Author: The Vigyan Team

  • औषधि एवं रसायन क्या है ?

    What are Drugs and Chemicals ?

    ड्रग्स (Drugs) ऐसे रसायन (Chemicals) या पदार्थ होते हैं जो हमारे शरीर के काम करने के तरीके को बदल देते हैं।

    कुछ ऐसी दवाएं (medicines)जो ड्रग्स का ही रूप होती हैं जो लोगों की मदद करती हैं जब डॉक्टर उन्हें लिखते (prescribed) हैं और बीमारियों के इलाज के तौर पर उनका इस्तेमाल किया जाता है

    कुछ ड्रग्स ऐसे होते है जिनका कोई चिकित्सीय उपयोग या लाभ नहीं होता है। लेकिन जब उन्हें लिया जाता है (आमतौर पर निगलने, श्वास लेने या इंजेक्शन द्वारा), तो यह नशे का काम करती है l

    प्रकार

    निश्चेतक (Anaesthetic)

    निश्चेतक औषधियों का प्रयोग मुख्यतः संवेदना को कम करने के लिए किया जाता है

    कुछ प्रमुख निश्चेतक हैं—डाइ इथाइल ईथर, क्लोरोफॉर्म, सल्फोनल, वेरोनल, क्लोरो प्रोपेन, कोकीन, डायजीपाम, पेन्टोथल सोडियम, हेलोथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, आदि।

    एन्टीबायोटिक्स (Antibiotic)

    एन्टीबायोटिक्स औषधियां अत्यन्त सूक्ष्म जीवाणुओं, कवक, आदि से बनायी जाती है। ये औषधियां अन्य दूसरे प्रकार के जीवाणुओं को मारती है और उनकी वृद्धि को रोकती है।

    अलक्जेंडर फ्लेमिंग ने, 1929 में पहली एन्टीबायोटिक औषधि पेनीसिलीन का आविष्कार किया जिसके द्वारा विशेष प्रकार के जीवाणुओं को नष्ट किया जा सकता था।

    कुछ महत्त्वपूर्ण एन्टीबायोटिक औषधियां निम्न हैं—पेनीसिलीन, टेट्रासाइक्लिन, सेफेलोस्प्रिन्स स्ट्रेप्टोमाइसिन, जेन्टामाइसिन, रिफामाइसिन, क्लोरामाइसिटीन, आदि।

    एन्टीसेप्टिक (Antiseptic)

    एन्टीसेप्टिक औषधियां सूक्ष्म जीवाणुओं को मारने एवं उनकी वृद्धि को रोकने में सहायक होती हैं। यह रक्त को दूषित होने से रोकने व घाव, आदि भरने में विशेष रूप से सहायक होती है

    प्राचीन काल में ही सिरका तथा सिडार तेल का प्रयोग घावों, आदि के उपचार में होता आ रहा है। आधुनिक काल में एन्टिसेप्टिक औषधियां तैयार करने वालों में सेमिलवीस, लिस्टर व कोच, आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

    कुछ महत्त्वपूर्ण एन्टिसेप्टिक औषधियां निम्न हैं—आयोडीन, हाइपोक्लोरस अम्ल, इथाइल ऐल्कोहॉल, फिनॉल, हेक्साक्लोराफीन, फॉर्मेल्डीहाइड, हाइड्रोजन पेरॉक्साइड, एक्रीफ्लेविन, आदि।

    एन्टीपायरेटिक्स (Antipyretics)

    एन्टीपायरेटिक्स का प्रयोग शरीर दर्द व बुखार उतारने में किया जाता है। कछ महत्त्वपूर्ण एन्टीपायरेटिक औषधियां निम्नलि हैं—ऐस्पीरिन, क्रोसीन, फिनैसिटिन, पायरोमिडीन, आदि।

    सल्फा ड्रग्स (Sulpha Drugs)

    सल्फा ड्राग्स या सल्फा औषधियों में मुख्य रूप से सल्फर और नाइट्रोजन होते हैं। इस प्रकार की औषधियां कुछ जीवाणुओं के प्रति अत्यंत प्रभावी होती हैं।

    सबसे पहली सल्फा औषधि सल्फानिलमाइड 1908 ई. में बनायी गई थी।

    कुछ महत्त्वपूर्ण सल्फा औषधियां निम्न हैं—सल्फानिलमाइड, सल्फाडायजीन, सल्फापिरीडीन, सल्फाथायोजाल, आदि।

    कुछ महत्वपूर्ण दवाएं

    एल.एस.डी. (L.S.D.): इसका पूरा नाम लाइसर्जिक अम्ल डाइथाइलेमाइड है। यह एक भ्रम उत्पन्न करने वाली दवा है।

    एस्पीरिन (Aspirin): एसीटाइल सैलिसिलिक अम्ल को ‘एस्पीरिन’ कहा जाता है। यह एक ज्वरनाशी तथा पीड़ानाशी दवा है।

    पैरल्डिहाइडः इसका उपयोग नींद लाने वाली दवा के रूप में होता है।

    यूरोट्रोपीन: इसका उपयोग मूत्र रोग की दवा के रूप में होता है। 

    क्लोरेटोन: इसका उपयोग पहाड़ी यात्रा या समुद्री यात्रा में चक्कर आने से रोकने की दवा के रूप में होता है।

  • विस्फोटक (Explosives) क्या है ?

    What are Explosives ?

    विस्फोटक ऐसे प्रतिक्रियाशील पदार्थ होते है जिनमे बड़ी मात्रा में संभावित ऊर्जा (potential energy) होती है जो अचानक निकलने पर विस्फोट उत्पन्न कर सकती है, विस्फोट का कारण तेज गर्मी, प्रकाश ध्वनि या दबाव होता है l इनके दहन पर अत्यधिक ऊष्मा और तीव्र ध्वनि पैदा होती है।

    भौतिकी में, संभावित ऊर्जा  (Potential Energy) किसी वस्तु द्वारा अन्य वस्तुओं के सापेक्ष उसकी स्थिति, अपने भीतर तनाव, उसके विद्युत आवेश या अन्य कारकों के कारण रखी गई ऊर्जा है  

    आर.डी.एक्स

    आर.डी.एक्स. का पूरा नाम रिसर्च एण्ड डेवलप्ड एक्सप्लोसिव (Research and Developed Explosive) है। इसका रासायनिक नाम साइक्लो ट्राइ मिथाइलीन ट्राईनाइट्रामाइन है। इसे प्लास्टिक विस्फोटक भी कहा जाता है।

    इस विस्फोटक को स.रा.अ. में साइक्लोनाइट; जर्मनी में हेक्सोजन तथा इटली में टी-4 के नाम से जाना जाता है

    इसमें प्लास्टिक पदार्थ, जैसे—पॉली ब्यूटाइन एक्रिलिक अम्ल या पॉलियूरेथेन को मिलाकर प्लास्टिक बान्डेड एक्सप्लोसिव बनाया जाता है। इसके एक रूप को सी-4 भी कहते हैं। यह एक प्रचंड विस्फोटक है तथा इसके तापमान व आग फैलाने की गति को बढ़ाने के लिए इसमें एल्युमिनियम चूर्ण मिलाया जाता है। आर.डी.एक्स. की विस्फोटक ऊष्मा 1,510 किलो कैलोरी प्रति किग्रा. होती है। इस विस्फोटक की खोज 1899 में जर्मनी के हैनिंग ने शुद्ध सफेद दानेदार पाउडर के रूप में किया था।

    टी.एन.जी. (T.N.G.)

