Author: Kailash Meena

  • माइकल फैराडे की जीवनी और प्रमुख आविष्कार| Biography of Michael Faraday and his inventions in Hindi

    माइकल फैराडे की जीवनी और प्रमुख आविष्कार| Biography of Michael Faraday and his inventions in Hindi

    इस आर्टिकल में हम महान वैज्ञानिक माइकल फैराडे (Michael Faraday) की जीवनी और उनके द्वारा बनाये गये प्रमुख आविष्कारों के बारे में बात करेगे |

    माइकल फैराडे (Michael Faraday) – परिचय


    माइकल फैराडे का पोर्ट्रेट (1791-1867)। हेनरी विलियम पिकर्सगिल (1782-1875) के द्वारा

    माइकल फैराडे Michael Faraday (22 सितंबर 1791 – 25 अगस्त 1867) एक ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी, रसायनज्ञ एवं दार्शनिक थे जिन्होंने विद्युत चुंबकत्व ((electromagnetism) और विद्युत रसायन विज्ञान (electrochemistry) के अध्ययन में योगदान दिया था। उनकी मुख्य खोजों में विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction), प्रतिचुम्बकत्व (Diamagnetism) और इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) के अंतर्निहित सिद्धांत शामिल हैं। हालाँकि फैराडे ने बहुत कम औपचारिक शिक्षा प्राप्त की, फिर भी वह इतिहास के सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों में से एक थे।

    प्रत्यक्ष धारा (direct current) ले जाने वाले कंडक्टर के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र पर अपने शोध से फैराडे ने भौतिकी में विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र की अवधारणा स्थापित की। फैराडे ने यह भी स्थापित किया कि चुंबकत्व प्रकाश की किरणों को प्रभावित कर सकता है और दोनों घटनाओं के बीच एक अंतर्निहित संबंध (underlying relationship) है।

    उन्होंने इसी तरह विद्युत चुम्बकीय प्रेरण, प्रतिचुंबकत्व और इलेक्ट्रोलिसिस के नियमों की खोज की। विद्युत चुम्बकीय रोटरी उपकरणों (electromagnetic rotary devices) के उनके आविष्कारों ने इलेक्ट्रिक मोटर प्रौद्योगिकी (electric motor technology) की नींव रखी, और यह काफी हद तक उनके प्रयासों के कारण बिजली प्रौद्योगिकी में उपयोग के लिए व्यावहारिक बन पाई |

    एक रसायनज्ञ (Chemist) के रूप में, फैराडे ने बेंजीन (benzene) की खोज की, क्लोरीन (chlorine) के क्लैथ्रेट हाइड्रेट (clathrate hydrate) की जांच की, बन्सन बर्नर (Bunsen burner) के प्रारंभिक रूप और ऑक्सीकरण (oxidation) संख्याओं की प्रणाली का आविष्कार किया, और “एनोड (anode)”, “कैथोड (cathode)”, “इलेक्ट्रोड (electrode)” और “आयन (ion)” जैसी शब्दावली को लोकप्रिय बनाया। . फैराडे अंततः रॉयल इंस्टीट्यूशन (Royal Institution) में रसायन विज्ञान के पहले और अग्रणी फुलेरियन प्रोफेसर (Fullerian Professor) बन गए, जो एक आजीवन पद था।

    अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने अध्ययन की दीवार पर आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer) और जेम्स क्लर्क मैक्सवेल (James Clerk Maxwell) की तस्वीरों के साथ फैराडे की एक तस्वीर रखते थे ।

    माइकल फैराडे का प्रारंभिक जीवन – Early Life of Michael Faraday

    माइकल फैराडे का जन्म 22 सितंबर, 1791 को इंग्लैंड के न्युविंगटन बट्स (Newington Butts), सरे (जो अब साउथवार्क के लंदन बरो का हिस्सा है) में हुआ था। उनका परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी | उनके पिता का नाम जेम्स फैराडे (James Faraday) था और माँ का नाम मार्गरेट (Margaret) (नी हेस्टवेल) (Née Hastwell) था | उनके पिता एक गरीब लोहार थे ।

    बचपन में पढ़ाई के साथ-साथ यह अपने पिता के साथ काम भी करते थे। माइकल फैराडे अपने माता पिता के चार बच्चो में तीसरे नंबर पर थे। स्कूल से माइकल फैराडे को सिर्फ बेसिक एजुकेशन ही ले पाए | खुद को शिक्षित करने के लिए फैराडे  रसायन एव विद्युत् भौतिकी पर पुस्तकें पढ़ते रहते थे।

    14 साल की उम्र में वह ब्लैंडफोर्ड स्ट्रीट में एक स्थानीय बुकबाइंडर और बुकसेलर जॉर्ज रीबाऊ के प्रशिक्षु बन गए। अपनी सात साल की प्रशिक्षुता के दौरान फैराडे ने कई किताबें पढ़ीं, जिनमें आइजैक वॉट्स की द इम्प्रूवमेंट ऑफ द माइंड (Isaac Watts’s The Improvement of the Mind) भी शामिल है, और उन्होंने उत्साहपूर्वक उनमें निहित सिद्धांतों और सुझावों को लागू किया ।

    इस अवधि के दौरान, फैराडे ने सिटी फिलॉसॉफिकल सोसाइटी (City Philosophical Society) में अपने साथियों के साथ चर्चा की, जहां उन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक विषयों पर व्याख्यान में भाग लिया। उन्होंने विज्ञान, विशेषकर बिजली में भी रुचि विकसित की। फैराडे विशेष रूप से जेन मार्सेट की पुस्तक कन्वर्सेशन्स ऑन केमिस्ट्री (Conversations on Chemistry by Jane Marcet) से प्रेरित थे।

    माइकल फैराडे का वैज्ञानिक जीवन (Scientific life of Michael Faraday)

    1812 में, 20 साल की उम्र में और अपनी प्रशिक्षुता (apprenticeship) के अंत में, फैराडे ने रॉयल इंस्टीट्यूशन (Royal Institution) और रॉयल सोसाइटी (Royal Society) के प्रख्यात अंग्रेजी रसायनज्ञ हम्फ्री डेवी (Humphry Davy) और सिटी फिलॉसॉफिकल सोसाइटी (City Philosophical Society) के संस्थापक जॉन टैटम (John Tatum) के व्याख्यान में भाग लिया। इन व्याख्यानों के कई टिकट फैराडे को विलियम डांस(William Dance) द्वारा दिए गए थे, जो रॉयल फिलहारमोनिक सोसाइटी (Royal Philharmonic Society) के संस्थापकों में से एक थे। फैराडे ने बाद में डेवी को इन व्याख्यानों के दौरान लिए गए नोट्स के आधार पर 300 पन्नों की एक किताब भेजी। इसलिए 1813 में, जब नाइट्रोजन ट्राइक्लोराइड के साथ एक दुर्घटना में डेवी की आँखे ख़राब हो गई थी, तो उन्होंने फैराडे को एक सहायक के रूप में नियुक्त करने का निर्णय लिया। इस प्रकार उन्होंने 1 मार्च 1813 को फैराडे को रॉयल इंस्टीट्यूशन में रासायनिक सहायक (Chemical Assistant) के रूप में नियुक्त किया।

    1842 में थॉमस फिलिप्स द्वारा फैराडे का चित्रण

    वर्ष 1820 में हैंड्स क्रिस्चियन ओर्स्टेड (Hans Christian Ørsted) ने अपनी खोज में बताया कि विद्युत धारा से चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जा सकता है। उनकी इस खोज से माइकल फैराडे को विचार आया कि यदि विद्युत धारा के प्रवाह से चुम्बकीय प्रभाव पैदा हो सकता है तो चुम्बकीय प्रभाव से विद्युत धारा को भी उत्पन्न कर सकते है।

    इसके लिए इन्होने एक प्रयोग किया जिसमें तार की एक कुंडली बनाकर चुम्बक के पास रखी गई। लेकिन उन्हें कुंडली में कोई बिजली बनती हुई नहीं दिखाई दी। उन्होंने कई बार अपने प्रयोग को दोहराया किन्तु उन्हें हर बार नाकामी हाथ लगी। तंग आकर एक दिन उन्होंने कुंडली को फेंकने के लिए चुंबक के पास से खींचा और उसी समय धारामापी ने विद्युत बनते हुए दिखा दिया। उस समय फैराडे को यह ज्ञात हुआ कि यदि कुंडली तथा चुंबक के बीच में आपेक्षिक गति होती है तभी उससे बिजली पैदा होती है। इसी को चुम्बकीय प्रेरण का सिद्धान्त (Principal of Electromagnetic Induction) कहते हैं। आज पूरे विश्व में इसी तरीके से बिजली का उत्पादन होता है।

    वर्ष 1831 में माइकल फैराडे ने ‘विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत (Principal of Electromagnetic Induction)’ की खोज की थी। चुम्बकीय क्षेत्र में एक चालक को घुमाकर विद्युत-वाहक-बल उत्पन्न किया। इसी सिद्धांत पर आने वाले समय में जनित्र (generator) बना था। फैराडे ने लगन के साथ कार्य किया और निरंतर प्रगति कर सन् 1833 में रॉयल इंस्टिट्यूट (Royal Institution) में रसायन के प्राध्यापक हो गए ।


    प्रेरण को प्रदर्शित करने वाले फैराडे के 1831 प्रयोगों में से एक। तरल बैटरी (दाएं) छोटे कुंडल (ए) के माध्यम से विद्युत प्रवाह भेजती है। जब इसे बड़े कुंडल (बी) के अंदर या बाहर ले जाया जाता है, तो इसका चुंबकीय क्षेत्र कुंडल में एक क्षणिक वोल्टेज उत्पन्न करता है, जिसे गैल्वेनोमीटर द्वारा पता लगाया जाता है

    चुम्बकीय प्रेरण पर कार्य करते हुए फैराडे ने एक और खोज की कि यदि दो कुंडलियों को पास में रखते हुए एक में ए-सी- विद्युत प्रवाहित की जाये तो दूसरे में स्वयं ए.सी. विद्युत बनने लगती है । ट्रांसफार्मर इसी सिद्धान्त पर कार्य करते हैं ।

    रसायन विज्ञान मे फैराडे ने बेन्जिन (Benzene) की खोज की, जिसका आज व्यापक पैमाने मे इस्तेमाल होता हैं। साथ उन्होने आक्सिकरण संख्या (Oxidation Number) का कॉन्सेप्ट दिया जिसका इस्तेमाल रासायनिक समीकारो को बैलेंस करने मे होता हैं ।

    बनसन बर्नर (Bunsen burner) की शुरुआती फॉर्म की खोज के साथ एनोड, कैथोड, इलेक्ट्रोड और आयन जैसी टर्मिनोलॉजी की भी खोज का श्रेय इन्हें जाता है। क्लोरीन गैस का द्रवीकरण करने में भी ये सफल हुए। फैराडे ही ऐसे पहले शख्स थे जिन्होंने गैसों के डिफ्यूजन संबंधी एक्सपेरीमेंट किये। कहा जाता है कि आइंस्टाइन ने अपने अध्ययन कक्ष में माइकल फैराडे की तस्वीर न्यूटन और जेम्स क्लार्क मैक्सवेल के साथ लगा रखी थी।

    फैराडे ने एक प्रकार की कांच की पट्टी पकड़ रखी है जिसका उपयोग उन्होंने 1845 में यह दिखाने के लिए किया था कि चुंबकत्व ढांकता हुआ पदार्थ (dielectric material) में प्रकाश को प्रभावित करता है।

