cortex के स्राव को नियन्त्रित करता है।

    TSH = Thyroid Stimulating Hormone –

    इसे थाइरोट्रोपिन हार्मोन भी कहते है। यह थाइराइड ग्रंथि की वृद्धि एवं स्रावण क्रिया का प्रेरक होता है।

    LTS = Lactogenic Hormone

    “प्रोलेक्टिन” भी कहते है। यह गर्भित मादा में दुग्ध-निर्माण एवं स्राव को प्रेरित करता है।

    (vi) Diabetogenic Hormone

    यह कार्बोहाइड्रेट के उपापचय को प्रभावित करता है। इसका प्रभाव इंसुलिन के ठीक विपरीत होता है।

    (vii) MSH = Melenocite Stimulating Hormone

    शरीर के अंग (मिलैनिन) को नियन्त्रित करता है।

    मध्यपालि (Intermediate Lobe)

    पीयूषग्रंथि का यह भाग अविकसित होता है।

    थाईराइड ग्रंथि (Thyroid Gland)

    यह ग्रन्थि गले में श्वास नली के पास होती है यह शरीर की सबसे बड़ी अंतरस्त्रावी ग्रन्थि है। इसकी आकृति एच होती है। इसके द्वारा थाइराॅक्सीन हार्मोन स्त्रावित होता है। ये भोजन के आक्सीकरण व उपापचय की दर को नियंत्रित करता है। कम स्त्रवण से गलगण्ड रोग हो जाता है।

    इसके कम स्त्रवण से बच्चों में क्रिटिनिज्म रोग व वयस्क में मिक्सिडीया रोग हो जाता है। अधिकता से ग्लुनर रोग, नेत्रोन्सेधी गलगण्ड रोग हो जाता है।

    थाईराइड ग्रंथि (Thyroid Gland) से जुड़े रोग

    (i) जड़वामनता (Cretinism):- यह बच्चों में होता है। मानसिक व शारीरिक वृद्धि अवरूध हो जाता है।

    (ii) Myxodema:- यह यौवनावस्था में होने वाले इस रोग में उपापचय भली-भाँति नहीं हो पाता, जिससे हृदय स्पंदन व रक्त चाप कम हो जाता है।

    (iii) Hypothyroidism:- सामान्य जनन कार्य सम्भव नहीं हो पाता। कभी-कभी इस रोग से मनुष्य गूंगा व बहरा भी हो जाता है।

    (iv) Simple Goitre:- आयोडिन की कमी से Thyroid Gland का आकार काफी बड़ जाता है।

    अधिकता से रोग

    (i) Toxic Goitre – उदर गति तीव्र रक्त चाप बढ़ जाता है।

    ii) Exophthalmic Goitre – आँख फूलकर नेत्रकोटर से बाहर निकल आती है।

    पैराथायरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid glands)

    यह ग्रन्थि गले में थाइराॅइड ग्रन्थि के पीछे स्थित होती है। इस ग्रन्थि से पैराथार्मोन हार्मोन स्त्रावित होता है। यह हार्मोन रक्त में Ca++ बढ़ाता है जो विटामिन डी की तरह कार्य करता है। इस हार्मोन की कमी से टिटेनी रोग हो जाता है। इस हार्मोन के अधिक स्राव से ओस्टिओपोरोसिरा रोग हो जाता है |

    एड्रिनलिन ग्रन्थि (Adrenal Gland)

    इसे अधिवृक्क ग्रन्थि भी कहते है। यह वृक्क के ऊपर स्थित होती है। यह ग्रन्थि संकट, क्रोध के दौरान सबसे ज्यादा सक्रिय होती है।

    इस ग्रन्थि के बाहरी भाग को कार्टेक्स व भीतरी भाग को मेड्यूला कहते है।

    कार्टेस से कार्टीसोल हार्मोन स्त्रावित होता है। जिसे जिवन रक्षक हार्मोन कहते है। मेड्यूला में एड्रिनलीन हार्मोन स्त्रावित होता है जिसे करो या मरो हार्मोन भी कहते है। यह मनुष्य में संकट के समय रक्त दाब हृदयस्पंदन, ग्लुकोज स्तर, रक्त संचार आदि बढ़ा कर शरीर को संकट के लिए तैयार करता है।

    Adrenal Cortex से स्रावित हार्मोन्स

    मिनरैलो कॉर्टिकोइडस – एल्डोस्टीरान = शरीर में लवण का नियन्त्रण करना।

    ग्लुकोकॉर्टिकोइडस

    कार्टिसोल व कॉर्टिकोस्टीरोन ये दोनों शरीर में उपापचय, यकृत में Glycogenesis, आदि का नियन्त्रण करते है।

    लिंग हार्मोन्स

    एण्डोजेन्स व इस्ट्रोजन ये दोनों नर में स्रावित होने वाले हार्मोन है, जो Endogens नर व Estrogen मादा में पेशियों तथा जनन अंगों के विकास को प्रेरित करते है।

    (B) Adrenal Medulla से स्रावित हार्मोन्स :– (i) एड्रीनलीन या ऐपीनैफ्रीन व नॉरएड्रीनलीन या नॉरऐपीनैफ्रीन एड्रीनलीन हमें संकट कालीन परिस्थतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। गुस्स या डर के समय उत्पन्न होने वाले हाव-भाव ऐड्रीनेंलीन के द्वारा ही उत्पन्न होते है। इसका चिकित्सा में अत्यंत महत्वपूर्ण है- क्योंकि “इसे हृदय में Inject कभी-कभी रूके हुये हृदय में हत् स्पंदन प्रारंभ किया जा सकता है। नार ऐड्रीनेलीन भी हृदय को नियन्त्रित करता है।

    Gonadotropic Hormone (GTH)

    यौवनावस्था से केवल 2-3 वर्ष पहले ही इनका स्राव शुरू होता है। “Hypothalmus” में स्थित जैनेटिक जैव घड़ी (Genetic biology Clock) इनके प्राव के समय को नियन्त्रित करती है।

    हाशी मोटो रोग

    यह रोग में Thyroid Gland के द्वारा हार्मोन्स का भाव अत्यन्त कम हो जाता है। स्राव को बढ़ाने के लिए दी गई दवाई शरीर में विष की तरह काम करने लगती है। इसे खत्म करने के लिए शरीर में Antibodies बनने लगती है जो Thyroid को नष्ट कर देती है। इसे Anti-immune रोग या “थायराइड की आत्म हत्या” कहते है |

    Addison’s disease

    Adrenal Hormone की कमी से होता है। इसका वर्णन सर्वप्रथम Thomus Addision ने किया था। इससे मूत्र के साथ अधिक मात्रा में जल के लवण भी निष्कासित हो जाता है। इसे शरीर Dehydration हो जाता है। अत: Adrenal Hormone को “जीवन-रक्षक हार्मोन्स” कहते है।

    कुशिंग रोग

    Adrenal Hormone के अधिक स्राव से होता है।

    इडीमा रोग (Edema disease)

    Adrenal Hormone के अधिक स्राव व साथ में Na+ के स्राव के कारण होता है।

    पीनियल ग्रन्थि

    यह ग्रन्थि अग्र मस्तिष्क के थैलेमस भाग में स्थित होती है। इसे तीसरी आंख भी कहते है। यह मिलैटोनिन हार्मोन को स्त्रावित करती है। जो त्वचा के रंग को हल्का करता है व जननंगों के विकास में विलम्ब करता है। इसे जैविक घड़ी भी कहते है।

    अग्न्याशय ग्रन्थि

    अग्नाश्य ग्रन्थि को मिश्रत(अन्तः व बाहरी) ग्रन्थि कहते है। यकृत के बाद दुसरी सबसे बड़ी ग्रन्थि है। इस ग्रन्थि में लैग्रहैन्स द्वीप समुह पाया जाता है। इसमें α व β कोशिकाएं पाई जाती है। जिनमें α कोशिकाएं ग्लुकागाॅन हार्मोन का स्त्रवण करती है। जो रक्त में ग्लुकोज के स्तर को बढ़ाता है।

    β कोशिकाएं इंसुलिन हार्मोन का स्त्राव करती है। जो रक्त में ग्लुकोज को कम करता है। यह एक प्रकार की प्रोटिन है। जो 51 अमीनो अम्ल से मिलकर बनी होती है। इसका टीका बेस्ट व बेरिंग ने तैयार किया ।

    इंसुलिन की कमी से मधुमेह(डाइबिटिज मेलिटस) नामक रोग हो जाता है व अधिकता से हाइपोग्लासिनिया रोग हो जाता है।

    थाइमस ग्रन्थि

    थाइमस ग्रन्थि को प्रतिरक्षी ग्रन्थि भी कहते है। इससे थाइमोसिन हार्मोन स्त्रावित होता है। यह हृदय के समीप पाई जाती है। यह ग्रन्थि एंटीबाॅडी का स्त्रवण करती है। यह ग्रन्थि बचपन में बड़ी व वयस्क अवस्था में लुप्त हो जाती है। यह ग्रन्थि टी-लिम्फोसाडट का परिपक्वन करती है। इसका प्रभाव लैंगिक परिवर्धन व प्रतिरक्षी तत्वों के परिवर्धन पर पड़ता है।

    जनन ग्रन्थियां

    पुरूष – वृषण – टेस्टोस्टीराॅन

     मादा – अण्डाश्य – एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान

    जनद – यह भी अंतः स्रावी ग्रंथियां हैं जो हमारे द्वितीयक लैंगिक लक्षणों को उत्पन्न करती है पुरुषों में जैसे आवाज का भारी होना दाढ़ी मूछ का आना,  महिलाओं में आवाज का पतला होना और दाढ़ी मूछ का नहीं आना

    वृषण- यह पुरुषों की अंतः स्रावी ग्रंथि होती है जो उन में द्वितीयक लैंगिक लक्षण के लिए उत्तरदाई होती है इसमें निकलने वाला हार्मोन टेस्टोस्टेरोन कहलाता है या हार्मोन पुरुषों में दाढ़ी मूछ का आना, आवाज का भारी होना आदि के लिए उत्तरदाई होता है साथ ही वृषण में स्पर्मेटोजेनेसिस अर्थात शुक्राणु निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है

    अंडाशय – यह दो गुलाबी संरचनाएं होती है जो शरीर के अंदर स्थित होती है इसमें दो हार्मोन एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन निकलते हैं जो मादा में द्वितीय लक्षण के लिए आवश्यक है |

    पैंक्रियास ग्रंथि (Pancreatic gland) 

    यह एक मिश्रित ग्रंथि होती है जिसकी लैंगर हैंस दीप कोशिकाओं में स्थित अल्फा और बीटा कोशिकाएं क्रम से ग्लूकेगन और इंसुलिन हार्मोन का श्रवण करती है ग्लूकेगन शरीर में शुगर की मात्रा को बढ़ाकर तथा इंसुलिन बढ़ी हुई शुगर को कम करके रक्त में शुगर की मात्रा का नियमन करता है इस हार्मोन की कमी से मधुमेह नामक रोग हो जाता है |

    सामान्य भाषा में कहें तो व्यक्ति चाहे कितना भी भोजन करें यदि वह प्रतिदिन व्यायाम और रनिंग करता है तो उसके शरीर में शर्करा की मात्रा के नियमन के लिए सही मात्रा में हार्मोन बनते रहेंगे और व्यक्ति को कभी मधुमेह से जूझना ही नहीं पड़ेगा |

    हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) 

    यह ग्रंथि थैलेमस के नीचे मस्तिष्क में स्थित होती है यह ग्रंथि हमारी मास्टर ग्रंथि अर्थात पीयूष ग्रंथि पर कंट्रोल करती है इसलिए इसे सुपर मास्टर ग्रंथि भी कहते हैं |

    हारमोंस के शरीर पर प्रभाव के बारे में वैज्ञानिक अभी तक रिसर्च कर रहे हैं बहुत ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं हुई है क्योंकि प्रकृति और शरीर में कितनी मात्रा में इनका प्रभाव क्या होता है इस पर खोज अभी जारी है |

    पौधों के हारमोंस

    पौधों में किसी भी प्रकार का अंतः स्रावी तंत्र नहीं पाया जाता है उसके बावजूद भी पौधों में हारमोंस बनते हैं जिन्हें पादप हार्मोन कहा जाता है सभी प्रकार के पादप हारमोंस या तो पौधों की वृद्धि को प्रेरित करते हैं या पौधों में प्रीति को संदमित करते हैं उदाहरण जिबरेलिन

    ग्रन्थि से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य (स्मार्ट फैक्ट्स)

    पिनियल ग्रन्थि (pineal gland) को लैंगिक जैव घड़ी (biological clock) भी कहा जाता है, जो 70 वर्ष की आयु में घटनी प्रारम्भ हो जाती है।

    थॉमस एडीसन को अन्तःस्रावी विज्ञान का जनक कहा जाता है।

    अग्न्याशय और जनद (gonad) मिश्रित ग्रन्थियाँ हैं।

    पिट्यूटरी ग्रन्थि को मास्टर ग्रन्थि (master gland) भी कहते हैं।

    थायरॉइड ग्रन्थि सबसे बड़ी अन्तः स्रावी ग्रन्थि है।

    अग्न्याशय एक मिश्रित ग्रन्थि है, जिसमें अन्तःस्रावी एवं बहिःस्रावी दोनों भाग होते हैं। इसके लैंगरहैन्स की द्वीपिकाओं में तीन प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं। यथा – α – कोशिकाओं से ग्लूकेगॉन हॉर्मोन, β-कोशिकाएँ से इन्सुलिन हॉर्मोन, δ – कोशिकाओं से सोमेटोस्टेटिन हॉर्मोन स्रावित होता है।

    रेनिन (Rennin) जठर ग्रन्थि (gastric gland) की जाइमोजन कोशिकाओं से स्रावित प्रोटीन अपघटनी एन्जाइम है, जबकि रेनिन (renin) वृक्क से स्रावित एक एन्जाइम है, जो हॉर्मोन की भाँति कार्य करता है। एड्रीनेलीन या एपीनेफ्रिन को संकटकालीन (emergency) हॉर्मोन कहा जाता है।

    मानव शरीर के सबसे छोटी अंत: स्रावी ग्रंथि है- “पिटयूटरी ग्रंथि’। व सबसे बड़ी अंत: स्रावी ग्रंथि- Thyroid Gland |

    एडीनल ग्रंथि की स्रावित हार्मोन को “लड़ो या उड़ो अथवा संघर्ष या पलायन की उपमा प्रदान की गई।

    एक्रोमेगाली रोग “सोमेट्रोट्रॉपिक हार्मोन (STH) के अधिक मात्रा में स्रावण से होता है।

    उत्तेजक पदार्थों को हार्मोन्स सर्वप्रथम-स्टारलिंग (1905) ने कहा था।

    स्तनधारियों में दुग्ध स्राव को- “आक्सीटोसिन व प्रोलैक्टिन” उत्तेजित करता है।

    एक्रोमेगाली रोग “सोमेट्रोट्रॉपिक हार्मोन (STH) के अधिक मात्रा में स्रावण से होता है।

    एड्रीनल ग्रंथि के हार्मोन के कम स्रावण से एडीसन, हाइपोग्लाइसीमिया तथा काँस्य वर्ण रोग हो जाते है।

    3F (Fight, Flight & Fright) हार्मोन्स-एड्रीनलिन को कहते है।

    Thyroid Gland के अति स्रावण से ग्रवसरोग, प्लूमर रोग, एक्सोफ्थैल्मिक ग्वाटर नामक रोग हो जाते है।

    हॉर्मोन के अल्पस्रावण के कारण होने वाले रोग

    रोगहार्मोनग्रंथिप्रमुख प्रभाव
    बौनापनSTHएड्रिनोहाइपोफाइसिसबाल्यावस्था में वृद्धि का निरोधन।
    सायमण्ड रोगSTHएड्रिनोहाइपोफाइसिसवयस्क अवस्था में व्यक्ति समय से पूर्व बूढ़ा दिखाई देता है।
    अवटुमनताथायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिशारीरिक वृद्धि व मानसिक वृद्धि मन्द हो जाती है व बौनापन।
    मिक्सोडेमाथायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिहृदय गति मन्द, रोगी सुस्त त्वचा, पलकें व होंठ मोटे हो जाते हैं।
    हाशीमोटो रोगथायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिथायरॉइड की आत्महत्या
    हाइपोकैल्सीमियाPTHपैराथायरॉइडCa2+ की कम व फास्फेट की मात्रा बढ़ जाती है |
    टिटेनीPTHपैराथायरॉइडCa2+ की कमी व पेशियों में ऐंठन
    एडीसन रोगमिनरेलोकोर्टिकॉइड्सएड्रिनल कॉर्टेक्सNa2+ की कमी, रुधिर दाब कम हो जाता है (हाइपोनेट्रिया)
    डाइबिटीज मेलीटसइन्सुलिनलैंगरहैन्स के द्वीप समूह (B-कोशिकाएँ)रुधिर में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है व मूत्र से होकर उत्सर्जन होने लगता है।
    डाइबिटीज इन्सीपीडसADHन्यूरोहाइपोफाइसिसपॉलियूरिया