    ट्राइनाइट्रो ग्लिसरीन एक रंगहीन तैलीय द्रव है जो डायनामाइट बनाने के काम आता है। इसे नोबल का तेल भी कहा जाता है। यह सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल व सान्द्र नाइट्रिक अम्ल की ग्लिसरीन के साथ क्रिया करके बनायी जाती है।

    टी.एन.टी. (T.N.T.)

    इसका पूरा नाम ट्राइनाइट्रो टॉल्वीन है जो कि सर्वाधिक प्रयोग में आने वाला एक विस्फोटक हैं। यह टॉल्वीन के साथ सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल व सान्द्र नाइट्रिक अम्ल की क्रिया से बनाया जाता है।

    डायनामाइट (Dynamite)

    डायनामाइट एक प्रकार का विस्फोटक है जिसका आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल ने 1863 ई. में किया था। यह नाइट्रोग्लिसरीन को किसी अक्रिय पदार्थ जैसे लकड़ी के बुरादे या कीजेलगूर (Kieselguhr) में अवशोषित करके बनाया जाता है।

    आधुनिक डायनामाइट में नाइट्रोग्लिसरीन की जगह सोडियम नाइट्रेट का प्रयोग किया जाता है। जिलेटिन डायनामाइट में नाइट्रो सेलुलोस की भी मात्रा उपस्थित रहती है।

    टी.एन.पी. (T.N.P.)

    टी.एन.पी, का पूरा रूप ट्राइनाइट्रो फिनॉल (Trintro Phenol) होता है। इसे ‘पिक्रिक अम्ल’ के नाम से भी जाना जाता है।

  • रेशे (Fibres) क्या है ?

    What are Fibres ?

    वे शृंखला-युक्त ठोस जिनकी लम्बाई-चौड़ाई की अपेक्षा सैकड़ों या हजारों गुना अधिक हो, ‘रेशे’ (Fibres) कहलाते हैं।

    संश्लिष्ट रेशा (Syntheitc Fibres)

    संश्लिष्ट रेशे कई सरल अणुओं के संयोग से बने बहुलक (Polymers) होते हैं। कृत्रिम तरीके से प्रयोगशालाओं में तैयार किये गये रेशों को ‘संश्लिष्ट’ रेशा कहा जाता है। उदाहरण, रेयॉन, नाइलॉन, पॉलिएस्टर।

    प्रमुख संश्लिष्ट रेशे

    नॉयलॉन (Nylon)

    नॉयलॉन ऐसे छोटे कार्बनिक अणुओं के बहुलकीकरण प्रक्रिया द्वारा बनाया जाता है जो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध नहीं है। यह एक पॉली एमाइड रेशे का उदाहरण है।

    नॉयलान मानव द्वारा संश्लिष्ट किया गया पहला रेशा था। इसका निर्माण सर्वप्रथम 1935 ई. में किया गया था तथा व्यापारिक स्तर पर 1939 ई. में महिलाओं के लिए जुराबें इससे बनाई गई।

    नॉयलान का उपयोग मछली पकड़ने के जाल में, पैरासूट के कपड़े में, टायर, दांत, ब्रश, पर्वतारोहण के लिए रस्सी, आदि बनाने में होता है।

    रेयॉन (Rayon)

    सेल्युलोज से बने कृत्रिम रेशे को रेयॉन कहते हैं। रेयॉन बनाने के लिए सेल्युलोज कागज की लुगदी या काष्ठ को लिया जाता है। इसे सान्द्र तथा ठण्डे सोडियम हाइड्रॉक्साइड तथा कार्बन डाइसल्फाइड से उपचारित करते हैं।

    रेयॉन रासायनिक दृष्टि से सूत के समान है। रेयॉन का उपयोग कपड़ा बनाने में, कालीन बनाने में चिकित्सा-क्षेत्र में लिट या जाली बनाने के लिए किया जाता है।

    पॉलीएस्टर (Polyester)

    इसे इंग्लैंड में विकसित किया गया था। पॉलीएस्टर का उपयोग कपड़े के रूप में, नौकाओं का पाल बनाने में, अग्निशमन में, प्रयुक्त हौज पाइप, आदि बनाने में किया जाता है।

    कार्बन फाइबर (Carbon Fibres)

    कार्बन फाइबर कार्बन परमाणुओं की लम्बी श्रृंखला से बने होते हैं। इसका उपयोग अंतरिक्ष यान तथा खेलकूद की सामग्री बनाने में होता है।

  • रबड़ और उसके प्रकार

    Rubber and its type ?

    रबड़ भूमध्यरेखीय सदाबहार वनों में पाये जाने वाले एक प्रकार के वृक्ष के दूध से प्राप्त होता है। इस दूध को ‘लेटेक्स’ (Latex) कहा जाता है। यह अपनी प्रत्यास्थता (Elasticity), जल प्रतिरोधी (Resistance to water) तथा विद्युत कुचालकता के कारण अनेक उद्योगों में काम आने लगा। अमेजन नदी की द्रोणी, रबड़ के वृक्षों का मूल स्थान है।

    रबड़ दो प्रकार के होते हैं

    प्राकृतिक रबड़ (Natural Rubber)

    प्राकृतिक रबड़ कुछ विशिष्ट जाति के पेड़ों से निकले वनस्पति दूध (Latex) से प्राप्त किया जाता है। दूसरे शब्दों में प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त रबड़ को प्राकृतिक रबड़ कहा जाता है। यह आइसोप्रीन का बहुलक है।

    संश्लिष्ट रबड़ (Synthetic Rubber)

    कृत्रिम स्रोतों से प्राप्त रबड़ को संश्लिष्ट रबड़ कहा जाता है। कृत्रिम रबड़ के विकास का श्रेय मैथ्यूस एवं हैरिस को जाता है। उन्होंने आइसोप्रीन को सोडियम के साथ 60°C तापक्रम पर प्रतिक्रिया कराकर प्राकृतिक रबड़ के सदृश बहुलक प्राप्त किया—जो संश्लिष्ट रबड़ कहलाता है।

    उदाहरण, बुना -N- रबड़, बुना -S- रबड़, पॉलिस्टाइरीन, ड्यूप्रीन रबड़, नियोप्रीन रबड़, थायोकॉल रबड़ तथा पॉलि विनाइल क्लोराइड, आदि।

  • प्लास्टिक (Plastics) क्या है ?

