Author: The Vigyan Team

  • निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity) क्या होती है ?

    निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity)

    हवा के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को ‘निरपेक्ष आर्द्रता’ कहते हैं। इसे अधिकतर ग्राम प्रति घनमीटर में व्यक्त किया जाता है। वायुमण्डल की जलवाष्प धारण करने की क्षमता पूर्णत: तापमान पर निर्भर करती है। 

    हवा की आर्द्रता स्थान-स्थान पर और समय-समय पर बदलती रहती है। आर्द्रता: वायुमण्डल में मौजूद अदृश्य जलवाष्य की मात्रा को ‘आर्द्रता’ कहते हैं। वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा स्थान और समय के अनुसार परिवर्तनशील होती है।

    उदाहरण 

    1. बरसात की ऋतु में नमक खुले में रखने पर गीला हो जाता है क्योंकि बरसात की ऋतु में वायु में आर्द्रता अधिक होती है जिसे नमक अवशोषित करके गीला हो जाता है।

     2. बर्फ से भरे गिलास के बाहर जल की बूंदे एकत्रित हो जाती है जिसका कारण है, कि गिलास की सतह से के सम्पर्क में आने वाली वायु की वाष्प संघनित होकर गिलास की सतह पर जम जाती है और बूंदों के रूप में दिखाई देती है। 

  • सौर दिवस (Solar Day) क्या है ?

    What is Solar Day ?

    जब सूर्य आकाश में चलते हुए सबसे ऊंचे बिन्दु पर होता है, तो उस समय को ‘मध्याह्न’ (Noon) कहते हैं। दो क्रमागत (Successive) मध्याह्नों के बीच के समय-अन्तराल को ‘सौर दिवस‘ कहते हैं।

    माध्य सौर दिवस (Mean Solar Day)

    कई कारणों से सौर दिवस प्रति दिन कुछ बदलता रहता है। अत: एक वर्ष तक ज्ञात किए गए सभी सौर दिवसों का औसत लेने पर ‘माध्य सौर दिवस‘ प्राप्त होता है।

    1 सेकण्ड = माध्य सौर दिवस का वा भाग 

    86400 1 पिक्रो सेकण्ड = 10-12 सेकण्ड 

    1 नैनो सेकण्ड =10-9 सेकण्ड

    1 माइक्रो सेकण्ड =10-6 सेकण्ड 

    1 लीप वर्ष = 366 दिन 

  • प्रत्यास्थता (Elasticity) क्या है ?

    What is Elasticity ?

    प्रत्यास्थता पदार्थ का वह गुण है जिसके कारण वस्तु, उस पर लगाए गए बाह्य बल से उत्पन्न किसी भी प्रकार के परिवर्तन का विरोध करती है तथा जैसे ही बल हटा लिया जाता है, वह अपनी पूर्व अवस्था में वापस आ जाती है।

    प्रत्यास्थता का कारण

    प्रत्येक पदार्थ अणुओं से मिलकर बना है। अणुओं के मध्य एक निश्चित दूरी तक आकर्षण बल लगता है। इस निश्चित दूरी को अणुओं के बीच की ‘साम्य दूरी’ कहते हैं। जब अणुओं के बीच की दूरी, साम्य दूरी से कम हो जाती है, तो उनमें प्रतिकर्षण बल लगता है। प्रतिकर्षण बल का मान, अणुओं के मध्य दूरी घटने पर आकर्षण बल की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ता है।

    प्रत्यास्थता की सीमा (Elastic Limit)

    विरूपक बल के परिमाण की वह सीमा जिससे कम बल लगाने पर पदार्थ का प्रत्यास्थता का गुण समाप्त हो जाता है, प्रत्यास्थता की सीमा कहलाती है। भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिए प्रत्यास्थता की सीमा भिन्न-भिन्न होती है।

  • बरनौली का प्रमेय (Bernoulli’s Theorem) क्या है ?

    What is Bernoulli’s Theorem ?

