Author: The Vigyan Team

  • कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide) क्या है ?

    कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide) क्या है ?

    What is Carbon Dioxide ?

    कार्बन डाइऑक्साइड पौधों के लिए प्राणदायिनी गैस है। वायुमंडल में पायी जाने वाली गैसों में CO2 की मात्रा 0.03% होती है। CO, गैस जन्तु जगत द्वारा श्वास के रूप में बाहर छोड़ी जाती है। पौधे दिन के समय CO2 गैस ही ग्रहण करते हैं। CO2 गैस ग्रीन हाऊस प्रभाव (Green house effect) के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होती है। प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की क्रिया में CO2 गैस प्रयुक्त होती है। किण्वन (Fermentation) की प्रक्रिया के दौरान भी CO2 गैस बाहर निकलती है। CO2 गैस की प्रकृति अम्लीय होती है। CO2 गैस चूने के जल को दुधिया कर देती है।

    सोडावाटर में अधिक दाब पर CO2 गैस घुली रहती है। शीतल पेय पदार्थों के बोतलों (Cold drinks) में उच्च दाब पर CO2 गैस भरी होती है। ठोस कार्बन डाइऑक्साइड को शुष्क बर्फ या Dry ice या क्तपावसक कहते हैं।

    CO2 गैस आग बुझाने के काम आता है। अग्निशामक यंत्रों में सोडियम बाइकार्बोनेट के घोल पर तनु सल्फ्यूरिक अम्ल की अभिक्रिया कराकर CO2 गैस तैयार की जाती है।

    ठोस कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग रेफ्रीजरेशन में होता है।

    कार्बन डाइऑक्साइड का जलीय घोल कार्बोनिक अम्ल कहलाता है।

    पेड़-पौधे रात्रि के समय कार्बन डाइऑक्साइड गैस बाहर छोड़ते है। इस कारण रात में पेड़ के नीचे नहीं सोना चाहिए।

    कार्बन डाइऑक्साइड के उपयोगः

    सोडावाटर, लेमोनेड, आदि में।

    चीनी उद्योग में, चूने को अवक्षेपित करने में।

    सफेद लेड के उत्पादन में।

    कड़ा इस्पात (Hard steel) के निर्माण में।

    अग्निशमन में।

  • कार्बन यौगिक – कार्बन मोनोक्साइड (Carbon Monoxide)

    कार्बन यौगिक – कार्बन मोनोक्साइड (Carbon Monoxide)

    कार्बन मोनोक्साइड (Carbon Monoxide)

    यह रंगहीन, स्वादहीन, विषैली, जल में अत्यंत अल्प घुलनशील, हवा के बराबर भारी तथा ज्वलनशील गैस है। कार्बन मोनोक्साइड गैस मानव रक्त के हीमोग्लोबीन के साथ मिलकर कार्बोक्सी हीमोग्लोबीन (Carboxy Haemoglobin) नामक एक लाल पदार्थ बनाता है जिससे रक्त में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। फलत: मनुष्य की श्वास क्रिया रुकने लगती है और अंत में मृत्यु हो जाती है। यह सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरीन के साथ संयोग कर फॉस्जीन या कार्बोनिल क्लोराइड (Phosgene or Carbonyl chloride) का निर्माण करती है जो कि एक विषैली गैस है।

    कार्बन मोनोक्साइड के उपयोगः

    1. फॉस्जीन गैस बनाने में।

    2. मिथाइल ऐल्कोहॉल तथा सोडियम फॉर्मेट बनाने में।

    3. अवकारक के रूप में धातुकर्म में।

    4. शुद्ध निकेल धातु तैयार करने में।

    5. प्रोड्यूशर गैस और जल गैस के रूप में ईंधन के लिए।

  • उर्वरक (Fertilizers) क्या है ?

    उर्वरक (Fertilizers) क्या है ?

    What are Fertilizers ?