    हॉर्मोन के अतिस्रावण के कारण होने वाले रोग

    रोगहार्मोनहार्मोन स्त्रावी ग्रंथिप्रमुख प्रभाव
    महाकायता या भीमकायता (Gigantism)STHएड्रिनोहाइपोफाइसिसबाल्यावस्था में अतिस्रावण से भीमकाय शरीर
    अग्राभिकायता (Acromegaly)STHएड्रिनोहाइपोफाइसिसवयस्कावस्था में चेहरे की अस्थियों का लम्बा होना, इसे रिवर्सल टू गॉरिला भी कहते हैं।
    नैत्रोत्सेंधी गलगण्ड (Exophthalmic goitre)थायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिनेत्र गोलक बाहर की ओर उभर जाते हैं।
    प्लूमर रोग (Plummer disease)थायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिग्रन्थि में जगह-जगह गाठें हो जाती हैं।
    ग्रेव का रोग (Grave’s disease)थायरॉक्सिनथायरॉइड ग्रन्थिसम्पूर्ण ग्रन्थि फूल जाती है।
    ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis)PTHपैराथायरॉइड ग्रन्थिअस्थियाँ कमजोर व भंगुर हो जाती हैं व अस्थियों से Ca2+ निकल कर रुधिर सीरम में बढ़ जाता है। इसे हाइपरकैल्सीमिया कहते हैं।
    संपुटीतन्तुमय अस्थि विकृति (Osteitis fibrosa cystica)PTHपैराथायरॉइड ग्रन्थिहाइपोकैल्सीमिया
    कुशिंग रोग (Cushing disease)कॉर्टीसोलएड्रिनल कॉर्टेक्सवक्षीय भाग में वसा के जमाव से शरीर भौंडा हो जाता है।
    एड्रिनोजेनाइटल सिण्ड्रोम हिरसुटिज्मडीहाइड्रोएपी एण्डोस्टीरॉनएड्रिनल कॉर्टेक्समहिलाओं में नर के लक्षण-दाढ़ी मूँछ आना, आवज में भारीपन, क्लाइटोरिस का बड़ा होना।

    विभिन्न मानव हॉर्मोन, उनके स्रोत, स्वभाव तथा मानव शरीर पर प्रभाव

    क्र. सं.हार्मोन का नामस्त्रोतस्वभावप्रभाव
    1.सोमेटोस्टेटिन हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनGH का श्रावण रोकता है।
    2.थायरोट्रॉपिन मुक्ति हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनTSH का स्रावण प्रेरित करता है।
    3.कॉर्टिकोटॉपिन मुक्ति हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनACTH का स्रावण प्रेरित करता है।
    4.गोनेडोट्रॉपिन मुक्ति हॉर्मोनहाइपोथैलेमस के न्यूरॉनप्रोटीनगोनेडोट्रॉपिन का स्रावण प्रेरित करता है।
    5.सोमेटोट्रॉफिक या वृद्धि हॉर्मोन (STH or GH)अग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. DNA, RNA व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक।
    2. ग्लूकोनियोजेनेसिस प्रेरित करता है।
    3. शरीर की वृद्धि में सहायक।
    6.एड्रिनोकॉर्टिकोट्रॉफिक हॉर्मोन (ACTH)अग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीनएड्रिनल कॉर्टेक्स को हॉर्मोन स्रावण के लिए प्रेरित करता है।
    7.थायरॉयड प्रेरक हॉर्मोन (TSH)अग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीनथायरॉइड ग्रन्थि को हॉर्मोन स्रावण के लिए प्रेरित करता है।
    8.गोनेडोट्रॉफिक हॉर्मोन (a) पुटिका प्रेरक हॉर्मोन     (b) ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोनअग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. जनदों का विकास।
    2. गेमीटोजेनेसिस को प्रेरित करता है।

    1. जनदों से लिंग हॉर्मोनों के स्रावण को प्रेरित करता है। 2. अण्डोत्सर्ग प्रेरित करता है।
    9.प्रोलैक्टिन हॉर्मोनअग्र पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. दुग्ध निर्माण प्रेरित करता है।
    2. स्तन ग्रन्थियों का विकास।
    10.मेलेनोसाइट प्रेरक हॉर्मोनमध्य पीयूष ग्रन्थिप्रोटीनमेलेनोसाइट में मेलेनिन निर्माण व वितरण में सहायक।
    11.वेसोप्रेसिन या पिट्रेसिन या मूत्र  बहुलता हॉर्मोनपश्च पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. धमनियों का संकुचन
    2. नेफ्रॉन्स द्वारा जल का पुनरावशोषण।
    12.ऑक्सीटोसिन या पिटोसिनपश्च पीयूष ग्रन्थिप्रोटीन1. शिशु जन्म के समय प्रसव वेदना प्रारम्भ करता है। 2. स्तन ग्रन्थियों से दुग्ध स्रावण को प्रेरित करता है।
    13.मैलेटोनिनपिनियल कायअमीनो अम्ल1. स्तनधारियों में लैंगिक परिपक्वन को रोकता है।
    2. अभयचरों में त्वचा के रंग को हल्का करता है।
    14.थायरॉक्सिन या टैट्राआयोडो थायरोनिनथायरॉइड ग्रन्थिअमीनो अम्ल1. आधारी उपापचय का नियन्त्रण।
    2. हृदय स्पंदन का नियमन तथा शरीर ताप का नियन्त्रण । 3. ऊतक विभेदन में सहायक है अन्तःकायान्तरण प्रेरित करता है।
    4. ग्लूकोनियोजेनेसिस
    15.थायरोकैल्सिटोनिनथायरॉइड ग्रन्थि की C-कोशिकाएँप्रोटीनमूत्र में Ca का उत्सर्जन बढ़ाता है तथा अन्तरा-कोशिकीय द्रव (ECF) में Ca स्तर बढ़ाता है।
    16.पैराथॉर्मोन या कोलिप का हॉर्मोनपैराथायरॉइड ग्रन्थिप्रोटीन1. Ca तथा P उपापचय का नियन्त्रण ।
    2. होमियोस्टेसिस तथा रुधिर में Ca तथा P स्तर का नियन्त्रण | 3. अस्थियों तथा दाँतों का निर्माण व वृद्धि।   
    17.कैल्सीटोनिनपैराथायरॉइडप्रोटीनपैराथॉर्मोन का विपरीत प्रभाव।
    18.थायमोसीनथायमस ग्रन्थिप्रोटीनलिम्फोसाइटों के विभेदीकरण में सहायक तथा शरीर के रक्षा तन्त्र का भाग
    19.ग्लूकोकॉर्टिकॉएड, कॉर्टीसोल तथा कार्टिकॉस्टीरॉनएड्रिनल कॉर्टेक्सकॉर्टिकॉएडकार्बोहाइड्रेट, वसा तथा प्रोटीन उपापचय का नियन्त्रण
    20.मिनरेलोकॉर्टिकॉएड एल्डोस्टीरॉनएड्रिनल कॉर्टेक्सकॉर्टिकॉएड1. Na तथा K उपापचय का नियन्त्रण 2. रुधिर में Na की मात्रा बढ़ाने में सहायक
    21.लिंग कॉर्टिकॉएड, एण्डस्टेनेडिओन तथा एस्ट्रोजन  एड्रिनल  कॉर्टेक्सकॉर्टिकॉएडबाह्य लिंग लक्षणों के विकास में सहायक
    22.एड्रिनेलीन या एपीनेफ्रीनएड्रिनल मेड्यूलाकैटकोलेमिन1. हृदय स्पंदन, रुधिर दबाव तथा श्वसन का नियमन । 2. शरीर को युद्ध या पलायन के लिए तैयार करता है।
    23.नॉरड्रिनेलीन या नॉर-एपीनेफ़ोनएड्रिनल मेड्यूलाकैटकोलेमिनरुधिर वाहिनियों के संकुचन द्वारा रुधिर दाब में वृद्धि
    24.इन्सुलिनअग्न्याशय में उपस्थित लेंगरहैन्स की द्वीपकाओं की β-कोशिकाएँप्रोटीन1. ग्लूकोस उपापचय का नियन्त्रण 2. ग्लाइकोजेनेसिस तथा लाइपोजेनेसिस में सहायक । 3. ग्लूकोनियोजेनेसिस में वृद्धि | 4. प्रोटीन संश्लेषण बढ़ाता है।
    25.ग्लूकागॉन या
    हाइपरग्लाइसेमिक कारक
    अग्न्याशय में उपस्थित लेंगरहैन्स की द्वीपकाओं की α-कोशिकाएँप्रोटीनइन्सुलिन का विपरीत ग्लाइकोजीनोलिसिस प्रेरित करता है तथा प्रोटीनों का अपचय बढाता है।
    26.एस्ट्रोजनअण्डाशय की ग्राफियन पुटिकाएँस्टीरॉइड1. मादा में सहायक प्रजनन अंगों की वृद्धि व विकास। 2. मादा में द्वितीयक लिंग लक्षणों का विकास।
    27.प्रोजेस्टेरॉन1. अण्डाश्य की कॉर्पस ल्यूटियम 2. अपरास्टीरॉइड1. गर्भाशय को भ्रूण के अधिरोपण के लिए तैयार करता है। 2. गर्भावस्था बनाए रखने में सहायक है।
    28.टेस्टोस्टीरॉनवृषण की लीडिंग कोशिकाएँस्टीरॉइड1. नर के सहायक प्रजनन अंगों की वृद्धि तथा विकास। 2. द्वितीयक लिंग लक्षणों का विकास।
    3. पेशियों के विकास में सहायक
    29.कोरियोनिक गोनैडोट्रॉपिक  हॉर्मोनअपराप्रोटीनकॉर्पस ल्यूटियम को बनाए रखने में सहायक।
    30.प्लेसेण्टल लैक्टोजनअपराप्रोटीनदुग्ध निर्माण को प्रेरित करता है।
    31.रिलेक्सिनअपराप्रोटीनप्यूबिक संघान की पेशियों को लचीला बनाकर बच्चे के जन्म में सहायता करता है।
    32.रेनिनवृक्कप्रोटीन1.   एल्डोस्टीरॉन के स्रावण को प्रेरित करता है।
    2.  प्लाज्मा प्रोटीन एन्जियोटेन्सीनोजन को एन्जियोटेन्सिन में तोड़ता है, जो हृदय स्पंदन की दर को बढ़ाता है।
  • मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र | Human Excretory System | Kidney | गुर्दा | वृक्क | मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi)

    मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र | Human Excretory System | Kidney | गुर्दा | वृक्क | मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की उत्सर्जन तंत्र (Excretory System) क्या है, मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi) किस तरह से कार्य करता है,  मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi) के मुख्य अंग कोनसे है, मानव उत्सर्जन तंत्र की क्रियाविधि क्या है, उत्सर्जन के प्रकार कितने है, वृक्क (गुर्दा) (kidney) क्या है, वृक्क का क्या कार्य है, वृक्क का चित्र, वृक्क नलिका (नेफ्रॉन (Nephron) क्या है? नेफ्रॉन कहा पाया जाता है, नेफ्रॉन के कार्य, नेफ्रॉन की सरंचना और क्रियाविधि, मनुष्य के उत्सर्जी अंग, वृक्क द्वारा मूत्र निर्माण और नेफ्रॉन (वृक्काणु या वृक्क नलिका का कार्य) आदि

    उत्सर्जन (excretion) क्या है ?

    जन्तुओं के शरीर में उपापचय के परिणामस्वरूप CO2, जल, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल आदि कई ऐसे अपशिष्ट पदार्थों का निर्माण होता रहता है, जो शरीर के लिए काफी हानिकारक हैं। अतः उपयुक्त स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए इसका शरीर से बाहर निकलना आवश्यक है। इसी क्रिया को उत्सर्जन (excretion) कहते हैं।

    विभिन्न जन्तुओं में उत्सर्जी अंग

    • प्लाज्मा झिल्ली अमीबा सदृश प्रोटोजोआ
    • नेफ्रीडिया एनीलिडा
    • मैल्पीघियन नलिका आर्थ्रोपोडा (कॉकरोच)
    • कोक्सल ग्रन्थि मकड़ी
    • ग्रीन ग्रन्थि प्रॉन
    • क्लोरैगोगन कोशिकाएँ केंचुआ
    • वृक्क सभी कशेरुकियों में
    • विसरण द्वारा एककोशिकीय जीवों में
    • ज्वाला कोशिकाएँ प्लैटीहैल्मिन्थीज

    अकशेरुकियो के उत्सर्जी अंग

    शरीर की सामान्य सतह द्वारा – प्रोटोजोआ , पोरीफेरा , सिलेन्ट्रेटा

    आदि वृक्कक (protonephridia) :- चपटे कृमि (प्लेटीहेल्मिन्थिज)

    उत्सर्जी नलिकाएं :- निमेटोडा संघ

    पश्च वृक्कक (meta nephridia) :- एनिलिडा

    मैलपिघी नलिकाओं द्वारा :- आर्थोपोडा

    बोजेनस के अंगो द्वारा :- मौल्स्का

    कशेरुकियो के उत्सर्जी अंग

    प्राकृवृक्क (pronephron) : टेडपोल , डेलोस्ट्रोमा

    मध्यवृक्क (mesonephron) : लैम्पे , मछली , उभयचर पश्चवृक्क (metanephron) : पक्षी , सरीसृप , स्तनी

    नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन – उत्सर्जी तत्व

    मुख्य रूप से प्रोटीन अपचय के परिणामस्वरूप निर्मित जटिल नाइट्रोजन पदार्थ का ही उत्सर्जन तंत्र द्वारा निष्काषित होता है |

    ● अमोनिया के रूप में उदाहरण जलीय कशेरुकी, अस्थिल मछलियों एवं उभयचर प्राणियों में ।

    ● यूरिया के रूप में उदाहरण स्तनधारी, मेंढक |

    ● यूरिक अम्ल के रूप में उदाहरण पक्षी, सरीसृप तथा कीट ।

    • अमीनो अम्ल के रूप में उदाहरण मोलस्का में ।

    अमोनिया उत्सर्जीकरण (Amnateusm)

    जन्तुओं की यकृत कोशिकाओं में अमीनो अम्लों के विएमीकरण के फलस्वरूप अमोनिया का निर्माण होता है | वे जन्तु जो नाइट्रोजनी अपशिष्टो को अमोनिया के रूप में उत्सर्जित करते है अमोनोटेलिक जन्तु कहलाते है तथा यह क्रिया अमोनिया उत्सर्जीकरण कहलाती है |

    उदाहरण – प्रोटोजोआ , पोरिफेरा व जलीय जन्तु |

    यूरिया उत्सर्जीकरण (Urecoteusm)

    ऐसे प्राणी जो उत्सर्जी पदार्थ के रूप में यूरिया का उत्सर्जन करते है , यूरियोटेलिक जन्तु कहलाते है तथा यह क्रिया यूरिया उत्सर्जीकरण कहलाती है | उदाहरण – मेंढक व सभी स्तनी प्राणी |

    यूरिक अम्ल उत्सर्जीकरण (Uricotelusm)

    वे जन्तु जिनमे उत्सर्जी पदार्थ के रूप में यूरिक अम्ल का उत्सर्जन होता है , यूरिकोटेलिक जन्तु कहलाते है तथा यह क्रिया यूरिको उत्सर्जीकरण कहलाती है |

    उदाहरण – पक्षी , कीट , मरुस्थलीय प्राणी |

    मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System in Hindi)  | मानव का उत्सर्जी तन्त्र

    मानव का उत्सर्जी तन्त्र निम्न उत्सर्जन अंगों से बना है :

    (i) वृक्क (Kidney)

    (ii) मूत्रवाहिनी नलिका (Ureters)

    (iii) मूत्राशय (Urinary Bladder) (iv) मूत्रमार्ग (Urethra)

    वृक्क (Kidney in Hindi)

    वृक्क उदरगुहा में पायी जाने वाली सेम के आकार की भूरी – चॉकलेटी रंग की संरचना है। मनुष्य के शरीर में एक जोड़ा वृक्क होता है। वृक्क के चारों तरफ पेरिटोनियम नामक झिल्ली पायी जाती है। बायाँ वृक्क दायाँ वृक्क की की तुलना में कुछ ऊँचाई पर स्थित होता है।

    वृक्क के आधार तल पर आगे की ओर एक गोल अधिवृक्क ग्रन्थि ( adrenal gland) होती है। प्रत्येक वृक्क का बाहरी भाग उत्तल व भीतरी भाग अवतल होता है , अवतल भाग गड्ढे के समान होता है , जिसे हाइलम कहते है | हाइलम में वृक्क धमनी व तंत्रिका प्रवेश करती है तथा वृक्क शिरा व मूत्रवाहिनी बाहर निकलती है | प्रत्येक वृक्क के ऊपर टोपी के समान अधिवृक्क ग्रन्थि पायी जाती है |

    प्रत्येक वृक्क से एक मूत्रवाहिनी निकलती है, जो मूत्राशय में खुलती है, जिसमें एकत्रित मूत्र, मूत्रमार्ग द्वारा बाहर निकल जाता है। वृक्क को मनुष्य में पूर्ण उत्सर्जी अंग की उपमा दी गई है