    अपने जीवनकाल में फैराडे ने अनेक खोजें कीं। इन्होंने विद्युद्विश्लेषण (electrolysis) पर महत्वपूर्ण कार्य किए तथा विद्युद्विश्लेषण के नियमों की स्थापना की, जो फैराडे के नियम कहलाते हैं। विद्युद्विश्लेषण में जिन तकनीकी शब्दों का उपयोग किया जाता है, उनका नामकरण भी फैराडे ने ही किया।

    क्लोरीन गैस का द्रवीकरण करने में भी ये सफल हुए। परावैद्युतांक, प्राणिविद्युत्, चुंबकीय क्षेत्र में रेखा ध्रुवित प्रकाश का घुमाव, आदि विषयों में भी फैराडे ने योगदान किया। इन्होने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें सबसे उपयोगी पुस्तक “विद्युत् में प्रायोगिक गवेषणाएँ” (Experimental Researches in Electricity) है। फैराडे को लेक्चर देना काफ़ी पसंद थे, उन्होने रॉयल इंस्टीटयूट में रसायन और भौतिकी पर लगातार लेक्चर दिया। इसे ‘केमिकल हिस्ट्री ऑफ कैंडल’ नाम दिया गया। उन्होंने 1827 से लेकर 1860 तक रिकार्ड 19 बार लेक्चर दिये।

    1831 में निर्मित, फैराडे डिस्क पहला विद्युत जनरेटर था। घोड़े की नाल के आकार के चुंबक (ए) ने डिस्क (डी) के माध्यम से एक चुंबकीय क्षेत्र बनाया। जब डिस्क को घुमाया गया, तो इससे केंद्र से रिम की ओर रेडियल रूप से एक विद्युत धारा प्रेरित हुई। करंट स्लाइडिंग स्प्रिंग संपर्क एम के माध्यम से, बाहरी सर्किट के माध्यम से, और एक्सल के माध्यम से वापस डिस्क के केंद्र में प्रवाहित हुआ।

    माइकल फैराडे का निजी जीवन (Personal life of Michael Faraday)

    फैराडे ने 12 जून 1821 को सारा बरनार्ड (Sarah Barnard) (1800-1879) से शादी की। वे सैंडेमेनियन चर्च (Sandemanian church) में अपने परिवारों के माध्यम से मिले थे | उनके कोई संतान नहीं थी।

    माइकल फैराडे – पुरस्कार और सम्मान

    जून 1832 में, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने फैराडे को डॉक्टर ऑफ सिविल लॉ की मानद उपाधि प्रदान की। अपने जीवनकाल के दौरान, विज्ञान के प्रति उनकी सेवाओं के सम्मान में उन्हें नाइटहुड की उपाधि की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने धार्मिक आधार पर यह मानते हुए ठुकरा दिया कि धन संचय करना और सांसारिक पुरस्कार प्राप्त करना बाइबल के शब्दों के विरुद्ध है | रॉयल सोसाइटी के फेलो चुने जाने पर, उन्होंने दो बार अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया। वह 1833 में रॉयल इंस्टीट्यूशन में रसायन विज्ञान के पहले फुलेरियन प्रोफेसर बने।

    1832 में, फैराडे को अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज का विदेशी मानद सदस्य चुना गया। उन्हें 1838 में रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज (American Academy of Arts and Sciences ) का एक विदेशी सदस्य (Foreign Honorary Member) चुना गया था। 1840 में, उन्हें अमेरिकन फिलॉसॉफिकल सोसायटी के लिए चुना गया था। वह 1844 में फ्रेंच एकेडमी ऑफ साइंसेज के लिए चुने गए आठ विदेशी सदस्यों में से एक थे। 1849 में उन्हें नीदरलैंड के रॉयल इंस्टीट्यूट के एसोसिएट सदस्य के रूप में चुना गया, जो दो साल बाद रॉयल नीदरलैंड एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज बन गया और बाद में उन्हें Honorary Member बनाया गया।

    माइकल फैराडे की मृत्यु (Death of Michael Faraday)

    1839 में फैराडे को नर्वस ब्रेकडाउन का सामना करना पड़ा लेकिन अंततः वे विद्युत चुंबकत्व की अपनी जांच में लौट आए।[ 1848 में, प्रिंस कंसोर्ट के अभ्यावेदन के परिणामस्वरूप, फैराडे को सभी खर्चों और रखरखाव से मुक्त, मिडलसेक्स के हैम्पटन कोर्ट में एक ग्रेस और फेवर हाउस से सम्मानित किया गया था। यह मास्टर मेसन हाउस था, जिसे बाद में फैराडे हाउस कहा गया, ब्रिटिश सरकार के लिए कई विभिन्न सेवा परियोजनाएं प्रदान करने के बाद, जब सरकार ने उन्हें क्रीमियन युद्ध (1853-1856) में उपयोग के लिए रासायनिक हथियारों के उत्पादन पर सलाह देने के लिए कहा, तो फैराडे ने नैतिक कारणों का हवाला देते हुए भाग लेने से इनकार कर दिया ।

    फैराडे की 75 वर्ष की आयु में 25 अगस्त 1867 को हैम्पटन कोर्ट में उनके घर पर मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से कुछ वर्ष पहले उन्होंने अपनी मृत्यु पर वेस्टमिंस्टर एब्बे में दफ़नाने के प्रस्ताव को ठुकराने के कारण उन्हें हाईगेट कब्रिस्तान में दफनाया गया था | लेकिन उनके सम्मान में वेस्टमिंस्टर एब्बे में आइजैक न्यूटन की कब्र के पास उनकी एक स्मारक पट्टिका बनाई गई ।

    माइकल फैराडे के सम्मान में दिए जाने वाले प्रमुख पुरस्कार

    फैराडे के वैज्ञानिक योगदान के सम्मान और स्मृति में, कई संस्थानों ने उनके नाम पर पुरस्कार दिए जाते हैं। जिनमे प्रमुख है :

    1. आईईटी फैराडे मेडल (The IET Faraday Medal)

    2. रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन माइकल फैराडे पुरस्कार (The Royal Society of London Michael Faraday Prize)

    3. भौतिकी संस्थान माइकल फैराडे पदक और पुरस्कार (The Institute of Physics Michael Faraday Medal and Prize)

    4. रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री फैराडे लेक्चरशिप पुरस्कार (The Royal Society of Chemistry Faraday Lectureship Prize)

  • पत्ती (Leaf) किसे कहते है? पत्ती/पर्ण क्या है, परिभाषा, पत्ती की संरचना, भाग, पत्ती के प्रकार, रूपान्तरण, पत्ती के कार्य What is leaf, its type (Leaf in Hindi)

    पत्ती (Leaf) किसे कहते है? पत्ती/पर्ण क्या है, परिभाषा, पत्ती की संरचना, भाग, पत्ती के प्रकार, रूपान्तरण, पत्ती के कार्य What is leaf, its type (Leaf in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पत्ती किसे कहते है, पत्ती के कितने प्रकार और भाग होते है l साथ ही हम इस आर्टिकल में जानेगे कि पत्ती की संरचना किस प्रकार की होती है, इसके अलावा पत्ती के रूपान्तरण तथा पत्ती के कार्यों, और एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री पत्ती में अन्तर के बारे में बात करेगे |

    पत्ती या पर्ण किसे कहते है ? (What is Leaf)

    पत्ती पोधों के तना के पर्वसन्धि (Internodes) से निकलती है जो  पौधों का हरा पाशर्व (side) भाग होता है और इसे पौधों की भोजन की फैक्ट्री कहा जाता है। क्योकीं पौधों का पत्ती वाला भाग ही प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की क्रिया द्वारा भोजन अर्थात कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते है। पत्तियाँ या पर्ण चपटी और फैली हुई पर्वसन्धि पर विकसित होती है।  ये अग्राभिसारी (आगे की तरफ देखते हुए – forward looking) क्रम में व्यवस्थित होती है।  पत्ती के कक्ष में कली होती है जो शाखा बनाती है।  पत्तियाँ क्लोरोफिल (Chlorophyll) (हरित लवक) के कारण हरे रंग की होती है, जिनमें छोटे-छोटे छिद्र होते है, जिनको स्टोमेटा (Stometa) कहा जाता है, जिसकी सहायता से गैसीय विनिमय (exchange of gases) का कार्य होता है।

    नोट :- क्लोरोफिल या हरित लवक हरे पौधों में मौजूद प्राकृतिक यौगिक है जो उन्हें अपना रंग देता है। यह पौधों को सूर्य से ऊर्जा को अवशोषित करने में मदद करता है क्योंकि वे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से गुजरते हैं। (Chlorophyll is the natural compound present in green plants that gives them their color. It helps plants to absorb energy from the sun as they undergo the process of photosynthesis.)

    पत्ती की संरचना किस प्रकार की होती है (What is structure of Leaf)

    पत्तियों को संरचना के आधार पर निम्न तीन भागों में बांटा गया है:- 

    पत्राधार या पर्णाधार (Leaf base)

    यह पत्ती का सबसे निचला भाग होता है जो पत्ती को तना व शाखा से जोड़ता है, अर्थात तना और पत्ती के पत्रवृंत (Petiole) के जुड़ने वाले भाग को पत्राधार कहते यह पत्ती का आधारीय भाग है | इसके आधार पर एक या दो छोटी पत्तियों के समान प्रवर्ध होते है, जिन्हें अनुपर्ण कहते है। एक बीज पत्ती व लैग्यूमिनेसी कुल के पादपों में पर्णाधार फूला हुआ होता है ऐसे पर्णाधार को पर्णवृन्त तल्प कहते है।

    पत्रवृंत (Petiole)

    पत्राधार से एक लम्बा डंठल या डंडलनुमा भाग जैसी संरचना निकलती है जो पत्रफलक को आधार प्रदान करती है, इस लम्बे डंठल को ही पत्रवृंत कहते है। किन्तु कुछ पौधों में यह संरचना नहीं पायी जाती जैसे एक बीजपत्री पौधे। पत्रवृंत का मुख्य कार्य पत्रफलक (पर्णफलक) को सहारा देना और प्रकाश के लिए उठाये रखना होता है। पर्णफलक को उपयुक्त सूर्य का प्रकाश ग्रहण करने के लिए अग्रसर करता है | यह पत्ती के फलक को प्रकाश में उठाए रखता है ताकि अधिक-से-अधिक प्रकाश प्राप्त हो सके। यदि पादपो में पत्तियों के पर्णवृन्त उपस्थित हो तो उसे संवृन्त पत्ती और यदि उपस्थित नहीं हो तो अवृन्त पत्ती कहते है। जिन पत्तियों में पत्रवृन्त होता है, उन्हें सवृन्त (Petiolate) कहते हैं। जैसे-आम, पीपल आदि। बबूल में यह चपटे आकार के पर्णदल (lamina) में रूपान्तरित हो जाता है जिसे फायलोड़ (phyllodo) कहते है। जिन पतियों में पत्रवृन्त नहीं होता है, उन्हें अवृन्त (sessile) कहते हैं। जैसे- मक्का, गेहूँ आदि।

    पत्रफलक ((Leaf blade या Lamina)

    यह पत्ती का हरा, चपटा तथा फैला हुआ भाग होता है। इसके मध्य में पर्णवन्त से लेकर पत्ती के शीर्ष तक प्रायः एक मोटी शिरा होती है जिसे मध्यशिरा (midrib) कहा जाता है इस मध्यशिरा से दोनों तरफ पतली शिरायें निकलती है, जो आगे जाकर और छोटी और पतली शिराओं में विभक्त हो जाती है। ये पत्रफलक को कंकाल की भाँति दृढ़ता प्रदान करते हैं | इसका मुख्य कार्य पानी तथा भोज्य पदार्थों का परिवहन करना है। यह जल, खनिज लवण व भोजन आदि का स्थानांतरण का कार्य भी करती है। पत्तियों द्वारा प्रकाश-संश्लेषण, श्वसन एवं वाष्पोत्सर्जन क्रिया सम्पन्न होती है |