    जब कोई असम्पीड्य और अश्यान द्रव (अर्थात् एक आदर्श द्रव) किसी नली में धारारेखीय प्रवाह में बहता है, तो इसके मार्ग के प्रत्येक बिन्दु पर इसके एकांक आयतन या एकांक द्रव्यमान की कुल ऊर्जा (दाब ऊर्जा, गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग) नियत रहती है। इसे ‘बरनौली का प्रमेय‘ कहते हैं।

    यह प्रमेय गैसों के प्रवाह के लिए भी सत्य है। इस प्रमेय से स्पष्ट है, कि यदि द्रव (अथवा तरल) का दाब बढ़ता है, तो उसका वेग कम हो जाता है और यदि वेग बढ़ता है, तो दाब कम हो जाता है।

    बरनौली प्रमेय के अनुप्रयोग (Application of Bernoulli’s Therorem)

    1. वेण्टीमीटर (Venturimeter): यह बरनौली की प्रमेय पर आधारित एक ऐसी युक्ति है जिसकी सहायता से किसी नली में द्रव के प्रवाह की दर ज्ञात की जाती है।

    2. यदि दो पिंग-पोंग की गेंदों के बीच में तेजी से हवा बहाते हैं, तो उनके बीच दाब कम हो जाने से गेंदे पास-पास आ जाती है।

    3. यदि भौतिक तुला के एक पलड़े के नीचे तेजी से हवा बहाते हैं, तो पलड़ें के नीचे दाब कम हो जाने से पलड़ा नीचे झुक जाता है।

    4. समुद्र में एक ही दिशा में एक-दूसरे के समान्तर गतिमान दो जलयानों के अधिक निकट आ जाने पर उनके बीच का स्थान संकरा होता जाता है जिससे वहां के जल की जलयानों के सापेक्ष विपरीत दिशा में चाल बहुत अधिक हो जाती है, फलत: वहां दाब बहुत कम हो जाता है तथा जलयानों के बाहर की ओर लगने वाले अधिक दाब से उत्पन्न दाबान्तर के कारण जलयान और अधिक निकट आकर टकरा जाते हैं।

    5. तेज आंधी में टीन की छतों का उड़ जाना: जब आधी में वायु बहुत तीव्र वेग से टीन की छत के ऊपर से प्रवाहित होती है तो बरनौली की प्रमेय के अनुसार, छत के ऊपर की वायु का दाब बहुत कम हो जाता है, जबकि छत के नीचे कमरे के अन्दर की वायु के दाब में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अत: इस दाबान्तर के कारण टीन की छतें ऊपर उड़कर दूर जा गिरती हैं।

    6. जब कोई गाड़ी प्लेटफार्म पर तीव्र गति से आती है, तो वहां पर वायु का दाब कम हो जाता है, अतः प्लेटफार्म पर उपस्थित प्रत्येक वस्तु पर दाबान्तर के कारण गाड़ी की ओर एक धक्का लगता है जिससे सारा कूड़ा-करकट, पत्ते, आदि गाड़ी की ओर तेजी से भागने लगते हैं। अत: गाड़ी आने के समय प्लेटफार्म पर पटरी से दूर खड़े होना चाहिए।

    7. दैनिक जीवन में अन्य उपयोगः जब कोई द्रव किसी जेट से बाहर निकलता है तो इसका वेग बढ़ जाता है और दाब घट जाता है। इस प्रवृत्ति का उपयोग ‘बुन्सेन के बर्नर’ में किया जाता है। ‘कार्बोरेटर’ में भी वायु को पेट्रोल के जेट द्वारा इसी प्रकार खींचा जाता है। |

    • बरनौली प्रमेय का उपयोग वायुयान के पंखों को बनाने में किया जाता है। पंखों की आकृति इस प्रकार रखी जाती है, कि उनकी ऊपरी सतह की वक्रता निचली सतह की वक्रता से अधिक हो तथा सामने का किनारा गोल एवं पीछे चपटा हो।
    • दो कारें जब उच्च गति से गुजर रही होती हैं, तो उनके टकराने की सम्भावना इसलिए बढ़ जाती है, कि उनके बीच के स्थान में दाब का मान अत्यल्प होता है।

    एक अच्छे स्नेहक में दो गुण होते हैं: 

    1. कम पृष्ठ तनाव तथा

    2. उच्च श्यानता

    आदर्श द्रव

    वह द्रव जो पूर्णत: असम्पीड्य (Incompressible) तथा अश्यान (Non-viscous) होता है, ‘आदर्श द्रव’ कहलाता है। अत: ऐसे द्रव का श्यानता गुणांक (n) शून्य होता है और आयतन प्रत्यास्थता गुणांक अनन्त होता है। ऐसे द्रव का क्रान्तिक वेग शून्य होता है। व्यवहार में ऐसा द्रव असम्भव है परन्तु जल आदर्श द्रव के निकटतम है।

  • क्रान्तिक वेग (Critical Velocity) क्या है ?