    वृक्क की आन्तरिक संरचना

    वृक्क की आन्तरिक संरचना में दो मुख्य भाग दिखाई देते है –

    वल्कुट (cortex)

    यह वृक्क का परिधीय भाग होता है, यह लाल रंग का कणिकामय भाग होता है |

    मध्यांश (Medula)

    यह वृक्क का मध्य भाग होता है, मध्यांश के वल्कुट की ओर पाये जाने वाले भाग पिरैमिड कहलाते है | मध्यांश में पिरैमिड के मध्य वल्कुट के छोटे छोटे भाग धंसे रहते है जिन्हें बर्टीनी के वृक्क स्तम्भ कहते है, प्रत्येक वृक्क में लाखो की संख्या में वृक्क नलिकाएं पायी जाती है |

    वृक्क द्वारा उत्सर्जन

    शरीर में प्रोटीन के अपचयन के कारण नाइट्रोजन युक्त वज्र्य पदार्थ बनते हैं, जिसे यूरिया एवं यूरिक अम्ल के रूप में जल में विलेय मूत्र के साथ उत्सर्जित किया जाता है। यूरिया का निर्माण यकृत में होता है। इनका उत्सर्जन वृक्क के माध्यम से होता है।

    शरीर में जल की हानि या निकासी फेफड़ों में श्वसन से, त्वचा से एवं मूत्र के द्वारा पूर्ण की जाती है। शरीर से अतिरिक्त जल वृक्क द्वारा मूत्र के रूप में उत्सर्जित किया जाता है।

    यकृत में पित्त का निर्माण होता है। पित्त का निर्माण टूटी-फूटी लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबीन से होता है। यकृत से पित्त सदैव निकलता रहता है परन्तु यह पित्ताशय में आकर संग्रहीत हो जाता है। पित्ताशय से यह समय-समय पर ड्योडिनम में पित्त वाहिनी द्वारा उत्सर्जित कर दिया जाता है।

    वृक्क के शरीर में कार्य

    वृक्क में बहुत सी वृक्क नलिकायें होती है। इन्हीं वृक्क नलिकायों में मूत्र का निर्माण होता है।

    मूत्र में 95% जल, 2% यूरिया, 0.6% नाइट्रोजन एवं थोड़ी मात्रा में यूरिक अम्ल पाया जाता है।

    शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने की अवस्था में विशेष एन्जाइम के स्रवण से वृक्क एरिथ्रोपोइटिन नामक हार्मोन द्वारा लाल रुधिराणुओं के तेजी से बनने में सहायक होता है।

    शरीर में परासरण नियंत्रण द्वारा वृक्क जल की निश्चित मात्रा को बनाए रखता है।

    वृक्क ऊतक की तीन परतों से ढका रहता हैः

    इसकी सबसे अंदर की परत मजबूत और तंतुमय पदार्थ की बनी होती है, जिसे वृक्कीय (गुर्दे) सम्पुट कहा जाता है। यह परत मूत्रनलियों की सतही परत में विलीन हो जाती है।

    इसकी मध्य की परत परिवृक्कीय (गुर्दे) वसा की बनी होती है जिसे वसीय सम्पुट कहा जाता है। वसा की यह गद्दीनुमा परत गुर्दे को झटकों और आघातों से बचाती है।

    इसकी बाह्य परत सीरमी कला के नीचे स्थित प्रावरणी होती है, जिसे वृक्कीय प्रावरणी कहते हैं। वृक्कीय प्रावरणी के चारों ओर वसा की एक दूसरी परत और होती है जिसे परिवृक्कीय वसा कहते हैं। वृक्कीय प्रावरणी संयोजी-ऊतक की बनी होती है, जो गुर्दे को घेरे रहती है तथा इसे पश्च उदरीय भित्ति से कसकर जोड़े रहती है।

    नेफ्रॉन (Nephron) (वृक्क नलिका)

    प्रत्येक वृक्क में दो भाग यथा – अन्दर वाले भाग मेड्यूला तथा बाहर वाले भाग को कॉर्टेक्स (cortex) कहते हैं। कॉर्टेक्स में लगभग एक करोड़ नेफ्रॉन (nephrons) होते हैं। यही नेफ्रॉन वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई होती है।

    प्रत्येक नेफ्रॉन बोमेन्स कैप्सूल (बोमेन सम्पुट) तथा ग्लोमेरुलस का बना होता है। बोमेन्स कैप्सल में रुधिर नलिकाओं का जाल बिछा होता है यही जाल ग्लोमेरुलस (glomerulus) कहलाता है।

    बोमेन्स कैप्सूल (Bowmen’s capsule) (बोमेन सम्पुट) में रुधिर चौड़ी अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) द्वारा प्रवेश करती है और फिर संकरी अपवाही धमनिका (efferent arteriole) द्वारा बाहर निकल जाती है।

    इस रूप में रुधिर का दबाव ग्लोमेरुलस में बढ़ जाता है और इस प्रकार रुधिर में घुले सभी पदार्थ छन जाते हैं। छने हुए पदार्थ में लाभदायक पदार्थ जैसे ग्लूकोज को वृक्क नलिका की दीवार सोख लेती है तथा हानिकारक पदार्थ मूत्रवाहिनी द्वारा मूत्राशय फिर मूत्रमार्ग द्वारा शरीर के बाहर निकल जाते हैं।

    वृक्क नलिका की संरचनाएँ

    मैलपिघी काय : यह दो भागों से मिलकर बना होता है –

    बोमेन सम्पुट : यह एक प्यालेनुमा संरचना होती है , यह पोड़ोसाइड कोशिकाओं से बनी होती है |

    ग्लोमेरुलस : बोमेन सम्पुट में अभिवाही धमनिका एक गुच्छे के रूप में उपस्थित रहती है , जिसे ग्लोमेरूलस कहते है |

    समीपस्थ कुंडलित नलिका : यह बोमेन सम्पुट से जुडी रहती है , इसका व्यास 50 म्यू का होता है | यह घनाकार एपिथिलयम कोशिकाओ से बनी होती है |

    हेन्ले लूप : यह u आकार की नलिका होती है जो समीपस्थ व दूरस्थ कुंडलिका नलिका के बीच में होती है , यह शल्की उपकला कोशिकाओं से बनी होती है |

    दूरस्थ कुंडलित नलिका : यह संग्राहक नलिका व हेन्ले लूप के मध्य स्थित होती है , यह घनाकार एपिथिलियम कोशिकाओ से निर्मित होती है |

    संग्राहक नलिका : प्रत्येक वृक्क नलिका आगे की ओर संग्राहक नलिका में खुलती है , संग्राहक नलिकाएँ आपस में मिलकर बेलिनाइ नलिका बनाती है |

    मूत्रवाहिनी (ureters) 

    मनुष्य में एक जोड़ी मूत्रवाहिनियाँ पायी जाती है जो पोल्विस से प्रारम्भ होकर मूत्राशय में खुलती है | मुत्रवाहिनी की भित्ति मोटी व गुहा संकरी होती है, इसकी भित्ति में क्रमाकुंचन गति होती है |

    मूत्राशय (Urinary Bladder)

    यह पेशियों से बना थैले के समान संरचना होती है जिसमें मूत्रवाहिनियाँ खुलती है,  इसमें मूत्र का संचय किया जाता है |

    मूत्रमार्ग (Urethra)

    मूत्राशय मूत्रमार्ग के रूप में बाहर खुलता है, पुरुष में मूत्रमार्ग की लम्बाई 15-20cm तथा स्त्रियों में 4cm होती है |

    मनुष्य के उत्सर्जी अंग

    उत्सर्जी अंगकार्य
    वृक्कनाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ, जल की अतिरिक्त में मात्रा एवं टॉक्सिन्स को बाहर करना ।
    फेफड़ेCO2 एवं जल को जल वाष्प के रूप में बाहर करना।
    आंत्रअनपचे भोजन एवं अन्य उत्सर्जी पदार्थों को मल के रूप में बाहर करना।
    यकृतअमोनिया को यूरिया में बदलना।
    त्वचाजल, खनिज लवण, स्वेद तथा कुछ मात्रा में नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर करना।

    मनुष्य के शरीर से उत्सर्जित होने वाले प्रमुख उत्सर्जी पदार्थ हैंः

    1. कार्बन डाइऑक्साइड

    2. जल

    3. खनिज लवण

    4. पित्त

    5. यूरिया

    उत्सर्जन तन्त्र के विकार

    1. मूत्राशय

    2. वृक्क पथरी (कैल्शियम ऑक्सेलेट तथा फॉस्फेट्स के जमाव के कारण)

    मनुष्य में उत्सर्जन कार्य

    त्वचा

    त्वचा में उपस्थिति तैलीय ग्रन्थियां एवं स्वेद ग्रन्थियां क्रमशः सीबम एवं पसीने का स्राव करती हैं। सीबम एवं पसीने के साथ अनेक उत्सर्जी पदार्थ शरीर से बाहर निष्कासित हो जाते हैं।

    फेफड़ा

    मनुष्यों में वैसे तो फेफड़ा श्वसन तंत्र से सम्बन्धित अंग है लेकिन यह श्वसन के साथ-साथ उत्सर्जन का भी कार्य करता है। फेफड़े द्वारा दो प्रकार के गैसीय पदार्थों कार्बन डाइऑक्साइड एवं जलवाष्प का उत्सर्जन होता है। कुछ पदार्थ जैसे-लहसुन, प्याज और कुछ मसाले जिनमें कुछ वाष्पशील घटक पाये जाते हैं, का उत्सर्जन फेफड़ों के द्वारा होता है।

    यकृत

    यकृत कोशिकाएं आवश्यकता से अधिक ऐमीनो अम्ल तथा रुधिर की अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित करके उत्सर्जन में मुख्य भूमिका निभाती हैं। इसके अतिरिक्त यकृत तथा प्लीहा कोशिकाएं टूटी-फूटी रुधिर कोशिकाओं को विखंडित कर उन्हें रक्त प्रवाह से अलग करती हैं। यकृत कोशिकाएं हीमोग्लोबिन का भी विखण्डन कर उन्हें रक्त प्रवाह से अलग करती हैं।

    पाचन तंत्र

    यह शरीर से कुछ विशेष लवणों, कैलिशयम, आयरन, मैगनीशियम और वसा को उत्सर्जित करने के लिए जिम्मेदार होता है।

    वृक्क द्वारा मूत्र निर्माण और नेफ्रॉन (वृक्काणु या वृक्क नलिका का कार्य)

    हर वृक्क या गुर्दे में पाया जाने वाला हर वृक्काणु मूत्र बनाने वाला एक स्वतंत्र इकाई होता है। इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी के द्वारा ही देखा जा सकता है।

    जैसा की पहले भी बताया गया है वृक्क के कार्यात्मक इकाई के रूप में वृक्काणु रक्त का प्रारम्भिक निस्यन्दन पूर्ण करके, निस्यन्द से उन पदार्थों का दुबारा अवशोषण कर लेते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी होते हैं तथा व्यर्थ पदार्थ मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

    वृक्काणु दो प्रकार के होते हैं- कॉर्टिकल और जक्स्टामेड्यूलरी।

    कॉर्टिकल वृक्काणु कॉर्टेक्स के शुरुआती दो तिहाई भाग में रहते हैं जिनकी नलिकीय संरचनाएं केवल मेड्यूला के वृक्कीय पिरामिड के आधार तक होती है जबकि जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु के लम्बे लूप वृक्कीय पिरामिड की गहराई में निकले रहते हैं।

    कॉर्टिकल वृक्काणु जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु की अपेक्षा लगभग सात गुने अधिक होते हैं। सामान्य अवस्थाओं में गुर्दो का कार्य, कॉर्टिकल वृक्काणु में होता रहता है लेकिन जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु दबाव अधिक होने की स्थितियों में ही सक्रिय होते हैं।

    हर वृक्काणु के निम्न दो मुख्य भाग होते हैंः

    * कोशिकागुच्छीय या बोमैंस सम्पुट,

    * वृक्कीय (गुर्दे) नलिका

    मूत्र को बनाने में वृक्क तीन प्रक्रियाओं का प्रयोग करते हैंः

    * कोशिका गुच्छीय निस्यन्दन

    * नलिकीय पुनरवशोषण

    * नलिकीय स्रवण

    कोशिका गुच्छीय निस्यन्दन

    गुच्छ एक निस्यन्दक के रूप में कार्य करता है। जब रक्त अभिवाही धमनिका से गुच्छ में से होकर बहता है तो इसका दबाव अधिक होता है । इस दबाव से रक्त प्लाज्मा का कुछ भाग गुच्छ कैप्सूल में पहुंच जाता है लेकिन रक्त कोशिकाएं और प्लाज्मा प्रोटीन्स के बड़े अणु गुच्छ के अंदर ही रह जाते हैं क्योंकि ये कैप्सूल की अर्द्धपारगम्य भित्तियों के छिद्रों से होकर गुजर नहीं पाते हैं। इस प्रक्रिया को ‘गुच्छ निस्यन्दन या फिल्ट्रेशन’ कहते हैं तथा उत्पन्न हुए द्रव को गुच्छ निस्यन्द या फिल्ट्रेट कहते हैं।

    नलिकीय पुनरवशोषण

    छनकर आया हुआ द्रव (ग्लोमेरुलर निस्यन्द) फिर वृक्काणुओं या वृक्कीय (गुर्दे) नलिकाओं से होकर गुजरता है तो शरीर के लिए उपयोगी पदार्थों जैसे- जल, सोडियम, आयन्स, ग्लूकोज तथा अमीनो अम्लों का वृक्काणु नलिकाओं की कोशिकाओं द्वारा पुनः अवशोषण हो जाता है तथा शरीर की चयापचयी क्रियाओं के दौरान उत्पन्न तथा रक्त में जमा विषैले पदार्थ, जैसे- यूरिया, यूरिक एसिड और क्रिएटिनीन आदि का अवशोषण नहीं होता और ये मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यह प्रक्रिया ‘नलिकीय पुर्नवशोषण’ कहलाती है।

    नलिकीय स्रवण

    शरीर के लिए कुछ अनावश्यक आयन्स और पदार्थ परिनलिकीय कोशिकाओं के रक्त से गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द में पहुंच जाते हैं जो संवलित नलिकाओं में होकर गुजरते हैं। इस प्रकार पोटैशियम आयन्स, हाइड्रोजन आयन्स जैसे उत्पाद, कुछ औषधियां और कार्बनिक यौगिक मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यह प्रक्रिया नलिकीय स्रवण कहलाती है।

    गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द वृक्काणु (नेफ्रॉन) में होकर गुर्दे के अंदरूनी भाग मेड्यूला में तथा फिर दुबारा कॉर्टेक्स में पहुंचता है। इस प्रक्रिया में जरूरी पदार्थ जैसे- जल और ग्लूकोज का रक्त में पुनरवशोषण हो जाता है। अंत में, गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द दुबारा मेड्यूला में पहुंचता है, जहां यह मूत्र कहलाता है तथा मूत्रनली से होकर मूत्राशय में पहुंच जाता है। छना हुआ रक्त दुबारा वृक्कीय शिरा द्वारा शरीर में पहुंच जाता है।

    उत्सर्जन से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य (Smart facts about Excretory System)

    केंचुआ, ऐस्कैरिस, फुफ्फुस मछली तथा जीनोपस में यूरिया व अमोनिया दोनों का उत्सर्जन होता है। मूत्र त्याग की प्रक्रिया को मिक्टयूरेशन (micturition) कहते हैं।

    मनुष्य में प्यूरीन का उत्सर्जी पदार्थ यूरिक अम्ल तथा पिरीमिडीन का उत्सर्जी पदार्थ एलेनीन है।

    डायलाइसिस ( dialysis) अर्द्धपारगम्य झिल्ली से विसरण के द्वारा रुधिर से उत्सर्जी पदार्थों को पृथक करना डायलेसिस कहलाता है। प्रत्येक केशिका गुच्छ (glomerulus) एक डायलेसिस थैली का कार्य करती है।

    वृक्क में प्रति मिनट एक लीटर रुधिर बहता है।

  • मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) | हृदय (Heart) और रुधिर (Blood) | जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals)

    मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) | हृदय (Heart) और रुधिर (Blood) | जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) क्या है ? जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals) से क्या तात्पर्य है ? रुधिर परिसंचरण क्षेत्र और लसीका परिसंचरण तन्त्र क्या होते है ? हृदय (Heart) कैसे कार्य करता है ? हृदय (Heart) की संरचना और कार्य क्या है ? लसीका तंत्र (Lymphatic system in Hindi) क्या है ? आदि | साथ ही इसमें मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) सचित्र और हृदय की संरचना (सचित्र)) (Structure of Heart) के बारे में बताया गया है |

    जन्तुओं में परिसंचरण तन्त्र (Circulatory System in Animals)

    उच्च बहुकोशिकीय जन्तुओं में आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति एवं अनावश्यक पदार्थों का बहिष्करण सीधे कोशिका द्वारा न होकर एक विशेष तन्त्र, जिसे परिसंचरण तन्त्र कहा जाता है, द्वारा होता है।