    प्रर्णाग्र – पत्ती का अंतिम पतला नुकीला भाग प्रर्णाग्र कहलाता है।

    शिराविन्यास

     वर्ण में शिराओ व शिराकाओं के विन्यास को शिरा विन्यास कहते है, शिराविन्यास दो प्रकार का होता है।

    (a) समान्तर शिराविन्यास: जब शिराएँ मध्य शिरा (midrib) के समान्तर व्यवस्थित होती है तो उसे समान्तर शिराविन्यास कहते है। उदाहरण: राकबीज पत्ती पादप।

    (b) जालिका शिराविन्यास: जब शिराएँ मध्यशिरा से निकलकर पर्णफलक में एक जाल बनाती है तो इसे जालिका पत शिराविन्यास कहते है। उदाहरण: द्विबीज पत्री पादप।

    पत्तियों को शिराविन्यास के आधार पर भी निम्न दो प्रकार में बांटा गया है:-

    जालिकावत पत्ती – जिलाकावत पत्तियाँ उन पत्तियों को कहा जाता है जिनका शिरा विन्यास जालि के जैसा होता है। अधिकतर द्वीबीजपत्री पौधों में यह विन्यास दिखाई देता है। जैसे :- जामुन, आम, बरगद, पीपल आदि की पत्ती।

    सामान्तर पत्ती – सामान्तर पत्ती उन पत्तियों को कहते है। जिनका शिरा विन्यास सामान्तर प्रकार का होता है। इस प्रकार का विन्यास एकबीजपत्री पौधों में दिखाई देता है। जैसे :-  गेंहूँ, धान, केला आदि की पत्तियाँ।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री पत्ती में अन्तर

    एकबीजपत्री पत्तीद्विबीजपत्री पत्ती
    यह समद्शिर्विक होती है।यह पत्ती पृष्ठधारी होती है
    इनकी बाह्य त्वचा में बुलीफार्म कोशिकाएँ पाई जाती हैं।इनकी बाह्य त्वचा में बुलीफार्म कोशिकाओं का अभाव होता है।
    स्पंजी पैरेन्काइमा के अवकाश छोटे होते है।स्पंजी पैरेन्काइमा के अवकाश बड़े होते हैं।
    इसकी दोनों सतहों पर स्टोमेटा पाए जाते हैं।इसकी केवल निचली सतह पर स्टोमेटा पाए जाते हैं।

    पत्ती कितने प्रकार की होती है ? (Type of Leaf) 

    पत्रफलक के कटाव के आधार पर पत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं- सरल पत्ती एवं संयुक्त पत्ती

    सरल पत्ती किसे कहते है (What is Simple Leaf) 

    सरल पत्ती वह पत्ती होती है जिसका फलक बड़ा होता है तथा इस फलक में कटाव नहीं होते किंतु कुछ पत्तियों में कटाव होते हैं लेकिन वह कटाव मध्य शिरा या पत्रवृन्त तक तक नहीं जाते।  जबकि इनमें केवल एक ही पर्ण फलक होता है तथा शाखा पर अग्रभिसारी क्रम में लगे होते है, उस पति को सरल पत्ती कहा जाता है। सरल पत्ती के उदाहरण:- आम, बरगद, पीपल, अमरुद आदि 

    संयुक्त पत्ती किसे कहते है (What is Compound Leaf)

    संयुक्त पत्ती पत्ती का वह प्रकार होता है जिसमें पत्र फलक मैं कटाव विभिन्न जगह से मध्य शिरा तक पहुंचता है, इसलिए यह पत्र फलक कई पर्णकों में बंट जाता है। इसके एक शाखा पर पर्ण फलक एक साथ होते है, उस पति को संयुक्त पत्ती कहा जाता है। संयुक्त पत्ती के उदाहरण:- नींबू, नारंगी, नीम, गुलाब आदि।

    संयुक्त पत्ती दो प्रकार की होती है –

    (a) पिच्छाकार संयुक्त पत्ती: इस प्रकार की पत्ती में अनेक पर्णक एक मध्यशिरा पर स्थित होते है।  उदाहरण – नीम आदि।

    (b) हस्ताकार संयुक्त पत्ती: इस प्रकार की पत्ती में अनेक पर्णक एक ही बिंदु अर्थात पर्णवृन्त के शीर्ष से जुड़े रहते है। उदाहरण – शिल्ककोटन वृक्ष।

    पूर्ण विन्यास (phyllotaxy)

    पत्तियों के तने पर लगने की व्यवस्था को पर्णविन्यास (Phyllotaxy) कहते हैं। पादपो में यह तीन प्रकार का होता है।

    (i) एकांतर पर्ण विन्यास: इस प्रकार के पर्णविन्यास में तने या शाखा पर एक अकेली पत्ती पर्णसन्धि पर एकान्तर क्रम में लगी रहती है। उदाहरण: गेहूं, गुडहल, सरसों, सूरजमुखी आदि।

    (ii) सम्मुख पर्णविन्यास: इस प्रकार के पर्ण विन्यास में प्रत्येक पर्णसन्धि पर एक जोड़ी पत्तियाँ आमने सामने लगी रहती है। उदाहरण: अमरुद, केलोट्रोफिस (आक) आदि।

    (iii) चक्करदार पर्णविन्यास: यदि एक ही पर्ण सन्धि पर दो से अधिक पत्तियाँ चक्र में व्यवस्थित हो तो उसे चक्करदार पर्ण विन्यास कहते है। उदाहरण – कनेर, एल्सटोनियम आदि।

    पत्तियों का रूपान्तरण (Modification of Leaves)

    पत्तियाँ कुछ विशेष कार्य सम्पादित करने पतियों का रूपांतर स्थिति मौसम के अनुसार अनुकूलन के हिसाब से हो जाता है:-

    पर्ण कंटक/सुरक्षा के लिए (Leaf spines)

    यह पौधे मरुस्थल या शुष्क स्थानों में उगते है, तो वहाँ जल की क्षति को रोकने के लिए पौधों की पत्तियाँ काँटों में परिवर्तित हो जाती है जिन्हे पर्णकंटक कहते है।  इसमें पतियाँ काँटों या शूलों (spines) में रूपान्तरित होकर पोधे के लिए सुरक्षा का कार्य करती है। जैसे- बैर , केक्ट्स , नागफनी आदि।

    पर्ण प्रतान (Leaf tendril)/ सहारा देने हेतु

    पौधों को आरोहण प्रदान करने के लिए जब पौधों की पत्तियाँ लंबे पतले कुंडलित तारनुमा संरचना में बदल जाते हैं, जिसे प्रतान (Tendril) कहा जाता है और इस तरह की पत्तियों को पर्णप्रतान ((Leaf Tendril) कहते है। ये प्रतान अति संवेदनशील होते हैं और ज्योंहि वे किसी आधार के सम्पर्क में आते हैं, उसके चारों ओर लिपट जाते हैं। इस प्रकार वे पौधों को आरोहण में सहायता प्रदान करते हैं। उदाहरण :- मटर

    पर्णाभवृन्त (Phyllode)

    इसमें पर्णवृन्त अथवा रेकिस का कुछ भाग चपटा एवं हरा होकर पर्णफलक जैसा रूप ग्रहण कर लेता है यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब पौधों में प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होने लगता है । इसे ही पर्णाभवृन्त कहते हैं। इस तरह इस प्रकार की पत्तियां प्रकाश संश्लेषण का कार्य करती है उदाहरण : ऑस्ट्रेलियन बबूल, कैर आदि।

    घटपर्णी या घट रूपान्तरण (Pitcher)

    इसे कीटभक्षी पौधा या किटाहारी पादप भी कहते है जो नाइट्रोजन की कमी पूरी करने के लिए कीटों का भक्षण करता है। इसमें पत्ती का पर्णाधार (Leaf base) चौड़ा, चपटा एवं हरे रंग का होता है। पर्णवृन्त (Petiole) प्रतान का, फलक (Leafblade) घटक (Pitcher) का तथा फलक शीर्ष (फलक का नुकीला हिस्सा) ढक्कन का रूप ले लेता है। इस प्रकार सम्पूर्ण पत्ती घटनुमा रचना में परिवर्तित हो जाती है। घट (Pitcher) की भीतरी सतह पर पाचक ग्रन्थियाँ (digestive glands) होती हैं, जिनसे पाचक रस निकलता है। जब कोई कीट आकर्षित होकर फिसलकर घट में गिर जाता है तो घट का ढक्कन स्वतः बन्द हो जाता है। कीट पाचक रस द्वारा पचा लिया जाता है। इस क्रिया द्वारा पौधे अपने नाइट्रोजन की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। जैसे- घाटपर्णी (Pitcher plant), डायोनिया , ड्रेसिरा , वीनस , प्लाई ट्रेप आदि।

    ब्लेडर वर्ट (Bladderwort)

    यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) जैसे जलीय कीटभक्षी पौधों में पतियाँ अनेक छोटे-छोटे खण्डों में बँटी होती हैं। कुछ खण्ड रूपान्तरित होकर थैलीनुमा संरचना बनाते हैं। प्रत्येक थैली (bladder) में एक खोखला कक्ष (Empty chamber) होता है, जिसमें एक मुख होता है। इस मुख पर एक प्रवेश द्वार होता है जिससे होकर केवल सूक्ष्म जलीय जन्तु ही प्रवेश कर सकते हैं। थैली या ब्लैडर के अंदर पाचक एन्जाइम उन सूक्ष्म जन्तुओं को पचा डालते हैं।

    खाद्य संचय हेतु रूपान्तरण

    कुछ पादपों की पत्तियाँ भोजन संचय का कार्य करती है।  उदाहरण – प्याज , लहसून आदि।

    कुछ पौधों (जैसे – खजूर और सायकस आदि) में पत्तियां केवल मुख्य स्तम्भ पर ही लगी रहती है। ऐसी पत्तियाँ स्तम्भिक कहलाती है।

    अधिकांश पौधों में पत्तियाँ मुख्य स्तम्भ और शाखाओं , दोनों पर पायी जाती है जैसे आम , पीपल , नीम आदि जिन्हें स्तम्भिक और शाखीय (cauline and ramal) कहते है।

    इनके अतिरिक्त कुछ पौधों , जैसे प्याज , मूली आदि में पत्तियां समानित भूमिगत तने पर उत्पन्न होती है , जिन्हें मूलज (radical) कहते है।

    नोट:- – संवहनी पौधों में पत्ती प्ररोह की एक महत्वपूर्ण संरचना होती है जो कि सीमित वृद्धि प्रदर्शित करती है। अधिकांश पौधों में पत्तियाँ प्राय: हरी , चपटी और पतली होती है और प्रकाश संश्लेषण और वाष्पोत्सर्जन का कार्य करती है। पत्ती को तने और शाखाओं की पर्वसन्धि से निकलने वाली एक पाशर्व उधर्ववृद्धि के रूप में परिभाषित किया जाता है। इनकी उत्पत्ति बहिर्जात होती है और अग्राभिसरी क्रम में उत्पन्न होती है। पत्ती की कक्ष में एक कक्षीय कलिका पायी जाती है जिससे शाखा का विकास होता है।

    पत्तियों के कार्य क्या है ? (What are functions of leaves)

    पत्तियाँ पौधे का महत्त्वपूर्ण अंग है। यह निम्नलिखित प्रमुख कार्य सम्पादित करती है-