    मृदा की उर्वरता कायम रखने के लिए उसमें बाहर से खाद (Manures) और रासायनिक पदार्थ मिलाए जाते हैं। मृदा में बाहर से मिलाए जाने वाले वे रासायनिक पदार्थ जो मृदा को उपजाऊ बनाने में सहायक होते हैं, ‘उर्वरक’ (Fertilizers) कहलाते हैं।

    उर्वरकों का वर्गीकरण: उर्वरकों में उपस्थित पोषक तत्वों (N (Nitrogen), P (Phosphorus), K (Potassium), इत्यादि) की प्रकृति के अनुसार, उर्वरकों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

    नाइट्रोजनी उर्वरक (Nitrogenous Fertilizer)

    इस प्रकार के उर्वरक मृदा में नाइट्रोजन की आपूर्ति करते हैं। उदाहरण, अमोनियम सल्फेट, कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट, भास्मिक कैल्सियम नाइट्रेट, कैल्सियम सायनामाइड (नाइट्रोलिम), यूरिया, इत्यादि।

    फॉस्फेटिक उर्वरक (Phosophatic Fertilizer)

    इस प्रकार के उर्वरक मृदा में फॉस्फोरस की कमी को पूरा करते हैं। उदाहरण, सुपर फॉस्फेट ऑफ लाइम, ट्रिपल सुपर फॉस्फेट, फॉस्फेटी धातुमल, इत्यादि।

    पोटाश उर्वरक (Potash Fertilizer)

    इस प्रकार के उर्वरक मृदा में पोटैशियम की कमी को पूरा करते हैं। उदाहरण, पोटैशियम क्लोराइड, पोटैशियम नाइट्रेट, पोटैशियम सल्फेट, इत्यादि।

    NP उर्वरक (NP Fertilizer)

    इस प्रकार के उर्वरक मृदा में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की कमी को पूरा करते हैं। नाइट्रोजनी तथा फॉस्फेटी उर्वरकों को उचित अनुपात में मिश्रित कर इन्हें बनाया जाता है। उदाहरण, डाइहाइड्रोजन अमोनिएटेड फॉस्फेट, कैल्सियम सुपर फॉस्फेट, नाइट्रेट, अमानिएटेड फॉस्फेट सल्फेट, इत्यादि।

    पूर्ण उर्वरक (Complete Fertilizers)

    इस प्रकार के उर्वरक मृदा के लिए आवश्यक तीनों पोषक तत्वों (N, P और K) की कमी को पूरा करते हैं। इन्हें नाइट्रोजनी, फॉस्फेटी और पोटाश तीनों प्रकार के उर्वरकों की परस्पर उचित अनुपात में मिश्रित कर बनाया जाता है।

    प्रमुख उर्वरक

    अमोनियम सल्फेट

    भारत में इस नाइट्रोजनी उर्वरक का उत्पादन सिन्दरी उर्वरक कारखाने में किया जाता है। यह उर्वरक धान और आलू की उपज बढ़ाने में काफी सहायक होता है। इस उर्वरक में 24-25% अमोनिया रहती है जो भास्मिक मृदा में उपस्थित नाइट्रीकारक बैक्टीरिया द्वारा नाइट्रेट में परिवर्तित हो जाती है। इन नाइट्रेटों को पेड़-पौधे आसानी से मृदा से ग्रहण कर लेते है।

    कैल्सियम अमोनिया नाइट्रेट:

    यह उर्वरक पंजाब के नांगल नामक स्थान पर वृहत् पैमाने पर बनाया जाता है। इस उर्वरक में नाइट्रोजन की मात्रा लगभग 20% होती है। इसे पौधे सीधे ग्रहण कर लेते हैं। मिट्टी में मिलाए जाने पर इसमें कोई परिवर्तन नहीं होती है। जल में अति विलेय होने के कारण यह मिट्टी में आसानी से घुल-मिल जाता है।

    सुपर फॉस्फेट ऑफ लाइम

    यह कैल्सियम डाइहाइड्रोजन फॉस्फेट जिप्सम का मिश्रण है। इसमें 16-20% P2O5, रहता है। इसका क्रियाशील अवयव कैल्सियम डाइड्रोजन फॉस्फेट है जो जल में विलेय होता है।

    ट्रिपल सुपर फॉस्फेट लाइम

    यह एक उपयोगी फॉस्फेटी उर्वरक है।

    यूरिया

    यह अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड के मिश्रण को 125°C-150°C ताप और 8.5 वायुमण्डलीय दाब पर गर्म करके प्राप्त की जाती है। इसमें नाइट्रोजन की मात्रा लगभग 46% होती है। यह भूमि में बीज डालते समय इस्तेमाल किया जाता हैं किन्तु इसे बीज के सम्पर्क में नहीं आने दिया जाता है। यूरिया डालने के 3-4 दिनों के बाद ही मृदा में पानी डाला जाता है।

    कैल्सियम सायनामाइड

    इसे नाइट्रोलिम (Nitrolim) के नाम से भी जाना जाता है। यह एक नाइट्रोजनी उर्वरक है। CaCN2 तथा C का मिश्रण बाजार में नाइट्रोलिम के नाम से बेचा जाता है।

  • कोयला (Coal) के प्रकार और गुण

    कोयला (Coal) के प्रकार और गुण

    What are the types and properties of Coal ?