    परिसंचरण तंत्र का अर्थ होता है, एक तत्व को एक स्थान से दुसरे स्थान तक परिवहन करना यानी परिसंचरण तंत्र यातयात का साधन है, जो रक्त का परिवहन करता है |

    यह तन्त्र दो प्रकार का होता है :

    खुला परिसंचरण तन्त्र (Open Circulatory System)

    इसमें केशिका तन्त्र नहीं पाया जाता है। हृदय द्वारा पम्प किया गया रुधिर वाहिकाओं द्वारा सीधे निर्धारित स्थान पर पहुँचता है। इस तन्त्र में रुधिर कम दाब तथा कम वेग से बहता है। इस प्रकार का रुधिर परिसंचरण तन्त्र संघ – एनीलिडा के जन्तुओं तिलचट्टा, कीट, मछली आदि में पाए जाते हैं।

    बन्द परिसंचरण तन्त्र (Closed Circulatory System)

    इसमें रुधिर बंद नलिकाओं में अधिक दाब एवं वेग से बहता है। इसमें पदार्थों का आदान प्रदान ऊतक द्रव्य द्वारा होता है। यह केंचुएँ, मोलस्का एवं सभी कशेरुकियों में पाया जाता है। मनुष्य में विकसित बन्द तथा दोहरा परिसंचरण तन्त्र पाया जाता है।

    मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System)

    सर विलियम हार्वे व मारसेली मैल्पिजी ने सबसे पहले रुधिर परिसंचरण (Blood circulation) के बारे में बताया था | मनुष्य में बंद परिसंचरण तंत्र (Closed circulatory system) एवं कीटों में खुला परिसंचरण तंत्र  (Open circulatory system) पाया जाता हैं | मानव रुधिर का pH 7.3 से 7.4 होता हैं. यह हल्का क्षारीय होता हैं |

    मनुष्य के रुधिर परिसंचरण तन्त्र में मुख्य संवहनी पदार्थ रुधिर होता है। रक्त परिसंचरण तंत्र शरीर की सभी कोशिकाओ तक प्रयुक्त पोषक तत्व ऑक्सीजन जल तथा अन्य पदार्थो को पहुंचाता है | तथा हमारे शरीर की आंतरिक सुरक्षा करता है |

    ये हमारे शरीर के pH मान को संतुलित बनाए रखता है | ये गैसे से लेकर हार्मोन तक सभी का परिवहन करता है | मनुष्य का रुधिर परिसंचरण तन्त्र दो भागों से मिलकर बना होता है।

    1. रुधिर परिसंचरण क्षेत्र

    2. लसीका परिसंचरण तन्त्र

    हृदय (Heart)

    हृदय

    हृदय एक मोटा, पेशीय, संकुचनशील स्वतः पम्पिंग अंग है। इसका वह भाग, जो शरीर के ऊतकों से रुधिर ग्रहण करता है, अलिन्द (auricle) कहलाता है तथा हृदय वह भाग है, जो ऊतकों में रुधिर पम्प करता है, निलय (ventricle) कहलाता है।

    हृदय वक्ष गुहा (thoracic cavity)

    हृदय वक्ष गुहा (thoracic cavity) में दोनों फेफड़ों के मध्य स्थित होता है।

    हृदय के चारों और द्विकलायुक्त कोष पाया जाता है। यह कला पेरीकार्डियम कहलाती है। दोनों कलाओं के मध्य पेरीकार्डियल द्रव से भरी एक गुहा पाई जाती है। पेरीकार्डियल द्रव हृदय की धक्कों से सुरक्षा करता है।

    मनुष्य का हृदय चार-कोष्ठीय होता है, जिसमें दो अलिन्द एवं दो निलय पाए जाते हैं। अलिन्द की दीवार पतली होती है, जबकि निलय की दीवार अपेक्षाकृत मोटी होती है |

    दायाँ अलिन्द

    दायाँ अलिन्द में सुपीरियर वेना कावा एवं इन्फीरियर वेना कावा से अनॉक्सीकृत रुधिर आता है। दायाँ अलिन्द, दाएँ निलय में एक चौड़े, वृत्तीय दाएँ अलिन्द निलय छिद्र (Auriculoventricular Aperture) द्वारा खुलता है, जो ट्राइकस्पिड वाल्व (Tricuspid Valve) द्वारा ढका होता है।

    ट्राइकस्पिड वाल्व, दाएँ अलिन्द से दाएँ निलय की ओर रुधिर के एक दिशीय प्रवाह को नियन्त्रित करता है।

    दायाँ निलय

    इससे फुफ्फुस धमनी (pulmonary artery) निकल कर फेफड़ों में पहुँचती है, जिसमें अनॉक्सीकृत प्रवाहित होता है।

    बायाँ अलिन्द

    इससे फुफ्फुस शिरा के द्वारा फेफड़ों से ऑक्सीकृत रुधिर आता है। इनमें वाल्व अनुपस्थित होते हैं। बायाँ अलिन्द, बायाँ निलय में, बाएँ अलिन्द-निलय छिद्र द्वारा खुलता है। अलिन्द-निलय छिद्र बाइकस्पिड वाल्व अथवा मिट्रल वाल्व (mitral valve) द्वारा ढका रहता है। बाइकस्पिड वाल्व बाएँ अलिन्द से बाएँ निलय में रुधिर के विपरीत प्रवाह को रोकता है।

    बायाँ निलय

    इससे बड़ी रुधिर नलिका निकलती है जिसे महाधमनी (aorta) कहते हैं। महाधमनी शरीर के विभिन्न भागों में ऑक्सीकृत रुधिर प्रवाहित करती है ।

    हृदय की क्रियाविधि (Mechanism of Heart)

    शरीर में रुधिर का परिसंचरण हृदय की पम्प क्रिया द्वारा सम्पन्न होता है। इसमें दो अवस्थाएँ होती हैं। प्रथम प्रंकुचन (systole) की अवस्था, जिसमें निलय सिकुड़ते हैं और उनमें भरे रुधिर को महाधमनियों में पम्प करते हैं। द्वितीय अवस्था को अनुशिथिलन (diastole) कहते हैं, जिसमें निलय फैलते हैं और अलिन्द से रुधिर प्राप्त करते हैं।

    एक प्रकुंचन तथा एक अनुशिथिलन मिलकर हृदय धड़कन (Heart Beat) का निर्माण करते हैं।

    एक स्वस्थ्य मनुष्य का हृदय 1 मिनट में 72 बार धड़कता है, जबकि कड़ी मेहनत या व्यायाम के फलस्वरूप बढ़कर 1 मिनट में 180 बार तक हो सकता है।

    हृदय की धड़कन दाहिने अलिन्द के ऊपरी भाग में स्थित ऊतकों के समूह शिरा अलिन्द नोड से शुरु होती है, इसे ही पेसमेकर (Pacemaker) कहते हैं

    हृदय के भीतर संकुलन एवं अनुशीथिलन के आवेग का प्रसारण विद्युत रासायनिक तरंगों के रूप में होता है, जो शिरा- अलिन्द नोड (SAN) से प्रारम्भ होकर निलयों तक जाता है। हृदय के धड़कन के दौरान वैद्युत परिवर्तन को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम नामक उपकरण द्वारा रिकार्ड किया जाता है, जिसे इलैक्ट्रोकार्डियोग्राफ या ECG कहते हैं।

    हृदय की संरचना (सचित्र)) (Structure of Heart)

    लसीका तंत्र (Lymphatic system in Hindi)

    लसिका वाहिनियों में लसिका बहती हैं जिसका कार्य कोशिका एवं रुधिर के मध्य पदार्थों के विसरण में सहायता पहुचाना एवं रुधिर से विसरित प्रोटीन एवं श्वेत रक्त कणिकाओं को वापिस रुधिर तक ले जाना हैं | इनका संचरण हमेशा ऊतकों से ह्रदय की ओर ही होता हैं |

    लसिका वाहिनियाँ शिराओं में जाकर खुलती हैं | इन वाहिनियों के मार्ग में मुख्यतः गले, बगल, जांघ एवं पेट आदि में लसिका ग्रंथियां होती हैं इन ग्रंथियों में लिम्फोसाइटस एकत्रित रहती हैं | लसिका ग्रंथियां हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधकता में प्रमुख भूमिका निभाती हैं |

    ह्रदय की धड़कन को पेसमेकर नियंत्रित करता हैं.

    एक स्वस्थ वयस्क का रक्त दाब लगभग 120/90 होता हैं ह्रदय के प्रकुचन (Systole) के समय दाब अधिकतम होता हैं और शिथिलन (Diastole) के समय निम्नतम रहता हैं |

    ह्रदय व धमनी सम्बन्धी रोग (Heart and artery disease)

    आस्टियो क्लोरोसिस (Osteosclerosis) – धमनी की दीवारों का अपेक्षाकृत कठोर हो जाना

    उच्च रुधिर दाब (High Blood Pressure)

    थम्बोसिस (Thrombosis) – इसमें रुधिर वाहिका के भीतर रुधिर का धक्का जम जाता हैं.

    ह्रदय मरमर – कई बच्चों में ह्रदय सामान्य परिवर्धित नही होता हैं | और शुद्ध व अशुद्ध रुधिर मिल जाते हैं | या निलय से आलिंद में रुधिर टपकने लगता हैं | जिसे ह्रदय मरमर कहते हैं |

    ह्रदयाघात (Heart attack) – रुधिर वाहिका (धमनियों) में कोलिस्टरोल (cholesterol) जम जाने से रक्त प्रवाह में रुकावट आ जाती हैं और ह्रदय के कार्य करने में रुकावट हो जाती हैं. इससे व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती हैं |

    हृदय से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य (Smart facts about Heart)

    • मछलियों में केवल दो-कोष्ठीय हृदय पाया जाता है जिसमें एक अलिन्द एवं एक निलय होता है।
    • सरीसृपों के हृदय संरचना में तीन कोष्ठीय तथा कार्य में चार-कोष्ठीय (four-chambered) होता है।
    • पक्षियों एवं स्तनियों में हृदय चार कोष्ठीय होता है, जिसमें दो अलिन्द एवं दो निलय होते हैं।
    • पुरुषों में हृदय का औसत वजन 280-340 ग्राम तथा महिलाओं में 230-380 ग्राम होता है।
    • पहली हृदय ध्वनि लब आलिन्द निलय कपाट के बन्द होने के कारण जबकि द्वितीय हृदय ध्वनि डप अर्द्धचन्द्राकार कपाटों के अचानक बाद होने के कारण होती है।
    • दो हृदय ध्वनियों के बीच मरमर की ध्वनि किसी कपाट के खराब होने पर रूधिर के टपकने के कारण होती है।
    • आरटीरियोस्क्लेरोसिस (arteriosclerosis) में धमनी की भित्ती में कोलेस्ट्राल जम जाने के कारण भित्तियाँ कठोर हो जाती है।

    रुधिर (Blood)

    यह लाल संवहनी (vascular) संयोजी ऊतक है, जिसमें हीमोग्लोबिन, हीमोसायिक प्लाज्मा प्रोटीन आदि उपस्थित होते हैं।

    रुधिर नलिकाएँ (Blood Vessels)

    रुधिर नलिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं :

    1. धमनियाँ (Arteries)

    मोटी भित्तियुक्त रुधिर नलिकाएँ, जो रुधिर को हृदय से विभिन्न अंगों में पहुँचाती हैं। ये शरीर में गहराई में स्थित होती है तथा इनमें वाल्व का अभाव होता है। फुफ्फुस धमनी के अतिरिक्त सभी धमनियों में ऑक्सीकृत रुधिर प्रवाहित होता है। सभी धमनियों में रुधिर अधिक दाब एवं अधिक गति से बहता है।

    2. शिराएँ (Veins)

    ये पतली भित्ति वाली रुधिर नलिकाएँ हैं, जो विभिन्न अंगों से रुधिर को हृदय तक ले जाती है। ये शरीर में अधिक गहराई में नहीं होती तथा इनमें रुधिर की विपरीत गति को रोकने हेतु वाल्व पाए जाते हैं। इनमें रुधिर कम दाब एवं कम गति से बहता है। फुफ्फुस शिरा के अतिरिक्त सभी शिराओं में अनॉक्सीकृत रुधिर प्रवाहित होता है।

    3. वाहिनियाँ (Capillaries)

    ये सबसे पतली रुधिर नलिकाएँ हैं, जो धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं। प्रत्येक वाहिनी चपटी कोशिकाओं की एक परत से बनी होती है। ये पोषक पदार्थों, वर्ज्य पदार्थों, गैस आदि का रुधिर एवं कोशिका के मध्य आदान-प्रदान करने में सहायक हैं।

    मानव परिसंचरण तन्त्र (Human Circulatory System in Hindi) सचित्र

    समीपस्थ संवलित नलिका (Proximal Convoluted Tubule-PCT)

    सरल घनाकार ब्रुश बॉर्डर उपकला से बनी यह नलिका अवशोषण के लिए सतह क्षेत्र को बढ़ाती है। सभी आवश्यक पोषक 70-80% वैद्युत अपघट्य और जल का पुनः अवशोषण इसी भाग द्वारा होता है। यह pH तथा आयनी सन्तुलन को बनाए रखने का लिए अमोनिया का निस्यन्द में स्रवण और HCO3 का पुनरावशोषण करती है।

    ग्लोमेरुलस में रुधिर लाने वाली अभिवाही धमनिका (afferent arteriole)

    अपवाही धमनिका (efferent arteriole) की अपेक्षा अधिक चौड़ी होती है। इस असामनता के फलस्वरूप गतिरोध उत्पन्न होता है। गतिरोध के कारण ग्लोमेरुलस की रुधिर केशिकाओं में रुधिर दाब काफी बढ़ जाने से रुधिर का प्लाज्मा छनकर (ग्लोमेरूलर निस्यन्द या नेफ्रिक निस्यन्द) बोमैन सम्पुट में आ जाता है।

    हेनले लूप (Loop of Henle)

    न्यूनतम पुनरावशोषण होता है। हेनले लूप की अवरोही भुजा जल के लिए पारगम्य होती है, परन्तु वैद्युतअपघट्य के लिए लगभग अपारगम्य होती है। आरोही भुजा जल के लिए अपारगम्य होती है। अवरोही शाखा में अन्तराकाशी द्रव की बढ़ी समसान्द्रता के कारण जल का पुनरावशोषण होता है। यहाँ पर निस्यन्द प्लाज्मा से अतिपरासारी बन जाता है। आरोही शाखा Na+, K+, Ca+2, Mg+2 तथा CI का पुनरावशोषण होता है।

    दूरस्थ संवलित नलिका (Distal Convoluted Tubule-DCT)

    विशिष्ट परिस्थितियों में Na+ और जल का कुछ पुनरावशोषण रुधिर में सोडियम-पोटैशियम का सन्तुलन तथा pH बनाए रखने के लिए बाइकार्बोनेट्स का पुनरावशोषण एवं H+, K और NH3 का चयनात्मक स्रावण होता है।

    संग्रह नलिका (Collecting Tubule)

    मूत्र को सान्द्र करने के लिए जल का बड़ा हिस्सा इस भाग में अवशोषित किया जाता है। यह pH के नियमन तथा H+ व K+ आयनों के चयनात्मक स्रवण का कार्य करती है।

    मूत्र का संघटन

    24 घण्टे में 1-1.8 लीटर मूत्र का उत्सर्जन

    रंग = पीला (यूरोक्रोम)

    pH = 6.0

    विशिष्ट घनत्व = 1.015-1.02 गन्ध का कारण = यूरीनोड

    जल = 95%

    यूरिया = 2.6%, यूरिक अम्ल = 0.03%, अमोनिया = 0.25%, लवण = 2%

    मूत्र में अनियमितता (Abnormality in Urine)

    (i) प्रोटीन यूरिया – मूत्र में प्रोटीन की उपस्थिति

    (ii) एल्ब्यूमिनयूरिया – मूत्र में एल्ब्यूमिन की उपस्थिति

    (ii) यूरेमिया – मूत्र में अत्यधिक यूरिया का पाया जाना

    (iv) हीमेट्यूरिया – मूत्र में रुधिर का पाया जाना

    (v) पाइयूरिया – मूत्र में WBCs या मवाद (pus) का पाया जाना

    (vi) हीमोग्लोबिनयूरिया – मूत्र के साथ हीमोग्लोबिन का त्याग

    (vi) कीटोन्यूरिया – मूत्र में कीटोन बॉडीज (vill) ग्लाइकोसूरिया – मूत्र में ग्लूकोस

  • पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि | पौधों में परिवहन (Transportation in Plants in Hindi)

    पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि | पौधों में परिवहन (Transportation in Plants in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि और पौधों में परिवहन (Transportation in Plants क्या है ? पादप और जल के बीच में क्या सम्बन्ध है ? पोधों में परिवहन की प्रक्रिया (Transportation in Plants) क्या है ? पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) का क्या योगदान है ? पौधों में परिसंचरण की विधियां कोनसी है ? रसारोहण (Desertification) क्या है ? विसरण दाब न्यूनता (Diffusion Pressure Deficit — DPD) क्या है ? वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) क्या है ? वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रावण में क्या अन्तर है ? आदि