    पत्तियों क्लोरोफिल, जल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करती है जिससे पौधों के लिए भोजन का निर्माण होता है। तथा मनुष्य और जीव जंतुओं के लिए प्राणवायु ऑक्सीजन का उत्पादन होता है ।

    यह जल तथा घुलनशील भोज्य पदार्थों का पतियों से स्तम्भ तक संचरण में सहायता करती है।

    पत्तियों का मुख्य कार्य गैसो का विनिमय करना होता है जो इनमें उपस्थित संरचना स्टोमेटा के द्वारा होता है। पत्तियाँ कार्बनडाई ऑक्साइड का अवशोषण करती है तथा ऑक्सीजन को वातावरण में छोड़ती है।

    मरुस्थल के पौधों में पत्तियाँ काँटों में रूपातंरित होकर जल के वाष्पीकारण को रोककर जल संरक्षण तथा जानवरो से फूलों, फलों और कलियों की रक्षा करती है।

    पत्तियाँ वाष्पीकरण के द्वारा पौधों से आवश्यकता से अधिक जल को बाहर निकालती है।

    पत्तियों में निर्मित भोजन पौधों के अन्य भागो में जल में धूलित अवस्था में पहुँचता है। तथा आवश्यकता से अधिक भोजन को संग्रहित करने का कार्य पत्तियाँ ही करती है।

    पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन की क्रिया करके पौधों की रक्षा सर्दी में पत्तियाँ गिराकर ऊष्मा को रोकती है और पतझड़ में पत्तियाँ गिराकर जल के वाष्पी कारण को रोककर पौधों में ऊष्मा और जल की मात्रा बनाये रखती है।

    पत्तियाँ उत्स्वेदन (Transpiration) की क्रिया को नियंत्रित करती है।

    प्रतन्तुओं में रूपान्तरित होने पर यह कमजोर पौधों को मजबूत आधार प्रदान करती है, तथा आरोहण में मदद करती है।

    कीटभक्षी पौधों में पिचर (Pitcher), ब्लेडर (Bladder) आदि में यह रूपान्तरित होकर प्रोटीनयुक्त पोषण में सहायता करती है।

    कुछ पतियाँ वर्धी प्रजनन (Vegetative reproduction) एवं परागण (Pollination) में सहायता करती हैं।

    कुछ पत्तियाँ भोजन संग्रह (Food storage) का कार्य भी करती हैं।

    बीजधारी पादपों में पत्तियों के प्रकार  (types of leaves in Hindi)

    पत्ती तने का मुख्य पाशर्व भाग है और बीजधारी पादपों में इनकी स्थिति , उत्पत्ति , कार्य और संरचना के आधार पर इनको निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

    1. बीजपत्रिय पर्ण (cotyledonary leaves) : अंकुरित होने वाले पौधों की यह सबसे पहली पर्ण होती है। कुछ द्विबीजपत्री पौधों में बीजों के अंकुरण के समय इनके बीजपत्र भूमि के ऊपर निकल आते है और हरे रंग का पत्तिनुमा संरचना में परिवर्तित हो जाते है। इस प्रकार की पत्तियां बीजपत्रीय पर्ण या भ्रूणीय पर्ण (embryonal leaves) कहलाती है। सत्य पर्णों के विकसित होने तक ये भोजन निर्माण का कार्य करती है और उसके पश्चात् झड़ कर गिर जाती है।

    2. अधोपर्ण अथवा शल्क पर्ण (cataphylls leaves) : ये सफ़ेद , भूरे अथवा हरे रंग की अवृंत और झिल्लीनुमा संरचनाएं होती है। ये मुख्यतः कलिकाओं और भूमिगत तनों में पायी जाती है। इनका प्रमुख कार्य पौधों के कोमल भागों को सुरक्षा प्रदान करना अथवा खाद्य पदार्थों का संचय होता है।

    3. अधिपर्ण (hypsophylls leaves) : ये हरी या रंगीन (लाल , पीली , नारंगी आदि) पर्णील संरचनाएँ होती है जो मुख्यतः पौधों के अग्र भागों में पायी जाती है , जिनके कक्ष में एकल पुष्प अथवा पुष्प गुच्छ विकसित होते है। इसलिए इन्हें सहपत्र (bract) भी कहते है। कभी कभी पुष्प वृंत पर भी इनका निर्माण होता है और सहपत्रक (bracteole) कहलाती है। ये कीटों को आकर्षित कर परागण में मदद करती है।

    4. प्रोफिल्स (prophylls) : ये आवृतबीजी पौधों की प्रथम पत्तियाँ होती है , जो पाशर्व शाखाओं पर उत्पन्न प्रथम केटाफिल्स है। इन्हें सहपत्रिका भी कहते है। उदाहरण – बीलपत्र में ये दो काटों के रूप में दिखाई देती है।

    5. पुष्पी पत्र (floral leaves) : पुष्प एक रूपांतरित प्ररोह है और इसके पुष्पी उपांग जैसे – बाह्यदल , दल , पुंकेसर और अंडप सभी पर्णील उपांग कहलाते है। आर्बर के अनुसार पर्णील उपांग , फिल्लोम (phyllome) कहलाते है।

    6. सामान्य पर्ण (foliage leaves) : ये पत्तियाँ तने पर पाशर्व उपांगों के रूप में लगी रहती है। ये हरे रंग की चपटी और प्रकाश संश्लेषी संरचनाएँ होती है। ये अवृंत संरचनाएं होती है और प्ररोह का मुख्य भाग प्राय: इन पत्तियों द्वारा ही निर्मित होता है।

    पत्ती की उत्पत्ति और परिवर्धन (origin and development of leaf in Hindi)

    पत्ती की उत्पत्ति तने अथवा शाखाओं के ऊपरी सिरे के पास स्थित कोशिकाओं के विभाजन से निर्मित पर्ण आद्यकों (leaf primordia) के रूप में होती है। पर्ण आद्यकों का विकास पर्ण विकास के अनुसार प्ररोह शीर्षस्थ विभाज्योतक के पाशर्व पर नियमित क्रम में होता है। पत्ती के विकास की विभिन्न प्रावस्थाओं का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है।

    1. समारम्भन और शीर्ष भिन्नन (initiation and early differentiation in hindi) :

    गिफोर्ड और टेपर के अनुसार पर्ण समारम्भन के स्थान पर उपस्थित विभाज्योतकी कोशिकाओं में आर.एन.ए (RNA) की मात्रा बढ़ जाती है। समारम्भन के प्रथम चरण में शीर्षस्थ विभाज्योतक की पाशर्व पर स्थित परिधीय कोशिकाओं में परिनतिक विभाजन होता है। विभिन्न पौधों में पर्ण आद्यकों के विभेदन में भाग लेने वाली कोशिकाओं की संख्या और स्थिति अलग अलग हो सकती है। सामान्यतया पर्ण समारम्भन से सम्बन्धित विभाजन ट्यूनिका की दूसरी या तीसरी परत की कोशिकाओं में होते है लेकिन घासों में ट्यूनिका की सबसे बाहरी परत में परिनतिक विभाजनों से पर्ण आद्यक का समारम्भन होता है। प्रारंभिक परिनतिक विभाजनों के फलस्वरूप ट्यूनिका से व्युत्पन्न कोशिकाओं और समीपवर्ती कार्पस की कोशिकाओं में परिनतिक और अपनतिक विभाजनों के फलस्वरूप शीर्षस्थ विभाज्योतक के पाशर्व में एक उभार और उधर्व विकसित होता है जिसे पर्ण बप्र कहते है। आच्छद पर्णाधार युक्त पत्तियों में प्रारंभिक विभाजन पर्ण आद्यक के पाशर्व में भी होते है , जिसके फलस्वरूप पर्ण आद्यक शीर्षस्थ विभाज्योतक को लगभग पूरी तरह घेर लेता है। इसके पश्चात् पर्ण आद्यक की शेष वृद्धि शीर्षस्थ विभाज्योतक के अतिरिक्त उपान्तीय , अन्तर्वेशी अभ्यक्ष और प्लेट विभाज्योतकों की सक्रियता के फलस्वरूप होती है। इन विभाज्योतकों में विभाजन उत्तरोतर या युगपत होते है जिनसे विभिन्न प्रकार की पत्तियों का विकास होता है।

    2. शीर्षस्थ और अंतर्वेशी वृद्धि (apical and intercalary growth in hindi) : अधिकतर द्विबीजपत्रीयों की पत्ती का आद्यक पर्णफलक रहित शंकु के रूप में होता है , जिसे पर्ण अक्ष कहते है। इसके पश्चात् पर्ण आद्यक की लम्बाई में वृद्धि आद्यक के शीर्ष पर उपस्थित शीर्षस्थ विभाज्योतक द्वारा होती है। इस विभाज्योतक की सक्रियता कुछ समय पश्चात् समाप्त हो जाती है। इसके पश्चात् शीर्ष से कुछ दूरी पर स्थित अन्तर्वेशी विभाज्योतक कोशिकाओं के विभाजन और दीर्घन से आद्यक की वृद्धि होती है। एकबीजपत्रियों मे अन्तर्वेशी वृद्धि द्विबीजपत्रियों की तुलना में अधिक होती है।

    3. उपांतीय वृद्धि (marginal growth) : पर्ण आद्यक की लम्बाई में वृद्धि के साथ साथ पत्ती के अक्ष के किनारे अथवा उपान्तो पर स्थित कोशिकाओं में तेजी से विभाजन होते है जिसके परिणामस्वरूप पत्ती में एक मध्यशिरा और दो पंख जैसे पर्ण फलक विभेदित हो जाते है। पर्ण आद्यक की यह पाशर्व या उपांतीय वृद्धि उपांतीय विभाज्योतक की सक्रियता द्वारा होती है। पर्ण आद्यक के आधारी भाग में उपान्ति विभाज्योतक निष्क्रिय होता है जिसके कारण पाशर्व वृद्धि नहीं होती और यह भाग पत्ती के वृंत में विकसित होता है। उपांति विभाज्योतक को दो भागों में विभेदित किया जा सकता है –

    (i) उपांतीय प्रारंभिक (marginal initials)

    (ii) उप उपांतीय प्रारंभिक (sub marginal initials)

    इन दोनों प्रारम्भिक कोशिकाओं से पत्ती के निश्चित भाग विकसित होते है।

    उपान्तीय प्रारंभिक में मुख्यतः अपनतिक विभाजन होते है जिससे पत्ती की ऊपरी और निचली अधित्वक का निर्माण करती है। कुछ एकबीजपत्री पर्णों में यदा कदा उपांति कोशिकाओं में परिनत विभाजन भी होता है जिनसे अधित्वक के अलावा पत्ती के आंतरिक ऊत्तक भी विकसित होते है।

    उप उपान्तीय प्रारंभिक जो उपांतीय प्रारम्भिक के निचे स्थित होती है। प्राय: सभी तलों में विभक्त होकर पर्ण फलक के आंतरिक ऊतकों का निर्माण करती है। उप उपांतीय प्रारंभिक कोशिकाओं की सक्रियता हमेशा एक सी नहीं रहती है। अत: पर्ण फलक की वृद्धि में विविधताएँ उत्पन्न होती है।

    4. अभ्यक्ष वृद्धि (adaxial growth) : पर्ण आद्यक की लम्बाई में वृद्धि के साथ साथ इसकी अरीय मोटाई में भी वृद्धि होती है। अरीय वृद्धि पत्ती के अभ्यक्ष अधित्वक के नीचे स्थित विभाज्योतकी पट्टियों के द्वारा होती है। इस विभाज्योतक की कोशिकाओं में परिनतिक विभाजन होते है जिनसे पत्ती की मोटाई में वृद्धि होती है। पर्णवृंत और मध्यशिरा की मोटाई भी इसी विभाज्योतक की सक्रियता का परिणाम होता है।