    कोयला – लगभग तीन सौ मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी पर निचले जलीय क्षेत्रों में घने वन थे।बाढ़ जैसे प्राकृतिक प्रक्रमों के कारण ये वन मृदा के नीचे दब गए।उनके ऊपर अधिक मृदा जम जाने के कारण वे संपिडित हो गये।जैसे जैसे वे गहरे होते गये उनका ताप भी बढ़ता गया। उच्च ताप और उच्च दाब के कारण पृथ्वी के भीतर मृत पेड़ पौधे धीरे धीरे कोयले में परिवर्तित हो गये। कोयले में मुख्य रूप से कार्बन होता है।मृत वनस्पति के धीमे प्रक्रम द्वारा कोयले में परिवर्तन को कार्बनीकरण कहते हैं। क्योंकि वह वनस्पति के अवशेषों से बना है अतः कोयले को जीवाश्म ईंधन भी कहते हैं।

    कोयला मुख्यतः कार्बन के यौगिकों का मुक्त कार्वन का मिश्रण है।

    जिस रासायनिक प्रक्रिया द्वारा वानस्पतिक पदार्थों का परिवर्तन कोयला में होता है, उसे कार्बनीकरण कहते हैं।

    कार्बनीकरण की मात्रा के आधार पर कोयला चार किस्मों का होता है।

    एन्थ्रासाइट – 90-98% कार्बन

    बिटुमिनस – 70-86% कार्बन

    लिग्नाइट – 60-70% कार्बन

    पीट – 50-60% कार्बन

    एन्थ्रासाइट कोयला उच्च कोटि का कोयला है क्योंकि इसमें कार्बन की मात्रा 94 से 98 प्रतिशत तक पाई जाती है। यह कोयला मजबूत, चमकदार काला होता है। इसका प्रयोग घरों तथा व्यवसायों में स्पेस-हीटिंग के लिए किया जाता है।

    बिटुमिनस सामान्य किस्म का कोयला होता है l बिटुमिनस कोयला को मुलायम कोयला (Solt coal) भी कहते हैं। घरेलू कार्यों में बिटूमिनस कोयले का उपयोग होता है। विश्व में खनन किये जाने वाले कोयले का 80% भाग बिटुमिनस कोयला ही होता है। यह एक ठोस अवसादी चट्टान है, जो काली या गहरी भूरी रंग की होती है। इस प्रकार के कोयले का उपयोग भाप तथा विद्युत संचालित ऊर्जा के इंजनों में भी होता है। इस कोयले से कोक का निर्माण भी किया जाता है।

    लिग्नाइट को ‘भूरा कोयला’ (Brown coal) कहते हैं। यह कोयला भूरे रंग का होता है तथा यह स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक हानिकारक सिद्ध होता है। इसमें कार्बन की मात्रा 28 से 30 प्रतिशत तक होती है। इसका उपयोग विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।

    पीट (Peat) कोयला निर्माण की प्रारंभिक इस कारण उसमें कार्बन की मात्रा सबसे कम होती है। पीट कोयला सबसे निम्न कोटि का होता है। यह कोयला स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यधिक हानिकारक होता है।

    विश्व का 90% कोयला उत्तरी गोलार्द्ध में तथा शेष 10% दक्षिणी गोलार्द्ध में पाया जाता है।

    कोक (Coke)

    कोयले को वायु की अनुपस्थिति में गर्म करने पर इसके वाष्पशील अवयव निकल जाते हैं जो अवशेष बचता है, उसे ‘कोक’ कहा जाता है। इसमें 80 85″, कार्बन पाया जाता है।

    कोक का उपयोग

    1. धातुओं के निष्कर्षण में अवकारक के रूप में।

    2. ईधन के रूप में।

    3. इलेक्ट्रॉड बनाने में।

  • चारकोल (Charcoal)

    चारकोल (Charcoal)