    What is Plastics ?

    प्लास्टिक सिंथेटिक (synthetic) या अर्ध-सिंथेटिक (semi-synthetic) सामग्रियों की एक विस्तृत श्रृंखला है जो मुख्य घटक के रूप में पॉलिमर का उपयोग करते हैं। उनकी प्लास्टिसिटी (plasticity) (प्लास्टिक का गुण)  प्लास्टिक को, विभिन्न आकृतियों की ठोस अवस्था में ढालना, उन्हें बाहर निकालना या उन्हें दबाना, संभव बनता है। प्लास्टिक का हल्का, टिकाऊ, लचीला और उत्पादन के लिए सस्ती होने के कारण इसका व्यापक उपयोग होता है

    प्लास्टिक आमतौर पर औद्योगिक प्रणालियों के माध्यम से बनाए जाते हैं। अधिकांश आधुनिक प्लास्टिक प्राकृतिक गैस या पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधन आधारित रसायनों से प्राप्त होते हैं; हालांकि, हाल के औद्योगिक तरीकों में अक्षय सामग्रियों (renewable materials ) से बने वेरिएंट का उपयोग किया जाता है l

    प्राकृतिक प्लास्टिक (Natural Plastics)

    प्राकृतिक प्लास्टिक वह प्लास्टिक है जो गर्म किये जाने पर मुलायम तथा ठंडा किये जाने पर कठोर हो जाता है। लाह (लाख) इसका एक अच्छा उदाहरण है।

    कृत्रिम प्लास्टिक (Artificial Plastics)

    रासायनिक विधि से तैयार किये गये प्लास्टिक को कृत्रिम प्लास्टिक कहा जाता है

    कृत्रिम प्लास्टिक दो प्रकार के होते हैं

    थर्मो प्लास्टिक (Thermo Plastics)

    यह गर्म करने पर मुलायम और ठंडा करने पर कठोर हो जाता है। यह गुण इसमें सदैव वर्तमान रहता है, चाहे इसे कितनी बार क्यों न गर्म व ठंडा किया जाये। जिन कार्बनिक यौगिक के अंत में एक द्विबन्ध रहता है, उनके योगशील बहुलीकरण (Addition polymerisation) से थर्मोप्लास्टिक बनता है

    उदाहरण—पॉलीइथिलीन, पॉली विनाइल क्लोराइड (PVC), पॉलीस्टइरीन, नायलॉन, टेफ्लॉन, इत्यादि।

    थर्मोसेटिंग प्लास्टिक (Thermosetting Plastic)

    यह वह प्लास्टिक है जो पहली बार गर्म करते समय मुलायम हो जाता है और उसे इच्छित आकार में ढाल किया जाता हैं, इसे पुनः गर्म करके मुलायम नहीं बनाया जा सकता है। इस प्रकार की अनुत्क्रमणीय बहुलकों को ‘ताप दृढ़’ बहुलक कहते हैं।

    उदाहरण—ग्लिप्टल, वीटल, बेकेलाइट, इत्यादि।

  • प्राकृतिक एस्टर और उसके प्रकार

    Natural esters

    प्राकृतिक एस्टर Renewable प्राकृतिक स्रोतों (natural resources) से बनाए जाते हैं,उदाहरण के लिए MIDEL eN 1204 (रेपसीड/कैनोला) और MIDEL eN 1215 (सोयाबीन)

    तेल व वसा

    तेल व वसा उच्च वसीय अम्लों (Higher fatty acids) व असंतृप्त अम्लों के ग्लिसरॉल के साथ बनने वाले एस्टर हैं। अधिकतर तेल व वसा पामिटिक, स्टिऐरिक, व औलिइक अम्लों में ग्लिसरॉल के मिश्रण के फलस्वरूप बनते है।

    साधारण ताप पर जो ग्लिसराइड ठोस अवस्था में पाये जाते हैं, वसा (Fat) कहलाते हैं व जो ग्लिसराइड द्रव अवस्था में पाये जाते हैं, तेल (Oil) कहलाते हैं।

    तेल व वसा में अंतर उनके गलनांकों के आधार पर भी किया जाता है। इसके अनुसार, जिन ग्लिसराइडों का गलनांक 20°C से कम होता है वे तेल (Oil) कहलाते हैं तथा जिनका गलनांक इससे अधिक होता है, वसा (Fat) कहलाते हैं

    मोम

    तेल और वसा के समान मोम भी प्रकृति में पाया जाने वाला एस्टर है परन्तु यह एस्टर ग्लिसराइड में भिन्न होता है। इसमें उच्च वसीय अम्लों के अणु ग्लिसरॉल के स्थान पर उच्च मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल से संयुक्त होकर एस्टर बनाते हैं।

    मोम की कुछ महत्त्वपूर्ण किस्में निम्नलिखित हैं

    1. शहद की मक्खी का मोमः इसमें मुख्य रूप से मिरीसिल पामिटेट रहता है।

    2. कार्नोबा मोमः यह ताड़ के पत्तों से प्राप्त किया जाता है। इसमें मिरीसिल सेराटेट होता है।

    3. स्पर्मेटी मोमः यह स्पर्म व्हेल से प्राप्त किया जाता है। इसमें सेटिल पामिटेड रहता है।

    4. पैराफिन मोमः यह उच्च हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण होता है। यह पेट्रोलियम से प्राप्त किया जाता है। प्लास्टिकः प्लास्टिक दो प्रकार के होते हैं:

  • साबुन और अपमार्जक (Soap & Detergent) क्या है ?

    साबुन और अपमार्जक (Soap & Detergent) क्या है ?

    What are Soap & Detergent ?