    5. प्लेट विभाज्योतक (plate meristem) : जब उपांतीय विभाज्योतक की सक्रियता समाप्त हो जाती है , तब पत्ती के पर्ण फलक के आमाप में वृद्धि प्लेट विभाज्योतक द्वारा होती है। इस विभाज्योतक में अनेक पर्ण मध्योतक कोशिकाओं के समानांतर स्तर होते है। ये कोशिकाएं अपनतिक विभाजनों द्वारा पत्ती के पृष्ठीय क्षेत्रफल में वृद्धि करती है। इस विभाज्योतक के विभाजनों के फलस्वरूप पत्ती अपनी परिपक्व अवस्था में पहुँचती है।

    6. संवहन ऊत्तक का विकास (development of vascular tissue in hindi) : द्विबीजपत्रियों की पत्ती में संवहन तंत्र का परिवर्धन मध्य शिरा में प्रोकेम्बियम के विभेदन से प्रारंभ होता है। प्रोकेम्बियम का विभेदन अग्राभिसारी क्रम में होता है और इसकी सतता अक्ष के प्रोकेम्बियम से बनी रहती है। पर्ण फलक के विस्तार के साथ साथ साथ मध्य शिरा से प्रथम श्रेणी की पाशर्व शिराएँ विकसित होती है। इसके पश्चात् दूसरी , तीसरी और अन्य उच्च श्रेणी की पाशर्व शिराएँ उत्तरोतर क्रम में विकसित होती है जिसके फलस्वरूप जालिकारुपी शिरा विन्यास बनता है। इस पाशर्व शिराओं का विभेदन पत्ती की अन्तर्वेशी वृद्धि के समय होता है। शिराओं के निर्माण में भाग लेने वाली प्रारंभिक कोशिकाओं की संख्या उत्तरोतर क्रम में (प्रथम श्रेणी → द्वितीयक श्रेणी → तृतीय श्रेणी) कम होती जाती और सबसे अंतिम श्रेणी की शिरिका केवल एकपंक्तिक रह जाती है। विभिन्न श्रेणी की शिराएँ सतत विकसित होती है। जाइलम और फ्लोयम ऊतकों का विभेदन अग्राभिसारी क्रम में होता है और फ्लोयम का विभेदन जाइलम से पहले होता है।

    एक बीजपत्रियों की पत्ती (उदाहरण ट्रिटिकम ) में लम्बी पाशर्व शिराओं का प्रोकेम्बियम स्टैंड अग्राभिसारी क्रम में विकसित होता है जबकि छोटी शिराओं का प्रोकोम्बियम तलाभिसारी क्रम में विकसित होता है। अनुप्रस्थ शिराएँ जो पाशर्व शिराओं को परस्पर जोडती है , अंत में बनती है और तलाभिसारी क्रम में विकसित होती है।

    स्मार्ट फैक्ट्स:

    आशुपाती (Caducous) पत्तियाँ प्रायः बनने के उपरान्त ही पौधे से गिर जाती हैं।

    पर्णपाती (Deciducous) पत्तियाँ एक विशेष ऋतु तक पौधे में लगी रहती है। और इसके बाद झड़ जाती है। उदाहरण: आम, पीपल, बरगद आदि।

    जालिका रूपी (Reticulate) शिराविन्यास में शिराएँ एवं उपशिराएँ एक अनियमित जाल के रूप में फैली रहती है। उदाहरण: द्विबीजपत्री पौधे। समानान्तर (Parallel) शिराविन्यास में शिराएँ एक दूसरे के समानान्तर होती हैं। उदाहरण: एकबीजपत्री पौधे।

  • तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना पौधे का वह भाग है जो कि भूमि एवं जल के विपरीत तथा प्रकाश (Light) की ओर वृद्धि करता है। तना प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है और शाखाओं, पतियों, फूल एवं फल धारण करता है।

    तना पौधे का आरोही भाग है, जो भूमि के विपरीत प्रकाश की ओर गति करता है। (Negatively geotropic but positively phototropic). तने का आकार बेलनाकार, चपटा अथवा कोणीय (Angular) होता है। तने की अग्र सिरे पर कलिकाएँ (Buds) पायी जाती हैं, जिनसे तना वृद्धि करता है।

    तने की विशेषताएं (Characteristics of stem):

    • तना पौधे को दृढ़ता प्रदान करता है, जो तना में उपस्थित जाइलम तथा दृढ़ोत्तक (soloronchyma) के कारण होता है।
    • यह शाखाओं, पत्तियों एवं पुष्पों को जन्म देता है।
    • यह जड़ों द्वारा अवशोपित जल और खनिज लवणों को अन्य भागों तक तथा पत्तियों में संश्लेपित भोजन को जड़ सहित अन्य भागों तक पहुँचाता है।
    • तनों में निश्चित पर्वसन्धियाँ (nodes) तथा पर्व (inter-nodes) होते है। शाखाएँ एवं पत्तियाँ सामान्यतया पर्वसन्धियों से ही निकलता है।
    • तना जड़ों की भाँति खाद्य संग्रह भी करती है। जैसे-आलू, हल्दी, अदरक, गन्ना आदि। तना धनात्मक प्रकाशानुवर्ती तथा ऋणात्मक गुरुत्वानुवव्रती होता है ।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने में अन्तर

    एकबीजपत्री तनाद्विबीजपत्री तना
    इसमें कैम्बियम नहीं पाया जाता। फलतः द्वितीयक वृद्धि का अभाव होता है।इसमें कैम्बियम पाया जाता है, इसलिए द्वितीयक वृद्धि भी पाई जाती है।
    मज्जा (pith) अनुपस्थित होता है।मज्जा उपस्थित होता है।
    इसकी एपीडर्मिस पर रोम नहीं पाए जाते।इसकी एपीडर्मिस पर रोम पाए जाते हैं।
    इसकी हाइपोडर्मिस स्क्लेरेन्काइमा की बनी होती हैं।इसकी हाइपोडर्मिस कोलेन्काइमा की बनी होती है।
    इसमें संवहन बण्डल बन्द प्रकार के होते हैं।इसमें संवहन बण्डल खुलै प्रकार के होते हैं।
    इसमें मज्जा किरणे नहीं पाई जाती हैं।इसमें मज्जा किरणें पाई जाती हैं।

    तने के विभिन्न प्रकार (Type of Plant Stem)

    भूमि की स्थिति के अनुसार तने के तीन प्रकार होते है जो निम्न है :

    1. भूमिगत तना (Underground Stem)

    भूमिगत तना पौधे के तने का वह भाग जो भूमि के अंदर पाया जाता है । भूमिगत तने में पर्व सन्धियाँ, पर्ण कलिकाएँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भूमिगत तने भोजन संग्रह करने के कारण मोटा एवं मांसल हो जाता है।

    जैसे- हल्दी, अदरक, केला, फर्न, आलू, प्याज, लहसुन, कचालू, जिमीकन्द, अरबी आदि।

    भूमिगत तने का रूपान्तरण (Modifications of underground stem)

    भूमिगत तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) प्रकन्द (Rhizorne): 

    यह मोटा, फैला हुआ भूमिगत तना होता है। इसमें कक्षस्थ तथा अग्रस्थ कलिकाएँ भी पायी जाती हैं। यह तना शाखारहित या शाखायुक्त हो सकता है। कभी-कभी इसमें अपस्थानिक जड़ (Adventitious roots) भी विकसित हो जाती है। इनमें स्पष्ट पर्व, पर्व सन्धियाँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। इस प्रकार का भूमिगत तना हल्दी, अदरक, केला, फर्न आदि पौधों में पाया जाता है।

    (ii) स्तम्भ कन्द (stem tuber): 

    यह एक प्रकार का भूमिगत तना है। यह भोजन संग्रह करने के कारण शीर्ष पर फ्ल जाता है। इस प्रकार के तने की सतह पर अनेक गड्ढ़े होते हैं, जिन्हें आंखें (eyes) कहते हैं। प्रत्येक आंख एक शल्क पत्र होता है, जो पर्व-सन्धि की स्थिति को दशतिा है तथा प्रसुप्त कलिकाएँ होती हैं। इन्हीं प्रसुप्त कलिकाओं से वायवीय (Aerial) शाखाएँ निकलती हैं जिनके अगले सिरे पर अग्रस्थ कलिका होती है जो कि अनुकूल परिस्थितियों में वृद्धि करके नए पौधे को जन्म देते हैं। इस प्रकार का तना आलू में पाया जाता है।

    (iii) शल्क कन्द (Bulb): 

    इस प्रकार का भूमिगत तना बहुत से छोटे-छोटे शल्क पत्रों (scaly leaves) से मिलकर बना होता है। यह शल्क पत्र जल तथा भोजन संग्रह करने के कारण मांसल (fleshy) हो जाते हैं। इस प्रकार के भूमिगत तने की बाहरी परत शुष्क (dry) होती है। यह तना संकेन्द्रीय क्रम में व्यवस्थित शल्क पत्र लिये हुए पाये जाते हैं। प्याज (Onion) तथा लहसुन (Garlic) इस प्रकार के भूमिगत तने का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) घनकन्द (Corm): 

    इस प्रकार का भूमिगत तन प्रकन्द (Rhizome) का संघनित रूप है। यह भूमि के नीचे उर्ध्व दिशा में वृद्धि करता है। इसमें अधिक मात्रा में भोजन संचित हो जाता है। शल्क पत्रों के कक्षा में कलिकाएँ पायी जाती हैं जबकि इसके आधार से अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं। कचालू एवं जिमीकन्द में इस प्रकार का भूमिगत तना देखने को मिलता है।

    2. अर्द्धवायवीय तना (Sub Aerial Stem):

    जब तने का कुछ भाग भूमि के अन्दर तथा कुछ भाग भूमि के बाहर वायु में पाया जाता है, तब इस प्रकार के तने की अर्द्धवायवीय तना कहते हैं। जैसे – दूब घास, मर्सीलिया, पैसीफ्लोरा, अरुई, जलकुम्भी, समुद्री सोख, गुलदाऊदी, पिपरमिन्ट आदि।

    अर्द्धवायवीय तने में कायिक जनन के लिए कलिकाएँ पायी जाती हैं, जिनसे पार्श्व शाखाओं (Lateral branches) की उत्पत्ति होती है।

    अर्द्धवायवीय तने का रूपान्तरण (Modification of sub aerial stem):

    अर्द्धवायवीय तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) उपरिभूस्तरी (Runner)-

    यह भूमि की सतह के समानान्तर फैला हुआ अर्द्धवायवीय तना है। इस प्रकार के तने में लम्बे एवं पतले पर्व (Inter nodes) पाये जाते हैं। पर्वसन्धियों से ऊपर की ओर शाखाएँ एवं तना तथा भूमि के अन्दर अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं दूब घास, मर्सीलिया आदि में उपरिभूस्तरी तना पाया जाता है।

    (ii) भूस्तरी (Stolon): 

    इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना भूमि के अन्दर क्षैतिज दिशा में वृद्धि करता है। इस प्रकार के तने पर पर्व (Internode) तथा पर्व सन्धियाँ (Nodes) पाये जाते हैं। पर्व सन्धियों से नीचे की ओर अपस्थानिक जड़ें तथा ऊपर की ओर शाखाएँ विकसित होती हैं। अरुई तथा पैसीफ्लोरा में इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना पाया जाता है।

    (iii) भूस्तारिका (offset): 