    What is Critical Velocity ?

    यदि द्रव के प्रवाह का वेग एक निश्चित वेग से कम होता है, तो द्रव का प्रवाह ‘धारारेखीय प्रवाह’ (Steam line flow) होता है अर्थात् द्रव का प्रत्येक कण उसी बिन्दु से गुजरता है जिससे उसके पहले वाला कण गुजरा था। यह प्रवाह नियमित होता है जिसमें किसी नियत बिन्दु पर प्रवाह की चाल व उसकी दिशा निश्चित बनी रहती है। उस निश्चित वेग को ‘क्रान्तिक वेग’ कहते हैं।

    क्रान्तिक वेग से जुड़े नियम

    यदि द्रव का वेग क्रान्तिक वेग से अधिक होता है, तो द्रव का प्रवाह धारारेखीय न रहकर ‘विक्षुब्ध प्रवाह’ (Turbulent flow) हो जाता है अर्थात् द्रव की गति अनियमित व उसका मार्ग टेढ़ा-मेढ़ा (Zig-zag) या भंवरदार (Whirly) होता है।उदाहरणार्थ, बरसात में नदी-नालों की गति।

    यदि द्रव-प्रवाह का वेग क्रान्तिक वेग से कम है, तो उसका प्रवाह उसकी श्यानता (n) पर निर्भर करता है l यदि द्रव प्रवाह का वेग क्रांतिक वेग से अधिक होता है तो उसका प्रवाह मुख्यतः उसके घनत्व पर निर्भर करता है l उदाहरण के लिए, ज्वालामुखी से निकला हुआ लावा बहुत गाढ़ा (अर्थात n अधिक ) होने पर भी तेजी से बहता है l क्योकि उसका घनत्व अपेक्षाकृत कम होता है और घनत्व ही उसके वेग को निर्धारित करता है l

    कारों, पनडुब्बियों, जेट-प्लेन तथा रॉकेट के डिजाइन करने में इस बात का ध्यान रखा जाता है उसका अगला हिस्सा ऐसा हो जिससे माध्यम का धारारेखीय प्रवाह बन सके l इससे यान के कम्पन व मंदन में कमी होगी जिससे ईधन की बचत होगी l

  • सीमान्त वेग (Terminal velocity) क्या है ?

    सीमान्त वेग (Terminal velocity) क्या है ?

    What is Terminal velocity ?

    गति के प्रारम्भ में वस्तु तेजी से गिरती है। इस समय उसका वेग बढ़ता जाता है। वेग बढ़ने के साथ-साथ श्यान बल का मान भी बढ़ता जाता है। एक स्थिति ऐसी आती है जबकि वस्तु का भार, श्यान बल और उत्प्लावन बल के योग के बराबर हो जाता है। इस स्थिति में वस्तु पर कार्य करने वाला नेट बल शून्य होता है। अतः वस्तु में त्वरण भी शून्य होता है। फलस्वरूप वस्तु एक नियत वेग से गिरने लगती है। इस नियत वेग को ही वस्तु का ‘सीमान्त वेग’ कहते हैं।

    यह वेग वस्तु की त्रिज्या के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है अर्थात् बड़ी वस्तु अधिक वेग से और छोटी वस्तु कम वेग से गिरती है।

    उदाहरण

    पैराशूट की सहायता से नीचे गिरना

    जब पैराशूट लेकर कोई सैनिक नीचे कूदता है, तो प्रारम्भ में उसका वेग बढ़ जाता है। इस समय वायु की श्यानता उसे मन्दित करने का प्रयास करती है। पैराशूट के खुलते ही उत्प्लावन बल का मान काफी बढ़ जाता है। अत: कुछ दूरी तक गिरने के पश्चात् सैनिक सीमान्त वेग प्राप्त कर लेता है और वह इस नियत सीमान्त वेग से पृथ्वी पर उतरता है।

    बादल आकाश में तैरते हुए प्रतीत होते हैं।

    क्योंकि बादल भाप के बहुत छोटे कणों से मिलकर बनते हैं। इन कणों का सीमान्त वेग भी बहुत कम होता है। जिससे वे वायु की दिशा में बह जाते हैं और उनका समूह (बादल) तैरता हुआ-सा प्रतीत होता है। ।