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation) क्या है ? What is Transportation in Plants

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation) का तात्पर्य जड़ द्वारा भूमि से अवशोषित जल एवं खनिज लवणों की पत्तियों तक पहुँचकर प्रकाश संश्लेषण हेतु विशिष्ट स्थिति उत्पन्न करना तथा पत्तियों में संश्लेषित कार्बनिक पदार्थ को अन्य अंगों तक पहुँचता है।

    सरल शब्दों में कहे तो परिवहन वह प्रक्रिया है जिसे जरिये पौधे अपने जीवन के लिए उसके सभी भागों में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करते है |

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation in Plants) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। पेड़ अपनी जड़ों से पत्तियों की युक्तियों तक जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों और पानी का परिवहन करते हैं। पौधों में परिवहन के मामले में, सबसे बड़ी बाधा पानी है क्योंकि यह विकास में एक सीमित कारक के रूप में समाप्त होता है। इस समस्या को दूर करने के लिए, पेड़ों और अन्य पौधों में पानी के अवशोषण (absorption) और स्थानान्तरण (translocation) की सही व्यवस्था होती है।

    पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem)

    पौधों में पानी और खनिजों का परिवहन दो प्रकार के संवाहक ऊतकों द्वारा किया जाता है:

    1. जाइलम

    2. फ्लाएम

    पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) से युक्त नलिकाओं का एक विशाल नेटवर्क होता है। यह उस  संचार प्रणाली (Circulatory system) की तरह है जैसी प्रणाली से पूरे मानव शरीर में रक्त का संचार होता है । मनुष्यों में संचार प्रणाली के समान, जाइलम और फ्लोएम ऊतक (tissue) पूरे पौधे में फैले होते हैं। ये संवाहक ऊतक (conducting tissues ) जड़ों से उत्पन्न होते हैं और पेड़ों की टहनियाँ के माध्यम से ऊपर जाते हैं। बाद में वे शाखाओं में बंट जाते हैं और फिर मकड़ी के जाले की तरह हर पत्ते में ओर भी आगे बढ़ते हैं।

    जाइलम (Xylem)

    जाइलम एक लंबी, निर्जीव नली है जो जड़ों से पत्तियों तक तने के माध्यम से चलती है। पानी जड़ के बालों (root hair) द्वारा अवशोषित किया जाता है और जब तक यह जाइलम तक नहीं पहुंच जाता, तब तक परासरण द्वारा कोशिका से कोशिका की गति (cell movement) से गुजरता है। यह पानी तब जाइलम वाहिकाओं के माध्यम से पत्तियों तक पहुँचाया जाता है और वाष्पोत्सर्जन (transpiration) की प्रक्रिया द्वारा वाष्पित हो जाता है।

    जाइलम भी फ्लोएम जैसी लम्बी कोशिकाओं से बना होता है। हालांकि, जाइलम विशेष रूप से जड़ों से सभी पौधों के हिस्सों तक पानी पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है। चूंकि वे इतना महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, एक पेड़ में बहुत सारे जाइलम ऊतक होते है ।

    फ्लाएम (Phloem)

    फ्लोएम पोधों में पोषक तत्वों और शर्करा जैसे कार्बोहाइड्रेट के स्थानान्तरण के लिए जिम्मेदार होता है, जो पत्तियों द्वारा पौधे के उन क्षेत्रों में उत्पादित होता है जो चयापचय (metabolically) रूप से सक्रिय होते हैं। यह जीवित कोशिकाओं से बना होता है। इन कोशिकाओं की कोशिका भित्ति कोशिकाओं के सिरों पर छोटे-छोटे छिद्र बनाती है जिन्हें चालनी प्लेट (sieve plates) कहा जाता है।

    पौधों में परिवहन स्तर

    एक कोशिका से दूसरी कोशिका में पदार्थ का परिवहन (Transportation of substance from one cell to another)

    फ्लोएम और जाइलम के भीतर रस का लंबी दूरी तक परिवहन (Long-Distance transport of sap within phloem and xylem)

    अलग-अलग कोशिकाओं द्वारा विलेय और पानी का विमोचन और अवशोषण (The release and uptake of solute and water by individual cells)

    पौधों में परिसंचरण की विधियां

    विसरण (Diffusion)

    सभी पदार्थ (ठोस, द्रव एवं गैस) के अणु गतिज ऊर्जा (kinetic energy) के कारण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थान की और गति करते हैं यहीं गति विसरण कहलाती है।

    परासरण (Osmosis)

    यह विसरण की एक विशिष्ट प्रक्रिया है, जब दो भिन्न सान्द्रता वाले विलयनों को अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक किया जाता है, तो विलायक का कम सान्द्रता वाले विलयन से अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर होने वाला विसरण परासरण कहलाता है।

    किसी विलयन का परासरण दाब वह दाब है, जो उस विलयन की अर्द्धपरागम्य झिल्ली द्वारा विलायक (अथवा कम सान्द्रता वाले विलयन) से पृथक करने पर अधिक सान्द्रता वाले विलयन में विलायक के परासरण के कारण उत्पन्न होता है।

    स्फीति दाब तथा भित्ति दाब (Turgor Pressure and Wall Pressure)

    जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भित्ति पर डाला गया दाब ही स्फीति दाब कहलाता है। यह क्रिया अन्तः परासरण की स्थिति में होता है।

    स्फीति दाब के साथ-साथ ही इसके बराबर व विपरीत (Equal and Opposite ) एक दाब कोशिका भित्तियों द्वारा भी उत्पन्न होता है, जो भित्ति दाब कहलाता है।

    विसरण दाब न्यूनता (Diffusion Pressure Deficit — DPD)

    किसी शुद्ध विलायक (अर्थात् सर्वाधिक विसरण दाब युक्त) में पदार्थों को घोलने पर उसके विसरण दाब में आई कमी को विसरण दाब न्यूनता या चूषण दाब (Suction Pressure) कहते हैं। यह दाब न्यूनता परासरण दाब तथा स्फीति दाब के अन्तर के बराबर होती है। इसे ही जल विभव (water potential) कहा जाता है।

    जल का अवशोषण (Absorption of water) शैवालों में जल का अवशोषण सभी कोशिकाओं द्वारा, ब्रायोफाइटा में मूलाभासों (rhizoids) द्वारा तथा टेरिडोफाइटा, अनावृतबीजी व आवृतबीजी में जड़ों द्वारा होता है। जड़ में कोशिका परिपक्वन प्रदेश (Zone of Cell Maturation) में उपस्थित मूलरोमों के द्वारा पौधे जल का अवशोषण करते हैं।

    रसारोहण (Desertification) क्या है ?

    जड़ों द्वारा अवशोषित जल का गुरुत्वाकर्षण के विपरीत स्तम्भ, शाखाओं तथा पत्तियों तक पहुँचने की क्रिया रसारोहण कहलाती है। सर जे. सी. बोस ने रसारोहण का पल्सेशन वाद प्रस्तुत किया।

    डिक्सन तथा जोली द्वारा दिए गए वाष्पोत्सर्जनाकर्षण- जलीय संसंजक मत (Transpiration pull-cohesive force of water theory) के अनुसार, रसारोहण की क्रिया निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है।

    वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (Transpiration Pull)

    पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं की भित्तियों से जल के वाष्पन के कारण इनकी परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाब न्यूनता (DPD) अधिक हो जाती है, और परासरण द्वारा जल जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) से पर्ण मध्योतक कोशिकाओं में प्रवेश करता है। इससे जाइलम द्रव में उत्पन्न तनाव को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण कहा जाता है।

    जल का संसंजक बल (Cohesive Force of Water)

    हाइड्रोजन बन्धों के कारण जल के अणुओं के बीच परस्पर आकर्षण को संसंजक बल कहते हैं। संसंजक बल के कारण मूल रोम से पत्तियों तक जल का एक अविरल स्तम्भ (continuous column) बना रहता है ।

    जल का आसंजक बल (Adhesive Force of Water)

    जल के अणु संकीर्ण जाइलम वाहिकाओं तथा वाहिनिकाओं से आसंजक बल द्वारा जुड़े रहते हैं।

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation in Plants) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    सम परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरण दाब कोशिका रस (cell sap) के परासरण दाब के बराबर होता है।

    अति परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरणी दाब कोशिका रस के परासरण दाब की तुलना में अधिक होता है।

    अल्प परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरण दाब कोशिका रस के परासरण दाब की तुलना में कम होता है। किसी पदार्थ के ठोस कणों द्वारा किसी द्रव को बिना विलयन बनाए अवशोषण करने को अन्त शोषण (imbibition) कहते हैं। जैसे कपास के रेशे, बीज, लकड़ी के बुरादे आदि ऐसे पदार्थ हैं, जो इसी प्रक्रिया से जल सोखते हैं, और फुलकर मोटे हो जाते हैं। पौधों में अधिक वाष्पोत्सर्जन के कारण पत्तियों के मुरझा जाने की प्रक्रिया म्लानि (wilting) कहलाती है।

    पौधों की पत्तियों के किनारों पर उपस्थित जल रन्ध्रों (hydathodes) से बूँदों के रूप में जल की हानि बिन्दुस्राव ( guttation) कहलाती है। यह मूल दाब के कारण होता है। वाष्पोत्सर्जन की दर की माप पोटोमीटर (potometer) से की जाती है। जलोद्भिद पौधों की पत्तियों में रन्ध्रों का अभाव होता है।

    वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) क्या है ?

    पौधों के वायवीय भागों से जल की वाष्प के रूप में हानि वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहलाती है।

    वाष्पोत्सर्जन तीन प्रकार का होता है

    1. रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन – 80-90%

    2. उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन – 3-9%

    3. वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन – 0.1%

    रन्ध्र की संरचना

    रन्ध्र एक छोटा-सा छिद्र है, जो चारों ओर से गुर्दे या सेम के बीज के आकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं (epidermal cells) से घिरा होता है। इन कोशिकाओं को द्वार कोशिकाएँ या रक्षक कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ जीवित, हरितलवक युक्त तथा केन्द्रकयुक्त होती हैं। द्वार कोशिकाओं की अन्दर की भित्ति मोटी तथा बाहरी भित्ति पतली होती है।

    रक्षक कोशिकाओं के चारों ओर विभिन्न आकार के बाह्य त्वचीय कोशिकाएँ होती हैं, जिनको उपकोशिका या गौण कोशिका (subsidiary cells or accessory cells) कहते हैं।

    सक्रिय K+ स्थानान्तरण क्रियाविधि

    लेविट (1974) के अनुसार, प्रकाश की उपस्थिति में द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल उत्पन्न होता है, जो मैलेट व H+ में वियोजित हो जाता है और H+, K+ से बदल जाते हैं।

    H+ बाहर निकलते हैं और K+ अन्दर आ जाते हैं। K+ मैलेट से क्रिया करके पोटैशियम मैलेट का निर्माण करते हैं, जो कोशिका की रिक्तिका में स्थानान्तरित हो जाता है।

    पोटैशियम मैलेट की उपस्थिति में बाह्य त्वचा कोशिकाओं से द्वार कोशिकाओं में जल का परासरण होने से उनका स्फीति दाब बढ़ जाता है और रन्ध्र खुल जाते हैं।

    रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने की क्रियाविधि

    रन्ध्र प्रायः दिन में खुलते हैं, और रात्रि में बन्द रहते हैं, परन्तु CAM में रन्ध्र दिन में बन्द रहते हैं और रात्रि में खुलते हैं। रन्ध्र का खुलना व बन्द होना द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) तथा श्लथन (flaccidity) पर निर्भर करता है। स्फीति तथा श्लथ दशा के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत दिए गए  

    स्टार्च-शर्करा परिवर्तन मत

    सेयरे (1926) के अनुसार, प्रकाश → प्रकाश संश्लेषण → पत्ती में CO2 की सान्द्रता में कमी → द्वार कोशिकाओं की pH का बढ़ना → एन्जाइम द्वारा स्टार्च का शर्करा में परिवर्तन → द्वार कोशिकाओं के परासरण दाब का बढ़ना → द्वार कोशिकाओं में जल का गमन → द्वार कोशिकाएँ स्फीति दशा में → रन्ध्रीय छिद्र का खुलना

    वाष्पोत्सर्जन का महत्त्व

    वाष्पोत्सर्जन मूल से शीर्ष तक जल, खनिज लवणों के परिवहन तथा तापक्रम सन्तुलन में उपयोगी है।

    करटिस (1926) ने वाष्पोत्सर्जन को आवश्यक दुर्गुण कहा।

    वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक

    वाष्पोत्सर्जन की दर आपेक्षिक आर्द्रता व्युत्क्रमानुपाती होती है अर्थात् आर्द्रता के बढ़ने पर वाष्पोत्सर्जन की दर घटती है।

    वाष्पोत्सर्जन की दर वायु की गति के अनुक्रमानुपाती होती है। तापमान बढ़ने के साथ वाष्पोत्सर्जन की दर भी बढ़ जाती है।

    CO2 की कम सान्द्रता पर वाष्पोत्सर्जन अधिक व CO2 की अधिक सान्द्रता पर व वाष्पोत्सर्जन कम होता है।

    एब्सिसिक अम्ल, फिनाइल मरक्यूरिक एसीटेट, ऐस्पेरीन आदि वाष्पोत्सर्जन की दर को घटा देते हैं।

    वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रावण में अन्तर

    वाष्पोत्सर्जनबिन्दुस्रावण
    यह क्रिया दिन में होती है।यह क्रिया रात में होती है।
    पानी वाष्प बनकर उड़ता है।पानी द्रव के रूप में निकलता है।
    यह क्रिया रन्ध्रों द्वारा होती है।यह जल रन्ध्रों द्वारा होती है, जो शिराओं के अन्त में होते हैं।
    वाष्पोत्सर्जित जल शुद्ध होता है।जल शुद्ध नहीं होता है, अपितु इसमें खनिज तथा शर्करा आदि मिलते हैं।
    यह क्रिया रन्ध्रों से नियन्त्रित है।यह क्रिया अनियन्त्रित है।
    यदि सतह का तापमान घटा दिया जाए, तो वाष्पोत्सर्जन की क्रिया धीमी पड़ सकती है।इसमें ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है।
  • श्वसन तन्त्र | Respiratory System | मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)

    श्वसन तन्त्र | Respiratory System | मानव श्वसन तंत्र (Human Respiratory System)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की श्वसन तंत्र यानी Respiratory System क्या होता है, मानव श्वसन तंत्र, मानव श्वसन तंत्र की क्रियाविधि, मानव श्वसन तंत्र कैसे कार्य करता है?, मनुष्य श्वसन तंत्र की संरचना क्या होती है, श्वसन के लिय गैसों का विनिमय (Exchange of gases) किस प्रकार होता है, श्वसन से जुडी किण्वन (Fermentation) क्रिया क्या होती है, मानव श्वसन तंत्र से जुड़े महत्वपुर्ण अंग कोनसे है ? श्वसन तंत्र के कितने प्रकार होते है,

    श्वसन तन्त्र (Respiratory System) क्या है ?