    साबुन (Soap)

    साधारणतः साबुन उच्च वसा-अम्लों (Higher fatty acids) के सोडियम लवण हैं। इन उच्च वसा अम्लों में पामिटिक अम्ल, स्टिएरिक अम्ल तथा ओलेइक अम्ल उल्लेखनीय है। पामिटिक अम्ल में बने साबुन को ‘सोडियम पामिटेट’ कहते हैं।

    अच्छे साबुन की विशेषताएं:

    (1) इसमें मुक्त क्षार उपस्थित नहीं रहना चाहिए।

    (2) यह ऐल्कोहॉल में विलेय होना चाहिए।

    (3) इसमें नमी की उपस्थिति 10% से अधिक नहीं होनी चाहिए।

    (4) प्रयोग करते समय इसको चटकना नहीं चाहिए।

    अपमार्जक (Detergents)

    साबुन द्वारा कपड़ों की धुलाई में अधिक परिश्रम करना पड़ता है तथा कठोर जल के साथ यह कठिनाई और अधिक हो जाती है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए रसायनशास्त्रियों ने अनेक प्रयास किए। अंततः वे साबुन से भिन्न प्रकार की सफाई करने वाले पदार्थ के निर्माण में सफल हुए। इस पदार्थ को अपमार्जक अथवा साबुनरहित साबुन कहते हैं

    अपमार्जकों के प्रकार और उनके उदाहरण

    अपमार्जकों के प्रकार उदाहरण
    सोडियम ऐल्किल सल्फेट सोडियम लौरिल सल्फेट 
    चतुष्क अमोनिया लवण ट्राइ मेथिल स्टिऐरिम अमोनिया ब्रोमाइड 
    अंशतः एस्टरीकृत यौगिकपेंटा एरिथ्रटोल मोनोस्टिऐरेट 
    प्रतिस्थापित ऐल्किल सल्फोनेट  सोडियम p-डोडेसिल बेंजीन सल्फोनेट 

  • पेट्रोलियम और गैस के प्रकार

    Type of Petroleum and Gas

    पेट्रोलियम (Petroleum)

    पेट्रोलियम एक प्राकृतिक ईंधन है। यह भू-पर्पटी (Earth’s Crust) के बहुत नीचे अवसादी परतों के बीच पाया जाने वाला संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का काले भूर रंग का गाढ़ा तैलीय द्रव है।

    आधुनिक समय में इसकी अत्यधिक महत्ता के कारण ही इसे काला सोना (Black gold), द्रव सोना (Liquid gold), आदि की संज्ञा दी गई। पेट्रोलियम से इसके विभिन्न अवयवों को प्रभाजी आसवन विधि (Fractional distillation method) द्वारा अलग-अलग किया जाता है।

    डीजल (Deisel)

    सिटी डीजल (City Diesel)

    सिटी डीजल को अल्ट्रा लो सल्फर डीजल (USLD-Ultra Low Sulphur Diesel) के नाम से भी जाना जाता है जो कि डीजल का एक अत्यधिक स्वच्छ रूप है। इसके दहन से वायुमंडल में कम प्रदूषण फैलता है क्योंकि इसमें सल्फर की मात्रा काफी कम रहती है।

    हरित डीजल (Green Diesel)

    हरित डीजल या ग्रीन डीजल एक उच्च कोटि का डीजल है जिसे यूरो-4 (Euro-4) मानक की मान्यता प्राप्त है। डीजल की सभी श्रेणियों में यह सबसे अच्छा माना जाता है और वायुमंडलीय प्रदूषण भी अन्य की अपेक्षा काफी कम करता है

    गैस (Gas)

    द्रवित पेट्रोलियम गैस (L.P.G.)

    यह प्रोपेन, ब्यूटेन तथा आइसो ब्यूटेन, आदि हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है एवं घरों में रसोई गैस के रूप में प्रयुक्त होता है। यह प्राकृतिक गैस तथा पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन से प्राप्त होता है। एल.पी.जी. के रिसाव की पहचान के लिए उसमें कुछ दुर्गन्धयुक्त पदार्थ, जैसे—मरकेप्टन, आदि मिला दिया जाता है।

    संपीडित प्राकृतिक गैस (C.N.G.)

    सी.एन.जी. (Compressed Natural Gas) अर्थात् संपीडित प्राकृतिक गैस धरती के भीतर पाये जाने वाले हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है जिसमें 80% से 90% मात्रा मिथेन गैस की होती है। यह गैस पेट्रोल तथा डीजल की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड 70%, नाइट्रोजन ऑक्साइड 87% और जैविक गैसों का लगभग 89% कम उत्सर्जन करती है।

    गैसोहोल (Gasohol)

    पेट्रोल तथा ऐल्कोहॉल के मिश्रण को ‘गैसोहोल’ कहा जाता है। यह गन्ने के रस से प्राप्त ऐल्कोहॉल को पेट्रोल में मिलाकर प्राप्त किया जाता है। इसमें पेट्रोल और ऐल्कोहॉल की मात्रा क्रमश: 10% और 90% होती है। इसकी खोज ब्राजील में की गई है।

    अपस्फोटन एवं ऑक्टेन संख्या (Knocking and Octane Number)

    कुछ ईंधन ऐसे होते हैं जिनका वायु मिश्रण इंजनों के सिलिण्डर में ज्वलन समय के पहले हो जाता है जिससे ऊष्मा पूर्णतया कार्य में परिवर्तित न होकर धात्विक ध्वनि (Matallic sound) उत्पन्न करने में नष्ट हो जाती है। यही धात्विक ध्वनि अपस्फोटन कहलाती है। ऐसे ईंधन जिनका अपस्फोटन अधिक होता है, उपयोग के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।

    अपस्फोटन कम करने के लिए ऐसे ईंधनों में कुछ ऐसे यौगिक मिश्रित कर दिये जाते हैं जिससे इनका अपस्फोटन कम हो जाता है। ऐसे यौगिकों को ही ‘अपस्फोटरोधी यौगिक’ (Anti knocking compound) कहते हैं। किसी ईंधन के अपस्फोटन को ऑक्टेन संख्या (Octane number) के द्वारा व्यक्त किया जाता है। जिस किसी ईंधन का ऑक्टेन संख्या जितनी अधिक होती है, उसका अपस्फोटन उतना ही कम होता है तथा वह उतना ही अच्छा ईंधन माना जाता है

    ईंधन की ऑक्टेन संख्या को बढ़ाने लिए उसमें अपस्फोटनरोधी यौगिक मिलाये जाते हैं। ट्रेटाइथाइल लेड या TEL सबसे अच्छा अपस्फोटनरोधी यौगिक है। BTX (Benzene Toluene xylene) भी एक अच्छा अपस्फोटनरोधी यौगिक है।

    कुछ अन्य महत्वपुर्ण गैस के प्रकार

    आंसु गैस (Tear Gas): आंसु गैस का प्रयोग कभी-कभी अनियंत्रित भीड़ को तीतर-बीतर करने के लिए किया जाता है। इस गैस के मानव नेत्र के सम्पर्क में आने से आंखों में जलन पैदा होती है एवं आंसु टपकने लगते हैं। एल्फा क्लोरो एसीटोफिनॉन, एक्रोलिन, आदि कुछ प्रमुख आंसु गैस है। इसे ग्रीनस में भरकर प्रयोग किया जाता है।