    स्टोक्स का नियम

    जब कोई पिण्ड नियत वेग से गति करता है और इसे पिण्ड का ‘अन्तिम वेग’ अथवा ‘सीमान्त वेग (Terminal Velocity) कहते हैं। स्टोक्स ने यह सिद्ध किया था कि यदि । त्रिज्या का कोई एक सूक्ष्म गोला अगर  किसी अनन्त विस्तार वाल पूर्णत: समांग श्यान माध्यम (द्रव अथवा गैस) में सीमान्त चाल v से गति करे तो गोले पर कार्य करने वाला श्यान बल, F = 6rnv जहाँ n इस माध्यम का श्यानता गुणांक है। यही स्टोक्स का नियम है ।

    स्टोक्स के नियम के अनुप्रयोग

    • वर्षा की बूंद होती है वो एक निश्चित अन्तिम चाल प्राप्त करती है और यह चाल बूँदों की त्रिज्या के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है। वर्षा की जो छोटी बूंद होती है वह बहुत कम चाल से गिरती है जबकि जो बड़ी बूँदे तेजी से धरती पर गिरती हैं।
    • जल की वाष्प धूल के कणों पर संघनित होती है तो प्रारम्भ में बूंदे बहुत ही छोटी होती है। इस समय इनकी नीचे की और चाल इतनी कम होती है कि ये आकाश में ही तैरती प्रतीत होती है। तब हम इन्हें बादल कहते है |
  • श्यानता (Viscosity) क्या है ?

    What is Viscosity ?

    जिस प्रकार एक ठोस वस्तु के दूसरी ठोस वस्तु पर फिसलने पर उनके मध्य घर्षण बल लगता है जो उनकी आपेक्षिक गति का विरोध करता है, ठीक उसी प्रकार किसी द्रव या गैस की एक परत पर फिसलने पर उनके मध्य घर्षण बल लगता है जो उनकी आपेक्षिक गति का विरोध करता है।

    किसी द्रव या गैस की दो क्रमागत परतों के बीच उनकी आपेक्षिक गति का विरोध करने वाले घर्षण बल को ‘श्यान बल’ (Visocus force) कहते हैं।

    तरल का वह गुण जिसके कारण तरल की विभिन्न पर्तों के मध्य आपेक्षिक गति का विरोध होता है, ‘श्यानता’ कहलाता है।

    किसी तरल की श्यानता को श्यानता गुणांक (Coefficient of viscosity) द्वारा मापा जाता है जिसका SI मात्रक ‘डेकाप्वॉइज’ या ‘प्वॉयजली’ (PI) कहलाता है। इसे ‘पास्कल सेकण्ड’ (Pas) भी कहते हैं। 

    श्यानता से जुड़े नियम

    श्यानता केवल द्रवों तथा गैसों का गुण है। द्रवों में श्यानता, अणुओं के मध्य लगने वाले संसंजक बलों के कारण होती है। जब द्रव की विभिन्न परतों के मध्य आपेक्षिक गति होती है तो द्रव के अणुओं के बीच की दूरी बढ़ती है तथा संसंजक बल इसका विरोध करता है। इसके विपरीत, गैसों में श्यानता इसकी एक परत से दूसरी परत में अणुओं के स्थानान्तरण के कारण होती है। अत: गैसों में श्यानता, द्रवों की तुलना में बहुत कम होती है। ठोसों में श्यानता नहीं होती है, क्योंकि उसकी विभिन्न परतों में आपेक्षिक गति नहीं होती है। 

    श्यानता का दूसरा अर्थ गाढ़ापन भी है। जो द्रव जितने अधिक गाढ़े होते हैं, वे उतने ही अधिक श्यान होते हैं। 

    श्यानता के गुण के कारण ही द्रवों को एक बर्तन से दूसरे बर्तन में उड़ेलना आसान नहीं होता है तथा एक बार गति में लाकर छोड़ने पर द्रव थोड़ी देर तक गतिमान रहते हैं, तत्पश्चात् रुक जाते हैं। शहद और ग्लिसरीन की श्यानता पानी की तुलना में अधिक होती है। यदि एक बीकर में शहद और दुसरे बीकर में पानी लेकर हिलाया जाए तो शहद पानी की अपेक्षा जल्दी रुक जाता है।

    वायु की श्यानता के कारण ही बादल के कण बहुत धीरे-धीरे नीचे आ पाते हैं तथा बादल आकाश में तैरते प्रतीत होते हैं। चूंकि वायु की श्यानता पानी की तुलना में बहुत कम होती है। अत: पानी की अपेक्षा वायु में चलना अधिक आसान होता है।

    एक आदर्श तरल की श्यानता शून्य होती है। ताप बढ़ाने पर द्रव की श्यानता घट जाती है, परन्तु गैसों की श्यानता बढ़ जाती है l

  • केशिकत्व (Capillarity) क्या है ?