    इस प्रकार का अर्द्ध वायवीय तना उपरिभूस्तरी (Runner) की तरह ही होता है, परन्तु इनके पर्व (nodes) मोटे तथा छोटे होते हैं। पर्व सन्धियों से ऊपर पतियाँ एक स्वतंत्र पौधे की भाँति होती है। जलकुम्भी भूस्तारिका का अच्छा उदाहरण है।

    (iv) अन्तः भूस्तरी (suckers):

    इस प्रकार के अर्द्धवायवीय तने में भूस्तरी (stolon) तने की तरह एक पार्श्व शाखा होती है, परन्तु यह ऊपर की ओर तिरछा बढ़ता है और एक नए पौधे को जन्म देता है। यह भूस्तरी (stolon) की तुलना में छोटा होता है। इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना गुलदाऊदी, पिपरमिण्ट आदि में देखने को मिलता है।

    3. वायवीय तना (Aerial stem): 

    जब सम्पूर्ण तना भूमि के ऊपर स्थित होता है, तो ऐसे तने को वायवीय तना कहते हैं। इस प्रकार के तने में शाखाएँ, पत्तियाँ, पर्व, पर्वसन्धियाँ, कलिकाएँ, फल, फूल सभी पाये जाते हैं। उदाहरण- गुलाब, अंगूर, नागफनी, रस्कस, कोकोलोवा आदि।

    वायवीय तने का रूपांतरण (Modification of Aerial Stem):

    वायवीय तने के पांच प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) कटक स्तम्भ (stem thorn): 

    इस प्रकार के तने में कक्षस्थ कलिकाएँ काँटे (thorn) के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। इन काँटों पर पत्ती, शाखा एवं पुष्प विकसित होते हैं। नींबू, वोगेनविलिया आदि पौधों में कटक स्तम्भ पाये जाते हैं।

    (ii) स्तम्भ प्रतान (stem tendril): 

    इस प्रकार के तने में पत्तियों के कक्ष से निकली शाखा बनाने वाली कलिका एक कुण्डलित, तन्तु बना लेती है जो कमजोर तने वाले पौधों के आरोहण में सहायता करती है। यह तन्तु (Filament) ही स्तम्भ प्रतान कहलाता है। अंगूर तथा कुकुरबिटेसी कुल के पौधों में स्तम्भ प्रतान पाया जाता है।

    (iii) पर्णकाय स्तम्भ (Phyloclade): 

    यह एक हरा, चपटा तथा कभी-कभी गोल-सा तना होता है जो कि पत्तियों की भाँति कार्य करता है। इसकी पत्तियाँ कॉटे रूपी संरचना में परिवर्तित हो जाती हैं। यह रूपान्तरण पौधों से होने वाले जल हानि को रोकता है। पर्णकाय स्तम्भ अनिश्चित वृद्धि वाले शाखा से विकसित होता है। नागफनी (Opuntia) तथा केजुराइना (Casurina) पर्णकाय स्तम्भ का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) पर्णाभ पर्त (Cladode): 

    कुछ पौधों की पर्त सन्धियाँ से छोटी, हरी, बेलनाकार अथवा चपटी शाखाएँ निकलती हैं। इस प्रकार की शाखाएँ पत्तियों के कक्ष से निकलती हैं, जो स्वयं शल्क पत्र (scaly leaves) में रूपांतरित हो जाती हैं। ऐसा रूपांतरण पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करने के उद्देश्य से होता है। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हरे तने एवं उसकी शाखाओं के द्वारा सम्पादित होती है। तनों के इस प्रकार के रूपान्तरण को पर्णाभ पर्व (Cladode) कहते हैं। सतावर (Asparagus), रस्कस (Ruscus) पणभि पर्व का सुन्दर उदाहरण हैं।

    (v) पत्र प्रकलिका (Bulbil): 

    कुछ पौधों की कक्षस्थ एवं पुष्प कलिकाएँ विशेष छोटे आकार की रचना में रूपांतरित हो जाती हैं, जिन्हें पत्र-प्रकलिका (Bulbil) कहते हैं। ये पत्र-प्रकलिका अपने मातृ पौधे (Mother plant) से अलग होकर मिट्टी में गिर जाती हैं तथा अनुकूल परिस्थितियों में विकसित होकर नए पौधों को जन्म देती हैं। अलोय (Aloe), अगेव (Agave) आदि पौधों में पत्र-प्रकलिका देखने को मिलता है।



  • रिक्तिका या रसधानियाँ क्या होती है ? रिक्तिका के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य | Vacuoles – वेक्यूल in Hindi

    रिक्तिका या रसधानियाँ क्या होती है ? रिक्तिका के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य | Vacuoles – वेक्यूल in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेंगे की रिक्तिका जिन्हें रसधानियाँ भी कहा जाता है क्या होती है ? रिक्तिका (Vacuoles) के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य क्या है ? आदि

    रिक्तिका (Vacuoles) किसे कहते है ? रसधानियाँ क्या है ?

    कोशिका की रसधानियाँ (vacuoles) यानी रिक्तिकाएं इकहरी झिल्ली (टोनोप्लास्ट) से घिरी तथा तरल पदार्थों से भरी रचनाएँ होती हैं। पादप कोशिका में, यह बड़े आकार में, जबकि जन्तु कोशिका में ये अनेक और बहुत ही छोटे आकार में होती है।बहुक्रियाशील ऑर्गेनेल सभी पौधों और कवक की कोशिकाओं में पाए जाते हैं, साथ ही कुछ प्रोटिस्ट, पशु और बैक्टीरिया कोशिकाओं में भी पाए जाते हैं | रिक्तिका सबसे महत्वपूर्ण सेल ऑर्गेनेल (कोशिकांग) में से एक है और कई कार्य करता है, जिसमें शामिल हैं: जल अवशोषण, सेल रंग, चयापचय से विषाक्त पदार्थों को हटाने, पोषक तत्वों का भंडारण आदि |

    रिक्तिकाएं/रसधानियाँ छोटी अथवा बड़ी हो सकती हैं। इनके अंदर ठोस या तरल पदार्थ भरा रहता है। जन्तु कोशिकाओं में रसधानियाँ छोटी होती हैं जबकि पादप कोशिकाओं में ये बड़ी होती हैं।

    “रिक्तिका” शब्द “लैटिन” “वेकस” से आया है जिसका अर्थ है “रिक्त”, क्योंकि ये माइक्रोस्कोप के साथ देखे जाने पर एक खाली जेब की तरह दिखते हैं.

    दरअसल, कोशिका के साइटोप्लाज्म में रिक्तिकाएं छोटे डिब्बे होते हैं, हालांकि, इन्हें मानव आंख द्वारा देखा जा सकता है, इनमें रसायन और एंजाइम होते हैं जो पदार्थों (जैसे कि भोजन और विषाक्त यौगिकों) को निकलने की अनुमति देते हैं।

    रिक्तिका के लक्षण एवं विशेषताएं

    रिक्तिका मुख्य रूप से पानी और अमीनो एसिड से बने होते हैं। इसके अलावा, रिक्तिका के भीतर के तरल पदार्थ में एंजाइम, शक्कर, खनिज लवण (पोटेशियम, सोडियम), ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और कुछ वर्णक शामिल हैं जो पौधों और फूलों की पत्तियों के रंग के लिए जिम्मेदार हैं ।

    रिक्तिकाएं चारों ओर से एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली (लिपिड) से घिरी रहती है, जो नमक के पानी को साइटोप्लाज्म से बाहर रखने की अनुमति देता है। जिसे टोनोप्लास्ट (Tonoplast) कहते हैं।

    वेकॉल्स तब बनते हैं जब एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम द्वारा छोड़े गए पुटिकाएं और गोलगी तंत्र द्वारा छोड़े गए एक एकल अंग में जुड़े होते हैं ।

    रिक्तिका का कोई विशिष्ट आकार या आकार नहीं होता है। ये दो विशेषताएं सेल की व्यक्तिगत जरूरतों पर निर्भर करेंगी।

    नई कोशिकाओं में छोटे रिक्तिका की एक श्रृंखला होती है; हालांकि, जब कोशिका परिपक्व होती है, तो ये छोटे जीव एकल केंद्रीय रिक्तिका में फ्यूज हो जाते हैं।

    केंद्रीय रिक्तिका कोशिका के आयतन का 90% भाग लेती है और 95% रह सकती है जब वह पानी के अवशोषण द्वारा फैलती है।

    पौधों में रिक्तिकाएं जानवरों की कोशिकाओं में लाइसोसोम के समान कार्य करती हैं, क्योंकि दोनों ऐसे थैली होते हैं जिनमें पाचन एंजाइम होते हैं।

    रिक्तिका के कार्य (Function of Vacuoles)

    • रिक्तिका को कोशिका का भण्डार घर कहा जाता है, जिसमें खनिज लवण, शर्करा, कार्बनिक अम्ल, O2 एवं Co2 आदि भरे होते हैं। इसमें स्थित रसधानी रस के कारण ही कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) बनी रहती है। इसमें एक वर्णक एन्थोसायनिन पाया जाता है।
    • रिक्तिकाएं उन पोषक तत्वों का स्रोत होती हैं जिन्हें अंकुरण के दौरान बीज की आवश्यकता होती है ।
    • पादप कोशिकाओं की रिक्तिका में कोशिका रस (Cell sap) भरा रहता है जो कि निर्जीव पदार्थ होता है।
    • जन्तु कोशिका में रिक्तिका जल संतुलन का कार्य करती हैं।
    • पादप कोशिका में ये स्फीति (Turgidity) तथा कठोरता प्रदान करती है।
    • रिक्तिका कोशिका के साइटोप्लाज्म की अम्लता को अवशोषित करती है ।
    • रिक्तिकाएं साइटोसोल को विषाक्त पदार्थों, जैसे भारी धातुओं और हर्बिसाइड्स से बचाती हैं ।
    • कुछ एक कोशिकीय जीवों में विशिष्ट रसधानियाँ कुछ अपशिष्ट पदार्थों की शरीर से बाहर निकालने में सहायक होती हैं। पादप कोशिका का यह 90 प्रतिशत स्थान घेरता है।
    • इनमें भोज्य पदार्थ संचित रहते हैं। जलीय पौधों की रसधानियाँ गैसयुक्त होकर पौधों को तैरने में मदद करती हैं।
    • रिक्तिकाएं कवक एवं पौधों की कोशिकाओं के छोटे पुटिका होते हैं जो पानी शर्करा जैसे विभिन्न पदार्थों के भंडारण की अनुमति देते हैं। कई पुटिकाओं का संलयन रिक्तिका के विकास की अनुमति प्रदान करता है, जिनके समोच्च को प्लाज्मा झिल्ली द्वारा सीमांकित किया जाता है।
    • टर्गर एक घटना है जो तब होती है जब कोशिका आंतरिक तरल पदार्थ द्वारा निकाले गए बल के कारण सूज जाती है ।
    • यह घटना सेल की दीवार पर अधिक दबाव उत्पन्न करती है। रिक्तिकाएं पानी (हाइड्रोस्टेटिक दबाव) का उपयोग करके इस दबाव का हिस्सा छोड़ती हैं, जो सेल और पौधे की कठोरता को बनाए रखने में मदद करता है ।
    • जानवरों के विपरीत, पौधों में स्वयं उत्सर्जन की प्रणाली नहीं होती है, इसलिए यह अपशिष्ट और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने के अन्य तरीकों पर निर्भर करता है ।
    • कोशिका अणु से छुटकारा पाने के लिए रिक्तिका का उपयोग करती है जिसकी उसे आवश्यकता नहीं है। इसे प्राप्त करने के लिए, रिक्तिका अवांछित तत्व को अवशोषित करती है और बाद में, सेल की दीवार की ओर बढ़ती है ।
    • एक बार सेल की दीवार में, रिक्तिका इसके साथ फ़्यूज़ हो जाती है, “कचरा” खोला और निष्कासित कर दिया जाता है। फिर, यह अंग कोशिका की दीवार से बंद हो जाता है और अलग हो जाता है ।
    • रिक्तिका के अंदर अम्लीय वातावरण, साथ ही साथ इस अंग में मौजूद एंजाइम बड़े अणुओं को ख़राब करने में मदद करते हैं जिन्हें रिक्तिका में भेजा जाता है ।
    • टोनोप्लास्ट साइटोप्लाज्म से रिक्तिका में हाइड्रोजन आयनों को ले जाने में हस्तक्षेप करता है, जिससे पर्यावरण की अम्लता बढ़ जाती है। इस अर्थ में, वेक्यूल जानवरों की कोशिकाओं में लाइसोसोम जैसा दिखता है ।
  • राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    इस आर्टिकल में राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार के बारे में जानेगें | राइबोसोम की खोज किसने की ? उसके प्रमुख कार्य क्या है ? राइबोसोम को प्रोटीन का कारखाना (फैक्ट्री) क्यों कहा जाता है ? राइबोसोम के प्रकार क्या है आदि के बारे में जानकारी लेगें |