    श्वसन एक ऑक्सीकारक एवं ऊर्जा प्रदान करने वाली प्रक्रिया है, जिसमें जटिल कार्बनिक यौगिकों के टूटने से सरल यौगिक बनते है और CO2 गैस मुक्त होती है। अर्थात् श्वसन का आशय ऐसी प्रक्रिया से है, जिसमें वायुमण्डलीय ऑक्सीजन शरीर की कोशिकाओं में पहुँचकर भोजन का ऑक्सीकरण या दहन सम्पूर्ण करती है तथा CO2 गैस बाहर निकलती है। श्वसन की सम्पूर्ण प्रक्रिया को दो भागों में बाँटा जा सकता है |

    बाह्य श्वसन (External Respiration)

    रुधिर एवं वायु के बीच O2 तथा CO2 का आदान-प्रदान बाह्य श्वसन कहलाता है। यह निम्नलिखित दो प्रकार से होता है:

    1. श्वासोच्छवास (Breathing)

    इसके अन्तर्गत फेफड़ों में निश्चित दर से वायु भरी एवं निकाली जाती है, जिसे साँस लेना भी कहते हैं। इसमें मुख्यतया दो क्रियाएँ होती हैं :

    (a) निःश्वसन (Inspiration)

    इस अवस्था में वायु वातावरण से वायु पथ द्वारा फेफड़े में प्रवेश करती है, जिसे नि: श्वसन कहते हैं। निः श्वसन में बाह्य अन्तरपर्शुक पेशियाँ सिकुड़ती हैं, पसलियाँ तथा स्टर्नम ऊपर तथा बाहर की और खिचतें हैं, जिससे वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है एवं फेफड़ों में निम्न दाब उत्पन्न हो जाता है।

    (b) उच्छश्वसन (Expiration)

    इस क्रिया में श्वसन के पश्चात वायु उसी वायु-पथ के द्वारा फेफड़े से बाहर निकलकर वातावरण में पुन: लौट आती है, जिस वायुपथ से वह फेफड़ों में प्रवेश करती है।

    श्वासोच्छ्वास में प्रयुक्त वायु का संगठन

     नाइट्रोजनऑक्सीजनकार्बनडाइऑक्साइड
    अन्दर ली गई वायु78.09%21%0.03%
    बाहर निकाली गई वायु78.09%17%4%

    निःश्वसन (Inspiration) तथा उच्छश्वसन (Expiration) में अन्तर

    निःश्वसनउच्छश्वसन
    यह वायुमण्डल की वायु का फेफड़ों में प्रवेश की प्रक्रिया है।यह फेफड़ों में भरी वायु का फेफड़ों से बाहर निकलने की क्रिया है।
    इससे फेफड़ों में वायुदाब कम होता है।इससे फेफड़ों में वायुदाब बढ़ता है।
    इसमें डायफ्राम की अरीय पेशियाँ सिकुड़ती हैं, जिससे डायफ्राम चपटा हो जाता है।इसमें डायफ्राम की अरीय पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, जिससे डायफ्राम गुम्बद के समान हो जाता है।
    इसमें प्ल्यूरल गुहाओं का आयतन अधिक होता है।इसमें प्ल्यूरल गुहाओं का आयतन कम होता है।

    2. गैसों का विनिमय (Exchange of gases)

    फेफड़ों के अन्दर गैसों का विनिमय होता है, यह प्रक्रिया घुली अवस्था या विसरणं प्रवणता (diffusion gradient) के आधार पर साधारण विसरण द्वारा होती है। इस क्रिया में फेफड़ों में O2 एवं CO2 का विनिमय उनके दाबों के अन्तर के कारण होता है। इन दोनों गैसों के विसरण की दिशा एक दूसरे के विपरीत होती है।

    श्वासोच्छवास के फलस्वरूप वायु फेफड़े के चारों और विभिन्न वायुकोष्ठकों घना जाल उपस्थित रहता है। इस समय वायु की ऑक्सीजन महीन शिरा केशिकाओं की दीवार से होकर रुधिर में पहुँच जाती है।

    गैसों का परिवहन

    इसके अन्तर्गत O2 का परिवहन रुधिर में पाए जाने वाले लाल वर्णक हीमोग्लोबिन के द्वारा शरीर के विभिन्न कोशिकाओं तक होता है जबकि, CO2 का परिवहन कोशिकाओं से फेफड़ों तक निम्न प्रकार से होता है:

    • CO2 के 70% भाग का परिवहन पोटैशियम बाइकार्बोनेट एवं सोडियम बाइकार्बोनेट के रूप में होता है।
    • CO2 के 23% भाग का परिवहन हीमोग्लोबिन द्वारा।
    • CO2 के 7% भाग का परिवहन प्लाज्मा में घुलकर कार्बनिक अम्ल के रूप में होता है।

    आन्तरिक श्वसन (Internal Respiration)

    शरीर के अन्दर रुधिर एवं ऊतक द्रव्य के बीच गैसीय विनिमय (O2 एवं CO2) आन्तरिक श्वसन कहलाता है।

    कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration)

    कोशिकाओं में कार्बनिक पदार्थों; जैसे ग्लूकोज का ऑक्सीजन द्वारा ऑक्सीकरण की क्रिया कोशिकीय श्वसन कहलाती है। ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर यह श्वसन वायवीय एवं अवायवीय होता है।

    किण्वन (Fermentation)

    यह अवायवीय श्वसन से मिलती-जुलती क्रिया है, जिसमें कार्बनिक यौगिकों का सरल पदार्थों के रूप में विघटन बैक्टीरिया एवं अन्य सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति में होता है। यीस्ट कोशिकाओं द्वारा शर्करा का एल्कोहॉलीय किण्वन इसका उदाहरण है। यीस्ट कोशिकाओं में शर्करा के किण्वन से एल्कोहॉल एवं CO2 बनते हैं।

    किण्वन की यह क्रिया जाइमेज (zymase) एन्जाइम की उपस्थिति में होती है। इस क्रिया में भी अवायवीय श्वसन की तरह ग्लाइकोलाइसिस प्रक्रम से बना पाइरुविक अम्ल दो चरणों में CO2 एवं एल्कोहॉल में टूट जाता है तथा समान मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। यद्यपि किण्वन में एल्कोहॉल एवं CO2 की उत्पत्ति कोशिकाओं के बाहर होती है, जिसके कारण सूक्ष्म जीवों की कोशिकाओं पर एल्कोहॉल का विषैला प्रभाव नहीं पड़ता, जबकि अवायवीय श्वसन में एल्कोहॉल एवं CO2 कोशिकाओं के अन्दर उत्पन्न होते हैं। यही कारण है कि इस विषैले एल्कोहॉल के कारण कोशिकाएँ मृत्यु ग्रस्त हो जाती हैं।

    कोशिकीय श्वसन की क्रियाविधि

    श्वसन क्रिया ग्लूकोस से प्रारम्भ होती है। यह ग्लाइकोलाइसिस तथा वायवीय एवं अवायवीय ऑक्सीकरण में विभाजित होती है। ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) इसे EMP पथ भी कहा जाता है, चूँकि इसके विभिन्न पदों की खोज क्रमशः एम्बडेन मेयरहॉफ तथा पारनास ने की थी।

    ग्लाइकोलाइसिस की क्रिया कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में सम्पन्न होती है। इस चरण में ग्लूकोज के एक अणु से पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं का निर्माण होता है। इसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है अर्थात् यह चरण वायवीय एवं अवायवीय श्वसन दोनों में एक जैसा होता है।

    वायवीय एवं अवायवीय श्वसन में अन्तर

    वायवीय श्वसनअवायवीय श्वसन
    ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।
    श्वसनी पदार्थ का पूरा ऑक्सीकरण होता है।श्वसनी पदार्थ का पूरा ऑक्सीकरण नहीं होता है।
    CO2 व जल अन्तिम उत्पाद होते हैंअन्तिम उत्पाद कोई कार्बनिक यौगिक (जैसे, एल्कोहॉल, लैक्टिक अम्ल आदि) होता है।
    ग्लूकोज के एक अणु से 686 कि कैलोरी ऊर्जा निकलती है अर्थात् 38 ATP का निर्माण होता हैग्लूकोज के एक अणु से केवल 56 कि कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है अर्थात् 2 ATP का निर्माण होता है।
    वायवीय या ऑक्सीश्वसन का प्रथम चरण कोशिकाद्रव्य में तथा द्वितीय चरण माइटोकॉण्ड्रिया में सम्पन्न होता है।अवायवीय श्वसन की सम्पूर्ण प्रक्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है।

    ग्लाइकोलाइसिस में ग्लूकोस के एक अणु से

    1. पाइरुविक अम्ल के दो अणु बनते हैं।

    2. ATP के चार अणु बनते हैं, परन्तु इस क्रिया में 2 ATP अणु खर्च होते हैं अर्थात् शुद्ध लाभ 2 ATP का होता है।

    3. NADH + H+ के दो अणु बनते हैं। ग्लाइकोलाइसिस की क्रिया में CO2 उत्पन्न नहीं होती है।

    पाइरुविक अम्ल का वायवीय ऑक्सीकरण

    कोशिकाद्रव्य में उत्पन्न हुआ पाइरुविक अम्ल माइटोकॉण्ड्रिया में प्रवेश करता है जहाँ O2 की उपस्थिति में इसका वायवीय ऑक्सीकरण होता है। यहाँ पाइरुविक अम्ल Co-A से मिलकर एसीटाइल Co-A बनाता है, जिसके अर्न्तगत माइटोकॉण्ड्रिया में पाइरुविक अम्ल का ऑक्सीय विकार्बोक्सिलीकरण तथा विहाइड्रोजनीकरण होता है।

    इस क्रिया में 6 ATP अणुओं (2 NADH + H+ = 2×3) का लाभ होता है। यह क्रिया ग्लाइकोलाइसिस एवं क्रैब्स चक्र के मध्य संयोजी कड़ी का कार्य करती है।

    क्रैब्स चक्र (Kerb’s Cycle)

    इस क्रिया की खोज हैन्स क्रैब्स ने की थी। इसे साइट्रिक अम्ल चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र भी कहा जाता है। यह क्रिया माइटोकॉण्ड्रिया के अन्दर सम्पन्न होती है इस क्रिया के फलस्वरूप एसीटाइल Co-A का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है फलस्वरूप H2O, CO2, NADH+H+ तथा ATP उत्पन्न होते हैं।

    एसीटाइल Co-A कोशिका में उपस्थित ऑक्जलोएसीटिक अम्ल एवं जल से क्रिया कर साइट्रिक अम्ल बनाता है। इस साइट्रिक अम्ल का क्रेब्स चक्र में धीरे-धीरे कई अभिक्रियाओं के माध्यम से क्रमबद्ध विघटन होता है।

    इन अभिक्रियाओं के फलस्वरूप कई मध्यवर्ती अम्ल बनते हैं; जैसे—ऑक्जलोसक्सिनिक अम्ल, अल्फा-कीटोग्लूटेरिक अम्ल, सक्सिनिक अम्ल, फ्यूमेरिक अम्ल एवं मैलिक अम्ल। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप CO2 के 2 अणु एवं हाइड्रोजन के 8 परमाणु मुक्त होते हैं। अन्ततः मैलिक अम्ल का परिवर्तन ऑक्जलोएसिटिक अम्ल में हो जाता है। यह दूसरे एसिटाइल कोएन्जाइम-A के अणु के साथ संयुक्त होकर क्रैब्स चक्र में पुन: प्रवेश करता है।

    ऊर्जा का उत्पादन

    पाइरुविक अम्ल के एक अणु के ऑक्सीकरण से ATP का एक अणु पाँच अणु NADH2, के व 1 अणु FADH2 का बनता है NADH2 के एक अणु से 3 अणु ATP के , जबकि FADH2 के एक अणु से ATP के 2 अणु प्राप्त होते हैं। इस प्रकार पाइरुविक अम्ल के एक अणु से 1+ ( 3 × 5 ) + ( 2 × 1) = 1+ 15 + 2 = 18 अणु ATP के बनते हैं। चूँकि ग्लूकोज के एक अणु से दो पाइरुविक अम्ल के अणु बनते हैं 2 × 18 = 36 अणु ATP, पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं से प्राप्त होते हैं।

    ग्लाइकोलिसिस के दौरान भी 2 ATP अणुओं का लाभ होता है। अतः ग्लूकोज के 1 अणु के ऑक्सीकरण से 2 + 36 = 38 ATP अणु प्राप्त होते हैं। स्पष्ट है कि हमारे तन्त्र में अधिकतम ATP अणुओं को उत्पादन क्रैब्स चक्र के दौरान होता है।

    मानव श्वसन तन्त्र (Human Respiratory System)

    मानव में प्रमुख श्वसन अंग फेफड़े होते हैं, जो वक्षगुहा में, कशेरुकदण्ड तथा पसलियों द्वारा बने एक कटघरे में सुरक्षित रहते हैं। फेफड़ों तक बाहरी वायु के आवागमन हेतु नासिका, प्रसनी, वायुनाल तथा इसकी शाखाएँ मिलकर एक जटिल वायु मार्ग बनाती है अत: ये सारे अंग मिलकर श्वसन तन्त्र बनाते हैं।

    श्वसन पथ का क्रम

    नासाद्वार → ग्रसनी → कण्ठ → श्वासनाल →श्वसनी → श्वसनिकाएँ → फेफड़े → वायुकोष्ठक-केशिका → रुधिर

    मनुष्य में फेफड़े श्वसन तन्त्र में श्वसन अंग का कार्य करते हैं। फेफड़े के ऊपर दोहरी झिल्ली होती है, जिसे फुफ्फुसावरणी या प्लूरा (plura) कहते हैं। मनुष्य में फेफड़ा तीन पालियों में विभक्त होता है, जिसमें स्थित वायु कोष्ठक (alveoli) के माध्यम से गैसों का विनिमय होता है।

    श्वसन भागफल

    श्वसन भागफल (RQ)

    श्वसन भागफल का मान कार्बोहाइड्रेट के लिए = 1, प्रोटीन के लिए = 0.9, वसा के लिए = 0.7, जबकि कार्बनिक अम्ल के लिए = 1 से अधिक

    जन्तुओं में श्वसन वर्णक

    वर्णक स्थिति धात्विक समूह रंग जंतु
    हीमोग्लोबिनRBC एवं प्लाज्मालौहलालसभी कशेरूकी, एनीलिडा एवं मोलस्का
    हीमोसायनिनप्लाज्माताँबानीलाअधिकांश मोलस्का एवं आर्थोपोडा में
    हीमोएरिथिनRBCलौहलालकुछ एनीलिडा में
    क्लोरोक्रुओरिनप्लाज्माताँबाहराकुछ एनीलिडा में
    पिन्नोग्लोबिनप्लाज्मामैंगनीजभूराकुछ मोलस्का में

    कुछ जन्तुओं में श्वसन अंग

    श्वसन अंगजंतु
    फेफड़ेमनुष्य, मेंढक, पक्षी और छिपकली
    त्वचामेंढक और केंचुआ
    क्लोममेंढक का लार्वा और मछली
    श्वसन नालकीट
    बुक फेफड़ेमकड़ी और बिच्छु

    श्वसन विकार

    एम्फाइसमा सिगरेट पीने से फेफड़े में स्थित, वायु कूपिकाओं में समस्या आ जाती है । जैसे- श्वसनी दमा, श्वसनी शोथ, न्यूमोनिया, सायनोसिस आदि।

    मानव श्वसन तन्त्र (Human Respiratory System) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    मनुष्य में श्वसन को नियन्त्रण करने वाला श्वसन केन्द्र मेड्यूला ऑब्लोंगेटा में होता है।

    जब कार्बोहाइड्रेट का अवायवीय श्वसन होता है, तो श्वसन भागफल (RQ) अनन्त (infinite) होता है ।

    हीमोग्लोबिन से CO (कार्बन मोनोक्साइड) के मिलने की क्षमता ऑक्सीजन की क्षमता से लगभग 250 गुना अधिक होती है।

    हैमबर्गर प्रक्रिया का सम्बन्ध CO2 के परिवहन से है।

    फेफड़ों में हैल्डेन प्रभाव हीमोग्लोबिन द्वारा O2 ग्रहण करने के कारण CO2 के बहिष्कार को प्रोत्साहित करता है, जबकि ऊतकों में यह O2 के बहिष्कार को प्रोत्साहित करता है।
    श्वसन भागफल गैनाँग के रेसपाइरोमीटर द्वारा मापा जाता है।

    श्वसन को प्रभावित करने वाले कारक

    • ऑक्सीजन इसकी उपस्थिति में वायवीय श्वसन तथा अनुपस्थिति में अवायवीय श्वसन होता है।
    • तापमान 0°C-35°C तापक्रम के बीच प्रत्येक 10°C तापमान बढ़ने पर श्वसन की दर 2-2.5 गुना बढ़ती है।
    • कार्बन डाइऑक्साइड वायुमण्डल में CO2 की सान्द्रता बढ़ने पर श्वसन की दर कम हो जाती है।
    • जल इसकी मात्रा बढ़ने से श्वसन दर एक सीमा तक बढ़ती है। अत्यन्त कम जल मात्रा में श्वसन की दर न्यूनतम होती है।
    • प्रकाश श्वसन दिन-रात होता है, परन्तु प्रकाश की उपस्थिति में तापमान बढ़ने व श्वसन प्रयुक्त पदार्थों की मात्रा अधिक होने के कारण श्वसन दर बढ़ जाती है।
    • क्षति क्षतिग्रस्त ऊतकों में श्वसन की दर अस्थायी रूप से तीव्र हो जाती है।
    • संदमक विभिन्न रासायनिक पदार्थ-सायनाइड, CO मैलोनेट आदि श्वसन को संदमित करते हैं।
  • मानव पाचन तंत्र | Human Digestive System in Hindi – Detailed

    मानव पाचन तंत्र | Human Digestive System in Hindi – Detailed

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) किस तरह से काम करता है, कोनसे अंग इस प्रक्रिया में महत्वपुर्ण भूमिका निभाते है, मुखगुहा (Buccal Cavity), आमाशय (Stomach), छोटी आंत (Small Intestine), बड़ी आंत (Large Intestine) द्वारा कैसे पाचन की क्रिया पूर्ण होती है, साथ ही जानेगे की पचे हुए भोजन का अवशोषण एवं स्वांगीकरण (Absorption and Assimilation of Digestive Food) कैसे होता है, अपचित भोजन का बहिष्करण (Egestion of Indigested Food) कैसे होता है, पाचन से सम्बन्धित ग्रन्थियाँ (Glands Related to Digestion) कोन कोंनसी है, यकृत के कार्य (Function of Liver) क्या है?, अग्नाशय (Pancreas) क्या है? और पाचन से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य कोनसे है आदि |