    मस्टर्ड गैस (Mustard Gas): यह एक विषैली गैस है, जिसका प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के समय रासायनिक हथियार के रूप में किया गया था। जब एथिलीन की अभिक्रिया सल्फर मोनोक्लोराइड के साथ करायी जाती है, तो मस्टर्ड गैस प्राप्त होती है। इसमें सरसों तेल (Mustard oil) की तरह झांस (Smell) होती है जिस कारण इसका यह नाम पड़ा। इसकी वाष्प त्वचा पर फफोला पैदा करती है तथा फेफड़ों को अत्यधिक प्रभावित करती है। इसकी वाष्प रबड़ को भी पार कर जाती है।

    ल्यूइसाइट (Lewisite): मस्टर्ड गैस की तरह यह भी एक अत्यंत ही जहरीली गैस है जिसका उपयोग द्वितीय विश्व युद्ध में रासायनिक हथियार (Chemical weapons) के रूप में किया गया था।

    क्लोरोपिक्रिन (Chloropicrin): यह एक विषैली गैस है जिसका प्रयोग युद्ध काल में किया जाता है।

    मिथाइल आइसोसायनेट (Methyl Isocynate): यह एक विषैली गैस है। भोपाल में कीटनाशक दवा बनाने वाली कम्पनी यूनियन कार्बाइड कारखाने से इसी गैस का रिसाव दुर्घटनावश हुआ था जिससे काफी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे।

    मार्श गैसः मिथेन को मार्श गैस के नाम से जाना जाता है। यह तालाबों के रूके हुए जल और दलदली स्थानों पर बुलबुलों के रूप में निकलता है। दलदली स्थानों पर नीचे दबी हुई वनस्पति और जैव पदार्थों के जीवाणु विच्छेदन से इसकी उत्पत्ति होती है।

    क्लैथरेट (Clathret): यह समुद्र की तलहटी में भारी मात्रा में जमा ईंधन है जो मूल रूप से पानी के अणुओं में फंसी मिथेन गैस है। इसका उपयोग रेफ्रिजरेटरों में प्रशीतक, वातानुकूलित संयंत्रों, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, ऑप्टिकल उद्योग तथा फार्मेसी उद्योग में व्यापक रूप से होता है।

    गोबर गैस (Gobar Gas): गीले गोबर के सड़ने से ज्वलनशील मिथेन गैस बनती है जो वायु की उपस्थिति में सुगमता से जलती है।

  • कार्बनिक यौगिक और उसके प्रकार क्या है ?

    What is an organic compound and its types ?

    कार्बन के रासायनिक यौगिकों को कार्बनिक यौगिक कहते हैं

    प्रकृति में इनकी संख्या 10 लाख से भी अधिक है। Life सिस्टम में कार्बनिक यौगिकों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें हाइड्रोजन भी रहता है।

    ऐतिहासिक तथा परंपरा गत कारणों से कुछ कार्बन के यौगकों को कार्बनिक यौगिकों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। इनमें कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड प्रमुख हैं। सभी जैव अणु जैसे कार्बोहाइड्रेट, अमीनो अम्ल, प्रोटीन, आरएनए तथा डीएनए कार्बनिक यौगिक ही हैं।

    कार्बनिक यौगिक एवं प्रकार

    मिथेन

    यह एक कार्बनिक गैस है। इसे ‘मार्श गैस’ के नाम से भी जाना जाता है। प्राकृतिक रूप से यह सब्जियों के विघटन से प्राप्त की जाती है। प्रयोगशाला में यह सोडियम ऐसीटेट को सोडालाइम के साथ गर्म करके प्राप्त किया जाता है। ऐल्युमिनियम कार्बाइड पर जल की प्रतिक्रिया से व्यापारिक स्तर पर मिथेन प्राप्त किया जाता है। यह प्राकृतिक गैस का प्रमुख अवयव है। उसमें यह 90% मात्रा में मौजूद रहता है। हवा के साथ यह विस्फोटक मिश्रण बनाता है जिस कारण कोयले की खानों में प्रायः भयानक विस्फोट हुआ करते हैं। इसका उपयोग गैसीय ईंधन के रूप में, कार्बनिक यौगिकों के निर्माण में, कार्बन ब्लैक बनाने में, हाइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन, आदि में होता है।

    एथीलिन

    इसका उपयोग पॉलीथीन प्लास्टिक बनाने, मस्टर्ड गैस बनाने, निश्चेतक के रूप में, ऑक्सी एथीलिन ज्वाला उत्पन्न करने, आदि में होता है।

    ऐसीटिलीन

    इसका उपयोग प्रकाश उत्पन्न करने, कपूर बनाने, निश्चेतक के रूप में, धातुओं को काटने जोड़ने में, बेजीन के संश्लेषण में, कच्चे फलों को कृत्रिम रूप से पकाने, आदि में होता है। इसकी खोज अमेरिकी वैज्ञानिक विल्सन ने की थी।

    क्लोरो फ्लोरो कार्बन (Chloro Fluoro Carbon)

    सी.एफ.सी. का पूरा नाम क्लोरो फ्लोरो कार्बन (Chloro Fluoro Carbon) होता है। यह क्लोरीन, फ्लोरीन तथा कार्बन परमाणुओं के यौगिकों का संघटन है। यह ओजोन परत के क्षरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सी.एफ.सी. (CFC) को ‘फ्रिऑन’ (Freon) भी कहा जाता है

    इथाइल ऐल्कोहॉल

    यह एक रंगहीन द्रव है जो अत्यधिक ज्वलनशील होता है। इसके पीने से मानव शरीर में उत्तेजना पैदा होती है। इस कारण इसका उपयोग मादक द्रव या शराब (Wine) के रूप में किया जाता है। यह फलों व स्टार्चयुक्त अनाजों से प्राप्त किया जाता है। औद्योगिक दृष्टि से इसका उत्पादन किण्वन विधि द्वारा किया जाता है। इसका उपयोग मोटर व हवाई जहाजों में ईंधन के रूप में, पारदर्शक साबुन बनाने में, इत्र व अन्य सुगन्धित पदार्थ बनाने में, शराब, आदि के निर्माण में किया जाता है।

    मिथाइल ऐल्कोहॉल (Methyl Alcohol)

    यह एक विषैला द्रव होता है। जिसकी गंध शराब की तरह होती है। इसके सेवन से व्यक्ति अंधा हो जाता है तथा अधिक मात्रा में पी लेने से मृत्यु तक भी हो सकती है। जहरीली शराब पीने वाले अधिकांश लोगों की मृत्यु इसी मिथाइल ऐल्कोहॉल के कारण होती है। इसका उपयोग पेट्रोल के साथ मिलाकर ईंधन के रूप में, कृत्रिम रंग बनाने में तथा वार्निश, आदि के विलायक के रूप में होता है।

    इथिलीन ग्लाइकॉल (Ethylene Glycol)