    यह कार्बन का अशुद्ध रूप है।

    यह कई प्रकार का होता है — (1) काप्ट चारकोल (Wood charcoal), (2) अस्थि चारकोल (Bone charcoal), (3) चीनी चारकोल (Sugar charcoal), तथा (4) रक्त चारकोल (Blood charcoal)।

    लकड़ी को हवा की अपर्याप्त मात्रा में जलाकर काष्ट चारकोल प्राप्त किया जाता है।

    काष्ठ चारकोल का उपयोग जलाने, गैस को अवशोषित करने, बारूद बनानं, अवकारक के रूप में कीटाणुओं को नष्ट करने, आदि कामों में किया जाता है।

    अस्थि चारकोल (Bone charcoal) चीरहित (Degreased) तथा हडिड्यों के भंजक स्त्रवण (Destructive distillation) से प्राप्त किया जाता है।

    चीनी चारकोल चीनी से तैयार किया जाता है। बोन चारकोल का प्रयोग कार्बनिक पदार्थों के विरंजन में किया जाता है। चीनी का विरंजन इसी से किया जाता है।

    रक्त चारकोल सूखे हुए रक्त का भंजक स्रवण करने पर प्राप्त होता है।

  • ग्रेफाइट (Graphite)

    ग्रेफाइट (Graphite)

    ग्रेफाइट, जिसे पुरातन रूप से प्लंबेगो कहा जाता है, ग्रेफाइट भी कार्बन का एक अत्यंत ही उपयोगी क्रिस्टलीय अपरूप है जिसके परमाणु एक हेक्सागोनल संरचना में व्यवस्थित होते हैं। यह इस रूप में स्वाभाविक रूप से होता है और मानक परिस्थितियों में कार्बन का सबसे स्थिर रूप है। उच्च दबाव और तापमान में यह हीरे में परिवर्तित हो जाता है

    यह मुख्यतः भारत, श्रीलंका, साइबेरिया, इटली, संयुक्त राज्य अमेरिका, आदि में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

    भारत के उड़ीसा राज्य में यह प्रचुर मात्रा में मिलता है।

    ग्रेफाइट की संरचना षट्कोणीय जालक सतह के रूप में होती है।

    ग्रेफाइट में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं जो सम्पूर्ण रवा-जालक (Crystal lattice) में गमन करते हैं। इसी कारण ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है।

    कागज पर रगड़ने से यह उस पर काला निशान बना देता है। इस कारण इसे ‘काला सीसा’ (Black lead) भी कहते हैं। यह ताप एवं विद्युत का सुचालक होता है। अतः इसका व्यवहार इलेक्ट्रोड तथा कार्बन आर्क बनाने में किया जाता है।

    ग्रेफाइट का उपयोग

    1. धातुओं को गलाने के लिए प्रयुक्त होने वाले उच्च तापसह क्रुसिवल (Refractory crucibles) के निर्माण में।

    2. शुष्क सेलों और विद्युत अपघटन क्रियाओं, आदि में इलेक्ट्रोड के रूप में।

    3. पेंसिल (Pencil) तथा रंग बनाने में।

    4. ग्रेफाइट चूर्ण का उपयोग मशीनों में शुष्क संहक (Dry lubricant) के रूप में होता है।

    5. काफी उच्च दाब पर उत्प्रेरक की उपस्थिति में ग्रेफाइट को गर्म करने पर हीरा में परिवर्तित हो जाता है।

    पेंसिल में प्रयुक्त होने वाला काला सीसा ग्रेफाइट होता है।

    काजल

    काजल कार्बन युक्त पदार्थों को हवा की अपर्याप्त मात्रा में जलाकर प्राप्त धुएं को कम्बलों पर एकत्र कर प्राप्त किया जाता है। इसमें लगभग 95% कार्बन मौजूद होता है।

    इसका उपयोग प्रिटिंग की स्याही, काला रंग तथा जूते की पॉलिश बनाने में किया जाता है। यह आंखों में लगाने (अंजन के रूप में) के काम में भी लाया जाता है।

  • हीरा (Diamond)

    हीरा (Diamond)

    हीरा एकल तत्व कार्बन (single element carbon) से बना होता है, और इसमें जाली की संरचना (Diamond Lattice) में कार्बन परमाणुओं की व्यवस्था होती है जो हीरे को इसके अद्भुत गुण प्रदान करती है। हीरे और ग्रेफाइट की संरचना की तुलना करें, दोनों ही कार्बन से बने हैं।