    बहुकोशिकीय जीवधारियों में शरीर की कोशिकाएँ अलग-अलग कार्य करने के लिए विशिष्टीकृत हो जाती हैं। इस विशिष्टीकरण के कारण इनकी रचना भी अपने-अपने कार्यों के अनुरूप भिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इस प्रकार बहुकोशिकीय जीवधारियों के शरीर में विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं के समूह बन जाते हैं, जिसे ऊतक कहा जाता है। कई ऊतकों के समूह अंग एवं कई अंग मिलकर अंग तन्त्र बनाते हैं, जैसे—मुख, आमाशय, यकृत आदि अंग मिलकर पाचन हेतु पाचन तन्त्र बनाते हैं।

    मानव पाचन तंत्र क्रिया (process of Human Digestive System)

    वे जटिल भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रियाएँ, जिनके द्वारा जटिल एवं अघुलनशील भोज्य कणों को सरल, घुलनशील एवं अवशोषण योग्य भोज्य कणों में परिवर्तित किया जाता है, पाचन कहलाता है। मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) यानी भोजन के पाचन की क्रिया पाँच चरणों में; जैसे- अन्तर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण तथा मल त्याग में पूर्ण होती है।

    मनुष्य के पाचन तन्त्र में एक आहारनाल और सहयोगी ग्रन्थियाँ होती हैं। आहारनाल मुख, मुखगुहा, ग्रसनी, प्रसिका, आमाशय, क्षुद्रान्त्र (छोटी आंत), वृहदान्त्र (बड़ी आंत), मलाशय और मल द्वार से बनी होती है। सहायक पाचन ग्रन्थियों में लार अन्थि, यकृत और अग्न्याशय हैं।

    मुखगुहा में पाचन (Digestion in Buccal Cavity)

    मुख के अन्दर दाँत भोजन को चबाते हैं। जीभ स्वाद को पहचानती है और भोजन को लार के साथ मिलाकर इसे अच्छी तरह से चबाने के लिए सुगम बनाती है। लार में उपस्थित टायलिन या एमाइलेज एन्जाइम स्टार्च पर कार्य करता है और स्टार्च को माल्टोज शर्करा में अपघटित कर देता है तथा माल्टेज एन्जाइम माल्टोज शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।

    मनुष्य के ऊपरी व निचले जबड़ों में कुल 32 दाँत होते हैं। मनुष्य के दाँत गर्तदन्ती (thecodont), द्विवारदन्ती (diphyodont ) तथा विषमदन्ती (heterodont) तीन प्रकार के होते हैं। मनुष्य के जबड़े में दो कृन्तक, एक रदनक, दो अग्रचवर्णक तथा तीन चवर्णक दाँत पाये जाते हैं।

    मनुष्य दन्तसूत्र

    जीभ

    जीभ मुखगुहा के निचले भाग पर स्थित एक मोटी मांसल रचना होती है, जिसकी ऊपरी सतह पर कई छोटे-छोटे अंकुर (papillae) होते हैं, जिन्हें स्वाद कलियाँ ( taste buds) कहते हैं। जीभ के अग्रभाग से मीठे स्वाद का पश्च भाग से कड़वे स्वाद का तथा बगल के भाग से खट्टे स्वाद का आभास होता है। टायलिन एन्जाइम के कारण भोजन के स्वाद में मिठास आ जाती है।

    आमाशय में पाचन (Digestion in Stomach)

    मुखगुहा से लार से सना हुआ भोजन निगल द्वार के द्वारा ग्रासनली (Oesophagus) में पहुँचता है, जहाँ से क्रमाकुंचन की प्रक्रिया द्वारा ग्रासनली से आमाशय में भोजन परन्तु पहुँचता है। आमाशय में प्रोटीन एवं वसा का पाचन प्रारम्भ हो जाता है, कार्बोहाइड्रेट का पाचन नहीं होता है।

    आमाशय में पाइलोरिक ग्रन्थियों से जठर रस (gastric juice) निकलता है, जबकि ऑक्सिन्टिक या भित्तिय कोशिकाओं से HCI निकलता है। जठर रस में पेप्सिन और रेनिन एन्जाइम होते है, जिसमें से पेप्सिन प्रोटीन को पाचन कर उसे पेप्टोन्स में बदल देती है, जबकि रेनिन दूध में घुली हुई प्रोटीन केसीन को ठोस प्रोटीन कैल्शियम पैराकेसीनेट में परिवर्तित कर देती हैं। इस प्रकार दूध फट जाता है। अब पेप्सिन इस प्रोटीन (केसीन) को पेप्टोन्स में परिवर्तित कर देती है। आमाशय में वसा पाचक एन्जाइम जठर लाइपेज वसीय पदार्थों पर क्रिया कर उसे छोटे-छोटे अणुओं में तोड़ देता है।

    आमाशय में स्रावित HCI मुख्य रूप से भोजन के माध्यम को अम्लीय बनाता है, जिससे लार के टाइलिन की क्रिया समाप्त हो जाती है। यह अम्ल भोजन के साथ आए जीवाणुओं को नष्ट कर देता है तथा एन्जाइम की क्रिया को तीव्र कर देता है।

    छोटी आंत में पाचन (Digestion in Small Intestine)

    छोटी आंत में पित्त, अग्न्याशयी रस तथा आंत रस आकर मिलते हैं तथा भोजन का पाचन पूर्ण करते हैं। पित्त एवं अग्न्याशयी रस आंत के pH को क्षारीय करते हैं। इसमें तीन एन्जाइम होते हैं, जिसमें ट्रिप्सिन, प्रोटीन को पॉलीपेप्टाइड एवं अमीनो अम्ल में, एमाइलेज स्टार्च को सरल शर्करा में, जबकि लाइपेज वसीय पदार्थों को ग्लिसरॉल एवं वसीय अम्ल (fatty acid) में तोड़ देता है। छोटी आंत आहारनाल का सबसे लम्बा भाग होता है। आहारनाल के इसी भाग में पाचन की क्रिया पूर्ण होती है।

    बड़ी आंत में पाचन (Digestion in Large Intestine)

    बड़ी आंत में उपस्थित चूषक कोशिकाएँ (goblet cells) श्लेष्मा का स्रावण करती हैं। यहाँ पर अपचे भोजन से जल का अवशोषण होता है फलतः मल गाढ़ा हो जाता है। शाकाहारी जन्तुओं के भोजन में उपस्थित सेलुलोज का पाचन यहीं पर होता है, जहाँ विद्यमान सहजीवी जीवाणु (symbiotic bacteria) इस सेलुलोज को शर्करा में बदल देती है।

    पचे हुए भोजन का अवशोषण एवं स्वांगीकरण (Absorption and Assimilation of Digestive Food)

    छोटी आंत में ही पचे भोजन का अवशोषण मुख्य रूप से होता है। छोटी आंत की सतह पर अंगुलीनुमा उभार पाए जाते हैं, जिन्हें आंत रसाकुंरों (intestinal villi) कहते हैं। इन्हीं रसांकुरों पर रुधिर केशिकाएँ और लिम्फ वाहिनियाँ का जाल बिछा होता है, जो पचे भोजन के अवशोषण में सहायक होती हैं। रुधिर केशिकाओं से ग्लूकोज तथा अमीनो अम्ल का अवशोषण, जबकि वसा अम्ल एवं ग्लिसरोल का अवशोषण लसीका (lymph) द्वारा हो जाता है।

    अपचित भोजन का बहिष्करण (Egestion of Indigested Food)

    बड़ी आंत में जल का अवशोषण होने के बाद शेष बचा अपच भोजन मलाशय के माध्यम से मलद्वार द्वारा बाहर निकल जाता है। अंतत: इसी प्रक्रिया के साथ पाचन की क्रिया समाप्त होती है।

    पाचन से सम्बन्धित ग्रन्थियाँ (Glands Related to Digestion)

    लार ग्रन्थि (salivary glands) तीन जोड़ी (i) अधोजिह्वा ग्रन्थि (sublingual glands) जिह्वा के दोनों ओर, एक-एक (ii) अधोजम्भ ग्रन्थि (sub-maxillary gland) निचले जबड़े के मध्य एक-एक (iii) कर्ण पूर्व ग्रन्थि (parotid gland) कर्णों के नीचे दोनों ओर एक-एक । लार में लगभग 99% जल, लगभग 1% एन्जाइम होते हैं। इसमें टायलिन एवं लाइसोजाइम नामक एन्जाइम होता है। लार कुछ तत्व; जैसे-लैड (शीशा) Pb, मर्करी (Hg) व आयोडाइड (I2) का स्रावण करती हैं।

    यकृत (liver) सबसे बड़ी ग्रन्थि है। मनुष्य में इसका भार लगभग 1.5 किलोग्राम होता है।

    यकृत के शिरापात्रों (sinusoids) में कुप्फर कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जो मृत RBCs व जीवाणुओं का भक्षण करती हैं।

    यकृत के कार्य (Function of Liver)


    यकृत पित्त का स्रावण करता है, जो पित्ताशय (gall-bladder) में संचित होता है संग्रह करता है। तथा ग्लाइकोजन हिपेरिन, फाइब्रिनोजन तथा प्रोथ्रॉम्बिन का स्रावण करता है।

    यकृत प्रोटीन उपापचय में भाग लेता है, जिसके फलस्वरूप अमोनिया, यूरिया आदि उत्पन्न होते हैं। यकृत अमोनिया को यूरिया में बदल देता है।

    यूरिया का संश्लेषण करता है तथा विटामिन A, D तथा B12 का निर्माण करता है।

    अमीनो अम्लों का डीऐमीनेशन तथा विषैले पदार्थों का विषहरण (detoxification) करता है।

    फैगोसाइटोसिस क्रिया द्वारा जीवाणुओं का भक्षण करता है। भ्रूणावस्था में लाल रुधिराणुओं का निर्माण करता है।

    अग्नाशय (Pancreas)

    यह शरीर की दूसरी बड़ी मिश्रित प्रन्थि (mixed gland) है। इसके अन्तःस्रावी भाग में निम्न प्रकार की कोशिकाएं होती है।

    एल्फा कोशिकाएँ (α-cells), जो ग्लूकेगॉन हॉर्मोन स्रावित करती हैं।

    बीटा कोशिकाएँ (β-cells), जो इन्सुलिन हॉमोन स्रावित करती हैं। इन्सुलिन रुधिर में शर्करा की मात्रा को नियन्त्रित करने का काम करता है। इन्सुलिन के अल्प स्रावण से मधुमेह (diabetes) नामक रोग हो जाता है।

    डेल्टा कोशिकाएँ (δ-cells), जो सोमेटोस्टेटिन हॉर्मोन स्रावित करती हैं।

    • अग्न्याशय का बाह्य या एक्सोक्राइन भाग जिसे एसीनी कोशिकाएँ कहते हैं अग्न्याशयी रस का स्त्रावण करता है, जो भोजन के पाचन में सहायक है।

    मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) की क्रिया सचित्र

    मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    लार में उपस्थित टायलिन एन्जाइम का स्रावण पेरोटिड ग्रन्थियाँ द्वारा होता है ।

    लार में उपस्थित छोटी आंत में बुनर्स ग्रन्थियों द्वारा आंत्र रस निकलता है ।

    बड़ी आंत में उपस्थित सैलोबायोपैरस एवं क्लॉस्ट्रिडियम जीवाणु तथा एन्टोडोनियम नामक प्रोटोजोआ सीकम में सेलुलोज के पाचन में सहायता करते हैं ।

    मनुष्य की दाँत का प्रमुख भाग डेन्टीन का बना होता है ।

    पाइलोरिक वाल्व आमाशय एवं ग्रहणी के बीच पाए जाते हैं ।

    बाइलीरुबिन एवं बिलीवर्डिन वर्णक पित्त रस में पाए जाते है ।

    लाइसोजाइम एक प्रति जीवाणु एन्जाइम है, जो भक्षक कोशिकाओं, आँसुओं, लार एवं स्वेद स्रावों में पाया जाता है ।

    मानव पाचन तंत्र का नामांकित चित्र

  • क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    Resource

    https://iopscience.iop.org/article/10.3847/2041-8213/ac83bd

    https://www.sciencealert.com/asteroid-ryugu-reveals-ancient-grains-of-stardust-older-than-the-solar-system

    करीब 6 साल के एक जापानी अंतरिक्ष मिशन में जुटाए गए गए दुर्लभ नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा है कि हमारे सौर मंडल के बाहरी किनारों से एस्‍टरॉयड्स द्वारा पानी पृथ्वी पर लाया गया हो सकता है।

    जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड के निर्माण पर रोशनी डालने के लिए रिसर्चर्स साल 2020 में एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) से पृथ्वी पर लाए गए मटेरियल की जांच कर रहे हैं।

    एक एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 5.4 ग्राम (0.2 औंस) वजन वाली चट्टान और धूल को एक जापानी स्‍पेस प्रोब, “हायाबुसा -2′ (Hayabusa-2) ने इकट्ठा किया था। यह प्रोब उस आकाशीय पिंड पर उतरा था और उसने पिंड के सर्फेस पर एक ‘प्रभावक’ (impactor) को फायर किया था। इस मटीरियल से जुड़ी स्‍टडी प्रकाशित होने लगी हैं।

    एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) क्या है ?

    यह सी-प्रकार के क्षुद्रग्रह 162173 रयुगु का रंगीन दृश्य है, जिसे हायाबुसा 2 के बोर्ड पर ओएनसी-टी कैमरे द्वारा देखा गया है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका में सोकोरो, न्यू मैक्सिको के पास लिंकन लैब के ईटीएस (Lincoln Lab’s ETS ) में लिंकन नियर-अर्थ क्षुद्रग्रह अनुसंधान (Lincoln Near-Earth Asteroid Research) के साथ खगोलविदों द्वारा 10 मई 1999 को रयुगु की खोज की गई थी। इसे अनंतिम पदनाम 1999 JU3 दिया गया था | इसका व्यास लगभग 1 किलोमीटर (0.62 मील) है और यह दुर्लभ वर्णक्रमीय प्रकार Cb (rare spectral type Cb) की एक काली वस्तु है, जिसमें C-प्रकार के क्षुद्रग्रह (C-type asteroid) और B-प्रकार के क्षुद्रग्रह ((B-type asteroid)) दोनों के गुण हैं।

    28 सितंबर 2015 को माइनर प्लैनेट सेंटर (Minor Planet Center ) द्वारा आधिकारिक तौर पर क्षुद्रग्रह का नाम “रयुगु” रखा गया था।

    यह नाम रियोगो-जो (ड्रैगन पैलेस) (Ryūgū-jō (Dragon Palace) को संदर्भित करता है, जो की एक जापानी लोककथा में एक जादुई महल होता है जो पानी के नीचे स्थित होता है | इस लोक कथा में, मछुआरा उरशिमा तारो (Urashima Tarō ) एक कछुए की पीठ पर इस जादुई महल की यात्रा करता है, और जब वह वापस उस महल से लौटता है, तो अपने साथ एक रहस्यमय बॉक्स लेकर आता है, जैसे हायाबुसा 2 इस एस्‍टरॉयड के नमूनों के साथ वापस पृथ्वी पर आया था |

    हायाबुसा-2 अंतरिक्ष यान जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (Japan Aerospace Exploration Agency (JAXA) द्वारा दिसंबर 2014 में लॉन्च किया गया था और 27 जून 2018 को यह सफलतापूर्वक क्षुद्रग्रह (asteroid) पर पहुंचा। 6 दिसंबर 2020 को एक कैप्सूल एस्‍टरॉयड के samples के साथ ऑस्ट्रेलिया में लैंड हुआ ।

    एस्‍टरॉयड रयुगु से क्या पाया वैज्ञानिकों ने ?

    इस साल जून में रिसर्चर्स के एक समूह ने कहा था कि उन्हें कार्बनिक पदार्थ मिला है, जिससे पता चलता है कि पृथ्वी पर जीवन के कुछ बिल्डिंग ब्‍लॉक्‍स, अमीनो एसिड अंतरिक्ष में बने हो सकते हैं।

    नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित एक नए पेपर में वैज्ञानिकों ने कहा है कि एस्‍टरॉयड ‘रयुगु’ (Ryugu) के सैंपल इस बात पर रोशनी डाल सकते हैं कि अरबों साल पहले पृथ्वी पर महासागर कैसे बने। जापान और अन्य देशों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि वाष्पशील और ऑर्गनिक रिच C-टाइप के एस्‍टरॉयड, पृथ्वी के पानी के प्रमुख सोर्सेज में से एक हो सकते हैं। उनके मुताबिक पृथ्वी पर वाष्पशील पदार्थ (ऑर्गेनिक्स और पानी) का होना अभी भी बहस का विषय है। खास बात यह है कि स्‍टडी में पहचाने गए रयुगु एस्‍टरॉयड के पार्टिकल्‍स में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ संभवत: वाष्पशील पदार्थ के एक अहम सोर्स हो सकते हैं। 

    हायाबुसा-2 को साल 2014 में लगभग 300 मिलियन किलोमीटर दूर ‘रयुगु’ एस्‍टरॉयड की ओर लॉन्‍च किया गया था। दो साल पहले ही यह पृथ्वी की कक्षा में लौटा था। नेचर एस्ट्रोनॉमी में पब्लिश हुई स्‍टडी में रिसर्चर्स ने मिशन द्वारा प्कीराप्त की गई खोजों को महत्वपुर्ण बताया है ।

  • रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    Resource: https://www.sciencealert.com/scientists-have-found-a-new-way-to-detect-alien-worlds-beyond-our-solar-system

    बीते कुछ वर्षों में साल से वैज्ञानिकों ने अपना फोकस एक्‍सोप्‍लैनेट की ओर बढ़ा दिया है। ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं उन्हें एक्सोप्लैनेट (exoplanets) कहलाते हैं। वैज्ञानिक लगातार नये ग्रहों की खोज इस उम्मीद में करते रहते है की शायद उन्‍हें वहां जीवन के संकेत मिल जाएंगे।

    एक्‍सोप्‍लैनेट को कैसे खोजा जाता है ?