    यह एक डाइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल है तथा अपने मीठे स्वाद के कारण इस नाम से पुकारे जाते हैं। ठंडे प्रदेशों में हिमांक कम करने के लिए इसका उपयोग कारों के रेडियेटरों में किया जाता है।

    ग्लिसरौल (Glycerol)

    यह प्रोपेन का ट्राइहाड्रॉक्सी व्युत्पन्न है। इसका व्यापारिक नाम ग्लिसरीन (Glycerine) है। यह मुक्त अवस्था में शक्कर के किण्वन घोल (Fermented sugar solution) तथा रक्त (Blood) में अल्प मात्रा में पाया जाता है। संयुक्त अवस्था में यह वसा तथा वनस्पति तेलों में उच्च कार्बनिक अम्लों के ईस्टर (ग्लिसराइड) के रूप में पाया जाता है। सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में यह सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया कर ग्लिसरौल ट्राइनाइट्रेट (ट्राइनाइटो) ग्लिसरीन या TNG बनता है। TNG एक शक्तिशाली विस्फोटक है जिसका उपयोग डाइनामाइट (Dynamite) एवं अन्य विस्फोटक बनाने में होता है। ग्लिसरौल का उपयोग पारदर्शक साबुन, जूतों की पॉलिश, छापे की स्याही, शृंगार की सामग्रियां बनाने, अनेक कार्बनिक यौगिकों के बनाने में, शक्तिवर्द्धक दवा बनाने, स्नेहक के रूप में, परिरक्षक के रूप में प्रतिहिमीभूत (Antifreeze), आदि के रूप में होता है।

    डाईथाइल ईथर (Diethyl Ether)

    ईथर श्रेणी के सदस्यों में डाईथाइल ईथर सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसे सिर्फ ईथर भी कहा जाता है। इसका उपयोग निश्चेतक (Anaesthetic agent) के रूप में होता है। यह क्लोरोफॉर्म से अच्छा निश्चेतक माना जाता है।

    क्लोरोफॉर्म

    इसकी खोज सर्वप्रथम 1831 में लीबिग ने की। श्वास के साथ इसका वाष्प लेने से बेहोशी होती है। यही कारण है, कि इसका उपयोग निश्चेतक के रूप में होता हैं।

    आयोडोफॉर्म

    यह उर्ध्वपातित होता है। यह एक तीव्र कीटाणुनाशक (Bactericidal) पदार्थ है। अत: जीवाणुनाशक (Antiseptic) की तरह इसका उपयोग दवा में होता है।

    पायरीन

    कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCL) को पायरीन के नाम से जाना जाता है जो बिजली से लगी आग बुझाने के काम आता है।

    यूरिया (Urea)

    यूरिया को सर्वप्रथम 1773 में मूत्र से प्राप्त किया गया था। वोहलर (Wohler) ने 1828 में । इसे अमोनियम सायनेट से प्रयोगशाला में संश्लेषित किया था। यह एक प्रकार का कार्बनिक यौगिक था, जिसे प्रयोगशाला में संश्लेषित किया गया। यूरिया में 46% नाइट्रोजन की मात्रा पायी जाती है। यह एक ठोस रंगहीन, गंधहीन पदार्थ है जो जल में विलेय है। यह जीव जन्तुओं के मूत्र में उपस्थित रहता है। इसका मुख्य उपयोग उर्वरक के रूप में होता है। इसके अतिरिक्त नाइट्रोजन गैस, बेरोनल दवा बनाने में, यूरिया प्लास्टिक बनाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

    फॉर्मेलीन (Formalin)

    यह एक उत्तम परिरक्षक (Preservatives) के रूप में प्रयुक्त होता है।

    फॉर्मिक अम्ल

    यह लाल चींटी (Red ants) तथा मधुमक्खी में पाया जाता है। सर्वप्रथम यह लाल चींटी को जल के साथ स्रावित करके बनाया गया था, इसी कारण इसे फॉर्मिक अम्ल कहा गया क्योंकि लैटिन (Latin) भाषा में लाल चींटी का नाम फॉर्मिकस (Formicus) है। इसका उपयोग रोगाणुनाशी के रूप में, गठिया रोग की दवा के रूप में, रबड़ उद्योग, चमड़ा उद्योग, कपड़ा उद्योग, आदि में होता है।

    ऐसीटिक अम्ल (Acetic Acid)

    यह अनेक फलों के रसों में मुक्त अवस्था में पाया जाता है। यह विशेष रूप से सिरके (Vinegar) में पाया जाता है। इसे व्यापारिक स्तर पर पाइरोलिग्यिस अम्ल (Pyrolignious acid) से प्राप्त किया जाता है। सेलुलोज ऐसीटेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफिक फिल्म तथा रेयान (Rayon) बनाने । में होता है। इसका 4-6% तनु घोल ‘सिरका’ (Vinegar) कहलाता है।

    ऑक्जैलिक अम्ल

    यह पोटैशियम लवण के रूप में प्रायः वनस्पतियों में पाया जाता है। पोटैशियम हाइड्रोजन लवण के रूप में यह ऑक्जैलिस (Oxalis) तथा रूमेक्स (Rumex) परिवार के पौधों में पाया जाता है। कैल्सियम ऑक्जैलेट (Calcium oxalate) के रूप में यह प्रायः पौधों के कोशिकाओं (Cells) में पाया जाता है। थोड़ी मात्रा में यह मूत्र में भी पाया जाता है। मानव गुर्दे (Kidney) में कैल्सियम ऑक्जैलेट के एकत्रित होने के कारण ही पथरी (Stone) की बीमारी पैदा होती है। फेरस ऑक्जैलेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफी में होता है। इससे कपड़े में लगे स्याही के धब्बे दूर किये जाते हैं।

    एसीटोऐसटिक अम्ल

    यह एक रंगहीन द्रव है। यह अपघटित होकर एसीटोन व कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती हैं। मधुमेह के रोगियों के मूत्र में इसकी अधिकता पायी जाती है।

    साइट्रिक अम्ल

    यह एक मोनोहाइड्रोक्सी अम्ल है जो जल में हाइड्रोजन बंधों के कारण अधिक विलेय परन्तु कार्बनिक विलायकों में अविलेय होता है। यह खट्टे दूध में उपस्थित रहता है। मांसपेशियों में इसी अम्ल के एकत्रित होने के कारण थकावट का अनुभव होता है।

    टार्टरिक अम्ल (Tartaric Acid)

    यह डाइहाइड्रॉक्सी डाइकोर्बेक्सिलिक अम्ल है जो इमली तथा अंगूर में उपस्थित रहता है। इसका उपयोग बैकिंग पाउडर बनाने में किया जाता है।

    बेंजीन (Benzene)