    हीरा कार्बन का क्रिस्टलीय अपरूप हैं

    इसका प्राकृतिक स्रोत किम्बरलाइट पत्थर होता है।

    यह विश्व में दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, सयुक्त राज्य अमेरिका , आस्ट्रेलिया, आदि देशों में पाया जाता है।

    भारतवर्ष में हीरा गोलकुण्डा, अनन्तपुर, बेलारी, पन्ना, आदि स्थानों पर मिलता है।

    कृत्रिम हीरा को सर्वप्रथम मोयासां (Moisson) ने 1893 ई. में बनाया था।

    शुद्ध हीरा पारदर्शक एवं रंगहीन होता है, किन्तु अशुद्धियों की उपस्थिति के कारण यह भिन्न-भिन्न रंगों का होता है। कुछ हीरे काले रंग के होते हैं जिसे बोर्ट (Bort) कहते हैं।

    यह सभी पदार्थों से अधिक कठोर होता है। इसका अपवर्तनांक 2.417 होता है। अतः पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण ही यह बहुत चमकता है।

    यह ताप और विद्युत का कुचालक है। यह किसी द्रव में नहीं घुलता है। इस पर अम्ल, क्षार, आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

    हीरा का उपयोग

    रंगहीन हीरे आभूषण बनाने में प्रयुक्त होते हैं। काला हीरा जिसे ‘बोर्ट’ कहते हैं, कांच काटने, चट्टानों में छेद करने तथा अन्य पत्थरों पर पॉलिश करने के काम में लाया जाता है।

    काला हीरा को ‘कार्बोनेडो’ (Carbonado) भी कहा जाता है। हीरा की संरचना नियमित चतुष्फलकीय (Regular tetrahedral) होती है।

  • कार्बन तत्व और उसके गुण

    कार्बन तत्व और उसके गुण

    Carbon element and its properties

    कार्बन का संकेत C तथा परमाणु संख्या 6 होता है।

    इसमें संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या 4 होती है।

    कार्बन वर्ग के तत्वों में लेड को छोड़कर सभी अपरूपता (Allotropy) का गुण प्रदर्शित करते हैं।

    कार्बन और सिलिकन अधातु हैं। जर्मेनियम उपधातु (Metalloid) है जबकि टिन और लेड धातु (Metal) है।

    प्रकृति में कार्बन मुक्त और संयुक्त दोनों ही अवस्थाओं में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

    कार्बन मुक्त अवस्था में हीरा, ग्रेफाइट तथा कोयले के रूप में पाया जाता है।

    संयुक्त अवस्था में कार्बन धातु के कार्बोनेट, बाइकार्बोनेटस, CO,, हाइड्रोकार्बन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य जटिल यौगिकों के रूप में पाया जाता है।

    कार्बन को एक सार्वभौमिक तत्व (Universal element) माना जाता है।

    प्रकृति में कार्बन ही एक ऐसा तत्व है जिसके सबसे अधिक यौगिक पाये जाते हैं।

    कार्बन एक ऐसा तत्व है जिसमें शृंखलन (Catenation) का गुण सबसे अधिक पाया जाता है।

    कार्बन के विभिन्न रूपों को जिनके रासायनिक गुणों में समानता, किन्तु भौतिक गुणों में अंतर रहता है, ‘कार्बन के अपरूप’ (Allotrops of carbon) कहते हैं। कार्बन रवेदार तथा बेरवेदार दोनों ही रूपों में पाया जाता है।

  • जल और उसके गुण

    जल और उसके गुण

    Water and its properties

    जल एक यौगिक (compound) है, इसका अणुसूत्र H2O होता है।

    इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात भार के अनुपात में 1:8 तथा आयतन के अनुपात में 2:1 होता है।

    शुद्ध जल उदासीन होता है अर्थात् इसका pH मान 7 होता है।

    शुद्ध जल विद्युत का कुचालक होता है जबकि अम्लीय जल विद्युत का सुचालक होता है।

    4°C पर जल का घनत्व अधिकतम तथा आयतन न्यूनतम होता है।

    जल शून्य डिग्री (0°) सेण्टीग्रेड पर सफेद बर्फ में परिवर्तित हो जाता है।

    शुद्ध जल का क्वथानांक 100°C तथा द्रवणांक 0°C होता है।

    वर्षा का जल शुद्ध जल होता है।

    सम्पूर्ण जल का 97% भाग समुद्री वातावरण में पाया जाता है, शेष बचा हुआ 3% भाग ही स्वच्छ जल के रूप में जाना जाता है। जल का बर्फ में तथा वाष्प में परिवर्तित होना भौतिक परिवर्तन का उदाहरण है।