    ज्‍यादातर एक्‍सोप्‍लैनेट को ट्रांजिट मेथड (transit method) द्वारा खोजा गया है। इसमें एक ऑप्टिकल टेलीस्कोप समय के साथ किसी तारे की चमक को मापता है। अगर तारे की चमक बहुत कम है, तो यह संकेत हो सकता है कि कोई ग्रह उसके सामने से गुजरा है। ट्रांजिट मेथड एक पावरफुल टूल है, लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं। इसके लिए ऑप्टिकल टेलीस्‍कोप चाहिए और तारे के पास से ग्रह को गुजरना चाहिए ।

    एक्सोप्लैनेट का पता लगाने का नया मेथड

    नई मेथड खगोलविदों को रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल करके एक्सोप्लैनेट का पता लगाने में मदद कर सकती है। Sciencealert की रिपोर्ट के अनुसार, रेडियो तरंग दैर्ध्य (Wavelengths) पर एक्सोप्लैनेट को ऑब्‍जर्व करना आसान नहीं है। ज्‍यादातर ग्रह बहुत ज्‍यादा रेडियो लाइट उत्सर्जित नहीं करते हैं और तारे ऐसा करते हैं। हालांकि तारों से निकलने वाले फ्लेयर्स (stellar flares) के कारण रेडियो लाइट में भी अंतर हो सकता है। लेकिन बृहस्पति जैसे बड़े गैस ग्रह रेडियो ब्राइट (radio bright) हो सकते हैं। इसकी वजह इनका मजबूत चुंबकीय क्षेत्र है। बृहस्पति ग्रह की रेडियो लाइट इतनी चमकदार है कि आप इसे घर में मौजूद रेडियो टेलीस्कोप से पहचान सकते हैं।

    बृहस्पति गृह की रेडियो इमेज (Radio image of Jupiter). (Imke de Pater; Michael H. Wong, UC Berkeley; Robert J. Sault, University of Melbourne)

    एस्‍ट्रोनॉमर्स ने कई और ग्रहों से रेडियो सिग्‍नल्‍स का पता लगाया है। स्‍टडी के दौरान टीम ने यह समझने की कोशिश की कि इस तरह के सिग्‍नल कैसे हो सकते हैं। उन्होंने अपने मॉडल को मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक्स (MHD) पर आधारित किया। यह बताता है कि चुंबकीय क्षेत्र और आयनित गैसें कैसे आपस में इंटरेक्‍ट करती हैं। अपनी स्‍टडी को वैज्ञानिकों ने HD 189733 के रूप में पहचाने के गए ग्रह सिस्‍टम पर अप्‍लाई किया। उन्होंने सिम्‍युलेट किया कि कैसे एक तारे की हवा ने ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र इंटरेक्‍ट किया।

    वैज्ञानिकों को कई दिलचस्‍प चीजें पता चलीं। उन्‍हें पता चला कि रेडियो ऑब्‍जर्वेशन अपने तारे के सामने से गुजरने वाले किसी ग्रह के ट्रांजिशन का पता लगा सकते हैं। हालांकि ऐसे सिग्‍नल काफी फीके होंगे और उन्‍हें पकड़ने के लिए नई जेनरेशन वाले रेडियो टेलिस्‍कोप की जरूरत होगी। लेकिन अगर हम उनका पता लगाते हैं, तो ग्रहों के रेडियो सिग्नल हमें सिस्टम में कम से कम एक ग्रह का सटीक ऑर्बिटल माप देंगे। इससे एक्सोप्लैनेट की संरचना और इंटीरियर को समझने में मदद मिलेगी।

  • तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) क्या है ?

    तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) क्या है ?

    बहुकोशिकीय जन्तुओं में पाये जाने वाले ऊतकों की चार प्रमुख श्रेणियाँ होती हैं:

    1. उपकला या एपीथीलियमी ऊतक (Epithelial tissues)
    2. संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
    3. पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
    4. तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue)

    इस आर्टिकल में हम बात करेगे तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) के बाते में |

    तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)

    तंत्रिका ऊतक मस्तिष्क (brain), रीढ़ की हड्डी (spinal cord) और तंत्रिकाओं (nerves) में पाए जाते हैं। यह शरीर की कई गतिविधियों के समन्वय और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है। यह मांसपेशियों के संकुचन को उत्तेजित करता है, पर्यावरण के बारे में जागरूकता पैदा करता है, और भावनाओं, स्मृति और तर्क में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। इन सभी चीजों को करने के लिए, तंत्रिका ऊतक में कोशिकाओं को विद्युत तंत्रिका आवेगों (electrical nerve impulses) के माध्यम से एक दूसरे के साथ संवाद करने में सक्षम होती है ।

    तन्त्रिका ऊतक संवेदना को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में भेजने का कार्य करता है। इसका निर्माण एक्टोडर्म से होता है। यह ऊतक तन्त्रिका ऊतक या न्यूरॉन का बना होता है। लम्बे तन्त्रिका तन्तु जिसे एक्सॉन भी कहते हैं एक न्यूरॉन के एक्सॉन की अन्तिम छोर की शाखाएँ दूसरे न्यूरॉन के डेन्ड्राइट्स से जुड़कर सिनैप्स बनाती है। आवेग का संचार एक्सॉन की एक कोशिका से दूसरी कोशिका के डेन्ड्राइट्स तक होने से होता है।

    न्यूरॉन्स और तंत्रिका उत्तक

    तंत्रिका ऊतक में कोशिकाएँ जो आवेग (impulses) उत्पन्न करती हैं और संचालित करती हैं, न्यूरॉन्स या तंत्रिका कोशिकाएँ (neurons or nerve cells) कहलाती हैं। न्यूरॉन में एक बड़ी कोशिका काय (cell body), साइटोन, पैरोकैरिऑन पाई जाती हैं। इससे डेन्ड्राइट (dendrites ) और एक्सॉन (Axon) निकलता है। कोशिका काय ((Cell body) में एक केन्द्रक होता है तथा निसल के कण (Nissl’s granules) उपस्थित होते हैं। एक्सॉन की कोशिका कला को एक्सोलेमा तथा कोशिकाद्रव्य को एक्सोप्लाज्म कहते हैं। एक्सॉन दूरस्थ छोर पर छोटी-छोटी शाखाओं में विभाजित हो जाता है, जिन्हें टीलोडेण्ड्रिया कहते हैं।

    नोट:

    कोशिका का मुख्य भाग, वह भाग जो सामान्य कार्य करता है, कोशिका काय (the cell body) होता है।

    डेंड्राइट कोशिका द्रव्य (cytoplasm) के विस्तार, या प्रक्रियाएं हैं, जो कोशिका शरीर में आवेगों (impulses) को ले जाती हैं।

    एक एक्सॉन कोशिका काय (the cell body) से आवेगों (impulses) को दूर करता है।

    तंत्रिका ऊतक में कोशिकाएं भी शामिल होती हैं जो आवेगों को संचारित नहीं करती हैं, बल्कि न्यूरॉन्स (neurons) की गतिविधियों का समर्थन करती हैं। ये ग्लियल कोशिकाएं (Glial cells) (न्यूरोग्लिअल कोशिकाएं) (neuroglial cells) हैं, जिन्हें एक साथ न्यूरोग्लिया (neuroglia) कहा जाता है। सहायक, या ग्लिया, कोशिकाएं न्यूरॉन्स को एक साथ बांधती हैं और न्यूरॉन्स को इन्सुलेट (insulate) करती हैं। इन कोशिकाओं में कुछ फागोसाइटिक (phagocytic) होते हैं और बैक्टीरिया के आक्रमण से बचाते हैं, जबकि अन्य रक्त वाहिकाओं को न्यूरॉन्स से बांधकर पोषक तत्व प्रदान करते हैं।

  • पेशीय ऊतक या पेशी ऊतक (Muscular Tissue) क्या है ? पेशीय ऊतक के प्रकार, संरचना और कार्य

    पेशीय ऊतक या पेशी ऊतक (Muscular Tissue) क्या है ? पेशीय ऊतक के प्रकार, संरचना और कार्य

    इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि पेशीय ऊतक या पेशी ऊतक (Muscular Tissue) क्या है, पेशी ऊतक (Muscular Tissue) कितने प्रकार के होते है , पेशी ऊतक (Muscular Tissue) का कार्य क्या है, पेशी ऊतक (Muscular Tissue) का कार्य क्या है, और पेशी ऊतक की सरंचना क्या है, रेखित पेशी ऊतक (Striated Muscular Tissue) क्या है, आरेखित पेशी ऊतक (Non Striated Muscular Tissue) क्या है, हृदय पेशी ऊतक (Cardiac Muscular Tissue) क्या है आदि |

    पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) क्या है ?

    पेशी ऊतक या पेशीय ऊतक (Muscle tissue या Myopropulsive Tissue) वे ऊतक हैं जिनसे जन्तुओं के शरीर की पेशियाँ निर्मित होतीं हैं। ये कोमल होते हैं तथा इनके कारण पेशियों में संकुचन की क्षमता होती है। पेशीय ऊतक अनेक लंबे एवं बेलनाकार तंतु या रेशों से बना होता है, जो समानांतर पंक्तियों में सजे रहते हैं, यह तंतु कई सूक्ष्म तत्वों से बना होता है जिसे पेशी तंतुक कहते है | पेशी ऊतकों के कारण ही हमारे शरीर में गति सम्भव हो पाती है।

    इन पेशियों में विशेष प्रकार की प्रोटीन होती है जिसे संकुचनशील प्रोटीन (Contractile Protein) कहते हैं। इसी के संकुचन और शिथिलन (relax) से गति उत्पन्न होती है।

    पेशीय उत्तक की क्रिया से शरीर वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार गति करता है तथा शरीर के विभिन्न अंगों की स्थिति को संभाले रखता है । सामान्यतया शरीर की सभी गतियां में पेशियां प्रमुख भूमिका निभाती है।

    पेशीय ऊतक या पेशी तन्तु (Muscular Tissue) भ्रूणीय मीसोडर्म से विकसित होती है। इसका विशिष्ट गुण संकुचलशीलता (contractility) है। यह शरीर का लगभग 50% भाग बनाती है।

    पेशी तन्तु के कोशिकाद्रव्य को सार्केप्लाज्म कहते हैं। पेशी तन्तु की प्लाज्मा झिल्ली को सारकोलेमा कहते हैं। पेशी तन्तु की संरचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाई सारकोमीर (Sarcomere) कहलाती है।

    पेशीय ऊतक कितने प्रकार के होते हैं ?

    पेशीय ऊतक के तीनो प्रकार (L से R): आंतरिक अंगों में आरेखित पेशी ऊतक (Smooth or Non Striated Muscular Tissue), हृदय या हृदय की मांसपेशी में हृदय पेशी ऊतक (Cardiac Muscular Tissue) और कंकाल की मांसपेशी में रेखित पेशी ऊतक (Skeletal or Striated Muscular Tissue)

    कार्यिकी के आधार पर पेशीय ऊतक तीन प्रकार के होते हैं |

    1. रेखित पेशी ऊतक (Striated Muscular Tissue)

    2 .आरेखित पेशी ऊतक (Non Striated Muscular Tissue)

    3. हृदय पेशी ऊतक (Cardiac Muscular Tissue)

    रेखित पेशियाँ ऊतक (Striated Muscular Tissue)

    यह पेशियाँ अस्थियों (bones) से कण्डराओं ( पेशियाँ जन्तु की फसलों से जुड़ी रहती हैं और इनमें एच्छिक गति होती हैं इसी के द्वारा जुड़ी होती हैं। ये कारण इन्हें एच्छिक पेशी या कंकाल पेशी भी कहते हैं। प्रत्येक पेशीय तन्तु पर क्रमशः गहरे A तथा हल्के 1 डिस्क होते हैं। I पट्ट के मध्य में एक गहरी 2 रेखा होती है। A-डिस्क में हेन्सन की डिस्क या M रेखा पाई जाती है। ये पेशियाँ अनेक बहुकेन्द्रक तन्तुओं द्वारा बनती हैं, जिसमें अनेक मायोफाइब्रिल होते हैं। ये मायोफ्राइबिल घने मायोसीन एवं पतले एक्टिन तन्तुओं के बने होते हैं। यह पेशी पैर, गर्दन, जिह्वा, ग्रासनली आदि में पाई जाती है।

    अरेखित पेशियाँ ऊतक (Non Striated Muscular Tissue)

    ये हमारी इच्छा के नियन्त्रण में नहीं होती हैं इसलिए इन्हें अनैच्छिक पेशियाँ भी कहते हैं। ये पेशियाँ पतली, लम्बी, तर्कुरूप तथा तन्तुमय पेशी कोशिकाओं की बनी होती हैं। आहारनाल के एक भाग से दूसरे भाग में भोजन का प्रवाह इस पेशी के संकुचन एवं प्रसार के कारण होता है। यह मूत्राशय, जठरान्त्र मार्ग में उपस्थित रहती है।

    हृदय पेशी ऊतक (Cardiac Muscular Tissue)

    यह हृदय की दीवारों में पाई जाती हैं। हृदय पेशियाँ स्वायत्त तन्त्रिका तन्तुओं से जुड़ी होती है इसलिए ये अपने आप स्वतंत्र रूप से बिना थके एक लय से जीवन भर धड़कती रहती हैं। इसमें उपस्थित अर्न्तविष्ट डिम्ब (intercalated discs) हृदय पेशियों हेतु उत्तेजक लहर (excitation waves) के रूप में बूस्टर का कार्य करती हैं। इनका संकुचन मायोजेनिक होता है, न्यूरोजेनिक नहीं।

    पेशी संकुचन की क्रियाविधि (Mechanism of Muscle Contraction)

    रेखित पेशियों में गति तन्त्रिकाओं की उत्तेजना के कारण होती है। प्रत्येक तन्त्रिका पेशी सन्धि पर एसीटिलकोलीन नामक हॉर्मोन स्रावित होता है, जो पेशियों के संकुचन को प्रेरणा देता है | ए. एफ. हक्सले तथा एच. ई. हक्सले ने 1965 में रेखित पेशियों के संकुचन की क्रियाविधि का विस्तृत अध्ययन किया । संकुचन के समय सार्कोमीयर की लम्बाई घट जाती है, जिससे मायोफाइब्रिल सिकुड़ जाता है। संकुचन समाप्त होने पर मायोफाइब्रिल में शिथिलन होता है। पेशी संकुचन के लिए ऊर्जा ATP से प्राप्त होती है। पेशी के संकुचन एक्टिन फिलामेन्ट के कारण होता है। संकुचन हेतु Ca2+ भी आवश्यक होता है।

    ऑक्सीजन ऋण (Oxygen-debt)

    सक्रिय शा रीरिक कार्य या व्यायाम के समय पेशियों में ऊर्जा का व्यय अधिक मात्रा में होता है और अधिकांश ATP, ADP में बदल जाती हैं, जिसके पश्चात् ग्लूकोस का जारण (Oxidation) तेजी से होने लगता है, परन्तु फेफड़े इसके लिए आवश्यक ऑक्सीजन (O2) की पूर्ति कर पाते, जिससे सांस फूलने लगती है। इस क्रिया को शरीर का ऑक्सीजन-ऋण (Oxygen-Debt) कहते हैं। इसी कारण जिन व्यक्तियों की पेशियों में ग्लूकोस की कमी होती है, वे अधिक मेहनत वाला काम नहीं कर सकते हैं।

    कंपकपी (Shivering)

    कंपकपी क्रिया का उद्देश्य शरीर के ताप को बढ़ाना है। जाड़े में कभी-कभी क्षणभर के लिए हमें अपने आप कंपकपी आ जाती है। यह कंकाल पेशियों की एक अनैच्छिक क्रिया होती है।

    थकावट (Fatigue)

    यदि पेशियों को कुछ समय तक निरन्तर आकुंचन (contraction) क्रिया करनी पड़े, तो इनमें आकुंचन क्रिया की क्षमता लगातार कम होती जाती है और पेशियों में लैक्टिक अम्ल के जमा हो जाने के कारण इनमें आकुंचन क्रिया बिल्कुल बंद हो जाती है। इसी को थकावट कहते हैं। कुछ समय पश्चात् लैक्टिक अम्ल धीरे-धीरे ग्लूकोस में बदल जाता है और थकावट की दशा समाप्त हो जाती है।