    यह सभी ऐरोमैटिक यौगिकों का जन्मदाता माना जाता है। इसका उपयोग घोलक के रूप में, ऊनी कपड़ों की शुष्क धुलाई में, पेट्रोल के साथ मिलाकर मोटर ईंधन के रूप में, अनेक एरोमैटिक यौगिक के निर्माण में, विस्फोटकों के निर्माण, आदि में होता है।

    नाइट्रोबेंजीन

    इसे मिरबेन का तेल (Oil of Mirbance) भी कहा जाता हैं, इसका उपयोग ट्राइनाइट्रोबेंजीन (TNB) नामक विस्फोटक के निर्माण में होता है।

    ऐनिलीन

    इसका उपयोग रबड़ उद्योग में, औषधियों के निर्माण में तथा अनेक रंजकों (Dyes) के उत्पादन में होता है।

    फिनॉल (Phenol)

    इसे कार्बोलिक अम्ल (Carbolic acid) भी कहा जाता है। इसका उपयोग पिक्रिक अम्ल जा (विस्फोटक), फिनॉल्फथैलीन, बेकेलाइट, सैलोल, एस्प्रीन, सैलिसिलिक अम्ल, आदि के निर्माण में होता है।

    बेन्जल्डिहाइड

    इसका उपयोग स्वादिष्ट मसाला बनाने व रासायनिक क्रियाओं में किया जाता है।

    बेन्जोइक अम्ल (Benzoic Acid)

    इसका प्रयोग खाद्य पदार्थों के संरक्षण में किया जाता है।

    सैलिसिलिक अम्ल (Salicylic Acid)

    इसका उपयोग दर्द निवारक दवाओं के निर्माण में होता है।

    टॉलूईन (Toluene)

    इसका उपयोग टी.एन.टी. (TNT) विस्फोटक के निर्माण में, घोलक के रूप में, शुष्क धुलाई (Dry cleaning) में, सैकरीन (Saccharin) एवं क्लोरामिन-टी (Chloramine-T) नामक दवाओं के निर्माण में तथा पेट्रोल एवं बेंजीन के साथ प्रतिहिमीभूत (Antifreeze) के रूप में होता है।

    सैकरीन (Sachrin)

    चीनी से 550 गुना मीठा होता है जिसका प्रयोग शर्बतों में तथा मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों के लिए चीनी की जगह किया जाता है। इसका भोज्य मान (Caloric value) कुछ भी नहीं होता है।

    नैप्थैलीन (Naphthalene)

    यह एक पॉलीन्यूक्लियर हाइड्रोकार्बन है जिसकी गोलियां कीड़ों को कपड़े से दूर रखने में उपयोगी होती है।

    कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)

    यह वनस्पतियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। ये कई प्रकार के होते हैं, जैसे—मोनोसैकराइड, डाइसैकराइड, ट्राइसैकराइड, ऑलिगों सैकराइड। ये तुरन्त ऊर्जा प्रदान करने वाले कार्बनिक यौगिक होते हैं। ग्लूकोज, शर्करा, स्टार्च, आदि कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण हैं।

    नियोप्रीन (Neoprene)

    यह 2-क्लोरोब्यूटाडाइन (2-Chirobutadiene) के बहुलीकरण से बनता है इसका उपयोग विद्युत रोधी पदार्थ (Insulating material), विद्युत तार, कनवेयर बेल्ट (Conveyor belt), खनिज तेल ले जाने वाले पाइप बनाने में किया जाता है।

    थाईकॉल

    यह दूसरा कृत्रिम रबर है जो डाइक्लोरो इथेन (Dichloro Ethane) को पॉलीसल्फाइड (Polysulphide) के अभिक्रिया से बनाया जाता है इसका उपयोग खनिज तेल ले जाने वाले पाइप बनाने में, विलायक जमा करने वाला टैंक (Solvent storage tank), आदि बनाने में किया जाता है। थाईकॉल रबर को ऑक्सीजन मुक्त करने वाले रसायनों के साथ मिलाकर रॉकेट इंजनों में ठोस ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    बैकेलाइट (Bakelite)

    यह फिनॉल तथा फॉर्मेल्डिहाइड को सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में गर्म करके प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग रेडियो, टेलीविजन, आदि के केस, बाल्टी, आदि बनाने में किया जाता है l

    पॉलीथीन (Polythene)

    यह एक थर्मोप्लास्टिक है जो एथिलीन के बहुलीकरण से प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग पाइप, तार के ऊपर आवरण, पैकिंग थैलियां, आदि बनाने में किया जाता है।

    रैक्सिन (Rexin)

    यह एक कृत्रिम चमड़ा है। इसका निर्माण सेल्यूलोज नामक वनस्पति से होता है। अच्छे रैक्सिन मोटे केनवास पर पाइरोक्सिलिन का लेप देकर बनाया जाता है।

    टेफ्लॉन (Tefion)

    एथिलीन के चारों हाइड्रोजन परमाणुओं को फ्लोरीन द्वारा प्रतिस्थापित करने पर टेट्राफ्लोरो एथिलीन बनता है जिसके बहुत से अणु बहुलीकृत होकर टेफ्लॉन नामक प्लास्टिक का निर्माण करते हैं, यह एक अदहनशील पदार्थ है। यह एक अत्यंत उपयोगी प्लास्टिक है।

    नियोप्रीन (Neoprene)

    यह एक संश्लिष्ट रबड़ है। प्राकृतिक रबड़ की तरह यह जल्दी जलता नहीं है। इसका उपयोग विद्युत केबल में विद्युत अवरोध पदार्थ के रूप में होता है।

    आंसु गैस (Tear Gas)

    आंसु गैस का प्रयोग कभी-कभी अनियंत्रित भीड़ को तीतर-बीतर करने के लिए किया जाता है। इस गैस के मानव नेत्र के सम्पर्क में आने से आंखों में जलन पैदा होती है एवं आंसु टपकने लगते हैं। एल्फा क्लोरो एसीटोफिनॉन, एक्रोलिन, आदि कुछ प्रमुख आंसु गैस है। इसे ग्रीनस में भरकर प्रयोग किया जाता है।

    मस्टर्ड गैस (Mustard Gas)

    यह एक विषैली गैस है, जिसका प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के समय रासायनिक हथियार के रूप में किया गया था। जब एथिलीन की अभिक्रिया सल्फर मोनोक्लोराइड के साथ करायी जाती है, तो मस्टर्ड गैस प्राप्त होती है। इसमें सरसों तेल (Mustard oil) की तरह झांस (Smell) होती है जिस कारण इसका यह नाम पड़ा। इसकी वाष्प त्वचा पर फफोला पैदा करती है तथा फेफड़ों को अत्यधिक प्रभावित करती है। इसकी वाष्प रबड़ को भी पार कर जाती है।

    ल्यूइसाइट (Lewisite)