    जल के प्रकार

    जल दो प्रकार का होता है:

    1. कठोर जल (Hard Water): कठोर जल साबुन के साथ फेन उत्पन्न नहीं करता है। इसमें कैल्सियम एवं मैग्नीशियम के क्लोराइड, सल्फेट व बाइकोर्बोनेट घुले रहते हैं। कठोर जल पीने के लिए उपयुक्त नहीं होता है क्योंकि इसमें घुले लवण स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होते हैं।

    2. मृदु जल (Soft Water): मृदु जल साबुन के साथ आसानी से फेन उत्पन्न करता है। यह जल पीने की दृष्टि से उपयुक्त होता है।

    जल की कठोरता (Hardness of Water)

    जल की कठोरता दो प्रकार की होती है

    स्थायी कठोरता

    जल की अस्थायी कठोरता उसमें कैल्सियम (Ca)व मैग्नीशियम (Mg) के क्लोराइड तथा सल्फेट लवण घुले रहने के कारण होती है। जल की स्थायी कठोरता उसमें सोडियम कार्बोनेट मिलाकर गर्म करने से दूर हो जाती है। जल की स्थायी कठोरता उसे उबालकर आसवन करने से भी दूर हो जाता है। जल की स्थायी कठोरता दूर करने की मुख्य विधि परम्यूटिट विधि है।

    अस्थायी कठोरता

    जल की अस्थायी कठोरता उसमें कैल्सियम (Ca) व मैग्नीशियम (Mg) के बाइकार्बोनेट्स लवण घुले रहने के कारण होती है। जल की अस्थायी कठोरता उसे उबालकर दूर कर ली जाती है। जल में सोडियम कार्बोनेट डालकर उबालने से स्थायी तथा अस्थायी दोनों प्रकार की कठोरता दूर हो जाती है।

    जल को सार्वत्रिक विलायक (Universal solvent) कहा जाता है क्योंकि इसमें कई पदार्थों को घुलाने की क्षमता होती हैं। जल का डाइइलेक्ट्रिक नियतांक अधिक होने के कारण ही इसे उत्तम विलायक माना जाता है (अपवाद-कार्बनिक पदार्थ)

    ऐसी शुद्ध बर्फ जिसमें रोगाणु नहीं होते हैं और जो लगभग 2000-3000 वर्ष पुरानी होती है, ‘ब्लू आइस’ (Blue ice) कहलाती है। यह ग्रीनलैंड में पायी जाती है जहां ब्लू आइस का उपयोग व्हिस्की (Whisky) बनाने में किया जाता है।

    केतली में जल उबालने पर उसकी आंतरिक परत में सफेद रंग की परत जम जाती है जो कैल्सियम व मैग्नीशियम के कार्बोनेट्स होते हैं।

    जल हाइड्रोजन बन्ध (Hydrogen bond) के कारण द्रव अवस्था में पाया जाता है।

    जल का शुद्धीकरण पोटैशियम परमैंगनेट, क्लोरीन गैस, पोटाश एलम, आदि द्वारा किया जाता है।

    पॉली वाटर (Poly Water)

    पॉली वाटर सामान्य जल को बाल के आकार की नलिका से गुजारकर बनाया जाता है। यह पृथ्वी पर एक खतरानाक वस्तु मानी जाती है।

  • हाइड्रोजन तत्व और उसके गुण

    हाइड्रोजन तत्व और उसके गुण

    Hydrogen element and its properties

    हाइड्रोजन आवर्त सारणी का प्रथम तत्व है। यह अन्य सभी तत्वों से हल्का होता है।

    सूर्य और तारों का आधार भाग हाइड्रोजन का बना है।

    हाइड्रोजन को भविष्य का ईधन कहा जाता है। इसके नाभिक में सिर्फ एक प्रोटॉन (Proton) होता है।