    राइबोसोम का परिचय (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम एक गोलाकार, दो उपइकाइयों के बने, झिल्ली विहीन राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन के सूक्ष्म कण होते हैं, जो हरितलवक, केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य में (अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर राइबोफोरोन प्रोटीन द्वारा जुड़ा) पाए जाते हैं।

    यह एक झिल्ली विहीन कोशिकांग है। राइबोसोम सभी कोशिकाओं (सार्वभौमिक कोशिकांग) में पाया जाता है। कोशिकाद्रव्य में यह स्वतंत्र रूप में तथा खुरदरीअन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर दाने के रूप में पाया जाता है। राइबोसोम सबसे छोटी कोशिकांग इकाई भी है और इसका आकार 15-20nm होता है।

    राइबोसोम RBC कोशिका को छोड़कर शेष सभी कोशिकाओं में (यूकैरियोटिक कोशिकाप्रोकैरियोटिक कोशिका) में पाया जाता है। ये प्रोटीन संश्लेषण नामक प्रक्रिया में अमीनो एसिड से प्रोटीन को बनाते हैं | राइबोसोम परिपक्व आरबीसी (Mature RBC) में अनुपस्थित होता हैं। रीबोफोरिन प्रोटीन की मदद से RER (खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका) पर उपस्थित होता है।

    राइबोसोम की खोज (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम की खोज सर्वप्रथम रोमानिया के जीववैज्ञानिक जॉर्ज पैलाडे (George Emil Palade) ने 1955 में की थी | उन्होंने इस खोज के लिए इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग किया था जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। राइबोसोम नाम 1958 में वैज्ञानिक रिचर्ड बी. रॉबर्ट्स (Richard B. Roberts) ने प्रस्तावित किया था।

    राइबोसोम और उसके सहयोगी अणु 20वीं शताब्दी के मध्य से जीवविज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। 7 अक्टूबर, 2009 को भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन को रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें राइबोसोम की कार्यप्रणाली व संरचना के उत्कृष्ट अध्ययन के लिए यह पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया |

    राइबोसोम की संरचना (Structure of Ribosome)

    प्रत्येक राइबोसोम लगभग दो गोलाकार सबयूनिट्स (Subunits) का बन जाता है. इनमें एक छोटी (छोटी इकाई) एवं एक बड़ी सब-यूनिट (बड़ी उप इकाई) होती है | छोटी इकाई की आकृति अण्डाकार एवं बड़ी इकाई की आकृति गुंबद के आकार जैसी होती है

    छोटी इकाई व बड़ी उप इकाई के क्रमशः कार्य m- RNA को जोड़ना व t- RNA को जोड़ने का काम करते हैं। राइबोसोम की संरचना के स्थाइत्व के लिए mg2+ की आवश्यकता होती है जिसका मान 0.001 मोलर होता है।

    राइबोसोम की बड़ी उपइकाई में तीन स्थल (साइट) होते हैं :

    ए-स्थल (A-Site): – यह अमीनोएसिल स्थल तथा टी-आरएनए के लिए ग्राही स्थल होता है।

    पी-स्थल (P-Site): – यह पेप्टाइडल साइट, पेप्टाइड श्रंखला के दीर्घीकरण के लिए स्थल होता है।

    ई-स्थल (E-Site): – यह टी-आरएनए के लिए राइबोसोम से बाहर निकलने के लिए स्थल होता है।

    इसकी उपइकाईयाँ राइबोप्रोटीन और आर-आरएनए द्वारा बनी होती है। जो निम्न प्रकार की होती है-

    50s उपइकाई – 34% प्रोटीन + 23 एस और 5 एस आर-आरएनए

    30s उपइकाई – 21% प्रोटीन + 16 एस आर-आरएनए

    60s उपइकाई – 40% प्रोटीन + 28 एस, 5.8 एस और 5 एस आर-आरएनए

    40s उपइकाई 33% प्रोटीन + 18 एस आरआरएनए

    Ribosome का निर्माण न्यूक्लियोलस (केन्द्रिक) में 40-60% प्रोटीन और 60-40% आरएनए द्वारा होता है। न्यूक्लियोलस को राइबोसोमल उत्पादक फैक्टरी (Ribosomal Manufactring Factory) माना जाता है।

    राइबोसोम के प्रकार (Types of Ribosome)

    राइबोसोम प्रोकेरियोटिक कोशिका और यूकैरियोटिक कोशिका दोनों में पाया जाता है। राइबोसोम के प्रकार निम्न है-

    प्रोकेरीयोट राइबोसोम (Prokaryotic Ribosome) 

    प्रोकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 70S  प्रकार का पाया जाता है जो बड़ी उप इकाई 50S की इकाई 25s + 5S) एवं छोटी उप इकाई 30S की इकाई 16S प्रकार की बनी होती है

    युकेरीयोट  राइबोसोम (Eukaryotic Ribosome)

    यूकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 80S प्रकार का पाया जाता हैं जो बड़ी उप इकाई 60S की इकाई (28S + 5.8S + 5S) एवं छोटी उप इकाई 40S की इकाई 18S  प्रकार की बनी होती है।

    हरितलवक राइबोसोम (Chloroplast Ribosome)

    यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है।

    माइटोकांड्रिया राइबोसोम (Mitochondrial Ribosome)

    माइटोकॉन्ड्रिया के राइबोसोम को माइटोराइबोसोम भी कहते हैं यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है। माइटोकॉन्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट का राइबोसोम 70S प्रकार का पाया जाता है। क्लोरोप्लास्ट के राइबोसोम को प्लास्टीड्यिल राइबोसोम कहते हैं।

    ध्यान दें :

    s = अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) (राइबोसोम के आकार की मापने की इकाई होती है)

    70S राइबोसोम्स: ये आकार में छोटे होते हैं एवं इनका अवसादन गुणांक 70S होता है. ये माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट एवं बैक्टीरिया आदि में पाए जाते हैं |

    80S राइबोसोम्स: ये आकार में कुछ बड़े होते हैं और इनका अवसादन गुणांक 80S होता है. ये उच्च विकसित पौधों एवं जन्तु कोशिकाओं में पाए जाते हैं |

    राइबोसोम की प्रमुख विशेषताएं

    • राइबोसोम झिल्ली विहीन (Membraneless) होते हैं।
    • राइबोसोम कोशिकाद्रव्य, माइटोकॉन्ड्रिया, केंद्रक, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, हरितलवक में पाए जाते है।
    • यह गोलाकार (spherical) होते हैं।
    • इनका व्यास 150- 250 Å होता है
    • यह राइबोप्रोटीन तथा mRNAके बने होते हैं।
    • इनके आकार का निर्धारण अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) के आधार पर किया जाता है।

    राइबोसोम के कार्य (Functions of Ribosome)

    राइबोसोम एक ऐसी कोशिका संरचना है जो प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक होती है | कई कोशिकाओं को उनकी मरम्मत या रासायनिक प्रक्रियाओं को निर्देशित करने के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है | राइबोसोम का मुख्य कार्य अमीनों अम्ल के द्वारा प्रोटीन संश्लेषण में सहायता करना है | प्रोटीन के निर्माण की प्रक्रिया ट्रांसलेशन या अनुवादन (Translation) कहलाती है।

    पॉलीराइबोसोम

    प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)के दौरान कई Ribosome एम-आरएनए से जुड़कर एक सरंचना बनाता है, जिसे पॉलीराइबोसोम या पोलीसीम कहा जाता है।

    राइबोसोम को प्रोटीन की फैक्ट्री क्यों कहा जाता है ?

    चूँकि राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) में भाग लेता है, इसलिए इसे सेल के इंजन या प्रोटीन फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है। इस को कोशिका का प्रोटीन कारखाना (Protein Factory of the Cell) या प्रोटीन की फैक्ट्री कहा जाता है |

    यदि कोशिका में राइबोसोम हटा दिया जाए तो क्या होगा?

    यदि कोशिका से राइबोसोम हटा दिए जाते हैं, तो प्रोटीन संश्लेषण नहीं होगा। इस प्रकार कोशिका चयापचय उत्पादों की कमी के कारण आगे प्रदर्शन करने की क्षमता खो देगी। कोशिका अंततः मर जाएगी | 
  • लाइसोसोम या लयनकाय (Lysosome) क्या है ? लाइसोसोम का निर्माण, प्रकार एवं कार्य

    लाइसोसोम या लयनकाय (Lysosome) क्या है ? लाइसोसोम का निर्माण, प्रकार एवं कार्य

    लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं, जो लगभग 5pH पर कार्य करते हैं। इसमें पाचन एंजाइम होते हैं।

    लाइसोसोम की खोज डी डवे (De Duve) ने की थी। एलेक्स नोविकॉफ़ (Alex Novikoff ) ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप द्वारा कोशिका में लाइसोसोम को देखा तथा इसे लाइसोसोम नाम दिया।

    Lysosome शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों Lyso तथा Soma से बना है। लाइसो का अर्थ पाचक तथा सोमा का अर्थ काय है यानि Lysosome का अर्थ पाचककाय या लयनकाय है।

    लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली क्यों कहा जाता है ?