    मस्टर्ड गैस की तरह यह भी एक अत्यंत ही जहरीली गैस है जिसका उपयोग द्वितीय विश्व युद्ध में रासायनिक हथियार (Chemical weapons) के रूप में किया गया था।

    क्लोरोपिक्रिन (Chloropicrin)

    यह एक विषैली गैस है जिसका प्रयोग युद्ध काल में किया जाता है।

    मिथाइल आइसोसायनेट (Methyl Isocynate)

    यह एक विषैली गैस है। भोपाल में कीटनाशक दवा बनाने वाली कम्पनी यूनियन कार्बाइड कारखाने से इसी गैस का रिसाव दुर्घटनावश हुआ था जिससे काफी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे।

    मार्श गैस

    मिथेन को मार्श गैस के नाम से जाना जाता है। यह तालाबों के रूके हुए जल और दलदली स्थानों पर बुलबुलों के रूप में निकलता है। दलदली स्थानों पर नीचे दबी हुई वनस्पति और जैव पदार्थों के जीवाणु विच्छेदन से इसकी उत्पत्ति होती है।

    क्लैथरेट (Clathret)

    यह समुद्र की तलहटी में भारी मात्रा में जमा ईंधन है जो मूल रूप से पानी के अणुओं में फंसी मिथेन गैस है। इसका उपयोग रेफ्रिजरेटरों में प्रशीतक, वातानुकूलित संयंत्रों, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, ऑप्टिकल उद्योग तथा फार्मेसी उद्योग में व्यापक रूप से होता है।

    गोबर गैस (Gobar Gas): गीले गोबर के सड़ने से ज्वलनशील मिथेन गैस बनती है जो वायु की उपस्थिति में सुगमता से जलती है।

    द्रवीभूत प्राकृतिक गैस (Liquified Natural Gas): द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG) की तरह ही यह प्राकृतिक गैसों का द्रवित रूप है। इसमें मुख्यतया मिथेन रहती है अर्थात् इसका मुख्य संघटक मिथेन है।

    एल.एस.डी. (L.S.D.): इसका पूरा नाम लाइसर्जिक अम्ल डाइथाइलेमाइड है। यह एक भ्रम उत्पन्न करने वाली दवा है।

    एस्पीरिन (Aspirin): एसीटाइल सैलिसिलिक अम्ल को ‘एस्पीरिन’ कहा जाता है। यह एक ज्वरनाशी तथा पीड़ानाशी दवा है।

    पैरल्डिहाइडः इसका उपयोग नींद लाने वाली दवा के रूप में होता है।

    यूरोट्रोपीन: इसका उपयोग मूत्र रोग की दवा के रूप में होता है।  

    क्लोरेटोन: इसका उपयोग पहाड़ी यात्रा या समुद्री यात्रा में चक्कर आने से रोकने की दवा के रूप में होता है।

    गेमेक्सेन: इसका रासायनिक नाम बेंजीन हेक्साक्लोराइड प्राकृतिक स्रोत (Benzen hexachloride या B.H.C.) है। यह एक प्रबल कीटाणुनाशक है।

    क्लोरल: यह एक तैलीय व रंगहीन द्रव है। इसका रासायनिक नाम ट्राइक्लोरोऐसीटल्डिहाइड है। इसका मुख्य उपयोग डी.डी.टी. (D.D.T.) बनाने में किया जाता है।

    डी.डी.टी. (D.D.T.): इसका पूरा नाम डाइक्लोरो डाइफिनाइल टाइक्लोरोइथेन है। यह एक प्रमख कीटाणुनाशक (Germicide) है। इसे क्लोरल से बनाया जाता है।  

  • कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के कार्बनिक यौगिक

    Organic Compounds of Carbon, Hydrogen And Oxygen

    कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोग से अनेक कार्बनिक यौगिकों का निर्माण होता है l

    इन यौगिकों में ऐल्कोहॉल (Alcohols), ईथर (Ethers), एस्टर (Ester), एल्डहाइड (Aldehydes), काटोन काबीनक अम्ल (Carboxylic acids), आदि उल्लेखनीय है।

    ऐल्कोहॉल (Alcohols)

    ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बने सरल यौगिक होते हैं। किसी ऐल्केन से एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणुओं को उतने ही हाइड्रॉक्सिल मूलकों द्वारा प्रतिस्थापित करने पर जो यौगिक प्राप्त होते हैं, उन्हें ‘ऐल्कोहॉल’ कहा जाता है

    जिन ऐल्कोहॉल के अणुओं में केवल एक हाइड्रोक्सिल मूलक रहता है, वे ‘मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल’ कहलाते हैं, जैसे—मिथेनॉल, एथेनॉल, इत्यादि।

    जिन ऐल्कोहॉल अणुओं में दो हाइड्रॉक्सिल मूलक रहते है, वे ‘डाइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल’ कहलाते हैं, जैसे—ग्लाइकॉल।

    ऐल्डिहाइड (Aldehydes)

    जिन कार्बनिक यौगिकों में CHO अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें ऐल्डिहाइड कहा जाता है। फॉर्मल्डिहाइड, ऐसीटल्डिहाइड, प्रोपायोनल्डिहाइड, आदि कुछ प्रमुख ऐल्डिहाइड कार्बनिक यौगिक हैं।

    कीटोन (Ketones)

    जिन कार्बनिक यौगिक में >C=0 अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें कीटोन कहा जाता है। ऐसीटोन या डाइमिथाइल कीटोन, मिथाइल इथाइल कीटोन, डाइइथाइल कीटोन, आदि प्रमुख कीटोन है।

    कार्बोक्सिलिक अम्ल

    जिन कार्बनिक यौगिकों में COOH अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित होता है, उन्हें ‘कार्बोक्सिलिक अम्ल’ कहा जाता है। फॉर्मिक अम्ल, ऐसीटिक अम्ल, प्रोपायोनिक अम्ल, ब्यूटिरिक अम्ल, आदि कुछ प्रमुख कार्बोक्सिलिक अम्ल हैं।

    एस्टर

    जिन कार्बनिक यौगिकों में COOR अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें एस्टर कहते हैं—मिथाइल फॉर्मेट, इथाइल फॉर्मेट, मिथाइल ऐसीटेड, इथाइल ऐसीटेट, आदि कुछ प्रमुख एस्टर है। कृत्रिम सुगन्धित पदार्थ बनाने में इथाइल एसीटेट का प्रयोग किया जाता है

    ईथर

    जिन कार्बनिक यौगिकों में -0- अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें ‘ईथर’ कहते हैं। डाइमिथाइल ईथर, डाइइथाइल ईथर, आदि कुछ प्रमुख ईथर यौगिक है। डाइइथाइल ईथर का उपयोग निश्चेतक के रूप में किया जाता है, इसे सिर्फ ईथर भी कहा जाता है