    What is Capillarity ?

    एक ऐसी नली, जिसकी त्रिज्या बहुत कम तथा एकसमान होती है, केशनली (Capillary tube) कहलाती है।

    जब दोनों सिरों पर खुली एक केशनली को पानी में डुबोया जाता है, तो पानी केशनली में कुछ ऊंचाई तक चढ़ जाता है। इसके विपरीत जब केशनली को पारे में डुबोया जाता है, तो कुछ पारा नली में नीचे दब जाता है केशनली में द्रव के ऊपर चढ़ने या नीचे उतरने की घटना को ‘केशिकत्व’ कहते हैं।

    किसी सीमा तक द्रव केशनली में चढ़ता या उतरता है, यह केशनली की त्रिज्या पर निर्भर करता है। सामान्यतः जो द्रव कांच को भिगोता है वह केशनली में ऊपर चढ़ जाता है और जो द्रव कांच को नहीं भिगोता वह नीचे उतर जाता है।

    उदाहरण के लिए, पानी कांच की नली को भिगोता है, अतः केशनली में पानी ऊपर चढ़ जाता है। पारा कांच की नली को नहीं भिगोता है, अत: इसका तल केशनली में नीचे उतर जाता है। 

    केशिकत्व से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण उदाहरण

    ब्लाटिंग पेपर (स्याही सोखता) स्याही को शीघ्र सोख लेता है, क्योंकि उसमें बने छोटे-छोटे छिद्र केशनलियों की तरह कार्य करते हैं।

    लालटेन या लैम्प की बत्ती में केशिकत्व के कारण ही तेल ऊपर चढ़ता है।

    मिट्टी के ढेले को जल में रखने पर वह ऊपर तक गीला हो जाता है क्योंकि उसमें असंख्य सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जो केशनलियों का काम करते हैं।

    पेड़-पौधों की शाखाओं, तनों एवं पत्तियों तक जल और आवश्यकता लवण केशिकत्व की क्रिया द्वारा ही  पहुंचते हैं।

    कृत्रिम उपग्रह के अन्दर (अर्थात् भारहीनता की अवस्था में) यदि किसी केशनली को जल में खड़ा किया जाए तो नली में चढ़ने वाले जल स्तम्भ का प्रभावी भार शून्य होने के कारण जल नली में दूसरे सिरे तक पहुंच जाएगा चाहे केशनली कितनी ही लम्बी क्यों न हो।

    वर्षा के बाद किसान अपने खेतों की जुताई कर देते हैं ताकि मिट्टी में बनी केशनलियां टूट जाएं और पानी ऊपर न आ सके व मिट्टी में नमी बनी रहे।

    फाउन्टेन पेन के निब की नोक बीच में चिरी होती है. जिससे इसको स्याही में इबोने पर वह उसमें चढ जाती है।

  • जल का असामान्य प्रसार क्या होता है ?

    जल का असामान्य प्रसार क्या होता है ?

    जल का असामान्य प्रसार

    प्रायः सभी द्रव गर्म किए जाने पर आयतन में बढ़ते हैं परन्तु जल 0°C से 4°C तक गर्म करने पर आयतन में घटता है तथा 4°C के पश्चात् बढ़ना प्रारम्भ करता है। इसका अर्थ यह है. कि 4° पर जल का घनत्व सबसे अधिक होता है।

    दैनिक जीवन में इसके कई प्रभाव दिखाई देते हैं. कुछ निम्नलिखित हैं:

    ठण्डे देशों में तालाबों के जम जाने पर भी उनमें मछलियां जीवित रहती हैं: ठण्डे देशों में जाड़े के दिनों में वायु का ताप 0° से भी कम हो जाता है। अतः वहां के तालाबों में जल जमने लगता है।

    वायु का ताप गिरने पर पहले तालाबों की सतह का जल ठण्डा होता है। अत: यह भारी होकर नीचे बैठता रहता है तथा नीचे का हल्का जल ऊपर आता रहता है। यह प्रक्रिया तब तक चली रहती है जब तक कि पूरे तालाब का जल 4°C तक नहीं गिरा जाता।