    इसकी खोज 1766 ई. में हेनरी कैवेडिस ने की।

    हाइड्रोजन सभी अम्लों का अनिवार्य अंग है।

    हाइड्रोजन निर्माण की विधि

    1. लाल तप्त लोहे पर भाप प्रवाहित करने पर हाइड्रोजन गैस प्राप्त होती है।

    2. हाइड्रोलिथ की जल से प्रतिक्रिया करने पर हाइड्रोजन गैस प्राप्त होती है।

    3. सोडियम की जल के साथ प्रतिक्रिया करने पर हाइड्रोजन गैस प्राप्त होती है।

    4. तेलों का हाइड्रोजनीकरण (Hydrogenation of Oils) : उच्च दाब पर निकेल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन वनस्पति तेलों (Vegetable oils) से संयोग करके उन्हें वनस्पति घी में परिवर्तित कर देता है, इस प्रक्रिया को तेलों का ‘हाइड्रोजनीकरण’ कहते हैं।

    हाइड्रोजन के उपयोग

    1. प्रायः अन्य गैसों के साथ मिश्रित कर ईंधन के रूप में।

    2. हैबर विधि से अमोनिया के उत्पादन में होता है।

    3. वनस्पति घी के निर्माण में।

    4. गैसोलिन (Gasolene) के उत्पादन में।

    5. ऑक्सीजन-हाइड्रोजन लौ (ताप 2,800°C) का उपयोग धातुओं को काटने तथा जोड़ने में होता है।

    6. हल्की गैस होने के कारण बैलून में भरने में होता है, किन्तु ज्वलनशील होने के कारण आजकल इसकी जगह हीलियम या हीलियम-हाइड्रोजन मिश्रण (He 85% + H215%) का व्यवहार होता है।

    7. द्रव हाइड्रोजन रॉकेट ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता है।

    हाइड्रोजन के समस्थानिक

    हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते हैं, ये है:

    1. प्रोटियम (1H1) ।

    2. ड्यूटेरियम (1H2 या D)।

    3. ट्राइटियम (1H3 या T)।

    प्रोटियम (Protium): प्रोटियम की परमाणु संख्या एक तथा द्रव्यमान संख्या भी एक होता है।

    ड्यूटेरियम (Deuterium): ड्यूटेरियम को भारी हाइड्रोजन कहा जाता है। इसकी परमाणु संख्या 1 तथा द्रव्यमान संख्या 2 होती है। ड्यूटेरियम का उपयोग कार्बनिक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि (Mechanism) समझने में तथा नाभिकीय अभिक्रियाओं (Nuclear reactions) में बमबारी के लिए होता है।

    ट्राइटियम (Tritium): यह हाइड्रोजन का एक दुर्लभ समस्थानिक है। इसकी परमाणु संख्या 1 तथा द्रव्यमान संख्या 3 होती है।

    भारी जल (Heavy Water)

    ड्यूटेरियम के ऑक्साइड को भारी जल कहा जाता है क्योंकि इसमें ड्यूटेरियम (D) होता है जो हाइड्रोजन का एक भारी समस्थानिक है

    इसकी खोज सन् 1932 में यूरे तथा वाशबर्न ने की थी। भारी जल को भारी कहा जाता है क्योंकि इसका घनत्व साधारण जल से अधिक होता है। भारी जल का उपयोग ड्यूटेरियम के अनेक यौगिकों के निर्माण में तथा यूरेनियम के नाभिकीय विखण्डन में तीव्रगामी न्यूट्रॉनों को मंद करने के लिए न्यूट्रॉन मंदक (Neutron moderator) के रूप में होता है।

    हाइड्रोजन परॉक्साइड (Hydrogen Peroxide)

    हाइड्रोजन परॉक्साइड की खोज सन् 1818 में श्रीनार्ड ने की।

    यह अपने ऑक्सीकारक गुणों के कारण विरंजक का कार्य करता है।

    यह रेशम, ऊन, बाल, तिनके , हाथी दांत, आदि कोमल वस्तुओं का विरंजन करने में प्रयुक्त होता है। इसका उपयोग बालों के ब्लीचिंग (Bleeching) में होता है

    इसका उपयोग पुराने तैल चित्रों (Oil paintings) को चमकदार बनाने तथा उसके रंग को पुन: उभारने के लिए किया जाता है। यह जर्मनाशी और प्रतिरोधी के रूप में घाव धोने, गरारे करने, दांत और कान साफ करने के काम आता है।

    यह दूध, शराब, आदि का परिरक्षण करने में प्रयुक्त होता है। यह रॉकेट, पनडुब्बियों और टॉरपीडों में ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता है क्योंकि इससे ऑक्सीजन प्राप्त होती है।