    लाइसोसोम कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है। लाइसोसोम विभिन्न कोशिका प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। वे अतिरिक्त या घिसे-पिटे सेल भागों को तोड़ देते हैं। उनका उपयोग हमलावर वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए किया जा सकता है। यदि कोशिका मरम्मत से परे क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो लाइसोसोम एपोप्टोसिस (programmed cell death, or apoptosis) नामक प्रक्रिया से स्वयं का आत्म-विनाश कर सकते हैं।

    लाइसोसोम का निर्माण

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) और गॉल्जी काय (Golgi body) के द्वारा लाइसोसोम का निर्माण के द्वारा होता है।

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) के द्वारा  लाइसोसोम के एंजाइमों का निर्माण होता है। तथा चारों ओर की झिल्ली का निर्माण गॉल्जी काय द्वारा होता है।

    लाइसो सोम के प्रकार (Types of Lysosome)

    लाइसोसोम के चार प्रकार होते हैं: –

    1. प्राथमिक लाइसोसोम (Primary lysosome)
    2. द्वितीयक लाइसोसोम (Secondary Lysosome)
    3. अवशिष्ट काय (Residual body)
    4. ऑटोफैगोसोम (Autophagosomes)

    लाइसोसोम के कार्य (Functions of Lysosome)

    1. फागोसाइटोसिस या पिनोसाइटोसिस के माध्यम से कोशिका में प्रवेश करने वाले कणों का पाचन करना। इसे हेटरोफैगी (Heterophagy) कहते है।
    2. कोशिका के आंतरिक पदार्थो का पाचन करना। इसे ऑटोफैगी कहते है।
    3. ऑटोलाइसिस प्रक्रिया से पुरानी कोशिकाओं और संक्रमित कोशिकाओं नष्ट किया जाता हैं। कोशिका के सभी लाइसो सोम फट जाते है जिससे इसके सभी पाचक एंजाइम कोशिकांगों को पचाने लगते हैं। इसलिए इसे कोशिका की आत्मघाती थैली (Suicidal bag of the cell) भी कहते है।

    लाइसोसोम के कार्य करने की प्रक्रिया

    लाइसोसोम एक विशिष्ट प्रकार का अंग होता है जो बहुत अम्लीय होता है। तो इसका मतलब है कि इसे सेल के अंदर के बाकी हिस्सों को damage होने से बचाना होगा ।

    यह एक कम्पार्टमेंट है, जिसके चारों ओर एक झिल्ली होती है जो पाचन एंजाइमों को संग्रहीत करती है जिन्हें इस एसिड, निम्न-पीएच (low-pH) वातावरण की आवश्यकता होती है। उन एंजाइमों को हाइड्रोलाइटिक एंजाइम ( hydrolytic enzymes) कहा जाता है, और वे बड़े अणुओं को छोटे अणुओं में तोड़ देते हैं।

    उदाहरण के लिए, ये एंजाइम बड़े प्रोटीन को अमीनो एसिड में, या बड़े कार्बोहाइड्रेट को सरल शर्करा में, या बड़े लिपिड को एकल फैटी एसिड में बदल देते है और जब वे ऐसा करते हैं, तो वे शेष कोशिका के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं |

    अब मान लीजिये की ये एंजाइम बड़े अणुओं को छोटे अणुओं में नहीं तोड़े तो शरीर में उन बड़े अणुओं का भंडारण होगा और वह एक प्रकार की बीमारी के रूप में बदल जायेगा । चूँकि लाइसोसोम संक्रमण के खिलाफ कार्य करता है तो कोशिका अक्सर एक जीवाणु को नष्ट करने के लिए इसे अपने लाइसोसोम में डाल देती है। लाइसोसोम उस जीवाणु को नष्ट कर देता है |

    यदि कोशिका में लाइसोसोम को हटा दे तो क्या होगा ? What if remove lysosome from cell ?

    स्तनधारी कोशिकाएं (Mammalian cells ) सैकड़ों लाइसोसोम से जुडी होती हैं, जिनमें 60 से अधिक विभिन्न प्रकार के एंजाइम पाए जाते हैं जो खराब हो चुके कोशिका भागों और बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं और एक कोशिका के स्वयं के वसा, शर्करा और प्रोटीन का पुनर्चक्रण करते हैं। इस तरह यदि कोशिका में लाइसोसोम नही हो तो एंजाइम कोशिका को पूरी तरह खत्म कर सकते है ।

  • अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) क्या है ? उसके प्रकार, संरचना और कार्य (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में )

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) क्या है ? उसके प्रकार, संरचना और कार्य (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में )

    इस आर्टिकल में हम जानेगें की अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)या अंतर द्रव्य जालिका किसे कहते है ? अन्तःप्रद्रव्यी जालिका कितने प्रकार की होती है ? अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) की सरंचना कैसी होती है ?, और अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के कार्य क्या होते है ? और अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के रूपांतर क्या होते है ? आदि

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका ( एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम) या अंतर द्रव्य जालिका क्या है ?

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका झिल्ली युक्त नलिकाओं का एक बहुत बड़ा तन्त्र होता है। यह दोहरी झिल्ली से घिरी होती है। यह जन्तु एवं पादप कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अत्यंत सूक्ष्म, शाखित, झिल्लीदार, अनियमित नलिकाओं के घने जाल के रूप में पाई जाती है ।  यह लाइपोप्रोटीन की बनी होती है और कोशिकाओं में समानान्तर नलिकाओं के रूप में फैली रहती है। कोशिकाओं में इनका विस्तार कभी-कभी केन्द्रक की बाह्य झिल्ली से प्लाज्मा झिल्ली तक होता है।

    Endoplasm का अर्थ है जीवद्रव्य में और रेटिकुलम (reticulum) का अर्थ होता है एक प्रकार का जाल या जालिका | एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की इस झिल्ली को पहली बार 1945 में कीथ आर. पोर्टर, अल्बर्ट क्लाउड और अर्नेस्ट एफ. फुलम द्वारा देखा गया था। बाद में, रेटिकुलम शब्द, जिसका अर्थ है “जाल या नेटवर्क”, पोर्टर द्वारा 1953 में इस झिल्ली युक्त नलिकाओं का वर्णन करने के लिए लागू किया गया था।

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम को झिल्ली युक्त नलिकाओं का पूरा एक नेटवर्क होने के कारण झिल्लियों का तंत्र (system of membrane) भी कहा जाता है।

    यह परिपक्व RBC को छोड़कर सभी यूकेरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाता है। मांसपेशियों में एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम को सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम कहा जाता है। जिसमें Ca की अधिकता होती है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका की संरचना (Structure of Endoplasmic reticulum)

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की सामान्य संरचना सिस्टर्न नामक झिल्लियों का एक बना एक जाल या नेटवर्क होता है।

    ये थैली जैसी संरचनाएं साइटोस्केलेटन (cytoskeleton) द्वारा एक साथ रखी जाती हैं। फॉस्फोलिपिड झिल्ली (phospholipid membrane) सिस्टर्नल स्पेस (या लुमेन) को घेर लेती है, जो पेरिन्यूक्लियर स्पेस (perinuclear space) के साथ निरंतर होती है लेकिन साइटोसोल से अलग होती है।

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम तीन प्रकार की सरंचनाओं का एक जाल होता है जो निम्न है :

    सिस्टर्नी (Cisternae)

    ये लंबी, चपटी, अशाखित झिल्ली से बनी संरचना है। ये सिस्टर्नी समानांतर व्यवस्थित होकर  लैमिली (lamellae) का निर्माण करती हैं। ये खुरदरी अन्त: प्रद्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum or RER) में अच्छी तरह से विकसित होती है।

    पुटिका (Vesicle)

    ये सिस्टर्नी से अलग, गोल और अंडाकार थैलीनुमा संरचना हैं, जो चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका (Smooth endoplasmic reticulum – SER) में प्रचुर मात्रा में पायी जाती हैं।

    नलिकाएँ (Tubule)

    ये पुटिका तथा सिस्टर्नी से अलग-थलग और शाखित संरचना हैं जो चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका में अच्छी तरह से विकसित है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के समान होती है, लेकिन इसके घटक भागों को अलग किया जा सकता है। गॉल्जीकाय (Golai Body) की तरह जीवद्रव्य में इसका कोई निश्चित स्थान नहीं है

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के प्रकार (Types of Endoplasmic reticulum)

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका दो प्रकार की खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका खुरदरी अन्त: प्रद्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum or RER) तथा चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका (Smooth endoplasmic reticulumSER) होती है।

    खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum)

    खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (rough ER) का खुरदरापन उस पर स्थित राइबोसोम के कारण होता है। राइवोसोम पर प्रोटीन-संश्लेषण होता है। RER में राइबोसोम की बड़ी उपइकाई राइबोफ़ोरिन नामक ट्रांसमेम्ब्रेग्लाइकोप्रोटीन द्वारा जुड़ी होती है।

    अन्त:प्रद्रव्यी जालिका का प्रमुख कार्य उन सभी वसाओं व प्रोटीनों का संश्लेषण करना है, जो विभिन्न कोशिका झिल्ली अथवा केन्द्रक झिल्ली का निर्माण करते हैं।

    खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Rough Endoplasmic Reticulum-RER)

    इसके द्वारा लाइसोसोम के एंजाइमों का निर्माण किया जाता है। विभिन्न प्रकार की प्रोटीन का संश्लेषण (Synthesis of Protein) करती है | ग्लाइकोसिलेशन (Glycosylation) की प्रक्रिया RER में ही होती है।
    RER में प्रोटियोसोम (proteasome) की सहायता से अनफोल्डेड प्रोटीन (Unfolded protein) को नष्ट किया जाता है।

    चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulum)

    चिकनी अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (smooth ER) पर राइबोसोम नहीं पाए जाते हैं। SER कोशिकाझिल्ली के लिपिड का संश्लेषण तथा स्टेरॉयड हार्मोन संश्लेषण का प्रमुख स्थल है।

    चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Smooth Endoplasmic Reticulum)

    SER पर एस्कॉर्बिक एसिड (Vitamin C) का संश्लेषित किया जाता है। इसी पर विटामिन ए से रेटिना के वर्णकों का निर्माण होता है।
    ये लिपिड संश्लेषण और स्टेरॉयड हार्मोन में भाग लेता है
    ऑक्सीजन स्थानांतरण एंजाइम (ऑक्सीजिनेज) की सहायता से SER आविषालु पदार्थ की विषालुता को कम (Detoxification of drug) किया जाता है।
    पौधों में SER स्फिरोसोमे (Sphaerosomes) का निर्माण करती है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के रूपांतरण (Modification of Endoplasmic Reticulum)

    सारकोप्लाज्मिक रेटिकुलम (Sarcoplasmic reticulum)

    ये SER के रूपांतरण से बनते है। इनमें Ca2+ संचित रहता है। कंकाली पेशियों और हृद पेशियों में सारकोप्लाज्मिक रेटिकुलम पाए जाते है।

    ग्लाइकोसोम (Glycosome)

    यकृत कोशिकाओं में SER ग्लाइकोजन का संग्रहण करता है जिसे ग्लाइकोसोम कहते है।

    माइलॉयड काय (Myeloid Bodies)

    ये रेटिना की वर्णकित उपकला कोशिकाओं (pigmented epithelial cells) में मौजूद विशेष प्रकार की SER हैं। ये प्रकाश संवेदी (light sensitive) होते है |

    एर्गैस्टोप्लाज्म (Ergastoplasm)

    ये ER की लैमिला (lamellae) में पाए जाने वाले राइबोसोम का समूह हैं।

    माइक्रोसोम (Microsome)

    ये राइबोसोम से संबंधित ER का हिस्सा हैं। जो जीवित कोशिकाओं में नहीं पाया जाता। इनका पात्रे प्रोटीन संश्लेषण (in vitro protein synthesis) के अध्ययन में उपयोग किया जाता है।

    टी-नलिकाएं (T-Tubules)

    ये कंकाली पेशियों और हृद पेशियों की कोशिकाओं में अनुप्रस्थ व्यवस्थित होते हैं। ये पेशियों की कोशिकाओं में संकुचन को उत्तेजित और संचालित करते हैं।

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका आर्टिकल में शामिल महत्वपूर्ण प्रश्न :

    • अंतर द्रव्य जालिका की खोज किसने की थी?
    • एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की खोज किसने की
    • एण्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम in Hindi क्या है ?
    • अन्तः प्रदव्ययी जलिका परिभाषा
    • अंतर द्रव्य जालिका का चित्र
    • अंतर द्रव्य जालिका को इंग्लिश में क्या कहते हैं
    • अंतर द्रव्य जालिका कितने प्रकार की होती हैं
    • अन्तः प्रदव्ययी जलिका के कार्य
    • अंतर द्रव्य जालिका के प्रमुख कार्य क्या है?
    • Smooth endoplasmic reticulum in Hindi
    • चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका क्या है ?
    • खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Rough Endoplasmic Reticulum-RER) क्या है ?