    जब सतह के जल का ताप 4°C से नीचे गिरने लगता है. तो इसका घनत्व कम होने लगता है। अतः अब यह नीचे नहीं जाता तथा 0°C तक ठण्डा होकर बर्फ के रूप में सतह पर ही जमने लगता है। अत: जल के जमने की क्रिया ऊपर से नीचे की ओर होती है (नीचे से ऊपर की ओर नहीं) बर्फ की इस पर्त के नीचे अब भी 4°C का जल रहता है।

    चूंकि बर्फ ऊष्मा का कुचालक होता है, अत: नीचे के 4°C वाले जल की ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देता। अत: नीचे वाला जल 4°C पर ही बना रहता है और इस प्रकार वह जमने से बच जाता है। इस जल में मछलिया तथा अन्य जीव जीवित रहते हैं।

    अत्यधिक ठण्ड में जल के पाइप कभी-कभी फट जाते हैं: ठण्डे स्थानों पर जाड़े के दिनों में पाइपों में बहने वाले जल का ताप 4°C से नीचे गिर जाने पर जल के आयतन में वृद्धि होती है परन्तु धातु का पाइप सिकुड़ता है। इन विपरीत दशाओं के कारण पाइपों की दीवारों पर इतना अधिक दाब पड़ता है, कि वे फट जाते हैं।

  • पृष्ठ तनाव (Surface Tension) क्या है ?

    What is Surface Tension ?

    परिभाषा

    द्रव के अणुओं में संसंजक बल होने के कारण उसका स्वतन्त्र पृष्ठ तनी हुई रबर की झिल्ली (Membrane) की तरह कार्य करता है। प्रत्येक तना हुआ पृष्ठ सदैव तनाव की स्थिति में होता है। तथा उसमें संकुचित (Contract) होने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार, द्रव का स्वतन्त्र पृष्ठ (Surface) सदैव तनाव की स्थिति में रहता है तथा उसमें कम-से-कम क्षेत्रफल प्राप्त करने की प्रवृत्ति होती है। द्रव के पृष्ठ का यह तनाव ही ‘पृष्ठ तनाव‘ कहलाता है।

    पृष्ठ तनाव नियम

    द्रव का ताप बढ़ाने पर पृष्ठ तनाव कम हो जाता है और क्रान्तिक ताप (Critical temperature) पर यह शून्य हो जाता है।

    किसी दिए हुए आयतन के लिए गोलाकार आकृति के पृष्ठ का क्षेत्रफल अन्य आकृतियों के पृष्ठ के क्षेत्रफल से कम होता है। चूंकि द्रव का स्वतन्त्र पृष्ठ कम-से-कम क्षेत्रफल घेरने का प्रयास करता है, अत: वर्षा की बूदें तथा पारे के कण गोलाकार होते हैं।

    पृष्ठ तनाव के कुछ प्रमाण

    1. लोहे का एक छल्ला लेते हैं तथा उसमें धागे का एक फन्दा डाल देते हैं। छल्ले को साबुन के गाढ़े घोल में डुबाकर निकालते हैं। फन्दे के अन्दर और बाहर साबुन की झिल्ली (फिल्म) बन जाती है और फन्दा किसी भी आकृति में साम्यावस्था में पड़ा रहता है। अब गरम पिन की नोंक से फन्दे के अन्दर की झिल्ली को तोड़ देते हैं। ऐसा करते ही फन्दा तनकर वृत्त की आकृति ग्रहण कर लेता है।

    2. जब मुलायम बालों से बने ब्रुश को पानी में डुबाते हैं तो उसके बाल अलग-अलग रहते हैं, किन्तु बाहर निकालने पर बाल आपस में चिपक जाते हैं। इसका कारण यह है, कि ब्रुश को बाहर निकालने पर बालों पर लगे पानी का स्वतन्त्र पृष्ठ होता है जिसमें संकुचित होने की प्रवृत्ति है। अत: ब्रुश के बाल आपस में चिपक जाते हैं।

    पृष्ठ तनाव को प्रभावित करने वाले कारक

    1. तापमान बढ़ाने से पृष्ठ तनाव घटता है।
    2. तेल, ग्रीस, आदि पृष्ठ तनाव घटाते हैं।
    3. जब द्रव में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तब द्रव का पृष्ठ तनाव घटता है।